Class 12 Hindi Book Antra Chapter 7 Question Answer जहाँ कोई वापसी नहीं Summary

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मैं खुद 12वीं का टॉपर रहा हूं और मुझे पता है कि 12वीं की परीक्षा में किस तरह के प्रश्न पूछे जाते हैं। वर्तमान में, मैं एक शिक्षक की भूमिका भी निभा रहा हूँ, और अपने छात्रों को कक्षा 12वीं की महत्वपूर्ण जानकारी और विषयों का अभ्यास भी कराता हूँ। मैंने यह लेख 5 वर्षों से अधिक के अपने अनुभव के साथ लिखा है। इस पोस्ट की मदद से आप परीक्षा में इस अध्याय से भूगोल में बहुत अच्छे अंक प्राप्त कर सकेंगे।

Class 12 Hindi Book Antra Chapter 7 Question Answer जहाँ कोई वापसी नहीं Summary

कक्षा | Class12th 
अध्याय | Chapter07
अध्याय का नाम | Chapter Nameजहाँ कोई वापसी नहीं
लेखक का नाम | Author Nameनिर्मल वर्मा
किताब | Bookअंतरा ऐच्छिक | Hindi Elective
खंड | Sectionगद्य खंड | Prose Section
बोर्ड | Boardसभी हिंदी बोर्ड
किताब | Book एनसीईआरटी | NCERT
विषय | Subjectहिंदी | HINDI
अध्ययन सामग्री | Study Materialsप्रश्न उत्तर | Question answer


निर्मल वर्मा का जीवन परिचय | Biography of Nirmal Verma

जीवन-परिचय-निर्मल वर्मा का जन्म सन् 1929 ई. में शिमला में हुआ। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के सेट स्टीफेंस कॉलेज में इतिहास से एम.ए. किया और अध्यापन कार्य करने लग गए और चेक उपन्यासों तथा कहानियों का हिन्दी अनुवाद किया। निर्मल वर्मा को हिन्दी के साथ-साथ अंग्रेजी पर भी अधिकार प्राप्त था। 

उन्होंने ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ तथ्या ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ के लिए यूरोप की सांस्कृतिक एवं राजनीतिक समस्याओ पर अनेक लेख और रिपोर्ताज लिखे हैं, जो उनके निबंध संग्रहों में संकलित हैं। सन् 1970 ई. में वे भारत लौट आए और स्वतंत्र लेखन करने लगे।

Class 12 Hindi Book Antra Chapter 7 Question Answer
image credit: Social media

रचनाएँ निर्मल वर्मा का मुख्य योगदान हिन्दी कथा-साहित्य के क्षेत्र में है। वे नयी कहानी आन्दोलन के महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर माने जाते हैं उनकी साहित्यिक रचनाएँ निम्नलिखित है- कहानी संग्रह-परिंदे, जलती झाड़ी, तीन एकांत, पिछली गरमियों में, कच्चे और काला पानी, बीच बहस में, सूखा तथा अन्य कहानियाँ आदि।

उपन्यास-वे दिन, लाल टीन की छत, एक चिथड़ा सुख तथा अन्तिम अरण्य, रात का रिपोर्टर |

यात्रा संस्मरण– हर बारिश में, चीड़ों पर चाँदनी, धुंध से उठती पुन। निबंध संग्रह – शब्द और स्मृति, कला का जोखिम, ढलान से उतरते हुए। इनमें विविध विषयों का विवेचन है। सन् 1985 ई. में कव्वे और काला पानी पर उनको ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। इसके अतिरिक्त उन्हें कई अन्य पुरस्कारों से भी सम्मानित किया गया।

भाषा शिल्प की विशेषताएँ निर्मल वर्मा की भाषा-शैली में एक ऐसी अनोखी कसावट है, जो विचार सूत्र की गहनता को विविध उद्धरणों से रोचक बनाती हुई विषय का विस्तार करती है। शब्द चयन में जटिलता न होते हुए भी उनकी वाक्य रचना में मिश्र और संयुक्त वाक्यों की प्रधानता है। स्थान-स्थान पर उन्होंने उर्दू और अंग्रेजी के शब्दों का स्वाभाविक प्रयोग किया है, जिससे उनकी भाषा शैली में अनेक प्रयोगों की झलक मिलती है।


जहाँ कोई वापसी नहीं पाठ का सारांश | Jahan Koi Wapsi Nahi Class 12 Hindi Summary

यात्रा वृतांत के माध्यम से लोगों को पर्यावरण और परिवर्तन के प्रति सजग रहने का संदेश देना प्रस्तुत पाठ का मूल आधार है। औद्योगिक विकास एवं प्राकृतिक संसाधनों का आवश्यक दोहन को जीवन के प्रतिकूल बताने में रचनाकार सफल हुआ है।

नवागाँव-लेखक सन् 1983 ई. में जुलाई मास के अंत में धान रोपाई के समय नवागाँव गए। यहाँ लगभग अठारह छोटे-छोटे गाँव हैं। इन गाँवों में से एक का नाम है-अमझर, अर्थात् आम के पेड़ों से घिरा गाँव, जहाँ आम झरते हैं। पिछले दो-तीन वर्षों से यहाँ न तो फल लगता है, न झरता है। क्योंकि ऐसी सरकारी घोषणा हुई थी कि ‘अमरौली प्रोजेक्ट’ के अंतर्गत नवागाँव के अनेक गाँव उजाड़ दिए जाएँगे। तब से आम के पेड़ सूखने लगे। अब आदमी ही उजड़ जाएगा तो पेड़ जीवित रहकर क्या करेंगे? मनुष्य के विस्थापन के विरोध में पेड़ भी सत्याग्रह कर सकते हैं, यह पहली बार देखने को मिला।

