Class 12 Hindi Book Antra Chapter 8 Question Answer यथास्मै रोचते विश्वम् Summary

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Class 12 Hindi Book Antra Chapter 8 Question Answer यथास्मै रोचते विश्वम् Summary

कक्षा | Class12th 
अध्याय | Chapter08
अध्याय का नाम | Chapter Name यथास्मै रोचते विश्वम्
लेखक का नाम | Author Nameरामविलास शर्मा
किताब | Bookअंतरा ऐच्छिक | Hindi Elective
खंड | Sectionगद्य खंड | Prose Section
बोर्ड | Boardसभी हिंदी बोर्ड
किताब | Book एनसीईआरटी | NCERT
विषय | Subjectहिंदी | HINDI
अध्ययन सामग्री | Study Materialsप्रश्न उत्तर | Question answer


रामविलास शर्मा का जीवन-परिचय | Biography of Ram Vilas Sharma

उत्तर – हिन्दी के सुप्रसिद्ध आलोचक रामविलास शर्मा का जन्म 1912 ई. में उत्तर-प्रदेश जिला उन्नाव के ऊँचगाँव -सानी में हुआ था। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा गाँव में ही सम्पन्न हुई। बाद में उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में एम.ए. व पी-एच.डी. की उपाधि प्राप्त की।

Class 12 Hindi Book Antra Chapter 8 Question Answer
image credit: Social media

 इसके बाद वे कुछ समय तक लखनऊ विश्वविद्यालय में अंग्रेजी विभाग के प्रवक्ता के पद पर कार्यरत रहे। 1943 ई. से 1971 ई. तक वे आगरा के बलवंत राजपूत कॉलेज में अंग्रेजी के प्राध्यापक रहे। तत्पश्चात् कुछ समय तक वे आगरा में ही के. एम. मुंशी विद्यापीठ के निदेशक) भी रहे। वहाँ से सेवा निवृत्त होकर वे दिल्ली में रहकर साहित्य साधना में जुट गए। यहाँ पर वे साहित्य, संस्कृति व इतिहास के विषयों पर गहने चिंतन में लीन रहे। 2000 ई. में दिल्ली में | उनका निधन हो गया।

रामविलास शर्मा सुप्रसिद्ध आलोचक, भाषाशास्त्री, समाजचिंतक और इतिहासवेत्ता रहे हैं। साहित्य के क्षेत्र में उन्होंने कवि और आलोचक के रूप में पदार्पण किया। उनकी कुछ कविताएँ अज्ञेय द्वारा सम्पादित तार सप्तक में संकलित हैं। हिन्दी का प्रगतिशील आलोचना सुव्यवस्थित करने और उसे नई दिशा देने का महत्त्वपूर्ण काम उन्होंने किया।

 उनके साहित्य-चिंतन के केन्द्र में भारतीय समाज का जन-जीवन, उसकी समस्याएँ और उसकी आकांक्षाएँ रही हैं। उन्होंने संस्कृति के वाल्मीकि, कालिदास और भवभूति के काव्य का नया मूल्यांकन और तुलसीदास के महत्त्व का विवेचन भी किया है।

रामविलास शर्मा ने आधुनिक हिन्दी साहित्य का विवेचन और मूल्यांकन करते हुए हिन्दी की प्रगतिशील आलोचना का मार्गदर्शन किया। अपने जीवन के आखिरी दिनों में वे भारतयी समाज, संस्कृति और इतिहास की समस्याओं पर गम्भीर चिंतन और लेखन करते हुए, वर्तमान भारतीय समाज की समस्याओं को समझने के लिए, अतीत की विवेक-यात्रा करते रहे हैं।

महत्वपूर्ण विचारक और आलोचक के साथ-साथ शर्मा जी एक सफल निबंधकार भी है। उनके अधिकांश निबंध ‘विराम चिह्न’ नाम की पुस्तक में संगृहीत हैं। उन्होंने विचार-प्रधान और व्यक्ति-व्यंजक निबंधों की रचना की है। प्रायः उनके निबंधों में विचार और भाषा के स्तर पर एक रचनाकार की जीवंतता और सहृदयता मिलती है। स्पष्ट वाचन, विचार की गम्भीरता और भाषा की सहजता उनकी निबंध-शैली की प्रमुख विशेषताएँ हैं।

रामविलास शर्मा को अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। निराला की साहित्य साधना सुस्तक पर उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुआ था अन्य प्रतिष्ठित पुरस्कारों में सोवियत भूमि, नेहरू पुरस्कार, उत्तर प्रदेश सरकार का भारत भारती पुरस्कार, व्यास सम्मान और हिन्दी अकादमी दिल्ली का शलाका सम्मान उल्लेखनीय हैं। 

पुरस्कारों के प्रसंग में शर्मा जी के आचरण की एक बात महत्त्वपूर्ण है कि वे पुरस्कारों के माध्यम से प्राप्त होने वाले सम्मान को तो स्वीकार करते थे, लेकिन पुरस्कार की राशि को लोकहित में व्यय करने के लिए लौटा देते थे। उनकी इच्छा थी कि यह राशि जनता को शिक्षित करने के लिए खर्च की जाए। उनकी उल्लेखनीय कृतियाँ हैं—भारतेन्दु और उनका युग, महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिन्दी

नवजागरण, प्रेमचंद और उनका युग, निराला की साहित्य साधना (तीन खंड), भारत के प्राचीन ‘भाषा परिवार और हिन्दी (तीन खंड), भाषा और समाज, भारत में अंग्रेजी राज और मार्क्सवादी इतिहास दर्शन, भारतीय संस्कृति और हिन्दी प्रदेश आदि छह दशकों में फैला उनका लेखन लगभग 50 पुस्तकों के रूप में उपलब्ध है।

