NCERT Class 12 Business Studies Chapter 10 Notes in Hindi वित्तीय बाजार Pdf

WhatsApp Group (Join Now) Join Now
Telegram Group (Join Now) Join Now

NCERT Class 12 Business Studies Chapter 10 Notes in Hindi वित्तीय बाजार Pdf

कक्षा | Class12th 
अध्याय | Chapter10
अध्याय का नाम | Chapter Nameवित्तीय बाजार | FINANCIAL MARKET
बोर्ड | Boardसभी हिंदी बोर्ड
किताब | Book एनसीईआरटी | NCERT
विषय | Subjectव्यवसाय अध्ययन | business studies
मध्यम | Medium हिंदी | HINDI
अध्ययन सामग्री | Study Materialsप्रश्न उत्तर | Question answer
Download Pdfclass 12 business studies chapter 10 notes pdf

वित्तीय बाजार | FINANCIAL MARKET

पाठ की प्रमुख बातें—पूँजी बाजार की अवधारणा का सम्बन्ध दीर्घकालीन वित्त से है। पूजी बाजार से आशय उन सभी वित्तीय स्रोतों से है जिनके द्वारा औद्योगिक एवं वाणिज्यिक संस्थाओं को दीर्घकालीन वित्त उपलब्ध कराया जाता है। पूँजी बाजार में उन वित्तीय परिसम्पत्तियों में व्यवहार किया जाता है जो कि दीर्घकालीन अवधि की होती है, जैसे—अंश, ऋणपत्र, बॉण्ड तथा अन्य दीर्घकालीन प्रतिभूतियाँ ।

प्राथमिक बाजार से आशय उस बाजार से है जिसमें दीर्घकाल के लिये पूँजी एकत्रित करने के उद्देश्य से अंशों, ऋणपत्रों, बॉण्डों व अन्य प्रतिभूतियों को पहली बार बेचा जाता है। इस प्रकार इस बाजार का सम्वन्ध नवीन निर्गमनों से होता है। इस कारण प्राथमिक बाजार को नव निर्गमन बाज़ार (News Issues Market) भी कहते हैं। इस बाजार के माध्यम से नई तथा पुरानी दोनों प्रकार की कम्पनियाँ आवश्यक पूँजी एकत्रित कहती हैं। 

1 4

गौण बाजार से आशय उस बाजार से है जहाँ पर पूर्व निर्गमित प्रतिभूतियों का क्रय-विक्रय होता है। कोई भी प्रतिभूति (अंश एवं ऋणपत्र आदि) जब प्रथम बार बेची जाती है तो यह प्राथमिक बाजार की क्रिया होती है, परन्तु जब उसी प्रतिभूति का पुनः क्रय-विक्रय स्कन्य विपणि (Stock Exchange) के माध्यम से होता है। 

इस समय भारत में कुल मिलाकर 24 स्कन्च विपणियाँ है जो कि भारत के विभिन्न भागों में फैली हुई हैं। इसमें से सबसे प्रमुख स्कन्च विपणियाँ बम्बई (मुम्बई) स्कंध विपणि तथा भारतीय राष्ट्रीय स्कन्य विपणि लि. मुम्बई है। यहाँ पर केवल उन्हीं प्रतिभूतियों (अंशों) का क्रय-विक्रय होता है जो पहले से इनमें अनुसूचित (Listed) है। 

यह क्रय-विक्रय इनमें पूंजीकृत दलालों के माध्यम से होता है। मुद्रा बाजार से आशय ऐसे बाजार से है जो अल्पकालीन कोषों में व्यवहार करता है। इसके अन्तर्गत उन सभी व्यक्तियों, संस्थाओं एवं संगठनों को शामिल किया जाता है जो अल्पकालीन कोषों का प्रबन्ध एवं उपयोग करते हैं। इस प्रकार मुद्रा बाजार के अन्तर्गत अल्पकालीन कोषों के उधार देने वाले तथा लेने वाले, दोनों शामिल होते हैं।

स्कन्ध विनिमय-विपणि से आशय एक ऐसे स्थायी एवं सुसंगठित बाजार से है जहाँ संयुक्त पूँजी वाली कम्पनियों के विभिन्न प्रकार के अंश, ऋण-पत्रादि, जन उपयोगी संस्थाओं तथा सरकारी प्रतिभूतियों का क्रय-विक्रय होता है।

ओवर-द-काउण्टर एक्सचेंज ऑफ इण्डिया को ओटीसीआई (OTCI) के नाम से भी जाना जाता है। ओटीसीआई का प्रधान कार्यालय मुम्बई में स्थित है। इसने अपने कार्यालय भारत के कई अन्य नगरों में भी स्थापित कर लिये हैं। इसके व्यापार की कार्य-प्रणाली में भिन्नता है। 

इसमें न केवल इसके सदस्य वल्कि इच्छुक कम्पनियाँ एवं विनियोजक भी कारोबार कर सकते हैं। इसके कार्यकलापों का पर्यवेक्षण भारत सरकार एवं सेबी (SEBI) के द्वारा किया जाता है। यह एक विशिष्ट प्रकार की विपणि है जिसका अपना एक निजी भीतिक स्थान नहीं है अर्थात इसका बाजार विपणि के अनेक परिचालकों के काउण्टरों के माध्यम से ही सम्पूर्ण देश में फैला हुआ है। 

ओटीसीआई विपणि एक प्रमाणपत्रविहीन (Scripless), परिधिरहित ( Ringless) इलेक्ट्रॉनिक विपणि है जिसमें सतत् संचार माध्यमों से प्रतिभूतियों की क्रय-विक्रय की राष्ट्रव्यापी व्यवस्था संचालित की जाती है।

राष्ट्रीय स्कन्ध विपणि ऑफ इण्डिया लिमिटेड एक नवीन स्वचालित स्कन्ध विपणि है जिसका मूलभूत उद्देश्य राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिभूति व्यापार सेवाएँ प्रदान करना है। इसकी स्थापना फेरवानी समिति की सिफारिशों पर नवम्बर, 1992 में एक गैर-लाभ कमाने वाली सार्वजनिक कम्पनी के रूप में की गई थी। 

यह भारत की प्रमुख स्कन्ध विपणि है जिसका प्रधान कार्यालय मुम्बई में स्थित है तथा यह वर्त्तमान में लगभग 400 नगरों एवं करवों में कार्यरत है। यह विभिन्न कम्पनियों के अंशों, ऋणपत्रों, बॉण्डों आदि तथा सरकारी प्रतिभूतियों में कार्य करती है।

प्रतिभूतियों के व्यवसाय में निवेशकों के हितों की सुरक्षा करने, देश भर में फैली हुई स्कंप यो के कामकाज की देखभाल करने एवं उनपर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करने के उद्देश्य से धरतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड की स्थापना की गई। इसे ‘सेबी’ (SEBI) के नाम से भी चुना जाता है। 