अमझर लोग विस्थापित होकर कैसी अनाथ, उन्मूलित जिंदगी बिताते हैं, परन्तु विस्थापन – से पूर्व वे अपने स्वच्छ पवित्र खुलेपन में रहते होंगे-ऐसा लेखक ने पहली बार अमझर गाँव में देखा। वहाँ पेड़ों के झुरमुट, साफ-सुथरे खप्पर लगे मिट्टी के झोंपड़े थे। चारों तरफ पानी ही पानी था, ऐसा लगता था मानों अमझर की पूरी की पूरी जमीन एक झील हो, एक अंतहीन सरोवर हो, जिसमें पेड़-पौधे, झोपड़े सभी आधे पानी में, आधे पानी के ऊपर तैरते दिखाई देते हैं। ऐसा • प्रतीत होता है ये सब बाढ़ में डूब गए हैं, परन्तु यह बाड़ नहीं अपितु धान के खेत हैं।

गाँव के भीतर का दृश्य-यदि गाँव के भीतर देखें, तो औरतें पंक्ति में झुकी हुई धान के पौधे छप छप पानी में रोप रही हैं-सुन्दर, सुडौल, धूप में चमचमाती काली टाँगे और सिरों पर चटाई के किश्तीनुमा हेट, जरा-सी आहट पाकर वे सिर उठाकर देखने लगती है, विस्मय से मुस्कुराती हैं, फिर अपने काम में लग जाती हैं। 

इनका इतना साफ व सजीव दृश्य देखकर लगता ही नहीं कि कुछ ही वर्षों में सब कुछ समाप्त हो जाएगा। झोंपड़े, खेत, ढोर, आम के पेड़-सब एक गंदी ‘आधुनिक औद्योगिक कॉलोनी की ईंटों के नीचे दब जाएगा। ये औरते पत्थर कूटती दिखाई देंगी। उनके बच्चों को कभी मालूम नहीं होगा कि पहले यह उनके पुरखों का गाँव था जहाँ आम झरते थे।

विकास या विनाश– आज बाढ़ या भूकम्प के कारण लोग कुछ समय तक अपना घर छोड़कर कहीं और चले जाते हैं, परन्तु कुछ अरसे के बाद अपने जाने-पहचाने परिवेश में लौट भी आते हैं। परन्तु विकास या प्रगति के नाम पर जब इतिहास लोगों को उन्मूलित करता है, तो फिर वे कभी अपने घर वापस नहीं लौट पाते।

सिंगरोली का विनाश व विकास-यदि सिंगरौली उजाड़ रेगिस्तान होता, तो शायद इतना दुःख नहीं होता। सिंगरौली की उर्वरा भूमि व समृद्ध जंगल के कारण शताब्दियों से हजारो वनवासी व किसान अपना भरण-पोषण करते आए हैं। बीस वर्ष पहले तक समूचा सिंगरौली विंध्याचल बावजूद व केनूर के पहाड़ों और चारों तरफ से जंगलों से घिरा हुआ था। यहाँ कत्था, महुआ, बाँस व शीशम के पेड़ थे। यातायात के साधन सीमित थे। सिंगरौली अतुल प्राकृतिक सौंदर्य के ‘काला पानी’ माना जाता था, जहाँ न लोग भीतर आते थे, न बाहर जाने का जोखिम उठाते थे।

कभी-कभी किसी इलाके की सम्पदा ही उसका अभिशाप बन जाती है। दिल्ली के सत्ताधारियों और उद्योगपतियों की आँखों से सिंगरौली की अपार खनिज सम्पदा छिपी नहीं रही। विस्थापन की एक लहर रिहंद बाँध बनने से आई, जिसके कारण हजारों गाँव उजाड़ दिए गए। चारों तरफ पक्की सड़कें व पुल बनाए गए। सिंगरौली जो कभी ‘बैकुण्ठ’ व ‘काला पानी’ माना जाता था। अब प्रगति के मानचित्र पर राष्ट्रीय गौरव के साथ प्रतिष्ठित हुआ। 

कोयले की खदानों और विद्युत गृहों की पूरी शृंखला ने पूरे प्रदेश को अपने में घेर लिया। आज वहाँ केन्द्रीय व राज्य सरकार के अफसरों, इंजीनियरों व विशेषज्ञों की कतार लगी रही है। सिंगरौली जाने से पूर्व लेखक के मन में ऐसा कोई सुखद भ्रम नहीं था कि औद्योगीकरण का चक्का रोका जा सकता है। लेकिन 35 वर्ष पूर्व हम कोई दूसरा विकल्प चुन सकते थे, जिसमें मानव सुख की कसौटी भौतिक लिप्सा न होकर जीवन की जरूरतों पर निर्धारित होती।