साहित्यिक परिचय– रामविलास शर्मा आलोचक, भाषाशास्त्री, समाज-चिंतक और इतिहासा रहे हैं। साहित्य के क्षेत्र में उन्होंने कवि और आलोचक के रूप में पर्दापण किया। उनकी कुछ कविताएँ अज्ञेय द्वारा सम्पादित ‘तारसप्तक’ में संकलित हैं। हिन्दी की प्रगतिशील आलोचना को • सुव्यवस्थित करने और उसे नई दिशा देने में महत्त्वपूर्ण काम उन्होंने किया। उनके साहित्य चिंतन के केन्द्र में भारतीय समाज का जन-जीवन, उसकी समस्याएँ और उसकी आकांक्षाएँ रही है। उन्होंने वाल्मीकि, कालिदास और भवभूति के काव्य का नया मूल्यांकन व विवेचन भी किया है।

महत्त्वपूर्ण विचारक और आलोचक के साथ-साथ रामविलास जी एक सफल निबंधकार भी हैं। उन्होंने विचार-प्रधान और व्यक्ति व्यंजक निबन्धों की रचना की है।

भाषा-शिल्प की विशेषताएं-प्रायः उनके निबंधों में विचार और भाषा के स्तर पर एक रचनाकार की जीवंतता और सहृदयता मिलती है। स्पष्ट कथन, विचार की गम्भीरता और भाषा की सहजता उनकी निबंध शैली की प्रमुख विशेषताएँ हैं।


यथास्मै रोचते विश्वम् पाठ का सामान्य परिचय | यथास्मै रोचते विश्वम् summary in hindi

‘यथास्मै रोचते विश्वम्’ नामक निबंध रामविलास शमा के निबंध संग्रह ‘विराम चिह्न’ से लिया है। इसमें उन्होंने कवि की तुलना प्रजापति से करते हुए उसे उसके कर्म के प्रति सचेत किया है। लेखक के अनुसार, साहित्य जहाँ एक तरफ मनुष्य को मानसिक विश्रांति प्रदान करता है, वह उसे उन्नति के मार्ग पर अग्रसर होने की प्रेरणा भी देता है। सामाजिक प्रतिबद्धता साहित्य की कसौटी है पन्द्रहवीं शताब्दी से आज तक के साहित्य के अध्ययन-मूल्यांकन के लिए रामविलास जी ने इसी जनवादी साहित्य चेतना को मान्यता दी है।

यथास्मै रोचते विश्वम् पाठ का सारांश | यथास्मै रोचते विश्वम् summary

प्रजापति अर्थात् ब्रह्मा से कवि की तुलना करते हुए किसी ने सत्य ही कहा है कि “कवि को जैसा अच्छा लगता है, वैसे ही वह संसार को बदल देता है।” अर्थात् कवि अपने अनुरूप ही समाज को ढाल लेता है। जैसी कवि की परिस्थितियाँ होती हैं, समाज को भी वह वैसा ही बदल देता है। 

साहित्य समाज का दर्पण होता तो लेखक का कथन है कि यदि साहित्य समाज का दर्पण होता, तो संसार को बदलने की बात ही न उठती। यदि कवि का कार्य वास्तविक जीवन को ही अपने काव्य में अंकित करने का होता, तो उसे कभी भी प्रजापति न कहा जाता। वास्तव में ब्रह्मा ने संसार को रचा है, इसी संसार से असंतुष्ट होकर कवि कविता करता है। 

यूनानी विज्ञान कला को जीवन की नकल समझते हैं। अफलातून ने संसार को असल की नकल बताया है, लेकिन अरस्तू ने मनुष्य के यथार्थ को बढ़ा-चढ़ा कर बताया। वाल्मीकि ने नारद से सर्वगुण सम्पन्न व्यक्ति के बारे में पूछा तब नारद ने पहली बार कहा, “दुर्लभ गुणों को एक ही पात्र में दिखाकर कवि ने समाज को दर्पण में प्रतिबिम्बित नहीं किया, अपितु पजापति की तरह नई सृष्टि की

कवि की सृष्टि निराधार नहीं– कवि जिस सृष्टि का निर्माण करता है, वह निराधार नहीं है। हमें उमसे अपनी आकृति भले ही न दिखे परंतु जैसी आकृति हम बनाना चाहते है, वह आकृति अवश्य देखते हैं। जिन रेखाओं व रंगों से कवि चित्र बनाता है, वे उसके चारों ओर यथार्थ जीवन में बिखरे होते हैं और चित्र के पिछले भाव में काली छायाएँ भी होती है, वह भी कवि यथार्थ जीवन से लेता है। यदि कवि राम के साथ रावण का चित्र न खींचे तो राम का चरित्र पीका हो जाए। वास्तव में उसके गुणों को प्रकाशित होने का अवसर ही न पाए।

“कवि का विश्व परितर्वन का कारण-कवि जब भी विश्व को बदलता है, तो वह बदलने का कारण बताता है। वह यह भी बताता है कि उसे क्या अच्छा लगता है और वह उसे क्यों फता-फूलता देखना चाहता है। वह केवल अच्छाई के लिए ही विश्व परिवर्तित नहीं करता, अपितु अच्छाई के साथ होने वाले बुरे परिणामों को भी वह साथ-साथ अंकित करता है। इसलिए कवि की वास्तविकता अंकित करने वाला प्रजापति कहा गया है। वह आज के साथ-साथ कल को भी देखता है। इसलिए मनुष्य साहित्य में केवल सुख-दुख की बात ही नहीं सुनता, वह उसमें आशा का स्वर भी सुनता है। साहित्य से केवल शांति ही प्राप्त नहीं होती, बल्कि आगे बढ़ने की प्रेगा भी मिलती है।

