Class 12 Hindi Book Antra Chapter 10 Question Answer कुटज Summary

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मैं खुद 12वीं का टॉपर रहा हूं और मुझे पता है कि 12वीं की परीक्षा में किस तरह के प्रश्न पूछे जाते हैं। वर्तमान में, मैं एक शिक्षक की भूमिका भी निभा रहा हूँ, और अपने छात्रों को कक्षा 12वीं की महत्वपूर्ण जानकारी और विषयों का अभ्यास भी कराता हूँ। मैंने यह लेख 5 वर्षों से अधिक के अपने अनुभव के साथ लिखा है। इस पोस्ट की मदद से आप परीक्षा में इस अध्याय से भूगोल में बहुत अच्छे अंक प्राप्त कर सकेंगे।

Class 12 Hindi Book Antra Chapter 10 Question Answer कुटज Summary

कक्षा | Class12th 
अध्याय | Chapter10
अध्याय का नाम | Chapter Nameकुटज
लेखक का नाम | Author Nameहजारी प्रसाद द्विवेदी
किताब | Bookअंतरा ऐच्छिक | Hindi Elective
खंड | Sectionगद्य खंड | Prose Section
बोर्ड | Boardसभी हिंदी बोर्ड
किताब | Book एनसीईआरटी | NCERT
विषय | Subjectहिंदी | HINDI
अध्ययन सामग्री | Study Materialsप्रश्न उत्तर | Question answer


हजारी प्रसाद द्विवेदी का जीवन-परिचय | Biography of Hazari Prasad Dwivedi

उत्तर-जीवन-परिचय-हजारी प्रसाद द्विवेदी का जन्म 1907 ई. में उत्तर प्रदेश के बलिया ग्राम के आरती दुबे का छपरा आझबलिया में हुआ था। इन्होंने संस्कृत महाविद्यालय काशी से शास्त्री परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके बाद काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से 1930 ई. में ज्योतिष में आचार्य परीक्षा उत्तीर्ण की। उसी वर्ष द्विवेदी जी शांतिनिकेतन में हिन्दी-अध्यापक बनकर कलकत्ता चले गए। 

Class 12 Hindi Book Antra Chapter 10 Question Answer
image credit: Social media

यहाँ गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर और आचार्य क्षितिज मोहन सेन से प्रभावित होकर गम्भीर साहित्य साधना में लीन हो गए। 1950 ई. में ये काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में अध्यक्ष बनकर वाराणसी आ गए, जहाँ से कुछ अपरिहार्य कारणों से पद त्याग करके 1960 ई. में पंजाब विश्वविद्यालय चंडीगढ़ में हिन्दी विभागाध्यक्ष का दायित्व संभाला। 

वहाँ से लौटकर ये काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रो. वाइस चांसलर बने। ये भारत सरकार की हिन्दी संबंधी अनेक योजनाओं से जुड़े रहे हैं। लखनऊ विश्वविद्यालय ने इनको डी.लिट्. की मानक उपाधि से सम्मानित किया था और भारत सरकार ने इनको पद्मभूषण की उपाधि से अलंकृत किया था। आलोक पर्व पुस्तक पर इनको साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया था। 1979 ई. की 19 मई को द्विवेदी जी का स्वर्गवास हो गया। 

रचनाएँ-संकलन– ‘अशोक के फूल’, ‘विचार और वितर्क’, ‘कल्पलता’, ‘कुटज’, ‘आलोक पर्व’ आदि। उपन्यास-‘चारुचंद्रलेख’, ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’, ‘पुनर्नवा’ तथा ‘अनामदास का पौधा । आलोचनात्मक ग्रंथ – ‘सूर-साहित्य’, ‘कबीर’, ‘हिन्दी साहित्य की भूमिका’, ‘कालिदास की लालित्य योजना’ आदि।

भाषा-शैली-आचार्य द्विवेदी की शैली आत्मकथात्मक, विवेचनात्मक एवं व्यंग्यात्मक है। विचारों की लड़ी पिरोते समय समास शैली एवं सूत्रात्मक विचारों की व्याख्या करते समय द्विवेदी जी ने व्यास शैली का भी प्रयोग किया है। आचार्य द्विवेदी की भाषा प्रांजल होते हुए भी सरल हैं तत्सम शब्दों के साथ ही अंग्रेजी, उर्दू के शब्दों तथा लोकोक्तियों, मुहावरे व संस्कृत के उच्चरणों का भी प्रयोग द्विवेदी जी ने किया है। 

साहित्यिक विशेषताएँ-द्विवेदी जी का अध्ययन क्षेत्र बहुत व्यापक था। संस्कृत, प्राकृत अपभ्रंश, बंगला, हिन्दी आदि भाषाओं एवं इतिहास, दर्शन, धर्म, संस्कृति आदि क्षेत्रों में उनका गहन अध्ययन रहा है। इसी कारण उनके साहित्य में भारतीय संस्कृति की गहरी पैठ और विषय-वैविध्य के दर्शन होते हैं। वे परम्परा के साथ आधुनिक प्रगतिशील मूल्यों के समन्वय को लेकर चले हैं। उनके निबंधों में विचार और भावना का अद्भुत सामंजस्य है। 

उन्होंने श्रेष्ठ कोटि के ललित निबंधों की रचना की है। विषय चेतन करते समय उन्होंने सरल व गूढ़ दोनों प्रकार के विषय लिए हैं। वे भारतीयता के विश्वासी हैं। यही कारण है कि उनकी कृतियों में भारतीय संस्कृति, भारतीय ज्ञान व भारतीय परम्पराओं के प्रति अत्यधिक सम्मान भाव वर्णित हुआ है। 

प्राचीन विषयों का वर्णन करते समय वे वर्तमान की समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करते हैं। वे के बाद हिन्दी के निबंध क्षेत्र में उनका लोकमंगल को बहुत महत्त्व देते हैं। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल सर्वप्रमुख स्थान है। 


कुटज पाठ का सामान्य परिचय | कुटज story in hindi

जीवन-संघर्ष में सौन्दर्य से अधिक महत्त्व इच्छा-शक्ति, कर्मठता, लगन, आत्मविश्वास का है जो विपरीत परिस्थितियों में स्वयं को अनुकूलन करने में सहायक सिद्ध होता है।

