Class 12 Hindi Book Antral-II Chapter 4 Question Answer अपना मालवा Summary

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NCERT Solutions for Humanities Class 12 Hindi Book Antral-II Chapter 4 Question Answer अपना मालवा Summary

कक्षा | Class12th 
अध्याय | Chapter04
अध्याय का नाम | Chapter Nameअपना मालवा (खाऊ- उजाडू सभ्यता में )
लेखक का नाम | Author Nameप्रभाष जोशी
किताब | Bookअंतराल भाग 2 ऐच्छिक | Antral-II Hindi Elective
बोर्ड | Boardसभी हिंदी बोर्ड
किताब | Book एनसीईआरटी | NCERT
विषय | Subjectहिंदी | HINDI
अध्ययन सामग्री | Study Materialsप्रश्न उत्तर | Question answer


अपना मालवा पाठ का सार | अपना मालवा summary

आधुनिक हिन्दी साहित्य के सफल गद्यकार एवं कुशल पत्रकार डॉ० प्रभाष जोशी ने मालवा जैसे प्रदेश की लोक संस्कृति, रीति-रिवाज, प्रकृति, मौसम, उत्पादन, पर्यावरण आदि का सजीव दर्शन कराते हुए प्रस्तुत गद्य की रचना की है जो मुख्यतः खाऊ- उजाडू सभ्यता का दर्शन कराती है।

class 12th NotesMCQ
HistoryPolitical Science
EnglishHindi

अपना मालवा पाठ का सारांश | Apna Malwa Summary In Hindi

खुशी और मेल-मिलाप का संकेत देने हेतु गद्यकार मालवा पहुँचकर सर्वप्रथम उस क्षेत्र के प्रमुख पर्व-त्योहारों की चर्चा करते हैं। आश्विन का महीना समाप्त होने को है, लेकिन अभी भी ऐसा लग रहा है कि मानसून गया नहीं है। जगह-जगह बारिश का पानी भरा हुआ है। नवरात्र का पर्व चल रहा है। लोग अपने घरों को लीप-पोत कर साफ कर रहे हैं। घर की औरतें सज-संवर कार स्पोहार मनाने की तैयारी कर रही हैं। लेखक अपने गाँव आया हुआ था।

 जब वह इंदौर के लिए चलता है, तो वह नागदा स्टेशन पर मीणा जी से कुछ बातचीत करता है और खाने-पीने का सामान लेता है। रास्ते में शिप्रा नदी पड़ती है, जिसे देखकर लेखक को पुराने दिन याद आ जाते हैं। मालवा में अब पहे जैसी बारिश नहीं होती। लेकिन फिर भी पर्याप्त बारिश हो जाती है। इंदौर पहुँचकर लेखक वहाँ के प्राकृतिक नजारें देखने की इच्छा प्रकट करता है। वहाँ वह माता की पूजा आदि करता है। 

Class 12 Hindi Book Antral-II Chapter 4 Question Answer
image credit: Social media

उसने नर्मदा नदी भी देखी, जिस पर कई बाँध बन गए हैं। लेकिन फिर भी वह काफी विशाल और तीव्र वेग वाली है। बिजवाड़ा के पास नर्मदा कुछ शांत थी। वह रात को उसी के किनारे पर रुकता है। लेखक नर्मदा को माँ के समान मानता है वह ओंकारेश्वर और नेमावर जाता है। तब रास्ते में सिमरोल और बिजवाड़ा के घाट पार करने पड़ते हैं। 

नेमावर के रास्ते में ही केवड़ेश्वर भी पड़ता है, जहाँ से शिप्रा निकलती है और निमाड़, मालवा, ग्वालियर होते हुए यमुना में मिलती है। उसने चंचल में खूब पानी देखा। इस बार अच्छी बारिश हुई, जिससे मालवा की अधिकांश नदियों में बाढ़ आ गई। सभी नदियों में खूब पानी था। इन नदियों के सदानीरा रहने से ही जीवन रहता है।