इसकी स्थापना भारतीय संसद द्वारा पारित ‘भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992’ (SEBI Act, 1992) के अन्तर्गत एक सांविधिक निकाय के रूप में की गई। है। इसे वैधानिक दर्जा प्राप्त है जिसका पृथक वैधानिक अस्तित्व एवं अविच्छिन्न उत्तराधिकार है। इसका प्रमुख कार्यालय मुम्बई में स्थित है तथा क्षेत्रीय कार्यालय क्रमशः दिल्ली, कोलकाता तथा धन्नई में स्थित है।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न (VERY SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS)

Q. 1. पूँजी बाजार की अवधारणा का वर्णन करें। *( Discuss the concept of capital market.)

Ans. पूँजी बाजार की अवधारणा (Concept of Capital Market ) — पूँजी बाजार की अवधारणा से आशय ऐसे बाजार से है जिसमें दीर्घकालीन प्रतिभूतियों में व्यवहार किया जाता है, जैसे अंश, ऋणपत्र, बॉण्ड आदि।

Q. 2. पूँजी बाजार की प्रकृति का उल्लेख करें। (Explain the nature of capital market.)

Ans. पूँजी बाजार की प्रकृति (Nature of Capital Market) 1. दीर्घकालीन प्रतिभूतियों व्यवहार, 2. वित्तीय बाजार का अंग, 3. दो खण्डों का होना (अ) प्राथमिक बाजार तथा व) गौण बाजार, 4. विचीलिए 5. पूँजी निर्माण में सहायक, 6. दो प्रारूप का होना

अ) संगठित पूँजी बाज़ार तथा (व) असंगठित पूँजी बाजार, 7. तरलता में सहायक तथा, 3. व्यावहारिक स्वामित्व में भिन्नता ।

Q. 3. पूँजी बाजार के कितने खण्ड हैं ? (How many segments of capital market.) 

Ans. पूँजी बाजार के खण्ड (Segments of Capital Market ) — पूँजी बाजार के नम्न दो खण्ड हैं-

1. प्राथमिक बाजार तथा 2. गीण बाजार।

Q.4. प्राथमिक पूँजी बाजार का अर्थ लिखें। (What is the meaning of primary capital market ? )

Ans. प्राथमिक पूँजी बाजार का अर्थ (Meaning of Primary Capital Market )— थमिक बाजार से आशय उस बाजार से है जिसमें दीर्घकाल के लिए पूँजी एकत्रित करने के द्देश्य से अंशों, ऋणपत्रों, वाण्डों आदि को पहली बार बेचा जाता है।

Q.5. प्राथमिक बाजार की विशेषतायें बतायें। (Explain the characteristics of primary market.)

Ans. प्राथमिक बाजार की विशेषताएँ (Characteristics of Primary Market)- 

1. नवीन निर्गमनों से सम्बन्धित, 2. कोई विशेष स्थान नहीं, 3. गौण बाजार से पहले तथा 5. पूँजी एकमित करने की विभिन्न विधियों (ज) सार्वजनिक निर्गमन (ब) निजी व्यवस्थ (स) अधिकार निर्गमन ।

Q.6. गौण बाजार का अर्थ लिखें। (What is the meaning of secondary market ?)

Ans. गौण बाजार का अर्थ (Meaning of Secondary Market )—गीण बाजार से आशय उस बाजार से है जहाँ पर पूर्व निर्गमित प्रतिभूतियों का क्रय-विक्रय होता है।

Q. 7. गौण बाजार की विशेषताओं का वर्णन करें। (Discuss the characteristics of secondary market.)

Ans. गौण बाजार की विशेषताएँ (Characteristics of Secondary Market)–

1. पूर्व निर्गमित प्रतिभूतियों में ही व्यवहार करता है, 

2. तरलता उत्पन्न करता है,

3. इस एक निश्चित विशेष स्थान होता है, 

4. यह प्राथमिक बाजार के बाद आता है, 

5, प्रतिभूतियों क्रय विक्रम स्कन्य विपणि में पंजीकृत दलालों के माध्यम से होता है, 

6, यह प्रत्यक्ष रूप से पूँजी का निर्माण नहीं करता है तथा 

7. प्रतिभूतियों का क्रय-विक्रय एक विनियोक्ता से दूसरे विनियोक्ता के मध्य होता है।

Q.8. प्राथमिक बाजार तथा गौण बाजार में अन्तर करें। (Differentiate between Primary market and Secondary market.)

Ans. प्राथमिक बाजार तथा गौण बाजार में अन्तर (Distinction between Primary Market and Secondary Market) — इन दोनों में अन्तर के प्रमुख बिन्दु —

1. निर्गमन, 2. क्रय-विक्रय, 3. विशेष स्थान, 4. प्रतिभूतियों का विनिमय, 5. मूल्य निर्धारण, 6. व्यवहार का क्रम, 7. उद्देश्य तथा 8. अवधि । 

Q. 9. पूँजी बाजार का महत्त्व बतायें। (Discuss the importance of Capital market.)

Ans. पूँजी बाजार का महत्त्व (Importance of Capital Market )—1. पूँजी निमांन में सहायक, 2. औद्योगीकरण का आधार, 3. वाजार की व्यापकता, 4. पूँजी का अनुकूलतम उपयोग तथा 5. प्रतिभूतियों में तरलता ।

Q. 10. पूँजी बाजार में प्रमुख ऋण लेनेवालों का वर्णन करें । (Discuss the majors borrowers in capital market.)

Ans. पूँजी बाजार में प्रमुख ऋण लेने वाले (Major Borrowers in Capital market)—1. व्यक्ति एवं/और असमामेलित संस्थाएँ, 2. व्यावसायिक संस्थाएँ, 3. सार्वजनिक संस्थाएँ अथवा उपक्रम तथा 4. सरकारें ।

Q. 11. पूँजी बाजार में प्रमुख कोषों की पूर्ति करने वालों का उल्लेख करें। (Explain the major suppliers of funds in the capital market.)

Ans. पूँजी बाजार में प्रमुख कोषों की पूर्ति करने वाले (Major suppliers of Funds in the Capital Market) 1. व्यक्तिगत निवेशक, 2. संस्थागत निवेशक, 3 बैंक वित्त तदा 4. विशिष्ट वित्तीय संस्थान ।

Q. 12. मुद्रा बाजार का क्या अर्थ है ? (What is meaning of money market ?) 

Ans. मुद्रा बाजार का अर्थ (Meaning of Money Market) मुद्रा बाजार से आशय ऐसे बाजार से है जिसमें अल्पकालीन कोषों में व्यवहार होता है।

Q. 13. मुद्रा बाजार की विशेषतायें लिखें । (Write the characteristics of money market.)

Ans. मुद्रा बाजार की विशेषताएँ (Characteristics of Money Market)— 1. अल्पकालीन प्रतिभूतियों का क्रय-विक्रय होता है, 2. इसमें अत्यधिक तरलता पायी जाती है, 3. अनेक उप-बाजारों का समूह है, 4. वित्तीय बाजार का प्रमुख अंग है, 5. अधिकांश व्यवहार टेलीफोन पर होते हैं, 6. लेन-देन का कार्य दलालों अथवा विचौलियों के माध्यम से होता है, 7. अल्पकालीन वित्तीय पूर्ति तथा अल्पकालीन वित्तीय माँग में सन्तुलन स्थापित करता है तथा 8. मुद्रा बाजार के दो स्वरूप होते हैं— (अ) संगठित मुद्रा बाजार तथा (ब) असंगठित मुद्रा बाजार ।

