Class 12 Hindi Book Antra Chapter 1 Question Answer प्रेमघन की छाया स्मृति

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मैं खुद 12वीं का टॉपर रहा हूं और मुझे पता है कि 12वीं की परीक्षा में किस तरह के प्रश्न पूछे जाते हैं। वर्तमान में, मैं एक शिक्षक की भूमिका भी निभा रहा हूँ, और अपने छात्रों को कक्षा 12वीं की महत्वपूर्ण जानकारी और विषयों का अभ्यास भी कराता हूँ। मैंने यह लेख 5 वर्षों से अधिक के अपने अनुभव के साथ लिखा है। इस पोस्ट की मदद से आप परीक्षा में इस अध्याय से भूगोल में बहुत अच्छे अंक प्राप्त कर सकेंगे।

Class 12 Hindi Book Antra Chapter 1 Question Answer प्रेमघन की छाया स्मृति

कक्षा | Class12th 
अध्याय | Chapter01
अध्याय का नाम | Chapter Nameप्रेमघन की छाया स्मृति
कवि का नाम | Poet Nameरामचंद्र शुक्ल
किताब | Bookअंतरा ऐच्छिक | Hindi Elective
खंड | Sectionगद्य खंड | Prose Section
बोर्ड | Boardसभी हिंदी बोर्ड
किताब | Book एनसीईआरटी | NCERT
विषय | Subjectहिंदी | HINDI
अध्ययन सामग्री | Study Materialsप्रश्न उत्तर | Question answer

आचार्य रामचंद्र शुक्ल का जीवन परिचय | Biography of Acharya Ramchandra Shukla

उत्तर—जीवन परिचय – आचार्य रामचंद्र शुक्ल का जन्म उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के अगोना गाँव में 1884 ई. में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा उर्दू, अंग्रेजी और फारसी में हुई। फिर उन्होंने संस्कृत, बँगला व हिन्दी का अध्ययन स्वयं किया। उन्होंने शिक्षा इण्टरमीडिएट तक ही प्राप्त की। 

कुछ समय तक मिशन हाई स्कूल मिर्जापुर में ड्राइंग मास्टर रहने के बाद 1908 ई. में नागरी प्रचारिणी सभा वाराणसी द्वारा ‘हिन्दी शब्द सागर’ के सहायक सम्पादक के रूप में नियुक्त हुए। बाद में काशी हिंदू विश्वविद्यालय में हिन्दी के प्राध्यापक तत्पश्चात् विभागाध्यक्ष बने। 

Class 12 Hindi Book Antra Chapter 1 Question Answer 
image credit: Jansatta

काशी शुक्ल जी की कर्मस्थली बन गई और मृत्युपर्यंत यहीं रहे। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में हिन्दी के अध्यक्ष पद पर कार्य करते हुए ही इनका देहांत 1941 ई. में हुआ।

रचनाएँ-शुक्ल जी ने हिन्दी साहित्य को अमर रचनाएँ प्रदान की हैं। चिंतामणि (चार खण्ड) हिन्दी साहित्य का इतिहास’ त्रिवेणी रस-मीमांसा इनकी प्रसिद्ध रचनाएँ हैं। त्रिवेणी में जायसी, तुलसी व सूरदास के ग्रंथों की भूमिकाओं में लिखी गई समीक्षकों का संकलन है।

भाषा-शैली– शुक्ल जी का शब्द चयन और शब्द-संयोजन व्यापक है जिसमें तत्सम शब्दों से लेकर उर्दू शब्दों तक का खुलकर प्रयोग हुआ है। उनकी भाषा इतनी सुगठित है कि उसमें से एक शब्द भी निकालना संभव दिखाई नहीं देता। वे मुख्यतया संस्कृत शब्दावली के हिमायती हैं, किन्तु अभिव्यक्ति की प्रबलता के लिए हिंदीतर अंग्रेजी, अरबी, फारसी भाषाओं के शब्दों को लेने में भी वे संकोच नहीं करते। मुहावरे व लोकोक्तियों से भाषा को प्रभावी बनाने में वे विश्वास रखते हैं।

विषय के अनुरूप शुक्ल जी की भाषा-शैली गूढ़-गंभीर तथा सूक्तिपरक हो जाती है। उनकी गद्य शैली विवेचनात्मक है जिसमें विचारशीलता वैज्ञानिक जैसी और तर्क योजना दार्शनिकों जैसी है। शुक्ल जी यदा-कदा व्यंग्य-विनोद की फुलझड़ी भी छोड़ते चलते हैं। 

उनके लेखन में विचारों की परिपक्वता निर्भकता और आत्मविश्वास का समन्वित रूप दिखाई देता है। वे अपनी बात को कहते समय ऐसे दृढ़ दिखाई देते हैं, मानो डंके की चोट पर बात कही जा रही हो। उनकी गद्य-शैली अत्यंत सारगर्भित विचार-प्रधान, तर्कपूर्ण एवं समासवद्धता से युक्त है।

साहित्य समीक्षा – आचार्य शुक्ल हिन्दी के मूर्धन्य आलोचक, निबंधकार व इतिहास-लेखक हैं। निबंध के क्षेत्र में तो एक युग उनके नाम से ही जाना जाता है। उन्होंने भारतीय साहित्य को नई अवधारणाओं से संपन्न करते हुए हिंदी आलोचना को नया स्वरूप प्रदान किया। निबंध के क्षेत्र में तो वे आज भी अतुलनीय है। उन्होंने मनोविकारों का सूक्ष्म वर्णन किया तो सैद्धान्तिक व विचारात्मक निबंध भी लिखे हैं। 

