Class 12 Hindi Book Antra Chapter 9 Question Answer दूसरा देवदास Summary

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मैं खुद 12वीं का टॉपर रहा हूं और मुझे पता है कि 12वीं की परीक्षा में किस तरह के प्रश्न पूछे जाते हैं। वर्तमान में, मैं एक शिक्षक की भूमिका भी निभा रहा हूँ, और अपने छात्रों को कक्षा 12वीं की महत्वपूर्ण जानकारी और विषयों का अभ्यास भी कराता हूँ। मैंने यह लेख 5 वर्षों से अधिक के अपने अनुभव के साथ लिखा है। इस पोस्ट की मदद से आप परीक्षा में इस अध्याय से भूगोल में बहुत अच्छे अंक प्राप्त कर सकेंगे।

Class 12 Hindi Book Antra Chapter 9 Question Answer दूसरा देवदास Summary

कक्षा | Class12th 
अध्याय | Chapter09
अध्याय का नाम | Chapter Nameदूसरा देवदास
लेखक का नाम | Author Nameममता कालिया
किताब | Bookअंतरा ऐच्छिक | Hindi Elective
खंड | Sectionगद्य खंड | Prose Section
बोर्ड | Boardसभी हिंदी बोर्ड
किताब | Book एनसीईआरटी | NCERT
विषय | Subjectहिंदी | HINDI
अध्ययन सामग्री | Study Materialsप्रश्न उत्तर | Question answer


ममता कालिया का जीवन-परिचय | Biography of Mamta Kalia

जीवन-परिचय-ममता कलिया का जन्म मथुरा, उत्तर प्रदेश में हुआ। उनकी शिक्षा के कई पड़ाव रहे, जैसे-नागपुर, पुणे, इंदौर, मुम्बई आदि। दिल्ली विश्वविद्यालय से उन्होंने अंग्रेजी विषय से एम.ए. किया। एम.ए. करने के बाद सन् 1963-1965 ई. तक दील्त राम कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में अंग्रेजी की प्राध्यापिका रही। 

Class 12 Hindi Book Antra Chapter 9 Question Answer
image credit: Social media

1966 से 1970 ई. तक एन.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, मुम्बई में अध्यापन कार्य किया फिर 1973 से 2001 ई. तक महिला सेवा सदन डिग्री कॉलेज, इलाहाबाद में प्रधानाचार्य रहीं। 2003 से 2006 ई. तक भारतीय भाषा परिषद् कोलकाता की निदेशक रही। वर्तमान में दिल्ली में रहकर स्वतंत्र लेखन कर रही है। रचनाएँ- उनकी प्रकाशित कृतियों में।

उपन्यास– बेघर, नरक दर नरक, एक पत्नी के नोट्स, प्रेम कहानी, लड़कियाँ, दौड़ आदि हैं। कहानियाँ – इनके 12 कहानी संग्रह प्रकाशित है, जो ‘सम्पूर्ण कहानियाँ’ नाम से दो खंडों में प्रकाशित है। दो नए कहानी-संग्रह-पच्चीस साल की लड़की, थिएटर रोड के कौवे भी प्रकाशित हुए हैं।

कथा-साहित्य में उल्लेखनीय योगदान के लिए उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान से ‘साहित्य-भूषण’ 2004 ई. में तथा वहीं से कहानी सम्मान 1989 ई. में प्राप्त हुआ। उनके समग्र साहित्य पर अभिनव भारती कोलकाता ने ‘रचना पुरस्कार’ भी दिया। इसके अतिरिक्त उन्हें सरस्वती प्रेस तथा साप्ताहिक हिन्दुस्तान का ‘श्रेष्ठ कहानी पुरस्कार भी प्राप्त है।

भाषा शिल्प की विशेषताएँ– ममता कालिया शब्दों की पारखी हैं। उनका भाषा ज्ञान अत्यंत उच्च कोटि का है। साधारण शब्दों में भी अपने प्रत्येक वाक्य से जादुई प्रभाव उत्पन्न कर देती हैं। विषय के अनुसार सहज भावाभिव्यक्ति उनकी खासियत है। व्यंग्य की सटीकता एवं सजीवता से भाषा में एक अनोखा प्रभाव उत्पन्न हो जाता है।

अभिव्यक्ति की सरलता एवं सुबोधता उसे विशेष रूप से मर्मस्पर्शी बना देती है। युवा मन की संवेदना, भावना और विचार की उथल-पुथल का सही चित्रण करते हुए प्रथम आकर्षण और परिस्थितियों से उत्पन्न अवरोधों को झेलने हेतु मजदूरी प्रदान करना है।


दूसरा देवदास पाठ का सारांश | दूसरा देवदास summary

लेखिका हर की पौड़ी के दृश्य से पाठ की शुरुआत करती हैं; वे कहती हैं कि शाम आरती के समय वहाँ फूलों के दोनों की कीमत दुगनी हो गई है, परन्तु भक्तों को कोई शिकायत नहीं, वे अपनी-अपनी मनोकामना लेकर आए हुए हैं। गंगा सभा के स्वयंसेवक खाकी वर्दी पहन कर सभी को सीढ़ियों पर बैठने की प्रार्थना करते हैं। कुछ भक्तों ने स्पेशल आरती बोल रखी है। 

पंडितगण आरती के इंतजाम में व्यस्त हैं। सबने देशी घी के डिब्बे अपनी ईमानदारी के प्रतीक सवरूप सजा रखे हैं। गंगा तट पर हर छोटे-बड़े मंदिर पर लिखा है-गंगाजी का प्राचीन मंदिर । गंगाजी की मूर्ति के साथ चामुंडा, बालकृष्ण, राधाकृष्ण, हनुमान, सीताराम की मूर्तियों की

शृंगार पूर्ण स्थापना है। आरती से पूर्व सब लोग गंगा में स्नान कर रहे हैं। पास ही कोई-न-कोई पंडा जजमानों के कपड़ों-लत्तों की सुरक्षा कर रहा है। हर एक के पास चंदन और सिंदूर की कटोरी है। मर्दों के माथे पर चंदन और औरतों के माथे पर सिंदूर का टीका लगा देते हैं।

