NCERT Solutions Class 12 Hindi Elective Chapter 2 Question Answer, Summary, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’

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तो छात्रों, इस लेख को पढ़ने के बाद, आपको इस अध्याय से परीक्षा में बहुत अधिक अंक प्राप्त होंगे, क्योंकि इसमें सभी परीक्षाओं से संबंधित प्रश्नों का वर्णन किया गया है, इसलिए इसे पूरा अवश्य पढ़ें।

मैं खुद 12वीं का टॉपर रहा हूं और मुझे पता है कि 12वीं की परीक्षा में किस तरह के प्रश्न पूछे जाते हैं। वर्तमान में, मैं एक शिक्षक की भूमिका भी निभा रहा हूँ, और अपने छात्रों को कक्षा 12वीं की महत्वपूर्ण जानकारी और विषयों का अभ्यास भी कराता हूँ। मैंने यह लेख 5 वर्षों से अधिक के अपने अनुभव के साथ लिखा है। इस पोस्ट की मदद से आप परीक्षा में इस अध्याय से भूगोल में बहुत अच्छे अंक प्राप्त कर सकेंगे।

NCERT Solutions Class 12 Hindi Elective Chapter 2 Question Answer, Summary, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’

कक्षा | Class12th 
अध्याय | Chapter02
अध्याय का नाम | Chapter Name(क) गीत गाने दो मुझे
(ख) सरोज स्मृति
कवि का नाम | Poet Nameसूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’
किताब | Bookअंतरा ऐच्छिक | Hindi Elective
खंड | Sectionकाव्य खंड | Poetry Section
बोर्ड | Boardसभी हिंदी बोर्ड
किताब | Book एनसीईआरटी | NCERT
विषय | Subjectहिंदी | HINDI
अध्ययन सामग्री | Study Materialsप्रश्न उत्तर | Question answer

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का जीवन परिचय कक्षा 12 | Biography of Suryakant Tripathi Nirala

प्रश्न 1. सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का जीवन-परिचय देते हुए उनकी रचनाओं -शैली तथा साहित्यिक विशेषताओं का वर्णन कीजिए। भाषा

उत्तर—जीवन-परिचय—सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का जन्म 1899 ई. में बंगाल के मेदिनीपुर जिले के महिषादल राज्य में हुआ था। इनके पिता पं. रामसहाय त्रिपाठी महिषादल राज्य के कर्मचारी थे। तीन वर्ष की आयु में ही निराला जी की माता का देहांत हो गया। उनकी प्रारंभिक शिक्षा बंगाल में हुई। बंगाल में रहते हुए ही उन्होंने संस्कृत, बंगला, संगीत और दर्शनशास्त्र का गहन अध्ययन किया। 

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IMAGE CREDIT: SOCIAL MEDIA

14 वर्ष की आयु में उनका विवाह मनोहरा देवी से हुआ, किंतु उनका पारिवारिक जीवन सुखमय नहीं रहा। 1918 ई. में उनकी पत्नी का स्वर्गवास हो गया और उसके बाद पिता, चाचा और चचेरे भाई भी एक-एक करके उन्हें छोड़कर इस दुनिया से चल बसे। उनकी प्रिय पुत्री सरोज की मृत्यु ने तो उनके हृदय के टुकड़े-टुकड़े कर डाले। इस प्रकार निराला जीवन-भर क्रूर परिस्थितियों से संघर्ष करते रहे। 15 अक्टूबर, 1961 ई. को इनका स्वर्गवास हो गया।

रचनाएँ—निराला का रचना में संसार बहुत विस्तृत है। उन्होंने गद्य और पद्य दोनों ही विधाओं में लिखा है। उनकी रचनाएँ निराला रचनावली के आठ खंडों में प्रकाशित हैं। निराला अपनी कुछ कविताओं के कारण बहुत प्रसिद्धि प्राप्त कवि हो गए हैं। ‘राम की शक्ति पूजा’ और ‘तुलसीदास’ उनकी प्रबंधात्मक कविताएँ हैं, जिनका साहित्य में महत्त्वपूर्ण स्थान है। ‘सरोज-स्मृति हिंदी की अकेली कविता है जो किसी पिता ने अपनी पुत्री की मृत्यु पर लिखी है। 

निराला की प्रमुख काव्य कृतियाँ हैं—अनामिका, परिमल, गीतिका, तुलसीदास, कुकुरमुत्ता, अणिमा, नए पत्ते, वेला, अर्चना, आराधना, गीतगुंज। इन ग्रन्थों में अनेक ऐसी कविताएं है जो निराला को जन- कवि बना देती हैं तथा जिनको लोगों ने अपने कंठ में स्थान दिया है, यथा— जूही की कली, तोड़ती पत्थर, कुकुरमुत्ता, भिक्षुक, में अकेला, बादल राग आदि ।

भाषा-शैली-काव्य की पुरानी परम्पराओं को त्याग कर काव्य-शिल्प के स्तर पर भी विद्रोही तेवर अपनाते हुए निराला जी ने काव्य-शैली को नई दिशा प्रदान की। उनके काव्य में भाषा का कसाव, शब्दों की मितव्ययिता एवं अर्थ की प्रधानता है। संस्कृतनिष्ठ तत्सम शब्दों के साथ ही संधि- समासयुक्त शब्दों का भी प्रयोग निराला जी ने किया है।