निबंध के सूक्ष्म विषय लेकर लज्जा और ग्लानि, क्रोध, श्रद्धा और भक्ति, उत्साह, मित्रता आदि विषयों पर बहुत गूढ़, गंभीर और प्रौढ़ विवेचन किया है। मनोवैज्ञानिक निबंधों की अत्यंत सूक्ष्म चर्चा को देखकर शुक्ल जी के गंभीर ज्ञान का परिचय मिलता है। नालिनी विलोचन शर्मा शुक्ल जी के समीक्षक रूप पर लिखते हैं कि गुफ्त जी से समीक्षक संभवतः उस युग में किसी भी भारतीय भाषा में नहीं था। 

उनका ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ आज भी समीक्षकों के लिए संदर्भ ग्रंथ के रूप में मान्य है। शुक्ल जी के निबंधों में जो गंभीरता है, विवेचन में जो पांडित्य एवं तार्किकता है तथा शैली में जो कसाव है, यह अन्यत्र संभव नहीं है। शुक्ल जी निबंध, समीक्षा और इतिहास लेखक के बेताज बादशाह हैं। 

वस्तुतः आचार्य रामचंद्र शुक्ल का हिन्दी निबंध लेखन में विशिष्ट स्थान है। ये हिन्दी साहित्य के एक महान स्तंभ हैं। भाषा शिल्प की विशेषताएं शुक्ल जी ने अपने निबंधों में उर्दू, संस्कृत, फारसी शब्दों का प्रयोग किया है। इनका वाक्य विन्यास भी सुन्दर है। इन्होंने अपनी भाषा को भावों एवं विचारों के अनुकूल ढालने का सफल प्रयास किया है। 

इन्होंने अपनी रचनाओं के लिए प्रांजल साहित्यिक भाषा का प्रयोग किया है। शब्द चयन, वाक्यरचना, सादृश्य विधान, व्यंजनाभिव्यक्ति • आदि में इनकी भाषा निपुणता का ज्ञान होता है। चिन्तन तथा भाषा के उत्कर्ष ने इनके निबन्धों को विरल सफलता प्रदान की है।

भावानुरूप शैली — शुक्ल जी की निबन्ध शैली इनके प्रखर व्यक्तित्व की परिचायक है। उन्होंने अपने निबंधों में आवश्यकता के अनुरूप समास शैली, व्यास शैली, निष्कर्षात्मक अथवा आगमन शैली, निगमन या प्रसारात्मक शैली का आश्रय लिया है। लोकोक्तियों, मुहावरों, अंग्रेजी, अरबी, फारसी, आँचलिक शब्दावली का भी इन्होंने यथावसर अपने निबन्धों में प्रयोग किया है। 

सूत्रात्मकता से रचना शैली में गुरुता, गंभीरता, लाक्षणिकता एवं अर्थवत्ता का सुन्दर समावेश हुआ है। इनके निबन्धों में दार्शनिक गम्भीरता के साथ-साथ हास्य व्यंग्य की छटा भी देखी जा सकती है।

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि शुक्ल जी के निबंध हिन्दी साहित्य की अनुपम निधि हैं। अनुभूति और अभिव्यंजना की दृष्टि से इनके निबन्ध उच्च कोटि के हैं। इनमें गंभीर विवे के साथ-साथ गवेषणात्मक चिन्तन का मणिकांचन संयोग, निभ्रांत अनुभूति के साथ-साथ प्रौढ़ अभिव्यंजना का अद्भुत मिश्रण भी है। इनके निबन्धों में विविध रसात्मक अनुभूतियों के साथ-साथ जगत की विविध रहस्यपूर्ण गतिविधियों का अनोखा चमत्कार मिलता है।

प्रेमघन की छाया स्मृति पाठ का सारांश | प्रेमघन की छाया स्मृति Summary

प्रेमघन की छाया स्मृति, रामचन्द्र शुक्ल का एक संस्मरणात्मक निबंध है। इस निबंध में शुक्ल जी ने हिंदी भाषा व साहित्य के प्रति अपने प्रारम्भिक रुझानों का बड़ा रोचक वर्णन किया है।

उनका बचपन साहित्यिक परिवेश से भरापूरा था। बाल्यावस्था से ही किस प्रकार भारतेंदु एवं उनके मंडल के अन्य रचनाकारों विशेषतः प्रेमघन के सान्निध्य में शुक्ल जी का साहित्यकार आकार ग्रहण करता है। उसकी अत्यन्त मनोहारी झाँकी यहाँ प्रस्तुत हुई है।

प्रेमचन के व्यक्ति ने शुक्ल जी की समवयस्क मंडली को किस प्रकार प्रभावित किया, हिंदी के प्रति किस प्रकार आकर्षित किया तथा किसी रचनाकार के व्यक्तित्व निर्माण आदि संबंधी पहलुओं का बड़ चित्ताकर्षक चित्रण इस निबंध में उकेरा गया है।

लेखक के पिता का रुझान–लेखक के पिता पुरानी फारसी कवियों की उक्तियों को हिंदी कवियों की उक्तियों के साथ मिलाने में आनन्दित होते थे। वे रात को रामचरितमानस और रमाचंद्रिका पढ़ा करते थे उन्हें भारतेंदु जी के नाटक बहुत प्रिय थे।