एकाएक हजारों दीप जल उठते हैं, पंडित आरती शुरू करते हैं। पहले पुजारियों के भर्राए गले से स्वर उठता है- ‘जय गंगे माता, जो कोई तुझको ध्याता, सारे सुख पाता, जय गंगे माता।’ घंटे घड़ियाल बजते हैं। मनीतियों के दो लिए हुए फूलों की छोटी-छोटी किश्तियाँ गंगा की लहरों पर इठलाती हुई आगे बढ़ती हैं। 

गोताखोर दोने पकड़, उसमें रखे हुए चढ़ावे का पैसा उठाकर मुँह में दबा लेते हैं। पैसे उठाते ही गंगापुत्र के लंगोट में दोने में रखी बाती से आग लग जाती है। परंतु उसे कोई फर्क नहीं पड़ता, वह झट गंगाजी मं बैठ जाता है। गंगा मैया ही उसकी जीविका और जीवन है। 

वह जो पैसे मुँह में रखता है, उसकी बीवी और बहन कुशाघाट पर वही रेजगारी बेचकर नोट कमाती है। एक रुपये के पच्चीस पैसे, कभी-कभी अस्सी भी दे देती है जैसे दिन हों।

पुजारियों का स्वर आरती गाते-गाते थकने लगता है, तो लता मंगेशकर की सुरीली आवाज लाउडस्पीकरों के साथ सहयोग करने लगती है और आरती का सौंदर्य अधिक बढ़ जाता है। ‘ओम जय जगदीश हरे’ ।

अधिकतर औरतें नहाकर वस्त्र नहीं बदलती। गीले कपड़ों में ही बड़ी-बड़ी आरती में शामिल हो जाती हैं। पीतल की पंचमंजिली आरती गरम हो जाती है, तो पुजारी नीलांजलि को गंगाजल से स्पर्श कर, हाथ में लिपटे अँगोछे को गीला कर लेते हैं। दर से यह दृश्य इतना विभोर कर देता है, मानो वे अपना संबोधन गंगाजी के गर्भ तक पहुँचा रहे हैं। आरती के पश्चात् भक्त खुशी-खुशी दक्षिणा देते हैं। पंडित जी भगवान के गले से माला उतार कर यजमान के गले में

अलवर पासपोर्ट डालते हैं, फिर जी खोलकर प्रसाद देते हैं। फिर यजमानों से संकल्प करवाते हैं ब्राह्मण-भोज, कन्याभोज आदि भी। यह खर्च हमेशा ही सुखदायी महसूस होता है। अब गंगाजल आकाश के साथ रंग बदल रहा है। संभव बहुत देर से नहाकर निकला, चंदन

का तिलक लगवाकर आगे बढ़ रहा था कि छोटे-से मंदिर के पुजारी ने आवाज लगाई-‘अरे दर्शन तो करते जाओ।’ संभव के पास खुले पैसे नहीं थे, तो पंडित जी ने कहा- आओ हम देते हैं रेजगारी।’ पुजारी ने चरणामृत दिया और लाल रंग का कलवा बाँध दिया, तभी उसका ध्यान गया कि एक दुबली नाजुक-सी कलाई पुजारी की तरफ बढ़ आई और पुजारी ने उसे भी कलावा बाँध

दिया। लड़की अर्चना कर रही थी। संभव ने देखा, उसके कपड़े भींगे हुए थे, उसके गुलाबी आँचल से संभव के कुरते का कोना भी गीला हो रहा था, संभव उसके सौंदर्य को निहारता रहा।

संभव उसके सौंदर्य का वर्णन इस प्रकार कर रहा था- “लंबे गीले बाल पीठ पर काले चमकीले शॉल की तरह लग रहे थे। दीपकों के नीम उजाले में, आकाश और जल की साँवली संधि-वेला में, लड़की बेहद सौम्य, लगभग कांस्य प्रतिमा लग रही थी।”

संभव पुजारी से पैसे वापन लेने का इंतजार कर रहा था। पुजारी ने आशीर्वाद दिया, “सुखी रहो, फूलो-फलो, जब भी आना साथ ही आना, गंगा मैया मनोरथ पूरे करे।” लड़का-लड़की दोनों अकबका गए। लड़की थोड़ी दूर हट गई। संभव कहने लगा-“देखिए। 

इसमें मेरी कोई गलती नहीं है, पुजारी ने गलत अर्थ ले लिया था।” बातचीत के लायक दोनों की मनःस्थिति नहीं थी। पहचान भी नहीं। दोनों ने नजरें बचाते हुए चप्पलें पहनीं। संभव ने देखा, जिस तरफ वह लड़की गई, संभव भी अनेक घुमावदार गलियों में उसके पीछे गया परंतु लड़की कहाँ ओझल हो गई, वह नहीं ढूँढ़ पाया पस्त कदमों से वह घर की तरफ मुड़ा।

वह नानी के घर आया हुआ था, नानी ने देर से आने का कारण पूछा, संभव ने कुछ नहीं कहा। नानी कहने लगी-विवाह कर ले। संभव फिर भी कुछ नहीं बोला। 

संभव तख्त पर लेट हो रहा था। आँख मूँद कर अर्चना करना, माथे पर भींगे बालों की लट, कुरते को छूता उसका गुलाबी आँचल, पुजारी से कहता उसका सौम्य स्वर “हम कल आएँगे।””

न जाने कब वह सोया और जल्दी ही उठ गया, तो वह भूल चुका था कि लड़की ने कल यहाँ आने का (गंगा किनारे) पुजारी को दिया था नानी ने खाने को पूछा, तो उसने कहा भूख नहीं है। थोड़ी देर पश्चात् खुद नानी से भोजन लाने को कहां परन्तु वह पूरा खाना खा ही नहीं पाया। उसे लड़की की सारी बातें याद आने लगीं, वह अविचलित हो उठा।

उसके भीतर एक अद्भुत प्रेम जाग चुका था, क्योंकि अभी तक उसके जीवन में किसी लड़की की कोई अहम् भूमिका नहीं आई थी। इस तरह बिल्कुल अकेली अनजान जगह पर एक लड़की का घबराना और चल देना, सब मिलाकर एक नई निराली अनुभूति थी, जिसमें उसे कुछ सुख और कुछ बेचैनी ज्यादा लग रही थी। उसने तय कर लिया कि कल शाम पाँच बजे ही वह उसी पुजारी के सामने घाट पर जाकर बैठ जाएगा।