मालवा के जलस्रोत सूख जाने के विषय में लेखक कहता है कि ये सब भूमिगत जल के अधिक दोहन से हुआ है। जबकि पुराने समय में विक्रमादित्य, भोज, मुंज आदि राजा तालाब तथा बावड़ियों में बरसात का पानी इकट्ठा करते थे जिससे धरती के गर्भ का पानी बचाया जा सके। आज के इंजीनियर मानते हैं कि पानी का प्रबंध हमें ही आता है, लेकिन ऐसा नहीं है। हाथीपाला, महाराष्ट्र तथा इंदौर की नदियाँ इन प्रदेशों को हरा-भरा रखती थीं। लेकिन आज

वे गंदे नालों में तब्दील हो गई हैं। शिप्रा, चम्बल, गंभीर, पार्वती, कालीसिंघ, चोरल जैसी सभ्यताओं का निर्माण करने वाली नदियाँ आज इन सभ्यताओं का गंदा पानी ढो रहे ही हैं। हालाँकि बारिश से इनमें फिर उफान आ जाता है ।। पिछले सालों में इन नदियों में पर्याप्त पानी रहा है कभी सूखा भी पड़ा, तो इनके पानी से

समस्या टल गई, इसलिए विकास के नाम पर इन नदी-नालों का विनाश नहीं करना चाहिए। क्योंकि यदि नदी, नाले, तालाब आदि संभाल कर रखे जाएँ, तो विपत्ति के समय काम आते हैं। यूरोप के विकसित देशों तथा अमेरिका के प्रयोगों से विभिन्न गैसें वातावरण में फैली हैं जिनसे वातावरण में काफी परिवर्तन हुए। ध्रुवों की बर्फ पिघल गई। 

समुद्रों का पानी गर्म हो गया, मौसम चक्र बिगड़ गया, लद्दाख में बर्फ की जगह पानी गिरा। ये सब वातावरण में फेल रही गैसों के कारण ही हुआ। लेकिन इसके दोषी देश ये मानने को तैयार नहीं हैं। इससे मालवा जैसे पग-पग नीर और डग-उग रोटी देने वाले क्षेत्र उजड़ते जा रहे हैं। हमारी जीवन पद्धति में परिवर्तन आ रहा है। हम विकास के बजाय विनाश की ओर बढ़ रहे हैं।


अपना मालवा कठिन शब्दों के अर्थ

निथरी चमकीली, फैली। चौमासा बारिश के चार माह – ओटले- मुख्यद्वार। घऊँ- घऊँ- बादलों की गड़गड़ाहट क्वार आश्विन का महीना । पानी भोत गिर्यो – बरसात बहुत हुई। उनने-उन्होंने। अति की – बढ़ा-चढ़ाकर गदराई -निखरी हुई। विपुलता की आश्वस्ति-सम्पन्नता का आश्वासन। रड़का- लुढ़का।

त्रासदयी – दुखपूर्ण। पूर-बाढ़। गमक-सुंगंध। चवथ का चाँद-चतुर्थी का चाँद। कलमल करना-पानी बहने की आवाज। पश्चिमी के रिनेसां पश्चिमी के पुनर्जागरण जीवंत प्राणवान नियोजक- नियोक्ता। गाद – कूड़ा-कचरा । अतिवृष्टि- अत्यधिक वर्षा । दुष्काल बुरा समय –


अपना मालवा पाठ का प्रश्न उत्तर | Class 12 Hindi Book Antral-II Chapter 4 Question Answer

प्रश्न 1. मालवा में जब सब जगह बरसात की झड़ी लगती रहती है तब मालवा के जनजीवन पर इसका असर पड़ता है?

उत्तर- (क) फसलों को फायदा तथा नुकसान-मालवा में जब बरसात की झड़ी लगी रहती है, तो वहाँ के जनजीवन पर इसका काफी असर पड़ता है। यहाँ के किसानों की फरा अधिक पानी के कारण गल जाती हैं, लेकिन आगे की फसलों के लिए पर्याप्त मात्रा में सिंचाई

का पानी एकत्रित हो जाता है जिससे कुछ फसले अच्छी होती है। लेखक को नागदा स्टेशन पर मीणा जी बताते हैं कि अधिक बरसात से सोयाबीन की फसल तो गल गई, पर अब गेहूँ और चना अच्छा होगा। 

(ख) आवागमन में परेशानी-मालवा में होने वाली भारी बरसात के कारण यहाँ के आम लोगों को आवागमन में काफी परेशानी होती है। नदियों में पानी का जलस्तर बढ़ जाने से कई बार पुल आदि वह जाते हैं रास्तों पर जगह-जगह पानी भर जाता है, जिससे आने-जाने वालों को मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। 

प्रश्न 2. अब मालवा में वैसा पानी नहीं गिरता जैसा गिरा करता था। उसके क्या कारण हैं ? 