के लेखक का रुझान-आचार्य शुक्ल आठ वर्ष के ही थे, तभी से भारतेंदु के संबंध में जानने इच्छुक थे ‘सत्य हरिश्चंद्र’ नाटक के नायक राजा हरिश्चन्द्र और कवि हरिश्चंद्र में लेखक की बाल-बुद्धि कोई भेद नहीं कर पाती थी।

लेखक के पिता की बदली मिर्जापुर में हुई, तो उन पता चला कि हरिश्चंद्र के एक मित्र भी मिर्जापुर में रहते हैं, वह हिंदी के प्रसिद्ध कवि है-उपाध्याय बदरीनारायण चौधरी। उनसे मिलने की लीखक को उत्कंठा हुई। लेखक बालकों की मंडली के साथ पत्थर के एक बड़े मकान के सामने जाकर खड़े हो गए।

बदरीनारायण चौधरी को मिलने की लालसा — नीचे खाली बरामदा था। ऊपर बरामदा सघन लताओं से उन्का था। सड़क पर कई चक्कर लगाए। कुछ समय पश्चात् एक लड़के ने उँगली से ऊपर की तरफ इशारा किया। लताओं के झुण्ड में एक मूर्ति खड़ी दिखाई दीं। दोनों रूपों पर बाल बिखरे हुए थे। एक हाथ खंभे पर था। देखते ही देखते यह मूर्ति दृष्टि से ओझल हो गई। बस, यही पहली झांकी थी।

लेखक का नूतन साहित्य की ओर झुकाव — जैसे ही लेखक बड़ा हुआ, तो उसका झुकाव नूतन साहित्य की ओर हो गया। भारत जीवन प्रेस की पुस्तकों को लेखक के पिता लेखक से छिपा कर रखते थे, उन्हें डर था कि कहीं लेखक बिगड़ न जाए, पढ़ाई से न हट जाए। पं. केदारनाथ जी पाठक के पुस्तकालय से पुस्तकें लाकर लेखक पढ़ने लगे।

भारतेंदु जी व अन्य हिंदी प्रेमियों से परिचय — एक दिन पं. केदारनाथ जी पाठक से पता चला कि भारतेंदु जी यहीं रहते हैं। लेखक ने भारतेंदु जी से परिचय किया व उस परिचय को शीघ्र ही गहरी मित्रता में बदल लिया। 16 वर्ष की अवस्था तक लेखक को हिंदी प्रेमियों को एक अच्छी मंडली मिल गई थी, जिनमें श्रीयुत् काशी प्रसाद जी जायसवाल, भगवानदास जी हालना, पं. बदरीनाथ गोंड, पं. उमाशंकर द्विवेदी मुख्य थे। लेखक स्वयं को भी एक लेखक मानने लगे थे।

निस्संदेह शब्द लेखक व अन्य लोग बातचीत में ‘निस्संदेह’ शब्द का प्रयोग करते थे, तो वहाँ के रहने वाले लोग (वकील, मुख्तार आदि) इन्हें (लेखकों को) ‘निस्संदेह’ लोग के नाम से पुकारने लगे। बदरीनारायण चौधरी प्रेमघन लेखक का परिचय चौधरी साहब से अच्छा तरह हो गया

शुक्ल जी उनके घर एक लेखक की हैसियत से जाते थे। चौधरी साहव एक खासे हिंदुस्तानी रईस थे। वसंत पंचमी, होली आदि अवसरों पर उनके यहाँ खूब नाचरंग और उत्सव हुआ करते. थे। उनकी हर एक अदा से रियासत व तबीयतदारी टपकती थीं कंधों तक बाल लटक रहे थे। 

उनकी बातचीत में एक विलक्षण वक्रता रहती थी। उनकी बातचीत का ढंग उनके लेखों के ढंग से एकदम निराला था। नौकरों तक के साथ उनका संवाद सुनने लायक होता था। उनके प्रश्नों के पहले ‘क्यों साहब’ अकसर लगा रहता था।

सहपाठी — लेखक के सहपाठी पं. लक्ष्मीनारायण चौबे, बा. भगवानदास हालना, बा. भगवानदास मास्टर थे। इन्होंने ‘उर्दू वेगम’ नाम की एक बड़ी ही विनोदपूर्ण पुस्तक लिखी थी, जिसमें उर्दू की उत्पत्ति, प्रचार आदि का वृत्तांत एक कहानी के ढंग पर दिया गया था। चौधरी जी नागरी को भाषा मानते थे और बराबर नागरी भाषा लिखा करते थे। उनका कहना था कि “नागर अपभ्रंश से जो शिष्ट लोगों की भाषा विकसित हुई, वही नागरी कहलाई।”

कठिन शब्दों के अर्थ

उक्तियाँ- महान पुरुषों के कथन ,चित्ताकर्षक- मन को मोहने वाली अपूर्व- अद्वितीय, स्मृति यादगार। ओझल होना-दिखाई न देना; सयाना समझदार, नूतन— नया आवृत — ढका हुआ; लताप्रतान—लता (बेलों) का फैलाव, उत्कंठा – लालसा । परिणत—अन्य रूप में बदला हुआ; मुख्तार अधिकार प्राप्त व्यक्ति; अमला—कर्मचारी मण्डल; वाकिफ——जानकार, परिचित, वक्रता—टेढ़ापन; विलक्षण — अद्भुत । लफ्ज़ – शब्द विनोदपूर्ण हास्यास्पद, अपभ्रंश प्राकृत भाषाओं का पत |

class 12th NotesMCQ
HistoryPolitical Science
EnglishHindi

प्रेमघन की छाया स्मृति गद्यांश सप्रसंग व्याख्या एवं शब्दार्थ | प्रेमघन की छाया स्मृति गद्यांश सप्रसंग व्याख्या NCERT