प्रभात होते ही नानी ने संभव को आवाज दी, ‘सत्ता चलेगा गंगाजी, आज बैसाखी है?” उसने नानी से कहा- “मैं अभी सोऊँगा, तुम मेरे नाम की भी डुबकी लगा आना।” परन्तु अब नींद कैसे आ सकती थी? उसी योजना के सौंदर्य की याद उसके मन में इस कदर बस गई थी कि हर साँस में वही याद आ रही थी। शाम का कार्यक्रम व बातों के बारे में अपने ही विचारों की उधेड़-बुन में लगा था।

वास्तव में पौड़ी पर आज अद्भुत भीड़ थी। गंगा के घाट पर नारियल, फूल और प्रसाद की पनघोर बिक्री थी। भीड़ संभव ने दिल्ली में भी देखी थी। लेकिन इस भीड़ का अंदाज निराला था। न यहाँ जाति का महत्त्व था, न भाषा का, महत्त्व उद्देश्य का था और सबका समान था, जीवन के प्रति कल्याण की कामना ।

संभव वहीं गंगा किनारे बैठा था, तो एक छोटे से लड़के ने कहा, “भैया, आज नहीं “नहाएंगे?” बच्चे ने बातों ही बातों में संभव को अपना दोस्त बना लिया। बच्चे ने कहा कि वे मंसा देवी जा रहे हैं, संभव का भी मन हुआ कि वह भी मंसा देवी जाए। संभव भी ट्राली द्वारा मंसा देवी पहुँच गया। ट्राली में कई लोग बैठे और चढ़ावे की बड़ी-छोटी थैली लिए थे, परन्तु संभव प्रसाद लाना भूल गया था। मंसा देवी जाकर उसने प्रसाद खरीदा और सीढ़ियाँ चढ़ कर मंदिर के प्रांगण में पहुँच गया। नाम मंसा देवी का था पर वर्चस्व सभी देवी-देवताओं का मिला जुला था।

यहाँ मनोकामना के हेतु लाल-पीले धागे सवा रुपये में बिक रहे थे। लोग पहले धागा बाँधते, फिर देवी के आगे शीश झुकाये। संभव ने पूरी श्रद्धा के साथ मनोकामना की, गाँठ लगाई, सिर झकाया, नैवेद्य चढ़ाया और वहाँ से बाहर आया।

तभी संभव ने क्या देखा कि गंगा किनारे मिलने वाला बच्चा भी ट्राली में बैठा मंसा देवी आ रहा है और साथ ही वही लड़की जो कल शाम झुटपुटे में उससे टकराई थी, वह भी बच्चे के साथ बैठी चली आ रही है। संभव की खुशी का ठिकाना न रहा।

वहाँ पहुँचते ही संभव ने बच्चे को लपककर कंधे से थाम लिया और बोला- ‘कहो दोस्त!’ बच्चे ने कहा- ‘अरे भैया’। तभी उस बच्चे की बुआ ने कहा- “मन्नू घर नहीं चलना है।” संभव ने अस्फुट स्वर में पूछा, “ये तुम्हारी बुआ है।”

“और क्या ” – मन्नू ने साश्चर्य जवाब दिया। “हमे नहीं मिलाओगे, हम तो तुम्हारे दोस्त हैं।” मन्नू संभव को खींचता हुआ चल दिया, “बुआ, बुआ, इनसे मिलो, ये हैं हमारे नए दोस्त.

उसने प्रश्नवाचक नजरों से संभव को देखा, “”अपना नाम खुद बताइए।” वह अपने भतीजे से कहने लगी, “ऐसे कैसे दोस्त हैं तुम्हारे, तुम्हें उनका नाम ही नहीं पता ?” अब संभव ने गौर किया, बिल्कुल वही कंठ, वही उलाहना, वही अंदाज, खुशी से उसका रोम-रोम खिल उठा। हे ईश्वर! उसने कब सोचा था मनोकामना का मीन उद्गार इतना शीघ्र परिणाम दिखाएगा।

ने आज गुलाबी परियान नहीं पहना था, पर सफेद साड़ी में लाज से गुलाबी होते. हुए उसने मंसा देवी पर एक और चुनरी चढ़ाने का संकल्प लेते हुए सोचा, “मनोकामना की गाँठ

भी अद्भुत अनूठी है, इधर बाँधो उधर लग जाता है……” पारो बुआ, पारो बुआ, इनका नाम है….” मन्नु ने बुआ का आँचल खींचते हुए कहा । “संभव देवदास” संभव ने हँसते हुए वाक्य पूरा किया। उसे भी मनोकामना का पीला-पीला धागा और उसमें पड़ी गिठान का मधुर स्मरण हो आया।


दूसरा देवदास कठिन शब्दों के अर्थ 

मुस्तैदी – होशियारी । गोधूलि बेला संध्या का समय नीलांजलि आरती हतप्रभ हैरान एकाएक-एकदम । 

कबूलवाना- स्वीकार करवाना। अगरू-अगरबत्ती। खखोरा-टटोला। मनोरथ-मन की इच्छा। व्यालू-भोजन। हुज्जत-बहस। कलावा – कलाई में बाँधी जाने वाली लाल डोरी (मौली)। ओझल होना-दिखाई न देना।

तिल धरने की जगह न होना अत्यंत भीड़ होना। भूख नॉय चमकी- भूख नहीं लगी। सद्य स्नाता-उसी समय नहा कर आई। तुंदा नष्ट होना- आलस दूर होना। प्रकोष्ठ-कमरा। झुटपुटा-कुछ-कुछ अंधेरा आत्मसात-अपने में समा लेना जी खोलकर

देना- उदाहरतापूर्वक खर्च करना। नजरें बचाना एक दूसरे से कतराना नौ दो ग्यारह होना- भाग जाना। हज़ारन हजारों।

बरज दिया-समझा दिया। रोपवे-रस्सी का रास्ता । कतारबद्ध – पंक्ति में विहंगम-विशाल समवयस्क एक जैसी उम्र के ।

class 12th NotesMCQ
HistoryPolitical Science
EnglishHindi

दूसरा देवदास पाठ का गद्यांश सप्रसंग व्याख्या एवं शब्दार्थ NCERT

1. पाँच बजे जो फूलों के दोने एक-एक रुपये के बिक रहे थे, इस समय दो-दो के हो गए हैं। भक्तों को इससे कोई शिकायत नहीं। इतनी बड़ी-बड़ी मनोकामना लेकर आए हुए हैं। एक-दो रुपए का मुँह थोड़े ही देखना है। गांग सभा के स्वयंसेवक खाकी वरदी में मुस्तैदी से घूम रहे हैं। वे सबको सीढ़ियों पर बैठने की प्रार्थना कर रहे हैं। शांत हाकर बैठिए, आरती शुरू होने वाली है। कुछ भक्तों ने स्पेशल आरती बोल रखी है। स्पेशल आरती यानी एक सौ एक या एक सौ इक्यावन रुपए वाली।