उत्तर- (क) औद्योगिक विकास – आज मानव विकास के नए-नए प्रतिमान छू रहा है। वैसे तो विकास हर क्षेत्र में हुआ है, लेकिन उद्योगों के क्षेत्र में ये विकास अत्यन्त तीव्र गति से हुआ। लगातार बढ़ते उद्योगों ने वातावरण पर बुरा प्रभाव डाला। इन उद्योगों से निकलने वाली गैसों ने पृथ्वी के तापमान को तीन डिग्री सेल्सियस बढ़ा दिया है, जिससे मौसम में काफी परिवर्तन आ गया। 

सर्दी, गर्मी तथा बरसात तीनों की मात्रा और समय में भी बदलाव हुआ। अब वर्षा की मात्रा बीते सालों से काफी कम रह गई है। पाठ में भी कहा गया है कि हम जिसे विकास की औद्योगिक सभ्यता कहते हैं, वह उजाड़ की अपसभ्यता है।

(ख) वायु प्रदूषण मनुष्य के विकास के साथ प्रदूषण भी काफी अधिक बढ़ गया है, जिसमें वायु प्रदूषण तो बहुत अधिक फैल रहा है। फैक्ट्रियों तथा वाहनों के धुएँ ने वातावरण को दूषित कर दिया है। ये धुएँ वायुमंडल में जाकर वर्षा की मात्रा को प्रभावित करते हैं। 

प्रश्न 3. हमारे आज के इंजीनियर ऐसा क्यों समझते हैं कि वे पानी का प्रबंध जानते हैं और पहले जमाने के लोग कुछ नहीं जानते थे ?

उत्तर- 

(क) अज्ञानतावश – हमारे आज के इंजीनियर अज्ञानतावश ऐसा समझते हैं कि वे पानी का प्रबंध जानते हैं और पहले जमाने के लोग कुछ नहीं जानते थे। उन्हे ज्ञात नहीं है कि पहले ऐसे-ऐसे राजा हुए, जिन्होंने बरसात के पानी को एकत्रित करने के लिए बड़े-बड़े तालाब तथा गाड़ियाँ बनवाई जिससे इस पानी का उचित प्रयोग हो सके और भूमिगत जल को सुरक्षित रखा जा सके।

(ख) अपने ज्ञान का अतिरिक्त प्रदर्शन- हमारे आज के इंजीनियर ये मानते हैं कि इस प्रकार के कार्य करने का ज्ञान उन्हीं के पास है। पहले के लोगों को यह ज्ञान न था। ये अपने ज्ञान का अतिरिक्त प्रदर्शन करने के लिए ऐसा सोचते हैं। दूसरा इस प्रकार के पुराने तथ्यों का मूल्यांकन पूर्ण रूप से नहीं किया जाता है।

प्रश्न 4. ‘मालवा में विक्रमादित्य, भोज और मुंज रिनेसा के बहुत पहले हो गए।’ पानी के रखरखाव के लिए उन्होंने क्या प्रबंध किए

उत्तर- 

(क) तालाबों तथा बावड़ियों का निर्माण मालवा के विक्रमादित्य, भोज और मुंज आदि राजा इस बात से परिचित थे कि इस पठारी क्षेत्र में पानी को रोक कर रखना अति आवश्यक है। इसलिए उन्होंने तालाबों और बावड़ियों का निर्माण किया। 

(ख) भूमिगत जल का संरक्षण इन राजाओं ने तालाबों तथा बावड़ियों का निर्माण करके बरसात के पानी को एकत्रित किया ताकि उस पानी का उचित प्रयोग किया जा सके और भूमिगत जल को जीवंत रखा जा सके। इससे भूमिगत पानी का बचाव हुआ और बरसात के व्यर्थ बह जाने वाले पानी का प्रयोग भी ठीक ढंग से हो सका।

प्रश्न 5. ‘हमारी आज की सभ्यता इन नदियों को अपने गंदे पानी के नाले बना रही हैं- क्यों और कैसे ? 