कवि के असंतोष की जड़ कवि के असंतोष की जड़ मानव-संबंध ही हैं, क्योंकि मानव-संबंधों के परे साहित्य ही नहीं है। कवि जब भी विधाता पर कुछ लिखता है, तो उसे भी मानव-संबंधी परिधि में खींच लेता है, जैसे-सूरदास, मीरा के कृष्ण, तुलसीदास के राम, सिक्खों के गुरु नानक आदि। जब भी मनुष्य अपने संबंधों से त्रस्त होता है, तो कवि ही इन संबंधों से अवगत होता है। वह लोगों के संबंधों को अपनी भाषा व वाणी देकर स्वतंत्र करता है।

दुःखी हृदय लोगों के भावों को समझकर उन्हें वाणी देता है। वह मुक्ति के गीत गाता है और मानवीय संबंधों में बंधे जंजाल को तोड़ने का प्रयत्न करता है। तो उस समय साहित्य जीवन का प्रतिबंध बनकर उसे समेटने, संगठित करने और उसे परिवर्तित करने का अजेय अस्त्र बन जाता है।

पन्द्रहवीं-सोलहवीं सदी में साहित्य-पन्द्रहवीं-सोलहवीं सदी में हिन्दी साहित्य ने बहत बड़ी भूमिका निभाई। अब जनता सामंती पिंजड़े में बंद थी, तो कवि ने मानव जीवन की मुक्ति के लिए वर्ण व धर्म के सीकचों पर प्रहार किए थे ललद्यद, नानक, सूर, तुलसी, मीरा, कबीर, चंडीदास, तिरुवल्लुवर ने समूचे भारत में जीर्ण मानव संबंधों के पिजड़े को झकझोर दिया था। इनकी वाणी ने पीड़ित जनता के मर्म को स्पर्श किया और उन्हें आशा दी, संगठित किया। जीवन को जहाँ बदलने की आवश्यकता थी, बदलाव भी किया।

साहित्य का पांचजन्य– जिस प्रकार श्रीकृष्ण का शंख कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में अपने अधिकारों के लिए लड़ने हेतु बजता है, ठीक उसी प्रकार साहित्य का पांचजन्य भी उदासीनता का राग नहीं सुनाता, वह मनुष्य को भागने के आसरे बैठने की प्रेरणा नहीं देता। वह कायरों व पराभव प्रेमियों को ललकारता हुआ एक बार फिर उन्हें समरभूमि में उतरने के लिए बुलावा देता है। भरत मुनि से भारतेंदु तक चली आती हुई हमारे साहित्य की यह गौरवशाली परम्परा है। इसके सामने निराशा व पराजय के सिद्धान्त वैसे ही नहीं ठहरते, जैसे सूर्य के सामने अंधकार ।

आज 21वीं सदी में आज भी मानव संबंधों के पिंजड़े में भारतीय जीवन-विहग बंदी है। वह मुक्त गगन में उड़ान भरने के लिए व्याकुल है। लेकिन आज भारतीय जनजीवन संगठित प्रहार करके एक के बाद एक पिंजड़े की तीलियाँ को मजबूत कर रहे हैं, उन्हें धिक्कार है। ये द्रष्टा भी नहीं, स्रष्टा भी नहीं है।

लेकिन जिन्हें इस देश की धरती से यार है, इस धरती पर बसने वालों से स्नेह हैं, जो साहित्य की युगांतकारी भूमिका समझते हैं, वे आगे बढ़ रहे हैं। उनका साहित्य जनता का रोष और असंतोष प्रकट करता है उसे आत्मविश्वास और दृढ़ता देता है। उसकी रुचि जनता की रुचि से मेल खाती है आर कवि उसे बताता है कि इस विश्व को किस दिशा में परिवर्तित करना है।

साहित्य कैसे उन्नत व समृद्ध हो सकता है कवि अपनी प्रजापति की भूमिका को भूलकर केवल दर्पण दिखाने वाला ही रह जाता है। वह ऐसा नकलची बन जाता है, जिसको अपनी कोई असलियत न हो। कवि का व्यक्तित्व पूरे वेग से तभी निखरता है, जब वह यथार्थ रूप से परिवर्तन चाहने वाली जनता के आगे कवि पुरोहित की तरह बढ़ता है। इसी परम्परा को अपनाने से हिन्दी साहित्य उन्नत और समृद्ध होकर हमारे जातीय सम्मान की रक्षा कर सकेगा।


यथास्मै रोचते विश्वम् कठिन शब्दों के अर्थ

यथास्मै रोचते – कवि को जैसा रुचता है। विश्वं तथेदं परिवर्तते वैसा ही संसार को बदल देता है। यथार्थ- वास्तविक नकल नवीस- नकल करने वाले। पार्श्व-बगल, बाजू। परिधि-घेरा। हैमलेट-शेक्सपियर द्वारा लिखित उपन्यास आतुर बेचैन क्षुब्धखिन्न। 

अवशेष बचे हुए चिह्न जीर्ण- पुराना। पांचजन्य- श्रीकृष्ण के शंख का नाम समरभूमि-युद्धभूमि दृढ़वत-दृढ़ प्रतिज्ञा विश्रांति-आराम। रुद्धस्वर-रुकी हुई आवाज। सींकचा-बंधन। सुघर-सुघड़ (सुंदर)। 1 पंख कतरना- नियंत्रित करना।

class 12th NotesMCQ
HistoryPolitical Science
EnglishHindi

यथास्मै रोचते विश्वम् पाठ का गद्यांश सप्रसंग व्याख्या एवं शब्दार्थ NCERT

1. प्रजापति से कवि की तुलना करते हुए किसी ने बहुत ठीक लिखा था- “यथास्मै रोचते विश्वं तथेदं परिवर्तते।” कवि को जैसे रुचता है वैसे ही संसार को बदल देता है। 