प्रसंग– ग-प्रस्तुत गद्य अवतरण मता कालिया द्वारा लिखित ‘दूसरा देवदास’ कहानी से उद्धृत । इस कहानी में हर की पौड़ी, हरिद्वार के प्रवेश को केन्द्र में रखकर युवा मन की संवेदना, भावना, विचार जगत की उथल-पुथल को आकर्षक भाषा-शैली में प्रस्तुत किया गया है।

व्याख्या– प्रस्तुत अवतरण में हरिद्वार में सायं की बेला का बहुत ही मनोहारी वर्णन किया गया है। सायं के समय पहले तो फूलों के दोने सस्ते होते हैं (जो गंगा नदी में बहाए जाते हैं), जैसे-जैसे समय बढ़ता जाता है, इनकी कीमत भी बढ़ती जाती है। समय बीतते-बीतते श्रद्धालुओं की संख्या भी बढ़ जाती है। 

भक्तों की कोई मलाल नहीं, दोनों की कीमत यदि बढ़ गई है, तो कोई बात नहीं, क्योंकि न जाने किन-किन भावनाओं को मन में संजोए हुए वे इन फूलों को खरीदते हैं, उस समय इन पुष्पों की कीमत उन्हें नहीं चुभती । वहाँ गंगा सभा के स्वयंसेवक घूम-घूम कर अपना कर्तव्य निभा रहे होते हैं।

 वे बार-बार वातावरण को शांत करने का प्रयत्न करते हैं और कहते हैं कि सीढ़ियों पर बैठ जाये, आरती प्रारम्भ होने वाली है। कुछ श्रद्धालुओं ने अपनी मनोकामना पूरी करने हेतु स्पेशल आरती या फिर मनोत पूरी हो जाने के उपलक्ष्य में स्पेशल आरती बोल रखी होती है। वे ढेर सारे चढ़ावे के साथ, ढेर सारी दक्षिणा के साथ आरती करवाते हैं।

विशेष– (i) भाषा सरल सहज व प्रवाहमान है। (ii) संध्याकाल की आरती का मनोहारी वणन किया (iii) खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है।

2. एक औरत ने इक्कीस दोने तैराएँ हैं। गंगापुत्र जैसे ही एक दोने से पैसे उठाता है, औरत अगला दोना सरका देती है। गंगापुत्र उस पर लपकता है कि पहले दोने की दीपक से उसके लंगोट में आग लपट लग जाती है। पास खड़े लोग हँसने लगते हैं। गंगा मैया ही उसकी जीविका और जीवन है। इसके रहते वह बीस चक्कर मुंह भर-भर रेजगारी बटोरता है। उसकी बीबी और बहन कुशाघाट पर रेजगारी बेचकर नोट कमाती हैं। एक रुपए के पच्चीस पैसे। कभी-कभी अस्सी भी देती हैं। जैसा दिन हो।

प्रसंग-प्रस्तुत गद्य अवतरण मता कालिया द्वारा लिखित ‘दूसरा देवदास’ कहानी से उद्धृत । इस कहानी में हर की पौड़ी, हरिद्वार के प्रवेश को केन्द्र में रखकर युवा मन की संवेदना, भावना, विचार जगत की उथल-पुथल को आकर्षक भाषा-शैली में प्रस्तुत किया गया है।

व्याख्या शाम को हर की पीढ़ी पर सभी भक्त अपनी-अपनी मनोकामना हेतु या फिर मनोकामना पूरी होने के उपलक्ष्य में गंगा के दोने तैराते हैं, उसमें दक्षिणा भी रखे हैं। जो 173 गोताखोर वहाँ होते हैं, वे दोने की आगे करते-करते उसमें से रखी दक्षिणा उठाकर मुंह में भरते रहते हैं। 

वे सब सिक्के एकत्रित कर लेते हैं। इसी बीच एक गोताखोर (गंगापुत्र) के लंगोट में (दोना आगे करते समय) आग लग जाती है, परंतु उसे कुछ बेचैनी नहीं होती, वह परेशान नहीं होता, देखने वालों को ही आश्चर्य हाता है, परंतु गोताखार एक बार गंगा में बैठ जाता है, उसके लगोटे की आग शांत हो जाती है।

दोने एक के बाद एक आते हैं, वह उनमें से दक्षिणा के पैसे उठाता जाता है और आगे करता जाता है। इन्हीं पैसों से वह जीवनयापन करता है। यही उसकी जीविका का साधन है। उसकी पत्नी व बहन कुशाघाट में भक्तों को रेजगारी देती हैं, उसी में बतौर कमीशन पैसे कमा लेती हैं जैसे एक रुपये के अस्सी पैसे देकर बीस पैसे स्वयं रख लेती हैं। इन्हीं पैसों से उनका घर-परिवार चलता है। 

विशेष– (i) भाषा सरल, सहज व प्रवाहमान है। (ii) खड़ी बोली का प्रयोग हुआ है। (iii) गंगापुत्र के जीवन का भावपूर्ण चित्रण है।

3. पीतल की पंचमंजिली नीलांजलि गरम हो उठी है। पुजारी नीलांजलि को गंगाजल से स्पर्श कम, हाथ में लिपटे अंगोछे को नामालूम किस ढंग से गीला कर लेते हैं। दूर से यह दृश्य देखने पर मालूम होता है वे अपना संबोधन गंगाजी के गर्भ तक पहुँचा रहे हैं। पानी पर सहस्र बाली वाले दीपकों की प्रतिच्छवियाँ झिलमिला रही हैं। पूरे वातावरण में अगरु चंदन की दिव्य सुगंध है। आरती के बाद बारी है संकल्प और मंत्रोच्चार की। भक्त आरती लेते हैं, चढ़ावा चढ़ाते हैं। स्पेशल भतों से पुजारी ब्राह्मण-भोज, दान, मिष्ठान्न की धनराशि कबुलवाते हैं।