कुटज पाठ का सारांश | कुटज Summary

हिमालय का निचला भाग-लेखक कहता है कि पर्वत शोभा निकेतन होते हैं। हिमालय पर्वत के आगे व पीछे दोनों तरफ समुद्र उसकी दो भुजाओं के रूप में शोभित हो रहे हैं। कालिदास का कहना है कि हिमालय के पाँव में ‘शिवालिक’ अर्थात् शिव की जटा का निचला | हिस्सा है। सम्पूर्ण हिमालय को देखकर किसी के मन में समाधिस्थ महादेव की मूर्ति स्पष्ट हुई। 

उसी महादेव के निचले हिस्से का प्रतिनिधित्व यह गिरी श्रृंखला कर रही होगी। कहीं-कहीं तो पास भी सूख गई है, वहाँ काली काली चट्टानें, कहीं-कहीं रक्ताम रेती है। कहीं भी रस नही है, लेकिन गरमी की मार खा-खाकर भी ये छोटे-छोटे से पेड़ निरंतर जी रहे हैं। वे शायद बेहया हैं या मस्तमौला हैं। ये पत्थरों की छाती फाड़कर न जाने किस तरह से अपनी भाग्य रेखा यहाँ तक ले आते हैं?

द्वंद्वातीत वृक्ष-शिवालिक की सूखी नीरस पहाड़ियों पर मुस्कुराते अलमस्त वृक्ष हैं। लेखक इनका नाम नहीं जानता परन्तु ऐसा महसूस हो रहा है, ये वृक्ष लेखक को अनादिकाल से जानते हैं। रूप या नाम-इन्हीं में से एक छोटा-सा, ठिगना-सा पेड़ है, प भी चीड़े हैं, बड़े हैं, फूलों से तो लदा ही रहता है, अजीब अदा से मुस्कुराता रहता है। लगता वह लेखक से प्रश्न करता है कि क्या तुम मुझे नहीं पहचानते हो। लेखक कहता है-“वह पहचान तो है, परन्तु नाम याद नहीं आ रहा। नाम प्रायः भूल जाता हूँ, “रूप मुख्य या नाम? नाम बड़ा है या रूप? पद पहले है या पदार्थ?”

लेखक का मन व्याकुल नहीं होता। वह वहाँ के बहुत-से मादा व नर वृक्षों के नाम गिनता है, पर मन नहीं मानता। वह कहता है कि नाम इसलिए बड़ा नहीं है कि वह नाम है। वह इसलिए बड़ा होता है क्योंकि उसे सामाजिक स्वीकृति मिली होती है। रूप व्यक्ति सत्य है, नाम समाज-सत्य। नाम उस पद को कहते हैं, जिस पर समाज की मुहर लगी होती है।

पेड़ का नाम स्मरण हो आना-लेखक अपने दिमाग पर जोर डालता है, उसका मन दूर-दूर तक उड़ता है अचानक उसे स्मरण हो आता है कि इस गिरकूट बिहारी का नामकुटज है। परन्तु इसका नाम ‘कूटज’ होता तो अच्छा होता। वास्तव में यह कूटज-कूटज है। इस पर ढेरों फल के गुच्छे लटक रहे हैं, प्रसन्नता से झूम रहा है। कालिदास करो, यक्ष द्वारा मेघ को अर्ध्य देने के लिए यही ‘कुटज’ पुष्प ही प्राप्त हुआ था। लेखक को लगा कि वह भी इन्हीं कुटज के फूलों द्वारा मेघ को अर्घ्य चढ़ा दे ।

रहीम व कुटज की तुलना-लेखक सोचता है कि कूटज कालिदास के काम आया तो उसे अधिक मान मिलना चाहिए। परन्तु उसे अधिक मान नहीं मिला। यही स्थिति रहीम की हुई। रहीम बड़े दरिकादिल आदमी थे। एक बादशाह ने आदर के साथ बुलाया, दूसरे ने फेंक दिया। इससे रहीम को मोल नहीं घटा। अच्छे-भले कद्रदान थे उनके। दुनिया वैसे मतलब की है, रस चूसकर छिलका व गुठली फेंक ही देती है। 

रहीम को भी फेंक दिया गया। बड़े लोग कभी-कभी गलती कर बैठते हैं। मन खराब रहा होगा, लोगों की बेरुखी व बेकद्रदानी से मुरझा गए होंगे। कभी-कभी कवियों का भी मूड खराब हो जाया करता है। वे भी गलत बयानी के शिकार हो जाया करते हैं। फिर बार्गों से गिरिकूट- बिहारी कुटज का क्या तुक है?

कुटज शब्द की व्युत्पत्ति — कुटज अर्थात् जो गुट से पैदा हुआ हो। ‘कुट’ पड़े को भी कहते हैं, घर को भी कहते हैं। अगस्त्य मुनि भी ‘कुटज’ कहे जाते हैं। संस्कृत में गुटिहारिका, कुटिकारिका’ दोनों दासी को कहते हैं। ‘फुटिया’ या ‘कुटीर’ शब्द भी इसी शब्द से सम्बद्ध है। अगस्त्य मुनि भी नारद की तरह दासी के पुत्र थे क्या ?. 

‘संस्कृत में ‘कुटज’ रूप भी मिलता है और ‘कुलय’ भी मिलने को तो ‘कूटज’ भी मिलता है। आर्य जाति का नहीं जान पड़ता। सिलवाँ लेवी कह गए हैं कि संस्कृत भाषा में फूलों, वृक्षों और खेत बागानी के अधिकांश शब्द आग्नेय भाषा परिवार के हैं। संस्कृत भाषा ने शब्दों के संग्रह में कभी छूत नहीं मानी। न जाने किस-किस नस्ल के कितने शब्द उसमें आकर अपने बन गए हैं। संस्कृत सर्वग्रासी भाषा है। कुटज शब्द व 

पौघा— कुटज अपने नाम व रूप दोनों में अपराजेय जीवनी शक्ति की घोषणा कर रहा है, इसीलिए यह इतना आकर्षक है। इसका नाम हजारों वर्षों से जीता चला आ रहा है। कुटज संस्कृत की निरंतर स्फीयमान शब्द राशि में जो जम के बैठा, सो बैठा ही है और

रूप की तो बात ही क्या ?