Q. 14. मुद्रा बाजार के महत्त्व का वर्णन करें। (Discuss the importance of money market.)

Ans. मुद्रा बाजार का महत्त्व (Importance of Money Market)—1. अल्पकालीन निवेश का सुअवसर प्रदान करता है, 2. अल्पकालीन निवेश को तरलता प्रदान करता है, ३. वित्तीय संस्थाओं की अल्पकालीन वित्तीय आवश्यकताओं की पूर्ति करता है, 4. रिजर्व बैंक को भौद्रिक नीति को क्रियान्वित करता है, 5. राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय दोनों प्रकार के व्यवसायों के लिए कोषों को उपलब्ध कराता है, 6. निर्गमित किये जाने वाले प्रपत्रों को सुरक्षा प्रदान करता है, 2.ताओं को उनकी निष्किय या अधिशेष निधि पर अल्प अवधि में ही लाभ अर्जित करने में सहायता प्रदान करता है तथा 8. सरकार, बैंक, उद्योगपति आदि के लिए अल्पकालीन वित्त अवस्था सरलता से हो जाती है।

Q. 15. मुद्रा बाजार के अंग को लिखें। (Write the components of money market.)

Ans. मुद्रा बाजार के अंग उपकरण (Components/Instruments of money (Market)- 1. भोग मुद्रा अल्प सूचना ऋण, 2. कोषागार विपन्न, 3. वाणिज्यिक विपत्र, 4. जमा प्रमाण-पत्र तथा 5. वाणिज्यिक पत्र ।

Q. 16. पूँजी बाजार तथा मुद्रा बाजार में अंतर करें। (Differentiate between capital market and money market.) 

Ans. पूँजी बाजार तथा मुद्रा बाजार में अन्तर (Distinction between Capital Market and Money Market)- इन दोनों में अन्तर के प्रमुख बिन्दु हैं- 1. अर्थ, 2. अवधि, 3. अंग, 4. उद्देश्य, 5. तरलता, 6. सुरक्षा तत्त्व, 7, नियन्त्रण तथा S. क्षेत्र । 

Q. 17. पूँजी बाजार के अंग कौन-कौन से हैं?

Ans. पूँजी बाजार में भाग लेने वालों में व्यक्ति / संस्था (जिसमें सरकार भी शामिल हैं) होते हैं जो दीर्घकालीन कोषों का लेन-देन पूँजी के रूप में या पूँजी के लिए करते हैं। स्कंध विनिमय बाजार व्यापारिक बैंक, सहकारी बैंक, वचत बैंक, विकास बैंक, बीमा कंपनी, विनियोग न्यास तथा कम्पनियों पूँजी बाजार के महत्त्वपूर्ण अंग हैं। 

Q. 18. भारतीय पूँजी बाजार की विशेषताएँ लिखिए।

Ans. 1. पूँजी बाजार में दीर्घकालीन पूँजी का क्रय विक्रयता होता है।

2. पूँजी बाजार में मुद्रा बाजार की क्रियाओं को भी शामिल किया जा सकता है।

3. स्कंप विनिमय बाजार व्यापारिक बैंक बचत बीमा कंपनी विनियोग न्यास आदि पूँजी बाजार के महत्त्वपूर्ण अंग हैं।

Q. 19. पूँजी बाजार के महत्त्व लिखिए।

Ans. 1. एक विकसित पूँजी बाजार संयुक्त स्कन्ध वाली कम्पनियों के विकास में महत्त्वपूर्ण सहयोग दे रहे हैं।

2. पूँजी संसाधनों को इकट्ठा करके साहसी विनियोगकर्ताओं के संसाधन उपलब्ध करा उनकी मदद करता है।

3. विश्व स्तर पर कोषों को आकर्षित करके उन्हें विनियोग करने के लिए एक उत्तम माध्यम प्रदान करता है।

4. पूँजी बाजार छोटी व बिखरी बचतें एकत्रित कर देश के आर्थिक विकास में सहयोग प्रदान करता है।

Q. 20. स्टॉक से आप क्या समझते हैं ?

Ans. स्टॉक एक व्यापक शब्द है जिसमें सभी प्रकार के अंश, ऋणपत्र और बॉण्ड शामिल होते हैं जिन पर समस्त मूल्य कंपनी को मिल जाता है और जिनका शेयर बाजार में विधिवत क्रय-विक्रय होता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न (SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS)

Q.1. ‘मुद्रा बाजार’ क्या है, व्याख्या कीजिए । (What is the ‘Money Market’? Explain it.)

Ans. मुद्रा बाजार (Money Market) वह केन्द्र या बाजार है जिसमें मुद्रा एवं अल्पावधि वित्तीय आस्तियाँ, जो मुद्रा के निकट के प्रतिरूप हैं, ली और दी जाती हैं। मुद्रा बाजार में मुझ विनिमय-पत्रों, प्रतिज्ञा-पत्रों व अल्पकालीन बिलों को मुद्रावत (Near Money) कहा जाता है।

Q. 2. मुद्रा बाजार के अंगों तथा गठन का वर्णन कीजिए। (Explain the composition and constituents of Money Market.)

Ans. मुद्रा बाजार कोई सुगठित बाजार नहीं होता, परंतु वह तो कई बाजारों से मिलकर बनता है, जिसमें प्रत्येक विभिन्न प्रकार के अल्पकालीन ऋणों का कारोबार करता है। साथ ही, प्रत्येक मुद्रा- बाजार के विभिन्न छोटे-छोटे बाजार होते हैं। अतएव मोटे तौर पर मुद्रा बाजार के गठन के बारे में नहीं कहा जा सकता। हम केवल मुद्रा बाजार के प्रमुख अंगों, का जो सारे मुद्रा बाजारों में आमतौर पर पाए जाते हैं, का वर्णन करते हैं जो इस प्रकार हैं—

1. अल्प सूचना ऋण बाजार (Call money market)

2. स्वीकृति बाजार (Acceptance market )

3. बिल बाजार (Bill market)।

अतः ये तीनों बाजार जो कि मुद्रा बाजार को बनाते हैं, एक बाज़ार में मिलाए जा सकते हैं। और उसे हुण्डी बाजार (Discount Market) कहा जा सकता है।

Q.3. विकसित व अविकसित मुद्रा बाजारों (Money Markets) के लक्षण बतायें। 

Ans. प्रो. एस. एन. सेन ने अपनी विख्यात पुस्तक ‘अर्द्ध-विकसित मुद्रा बाजारों में केन्द्रीय बैंकिंग’ में विकसित मुद्रा बाजार के लक्षणों को स्पष्ट किया है। इन लक्षणों में से एक या अधिक का अभाव किसी मुद्रा बाजार को अविकसित मुद्रा बाजार में बदल देता है। 

प्रत्येक देश में, मुद्रा बाजार (Money Market) अवश्य होता है, जिनमें से कुछ विकसित होते हैं और कुछ अविकसित होते हैं। 

किसी विकसित मुद्रा बाजार के बनने के लिए कुछ मूलभूत लक्षण आवश्यक होते हैं। 

जैसे— 1. सुगठित व्यापारिक बैंक प्रणाली (Highly organised commercial banking system)

2. केन्द्रीय बैंक की विद्यमानता (Presence of Central Bank)

3. उचित साख लिखितो की उपलब्धता (Availability of proper credit instruments)

4. अनेक उप-बाजारों का अस्तित्व (Existence of a number of sub-markets) 

5. पर्याप्त साधनों की उपलब्धता (Availability of ample resources)

6. अन्य योगदायी कारक (Other contributory factors)

Q.4. मुद्रा बाजार के महत्त्व क्या हैं? (What are the advantages of Money market ?)