प्रसंग-प्रस्तुत गद्य अवतरण मता कालिया द्वारा लिखित ‘दूसरा देवदास’ कहानी से उद्धृत । इस कहानी में हर की पौड़ी, हरिद्वार के प्रवेश को केन्द्र में रखकर युवा मन की संवेदना, भावना, विचार जगत की उथल-पुथल को आकर्षक भाषा-शैली में प्रस्तुत किया गया है।

व्याख्या– जब गंगा किनारे पर आरती होती है, उस पीतल की पाँचमंजिली आरती में न जाने कितनी बत्तियाँ एक साथ जलती हैं। वह पाँचमंजिली नीलांजलि बहुत गर्म हो जाती है, तो पुजारी जी अपना हाथ अद्भुत ढंग से गंगा में भिंगोते है। और हाथ में पकड़ा अंगोछा गीला कर लेते हैं, और वह कम गर्म करने लगती है। 

जब नीलांजलि को गंगा का स्पर्श करवाते हैं, तो दर्शकों को ऐसा लगता है, मानो पुजारी गंगा के बिल्कुल भीतर तक अपने भावों को ले जाना चाहते हैं। उस समय बत्तियों की परछाई गंगा के जल पर पड़ती है, तो पानी में झिलमिल बत्तियों की प्रतिच्छवियाँ अद्भुत दृश्य प्रस्तुत करती हैं। वह दृश्य बहुत ही मनमोहक लगता है। चारों तरफ अगरबत्ती व चंदन की सुगन्ध फैल जाती है। 

आरती के पश्चात् पंडित जी स्पेशल भक्तों से संकल्प करवाते है कि वे कितने पैसों का भोजन ब्राह्मणों को करवाएँगे, कितने पैसों की ब्राह्मण को मिठाई खिलायेंगे व ब्राह्मणों को कितनी कितनी दक्षिणा देंगे। इस प्रकार सभी भक्त खुशी-खुशी से यह दान-दक्षिणा देते हैं, क्योंकि यह धार्मिक अन्धविश्वास हमारे भारत के श्रद्धालुओं से आराम से पैसे के नाम से हड़पे जा सकते हैं। हमारे भारतीयों को धर्म का वास्तविक ज्ञान नहीं, उन्हें जैसे कहा जाता है, वे मानते चले जाते हैं।

विशेष– (i) भारतीय श्रद्धालुओं की मानसिकता का वर्णन किया गया है। (ii) भाषा सरल व सहज है। (iii) विषयानुरूप भाषा का चयन किया गया है।

4. संभव इंतजार में खड़ा था कि पुजारी ने उसे पचहत्तर पैसे लौटाए। लेकिन पुजारी भूल चुका था। जाने कैसे पुजारी ने लड़की के ‘हम’ को युगल अर्थ में लिया कि उसके मुँह से अनायास आशीष निकली, “सुखी रहो, फूलो-फलो, जब भी आओ साथ ही आना, गंगा मैया मनोरथ पूरी करे।”

प्रसंग-प्रस्तुत गद्य अवतरण मता कालिया द्वारा लिखित ‘दूसरा देवदास’ कहानी से उद्धृत । इस कहानी में हर की पौड़ी, हरिद्वार के प्रवेश को केन्द्र में रखकर युवा मन की संवेदना, भावना, विचार जगत की उथल-पुथल को आकर्षक भाषा-शैली में प्रस्तुत किया गया है।

व्याख्या-संभव गंगा स्नान करके अपनी नानी के घर की तरफ लौट रहा था कि अचानक एक छोटे से मंदिर से अवाज आई, अरे दर्शन तो करते जाओ। संभव के पास खुले पैसे नही थे, तो पुजारी ने कहा-आओ हम देते हैं रेजगारी संभव ने दो रुपये का नोट पुजारी को दिया और प्रतीक्षा करने लगा कि पुजारी उसे सवा रुपया लेकर पचहत्तर पैसे लौटाएगा। 

लेकिन पुजारी जी भूल गए थे। इसी बीच एक कन्या पुजारी के पास आई, कहने लगी पंडित जी आज हमें देर हो गई ‘हम कल’ आयेंगे। क्योंकि कन्या व संभव बिल्कुल पास-पास खड़े थे, दोनों के आने का समय भी साथ-साथ था। कन्या ने कहा कि ‘हम’ कल आयेंगे, तो पुजारी ने ‘हम’ का अर्थ दोनों से कन्या व संभव से लगाया और पजारी के मुख से अचानक ‘युगल’ के लिए ही आशीर्वाद निकला कि तुम दोनों सुखी रहो। 

फूलो-फूलो, जब भी आना साथ-साथ आना, गंगा मैया तुम्हारे मनोरथ पूरे करे। स्पष्ट अर्थ में यह कहा जा सकता है कि पुजारी का कहना था कि भगवान तुम दोनों को शीघ्र ही जोड़ी बनाए। तुम जिस मनोकामना से मंदिर आए हो, परमात्मा पूरी करे। लड़की व लड़का दोनों सकपका गए। दोनों में से कोई भी एक-दूसरे को नहीं जानते थे। 

विशेष– (i) भाषा सरल, स्पष्ट व प्रवाहमान है। (ii) खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है। (iii) युवा मन की संवेदना को जागृत किया गया है। 

5. भीड़ लड़के ने दिल्ली में भी देखी थी, बल्कि रोज देखता था। दफ्तर जाती भीड़, खरीद फरोख्त करती भीड़, तमाशा देखती भीड़, सड़क क्रास करती भीड़, लेकिन इस भीड़ का अंदाजा निराला था। इस भीड़ में एकसूत्रता थी। न यहाँ जाति का महत्त्व था, न भाषा का, महत्त्व उद्देश्य का था और वह सबका समान था, जीवन के प्रति कल्याण की कामना ।। इस भीड़ में दौड़ नहीं थी, अतिक्रमण नहीं था और भी अनोखी बात यह थी कि कोई भी स्नानार्थी किसी सैलानी आनंद में डुबकी नहीं लगा रहा था। बल्कि स्नान से ज्यादा समय ध्यान ले रहा था।

प्रसंग-प्रस्तुत गद्य अवतरण मता कालिया द्वारा लिखित ‘दूसरा देवदास’ कहानी से उद्धृत । इस कहानी में हर की पौड़ी, हरिद्वार के प्रवेश को केन्द्र में रखकर युवा मन की संवेदना, भावना, विचार जगत की उथल-पुथल को आकर्षक भाषा-शैली में प्रस्तुत किया गया है।