चारों तरफ कुपित यमराज के दारुण निःश्वास के समान धधकती लू में यह हरा भी है और मरा भी। पाषाणों से घिरे स्थान पर अज्ञात जलस्रोत से रस खींच कर सरस बना हुआ है और इतना मस्त भाव से खड़ा है कि ईर्ष्या होती है। कितनी कठिन जीवनी शक्ति है। कुटज का

स्थान—दूर पर्वतराज हिमालय की बर्फ से ढकी चोटियाँ हैं। वहीं कहीं भगवान महादेव समाधि लगाकर बैठे होंगे नीचे सपाट पथरीली जमीन का मैदान है। कहीं-कहीं नदियाँ आगे बढ़ने का रास्ता खोज रहीं हैं। बीच में यह चट्टानों की ऊबड़-खाबड़ जटा भूमि है-सूखी,

नीरस व कठोर। यहीं आसन मारकर बैठे हैं, मेरे चिर-परिचित दोस्त कुटज एक बार जोर से हिलकर पुष्प गुच्छों को हिलाकर महादेव को उपहार चढ़ा देते हैं। 

एक बार नीचे की तरफ सरिताओं को संकेत कर बता देते हैं कि रस का स्रोत कहाँ है ? कुटज प्रेरणा देता है, उपदेश देता है- ‘जीना चाहते हो ? कठोर पाषाण को भेदकर, पाताल की छाती चीरकर अपना भोग्य संग्रह करो, वायुमंडल को चूसकर, झंझा तूफान को रगड़कर अपना प्राप्य वसूल करो, आकाश को चूमकर, अवकाश की लहरी में झूमकर, उल्लास खींच लो।” के माध्यम से लेखक को उपदेश – “जीना भी एक कला है। कला ही नहीं तपस्या कुटज है।

जियो तो प्राण ढाल दो जिंदगी में, मन ढाल दो जीवनरस के उपकरणों में क्या जीने के लिए जीना ही बड़ी बात है ? संसार में जहाँ कहीं भी प्रेम है, सब मतलब के लिए। दुनिया में त्याग नहीं है, प्रेम नहीं है, परार्थ नहीं है, परमार्थ नहीं है है केवल प्रचंड स्वार्थ। भीतर की जिजीविषा जीते रहने की प्रचंड इच्छा ही अगर बड़ी बात हो, तो फिर सारी बड़ी-बड़ी बोलियाँ झूठ हैं। इसके द्वारा कोई न कोई अपना बड़ा स्वार्थ सिद्ध करता है। लेकिन लेखक कहता है ऐसा सोचना गलत है। स्वार्थ से भी बड़ी कोई न कोई बात अवश्य

है। जिजीविषा से भी प्रचंड कोई न कोई शक्ति अवश्य है। लेखक का व्यापक दृष्टिकोण लेखक कहता है कि ‘व्यक्ति की आत्मा केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं है, वह व्यापक है। 

अपने में सब और सबमें आप इस प्रकार की एक विशाल बुद्धि जब तक नहीं आती, तब तक पूर्ण सुख का आनन्द भी नही मिलता लेखक कहता है कि कुटज क्या केवल जी रहा है? वह दूसरे के द्वार पर भीख माँगने नहीं जाता, कोई निकट आ गया, तो भय के मारे अधमरा नहीं हो जाता, नीति और धर्म का उपदेश नहीं देता फिरता, अपनी उन्नति के लिए अफसरों का जूता नहीं चाटता फिरता । 

ग्रहों की खुशामद नहीं करता, आत्मोन्नति हेतु नीलम धारण नहीं करता, दाँत नहीं निपोरता, बगले नहीं झोकता जीता है शान से किस उद्देश्य से ? कोई नहीं जानता। यह स्वार्थ के दायरे से बाहर की है। वह कहता है- चाहे सुख हो या दुख, प्रिय हो या अप्रिय जो मिल जाए, उसे शान के साथ, हृदय से बिल्कुल अपराजित होकर, सोल्लास ग्रहण करो। हार मत मानो।” लेखक कहता है कुटज को देखकर रोमांच हो जाता है। कहाँ से मिली है यह अकुतोभयावृत्ति, । अपराजित स्वभाव, अविचल जीवन दृष्टि ? है, जो समझता

है कि दूसरे उसका अपकार कर रहे हैं वह भी बुद्धिहीन है। कौन किसका उपकार करता है, कौन किसका अपकार कर रहा है? खुशामद करना, दाँत निपोरना, चाटुकारिता, हाँ-हजूरी। जिसका मन अपने वश में नहीं है, वही दूसरे के मन का छटावर्तन करता है। अपने को छिपाने का ढोंग करता है, दूसरों को फँसाने के लिए जाल बिछाता है। कुटज इन सभी आडम्बरों से मुक्त है, वह तो वैरागी है। राजा जनक की भाँति इस संसार में रहकर, सम्पूर्ण भोगों को भोगकर भी सदा उनसे मुक्त है। कुटज अपने मन पर सवारी करता है, मन को अपने पर सवार नहीं होने देता।


कुटज पाठ का कठिन शब्दों के अर्थ

अंतर्निरुद्ध-भीतरी रुकावट । गहर—गहरा, गड्डा । द्वंद्वातीत—द्वंद्व से भरे मदोद्धता-नशे या गर्व से चूर । विजितातपा धूप को दूर करने वाली अकुतोभय जिसे कहीं से भव न हो। अवमान अपमानित, तिरस्कृत। विरुद― कीर्तिगाथा स्तबक गुच्छा। अभ्यर्थना—प्रार्थना । लोल — चंचल । फकत अकेला। अनत्युच्य—— जो, बहुत ऊँचा न हो।

अदनासा—छोटा सा । विचारोत्तेजक विचार में उत्तेजना पैदा करने वाला। अविच्छेद्य- जिन्हें अलग नहीं किया जा सकता। स्फीयमान फैलता कुपित — क्रोधित । कृपित— कंजूस । द्रांक्षा—अंगूर। मूर्धा-मस्तक। दूरंत—प्रबल उपहत — घायल, नष्ट ।

निपोरना — खुशामद करना। अवधूत विरक्त, संयासी। नितरां बहुत अधिक। मिथ्याचार-झूठा आचरण ।

class 12th NotesMCQ
HistoryPolitical Science
EnglishHindi

कुटज पाठ का गद्यांश सप्रसंग व्याख्या एवं शब्दार्थ NCERT

1. कहते हैं, पर्वत शोभा-निकेतन होते हैं। फिर हिमालय का तो कहना ही क्या। पूर्व और अपर समुद्र महोदधि और रत्नाकर—दोनों को दोनों भुजाओं से थाहता हुआ हिमालय ‘पृथ्वी का मानदंड’ कहा जाए तो गलत क्या है ? कालिदास ने ऐसा ही कहा था। इसी के पाद देश में यह श्रृंखला दूर तक लेटी हुई है, लोग इसे शिवालिक श्रृंखला कहते हैं। 