प्रसंग-प्रस्तुत अवतरण रामविलास शर्मा के निबंध यथास्मै रोचते विश्वम् से अवतरित है। इसमें लेखक ने कवि की तुलना प्रजापति से करते हुए उसके कर्म के प्रति सचेत किया है। व्याख्या-लेखक कहता है कि जिस प्रकार प्रजापति ब्रह्मा सृष्टि के रचयिता कहलाते हैं। ठीक उसकी प्रकार कवि भी सृष्टि का रचनिता ही है। 

लेखक कहता है कि- “कवि को जिस समय संसार में जो परिवर्तन लाना होता है अपनी रचनाओं में वे भाव भरकर जनता तक पहुँचाता है। जनता उसी के अनुरूप आचरण करने लगती है। कवि को जैसा अच्छा लगता है उसी के अनुरूप संसार को बदल देता है। कवि अपने भावों को अपने साहित्य के द्वारा जनता में पहुँचाता है।

जनता उसी के अनुसार अपेन भावों को परिवर्तित करती है। 

विशेष– (i) संस्कृत प्रधान शब्दावली का प्रयोग है। (ii) कवि की तुनला प्रजापति से की गई है। (iii) उदाहरण शैली का प्रयोग है।

2. यदि साहित्य समाज का दर्पण होता तो सार को बदलने की बात न उठती कवि का काम यथार्थ जीवन को प्रतिबिम्बित करना ही होता तो वह प्रजापति का दर्जा न पाता। वास्तव में प्रजापति ने जो समाज बनाया है उससे असंतुष्ट होकर नया समाज बनाना कविता का जन्मसिद्ध अधिकार है।

प्रसंग-प्रस्तुत अवतरण रामविलास शर्मा के निबंध यथास्मै रोचते विश्वम् से अवतरित है। इसमें लेखक ने कवि की तुलना प्रजापति से करते हुए उसके कर्म के प्रति सचेत किया है। व्याख्या-लेखक कहता है कि जिस प्रकार प्रजापति ब्रह्मा सृष्टि के रचयिता कहलाते हैं। ठीक उसकी प्रकार कवि भी सृष्टि का रचनिता ही है। 

व्याख्या – लेखक कवि की तुलना प्रजापति से करता है और कहता है कि कवि का कार्य केवल वास्तविक जीवन को अपने काव्य में अंकित करने का नहीं है, वह उसमें अपनी कल्पना व आवयकता के आधार पर परिवर्तन करता है तभी अपने नए काव्य का सृजन करता है। यदि साहित्य में वही कुछ होता जो कछ समाज में घटित हो रहा है तो संसार को बदलने के लिए कवि क्यों कल्पना करता। कवि समाज में, साहित्य में, संसार में बदलाव चाहता है। उसी बदलाव का वर्णन वह अपने साहित्य में करता है तथा अपना साहित्य जनता तक पहुँचाता है, तभी परिवर्तन होता है।

विशेष-(i) भाषा सरल, सहज एवं प्रवायुक्त है। (ii) तत्सम प्रधान शब्दावली है। (iii) विषयानुरूप भाषा का चयन है।

3. कवि अपनी रुचि के अनुसार जब विश्व को परिवर्तित करता है तो यह भी बताता है कि विश्व से उसे असंतोष क्यों है, वह यह भी बताता है कि विश्व में उसे रुचता है जिसे वह फलता-फूलता देखना चाहता है। उसके चित्र के चमकीले रंग और पार्श्वभूमि की , गहरी काली रेखाएँ दोनों ही यथार्थ जीवन से उत्पन्न होते हैं।

प्रसंग-प्रस्तुत अवतरण रामविलास शर्मा के निबंध यथास्मै रोचते विश्वम् से अवतरित है। इसमें लेखक ने कवि की तुलना प्रजापति से करते हुए उसके कर्म के प्रति सचेत किया है। व्याख्या-लेखक कहता है कि जिस प्रकार प्रजापति ब्रह्मा सृष्टि के रचयिता कहलाते हैं। ठीक उसकी प्रकार कवि भी सृष्टि का रचनिता ही है। 

व्याख्या-लेखक कहता है कि कवि अपनी इच्छा के अनुरूप जब संसार को बदलता है, तो उसके बदलने का कारण भी बताता है कि किस कारण से उसे संसार से संतुष्टि नहीं है। यह यह भी बताता है कि उसे संसार में क्या अच्छा लगता है। क्या गलत लगता है। जो उसे अच्छा लगता है वह उसे आगे बढ़ाना चाहता है। कवि जो भी काव्य सृष्टि करता है उस काव्य दृष्टि में वह संसार के उजले व मैले दोनों पक्षों को उजागर करता है अर्थात् प्रत्येक विषय के यक्ष व विपक्ष में पूरे तर्क वह अपने काव्य में देता है।

विशेष– (i) भाषा सरल, सहज व प्रवाहमयी है। (ii) खड़ी बोली का प्रयोग है। (iii) तत्सम प्रधान शब्दावली है।

4. यदि समाज में मानव-संबंध वही होते जो कवि चाहता है, तो शायद उसे प्रजापति बनने की जरूरत न पड़ती। उसके असंतोष की जड़ ये मानव-संबंध ही हैं। मानव-संबंधों से परे साहित्य नहीं है। कवि जब विधाता प साहित्य रचता है तब उसे भी मानव संबंधों की परिधि में खींच लाता है।

प्रसंग-प्रस्तुत अवतरण रामविलास शर्मा के निबंध यथास्मै रोचते विश्वम् से अवतरित है। इसमें लेखक ने कवि की तुलना प्रजापति से करते हुए उसके कर्म के प्रति सचेत किया है। व्याख्या-लेखक कहता है कि जिस प्रकार प्रजापति ब्रह्मा सृष्टि के रचयिता कहलाते हैं। ठीक उसकी प्रकार कवि भी सृष्टि का रचनिता ही है। 