Ans. आधुनिक अर्थव्यवस्था में मुद्रा बाजार एक महत्त्वपूर्ण संस्था है। यद्यपि यह संस्था औद्योगिक वाणिज्यिक प्रगति के साथ-साथ विकसित हुई है और इनकी प्रगति का परिणाम भी है, फिर इसने (मुद्रा बाजार ने) उद्योग और वाणिज्य के विकास को भी अधिक प्रभावित किया है।

1. उद्योग व वाणिज्य को वित्त प्रदान करना (Financing of Industry and Commerce) 

2. अल्पकालीन कोषों / निधियों का निवेश (Investment of Short term funds)

3. केन्द्रीय बैंकों को सहायता देना (Help to the Central Bank)

4. सरकार को सहायता (Help to Government)।

Q.5. पूँजी बाजार का स्वभाव तथा इसके विभिन्न अंगों की व्याख्या कीजिए । (Discuss the nature and constituents of Capital Market.)

Ans. पूँजी बाजार (Capital Market) में भाग लेने वालों में सरकार, व्यक्ति व संस्था ते हैं, जो दीर्घकालीन कोपों का लेन-देन पूँजी के रूप में या पूँजी के लिए करते हैं। स्कन्ध- निमय बाजार, व्यापारिक बैंक, सहकारी बैंक, वचत बैंक, विकास बैंक, बीमा कंपनी, निवेश ट्रस्ट था कम्पनियाँ पूँजी बाजार (Capital Market) के महत्त्वपूर्ण अंग हैं।

मुद्रा बाजार (Money Market) की तरह पूँजी बाजार में भी तीन पक्ष होते हैं, जैसे—ऋण तु कोष के आपूर्तिकर्त्ता, ऋणी (पूँजी की माँग करने वाले पक्ष) तथा मध्यस्थ। ये मध्यस्थ पूँजी देने ले पक्ष पूँजी प्राप्त करने वाले पक्ष की ओर से व्यवहार करते हैं।

पूँजी बाजार में व्यावसायिक फर्म विभिन्न प्रकार के अंश तथा साख-पत्रों के माध्यम से पूँजी प जुटाते हैं। पूँजी बाजार के लिए यह अति आवश्यक है कि वह प्रभावशाली ढंग से प्रतिभूतियों विपणनता प्रदान करे, क्योंकि विनियोगकर्ता ऋण प्रदान करने में उत्साह तभी दिखायेंगे जब अपने ऋणपत्रों तथा बिलों को सरलतापूर्वक पूँजी बाजार में बेच सकेंगे। विकासशील देशों में बाजार कम उन्नतशील होते हैं।

Q.6. पूँजी बाजार का महत्त्व स्पष्ट कीजिए। (Clearify the importance of Capital Market.)

Ans. किसी देश की विकास दर अन्य बातों के अलावा दीर्घकालीन विनियोग तथा पूँजी निर्माण से प्रभावित होती है। विनियोग हेतु कोष के एकत्रीकरण, वृद्धि तथा उसके मार्गीकरण Channalisation) के लिए पूँजी निर्माण एक प्रमुख शर्त होती है। वास्तव में पूँजी बाजार पूँजी संसाधनों को एकत्र करने तथा उन्हें साहसी विनियोगकर्ताओं को उपलब्ध कराने में महत्त्वपूर्ण योगदान देता है।

एक विकसित पूँजी बाजार विश्व स्तर पर कोषों को आकर्षित करके उन्हें विनियोग करने के लिए उत्तम माध्यम प्रदान करता है।

बढ़ती हुई औद्योगिक इकाइयों के आकार विभिन्न स्तरों पर आधारित अर्थव्यवस्था तथा बड़ी- बड़ी व्यावसायिक निकायों के तकनीकी विकास के फलस्वरूप एक ऐसी स्थिति पैदा हो गई है, जिसमें एक व्यक्ति या व्यक्ति समूह के पास उपलब्ध कोष विनियोग की माँग के अनुसार पर्याप्त नहीं होते हैं। 

एक विकसित पूँजी बाजार इस कोष की कमी की समस्या का निवारण कर सकता है। पूँजी बाजार छोटी तथा बिखरी बचतों को एकत्र करता है और विनियोग हेतु कोष की उपलब्धता में वृद्धि करता है। इस प्रकार एक ओर जहाँ संयुक्त स्कंध वाली कंपनियों में तेज गति से विकास ने बहुत हद तक पूँजी बाजार को विकसित किया है वहीं दूसरी ओर पूँजी बाजार ने संयुक्त स्कंध

वाली कंपनियों के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। एक विकसित पूंजी बाजार छोटे-छोटे बचतकर्त्ताओं को लाभपूर्ण विनियोग के लिए उत्तम अवसर भी प्रदान करता है।

Q.7 भारतीय पूंजी बाजार के स्वभाव की विवेचना कीजिए। (Explain the nature of Indian money market.)

Ans. मुद्रा बाजार की तरह भारतीय पूंजी बाजार में भी संगठित तथा असंगठित क्षेत्र पाए जाते हैं। संगठित क्षेत्र में पूँजी की माँग अधिकतर निकायों तथा सरकारी एवं अर्धसरकारी संस्थाओं की ओर से होती है जिसकी आपूर्ति अधिकतर घरेलू बचत, विनियोगी बैंकों, न्यासों, बीमा कम्पनियों, वित्तीय निगमों, सरकार तथा अन्तर्राष्ट्रीय वित्तीय एजेन्सियों के द्वारा की जाती है।

असंगठित क्षेत्र में मुख्य पूँजी आपूर्ति देशी बैंकरों एवं साहूकारों द्वारा होती है। जहाँ एक और संगठित क्षेत्र में पूँजी की माँग मुख्यतः उत्पादकीय विनियोग के लिए की जाती है, वहाँ असंगठित क्षेत्र में कोषों की माँग का एक बड़ा भाग उपभोगीय उद्देश्यों के लिए होता है। 

अधिकतर यह देखा गया है कि संगठित क्षेत्र में जिस माँग की आपूर्ति नहीं की जाती है, उस माँग की आपूर्ति असंगठित क्षेत्र द्वारा कर दी जाती है। अतः असंगठित मुद्रा बाजार की तरह असंगठित पूँजी बाजार में भी व्याज दरों में भिन्नता तथा बाहुल्यता पाई जाती है तथा प्रायः व्याज की दरों में भी असमानता पाई जाती है।