1. जब उनकी बदली हमीरपुर जिले की राठ तहसील से मिज पुर हुई, तब मेरी अ आठ वर्ष की थी। उसके पहिले ही से भारतेंद के संबंध में एक अपूर्व मधुर भावना मेरे पन में जगी रहती थी ।’

सत्य हरिश्चंद्र’ नाटक के नायक राजा हरिश्चंद्र और कवि हरिश्चंद्र में मेरी बाल-बुद्धि कोई भेद नहीं कर पाती थी। ‘हरिश्चंद्र’ शब्द से दोनों की एक मिली- भावना एक अपूर्व माधुर्य का संचार मेरे मन में करती थी ।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यावरतण सुप्रसिद्ध साहित्यकार आचार्य रामचन्द्र शुक्ल विरचित निर “प्रेमचंद्र की छाया समृति’ से उद्धृत है। शुक्ल जी ने प्रस्तुत निबंध में हिंदी साहित्य के के प्रति अपने प्रारंभिक रुझान का बड़ा ही रोचक वर्णन किया है।

व्याख्या—लेखक अभी उम्र के छोटे ही थे, अपने पिता से भारतेंदु जी के नाटकों को सुर करते थे। बचपन से भारतेंदु जी के प्रति लगाव तो स्वाभाविक ही था। जब शुक्ल जी के स्थानान्तरण मिर्जापुर में हो गया, तो उन्हें पता चला कि भारतेंदु के मित्र मिर्जापुर में राष्ट्र हैं। शुक्ल जी बहुत प्रसन्न हुए।

अपनी बाल बुद्धि के बारे में लेखक कहते हैं कि उन्हें हिंदी साहित्यकार भारतेंदु जी व ‘सत्य हरिश्चंद्र नाटक के नायक राजा ‘हरिश्चंद्र में कोई भेद नह नहीं आता था। उनके मन ने दोनों को एक ही माना हुआ था। मन प्रसन्नता से भर गया, लगा कि भारतेंदु हरिश्चंद्र से भी मिलने का अवसर प्राप्त होगा क्योंकि हरिश्चंद्र जी के प्रति ने भाव बचपन से ही उनके मन में था।

विशेष— (i) लेखक का बचपन साहित्यिक परिवेश से भरा-पूरा था। (ii) गद्य शैली विवेचनात्मक है। (iii) इसमें शब्द चयन और शब्द संयोजन व्यापक है। (iv) तत्सम व उर्दू शब्दों का प्रयोग किया गया है।

2. भारतेंदु मंडल की किसी सजी व स्मृति के प्रति मेरी कितनी उत्कंठा रही होगी, प अनुमान करने की बात है। मैं नगर से बाहर रहता था। एक दिन बालकों में मंडली जोड़ गई। जो चौधरी साहब के मकान से परिचित थे, वे अगुआ हुए। मील डेढ़ का सफर हुआ । पत्थर के एक बड़े मकान के सामने हम लोग जा खड़े हुए।

नीचे का बरामदा खाल था । ऊपर का बरामदा सघन लताओं के जाल से आवृत था। बीच-बीच में खंभे और खुली जगह दिखाई पड़ती थी। उसी ओर देखने के लिए मुझसे कहा गया। कोई दिखाई न पड़ा।

सड़क पर कई चक्कर लगे। कुछ देर पीछे एक लड़के ने उंगली से ऊपर की ओर इशारा किया। लता-प्रतान के बीच एक मूर्ति खड़ी दिखाई पड़ी। दोनों कंधों पर बाल बिखरे हुए थे । एक हाथ खंभे पर था। देखते ही देखते यह मूर्ति दृष्टि से ओझल हो गई। बस, यही पहली झांकी थी।

प्रसंग — प्रस्तुत गद्यावरतण सुप्रसिद्ध साहित्यकार आचार्य रामचन्द्र शुक्ल विरचित निर “प्रेमचंद्र की छाया समृति’ से उद्धृत है। शुक्ल जी ने प्रस्तुत निबंध में हिंदी साहित्य के के प्रति अपने प्रारंभिक रुझान का बड़ा ही रोचक वर्णन किया है।

व्याख्या—जब लेखक को पता चला कि मिर्जापुर में भारतेंदु जी के मित्र रहते हैं, तो भारतेंदु जी के प्रति लगाव होने के कारण उनके मित्र से मिलने की इच्छा बलवती हो उठी। अपने मित्रों से उनके बारे में पूछा। कुछ मित्रों को (जिन्हें उनके घर का पता मालूम था) आगे आने को कहा गया, शुक्ल जी पीछे-पीछे चल रहे थे।

पत्थर का बना मकान जहाँ मित्र रुक गए शब्द यही उनके (भारतेंदु) मित्र का मकान था। मकान को लेखक एकटक देखने लगे। नीचे व बरामदा वीरान पड़ा था, परन्तु ऊपर का बरामदा लताओं से ढका हुआ था। लताओं से ढके बरामदे में बीच-बीच का स्थान खाली भी था। मित्रों ने कहा-यहीं खाली स्थान पर नजर रखो।