उत्तर- 

(क) बढ़ती महत्त्वाकांक्षाएँ मानव ने अपने जन्म के उपरांत विकास के लिए नित नए-नए प्रयोग किए। इन प्रयोगों से उसने विकास भी किया। लेकिन वह यहीं नहीं रुका, उसकी महत्वाकांक्षाएँ और बढ़ने लगी जिससे उसने विकास के लिए और अधिक प्रयास किए। इस कारण नई-नई औद्योगिक संस्थाएँ स्थापित हुई। इन उद्योग-धंधों से निकलने वाले अवशिष्ट पदार्थ नदियों में बहाए जाने लगे, जिससे ये गंदे नालों के रूप में परिवर्तित हो गई अर्थात् विकास के कारण हम विनाश की ओर बढ़ गए।

(ख) धार्मिक मान्यताएँ और परम्पराएँ- हमारे देश में विभिन्न धर्म हैं। सभी धर्मों की अनेक मान्यताएँ और परम्पराएं हैं। त्योहारों तथा उत्सवों के अवसर पर हम नदियों में पूजा के बाद मूर्तियाँ आदि विसर्जित करते हैं। हवन-पूजा करने के बाद बची हुई राख तथा अन्य पदार्थ भी हम नदियों में फेंक देते हैं जिससे इनका जल दूषित होता है और ये नाले के रूप में परिवर्तित हो जाते हैं।

प्रश्न 6. लेखक को क्यों लगता है कि ‘हम जिसे विकास की औद्योगिक सभ्यता कहते हैं वह उजाड़ की अपसभ्यता है ?’ आप क्या मानते हैं ?

उत्तर— लेखक को औद्योगिक सभ्यता के विकास से होने वाले विनाश के कारण यह सभ्यता उजाड़ की अपसभ्यता लगती है। इस विकास के कारण कई खतरे उत्पन्न हुए

(क) वातावरण में परिवर्तन औद्योगिक सभ्यता के विकास के परिणामस्वरूप वातावरण में काफी परिवर्तन हुआ है। उद्योगों से निर्माण कार्य के दौरान निकलने वाली दूषित गैसों के कारण धरती का तापमान तीन डिग्री सेल्सियम बढ़ गया है। ठंडे प्रदशों में भी गर्मी होने लगी है तथा मानसून अनियमित हो गया जिससे बाढ़ तथा सूखे जैसी समस्याएँ उत्पन्न हुई और कई बार मानव सभ्यता उजड़ी।

(ख) नदी-तालाबों की दुर्दशा — उद्योगों के तीव्र विकास से नदियों तथा तालाबों का पानी दूषित हो गया है। उद्योगा-पंचों से निकलने वाले अवशिष्ट पदार्थ इन जल– -स्रोतों में वहा दिए जाते हैं जिससे पानी सुचारु रूप से नहीं वह पाता और वह अपनी सीमाएँ तोड़कर बाढ़ आदि की स्थिति पैदा करता है। इन उद्योगों का कूड़ा-कचरा नदियों में वह जाने से ये गंदे नालों के रूप में परिवर्तित हो गई हैं। हमारे मत में यह बात बिल्कुल सही है कि जिसे हम विकास की औद्योगिक सभ्यता कहते हैं वह उजाड़ की अपसभ्यता है।

प्रश्न 7. धरती का वातावरण गरम क्यों हो रहा है? इसमें यूरोप और अमेरिका की क्या भूमिका है? टिप्पणी कीजिए।

उत्तर- 

(क) वातावपरण गरम होने का कारण—हमने अपनी सभ्यता के विकास के लिए विभिन्न प्रयास किए। इन प्रयासों में हमने प्रकृति के साथ खिलवाड़ किया। पेड़ों की अंधाधुंध कटाई की, जिससे वातावरण में परिवर्तन आया। अपने विकास के लिए हमने नए-नए उद्योग-धंधे स्थापित किए। इन उद्योगों से अनेक हानिकारक गैसें वातावरण में फैलीं, जिससे वातावरण बेहद गर्म हो गया। कार्बन डाइऑक्साइड तथा अन्य गैसों के वातावरण में फैलने से पृथ्वी का तापमान बढ़ गया है।