संगठित क्षेत्रों में सरकारी नियंत्रण अधिक दिखाई पड़ता है, परंतु असंगठित क्षेत्र प्रायः सरकारी नियंत्रण की सीमा से बाहर होते हैं। इसके साथ-साथ संगठित क्षेत्रों में संस्थाओं की संख्या में अधिक वृद्धि हो रही है, और इस क्षेत्र के व्यवसाय के एक बड़े भाग में सार्वजनिक क्षेत्र की वित्तीय संस्थाओं का भाग है, तथा गत वर्षों में इस संगठित क्षेत्र में सरकारी नियंत्रण काफी बढ़ता जा रहा है।

Q. 8. शेयर बाजार से क्या अभिप्राय है ? (Explain Stock Exchange.) 

Ans. शेयर बाजार एक ऐसा संगठित बाजार है जहाँ पर विभिन्न प्रकार की प्रतिभूतियों का क्रय-विक्रय किया जाता है। ये प्रतिभूतियाँ वे हैं जो शेयर बाजार की सूची में सम्मिलित हो और जो पहले ही किसी संस्था द्वारा जारी की गई हो। 

जैसे सार्वजनिक कंपनियों द्वारा निर्गमित कंपनियों द्वारा निर्गमित अंश एवं ऋणपत्र, सरकार तथा नगरपालिका द्वारा जारी किये गये वांड आदि तथा विभिन्न प्रयासों द्वारा निर्गमित प्रतिभूतियों । शेयर बाजार में प्रतिभूतियों का लेन-देन विनियोग या सट्टे के लिए कुछ निश्चित नियमों के अनुसार किया जाता है।

प्रतिभूति अनुबंध (नियमन) अधिनियम 1956 के अनुसार, “स्टॉक एक्सचेंज का आशय व्यक्तियों के एक ऐसे संगठन या संस्था से है, चाहे वह समामेलित हो या न हो, जिसकी स्थापना प्रतिभूतियों के क्रय-विक्रय और लेन-देन में सहायता नियमन तथा नियंत्रण करने के उद्देश्य से की गई हो।””

Q. 9. नए निर्गमन के लिए ‘सेबी’ के दिशा-निर्देशों के बारे में लिखिए । (Discuss the Guidelines by SEBI fresh issues.)

Ans. जून 2001 में नए निर्गमन के दिशा निर्देशन ‘सेबी’ द्वारा दिए और अब पूँजी निर्गमन का नियन्त्रण एवं नियमन ‘सेबी’ (SEBI) द्वारा जारी तथा भविष्य में जारी किये जाने वाले दिशा- निर्देशों के अधीन होगा, किंतु जिन कंपनियों को पूँजी निर्गमनों के लिए जून 2001 से पूर्व पूँजी मन नियन्त्रण (CCI) से अनुमति प्राप्त हो गई थी सेबी के दिशा-निर्देशों से बाध्य हुए बिना

पूजा निर्गमन कर सकेंगे। सामान्यतः सेबी (SEBI) नए निर्गमन के लिए प्रायः दो प्रकार की स्वस्थाएँ अपनाता है-

विद्यमान कंपनियों का प्रथम निर्गमन । ग्रमान निजी कंपनियों द्वारा प्रथम निर्गमन।

Q. 10. ‘सेबी’ (SEBI) के अधिकारों व शक्तियों का वर्णन कीजिये । (Discuss Rights & Powers of SEBI.)

Ans. 1. स्कंध विनिमय केन्द्रों तथा इनकी क्रियाओं और पूँजी बाजार का आवश्यकतानुसार तथा परिस्थितियों का नियमन करना।

2. स्कंध विनिमय केन्द्रों के अधिकार अपने हाथ में लेने का अधिकार ।

3. शुल्क तथा खर्च निर्धारित करने का अधिकार

4. प्रतिभूति बाजार के निवेशकों की शिक्षा तथा मध्यस्थों के प्रशिक्षण को प्रोत्साहित करना। 

5. ऐसी विनिर्दिष्ट संस्थाओं से सूचनाएँ माँगने का अधिकार जो बोर्ड के कार्यों के लिए

Q. 11. सट्टे के लाभों को स्पष्ट कीजिए। (Clearify the benefits of Speculation.)

Ans. 1. भावी मूल्य परिवर्तनों का पूर्वानुमान लगाना — सटोरिये अपने ज्ञान एवं अनुभव के आधार पर इतने निपुण हो जाते हैं कि प्रतिभूतियों के भविष्य में होने वाले मूल्यों के बारे में ठीक- ठीक पूर्वानुमान लगा सकते हैं, जिससे संबंधित कंपनी एवं पक्ष को उन पर सोच-विचार करने का अवसर मिल जाता है, और ये उनका सामना करने के लिए पहले से ही सावधान हो जाते हैं।

2. प्रतिभूतियों के मूल्यों में उतार-चढ़ाव पर रोक लगाना—सटोरिये भविष्य में होने वाले मूल्यों के परिवर्तनों को पूर्वानुमान लगाकर क्रय-विक्रय के भावी सौदे करना प्रारंभ कर देते हैं, जिनके फलस्वरूप प्रतिभूतियों की माँग और पूर्ति में संतुलन स्थापित होकर, मूल्यों के अत्यधिक उतार-चढ़ाव पर रोक लग जाती है।

3. प्रतिभूतियों की विपण्यता एवं तरलता में वृद्धि करना — स्टॉक एक्सचेंजों में सटोरियों द्वारा निरंतर क्रय-विक्रय होते रहने के कारण, प्रतिभूतियों का लेन-देन कभी भी सरलतापूर्वक किया जा सकता है। प्रतिभूतियों के इस प्रकार सतत् एवं नियमित कप-विक्रय के परिणामस्वरूप उनके प्रतिदिन के मूल्य ज्ञात हो सकते हैं, जिससे प्रतिभूतिपारी अपनी प्रतिभूतियों का मूल्यांकन भी आसानी से कर सकता है।

4. विभिन्न बाजारों में मूल्य-समता लाना— सटोरिये विभिन्न स्थानों पर प्रतिभूति के मूल्य में व्यापक उतार-चढ़ाव को भी रोकते हैं। यदि किसी बाजार में शेयर को अन्य बाजारों से खरीदकर बेच देते हैं। इस प्रकार विभिन्न स्थानों पर माँग एवं पूर्ति का साम्य हो जाता है तथा मूल्य परिवर्तन अधिक व्यापक नहीं रह पाते।

Q. 13. सट्टे एवं जुए में अन्तर कीजिए । (Distinguish between supeculation & Gambling.)

Ans. सट्टा तथा जुआ— यद्यपि दोनों एक समान प्रतीत होते हैं तथा दोनों ही में लाभ अथवा हानि भावी घटना पर आधारित होती है जो अनिश्चित होती है। सट्टे का उद्देश्य जुए की भांति तेजी से लाभ कमाना होते हुए भी दोनों में निम्न आधारों पर अंतर किया जा सकता है-