प्रसंग — प्रस्तुत गद्य अवतरण हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा लिखित निबंध ‘कुटज’ से अवतरित है। इस निबंध के प्रारंभ में ही लेखक हिमालय पर्वत के सौंदर्य का वर्णन करते हुए कहते हैं कि –

व्याख्या पर्वत अर्थात् पहाड़ तो सौंदर्य बिखरने वाले होते हैं। इनकी सुंदरता तो देखते ही बनती है। पर्वतों को लेखक ने ‘शोभा निकेतन’ अर्थात् ‘सुंदरता का घर’ कहा है और यह पूर्णतः सत्य है। पर्वत सभी को अपनी तरफ बरबस आकर्षित कर लेते हैं। फिर हिमालय की सुंदरता तो अद्वितीय है। हिमालय के दोनों तरफ अचाह समुद्र विराजमान है। 

ऐसा प्रतीत होता है कि दोनों हाथों द्वारा हिमालय इन समुद्रों को थाह रहा है (धकेल रहा है)। लेखक हिमालय को पृथ्वी का मानदण्ड कहता है। संस्कृत के महाकवि कालिदास ने भी इसे (हिमालय पर्वत को पृथ्वी का मानदण्ड ही कहा है। हिमालय पर्वत के पाँव की तरफ जो श्रृंखला फैली हुई है, उसे शिवालिक श्रृंखला कहा जा सकता है। लोग इसे शिवालिक की श्रृंखला ही कहते हैं। 

2. रहीम को तो मैं बड़े आदर के साथ स्मरण करता हूँ। दरियादिल आदमी थे, पाय सो लुटाया । लेकिन दुनिया है कि मतलब से मतलब है, रस चूस लेती है छिलका और गुठली फेंक देती है। सुना है रस चूस लेने के बाद रहीम को भी फेंक दिया गया था। एक बादशाह ने आदर के साथ बलाया, दूसरे ने फेंक दिया। हुआ ही करता है। इसे रहीम का मोल घट नहीं जाता।

प्रसंग प्रस्तुत अवतरण हजारी प्रसाद द्विवेदी ललित निबंध कुटज से अवतरित है। इस अवतरण में लेखक दुनियादारी की बात समझाते हुए कहते हैं-

व्याख्या-लेखक रहीम (कवि) का बहुत सम्मान करते हैं, उनके दिल में रहीम के लिए अथाह प्यार है। लेखक के अनुसार रहीम भी हुत बड़े दिल के व्यक्ति हैं। उन्होंने इस संसार में जो कुछ भी धन-दौलत आदि प्राप्त किया, उसे इसी संसार में लुटा दिया। उनमें संचय की प्रवृत्ति नहीं थी। परन्तु दुनिया ने उनके साथ दगा किया। जैसा कि दुनिया का दस्तूर है- ‘सार-सार ग्रहि लिए थोथा देइ उडाय’ जो वस्तु दुनिया के मतलब की है उसे तो वह रख लेती है; जो बेकार होती है उसे फेंक देती है। 

लेखक कहता है कि रहीम के साथ भी दुनिया ने ऐसा ही छलावा किया है। उनका काव्य प्राप्त कर लेने के पश्चात् उनके साथ बुरा व्यवहार किया। एक बादशाह ने उन्हें उनके काव्य के आधार पर स्वीकार किया, उन्हें सम्मान दिया और दूसरे बादशाह ने उनकी उपेक्षा की। दुनियादारी है इसमें ऐसा होता ही है। परन्तु सोना तो सोना ही रहता है चाहे उसकी प्रशंसा की जाए या निंदा। रहीम भी रहे तो सोने की तरह। चाहे उन्हें सम्मान मिला या उपेक्षा वे एक प्रसिद्ध कवि रहे हैं।

3. जीना चाहते हो? कठोर पाषाण को भेदकर, पाताल की छाती चीरकर अपना भोग्य संग्रह करो; वायुमंडल को चूसकर, झंझा तूफान को रगड़कर अपना प्राप्य वसूल लो; आकाश को चूमकर अवकाश की लहरी में झूमकर उल्लास खींच लो। कुटज का यही उपदेश है।

प्रसंग प्रस्तुत अवतरण हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा लिखित निबंध कुटज से अवतरित है। उपरोक्त पंक्तियों में लेखक कुटज (एक छोटे से वृक्ष) के उपदेश के बारे में बता रहे हैं- 

व्याख्या-कुटज मनुष्य को सम्बोधित करते हुए कहता है-हे मनुष्य! यदि तुम जीना चाहते हो तो समस्त कठिनाइयों को झेलते हुए, मुसीबतों को झेलते हुए, बड़ी-बड़ी रुकावटों को पार करते हुए जीने का प्रयत्न करो और अपने जीने के लिए आवश्यक वस्तुओं को प्राप्त करो। अपने मार्ग में आने वाली बाधाओं को दूर करके, विपरीत परिस्थितियों को अपने अनुकूल करके जीने का प्रयत्न करो। कुटज मनुष्य को कहता अवकाश के समय, अपने कदम बढ़ाकर, आकाश की बुलन्दियों को छूने का प्रयास करो अर्थात् खुशियों को प्राप्त करो। आनन्द प्राप्त करो। ऊपर उठकर आनन्द प्राप्त करो। सफलता हासिल करो।

4. दुनिया में त्याग नहीं है, प्रेम नहीं है, परार्थ नहीं है, परमार्थ नहीं है-है केवल प्रचंड स्वार्थ । भीतर की जिजीविषा जीते रहने की प्रचंड इच्छा ही-अगर बड़ी बात हो तो फिर यह सारी बड़ी-बड़ी बोलियाँ जिनके बल पर दल बनाए जाते हैं, शत्रुमर्दन का अभिनय किया जाता है, देशोद्धार का नारा लगाया जाता है, साहित्य और कला की महिमा गाई जाती है, झूठ है।

प्रसंग प्रस्तुत अवतरण हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा लिखित निबंध ‘कुटज’ से अवतरित है। लेखक कहते हैं कि इस संसार में सब तरफ स्वार्थ ही स्वार्थ है।