कुश ही समय इधर-उधर घूमने के उपरान्त ऊपर बरामदे में लताओं के झुण्ड में छिपी एक मूर्ति दिखाई दी। यही थे, भारतेंदु जी के मित्र । उनके दोनों कंधों पर बाल बिखरे हुए थे, एक हाथ खभे पर टिका था। कुछ ही क्षणों में वह मूर्ति आँखों से ओझल हो गई। लेखक की आँखों में वह मूर्ति बस गई। यही चौधरी साहब से मिलने की प्रथम झाँकी थी।

विशेष- (i) विवेचनात्मक गद्य शैली द्रष्टव्य है। (ii) चित्रात्मकता का गुण विद्यमान है। (iii) तत्सम शब्दों का प्रयोग किया गया है। (iv) खड़ी बोली के परिनिष्ठित रूप का प्रयोग है।

3. उन्हीं दिनों पं. केदारनाथ जी पाठक ने एक हिंदी पुस्तकालय खोला था। मैं वहाँ से पुस्तकें ला- लाकर पढ़ा करता। एक बार एक आदमी साथ करके मेरे पिता जी ने मुझे एक बारात में काशी भेजा। मैं उसी के साथ घूमता फिरता चौखंभा की ओर जा निकला। वहीं पर एक घर में से पं. केदारनाथ जी पाठक निकलते दिखाई पड़े।

पुस्तकालय में वह मुझे प्रायः देखा करते थे। इससे मुझे देखते ही वह वहीं खड़े हो गए। बात ही बात में मालूम हुआ कि जिस मकान में से वह निकले थे, वह भारतेंदु जी का घर था।

मैं बड़ी चाह और कुतूहल की दृष्टि से कुछ देर तक उस मकान की ओर न जाने किन-किन भावनाओं में लीन होकर देखता रहा। पाठक जी मेरी यह भावुकता देख बड़े प्रसन्न हुए और बहुत दूर मेरे साथ बातचीत करते हुए गए। भारतेंदु जी के मकान के नीचे का यह हृदय-परिचय बहुत शीघ्र गहरी मैत्री में परिणत हो गया।

प्रसंग– प्रस्तुत गद्यावरतण सुप्रसिद्ध साहित्यकार आचार्य रामचन्द्र शुक्ल विरचित निर “प्रेमचंद्र की छाया समृति’ से उद्धृत है। शुक्ल जी ने प्रस्तुत निबंध में हिंदी साहित्य के के प्रति अपने प्रारंभिक रुझान का बड़ा ही रोचक वर्णन किया है।

व्याख्या— लेखक के घर भारत जीवन प्रेस की पुस्तकें आती थी, परन्तु उनके पिता उन पुस्तकों को उन्हें पढ़ने नहीं देते थे, क्योंकि वह नहीं चाहते थे कि उनका पुत्र बिगड़ जाए या फिर विद्यालय की पुस्तकों में ध्यान न दे। उस समय उनके घर के पास पं. केदारनाथ ने एक पुस्तकालय खोला, तो लेखक प्रतिदिन वहीं से पुस्तकें लाकर पढ़ने लगे। लेखक का रुझान हिंदी के नूतन साहित्य के प्रति हो गया तो, पुस्तकों के बिना वे कैसे रह सकते थे ? 

एक दिन काशी में जब लेखक किसी काम से गए, तो उन्हें पं. केदारनाथ जी मिले और बातचीत होने लगी। बातों ही बातों में मालूम हुआ पं. केदारनाथ जी भारतेंदु जी के घर से निकले हैं। बस लेखक का मन न जाने कितने प्रश्नों से जूझ गया। भावना में बह गया। केदारनाथ जी पाठक को लेखक का इस तरह भावुक होना बहुत आकर्षक लगा। भारतेंदु जी के देखने की व मिलने की चाहत लेखक को बचपन से थी। लेखक भारतेंदु जी के मकान को प्रश्न भरी निगाहों से देखने लगा। लेखक को महसूस हुआ मानो वह भारतेंदु जी के पास है। 

भारतेंदु जी के मकान के नीचे इतना परिचय मिलना कि यह भारतेंदु जी का घर है, लेखक को अत्यधिक आनन्दित व भाव-विभोर कर गया। शीघ्र ही वह परिचय मित्रता में बदल गया। लेखक की मित्रता भारतेंदु जी से हो गई और वे एक लेखक की हैसियत से उनके घर आने-जाने लगे। उनकी बचपन की मनोकामना पूरी हो गई।

विशेष- (i) खड़ी (ii) तत्सम प्रधान शब्दावली है। बोली के परिनिष्ठित रूप को प्रयोग किया गया है। (iii) विचारात्मक शैली है। (iv) भाषा सहज, सरल व विषयानुरूप हैं।

14. मेरे मुहल्ले में कोई मुसलमान सब-जज आ गए थे। एक दिन मेरे पिता जी खड़े-खड़े उनके साथ कुछ बातचीत कर रहे थे। उसी बीच मैं उधर जा निकला। पिता जी ने मेरा बताने की जरूरत नहीं। मैं तो इनकी सूरत देखते ही इस बात से वाकिफ हो” मेरी परिचय देते हुए उनसे कहा- “इन्हें हिन्दी का बड़ा शौक हैं।” घट जवाब मिला- “आफ्नो सूरत में ऐसी क्या बात थी, यह इस समय नहीं कह सकता ।

प्रसंग -प्रस्तुत गद्यावरतण सुप्रसिद्ध साहित्यकार आचार्य रामचन्द्र शुक्ल विरचित निर “प्रेमचंद्र की छाया समृति’ से उद्धृत है। शुक्ल जी ने प्रस्तुत निबंध में हिंदी साहित्य के के प्रति अपने प्रारंभिक रुझान का बड़ा ही रोचक वर्णन किया है।