सट्टा (Speculation)जुआ (Gambling)
1. सट्टेबाजी विवेकपूर्ण अध्ययन तथा बाजार आधारित है। परिस्थितियों एवं प्रवृत्तियों की समीक्षा पर मूल्यों में भावी परिवर्तनों के प्रति ज्ञान एवं दूरदर्शिता इसका आधार होती है।1.जुए में ऐसी किसी विवेकपूर्ण समीक्षा की बाद नहीं होती। वह तो मात्र घटनाओं की क्रम-बद्धता के अवसर की बात होती है तथा किसी वैज्ञानिक तथ्य एवं तर्क का सर्वथा अभाव होता है।
2. सट्टे के अनेक आर्थिक लक्ष्य पूरे होते हैं। 2. सट्टा पूर्णतः कानूनी होता है।
3. सटोरिया तर्कपूर्ण व्याख्या के आधार पर हानि की जोखिम सहन करता है। यदि सटोरिया भी बिना सोचे-समझे, बिना किसी तर्क के गति- विधि करता चला जाए तो सट्टे और जुए में। विशेष अंतर नहीं रह जाएगा।3. जुए से अर्थव्यवस्था का कुछ भी भला नहीं होता। साथ ही जुआ और कानून तथा ए समाज विरोधी गतिविधि है।जुआरी ऊँची तथा नासमझ संभावना आधार पर ही हानि की जोखिम वहन करता है जिसके कारण हानि की कृत्रिम गोि उत्पन्न होती है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (LONG ANSWER TYPE QUESTIONS)

Q. 1. पूँजी बाजार से आप क्या समझते हैं? इसकी विशेषताएँ एवं महत्त्व को स्पष्ट करें। ( What do you mean by Capital Market ? Discuss its characteristics and importance.)

Ans. पूँजी बाजार से अभिप्राय उस बाजार से है जहाँ पर दीर्घकालीन वित्त का क्रय-विक्रय अथवा माँग एवं पूर्ति की जाती है। पूँजी बाजार वह केन्द्र है जहाँ पर दीर्घकालीन पूँजी की मांग तथा पूर्ति का परस्पर समायोजन होता है। यह वह स्थान है जहाँ पर किसी राष्ट्र की उधार देय पूँजी का संचय किया जाता है तथा जहाँ पर दीर्घकालीन पूँजी के साथ व्यवहार किया जाता है। 

इस बाजार में विशेष रूप से निजी उद्यमियों (Private enterpreneurs) जिन्होंने नये औद्योगिक संस्थान या पुराने औद्योगिक संस्थानों का विस्तार के लिए दीर्घकालीन पूंजी की मांग की जाती है। दीर्घकालीन पूँजी की पूर्ति सरकार, अर्थ-सरकारी संस्थाएँ, व्यापारिक तथा औद्योगिक कम्पनियाँ आदि करती हैं। जबकि उधार देने वालों में व्यापारिक बैंक, औद्योगिक वित्तीय संगठन तथा देशी साहूकार आदि आते हैं।

पूँजी बाजार की विशेषताएँ (Characteristics of Capital Market) 

1. दीर्घकालीन पूँजी की माँग एवं पूर्ति का स्रोत 2. पूँजी बाजार के अन्तर्गत अंश, ऋण पत्र आदि का फम- विक्रय होता है। 3. इसके अन्तर्गत दीर्घकालीन पूँजी का बड़े पैमाने पर व्यवहार किया जाता है। 4. पूँजी बाजार संगठित तथा असंगठित होता है। 5. पूँजी बाजार वित्तीय स्रोतों को प्रोत्साहन देता है। 6. पूँजी बाजार औद्योगिक कृषि, व्यापारिक, सामाजिक तथा राजनीतिक विकास ने सहयोग प्रदान करता है। 7. पूँजी बाजार किसी भी देश की स्मृति एवं प्रगतिशील अर्थव्यवस्था का पैरोमीटर (Baro-meter) है। 8. शासन की नीति पूँजी बाजार को प्रभावित करती है।

पूँजी बाजार का महत्त्व (Importance of Capital Market) – 

1. पूँजी बाजार वित्त आवश्यकता की पूर्ति का स्रोत है। 2. पूँजी बाजार वित्त स्रोतों को गति प्रदान करता है। 3. पूँजी बाजार जनता में बचत की प्रेरणा को प्रोत्साहित करता है।4. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया पूँजी बाज़ार में साख का नियन्त्रण करता है। 5. देश की कृषि, उद्योग, व्यापारिक क्रियाओं, सामाजिक तथा राजनीतिक उत्थान को पूँजी बाजार तेजी प्रदान करता है। 6. पूँजी बाजार में महत्त्वपूर्ण अंग देशी साहूकार, व्यापारिक बैंक तथा स्टॉक मार्केट को सम्मिलित किया जाता है। 

Q. 2. मुद्रा बाजार को स्पष्ट करें। इसके विभिन्न अंग तथा विशेषताएँ बतलाइए। (Explain Money Market. Discuss its different components and characteristics.) 

Ans. मुद्रा बाजार जो अनिवार्य रूप से अल्पकालीन पूँजी का कुण्ड होता है। डलर हेलर तथा शिपमेन (Nadler, Heller and Shipman) के अनुसार- मुद्रा बाजार “वह केन्द्र है जहाँ पर अल्पकालीन पूंजी की माँग तथा पूर्ति का परस्पर समायोजन होता है। मुद्रा बाजार का शब्दार्थ किसी स्थान को संकेत नहीं करता है। 

यह शब्द उस सम्पूर्ण प्रक्रिया का जिसके माध्यम द्वारा उपार देकर अल्पकालीन पूंजी का निवेश किया जाता है तथा उस विधि का जिसके माध्यम द्वारा अनेक वित्तीय सौदे तय किये जाते हैं सूचक है। यह वह स्थान है जहाँ पर किसी राष्ट्र तथा अन्य राष्ट्री की उधारदेय पूँजी का संचय किया जाता है तथा जहाँ पर अल्पकालीन पूजी अथवा मुद्रा को शीघ्रता के साथ उधार लिया तथा उधार दिया जा सकता है। यद्यपि सामान्यतः मुद्रा बाजार में केवल अल्पकालीन उधारदेय निधि को उधार दिया तथा उधार लिया जाता है। 

विस्तृत अर्थ में मुद्रा बाजार शब्द में वे सभी सुविधायें सम्मिलित होती है जिनका उपयोग सभी प्रकार की आर्थिक क्रियाओं का वित्तीकरण करने में किया जाता है। कोई भी महत्त्वपूर्ण व्यवहार जिसमे अल्पकालीन अथवा दीर्घकालीन उपारदेय निथि का हस्तांतरण होता है राष्ट्रीय अथवा अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा बाजार में ही सम्पन्न होता है।” 

संकुचित अर्थ में, मुद्रा बाजार में केवल प्रामाणिक साख मुद्रा बाजार से सम्बद्ध व्यवहार जैसे अविलम्ब कर्जा (call loan) तथा वाणिज्य पत्र व राजकोष पत्र आदि उधार पत्र, जिनमें उपारदाता तथा उधार लेने वालों के बीच व्यक्तिगत सम्बन्धों का बहुत कम महत्त्व होता है सम्मिलित होते है।