व्याख्या– दुनिया में त्याग है ही नहीं, किसी के लिए कुछ त्यागना आसान नहीं है। न ही एक-दूसरे से प्यार है। इस संसार में कोई किसी का हित नहीं चाहता। यदि इस संसार में कुछ है तो वह है घोर स्वार्थ अर्थात् केवल अपने लिए सोचना मनुष्य केवल स्वार्थ की खातिर जीना चाहता है। परन्तु बड़ी-बड़ी बातें करता है, नारे लगाता है, शत्रुओं का मारने का दोन करता है, देश के हित के लिए नारे लगाता है, साहित्य सर्जन की बात करता है, कला की महिमा गान करता है परन्तु भीतर से एकदम स्वार्थी है। जहाँ उसका स्वार्थ सिद्ध हो गया, वहीं उसने देश हित के नारे छोड़ दिए। यही आज के मनुष्य की प्रकृति है। 

5. दुरंत जीवन शक्ति है। कठिन उपदेश है। जीना भी एक कला है लेकिन कला ही नहीं, तपस्या है। जियो तो प्राण डाल दो जिन्दगी में, मन ढाल दो जीवन रस के उपकरणों में! ठीक है। लेकिन क्यों? क्या जीने के लिए जीना ही बड़ी बात है? सारा संसार अपने मतलब के लिए ही तो जी रहा है। 

प्रसंग– प्रस्तुत अवतरण हजारी प्रसाद द्विवेदी के निबन्ध ‘कुटज’ से अवतरित है। लेखक कुटज के माध्यम से उपदेश देता है कि- व्याख्या- जीवन जीना बहुत कठिन है, जिसने जीना सीख लिया, उसका जीवन सफल है। स्वार्थ भाव से दूर रहकर विपदाओं को झेलकर, प्रतिकूल परिस्थितियों को अपने अनुकूल बनाकर जीवन यापन करना एक कला है। यही कला बहुत कठिनता से प्राप्त होती है, ऐसा जीवन जीने के लिए बहुत संघर्ष व अभ्यास करना पड़ता है। 

प्राणों की बाजी लगाकर समस्त कठिनाइयों को झेलकर जीना ही असली जीना है। मन से आनन्दित होकर जीना भी एक कला है। जीते तो सभी परन्तु जो अपने जीवन में आनन्द रस का संचार करते हुए जीवनयापन करता है उसी का जीना धन्य है। केवल जीना बड़ी बात नहीं है परन्तु सफल व आनन्दित जीवन जीना बहुत बड़ी बात है। परन्तु सारा संसार स्वार्थी है, वह केवल अपने हित के लिए ही जीवनयापन कर रहा है।

6. व्यक्ति की ‘आत्मा’ केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं है, वह व्यापक है। अपने में सब और सबमें आप इस प्रकार की एक समष्टि बुद्धि जब तक नहीं आती तब तक पूर्ण सुख का आनन्द भी नहीं मिलता। अपने आपको दलित दाक्षा की भाँति निचोड़कर जब तक सर्व के लिए निछावर नहीं कर दिया जाता तब तक ‘स्वार्थ’ खंड-सत्य है, वह मोह को बढ़ावा देता है, तृष्णा को उत्पन्न करता है और मनुष्य को दयनीय- कृपण बना देता है। 

प्रसंग प्रस्तुत अवतरण हजारी प्रसाद द्विवेदी के निबंध ‘कुटज’ से अवतरित है। इस अवतरण में द्विवेदी जी ‘कुटज’ वृक्ष के माध्यम से मनुष्य को शिक्षा देते हैं, उपदेश देते हैं कि-

व्याख्या-‘आत्मा’ केवल मनुष्य के भीतर ही नहीं अपितु वह सर्वत्र है, वह बहुत व्यापक है, विस्तृत है। जब तक मनुष्य में ये भाव नहीं आ जाते कि आत्मा अर्थात् परमात्मा सब जगह है और आत्मा सभी में व्याप्त है तब तक मनुष्य को आनन्द प्राप्त नहीं होता, न ही वह सुखी होता है। 

मनुष्य तभी सुखी व आनन्दित हो सकता है जब तक वह ‘आत्मा सर्वत्र है’, ‘ईश्वर सर्वत्र है’, ‘सभी में ईश्वर का वास है’, का मान नहीं कर लेता। जब तक मनुष्य अपने अहंकार को एक अंगूर के रस की भाँति निचोड़ कर फेंक नहीं देता तब तक वह स्वार्थ से ऊपर नहीं उठ सकता। 

मनुष्य के भीतर से स्वार्थ का त्याग अनिवार्य है। स्वार्थ त्याग कर ही मानव सफल हो सकता है। जब तक मनुष्य में स्वार्थ है, उसकी इच्छाएँ प्रबल होती रहती हैं और मनुष्य की हालत दयनीय होती रहती है। मनुष्य जब स्वार्थ से ऊपर ही नहीं उठ सकता तो उसकी दशा एक कंजूस की भाँति हो जाती है, उसके व्यक्तित्व का विकास ही नहीं हो सकता। अतः स्वार्थ-त्याग अत्यंत आवश्यक है। स्वार्थ त्याग के बिना मनुष्य सफल जीवनयापन नहीं कर सकता

7. जो समझता है कि वह दूसरों का उपकार कर रहा है, वह अबोध है, जो समझता है कि दूसरे उसका उपकार कर रहे हैं वह भी बुद्धिहीन है। कौन किसका उपकार करता है, कौन किसका उपकार कर रहा है? मनुष्य जी रहा है, केवल जी रहा है; अपनी इच्छा से नहीं, इतिहास विधाता की योजना के अनुसार।

प्रसंग प्रस्तुत अवतरण हजारी प्रसाद द्विवेदी के निबंध ‘कुटज’ से अवतरित है। इस अवतरण में द्विवेदी जी ‘कुटज’ वृक्ष के माध्यम से मनुष्य को शिक्षा देते हैं, उपदेश देते हैं कि-

व्याख्या- लेखक कहता है कि यदि कोई व्यक्ति किसी की मलाई करके यह सोचे कि वह किसी का उपकार कर रहा है तो उसकी यह धारणा गलत है, यदि वह यह समझता है कि कोई व्यक्ति उसका अहित कर रहा है तो भी उसका ऐसा सोचना गलत है। इस संसार में कोई किसी के लिए कुछ नहीं कर रहा है। न तो कोई किसी का हित कर रहा है न ही कोई उसका अहित कर रहा है। यह सब सोचना तो नादानी है। दुनिया में मनुष्य विधि के विधान के अनुरूप जी रहा है, जो लिखा है, उसे काट रहा है। सब कुछ विथि के अनुरूप ही हो रहा है।


कुटज पाठ का प्रश्न उत्तर | Class 12 Hindi Book Antra Chapter 9 Question Answer

प्रश्न 1. कुटज को ‘गाढ़े का साथी’ क्यों कहा गया है?