भारत की सांस्कृतिक विरासत भारत की सांस्कृतिक विरासत यूरोप की तरह म्यूजियम व संग्रहालयों में जमा नहीं थी। वह उन रिश्तों से जीवित थी जो आदमी को उसकी धरती, उसके जंगलों, नदियों, उसके समूचे परिवेश के साथ जोड़ते थे। यूरोप में पर्यावरण का प्रश्न मनुष्य व भूगोल के बीच संतुलन बनाए रखने का है। भारत में वही प्रश्न मनुष्य और उसकी संस्कृति के बीच पारस्परिक संबंध बनाए रखने का हो जाता है।

भारत की ट्रेजेडी यह नहीं है कि शासक वर्ग ने औद्योगीकरण का मार्ग चुना। ट्रेजेडी यह रही कि पश्चिम की देखा-देखी और नकल में योजनाएँ बनाते समय प्रकृति, मनुष्य और संस्कृति के बीच का नाजुक संतुलन किस तरह नष्ट होने से बचाया जा सकता है इस तरफ हमारे सत्ताधारियों का ध्यान कभी नहीं गया। हम बिना पश्चिम को मॉडल बनाए अपनी शर्तों और मर्यादाओं के आधार पर, औद्योगिक विकास का भारतीय स्वरूप निर्धारित कर सकते हैं। हमारे शासकों को ऐसा ध्यान कभी नहीं आया।


जहाँ कोई वापसी नहीं कठिन शब्दों के अर्थ

धान रोपाई – धान लगाने का । विस्थापन- उजड़ कर एक जगह से दूसरी जगह जाना। अमूलित-अपने मूल से कटना । निरंतर । परिवेश वातावरण डोर-डंगर-पशु-पक्षी

विस्मय – आश्चर्य । तिरना अलग-थलग पड़ना, किनारे पर रहना। शाश्वत – निर्वासित निकाल दिया। अरसा समय सीमित-कम – लोलुप – लालची। झंझावत-मुसीबत। भ्रम-शंका। चक्का-चक्र। अदृश्य-न दिखाई देने वाला। 

class 12th NotesMCQ
HistoryPolitical Science
EnglishHindi

जहाँ कोई वापसी नहीं पाठ का गद्यांश सप्रसंग व्याख्या एवं शब्दार्थ NCERT

1. किन्तु पिछले दो-तीन वर्षों से पेड़ों पर सूनापन है, न कोई फल पकता है, न कुछ झरता है। कारण पूछने पर पता चला कि जब से सरकारी घोषणा हुई है कि अमरौली प्रोजक्ट के अंतर्गत नवागाँव के अनेक गाँव उजाड़ दिए जाएँगे, तब से न जाने कैसे, आम पेड़ सूखने लगे। आदमी उजड़ेगा, तो पेड़ जीवित र कर क्या करेंगे? 

प्रसंग प्रस्तुत गद्य अवतरण ‘निर्मल वर्मा’ द्वारा लिखत याचा वृत्तांत ‘जहाँ कोई वापसी ‘नहीं’ से अवतरित है। इसमें लेखक सिंगरौली का दृश्य अंकित करता है। वह गिरौली गया। उसने वहाँ क्या देखा? उसे कैसा महसूस हुआ? इसका वर्णन किया गया है।

व्याख्या- लेखक धान रोपाई के महीने में सिंगरौली जाता । वहाँ जाने पर पता चलता है कि दो-तीन वर्षों से यहाँ के सभी पेड़ सूखने लगे हैं। यहाँ अमझर नामक स्थान पर ढेरों आम के बाग थे, परन्तु अब तो सर्वत्र शून्य ही शून्य है, अर्थात् चारों तरफ सूनापन छा गया है, न कोई फल पकता है, न ही कोई पका हुआ फल नीचे गिरता है। 

लेखक ने खूब पूछताछ की कि वहाँ ऐसा सूनापन क्यों दिखाई दे रहा है, तो उसे पता चला कि जब से यहाँ घोषणा की गई है कि औद्योगीकरण हेतु नवागाँव के अनेक गाँव उजाड़ दिए जाएँगे, तभी से यहाँ के पेड़ सूखने लगे। ऐसा प्रथम बार देखा गया, वह भी सिंगरौली में कि पेड़-पौधे आदमी के साथ कितने जुड़े हुए हैं। वहाँ यह निश्चित हो गया था कि आदमी हैं तो पेड़ हैं अर्थात् पेड़ों का अस्तित्व आदमियों से है। यदि आदमी नहीं तो पेड़ों का ध्यान कौन रखेगा?

विशेष– (i) विषयानुकूल भाषा का चयन है। (ii) भाषा सरल, सहज व प्रवाहयुक्त है। (iii) यात्रा का मनोहारी वर्णन है।

2. मेरे लिए एक दूसरी दृष्टि से भी यह अनूठा अनुभव था। लोग अपने गावों से विस्थापित होकर कैसी अनाथ, उन्मूलित जिंदगी बिताते हैं, यह मैंने हिन्दुस्तानी शहरों के बीच बसी मजदूरों की गंदी, दम घुटती भयावह बस्तियों और स्लम्स में कई बार देखा था, किन्तु विस्थापन से पूर्व वे कैसे परिवेश में रहते होंगे? किस तरह की जिन्दगी बिताते होंगे? इसका दृश्य अपने स्वच्छ, पवित्र, खुलेपन में पहली बार अमझर गाँव में देखने को मिला।

प्रसंग प्रस्तुत गद्य अवतरण ‘निर्मल वर्मा’ द्वारा लिखत याचा वृत्तांत ‘जहाँ कोई वापसी ‘नहीं’ से अवतरित है। इसमें लेखक सिंगरौली का दृश्य अंकित करता है। वह गिरौली गया। उसने वहाँ क्या देखा? उसे कैसा महसूस हुआ? इसका वर्णन किया गया है।