(ख) यूरोप और अमेरिका की भूमिका – उद्योगों का सबसे अधिक विकास यूरोप और अमेरिका में हुआ। इन देशों ने नित नए प्रयोगों से अनेक हानिकारक गैसें वातावरण में फैलाई, जिससे पर्यावरण बिगड़ा है। इससे पूरी दुनिया प्रभावित हुई है। ये देश इन्हें रोकने को भी तैयार नहीं हैं। वे नहीं मानते कि धरती के वातावरण के गरम होने से काफी गड़बड़ी हो रही है। इस प्रकार धरती का वातावरण गरम होने में यूरोप और अमेरिका की प्रमुख भूमिका है।

प्रश्न 8. क्या आपको भी पर्यावरण की चिंता है ? अगर है तो किस प्रकार ? अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तर- 

(क) पेड़-पौधों की कटाई से चिंतित—हम भी पर्यावरण के हो रहे विनाश से काफी चिंतित हैं, विशेषकर पेड़-पौधों की अंधाधुंध कटाई से हम बहुत चिंतित हैं। इससे पर्यावरण पर काफी बुरा प्रभाव पड़ा है। पर्यावरण का संतुलन बिगड़ गया है। मौसम में काफी बदलाव आया है और मानसून अनियमित हो गया है। पेड़ों की कटाई से मृदा अपरदन भी बढ़ा है, जिससे नदी-नालों में मिट्टी भर जाने से बाढ़ आने के खतरे बढ़े हैं। 

(ख) प्रदूषण – आज प्रदूषण अत्यन्त तीव्र गति से बढ़ रहा है जिनमें जल प्रदूषण और वायु प्रदूषण पर्यावरण संबंधी हैं। इनसे पर्यावरण को काफी क्षति हुई है। वायु प्रदूषण के बढ़ने से मौसम में काफी बदलाव हुआ है, तो वहीं जल प्रदूषण से हमारे प्राकृतिक जल स्रोत नष्ट हो रहे हैं। इस समस्या से यदि जल्दी न निपटा गया, तो भविष्य में हमारे समक्ष विकट स्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं।

प्रश्न 9 विकास की औद्योगिक सभ्यता उजाड़ की अपसभ्यता है। खाऊ- उजाडू सभ्यता के संदर्भ में हो रहे पर्यावरण के विनाश पर प्रकाश डालिए।

उत्तर—विकास की औद्योगिक सभ्यता के कारण पर्यावरण का विनाश निम्नलिखित प्रकार से हो रहा है- 

(क) वायु प्रदूषण अपने विकास के लिए हमने विभिन्न उद्योगों की स्थापना की, बड़े-बड़े कारखाने लगाए। इन कारखानों में वस्तुओं के निर्माण के दौरान अनेक जहरीली गैसे निकलती हैं, जो वायुमंडल में फैलकर वायु प्रदूषण का कारण बनती हैं। वाहनों की बढ़ती संख्या ने वायु प्रदूषण को और अधिक बढ़ा दिया है। इस कारण ओजोन परत में छेद हो गया है, जिससे सूर्य की पराबैंगनी किरणें सीधी धरती पर आने लगीं। इनसे त्वचा संबंधी अनेक रोग विकसित हुए। इसके अतिरिक्त वायु प्रदूषण से विभिन्न रोग फैले हैं।

(ख) जल प्रदूषण- हमने औद्योगिक विकास के लिए कई उद्योगों की स्थापना की। इनमें बनने वाली वस्तुओं के निर्माण के बाद जो भी अपशिष्ट पदार्थ बचते हैं, उन्हें हम प्राकृतिक जल स्रोतों में वहा देते हैं जिससे इनका जल दूषित हो गया। इस कारण अनेक बीमारियों भी पैदा हुई। जल के इन स्रोतों के दूषित होने से पर्यावरण के संतुलन पर भी काफी असर पड़ा। 