व्याख्या- लेखक के पिता भी विद्वान थे, उन्हें अपने पुत्र पर गर्व तो था ही, क्योंकि इतनी छोटी उम्र में उनका पुत्र लेखक बन गया था। अच्छी हिंदी बोलता व लिखता था। उनके मोहल्ले में एक मुसलमान सब जज आ गए। उनसे लेखक का परचिय करवाते हुए पिता जी ने कहा- मेरा पुत्र है, हिंदी में रुचि रखता है।

सब जज ने उत्तर दिया कि यह बताने के आवश्यकता नहीं है, इनकी सूरत देखकर ही में समझ गया था। लेखक हैरान रह गया कि आखिर मेरी सूरत में ऐसा क्या है ? शायद वे सूरत से ही पढ़े-लिखे नौजवान लगते थे। उनके भीतर की प्रतिभा उनके चेहरे पर विद्यमान थी। उनके भीतर का आचार्यत्व उनके चेहरे से पढ़ा जा सकता था।

विशेष – (i) भाषा सरल, सहज व विषय के अनुरूप है। (ii) उर्दू शब्दों जैसे ‘वाकिफ का प्रयोग किया गया है। (iii) लेखक की प्रतिमा को दर्शाया गया है।

प्रेमघन की छाया स्मृति Question Answer | NCERT Solutions Class 12 Hindi Book Antra Chapter 1 Question Answer 



प्रश्न 1. लेखक ने अपने पिता जी की किन-किन विशेषताओं का उल्लेख किया है?

उत्तर- लेखक ने अपने पिता जी की निम्नलिखित विशेषताओं का उल्लेख किया है

(i) लेखक के पिता फारसी के अच्छे ज्ञाता और पुरानी हिंदी कविता के बड़े प्रेमी है।

(ii) फारसी कवियों की उक्तियों को हिंदी कवियों की उक्तियों के साथ मिलाने में उन्हें बड़ा आनंद आता था।

(iii) वे रात को प्रायः रामचरितमानस और रामचंद्रिका, घर के सब लोगों को एकत्र करके बड़े चित्ताकर्षक ढंग से पढ़ा करते थे। 

(iv) उन्हें भारतेंदु जी के नाटक बहुत प्रिय थे। 

(v) वे लेखक की पढ़ाई का विशेष ध्यान रखते थे, इसलिए घर में आई भारत जीवन प्रेस की पुस्तकों को छिपा देते थे ताकि ये पुस्तकें लेखक की पढ़ाई में बाधा न डालें। 

प्रश्न 2. बचपन में लेखक के मन में भारतेंदु जी के संबंध में कैसी भावना जगी रहती थी? 

उत्तर—(i) बचपन में लेखक के मन में भारतेंदु जी के संबंध में एक अपूर्व मधुर भावना जगी रहती थी।

(ii) लेखक की बालक-बुद्धि ‘सत्य हरिश्चंद्र’ नाटक के नायक राजा हरिश्चंद्र और की हरिश्चंद्र में कोई भेद नहीं कर पाती थी। 

प्रश्न.3 उपाध्याय बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’ की पहली झलक लेखक ने किस प्रकार देखी ?

उत्तर— 

(i) लेखक मिर्जापुर में नगर से बाहर रहते थे। एक दिन कुछ बालकों से पूछा कि ‘क्या वे चौधरी साहब के मकान से परिचिति हैं ? उत्तर हमें मिलने पर उन्हीं बालकों को अ कर दिया।

(ii) डेढ़ मील कर सफर तै करने पर पत्थर के एक बड़े मकान के नीचे सभी रुक गए। 

(iii) नीचे का बरामदा खाली था, ऊपर का बरामदा लताओं के जाल से ढका था। उसी तरफ देखने के लिए लेखक को कहा गया। 

(iv) पहले तो कोई दिखाई न पड़ा। कुछ देर बाद एक लड़के ने उँगली से ऊपर की तरफ इशारा किया। 

(v) लताओं के बीच एक मूर्ति खड़ी दिखाई पड़ी।

(vi) दोनों कंथों पर बाल बिखरे हुए थे। एक हाथ खंभे पर था। 

(vii) देखते-देखते यह मूर्ति दृष्टि से ओझल हो गई। यही पहली झाँकी थी। बदरीनारायण चौधरी प्रेमवन को इस प्रकार पहली बार लेखक ने देखा था।

प्रश्न 4. लेखक का हिंदी साहित्य के प्रति झुकाव किस तरह बढ़ता गया ? 

उत्तर- 

(i) लेखक को हिंदी साहित्य के प्रति बचपन से ही लगाव था, एक तो उसका परेलू परिवेश ही ऐसा था। 

(ii) दूसरा, स्व, वा. रामकृष्ण वर्मा जो क्वीन्स कॉलेज में पढ़ाते थे, लेखा के पिता के मित्र थे।

(iii) पं. केदारनाथ जी पाठक के पुस्तकालय से हिंदी साहित्य की पुस्तकें ला-जाकर लेखक पढ़ता था। इससे उसका झुकाव हिंदी साहित्य की तरफ हो गया। 

प्रश्न 5. ‘निस्संदेह’ शब्द को लेकर लेखक ने किस प्रसंग का जिक्र किया है ?