व्याख्या– वैसाखी के दिन गंगा पर हर की पीढ़ी पर इतनी भीड़ थी कि इतनी भीड़ संभव ने कभी नहीं देखी। वह दिल्ली का रहने वाला था। दिल्ली में वह प्रतिदिन भीड़ देखता था, दफ्तर में जाते लोगों की भीड़, खरीदारी करते लोगों की भीड़, तमाशा देख रहे लोगों की भीड़, सड़कों को पार करती भीड़। 

परन्तु यह भीड़ अनोखी थी, इस भीड़ का अंदाज अलग था। यहाँ लाखों लोगों की भीड़ थी। इतने लोगों की भीड़ में भी एकता की गंध आ रही थी। यहाँ एकत्रित लोग अलग-अलग जाति के थे, अलग-अलग प्रांत के व अलग-अलग भाषा के थे, परंतु इन सभी अलग-अलग प्रांतों से आए लोगों का उद्देश्य केवल एक ही था और वह था- अपने-अपने जीवन के प्रति कल्याण की कामना। 

इस भीड़ में किसी प्रकार की भागमभाग नहीं थी। सबसे अद्वितीय बात यह थी कि कोई भी स्नान करने आया हुआ व्यक्ति केवल आनन्दित होने के लिए ही नहीं रहा था, अपितु नहाने से अधिक समय वह ‘ध्यान’ पर लगा रहा था। वहाँ किसी प्रकर की कोई भिन्नता नहीं थी।

विशेष (1) भाषा सरल, सहज व प्रवाहमान है। (ii) विषयानुरूप भाषा का चयन है। (iii) गंगा स्नान के लिए आए व्यक्तियों की श्रद्धा भावना द्रष्टव्य है। (iv) विभिन्नता में एकता दिखाई गई है।

6. दूर जलधारा के बीच एक आदमी सूर्य की ओर उन्मुख हाथ जोड़े खड़ा था। उसके चेहरे पर इतना विभोर, विनीत भाव था, मानो उसने अपना सारा अहम त्याग दिया हैं उसक अंदर “स्व” से जनित कोई कुंठा शेष नहीं है, वह शुद्ध रूप से चेतनास्वरूप, आत्माराम और निर्मलानंद है।

प्रसंग-प्रस्तुत गद्य अवतरण मता कालिया द्वारा लिखित ‘दूसरा देवदास’ कहानी से उद्धृत । इस कहानी में हर की पौड़ी, हरिद्वार के प्रवेश को केन्द्र में रखकर युवा मन की संवेदना, भावना, विचार जगत की उथल-पुथल को आकर्षक भाषा-शैली में प्रस्तुत किया गया है।

व्याख्या-लेखिका कहती है कि गंगा के भीतर दूर जलधारा के बीच में खड़ा एक व्यक्ति सूर्य की ओर मुख करके हाथ जोड़े खड़ा था। वह सूर्यदेव की पूजा बहत ही ध्यानमग्न होकर कर रहा था और आनन्दित हो रहा था, उसके चेहरे पर विनम्रता का भाव था, लगता था उसने अपना सारा अहंकार त्याग दिया है। 

ऐसा आभास हो रहा था मानो उसने अपने ‘स्व’ को त्याग दिया हैं वह अपने स्व को त्यागकर एक महान आत्मा बन गया है। वह सांसारिक विषय-वासनाओं को त्याग कर आत्मरूप हो गया है। उसने परम आनन्द की प्राप्ति कर ली है, मानो उसने परमात्मा को प्राप्त कर लिया हो, वह स्वयं ब्रह्म स्वरूप हो गया है।

विशेष- (i) भाषा सरल, सहज व प्रवाहमान है। (ii) विषयानुरूप भाषा का चयन किया गया है। (iii) आत्मा परमात्मा के मिलन का भाव है। (iv) ‘अहंकार को त्याग कर मनुष्य किस प्रकार लगता है’ का मनोहारी वर्णन किया गया है।


दूसरा देवदास पाठ का प्रश्न उत्तर | Class 12 Hindi Book Antra Chapter 9 Question Answer

प्रश्न 1. पाठ के आधार पर हर की पौड़ी पर होने वाली गंगाजी भावपूर्ण वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।

उत्तर- 

1. हर की पौड़ी की शाम कुछ अलग रंग की होती है।

2. शाम पाँच बजे फूलों के दोनों की कीमत दुगनी हो जाती है।

3. गंगा सभा के स्वयंसेवक खाकी वरदी में मुस्तैदी से घूमते है। 

4. सभी को शांत होकर बैठने के लिए कहते हैं।

5. कुछ भक्तों ने स्पेशल आरती बोल रखी है। स्पेशल यानी एक सी एक या एक सी इक्वायन रुपए वाली।

6. पीतल की नीलांजलि में सहस्र बत्तियाँ घी में भिंगोकर रखी हुई है।

7. सबने देशी घी के डिब्बे अपने ईमानदारी के प्रतीक स्वरूप सजा कर रखे हैं।

8. आरती से पूर्व स्नान होता है। स्नान के पश्चात् पंडे चंदन व सिंदूर का तिलक करते हैं। 

9. एकाएक सहस्र दीप जल उठते हैं। पंडित अपने आसन से उठ खड़े होते हैं। हाथ में अंगोछा लपेट पाँचमंजिली भीतांजलि पकड़ते है और शुरू हो जाती है आरती पहले पुजारियो के भर्राए गले से समवेत स्वर उठता है-‘जय गंगे माता, जो कोई तुमको ध्याता, सारे सुख पाता, जब गंगे माता’ । 

10. घंटे, घड़ियाल बनते हैं, मनीतियों के जलते हुए दीप लेकर फूलों की छोटी-मोटी कश्तियाँ गंगा की लहरों पर इठलाती हुई आगे बढ़ती हैं। 

11. पुजारियों का स्वर थकने लगता है, तो लता मंगेशकर की सुरीली आवाज लाउडस्पीकरों के साथ सहयोग करने लगती है। ‘ओम जय जगदीश हरे’ से हर की पौड़ी गुंजायमान हो जाती है।