व्याख्या – कवि जो कुछ लिखता है मानव संबंधों पर ही लिखता है। वास्तव में कवि के काव्य का विषय मानव संबंधों पर ही आधारित होता है। यदि समाज में वैसे ही मानव-संबंध होते हैं जैसे कवि को अच्छे लगते हैं तो कवि को कभी प्रजापति न बनना पड़ता। कुछ संबंध मधुर होते हैं कुछ कटु। 

इस प्रकार विभिन्न प्रकार के मानव संबंधों के कारण कवि काव्य रचना करता है क्योंकि इसके अतिरिक्त साहित्य के लिए कोई विषय नहीं है। यदि ईश्वर पर भी कवि कोई कविता लिखना चाहता है तो प्रभु को भी वह मानवीय संबंधों में घेर लेता है। तुलसीदास ने रामचरित मानस में भगवान राम की मर्यादा का वर्णन, महर्षि वेदव्यास ने गीता में भगवान कृष्ण का वर्णन मानवीय संबंधों के ही उदाहरण हैं।

विशेष– (i) भाषा सरल, सहज व सुबोध है। (ii) खड़ी बोली का प्रयोग है। (iii) विषयानुरूप भाषा है।

5. अभी भी मानव संबंधों के पिजड़े में भारतीय जीवन विहग बंदी है। मुक्त गगन में उड़ान भरने के लिए व्याकुल है। लेकिन आज भारतीय जनजीवन संगठित प्रहार करके एक के बाद एक पिजड़े की तीलियाँ तोड़ रहा है। धिक्कार है उन्हें जो तीलियाँ तोड़ने के बदले उन्हें मजबूत कर रहे हैं।

प्रसंग-प्रस्तुत अवतरण रामविलास शर्मा के निबंध यथास्मै रोचते विश्वम् से अवतरित है। इसमें लेखक ने कवि की तुलना प्रजापति से करते हुए उसके कर्म के प्रति सचेत किया है। व्याख्या-लेखक कहता है कि जिस प्रकार प्रजापति ब्रह्मा सृष्टि के रचयिता कहलाते हैं। ठीक उसकी प्रकार कवि भी सृष्टि का रचनिता ही है। 

व्याख्या-लेखक कहता है कि कवि के काव्य का विषय मानव-संबंध ही है। भारतीय जीवन मनुष्य के संबंधों के पिंजड़े में पक्षी की भाँति है। मनुष्य उन्मुक्त गगन में विहार करना चाहता अर्थात् कवि भी उन्मुक्त होकर अपने बंधनों को तोड़ने में लगा है, स्वतंत्रता प्राप्ति का इच्छुक परन्तु कुछ साहित्यकार ऐसे हैं जो उन्हें उनके बंधन तोड़ने नहीं देना चाहते। ऐसे साहित्यकारों को लेखक धिक्कारता है। 

विशेष– (i) भाषा सरल व सहज है। (ii) विषयानुरूप भाषा का चयन है। (iii) तत्सम नखड़ी बोली हैं


यथास्मै रोचते विश्वम् प्रश्न उत्तर | Class 12 Hindi Book Antra Chapter 8 Question Answer

प्रश्न 1. लेखक ने कवि की तुलना प्रजापति से क्यों की है? 

उत्तर- 

1. लेखक ने कवि की तुलना प्रजापति से इसलिए की है क्योंकि प्रजापति ब्रह्मा जी कहते हैं। ब्रह्मा जी का कार्य सृष्टि का निर्माण करना होता है। 

2. कवि भी प्रजापति की तरह जैसा चाहे, वैसे ही सृष्टि का निर्माण करता है। कवि अपने काव्य की रचना करके समाज में परिवर्तन ला देता है।

3. प्रजापति संसार को शारीरिक आकार देते हैं, कवि संसार को अपने काव्य द्वारा भावात्मक आकार प्रदान करता है। 

4. जिन भावों को कवि समाज के हित के लिए उपयोगी समझता है, उसे अपने काव्य में अंकित कर लोगों तक पहुँचाता है। 

प्रश्न 2. साहित्य समाज का दर्पण है’-इस प्रचलित धारणा के विरोध में लेखक ने क्या तर्क दिए हैं?

उत्तर-

1. लेखक का कथन है कि यदि साहित्य समाज का दर्पण होता, तो संसार को बदलने की बात न उठती। 

2. यदि कवि का काम यथार्थ जीवन को प्रतिबिम्बित करना ही होता, तो वह प्रजापति का दर्जा न पाता।

3. वास्तव में प्रजापति ने जो समाज बनाया है, उससे असंतुष्ट होकर नया समाज बनाना कविता का जन्मसिद्ध अधिकार है। 

4. यूनानी विद्वान कला को जीवन की नकल समझते थे। 

5. अफलातून संसार को असल की नकल, कला को नकल बताते थे।

6. . अरस्तू ने कहा कि ट्रेजेडी में मनुष्यों का बढ़ा-चढ़ा कर वर्णन किया जाता है। 

7. वाल्मीकि ने अपने चरित्र नायक के गुण गिनाकर नारद से पूछा कि ऐसा मनुष्य कौन है।

8. इस प्रकार के दुर्लभ गुणों को एक ही पात्र में दिखाकर आदि कवि ने समाज को दर्पण में प्रतिबिम्बत नहीं किया था, वरन् प्रजापति की तरह नई सृष्टि की थी।

प्रश्न 3. दुर्लभ गुणों को एक ही पात्र में दिखाने के पीछे कवि का क्या उद्देश्य है? उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- 

1. दुर्लभ गुणों को एक ही पात्र में दिखाने के पीछे कवि समाज को दर्पण में प्रतिबिम्बित नहीं कर रहा था, अपितु प्रजापति की तरह नई सृष्टि कर रहा था। 