उत्तर- 

1. कालीदास जब रामगिरि पहुँचे, तो उन्होंने अपने ही हाथों इर कुटज पुष्प का अर्ध्य देकर मेघ की अभ्यर्थना की थी, उस समय उन्हें कोई अन्य फूल नहीं मिला था। 

2. जब कालिदास ने यक्ष को मेघ की अभ्यर्थना हेतु भेजा था, तो उसे ताजे कुटज पुष्पों की अंजलि देकर ही संतोष करना पड़ा था।

3. इस प्रकार कुटज ने ही उनके संतप्त चित्त को सहारा दिया था।

4. इसीलिए लेखक ने कुटज से कहा है कि ‘तुम धन्य हो ! गाढ़े के तुम साथी हो’। 

प्रश्न 2. ‘नाम’ क्यों बड़ा है ? लेखक के विचार अपने शब्दों में लिखिए । समय पड़ने पर तुम्हीं काम आए हो।

उत्तर- 

1. लेखक का विचार है कि नाम इसलिए बड़ा होता है कि उसे सामाजिक स्वीकृति मिली होती है। रूप व्यक्ति सत्य है, नाम समाज सत्य।

2. नाम उस पद को कहते हैं, जिस पर समाज की मुहर लगी होती है। 

3. आधुनिक शिक्षित लोग जिसे ‘सोशल सेक्शन’ कहा करते हैं।

4. नाम समाज द्वारा स्वीकृत होता है, इतिहास द्वारा प्रमाणित होता है, समस्त मानव की वित्त गंगा में स्नात होता है। 

प्रश्न 3. ‘कुट’, ‘कुटज’ और ‘कुटनी’ शब्दों का विश्लेषण कर उनमें आपसी संबंध स्थापित कीजिए।

उत्तर- 

1. कुट घड़े को भी कहते हैं, घर को भी कहते हैं। 

2. ‘कुटज’ अर्थात् घड़े से उत्पन्न, प्रतापी अगस्त्य मुनि ‘कुटज’ कहे जाते हैं।

3. जरा गलत ढंग की दासी ‘कुटनी’ कही जा सकती है। घड़े में पैदा होने का तो कोई तुक नहीं है, न मुनि कुटज के सिलसिले में, न फूल कुटज के। फूल गमले में अवश्य होते हैं, पर कुटज तो जंगल का सैलानी है, उसे घड़े या गमले से क्या लेना-देना। यह शब्द अवश्य ही विचारोत्तेजक है, कहाँ से आया ? अवश्य ही ये शब्द आग्नेय भाषा परिवार के हैं। 

पश्न 4. कुटज किस प्रकार अपनी अपराजेय जीवनी-शक्ति की घोषणा करता है ?

उत्तर- 

1. कुटज नाम व रूप दोनों में ही अपनी अपराजेय जीवनी-शक्ति की घोषणा कर रहा है।

2. यह इतना आकर्षक नाम है कि हजारों वर्षों से जीता चला आ रहा है। कितने नाम आए और गाए। कुटज है कि संस्कृत की निरंतर स्फीयमान शब्दराशि में जो जमकर बैठा, सो बेटा ही है।

3. रूप के तो कहने ही क्या ? चारों तरफ से कुपित यमराज के दारुण निःश्वास के समान यघकती लू में यह हरा भी है और मरा भी।

4. कठोर पाषाण की कारा में रुद्ध अज्ञात जलस्रोत से बरबस रस खींचकर सरस बना हुआ है। 

5. इसमें कितनी कठिन जीवनी-शक्ति है। जीवनी-शक्ति ही जीवनी-शक्ति को प्रेरणा देती है।

प्रश्न 5. ‘कुटज’ हम सभी को क्या उपदेश देता है ? टिप्पणी कीजिए।

उत्तर- 

1. कुटज हम सभी को उपदेश देता है कि यदि जीना चाहते हो तो “कठोर पाषाण को भेदकर, पाताल की छाती चीरकर अपना भोग्य संग्रह करो, वायुमण्डल को चूसकर, झंझा-तूफान रगड़कर, अपना प्राप्य वसूल लो; आकाश को चूमकर, अवकाश की लहरी में घूमकर उल्लास खींच लो।”

2. अर्थात् कठिन परिश्रम करके, समस्त परिस्थितियों को अपने अनुकूल बनाकर अपने अधिकारों को भोगों और खुशी प्राप्त करो।

प्रश्न 6. कुटज के जीवन से हमें क्या सीख मिलती है ? 

उत्तर- -कुटज के जीवन में हमें यह सीख मिलती है कि-

1. जीना एक कला ही नहीं, तपस्या भी है।

2. सारा संसार मतलब के लिए ही जी रहा है। 

3. दुनिया में त्याग नहीं है, प्रेम नहीं है, परार्थ नहीं है, परमार्थ नहीं है, केवल स्वार्थ ही स्वार्थ है दुनिया में।

4. चाहे सुख हो या दुख, प्रिय हो या अप्रिय, जो मिल जाए उसे शान के साथ, हृदय सेbबिल्कुल अपराजित होकर सोल्लास ग्रहण करो। हार मत मानो। 

प्रश्न 7. कुटज क्या केवल जी रहा है- लेखक ने यह प्रश्न उठाकर किन मानवीय कमजोरियों पर टिप्पणी की है ? 