(ग) वनों की अंधाधुध कटाई-उद्योगों के विकास के लिए आवश्यक कच्चे माल तथा स्थान के लिए हमने बनों की अंधाधुंध कटाई की जिससे पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव पड़े। तापमान, वर्षा तथ मौसम में अनेक परिवर्तन आ गए। पेड़ों के कटने से मृदा अपरदन बढ़ा, जिससे कृषि पर भी प्रभाव पड़ा। इस कारण बाढ़ आने के खतरे बढ़ गए।

प्रश्न 10. पर्यावरण को विनाश से बचाने के लिए आप क्या कर सकते हैं? उसे कैसे बचाया जा सकता है? अपने विचार लिखिए । 

उत्तर- 

(क) निजी प्रयास पर्यावरण को विनाश से बचाने के लिए सबसे आवश्यक है कि हम इसके लिए निजी रूप से प्रयास करें। वायु, जल तथा ध्वनि-प्रदूषण को रोकने में अपना योगदान दें। ऐसे कोई भी क्रियाकलाप न करे, जिससे पर्यावरण को क्षति पहुँचे।

(ख) वनों का संरक्षण-पर्यावरण का सबसे अधिक विनाश वनों की अंधाधुंध कटाई के न में हो रहा है। इसलिए वनों के संरक्षण संबंधी नियम बनाने चाहिए। पेड़ों की कटाई कम-से- कम करनी चाहिए और यदि ऐसा करना पड़े, तो काटे गए पेड़ों के बराबर नए पेड़ लगाने चाहिए। ऐसा करने से पर्यावरण के विनाश को काफी कम किया जा सकता है। 

(ग) लोगों में जागरूकता फैलाना लोगों में पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता ताकर उसके विनाश को रोका जा सकता है। इसके लिए स्कूलों तथा कॉलेजों में छात्रों को पर्यावरण संरक्षण के विषय में बताना चाहिए। सभाओं तथा सम्मेलनों का आयोजन करके आम

लोगों को पर्यावरण को बचाने का संदेश दिया जा सकाता है। अन्य महत्त्वपूर्ण परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

प्रश्न 11 लेखक ने नर्मदा नदी की स्थिति का वर्णन किस प्रकार किया है ?

उत्तर- 

(क) बाँधों का निर्माण लेखक कहता है कि नर्मदा नदी पर बाँध का निर्माण हो रहा है। इस कारण वह पीड़ित है और हिलोरें लेकर बह रही है। किसी स्थान पर उसका तल स्पष्ट दिखाई देता है, तो कहीं उसकी गहराई का अंदाजा लगाना भी मुश्किल है। उस पर बाँध निर्माण का कार्य बड़े स्तर पर हो रहा है।

(ख) नर्मदा का जल स्तर लेखक कहता है कि नर्मदा पर बाँध बनाया जा रहा है। साथ ही इसमें बार-बार बाढ़ भी आती रही है। लेकिन इन सबके बावजूद नर्मदा में खूब पानी है और तीव्र गति से बहती जा रही है। किसी स्थान पर यह शांत और गंभीर रूप में भी बहती है। 

प्रश्न 12. गाँवों में बरसात से प्रसन्नता और पीड़ा दोनों मिलते हैं। स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- 

(क) बरसात से प्रसन्नता-ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले अधिकांश लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि होता है। कृषि के लिए उचित बरसात का होना जरूरी है। यदि बरसात समय पर हो जाए, तो फसलें अच्छी हो जाती है जिससे लोगों में प्रसन्नता फैल जाती है। साथ ही गाँव के तालाबों, कुओं आदि में भी पानी भर जाता है जिससे गाँव के लोगों की पानी से संबंधित आवश्यकताएँ पूरी होती है। 

(ख) बरसात से पड़ा गाँवों में जब अधिक बारिश हो जाती है, तो कई बार फसलें बरबाद हो जाती हैं। जगह-जगह पानी भर जाता है। कई बार बरसात इतनी अधिक होती है कि बाढ़ तक आ जाती है। इस कारण लोगों को जान-माल की काफी हानि होती है। ऐसी स्थिति में बरसात पीड़ा का कारण बन जाती है। पाठ में लेखक कहता है कि अब की पानी बहुत गिरा है, जिससे सोयाबीन की फसल गल गई।

प्रश्न 13. औद्योगिक विकास से कौन-कौन सी समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं ? 