उत्तर- 

(i) लेखक व उसके मित्रों में बातचीत प्रायः लिखने-पढ़ने की हिंदी में हुआ करती, जिसमें ‘निस्संदेह’ इत्यादि शब्द आया करते थे। 

(ii) जिस स्थान पर लेखक रहता था, वहीं अधिकतर वकील, मुख्तार, कचहरी के अफसार ही रहते थे।

(iii) ऐसे लोगों के उर्दू कानों में लेखक व उसके मित्रों की बोली कुछ अनोखी लगती थी।

(iv) इसी से उन्होंने लेखक व उसके मित्रों का नाम ‘निरसदेह’ रख दिया था।

प्रश्न 6. पाठ में कुछ रोचक घटनाओं का उल्लेख है। ऐसी तीन घटनाएँ चुनकर उन्हें अपने शब्दों में लिखिए । 

उत्तर—पाठ में आई मुख्य रोचक घटनाएँ निम्नलिखित हैं-

(i) चौधरी जी के घर के किसी नौकर के हाथ से कभी कोई गिलास वगैरह गिर जाता, वह कहते, “कारे बचा त नाहीं।”इस प्रकार चौधरी के प्रत्येक कथन में वक्रता होती थी। 

(ii) एक दिन कई लोग बैठे बातचीत कर रहे थे कि एक पण्डित जी आ गए। चौधरी साध्य पूछा- “कहिए क्या हाल है ?” पं. जी बोले-“कुछ नहीं। आज एकादशी थी, कुछ जल खाया नौर चले आ रहे हैं।” चौधरी जी ने कहा- “जल ही खाया है कि कुछ फलाहार भी दिया है।” 

(iii) एक दिन चौधरी साहब ने पड़ोसी से सवाल किया, “क्यों साहब, घनचक्कर के क्या मानी = ?” पड़ोसी महाशय बोले- वाह। यह क्या मुश्किल बात है।” “एक दिन रात को सोने से पहले कागज-कलम लेकर सवेरे से रात तक जो-जो काम किए हो, सब लिख जाइए और पढ़ जाइए।”

प्रश्न 7. “इस पुरातत्व की दृष्टि में प्रेम और कौतूहल का अद्भुत मिश्रण रहता था।” कथन किसके संदर्भ में कहा गया है और क्यों ? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर— 

(i) “इस पुरातत्व की दृष्टि में प्रेम और कौतूहल का अद्भुत मिश्रण रहता था। यह कथन बदरीनारायण चौधरी प्रेमघन के संदर्भ में कहा गया है। 

(ii) लेखक का चौधरी साहब से अच्छी तरह परिचय हो गया था। उनके यहाँ उनका आना-जाना एक लेखक की हैसियत से ही होता था।

(iii) वे अब चौधरी जी को एक पुरानी चीज समझा करते थे। 

(iv) उनसे मिलते समय लेखक को ऐसा आभास होता था कि वे बहुत पुराने लेखक हैं, उनसे मिलते समय प्रेम भी उमड़ता था और उत्सुकता भी बनी रहती थी। 

(v) लेखक का रुझान बचपन से ही हिंदी के प्रति था। हिंदी साहित्य के पुराने विद्वानों से मिलने की उनमें उत्कट अभिलाषा रहती थी। चौधरी जी उच्चकोटि के विद्वान थे।

(vi) चौधरी जी से मिलना अवश्य ही प्रेमास्पद होता था। लेखक का हृदय चौधरी जी से ने पर आनन्दित हो उठता था और आश्चर्यजनक कौतूहल उत्पन्न हो जाता था। 

प्रश्न 8. प्रस्तुत संस्मरण में लेखक ने चौधरी साहब के व्यक्तित्व के किन-किन पहलुओं को उजागार किया है?

उत्तर—प्रस्तुत संस्मरण में लेखक ने चीधरी साहब के व्यक्तित्व के निम्नलिखित पहलुओं को उजागर किया है-

(i) चौधरी साहब एक खासे हिंदुस्तानी रईस थे।

(ii) वसंत पंचमी, होली इत्यादि अवसरों पर उनके यहाँ खूब नाचरंग और उत्सव हुआ करते थे।

(iii) उनकी हर एक अदा से रियासत और तबीयतदारी टपकती थी। 

(iv) वाल कंपों तक लटकाए हुए थे।

(v) बात की कॉट-छाँट करने का लहजा अच्छा था।

(vi) उनका नौकरों के साथ संवाद करने का ढंग सुनने लायक होता था। 

(vii) नागरी को भाषा मानते थे और बराबर नागरी भाषा लिखते थे। 

(viii) उनका कहना था- “नागर अपभ्रंश से जो शिष्ट लोगों की भाषा विकसित हुई, 

प्रश्न 9. समवयस्क हिंदी प्रेमियों की मंडली में कौन-कौन से लेखक मुख्य थे?