व्याख्या – लेखक ने सिंगरौली भ्रमण में न केवल यात्रा का ही आनन्द लिया अपितु उसने एक दूसरी तरह का अनुभव भी प्राप्त किया। उसने महसूस किया कि औद्योगीकरण से आम जनता किस प्रकार प्रभावित होती है? कैसे उजड़ते हैं उनके घर-बार? विस्थापित होने के पश्चात् कैसी जिन्दगी बिताते हैं ये लोग। लेखक को दुख होता है कि औद्योगीकरण होने के पश्चात् वहाँ के लोग शहरों के बीच गंदी, दम घुटी बस्तियों में रहते हैं। इससे पूर्व वे बहुत अच्छे वातावरण में रहते होंगे। 

उसने इसका साक्षात् रूप देखा, अमेझर गाँव। अमझर गाँव एक समृद्ध, सुविधा सम्पन्न गाँव था । वहाँ के लोग बहुत बढ़िया तरीक से जीवनयापन कर रहे थे। एकाएक सरकार ने वहाँ उद्योग स्थापित किए। वहाँ बसे लोग बेघर हो गए, उनका भविष्य गर्त में घेरा गया। जो कल तक ऐशो-आराम की जिन्दगी बिता रहे थे, आज सड़कों पर थक्के खा रहे हैं। यही विस्थापित लोगों के साथ घटित होता है।

विशेष- (i) भाषा, सरस, सरल व सहज है। (ii) खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है। (iii) विषयानुरूप शैली का चयन किया गया है।

3. अपनी स्वच्छ मांसलता में इतना सम्पूर्ण और शाश्वत कि एक क्षण के लिए विश्वास नहीं होता कि आने वाले वर्षों में सब कुछ मटियामेट हो जाएगा-झोंपड़े, खेत, दोर, आम के पेड़-सब एक गंदी, ‘आधुनिक’ औद्योगिक कॉलोनी की ईंटों के नीचे दब गाएगा और ये हंसती मुसकुराती औरतें, भोपाल, जबलपुर था बैढ़न की सड़कों पर पत्थर कुटती दिखाई देंगी। शायद कुछ वर्षों तक उनकी स्मृति में अपने गाँव की तस्वीर एक स्वप्न की तरह धंधलाती रहेगी। किन्तु धूल में लोटते उनके बच्चों को तो कभी मालूम भी नहीं होगा कि बहुत पहले उनके पुरखों का गाँव था जहाँ आम झरा करते थे।

प्रसंग प्रस्तुत गद्य अवतरण ‘निर्मल वर्मा’ द्वारा लिखत याचा वृत्तांत ‘जहाँ कोई वापसी ‘नहीं’ से अवतरित है। इसमें लेखक सिंगरौली का दृश्य अंकित करता है। वह गिरौली गया। उसने वहाँ क्या देखा? उसे कैसा महसूस हुआ? इसका वर्णन किया गया है।

व्याख्या-लेखक ने ‘अमझर’ गाँव को अपनी आँखों के समझ विस्थापित होते देखा है, उसी के बारे में कहता है कि अमझर गांव सब तरफ से सम्पूर्ण व समृद्ध था। उसे देखकर लगता ही नहीं था कि कभी यह भी सजड़ सकता है। यह सोच भी नहीं सकते थे कि अमझर भी औद्योगीकरण की लपेट में आकर कॉलोनी की ईंटों के नीचे दब जाएगा परन्त ऐसा ही हुआ, यही सत्य है। 

यहाँ जो औरतें खुशी-खुशी धन रोप रही हैं, वे भोपाल, जबलपुर व बैढ़न की सड़कों पर पत्थर कूट रही होंगी, यही उनका भविष्य होगा। उन्हें मरते दम तक अपने अमझर की याद सताती रहेगी। जब उनके बच्चे बड़े हो जाएँगे, उन्हें मालूम भी नहीं होगा कि बहुत पहले उनके पूर्वजों का कोई गाँव भी था, जहाँ आम झरते थे। उन्हें कुछ भी पता नहीं होगा, क्योंकि पीढ़ी ही बदल जाएगी।

विशेष– (i) विषयानुरूप भाषा व शैली का चयन हुआ (ii) भाषा खड़ी बोली का परिनिष्ठित रूप है। (iii) अमझर गाँव के अविस्थापन का वर्णन है।

4. ये लोग आधुनिक भारत के नए ‘शरणार्थी’ हैं, जिन्हें औद्योगीकरण के झंझावात ने अपनी घर-जमीन से उखाड़कर हमेशा के लिए निर्वासित कर दिया है। प्रकृति और इतिहास के बीच गहरा अंतर है। बाढ़ या भूकम्प के कारण लोग अपना घर-बार छोड़कर कुछ अरसे के लिए जरूर बाहर चले जाते हैं। किन्तु आफत टलते ही वे दोबारा अपने जाने-पहचाने परिवेश में लौट भी आते हैं, किन्तु विकास और प्रगति के नाम पर जब इतिहास लोगों को उन्मूलित करता है, तो वे फिर कभी अपने घर नहीं लौट सकते। 