उत्तर- 

(क) मौसम में बदलाब-उद्योगों के विकास से मौसम पर काफी असर पड़ा है। करखानों से निकलने वाली गैसों से वातावरण गर्म हो गया है जिस कारण तापमान में बढ़ोतरी हुई है। ध्रुवीय प्रदेशों में भी तापमान कुछ बढ़ा है। समुद्रों का पानी गर्म होता जा रहा है अर्थात् मौसम का चक्र बिगड़ रहा है जिससे जीवन व्यतीत करना कठिन हो गया है।

(ख) दूषित जल-स्त्रोत– औद्योगिक विकास से हमारे प्राकृतिक जल स्रोतों को काफी हानि पहुँची है। इन स्रोतों में उद्योगों की गंदगी डाल दी जाती है, जिससे इनकी निर्मलता और स्वच्छता नष्ट हो गई है। लेखक ने पाठ में कहा है कि हमने अपनी नदियों को गंदे नालों में परिवर्तित कर दिया है। इस कारण पीने के पानी तथा सिंचाई के पानी की किल्लत हो गई है।

(ग) पेड़ों की अनियमित कटाई उद्योग-धंधों के विकास से पेड़ों की कटाई बढ़ी है। जिससे वर्षा की मात्रा में परिवर्तन आया तथा मृदा अपरदन बढ़ने लगा। इस कारण हमें अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ा।



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VVI Question for VIP Topper Students

प्रश्न 1. ‘हम नदी को नदी नहीं, माँ मानते हैं। नर्मदा मैया है, उससे हम बने हैं।’- कथन के संदर्भ में लेखक का भाव स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- (कं) संस्कारों को मान्यता- हमारे देश में प्राचीन संस्कारों को बहुत मान्यता दी जाती है। हम बहुत पहले से नदियों को माता के रूप में मानते आए हैं, क्योंकि इनका जल हमारा पोषण मी के समान करता है। लेखक भी प्राचीन मान्यताओं तथा संस्कारों को पूरी तरह मानता है। अतः वह नर्मदा को मैया कहते हैं। 
(ख) नदियों का महत्त्व इन पंक्तियों के माध्यम से लेखक नदियों के महत्त्व को स्पष्ट करता है। नदियाँ हमारे लिए जीवनदायिनी है। उन्हीं के जल को हम पीते हैं तथा उसी के द्वारा अनाज उत्पन्न करते हैं जिससे हमारा जीवन निर्वाह होता है। इस प्रकार मानव जीवन में नदियों का सीन अत्यनत महत्त्वपूर्ण है। लेखक स्वयं कहता है कि ‘इससे हम बने हैं’। 

प्रश्न 5. ‘गोबर से घर-आँगन लीपने और मानाजी को ओटले के रंगोली से सजाने की सुबह। बहू-बेटियों के नहाने धोने और सजकर त्योहार मनाने में लगने की घड़ी। लेकिन आसमान तो घऊ घऊँ कर रहा था।—के द्वारा लेखक ने क्या वर्णित किया है ?

उत्तर- 
(क) ग्रामीण जीवन पद्धति का चित्रण लेखक ने इन पंक्तियों में ग्रामीण जीवन पद्धति का सुंदर वर्णन किया है। गाँवों में घरों को गोवर से लीपा जाता है तथा रंगोली आदि बनाकर सजाया जाता है। त्योहारों पर तो ये सब विशेष रूप से किये जाते हैं। त्योहारों पर गाँव में रहनेवाली औरतें सज-धजकर त्योहार मनाती हैं। इनका इंतजार और तैयारी वे काफी पहले से ही करने लगती हैं।
(ख) वर्षा ऋतु का चित्रण – लेखक ने गाँव की बरसात का चित्रण भी किया है। त्योहार का दिन है, गाँव की बहू बेटियाँ इसे मनाने की तैयारियाँ कर रही हैं। लेकिन आसमान में काले बादल छाए हुए हैं जो रह-रहकर अपनी उपस्थिति का संकेत अपनी गर्जना से कर रहे हैं।

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