उत्तर— ‘कुटज क्या केवल जी रहा है’-लेखक ने यह प्रश्न उठाकर निम्नलिखित मानवीय कमजोरियों पर टिप्पणी की है-

1. आज का मानव स्वावलम्बन से नहीं, अपितु दूसरों का आश्रय लेकर जीता है। 

2. शक्तिशाली लोगों के आगे घुटने टेक देता है।

3. स्थान-स्थान पर नीति और धर्म का उपदेश देता फिरता है। 

4. अपनी उन्नति हेतु अफसरों का जूता चाटता फिरता रहता है। 5. आत्मोन्नति हेतु नीलम धारण करता है, तरह-तरह के नगों की अंगूठियाँ पहनता है।

प्रश्न 8. लेखक क्यों मानता है कि स्वार्थ से भी बढ़कर, जिजीविषा से भी प्रचंड कोई न कोई शक्ति अवश्य है ? उदाहरण सहित उत्तर दीजिए। 

उत्तर—लेखक का कहना है कि स्वार्थ से भी बढ़कर जिजीविषा से भी प्रचंड कोई न कोई शक्ति अवश्य है। यहाँ लेखक ‘आत्मा’ के बारे में संकेत करता है और कहता है कि व्यक्ति की आत्मा केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं है, वह व्यापक है। अपने में सब और सबमें आप इस प्रकार की समष्टि बुद्धि जब तक नहीं आती, तब तक पूर्ण सुख का आनन्द भी नहीं मिलता। 

प्रश्न 9. ‘कुटज’ पाठ के आधार पर सिद्ध कीजिए कि ‘दुख और सुख तो मन के विकल्प हैं।

उत्तर—

1. लेखक का कहना है कि दुख और सुख तो मन के विकल्प हैं अर्थात् सुखी वह है जिसका मन वश में है, दुखी वह है जिसका मन परवश है। 

2. परवश होने का अर्थ है खुशामद करना, जी- हुजूरी करना । 

3. जिसका मन अपने वश में नहीं, वह स्वयं को छिपाने के लिए आडंबर रचता रहता है या फिर दूसरों को फँसाने के लिए जाल बिछाता रहता है।

4. कुटज इन सभी आडम्बरों से मुक्त है, वह संसार में रहकर भी संसार से मुक्त है। उसने मन को जीत लिया है। 

5.  अपने मन को नियंत्रित करना सबसे बड़ा सुख है। जिस प्रकार कमल कीचड़ में रहकर भी अलग होता है, उसी प्रकार संसार में रहकर सांसारिक वासनाओं को त्यागना चाहिए। 

प्रश्न 10. निम्नलिखित गद्यांशों की सप्रसंग व्याख्त कीजिए-

(क) ‘कभी-कभी जो लोग ऊपर से बेहया दिखते हैं, उनकी जड़ें काफी गहरी पैठी रहती हैं। ये भी पाषाण की छाती फाड़कर न जाने किस अतल गहर से अपना भोग्य खींच लाते हैं ?

उत्तर—-प्रसंग प्रस्तुत गद्य अवतरण हजारी प्रसाद द्विवेदी के निबंध कुटज से अवतरित है। इस निबंध में द्विवेदी जी कुटज के माध्यम से मानव के लिए संदेश देते हैं। कुटज में अपराजेय  जीवन-शक्ति है, वह विषम परिस्थितियों में भी बने हता है- शान के साथ जीने की क्षमता रखता है। 

लेख व्याख्या-कुटज वृक्ष के लिए लेखक कहता है कि यह कुटज इतना मस्तमौला दिखाई दे रहा है, लगता है कि यह बेहया है, अर्थात् इसे अपने इज्जत की कोई चिन्ता नहीं। परन्तु कभी-कभी ऐसा भी होता है, जो लोग ऊपर से यूँ मस्तमौला दिखाई देते हैं, वे भीतर से बहुत गहरी सोच रखते हैं। 

जब इन्हें अपना कार्य पूर्ण करना होता है, तो विषम परिस्थितियों में भी रास्ता खोज एव हैं अर्थात् बेहया दिखने वाले लोग वास्तव में बेहया नहीं होते। वे अपनी आवश्यकतानुसार अपनी जरूरतों को स्वयं पूरा कर लेते हैं। 

(ख) ‘रूप व्यक्ति-सत्य है, नाम समाज- सत्य। नाम उस पद को कहते हैं, जिस पर समाज की मुहर लगी है। आधुनिक शिक्षित लोग जिसे ‘सोशल-सेक्शन’ कहा करते हैं। मेरा मन नाम के लिए व्याकुल है, समाज द्वारा स्वीकृत, इतिहास द्वारा प्रमाणित, समष्टि मानव न की चित्त-गंगा में स्नात।”

उत्तर- प्रसंग-प्रस्तुत अवतरण हजारी प्रसाद द्विवेदी के निबंध ‘कुटज’ से अवतरित है। लेखक जब कुटज का नाम भूल जाता है तो काफी देर बाद उसे यह नाम याद आता है। उसके रूप को देखकर नाम याद करने का प्रयत्न करता है। वह कहता है कि रूप व नाम में से नाम बड़ा है क्योंकि- 

व्याख्या – नाम तो समाज द्वारा स्वीकृत होता है और रूप केवल व्यक्ति ही जानता है। ‘नाम’ पर समाज की मुहर लग जाती है, अर्थात् समाज के द्वारा किसी भी व्यक्ति, वस्तु व स्थान को नाम दिया जाता है और सभी की तरफ से उसे स्वीकृत भी किया जाता है। 

आधुनिक लोग इसे ‘सोशल सेक्शन’ कहते हैं। लेखक का मन ‘नाम’ ढूँढ़ने के लिए बेचैन है। वह नाम जिसे समाज ने स्वीकृति दे दी है, इतिहास ने जिसे प्रमाणित कर दिया है, समस्त मानवों के मन ने जिसे अपना लिया हो। कवि को देर से इसका नाम कुटज याद आता है। 

(ग) रूप की तो बात ही क्या है! बलिहारी है इस मादक शोभा की। चारों ओर कुपित यमराज के दारूण निःश्वास के समान धधकती लू में यह हरा भी है और भरा भी है, दुर्जन के चित्त से भी अधिक कठोर पाषाण की कारा में रुद्ध अज्ञत जल स्रोत से बरबस रस खींचकर सरस बना हुआ है।

उत्तर- प्रसंग– प्रस्तुत गद्य अवतरण हजारी प्रसाद द्विवेदी के निबंध ‘कुटज’ से अवतरित है। लेखक कुटज का पौधा देखकर उसके रूप पर बलिहारी जाता है। कुटज की सुन्दरता का वर्णन करते हुए लेखक कहता है कि-