प्रसंग प्रस्तुत गद्य अवतरण ‘निर्मल वर्मा’ द्वारा लिखत याचा वृत्तांत ‘जहाँ कोई वापसी ‘नहीं’ से अवतरित है। इसमें लेखक सिंगरौली का दृश्य अंकित करता है। वह गिरौली गया। उसने वहाँ क्या देखा? उसे कैसा महसूस हुआ? इसका वर्णन किया गया है।

व्याख्या – अमझर गाँव के जो लोग उजड़कर दूसरे स्थानों पर बसे, ये आधुनिक भारत के नए शरणार्थी कहलाए। विस्थापन के पश्चात् लोग नए शरणार्थी कहलाते हैं। औद्योगीकरण की अंधी दौड़ ने लोगों को हमेशा के लिए घर-जमीन से उखाड़कर फेंक दिया। विस्थापन भी दो प्रकार से होता है-एक तो जब प्राकृतिक आपदा आती है, जैसे बाढ़, भूकम्प आदि तो बहुत नुकसान होता है, लोग बेघर हो जाते हैं, परन्तु अस्थायी रूप से। 

जब बाढ़ व भूकम्प के पश्चात् सब कुछ ठीक हो जाता है, स्थिति सामान्य हो जाती है, तो लोग पुनः अपने-अपने स्थान पर आकर बस जाते हैं दूसरा विस्थापन ऐतिहासिक होता है। जब किसी स्थान पर औद्योगीकरण हो जाता है, तो वहाँ की बस्तियाँ उजड़ जाती हैं, वे पुनः कभी नहीं बसतीं। ये लोग स्थायी रूप से उजड़ते हैं। अपने घरों को वापिस नहीं जा पाते।

विशेष– (i) खड़ी बोली का प्रयोग है। (ii) भाषा सरल, सरस व प्रवाहयुक्त है। (iii) विस्थापन की प्रक्रिया समझाई गई है ।

5. एक भरे-पूरे ग्रामीण अंचल को कितनी नासमझी और निर्ममता से उजाड़ा जा सकता है, सिंगरौली इसका ज्वलंत उदाहरण है। अगर यह इलाका रेगिस्तान होता तो शायद इतना क्षोभ नहीं होता; किन्तु सिंगरौली की भूमि इतनी उर्वरा और जंगल इतने समृद्ध हैं कि उनके सहारे शताब्दियों से हजारों बनवासी और किसान अपना भरण-पोषण करते आए हैं।

प्रसंग प्रस्तुत गद्य अवतरण ‘निर्मल वर्मा’ द्वारा लिखत याचा वृत्तांत ‘जहाँ कोई वापसी ‘नहीं’ से अवतरित है। इसमें लेखक सिंगरौली का दृश्य अंकित करता है। वह गिरौली गया। उसने वहाँ क्या देखा? उसे कैसा महसूस हुआ? इसका वर्णन किया गया है।

व्याख्या-यहाँ लेखक सिंगरौली में हुए औद्योगीकरण का परिणम बता रहे हैं कि उन्होंने अपनी आँखों से देखा कि इतना सुन्दर ग्रामीण प्रदेश था जिसे सरकार ने निमर्मता से उजाड़ फेंका है। इतना सुंदर, भव्य, मनोहर यह स्थान था, जिसे सरकार ने विस्थापित कर दिया। लेखक कहता है कि उसे अत्यधिक कष्ट इसलिए हो रहा है कि कितने वनवासियों का गुजारा इसी से चलता था। कई लोगों की आजीविका इसी पर निर्भर थी। इसकी जमीन इतनी उपजाऊ थी कि हजारों किसान यही फसल बोकर उससे अपना पेट भरते थे परन्तु किसी ने इसके लिए नहीं सोचा, केवल विस्थापन ही किया।

विशेष– (i) भाषा, सरल, सरस व प्रवाहयुक्त है। (ii) विषयानुरूप शैली व भाषा का चयन है। (iii) खड़ी बोली प्रयोग में लाई गई है।

6. किन्तु कोई प्रदेश आज के लोलुप युग में अपने अलगाव में सुरक्षित नहीं रह सकता। कभी-कभी किसी इलाके की सम्पदा ही उसका अभिशाप बन जाती है। दिल्ली के सत्ताधारियों और उद्योगपतियों की आँखों से सिंगरौले की अपार खनिज सम्पदा छिपी नहीं रही।

प्रसंग प्रस्तुत गद्य अवतरण ‘निर्मल वर्मा’ द्वारा लिखत याचा वृत्तांत ‘जहाँ कोई वापसी ‘नहीं’ से अवतरित है। इसमें लेखक सिंगरौली का दृश्य अंकित करता है। वह गिरौली गया। उसने वहाँ क्या देखा? उसे कैसा महसूस हुआ? इसका वर्णन किया गया है।

व्याख्या-लेखक कहता है कि आज का युग इतना लालची हो गया है कि उसके लालच के समझ कोई भी प्रदेश सुरक्षित नहीं रह सकता। यदि किसी प्रदेश में बहुत-सी सुख-सुविधाएँ हैं और वह सभी तरह से सम्पन्न है, यदि वह किसी सत्ताधारी या उद्योगपति की आँखों में समा गया, तो उसका विस्थापन निश्चित है। फिर वह प्रदेश टिक नहीं सकता। 