2. कवि यह बताकर इस भावना को गलत सिद्ध करना चाहता है कि साहित्य समाज का दर्पण है।

3. कवि ने राम को गुणवान, वीर्यवान, कृतज्ञ, सत्यवाक्य, दृढ़वाक्य, चरित्रवान, दयावान, विद्वान, समर्थ व प्रियदर्शन आदि सभी गुणों से सम्पन्न दिखाया है। इस प्रकार का कार्य कर कवि ने अपनी रुचि के अनुरूप संसार को आकार दिया है।

Q4. ‘साहित्य थके हुए मनुष्य के लिए विश्रांति ही नहीं है, वह उसे आगे बढ़ने के लिए उत्साहित भी करता है’-स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- 

1. साहित्य के द्वारा केवल आराम या शांति ही प्राप्त नहीं होती अपितु आगे बढ़ने की प्रेरणा भी मिलती है।

2. किसी भी उपन्यास के गुणी चरित्र को, काव्य में प्रेम को, संघर्ष को कहानी की शिक्षा को ध्यान से पढ़े, तो हमें भी उन्हीं के द्वारा प्रेरणा प्राप्त होती है और उन्हीं में से कुछ गुणों को धारण करने की चेष्टा उत्पन्न होती है। प्रेम भरा काव्य प्रेममय जीवन बिताने की चेष्टा उत्पन्न होती है। संघर्षमय कविता पढ़कर संघर्ष करने की प्रेरणा उत्पन्न होती है।

3. इस प्रकार साहित्य केवल विश्रांति ही नहीं अपितु आगे बढ़ने के लिए उत्साहित करता है। 

प्रश्न 5. ‘मानव-संबंधों से परे साहित्य नहीं है’- कथन की समीक्षा कीजिए।

उत्तर- 1. मानव संबंधों से परे साहित्य नहीं है क्योंकि कवि जब विधाता पर साहित्य रचता है, तो उसे भी मानव-संबंधों की परिधि में खींच लाता है। 2. इन मानव-संबंधों की दीवार से ही हैमलेट का कवि सुलभ सहानुभूति टकराती है और शेक्सपियर एक महान ट्रेजेडी की सृष्टि करता है।

3. जब समाज के बहुसंख्यक लोगों का जीवन इन मानव-संबंधों के पिजड़े में फड़फड़ाने लगे, सौंकचे तोड़कर बाहर उड़ने के लिए आतुर हो उठे, उस समय कवि का प्रजापति रूप और भी स्पष्ट हो उठता है।

प्रश्न 6. पन्द्रहवीं-सोलहवीं सदी में हिन्दी साहित्य ने मानव जीवन के विकास में क्या भूमिका निभाई।

उत्तर- 

1. पन्द्रहवीं-सोलहवीं सदी में हिन्दी साहित्य ने मानव जीवन के विकास में पूरी भूमिका निभाई।

2. पन्द्रहवीं – सोलहवीं शताब्दी में सामंती पिंजड़े में बंद मानव जीवन की मुक्ति के लिए उसने वर्णन और धर्म के सीकचों पर प्रहार किए थे। 

3. सूर, तुलसी, मीरा, कबीर आदि ने आगे-पीछे समूचे भारत में उस जीर्ण मानव-संबंधों है पिंजड़े को झकझोर दिया था।

4. इन कवियों की वाणी ने पीड़ित जनता के मर्म को स्पर्श कर उसे नए जीवन के लिए इटौरा, उसे आशा दी, संगठित किया और जहाँ-तहाँ जीवन को बदलने के लिए संघर्ष के लिए आमंत्रित भी किया। 

प्रश्न 7. साहित्य के ‘पांचजन्य’ से लेखक का क्या तात्पर्य है? ‘साहित्य का पांचजन्य’. मनुष्य को क्या प्रेरणा देता है? 

उत्तर- 1. ‘पांचजन्य’ श्रीकृष्ण के शंख का नाम है। 

2. श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र में युद्ध के मैदान में यह शंख सेना को तैयार हो जाने के लिए बजाया था। 

3. साहित्य के ‘पांचजन्य’ का अभिप्राय कवियों के लिए है कि वे अपने लेखन कार्य में जुटbजायें और अपने इस लेखन कार्य से समाज में आमूल-चूल परिवर्तन ला दें।

4. साहित्य का ‘पांचजन्य’ मनुष्य को सदैव कार्यरत रहने की प्रेरणा देता है। जीवन में गति बनाए रखने की प्रेरणा देता है। 

5. ‘आगे बढ़ो रुको नहीं’ की प्ररेणा यही साहित्य का पांचजन्य देता है।

प्रश्न 8. साहित्यकार के एिल स्रष्टा और द्रष्टा दोनों का होना अनिवार्य है-क्यों और कैसे?

उत्तर- साहित्यकार के लिए स्रष्टा और द्रष्टा दोनों का होना अनिवार्य है क्योंकि- 

1. स्रष्टा का अर्थ है- रचयिता अर्थात् साहित्य का निर्माण तो साहित्यकार ही करता है। साहित्यकार को चाहिए कि साहित्य का निर्माण करते समय देश, काल, परिस्थिति, वातावरण, भाषा, विषय को ध्यान में रखे। साहित्यकार जिस साहित्य का निर्माण करता है, सारा समाज उसे पढ़ता है, सारे समाज की संतुष्टि के लिए उसे सोच-समझकर लिखना पड़ता है।

2. द्रष्टा का अर्थ है-देखने वाला, अर्थात् समाज को देखने वाला। साहित्यकार द्रष्टा भी होता है, जो कुछ समाज में घटित होता है, साहित्यकार उन सब घटने वाली घटनाओं को अपना विषय बनाता है वह केवल यथार्थ ही अंकित नहीं करता, अपितु यथार्थ में अपने भावों की संवेदना व कल्पनाओं को भी अभिव्यक्त करता है। 

प्रश्न 9. ‘कवि-पुरोहित’ के रूप में साहित्यकार की भूमिका स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- 1. ‘पुरोहित’ का अभिप्राय पण्डित से है, जो अपने ज्ञान के आधार पर अपने यजमानों को सत्मार्ग पर ले जाता है और उनके जीवन की मंगल कामना करता है। सर्वप्रथम किसी भी शुभ-अशुभ कार्य में पुरोहित को ही पूछा जाता है।