उत्तर—समवयस्क हिंदी प्रेमियों की मंडली में निम्नलिखित लेखक मुख्य थे- 

(i) श्रीयुत् काशीप्रसाद जी जायसवाल

(ii) वा. भगवानदास जी हालना 

(iii) पं. बदरीनाथ गौड़

(iv) पं. उमाशंकर द्विवेदी। 

प्रश्न 10. ‘भारतेंदु जी के मकान के नीचे का यह हृदय-परिचय बहुत शीघ्र गहरी मैत्री में परिणत हो गया।’ कथन का आशय स्पष्ट कीजिए। 

उत्तर- (i) लेखक को एक दिन पं. केदारनाथ रास्ते में मिले।

(ii) बात ही बात में उन्हें मालूम हुआ कि जिस मकान से पं. केदारनाथ निकले थे, वह भारतेंदु जी का पर था।

(iii) लेखक भावुक होकर बड़ी चाह के साथ उस मकान की तरफ देखने लगे।

(iv) भारतेंदु जी के मकान के नीचे खड़े होकर लेखक बहुत आनन्दित होने लगे, उन्हें लगा आज मकान के नीचे खड़े हैं। कल मकान के भीतर जाने का अवसर भी प्राप्त होगा। 

(v) यहीं हुआ, भारतेंदु जी से शीघ्र परिचय हो गया और यह परिचय मित्रता में बदल गया। 

(vi) लेखक बचपन से ही घेरलू परिवेश के कारण भारतेंदु जी से मिलने के इयुक 

(v) आखिर भारतेंदु जी से उनकी मित्रता हो गई उनकी अभिलाषा पूर्ण हो गई। 

प्रश्न 11. हिंदी-उर्दू के विषय में लेखक के विचारों को देखिए। आप इन दोनों के एक ही भाषा की दो शैलियाँ मानते हैं या भिन्न भाषाएँ ?

उत्तर-हिंदी व उर्दू दोनों भिन्न-भिन्न भाषएँ हैं। दोनों की लिपियों अलग हैं। एक भाषा हिंदी बाई से दाईं तरफ, दूसरी भाषा उर्दू दाई से बाई ओर लिखी जाती है। उर्दू की लिपि फारसी है, हिंदी की लिपि देवनागरी है अतः देनों एक ही भाषा की दो शैलियाँ नहीं हैं, अपितु दोनों भिन्न-भिन्न भाषाएँ हैं

प्रश्न 12. चौघरी जी के व्यक्तित्व को बताने के लिए पाठ में कुछ मजेदार वाक्य आए हैं उन्हें छाँटकर उनका संदर्भ लिखिए। 

उत्तर—

(i) चौयरी जी का नौकरों तक के साथ बातचीत का ढंग निराला था। अगर किसी नौकर के हाथ से कोई गिलास गिर जाता, तो वे कहते कि ‘कारे बचा त नाहीं।’ 

(ii) “जल ही खाया है कि कुछ फलाहार भी पिया है ?” चौधरी जी ने यह वाक्य तब कहा जब पं. जी ने कहा आज एकादशी थी, कुछ जल खाया है और चले आ रहे हैं। 

(iii) ‘अरे! जब फूट जाई तबै चलत आवह। चौधरी जी ने यह वाक्य तब कहा, जब लैम्प में तेल समाप्त हो गया, नौकर को आवाज देने पर नहीं आया।

प्रश्न 13. पाठ की शैली की रोचकता पर टिप्पणी कीजिए।

उत्तर— ‘प्रेमघन की छाया स्मृति’ पाठ की शैली बहुत की रोचक है। स्थान-स्थान पर प्रेमघन जी के दैनिक बोलचाल के शब्दों, वाक्यों व उदाहरणों के देने से निबंध रोचक बन गया है जैसे-

(i) “कारे बचा ता नाहीं ।”

(ii) आखिर घनचक्कर के का मानी है ? 

(iii) जल की खाया है कि कुछ फलाहार भी पिया है । 

(iv) अरे ! जब फूट जाई तबै चलत आवह।



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VVI Question for VIP Topper Students

प्रश्न 1. क्वीन्स कॉलेज में पढ़ते समय लेखक के पिता घर में किन पुस्तकों को छिपाया करते थे व क्यों ? 

उत्तर— (i) जब लेखक क्वीन्स कॉलेज में पढ़ते थे तो उनके घर भारत जीवन प्रेस की पुस्तकें आया करती थीं।
(ii) इन पुस्तकों को लेखक के पिता छिपा दिया करते थे।
(iii) लेखक के पिता को डर था कि कहीं शुक्ल उन पुस्तकों को न पढ़ने लगे और स्कूल की पढ़ाई से न हट जाए।
(iv) लेखक उन पुस्तकों को पढ़कर कहीं बिगड़ न जाए।

प्रश्न 2. 16. वर्ष की उम्र में शुक्ल जी का रुझान किस तरफ हुआ ? 

उत्तर- (i) जब लेखक 16 वर्ष के थे, तो उनके सभी दोस्त हिंदी प्रेमी थे। 
(ii) उनके दोस्तों में थे— काशीप्रसाद जी जायसवाल, वा. भगवानदास जी हालना, पं. बदरीनाथ गौड़, पं. उमाशंकर द्विवेदी।
(iii) ये सब मिलकर हिंदी के नए-पुराने लेखकों की चर्चा करते थे। 
(iv) शुक्ल जी 16 वर्ष की उम्र में स्वयं को लेखक मानने लगे थे। 

प्रश्न 3. ‘चौधरी साहब की बातचीत में एक विलक्षण वक्रता रहती थी- उदाहरण द्वारा स्पष्ट कीजिए ।

उत्तर- (i) चौधरी साहब के मुँह से जो बातें निकलती थी, उनमें एक विलक्षण वक्रता रहती थी। 
(ii) उनकी बातचीत का ढंग उनके लेखों के ढंग से एकदम निराला था। 
(iii) नौकरों के साथ उनका संवाद सुनने लायक होता था।
(iv) उदाहरणतया – अगर किसी नौकर के हाथ से कभी कोई गिलास वगैरह गिरा, तो उनके मुँह से यही निकलता कि “कारे बचा त नाही”

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