आज उद्योगपति भी वही देखते हैं, उन्हें कहाँ अधिक लाभ हो सकता है। वे उसी जमीन पर औद्योगीकरण करते हैं। उनकी नजरों में आम जनता की भावनाएँ या सुविधाएँ कोई मायने नहीं रखतीं। वे केवल अपना स्वार्य सिद्ध करते हैं। सिंगरौली में भी ऐसा ही हुआ। दिल्ली के सत्ताधारियों और उद्योगपतियों ने सिंगरौली में अपार सम्पदा देखकर वहाँ औद्योगीकरण कर लिया।

विशेष– (i) सत्ताधारियों के स्वार्थपूर्ण व्यवहार की चर्चा की गई है। (ii) खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है। (iii) भाषा सरल, स्पष्ट व प्रवाहयुक्त है।


जहाँ कोई वापसी नहीं प्रश्न उत्तर | Class 12 Hindi Book Antra Chapter 7 Question Answer

प्रश्न 1. अमझर से आप क्या समझते हैं? अमझर गाँव में सूनापन क्यों है? 

उत्तर- 

1. अमझर सिंगरौली के एक गाँव का नाम है। अमझर से अभिप्राय है-आम के पेड़ों से घिरा गाँव, जहाँ आम झरते हैं। 

2. पिछले दो-तीन वर्षों से पेड़ों पर सूनापन है, न कोई फल पकता है, न कुछ नीचे झरता है।

3. जब से सरकारी घोषणा हुई है कि अमरौली प्रोजेक्ट अंतर्गत के अनेक गाँव उजाड़ दिए जाएँगे, तब से न जाने कैसे यहाँ आम के पेड़ खो गए।

प्रश्न 2. आधुनिक भारत के ‘नए शरणार्थी’ किन्हें कहा गया? 

त्तर- 

1. आधुनिक भारत के ‘नए शरणार्थी’ वे हैं जिन्हें औद्योगीकरण के झझावत ने अपनी घर-जमीन से उखाड़कर हमेशा के लिए निर्वासित कर दिया। 

2. जैसे अमझर में रहने वाले लोगों की दशा हुई, वहाँ सब कुछ झोपड़ी खेत, ढेर आम के पेड़ सब आधुनिक’ औद्योगिक कॉलोनी की ईंटो के नीचे दब गए और ये हँसती-मुसकुराती औरतें भोपाल, जबलपुर और बैढ़न की सड़कों पर कूटती दिखाई दीं। 

3. यही लोग ‘नए शरणार्थी’ कहलाते हैं। 

प्रश्न 3. प्रकृति के कारण विस्थापन और औद्योगीकरण के कारण विस्थापन में क्या अंतर है?

उत्तर- प्रकृति के कारण विस्थापन प्राकृतिक कारणों जैसे बाढ़ या भूकम्प के कारण लोग अपना घर छोड़कर कुछ अरसे के लिए जरूर बाहर चले जाते हैं किन्तु आफत टलते ही वे दोबारा अपने जाने-पहचाने परिवेश में लीट भी आते हैं।

औद्योगीकरण के कारण विस्थापन विकास और प्रगति के नाम पर जब इतिहास लोगों को उन्मूलित करता है, अर्थात् अपने स्थान से हटाता है, तो वे अपने घर वापस नहीं लौट सकते।

आधुनिक औद्योगकीरण की आंधी में सिर्फ मनुष्य ही नहीं उखड़ता, बल्कि उसका परिवेश और आवास स्थल भी हमेशा के लिए नष्ट हो जाता है। 

प्रश्न 4. यूरोप और भारत की पर्यावरण संबंधी चिंताएँ किस प्रकार भिन्न हैं?

उत्तर-

1. भारत की सांस्कृतिक विरासत यूरोप की तरह म्यूजियम्स और संग्रहालयों में जमा नहीं थी—वह उन रिश्तों से जीवित थी, जो आदमी को उसकी धरती, उसके जंगलों, नवि-एक शब्द में कहे तो उसके समूचे परिवेश के साथ जोड़ते थे।

2. यूरोप में पर्यावरण का प्रश्न मनुष्य व भूगोल के साथ संतुलन बनाए रखने का है। 

3. भारत में यही प्रश्न मनुष्य और उसकी संस्कृति के बीच पारम्परिक संबंध बनाए रखने का हो जाता है।

प्रश्न 5. लेखक के अनुसार स्वातंत्र्योत्तर भारत की सबसे बड़ी ‘ट्रैजेडी’ क्या है?

उत्तर-

1.स्वातंत्र्योत्तर भारत की सबसे बड़ी ट्रेजेडी यह है कि पश्चिम की देखा-देखी और नकल में योजनाएँ बनाते समय प्रकृति, मनुष्य और संस्कृति के बीच का नाजुक संतुलन किस तरह नष्ट होने से बचाया जा सकता है-इस तरफ हमारे पश्चिम- शिक्षित सत्ताधारियों का ध्यान कभी नहीं गया। 

2. हम पश्चिम को मॉडल बनाए बिना, अपनी शर्तों और मर्यादाओं के आधार पर औद्योगिक विकास का भारतीय स्वरूप निर्धारित कर सकते हैं, कभी इसका ख्याल भी हमारे शासकों को नहीं आया।

प्रश्न 6. औद्योगीकरण ने पर्यावरण का संकट पैदा कर दिया है, क्यों और कैसे? 