2. ठीक उसी प्रकार कवि भी पुरोहित के रूप में कार्य करता है। सम्पूर्ण संसार उसका यजमान है सभी के उज्जवल भविष्य हेतु बढ़िया कव्य निर्माण ही कवि का महान कार्य है। काव्य को पढ़कर सभी प्राणी प्रेरित होते हैं, संघर्ष करना सीखते हैं, प्रेम-भाव सीखते हैं, भाई-चारे की भावना सीखते हैं, न जाने किन-किन गुणों का आविर्भाव उनमें काव्य द्वारा ही होता है। यह समस्त श्रेय कवि को ही जाता है। अतः कहा जा सकता है कि कवि पुरोहित के रूप में ही कार्य करता है। यहाँ तक कि जितने भी मंगलाचार शुभ कार्यों के लिए प्रारम्भ में गाए जाते हैं, वे सभी कवि द्वारा ही लिखे जाते हैं।

प्रश्न 10, सप्रसंग व्याख्या कीजिए-

‘कवि की यह सृष्टि की तरह नई सृष्टि होती है। कवि की तुलना प्रजापति से करता है, वह कहता है-

(क) निराधार नहीं होती। हम उसमें अपनी ज्यो-की-त्यों आकृति भले ही देखें, पर ऐसी आकृति जरूर देखते हैं जैसी हमें प्रिय है, जैसी आकृति हम बनाना चाहते हैं।” 

उत्तरप्रसंग प्रस्तुत गद्य अवतरण रामविलास शर्मा द्वारा लिखित निबंध ‘यथास्मै रोचते विश्वम्’ से अवतरित है। लेखक कहता है कि कवि जिस सृष्टि का निर्माण करता है। 

व्याख्या-कवि द्वारा बनाई गई सृष्टि एकदम नई होती है, उसका एक आधार अवश्य होता है। हम जैसा रूप उसकी सृष्टि में देखना चाहें, हो सकता है बिल्कुल वैसा दिखाई न दे, परन्तु उससे मिलता-जुलता रूप अवश्य देखने को मिलता है या फिर जो रूप हमें अच्छा लगता है, वैसा रूप हम उसकी सृष्टि में देख सकते हैं।

कहने का अभिप्राय है कि कवि जिस काव्य की रचना करता है, वह एकदम नया होता है, वह ऐसा होता है जिसमें हम सभी की भावनाएँ निहित होती हैं। हम उसके काव्य में वही ढूँढ सकते हैं, जो हमे अच्छा लगता है। कभी-कभी ऐसा आभास होता है मानो यह काव्य हमारे लिए ही लिखा गया है। प्रत्येक व्यक्ति ऐसा ही अनुभव करता है। कवि सामान्य व्यति को ही अपने काव्य का विषय बनाता है। उसमें यथार्थता के साथ-साथ कल्पना का मिश्रण होता है।

विशेष– (i) तत्सम प्रधान शब्दावली का प्रयोग है। (ii) वर्णनात्मक शैली द्रष्टव्य है। (iii) विषय के अनुरूप भाषा का चयन है। (iv) भाषा सरल, सहज व प्रवाहयुक्त है। 

(ख) ‘प्रजापति-कवि गम्भीर यथार्थवादी होता है, ऐसा यथार्थवादी जिसके पाँव वर्तमान की धरती पर हैं और आंखें भविष्य की क्षितिज पर लगी हुई हैं।”

प्रसंग प्रस्तुत गद्य अवतरण रामविलास शर्मा द्वारा लिखित निबंध ‘यथास्मै रोचते विश्वम्’ से अवतरित है। लेखक कहता है कि कवि जिस सृष्टि का निर्माण करता है। 

व्याख्या-लेखक कवि को प्रजापति अर्थात् ब्रह्मा की संज्ञा देते हुए कहता है कि कवि गम्भीर होता है अर्थात् उसके काव्य में अर्थ गाम्भीर्य होता है। साथ ही कवि यथार्थवादी होता है अर्थात् वास्तविकता को अंकित करना कवि के कार्य के अंतर्गत आता है। कवि ऐसी वास्तविकता को अपने काव्य का विषय बनाता है जिसमें मनुष्य के पाँव हमेशा धरती पर हों और वे धरती पर रहकर आकाश की बुलन्दियों को छुएँ। कवि वर्तमान को ध्यान में रखते हुए भविष्य की भी चिंता करता है।

प्रसंग – (i) कवि ने कर्म का उदाहरण दिया है। (ii) तत्सम् प्रधान शब्दावली है। (iii) भाषा सरल, सहज व प्रवाहमान है। (iv) विषयानुरूप भाषा का चयन है। 

(ग) इसके सामने निरुद्देश्य कला, विकृत काम वासनाएँ, अहंकार और व्यक्तिवाद,निराशा और पराजय के सिद्धांत वैसे ही नहीं ठहरते, जैसे सूर्य के सामने अंधकार।’

प्रसंग प्रस्तुत गद्य अवतरण रामविलास शर्मा द्वारा लिखित निबंध ‘यथास्मै रोचते विश्वम्’ से अवतरित है। लेखक कहता है कि कवि जिस सृष्टि का निर्माण करता है। 

व्याख्या -कवि की तुलना प्रजापति से करते हुए लेखक कहता है कि कवि जितेन्द्रिय होते हैं, उनसे सांसारिक मोह से कुछ लेना-देना नहीं, वह विषय-वस्तुओं में लिप्त नहीं होता। कवि के समक्ष उस कला का कोई अर्थ नहीं, जिसका उद्देश्य नहीं, कवि काम वासनाओं से ऊपर उठ चुके हैं। कवि के समक्ष अहंकार नहीं टिकता, न ही व्यक्तिवादिता कोई मायने रखती है। 