12. पूरे वातावरण में अगरबत्ती व चंदन की दिव्य सुगंध होती है। 

13. आरती के बाद बारी आती है, संकल्प की। भक्त आरती लेते हैं, चढ़ावा चढ़ाते हैं। आरती के ये क्षण अत्यंत भव्य व दिव्य लगते हैं। पंडितम जी प्रसन्न होकर भगवान के गले से माला उतार कर यजमान को देते हैं और ढेर सारा प्रसाद भी ।

प्रश्न 2. ‘गंगापुत्र के लिए गंगा मैया ही जीविका और जीवन है’- इस कथन के आधार पर गंगा पुत्रों के जीवन परिवेश की चर्चा कीजिए। 

उत्तर- गंगापुत्र शाम के समय या सुबह आरती के समय गंगा के बीच खड़े होकर आरती की फूलों वाली कश्तियों में से चढ़ावे के पैसे छाँट कर उठा लेते हैं और वही खुले पैसे अपनी पनियों व बहनों को देते हैं। वे कुशाघाट पर यात्रियों को एक रुये के अस्सी पैसे देकर शेष बीच पैसे अपने पास रखती हैं, तभी उनका जीवन चलता है। इन्हीं पैसों से वे अपनी जीविका चलाते हैं।

प्रश्न 3. पुजारी ने लड़की के ‘हम’ को युगल अर्थ लेकर क्या आशीर्वाद दिया और पुजारी द्वारा आशीर्वाद देने के बाद लड़के और लड़की के व्यवहार में अटपटापन क्यों आया? 

उत्तर- 1. पुजारी ने लड़की के ‘हम’ का युगल अर्थात् हम दोनों (संभव व पारो) कल आयेगे अर्थ लेकर आशीर्वाद दिया कि- “सुखी रहो, फूलो-फलो, जब भी आओ साथ ही आना, गंगा मैया मनोरथ पूरे करे।” 

2. लड़की और लड़का दोनों अकबका गए।

3. दोनों एक-दूसरे के लिए अनजान थे।

4. इसलिए इनके व्यवहार में अटपटापन आ गया। 

प्रश्न 4. उस छोटी-सी मुलाकात ने संभव के मन में क्या हलचल उत्पन्न कर दी, इसका सूक्ष्म विवेचन कीजिए।

उत्तर- 

1. उस छोटी सी मुलाकात ने संभव के मन को झिंझोड़ दिया।

2. संभव का मन बेचैन हो गया। उसने उसका पीछा किया, परन्तु न मिली। 

3. अगले दिन के लिए वह पंडित जी से कहकर गई थी।

4. संभव ने अगले दिन वह पंडित जी से कहकर गई थी। 

5. सारी रात उसने करवटें बदलते काटी, सुबह होने के इंतजार में न जाने किन-किन स्मृतियों में वह खोया रहा। 

6. जीवन में इस प्रकार किसी लड़की से अकेले में वह पहली बार, वह कुछ भी क्षणों के लिए मिला, परंतु इतना भाव-विभोर हो गया कि पुनः मिलने को उत्सुक व बेचैन हो गया। अगले दिन मिलने की तड़प उसे सता रही थी। 

प्रश्न 5. मंसा देवी जाने के लिए केबिल कार में बैठे हुए संभव के मन में जो कल्पनाएँ उठ रही थीं, उनका वर्णन कीजिए।

उत्तर- मंगा देवी जाने के लिए जब संभव केबिल कार में बैठा, तो उसके मन में निम्नलिखित कल्पनाएँ उठ रही थीं-

1. उसे गुलाबी के सिवा ‘कोई रंग सुहा नहीं रहा था। वह गुलाबी कार में बैठ गया । 

2. उसने नवनिवाहित दंपत्ति को चढ़ावे की बड़ी थैली लिए बैठे हुए देखा, तो उसका मन भी अनायास उस नवयौवना की तरफ गया, जिसे उसने कल देखा था और अपने भविष्य को लेकर सोचने लगा।

3. संभव की कल्पना में केवल वही नवयुवती थी, उसका सौंदर्य था, जो उसने कल देखा । 

प्रश्न 6. “पारो बुआ, पारो बुआ, इनका नाम है उसे भी मनोकामना का पीला लाल धागा और उसमें पड़ी गिठान का मधुर स्मरण हो आया” कथन के आधार पर कहानी के संकेतपूर्ण आशय पर टिप्पणी लिखिए। 

उत्तर-

1 पारी जब मन्नू से उसके दोस्त का नाम पूछती है तो मन्नू पारो को बताता है कि पारो दुआ, पारो बुआ इनका नाम है। भी वह इतना ही कहता है कि संभव स्वयं अपना नाम बताकर वाक्य पूरा कर देता है। 

2. संभव ने जब मंसा देवी के मंदिर में प्रवेश किया था, तो सभी लोग अपनी-अपनी मनोकामना पूरी करने हेतु लाल-पीला धागा लेकर गिठान बाँध रहे थे। संभव ने भी भाग लेकर गिठान बांधी थी और बाँधते समय उसने पारो के बारे में सोचा था कि कितना अच्छा हो यदि

प्रभु तू मुझे पारो से मिला दे। 

3. अभी कुछ ही क्षण तो बीते थे कि भगवान ने उसकी सुन भी ली, इतनी शीघ्र पारो के दर्शन हो गए।

4: जैसा चाहा, उसे प्राप्त हुआ। 

5. जो. सोचा, वही हुआ।

प्रश्न 7. ‘मनोकामना की गाँठ भी अद्भुत, अनूठी है, इधर बाँधो उधर लग जाती है।’ कथन के आधार पर पारो की मनोदशा का वर्णन कीजिए। 

उत्तर- 

1. मंसा देवी मंदिर में ऐसी मान्यता है कि मनोकामना अवश्य पूरी होती है।

2. पारो भी मन के भीतर यही कामना करते हुए गाँध बाँधती है कि भगवान संभव से मिला दे। 

3. अभी कहती है कि उसकी मनोकामना उसे साक्षात् देखकर पूरी हो जाती है। 

4. पारो को लगता है कि यह गाँठ कितनी अनूठी है! कितनी अद्भुत है! कितनी

आश्चर्यजनक है! अभी बाँधी अभी फल की प्राप्ति हुई। 5. उसका मन फूला नहीं समाता।

6. वह अत्यंत प्रसन्न होती है, स्वयं को भाग्यशाली समझती है कि मंसा देवी ने उसकी मनोकामना शीघ्र ही पूरी कर दी।

प्रश्न 8. निम्नलिखित का आशय स्पष्ट कीजिए- (क) ‘तुझे तो तैरना भी न आवे। कहीं पैर फिसल जाता, तो मैं तेरी माँ को क्या मुँह दिखाती?