उत्तर- औद्योगीकरण का अर्थ है-उद्योग-धंधों और मशीनों का प्रचुर प्रयोग उद्योगों के कारण शहरों का वातावरण विषाक्त हो गया है। फैक्टरियों से निकला प्रदूषित जल, कचरा, शोर आदि मानव के लिए घातक सिद्ध हुए हैं। भोपाल का गैस-काण्ड, सूरत का प्लेट प्रदूषण के ज्वलंत उदाहरण हैं। इसके अतिरिक्त आजकल मुम्बई, कोलकाता, दिल्ली जैसे शहरों में साँस लेना दूभर हो गया है। जब मानव से शुद्ध जल, शुद्ध वायु और शांत वातावरण ही छिन गया है, तो सुख-समृद्धि का क्या करें।

प्रश्न 7. निम्नलिखित पंक्तियों का आशय स्पष्ट कीजिए- 

(क) आदमी उजड़ेंगे, तो पेड़ जीवित रह कर क्या करेंगे?

उत्तर- जब औद्योगीकरण द्वारा विस्थापन होगा तो आदमी अपना स्थान छोड़कर चले जाएँगे, उन्हें जाना ही पड़ेगा। जब आदमी ही न रहेंगे, तो पेड़ों की रक्षा कौन करेगा? कौन उनकी रखवाली करेगा? कौन उनकी सिंचाई करेगा? कौन उनके फलों को खाएगा? अर्थात् जब आदमी उजड़ेंगे, तो पेड़ भी जीवित नहीं रहेंगे।

(ख) प्रकृति और इतिहास के बीच गहरा अंतर है? 

उत्तर- 

1. जब प्रकृति द्वारा कोई आपदा आती है, जैसे- बाढ़ आना, तूफान आना, तो मनुष्य अस्थायी रूप से अपना घर-बार बदलता है और आफत समाप्त होने पर पुनः अपनी पुरानी जगह पर वापस आ जाता है। 

2. जब औद्योगीकरण द्वारा किसी बसे बसाए नगर या गाँव को उजाड़ा जाता है तो वह ऐतिहासिक हो जाता है। उस नगर या गाँव के निवासी अपनी घर-जमीन से उखाड़कर हमेशा के लिए निर्वासित कर दिए जाते हैं। इस प्रकार प्रकृति और इतिहास के बीच गहरा अंतर है। 

प्रश्न 8. निम्नलिखित पर टिप्पणी लितिखए-

उत्तर- 

(क) आधुनिक शरणार्थी – आधुनिक औद्योगीकरण की आँधी ने जब मनुष्य जाता है, अपने घर-जमीन से उखाड़कर हमेशा के लिए निर्वासित कर दिया जाता है तो वह ‘आधुनिक शरणार्थी’ कहलाता है। 

(ख) औद्योगीकरण की अनिवार्यता- औद्योगीकरण ने हर क्षेत्र में विकास और समृद्धि के अनंत द्वार खोल दिए हैं, उदाहरणतया, कीमती रेशमी वस्त्र, प्रचार-प्रसार व मुद्रण साइकिल स्कूटर, मोटरकार, जगमगाते मकान ये सभी सुविधाएँ औद्योगीकरण की देन हैं। जहाँ उद्योगों ने मानव को सब सुविधाएँ उपलब्ध कराने का संकल्प लिया है, वहाँ उद्योगों से होने वाले विद्युत लाभ ने भी समृद्धि को बढ़ाया है।

(ग) प्रकृति, मनुष्य और संस्कृति के बीच आपसी संबंध-भारत में रहते हुए प्रकृति, मनुष्य और संस्कृति के बीच आपसी संबंध अनिवार्य है। औद्योगीकरण करते समय इन तीनों में संतुलन होना अनिवार्य है। आज प्रत्येक मनुष्य को, जहाँ वह रहता है, वहाँ की मिट्टी, वहाँ के पेड़-पौधे, नदी-नाले, वहाँ के वातावरण सभी से प्यार हो जाता है। वहाँ चलने वाले रीति-रिवाजों मैं वह ढल जाता है। यदि जरा-सा संतुलन बिगड़ा, तीनों में से एक (प्रकृति, मनुष्य व संस्कृति) भी इधर-उधर हुआ, वहीं दुविधा उत्पन्न हो जाती है। जीवनयापन कठिन हो जाता है। औद्योगीकरण करते समय इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए।

प्रश्न 9. निम्नलिखित पंक्तियों का भाव-सौंदर्य लिखिए- 

(क) कभी-कभी किसी इलाके की सम्पदा ही उसका अभिशाप बन जाती है।

उत्तर- कभी-कभी कोई स्थान ऐसा होता है जो हर तरह से समृद्ध होता है, चाहे वातावरण की तरफ से हो, धन-धान्य की तरफ से हो, वहाँ रहने वाले लोगों के रहन के स्तर से हो जाने हर प्रकार की सुविधा हो, तो वह स्थान कभी भी बंजर हो सकता है अर्थात् समय के साथ-साथ परिवर्तन अनिवार्य है। चाहे वह ईश्वर द्वारा किया जाए या मनुष्य द्वारा, जरूरी नहीं, परिवर्तन हमेशा अच्छे के लिए हो। कभी-कभी परिवर्तन में हानि भी होती है, जैसा कि अमझर नामक गाँव में हुआ। यह स्थान पूर्णतया समृद्ध स्थान था। परन्तु औद्योगीकरण की आँधी में सिर्फ मनुष्य ही नहीं उखड़ता, बल्कि उसका परिवेश और आवास-स्थल भी हमेशा के लिए नष्ट हो जाता है। 