व्याख्या-कुटज का रूप बहुत मनोरम है। इसकी मस्ती की शोभा पर लेखक बलिहारी जाता है। इसकी सुन्दरता का वर्णन करते हुए लेखक कहता है कि चारों तरफ से यह भयंकर गर्मी व लू से घिरा हुआ है, फिर भी हरा-भरा है। यह इतनी विपरीत परिस्थितियों में भी अपने अस्तित्व को बचाए हुए है। किसी बुरे व्यक्ति के हृदय में रहकर अच्छा बना रहना अत्यन्त कठिन है। कुटज तो भारी पत्थरों के बीच में से निकलकर न जाने कहाँ से जल प्राप्त करके स्वयं सरस बना हुआ है। इतनी विषम परिस्थितियों में भी सरस व हरा-भरा है। ठीक उसी तरह जैसे कीचड़ में कमल रहता है, उसे कीचड़ से कोई सरोकार नहीं। 

(घ) ‘हृदयेनापराजितः। कितना विशाल वह हृदय होगा जो सुख से, दुःख से, प्रिय अप्रिय से विचलित न होता होगा! कुटज को देखकर रोमांच हो आता है। कहाँ से मिली है यह अकुतोभया वृत्ति, अपराजित स्वभाव, अविचल जीवन दृष्टि।”

उत्तर- प्रसंग – प्रस्तुत गद्य अवतरण हजारी प्रसाद द्विवेदी के निबंध ‘कुटज’ से अवतरित है। लेखक कुटज के माध्यम से प्रत्येक मानव को प्रत्येक परिस्थिति में समभाव रखने की प्रेरणा देते हुए कहता है-

व्याख्या ‘चाहे सुख हो या दुःख, प्रिय हो या अप्रिय’ जो मिल जाए, उसे शान के साथ, हृदय से बिल्कुल अपराजित होकर, सोल्लास ग्रहण करे। हार न माने लेखक कढ़ता है कि यह हृदय कितना विशाल होगा, जो कभी विचलित नहीं होता, चाहे सुख हो या दुख हो, चाहे कोई प्रिय व्यक्ति मिले या अप्रिय व्यक्ति मिले। जो सभी के साथ समान भाव रखता है। वही श्रेष्ठ है। 

लेखक जैसे ही कुटज को देखता है उसका हृदय पुलकित हो जाता है कि यह कुट श्रेष्ठ है, इसमें इतनी सहन शक्ति कहाँ से प्राप्त की है। उसका स्वभाव ऐसा है जो किसी से हार नहीं मानता, उसकी जीवनदृष्टि ऐसी है, जो कभी भी विचलित नहीं होती है।



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VVI Question for VIP Topper Students

प्रश्न 1. कुटज के पौधों का रेखाचित्र खींचिए।

उत्तर-कुटज के वृक्ष शिवालिक की सूखी नीरस पहाड़ियों पर द्वंद्वातीत व अलमस्त है। वे छोटे-से, ठिगने से पेड़ हैं, पत्ते हैं, पत्ते चौड़े हैं, बड़े भी हैं। फूलों से ऐसे लदे हैं कि कुछ पूछिए नहीं। इनकी अदा अजीब है, मुस्कुराते जान पड़ते हैं। लगता है ये लेखक से पूछ रहे हैं कि क्या तुम मुझे नहीं पहचानते? यह कुसुम स्तबकों से झवराया, उल्लास लोल चारुस्मित कुटज है फुटज ।

प्रश्न 2. लेखक को जब ‘कुटज’ नाम ध्यान नहीं आता, तो वह कौन-कौन नाम की सर्जना अपने मन में करता है? 

उत्तर- लेखक सोचता है, नाम में क्या रखा है। नाम तो कई दिए जा सकते हैं, जैसे—सुस्मिता, गिरिकांता, वनप्रभा, शुभकिरीटिनी, मदोद्धता, विजितातपा, अलकावतंसा तथा पौरुप व्यंजन नाम भी दिए जा सकते हैं। जैसे-अकुतोभय, गिरिगौरव, कूटोल्लास, अपराजित, धरतीयकेल, पहाड़फोड़ पातालभेद आदि ।

प्रश्न 3. ‘कठोर पाषाण को भेदकर, पाताल की छाती चीरकर अपना भोग्य संग्रह करो’ से लेखक क्या संदेश देना चाहता है? 

उत्तर- ‘कठोर पाषाण को भेदकर, पाताल की छाती चीरकर अपना भोग्य संग्रह करो’ से लेखक यह संदेश देता है कि मनुष्य चाहे जितनी भी कठिन परिस्थितियों में हो, उन परिस्थितियों को अपने अनुकूल बनाने का प्रयत्न करे। जीवन के आधारभूत तत्व प्राप्त करने के लिए जितने भी कष्ट सहन करने पड़ें, उन कष्टों को सहनकर अपने आवश्यक तत्वों को प्राप्त करे।

प्रश्न 4. भीष्म पितामह के लिए लेखक के क्या विचार थे? 

उत्तर – भीष्म पितामह के लिए लेखक के विचार थे—’चाहे सुख हो या दुख, प्रिय हो या अप्रिय, जो मिल जाए, उसे शान के साथ हृदय से बिल्कुल अपराजित होकर, सोल्लास ग्रहण करो हार मत मानो।”

प्रश्न 5. कुटज की क्या-क्या विशेषताएँ लेखक ने बताई हैं? 

उत्तर- कुटज दूसरे के द्वार पर भीख माँगने नहीं जाता, नीति व धर्म का उपदेश नहीं दता, अपनी उन्नति के लिए अफसरों का जूता नहीं चाटता, आत्मोन्नति हेतु नीलम धारण नहीं करता, अंगूठियों की लड़ी नहीं पहनता दाँत नहीं निपोरता, जीता है शान से बस ।

प्रश्न 6. ‘आत्मनस्तु कामाय सर्व प्रियं भवति’ से लेखक का क्या अभिप्राय है?

उत्तर- ‘आत्मनस्तु कामाय सर्व प्रियं भवति’ से अभिप्राय है कि सब अपने मतलब के लिए प्रिय होते हैं। संसार में जहाँ कहीं प्रेम है, सब मतलब के लिए है। अर्थात् यह संसार स्वार्थी है स्वार्थ हेतु सभी प्रेम करते हैं, चाहे वह पति पत्नी का, भाई-भाई का प्रेम क्यों न हो। किसी-न-किसी कोने में प्रत्येक व्यक्ति के स्वार्थ की पूर्ति होती है।

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