उत्तर-संभव गंगा नदी पर शाम को आरती के समय जाता है और नारी इंतजार करती है। वह आने में बहुत देर कर देता है। जब देरी से लोट आता है, तो उसकी नानी बहुत चिन्तित होकर कहती है कि बेटा तुम तो तैरना भी नहीं जानते। इतनी देर तक गंगा में क्या कर रहे थे? यदि पैर फिसल जाता और कुछ हो जाता, तो मैं तेरी माँ को क्या मुँह दिखाती? नानी संभव को समय पर घर आने की हिदायत देती है। 

(ख) ‘उसके चेहरे पर इतना विभोर विनीत भाव था मानो उसे अपना सारा अहम त्याग दिया है। उसके अंदर स्व से जनित कोई कुंठा शेष नहीं है। वह शुद्ध रूप से चेतनास्वरूप, आत्माराम और निर्मलानंद है।

उत्तर- लेखिका कहती है कि एक व्यक्ति बीच गंगा में खड़े होकर तल्लीनता से सूर्य की पूजा कर रहा है और इतना तन्मय हो रहा है कि उसे किसी के वहाँ होने या न होने का अभास ही नहीं हो रहा। उसका चेहरा इतना विनयावनत भाव में लीन है, इतना प्रसन्न है कि उसे कुछ लेना देना नहीं है, उसके भीतर के अहंकार की शांति हो चुकी है, अहंकार तो मानो समाप्त हो. गया हैं 

उसके भीतर स्वार्थ की भावना है ही नहीं। यूँ लगता है कि यह व्यक्ति ‘स्व’ से बहुत ऊपर उठ चुका है। आत्मा परमात्मा में लीन हो चुकी है। उसकी आत्मा इतनी प्रसन्न दिखाई दे रही है, उसे दीन-दुनिया से कुछ लेना देना नहीं। वह इन सब बातों से ऊपर उठ चुका है कि उसे स्व की कोई अनुभूति ही नहीं रह गई थी।

(ग) ‘एकदम अंदर के प्रकोष्ठ में चामुंडा रूप धारिणी मंसा देवी स्थापित थी । व्यापार यहाँ भी था।’

उत्तर- संभव जब मंसा देवी मंदिर पहुँचा, तो उसने देखा कि भीतर के कमरे में माँ चामुंडा विराजमान थी। मनोकमना पूरी करने के लिए लाल-पीले धागे सवा रुपये में बिक रहे थे लोग धागा बाँध रहे थे, बाद में देवी के लोग शीश नवाते थे अर्थात् मंदिर में भी व्यापार चल रहा था। आज हर जगह पर व्यापार का बोलबाला है। बाजारों में तो है ही, परंतु मंदिरों में भी व्यापार हो रहा है।

प्रश्न 9. ‘दूसरा देवदास’ कहानी के शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए। 

उत्तर- 1. किसी भी कहानी का शीर्षक या तो प्रतीकात्मक होता है या घटना विशेष पर आधारित होता है या पात्र के नाम पर आधारित होता है।

2. प्रस्तुत कहानी का शीर्षक प्रतीकात्मक है।

3. देवदास उसे कहा जाता है जो अपनी प्रेमिका को अथाह प्यार करे। यही की है, अतः कहानी का शीर्षक प्रतीकात्मक है, अतः उचित ही है। 

प्रश्न 10. ‘हे ईश्वर। उसने कब सोचा था कि मनोकामना का मौन उद्गार इतनी शीघ्र दशा संमय

शुभ परिणाम दिखाएगा।’ 

उत्तर-

1. ‘हे ईश्वर! उसने कब सोचा था कि मनोकमना का मौन उद्गार इतनी शीघ्र शुभ परिणाम दिखाएगा। ये कथन संभव ने स्वयं अपने आपसे कहे।

2. संभव ने जब प्रभु से चुपचाप प्रार्थना की थी या मनोकामना की थी कि उसे कल वाली नवयौवना अर्थात् पारों से मिला दे। 

3. अभी कुछ ही क्षण पूर्व वह मनोकामना कर रहा था कि उसे पारो नजर आ गई। उसने मन ही मन भगवान को धन्यवाद किया। 

4. उसकी उन्मीदों से बढ़कर उसे मनोकामना का फल प्राप्त हुआ। इसलिए वह बहुत खुश था।



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VVI Question for VIP Topper Students

प्रश्न 1. पाठ में आए पूजा-अर्चना के शब्दों तथा इनसे संबंधित वाक्यों को छोटकर लिखिए।

उत्तर- 
1. पीतल की नीलांजलि-पीतल की नीलांजलि में सहस्र बत्तियाँ घी में भिंगोकर रखी हुई है।
2. स्नान – हमें स्नान करके पूजा करनी चाहिए। 3. आराध्य – ईष्ट- जो भी आपका आराध्य हो चुन लें। मेरे आराध्य तो भगवान कृष्ण हैं।
4. चंदन का तिलक – हर एक के पास चंदन और सिंदूर की कटोरी है। 
5. मूर्ति गंगा की मूर्ति के साथ अन्य मूर्तियाँ हैं।
6. दीप- पानी पर सहस्र बाती वाले दीपकों की प्रतिछवियों झिलमिला रही है। 
7. घड़ियाल आरती के समय घड़ियाल भी बनता है।
8. आरती दीया-बाती का समय या कह तो आरती की बेला।
9. प्रसाद – फिर जी खोलकर देते हैं प्रसाद।
10. अगरु पूरे वातावरण में अगरु चंदन की दिव्य सुगंध है। 

प्रश्न 2. गंगा के किनारे पंडे बैठे-बैठे क्या करते हैं?

उत्तर- 
1. गंगा के किनारे बैठे पंडे गंगा में नहाने गए अपने यजमानों के कपड़ों, जूतों का ध्यान रखते हैं क्योंकि वहाँ चोरी की संभावना अधिक होती है। 
2. पंडे नहाकर आए अपने यजमानों को चंदन व सिंदूर का तिलक करते हैं।
3. यजमान अपनी श्रद्धानुसार उन्हें दक्षिणा देते हैं। 4. यह दक्षिण ही उनके जीवनयापन का साधन होती है।

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