(ख) अतीत का समूचा मिथक संसार पोथियों में नहीं, इन रिश्तों की अदृश्य लिपि में मौजूद रहता था।

उत्तर- यदि भारत का अतीत देखना चाहें, तो वह आज भी जीते-जागते लोगों में मौजूद है। हमारी संस्कृति अत्यधिक प्राचीन है। उसी प्राचीनता के दर्शन आज प्रत्येक व्यक्ति के बोलचाल के ढंग, व्यवहार, रहने के स्तर, खाने के ढंग, पहनने के ढंग में दिखाई देते हैं। भारतीय अतीत

केवल पुस्तकों व पुराणों में ही नहीं छिपा, अपितु आज के जीते-जागते रिश्तों में भी दिखाई देता है। हमारी संस्कृति के कुछ मूल्य हैं, जो त्रेता युग से कलयुग में चले आ रहे हैं। इक लिए कोई पुस्तक खोजने की आवश्यकता नहीं, अपितु प्रकृति व मनष्य काफी हैं। शल्प हा इसके लिए

प्रश्न 1. पाठ के संदर्भ में निम्नलिखित अभिव्यक्तियों का अर्थ स्पष्ट कीजिए- मूक सत्याग्रह, पवित्र खुलापन, स्वच्छ मांसलता, औद्योगीकरण का चक्का, नाजुक संतुलन।

उत्तर- 

1. मूक सत्याग्रह – मूक सत्याग्रह का शाब्दिक अर्थ है चुपचाप सत्य के लिए आग्रह, अर्थत् जब से अमझर गाँव में घोषणा हुई थी कि अमरौली प्रोजेक्ट के अंतर्गत नवागाँव के अनेक गाँव उजाड़ दिए जाएँगे, तब से न जाने कैसे वहाँ के आम के पेड़ भी सूखने लगे। उस समय पेड़ों ने सोचा कि आदमी उजड़ेगा तो हम जीवित रहकर क्या करेंगे? अमझर गाँव में मनुष्य विस्थापन के विरोध में पेड़ भी एक साथ मिलकर मूक सत्याग्रह करते हैं, केवल सिगरौली में ही हुआ। 

2. पवित्र खुलापन – पवित्र खुलापन से अभिप्राय अमझर गाँव के वातावरण से है कि साफ-सुथरे खप्पर लगे मिट्टी के झोपड़े और चारों तरफ पानी कितना सुन्दर लगता होगा। इसी को लेखक ने पवित्र खुलापन कहा है।

3. स्वच्छ मांसलता-स्वच्छ मांसलता से अभिप्राय है आर-पार या पारदर्शिता। ग्राम पली हुईं, विस्मय से मसकुराती हुई युवतियाँ इतनी मनोहारी लगती थी कि उनके भीतर कोई राग-द्वेष कपट का भाव नहीं था। यह दृश्य अत्यंत पारदर्शी था। काम में डूबी युवतियों का दृश्य एकदम स्वच्छ व आनन्द देने वाला था।

4. औद्योगीकरण का चक्का – आज की जनसंख्या वृद्धि के कारण सभी स्थानों पर औद्योगीकरण का चक्र चला हुआ है। विकसित देश के लिए औद्योगीकरण अनिवार्य है औद्योगीकरण करते समय मनुष्य, प्रकृति एवं संस्कृति का संतुलन बनाए रखना अनिवार्य है, अन्यथा चहुँ और विस्थापन ही नजर आएगा।

5. नाजुक संतुलन-औद्योगीकरण करते समय प्रकृति, मनुष्य व संस्कृति का संतुलन बनाए रखना अनिवार्य है। ये तीनों एक-दूसरे पर आश्रित हैं। यदि एक जगह पर संतुलन बिगड़ा, तो तीनों जगह विस्थापन होने की आशंका बनी रहती है। अतः कोई भी कार्य करते समय इन तीनों के बारे में सोचना अनिवार्य है। 



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VVI Question for VIP Topper Students

प्रश्न 1. भारतीय लोग अपने गाँवों से विस्थापित होकर कैसे जिन्दगी बिताते हैं?

उत्तर- भारतीय लोग अपने गाँवों से विस्थापित होकर अनाथ, उन्मूलित जिन्दगी बिताते हैं। उन्हें शहरों के बीच गंदी, दमघुटती भयावह बस्तियों व स्लम्स में रहना पड़ता है। अतः कहा जा सकता है कि विस्थापन के पश्चात् भारतीय लोगों की दशा अति शोचनीय हो जाती है। 

प्रश्न 2. अमहार गाँव विस्थापन से पूर्व कैसा था?

उत्तर-
1. अमझर गाँव में पेड़ों के घने झरमुट, साफ-सुथरे खप्पर लगे मिट्टी के झोंपड़े थे। चारों तरफ पानी ही पानी दिखाई देता था।
2. ऐसा प्रतीत होता था मानो सारी जमीन एक झील हो, एक अंतहीन सरोवर हो, जिसमें पेड़, झोपड़े, आदमी, ढोर-डंगर आधे पानी में, आधे ऊपर तिरते दिखाई देते हों। ऐसा प्रतीत होता था मानो किसी बाढ़ में सब-कछ डूब गया हो, पानी में फँस गया हो।

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