जिन वाणिज्य हुण्डियों का मुद्रा बाजार में क्रय-विक्रय होता है वे सभी ऐसे प्रामाणिक अल्पकालीन ऋण तथा साख पत्र होते हैं जिनके विषय में उधारकर्त्ताओं तथा उधारदाताओं के बीच व्यक्तिगत सम्बन्धों का कोई महत्त्व नहीं होता है। दोनों पक्ष एक दूसरे से व्यापारियों तथा दलालों के द्वारा मिल हैं। 

बाणिज्य हुण्डी बाजार (commercial bill market ), अल्पावधि राजकोष हुण्डी बाजार (Short term treasury bill market) तथा अविलम्ब द्रव्य बाजार (call money market) सभी मुद्रा वाजार के अंग होते हैं परन्तु बैंक स्वीकृत बाजार (bankers acceptances market) मुद्रा बाजार का सबसे अधिक आवश्यक तथा महत्त्वपूर्ण अंग होता है। बैंक स्वीकृति बाजार तथा वाणिज्य हुण्डी बाजार में अल्पकालीन पूँजी के द्वारा देशी तथा विदेशी व्यापार की वित्त व्यवस्था की जाती है। 

राजकोष हुण्डी बाजार से सरकारी ऋण पत्रों का क्रय-विक्रय किया जाता है। अविलम्ब द्रव्य बाजार में प्रचलित तथा नये ऋण पत्रों का क्रय-विक्रय किया जाता है। मुद्रा बाजार में इन सब भिन्न भागों के बीच गहरा सम्बन्ध होता है तथा एक भाग का दूसरे भाग पर गहरा प्रभाव पड़ता है।

Q.3. स्कन्ध विपणि से आपका क्या आशय है ? इसके महत्त्व एवं कार्यों को स्पष्ट कीजिए । ( What do you understand by Stock Exchange? Discuss its fiunctions and importance.)

Ans. जनसाधारण की दृष्टि में “स्कन्ध विपणि” का अर्थ धन कमाने के स्थान पर लक्ष्मी के मन्दिर से लगाया जाता है। परन्तु वास्तव में यह धारणा भ्रमपूर्ण है। जिस प्रकार विभिन्न वस्तुओं के लिए विभिन्न विपणियाँ हैं। उसी प्रकार स्कन्धों, अंशों, ऋण पत्रों व अन्य प्रतिभूतियों के लिये भी एक विपणि है जिसे स्कन्ध विपणि कहते हैं। 

स्कन्ध विपणि से अभिप्राय एक ऐसे स्थायी एवं सुसंगठित बाजार से है, जहाँ संयुक्त पूँजी वाली कम्पनियों के विभिन्न प्रकार के अंश, ऋण पत्र एवं सरकारी प्रतिभूतियों का क्रय-विक्रय होता है। भारत में इन्हें “सट्टा बाजार” या “शेयर बाजार” के नाम से भी पुकारा जाता है। स्कन्ध विपणि की प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं-

1. डॉ. के. एल. गर्ग के अनुसार, “स्कन्ध विनिमय विपणि वह मण्डी है जहाँ विभिन्न प्रकार की औद्योगिक अथवा आर्थिक प्रतिभूतियों जैसे संयुक्त पूँजी वाली कम्पनी के अंशों एक ऋण पत्रों, राजकीय पत्रों, म्यूनिसिपल एवं अन्य संस्थाओं के ऋण पत्रों और बन्चकों इत्यादि का क्रय-विक्रय होता है।”

(“Stock Exchange may be defined as a forum, a mandi or market for the purchase and sale of industrial and financial securities such as shares and debentures of public companies Govt. papers, Municipal and other bonds and debentures.”-Dr. K.L. Gard)

2. प्रतिभूति प्रसंविदा (नियमन) अधिनियम 1956 [ धारा 2 (i)] के अनुसार, “स्कन्य विनिमय विपणि से आशय व्यक्तियों के ऐसे समुदाय से है जो सम्मिलित हो या नहीं परन्तु जिसके निर्माण का उद्देश्य प्रतिभूतियों के क्रय-विक्रय तथा उनसे सम्बन्धित व्यवहारों की सहायता पहुँचाने तथा व्यापार को नियन्त्रित एवं नियमित करना होता है।”

[“Stock Exchange means any body of individuals, whether incorporated or not, constituted for the purpose of assisting, regulating or controlling the business of buying selling, or dealing in securities.”-The Securities Contract Act. 1956 sec 2 (i)]

3. चार्ल्स डब्ल्यू. गर्सटनबर्ग के अनुसार, “स्कन्च विनिमय व्यवस्थित बोली बाजार है जहाँ क्रेता और विक्रेता अपने दलालों के माध्यम से उन प्रतिभूतियों को व्यावहारिक रूप देने के लिए इकट्ठे होते हैं जो उस स्वन्ध विनिमय विपणि पर अनुसूचित है और गैर-अनुसूचित प्रतिभूतियों का बाजार बनाये रखा जाता है।”

(“The Stock Exchange are organised auction markets where buyers and sellers come together, through their brokers, to effect transactions in securities admitted to listing on the exchange and unlisted securities for which a market is maintained.”Charles W. Gresterberg)

4. हार्टले विदर्स के अनुसार, “स्कन्ध विनिमय विपणि एक बड़े गोदाम की भाँति है जहाँ विभिन्न प्रतिभूतियों का निश्चित मूल्य पर क्रय-विक्रय होता है।”

(“A Stock Exchange is something like a vast warehouse where securities are taken away from shelves and sold across the counters at a fixed price in a catalogue which is called the official list.”-Hartley Withers)

5. पॉयले के शब्दों में, “स्कन्ध विनिमय विपणि वह बाजार स्थान है जहां पर प्रतिभूतियों या तो विनिमय अथवा सट्टे के लिए क्रय और विक्रय की जा सकती हैं जिनका उक्त स्थान पर पंजीकरण हो चुका है।” (“Stock Exchange are market places where securities that have been listed there on may be bought and sold for either investment or speculation.” — Pyle)

उपरोक्त परिभाषाओं के आधार पर स्कन्च विनिमय विपणि की निम्नलिखित प्रमुख विशेषताये (Chief Charateristics) –

1. व्यवस्थित बाजार (Organised Market)—रकन्य विनिमय विपणि एक व्यवस्थित बाजार है।

2. अधिकृत सदस्य (Authorised Members) – प्रत्येक स्कन्ध विनिमय विपणि के अपने अधिकृत सदस्य होते हैं जिन्हें पालन कहते हैं। वह अपने ग्राहकों के लिए प्रतिभूतियों का क्रय एवं विक्रम कमीशन के आधार पर करते हैं।

3. नियम (Rules and Regulations )—स्कन्य विनिमय विपणि एक ऐसा बाजार है जहाँ प्रतिमूतियों का क्रम एवं विक्रय उस स्कन्ध विपणि आचार की संहिता नियमों के अधीन होता है। 

4. प्रतिभूतियों का क्रय एवं विक्रय (Sale and Purchase of Securities)—स्कन्च विनिमय विपणि में औद्योगिक एवं वित्तीय प्रतिभूतियों का क्रम एवं विक्रय होता है। जिन्हें संयुक्त पूँजी कम्पनियों, पोर्ट ट्रस्ट, जनहित संस्थाओं या सरकारी संस्थाओं द्वारा निर्गमित किया जाता है।

Q.4. भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) की भूमिका भारतीय पूँजी बाजार ये क्या है ? इसके कार्य एवं वर्त्तमान गतिविधियाँ बतलाइए।

(What is the Role of SEBI in Indian Capital Market? Discuss its function and present operations.)