कवि के शब्दकोश में निराशा व पराजय जैसे शब्द है ही नहीं। ठीक उसी प्रकार जैसे सूर्य के आते ही अंधकार समाप्त हो जाता है, वैसे ही कवि के समक्ष काम-वासनाएँ, अहंकार, निराशा व पराजय जैसे शब्द नहीं टिकते।

विशेष– 1. तत्सम प्रधान शब्दावली का प्रयोग किया गया है। 2. उदाहरण शैली द्रष्टव्य है। 3. भाषा भावानुरूप है। 4. कवि को सांसारिक विषय-वासनाओं से ऊपर माना गया है।।

प्रश्न 11. पाठ में ‘साहित्य के स्वरूप’ पर आए वाक्यों को छाँटकर लिखिए। 

उत्तर- 

1. यदि साहित्य समाज का दर्पण होता, तो संसार को बदलने की बात ही न उठती। 

2. मानव संबंधों से परे साहित्य नहीं है।

3. पन्द्रहवी सोलहवीं सदी में हिन्दी साहित्य ने यही भूमिका पूरी की है। 

4. साहित्य जीवन का प्रतिबिम्ब रहकर उसे समेटने, संगठित करने और उसे परिवर्तित करने का अजेय शस्त्र बन जाता है।

5. साहित्य का पांचजन्य समरभूमि में उदासीनता का राग नहीं सुनता।

6. जो साहित्य की युगान्तकारी भूमिका समझते हैं, वे आगे बढ़ रहे हैं। 

7. उनका साहित्य जनता का रोष और असंतोष प्रकट करता है, उसे आत्मविश्वास और दृढ़ता देता है।

प्रश्न 12. इन पंक्तियों का अर्थ स्पष्ट कीजिए- (क) कवि की सृष्टि निराधार नहीं होती।

उत्तर- लेखक कहता है कि कवि का काव्य कभी भी निराधार नहीं होता है। वह सामान्य जीवन पर आधारित होता है, जो व्यक्ति जैसा रूप देखना चाहे कवि के काव्य में वैसा ही रूप उसे प्राप्त होता है। कवि के काव्य का विषय सामान्य प्राणी व परिस्थिति होती है।

(ख) कवि गम्भीर यथार्थवादी होता है। 

उत्तर– कवि के काव्य के विषय में गम्भीरता, गहनता होती है और वह वास्तविकता को ही अपने काव्य का विषय बनाता है। कवि का काव्य कोरी कल्पना नहीं होता, अपितु उसमें यथार्थता भी होती है।

(ग) धिक्कार है उन्हें जो तीलियाँ तोड़ने के बदले उन्हें मजबूत कर रहे हैं।

उत्तर- लेखक कहता है कि कुछ कवियों ने तो सामंती पिंजड़े में बंद मानव-जीवन की मुक्ति के लिए वर्ण व धर्म के सीकचों पर प्रहार किए थे; परन्तु कुछ ऐसे भी कवि थे, जो उन सीकचों को तोड़ने के बदले उन्हें और मजबूत कर रहे थे। लेखक उन कवियों को दिक्कारता है। लेखक कहता है कि आज भी मानव-संबंधों के पिंजड़े में भारतीय जीवन रूपी पक्षी बंद है। वह मुक्त गगन में विहार करने को आतुर है, परन्तु कुछ साहित्यकार या कवि है जो उन्हें उड़ान नहीं भरने दे रहे, अर्थात् उनके मार्ग में बाधा उत्पन्न कर रहे हैं। लेखक ऐसे कवियों को धिक्कारता है।



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VVI Question for VIP Topper Students

प्रश्न 1. लेखक ने कवि की तुलना किससे की है और कवि के बारे में क्या टिप्पणी 

उत्तर- लेखक ने कवि की तुलना प्रजापति से की है और कवि के बारे में लेखक का कथन है, “ययास्मै रोचते विश्वं तथेदं परिवर्तते ।” अर्थात् कवि को जैसा रुचता है (अच्छा लगता है)

प्रश्न 2. कवि राम के साथ रावण का चित्र क्यों खींचता है? 

उत्तर- कवि यदि राम के साथ रावण का चित्र न खींचे, तो गुणवान, वीर्यवान, कृराज, सत्यवाक्य, दृढव्रत, चरित्रवान, दयावान, समर्थ, प्रियदर्शन नायक का चरित्र फीका हो जाए और उसके गुणों के प्रकाशित होने का अवसर ही न आए।

प्रश्न 3. कवि अपनी रुचि के अनुसार विश्व को परिवर्तित करते समय बनाया है?

उत्तर- कवि अपनी रुचि के अनुसार विश्व को परिवर्तित करते समय बताता है कि विश्व से उसे असन्तोष क्यों हैं, वह यह भी बताता है कि विश्व में उसे क्या रुचता है जिसे वह फलता-फूलता देखना चाहता है।

प्रश्न 4. कवि जब विधाता पर साहित्य रचता है, तब उसे मानव संबंधों की परिधि में क्यों खींच लाता है?

उत्तर—जब भी कवि विधाता पर साहित्य रचता है, तो उसे मानव संबंधों की परिधि में खींच लाता है, क्योंकि मनुष्य में जितने गुणों का समावेश करवा सकते हैं, वैसे अन्यत्र असम्भव है। 
मनुष्य ही धरती पर सर्वश्रेष्ठ प्राणी है, जो अपनी बुद्धि के बल पर सही दिशा का चुनाव कर सकता है। अतः कवियों ने मानव-संबंधों में राम-सीता लक्ष्ण और भरत के चरित्रों का गुणगान किया है। भक्त प्रहलाद का गुणगान, कृष्ण-राधा का गुणगान हिन्दी साहित्य में अद्वितीय है।

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