Ans. भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) [(Securities and Exchange Board of India (SEBI)] :

सेबी की भूमिका (Role of SEBI) — पिछले दशक के दौरान भारतीय पूँजी बाजार ने आशाजनक उन्नति की है। सरकार की आर्थिक उदारीकरण की नीतियों के फलस्वरूप पूँजी बाजार में जनता की रुचि में वृद्धि हुई है। पूँजी बाजार में निवेशकों के विश्वास को बनाए रखने के लिए एक प्रशासनिक संस्था के रूप में 12 अप्रैल, 1988 को भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) की स्थापना की गई। 

31 जनवरी, 1992 को एक अध्यादेश के द्वारा इसे वैधानिक दर्जा प्रदान किया गया। 4 अप्रैल, 1992 से ‘सेवी’ का कार्य एक पृथक् कानून के अधीन संचालित होने लगा है तथा इसे अधिक व्यापक कानूनी अधिकार प्राप्त हो गये हैं और उसका कार्य क्षेत्र विस्तृत हो गया है। बोर्ड (SEBI) का प्रबन्ध छः सदस्यों द्वारा किया जाता है, जिनमें एक चेयरमैन | 

(जो केन्द्र सरकार द्वारा नामित होता है), दो सदस्य केन्द्रीय मन्त्रालयों के अधिकारियों में से, जिन्हें वित्त एवं कानून की जानकारी होती हैं, एक सदस्य भारत के रिजर्व बैंक के अधिकारियों में से तथा अन्य दो सदस्यों का नामांकन केन्द्रीय सरकार द्वारा किया जाता है। इसका मुख्यालय मुम्बई में है।

सेबी के कार्य (Functions of SEBI)-

1. प्रतिभूति बाजार में निवेशकों के हितों की रक्षा करना तथा प्रतिभूति बाजार को उचित उपायों के द्वारा विकसित करना।

2. स्टॉक एक्सचेन्जों तथा किसी भी अन्य प्रतिभूति बाजार के व्यवसाय का नियमन करना। 

3. स्टॉक ब्रोकर्स, सब-ब्रोकर्स, शेयर ट्रांसफर एजेन्ट्स, ट्रस्टीज, मर्चेन्ट बैंकर्स, अण्डराइटर्स, पोर्टफोलियो मैनेजर आदि के कार्यों का नियमन करना एवं उन्हें पंजीकृत करना। 

4. म्यूचुअल फण्ड्स को सम्मिलित करते हुए सामूहिक निवेश की योजनाओं को पंजीकृत करना ।

5. स्वयं नियमित संगठनों को प्रोत्साहित करना।

6. प्रतिभूतियों के बाजारों से सम्बन्धित अनुचित व्यापार व्यवहारों को समाप्त करना ।

7. प्रतिभूतियों के बाजार से जुड़े हुए लोगों को प्रशिक्षित करना । प्रतिभूतियों के अन्दर व्यापार पर रोक लगाना।

8. प्रतिभूतियों के बाजार में कार्यरत विभिन्न संगठनों के कार्य-कलापों का निरीक्षण करना। 

Q.5. राष्ट्रीय स्कन्ध विपणि ऑफ इण्डिया लिमिटेड पर प्रकाश डालें । [Throw Light on National Stock Exchange of India Limited (NSEI).]

Ans. राष्ट्रीय स्कन्ध विपणि ऑफ इण्डिया लिमिटेड एक नवीन स्वचालित स्कन्ध विपणि है जिसका मूलभूत उद्देश्य राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिभूत व्यापार सेवाएँ प्रदान करना है। इसकी स्थापना फेरवानी समिति की सिफारिशों पर नवम्बर, 1992 में एक गैर-लाभ कमाने वाली सार्वजनिक कम्पनी के रूप में की गई थी। 

यह भारत की प्रमुख स्कन्ध विपणि है जिसका प्रधान कार्यालय मुम्बई में स्थित है तथा यह वर्तमान में लगभग 400 नगरों एवं कस्बों में कार्यरत है। यह विभिन्न कम्पनियों के अंशों, ऋणपत्रों, बॉण्डों आदि तथा सरकारी प्रतिभूतियों में कार्य करती है। इसका प्रमुख प्रवर्तक भारतीय औद्योगिक विकास बैंक है। इसके अतिरिक्त इसके प्रवर्तकों में भारतीय औद्योगिक वित्त निगम (IFCI), साधारण बीमा निगम (GIC), भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC), औद्योगिक साख एवं विनियोग निगम (ICICI), एस. बी. आई. कैपिटल मार्केट आदि है। 

कुल मिलाकर 21 वित्तीय संस्थान इसके प्रवर्तक हैं। इस विपणि में व्यवहार का ढंग इस प्रकार का है कि इसके व्यवहार में उच्च स्तर की पारदर्शिता (Transparency) होती है तथा एक समय में देशभर के सभी क्रेता एवं विक्रेता क्रय एवं विक्रय में भाग ले सकते हैं। इसमें स्वचालित व्यापार मिलन प्रणाली (Automatic Trade Matching System) का उपयोग होता है तथा प्रत्येक सदस्य अपने दफ्तर में बैठे-बैठे ही क्रय-विक्रय के व्यवहार बहुत ही मितव्ययी मूल्य पर कर सकता है। 

Very Important Questions

Q. 1. मुद्रा बाजार के कार्य लिखिए।

Ans. 1. अल्पकालीन बचत कोष के लिए लाभपूर्ण विनियोग के अवसर प्रदान करके विनियोगकर्ताओं तथा वित्तीय संस्थाओं के लाभ में वृद्धि करना । 2. संपूर्ण देश के मुद्रा बाजार कोषों एवं विनियोग को तरलता प्रदान करने में मदद करना । 

Q. 2. मुद्रा बाजार की परिभाषा दीजिए। (Give the definition of money market.)

Ans. मुद्रा-बाजार की परिभाषा—मुद्रा बाजार उस बाजार को कहा जाता है जहाँ पर अल्पकालीन ऋण लेने व देने का कार्य होता है या अल्पकालीन ऋण उपलब्ध कराये जाते हैं। बाजार एक अत्यन्त सक्रिय स्थान है जिसमें वित्त समस्याएँ अपने सामान्य व्यवसाय अथवा मुख्य व्यवसाय के रूप में तरलता उत्पन्न करने के उद्देश्य से मुद्रा सम्पत्ति का क्रय-विक्रय करते हैं।

NCERT Solutions for Class 12 Commerce Stream


Leave a Comment