छंद-विधान – निराला जी छंदमुक्त काव्य के प्रवर्तक माने जाते हैं। उन्होंने ही सर्वप्रथम कविता को छंदों के बंधन से मुक्त करने का साहस किया। यद्यपि उन्होंने छंदबद्ध कविताएँ भी लिखी हैं। उर्दू में प्रचलित छंदों का प्रयोग कर निराला जी ने हिंदी में गजलों की रचना भी की है। ध्वन्यात्मकता — निराला जी के काव्य में ध्वन्यात्मकता का गुण भी है। उनकी उनेक कविताएँ

संगीतात्मकता के गुण से भी युक्त प्रतीक-योजना–निराला जी ने प्रतीकों का बड़ा ही सुंदर एवं उपयुक्त प्रयोग किया है। ‘जैसे- ‘वन’ को जीवन का एवं ‘पुष्प’ को नवोदितों का प्रतीक बताना। 

बिम्ब-विधान – निराला जी के काव्य में चित्रमय विम्ब-विधान का गुण हैं।

अलंकार-योजना–अलंकारों का सुंदर प्रयोग निराला जी के काव्य में हुआ है।

अनुप्रास अलंकार – गीत गाने दो’, ‘लोग लोगों को’, ‘नत नयनों से’, ‘रति रूप’, ‘राग रंग’ आदि। उपमा अलंकार ‘हो भ्रष्ट शीत के से शतदल’ ।

पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार– ‘अंग’ अंग’, ‘थर-थर-घर’।

समग्रतः निराला जी छायावाद के प्रमुख स्तम्भ, मुक्त छंद के प्रवर्तक, शोषितों व दलितों के मसीहा तथा व्यापक विचारों व भाव से सम्पन्न एक सशक्त कवि के रूप में चिरस्मरणीय रहेंगे।

गीत गाने दो मुझे कविता का सारांश | Summary Of The Poem geet gaane do mujhe

Class 12 Hindi Elective Chapter 2 Question Answer

निराला जी की प्रेरक रचना ‘गीत गाने दो मुझे’ दुख को भुलाकर सुख की आशा बनाये रखने का संदेश देती है। विषम परिस्थितियों में भी जीवन-संघर्ष करते हुए आशा के सहारे निरंतर आगे बढ़ने की प्रेरणा देने वाली कविता है। इस कविता में निराला ने ऐसे समय की ओर इशारा किया है, जिसमें चोट खाते-खाते, संघर्ष करते-करते होश वालों के होश खो गए हैं, यानिजीवन जीना आसान नहीं रह गया है। 

मनुष्य के जीवन में जो कुछ मूल्यवान था, वह लुट रहा है। पूरा संसार हार मानकर जहर से भर गया है। पूरी मानवता हाहाकार कर रही है। लगता है, पृथ्वी की लौ बुझ गई है, मनुष्य में जिजीविषा खत्म हो गई है। इसी बुझती हुई ली को जगाने की बात कवि कर रहा है और वेदना को छिपाने के लिए, उसे रोकने के लिए गीत गाना चाहता है। निराशा में आशा का संचार करना चाहता है। इसमें कवि ने यह प्रेरणा दी है कि संसार को सबके जीने योग्य बनाने के लिए कुछ लोगों को स्वयं भी जलना होगा अर्थात् त्याग करके ही समाज की स्थिति में परिवर्तन लाया जा सकता है।

सरोज स्मृति कविता का सारांश | Summary Of The Poem Saroj Smriti

निराला जी की एकमात्र पुत्री सरोज के असामयिक निधन के कारण दुखी कवि के हृदय से निकला एक प्रभावी शोकगीत ‘सरोज-स्मृति’ शीर्षक से प्रचलित हुआ। कवि के हृदय से निकली वेदना सही शब्दों के रूप में जन-जन तक पहुँच गयी है।

‘सरोज स्मृति’ कविता निराला की दिवंगता पुत्री सरोज पर केंद्रित है। यह कविता नौयुवती बेटी के दिवंगत होने पर पिता का विलाप है। पिता के इस विलाप में कवि को कभी शकुंतला की याद आती है, कभी अपनी स्वर्गीया पत्नी की बेटी के रूप-रंग में पत्नी का रूप रंग दिखाई पड़ता है, जिसका चित्रण निराला ने किया है। 

यही नहीं इस कविता में एक भाग्यहीन पिता का संघर्ष, समाज से उसके संबंध, पुत्री के प्रति बहुत कुछ न कर पाने का अकर्मण्यता-बोध भी प्रकट हुआ है। इस कविता के माध्यम से निराला का जीवन-संघर्ष भी प्रकट हुआ है। तभी तो वे कहते दुख ही जीवन की कथा रही, क्या कहूँ आज, जो नहीं कही। इस कविता में कवि की मनोव्यथा के साथ ही पुत्री के प्रति उसका अपार स्नेह भी स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।

class 12th NotesMCQ
HistoryPolitical Science
EnglishHindi

गीत गाने दो मुझे सप्रसंग व्याख्या एवं शब्दार्थ | गीत गाने दो मुझे सप्रसंग व्याख्या Ncert

1.गीत गाने दो मुझे तो,

(क) गीत गाने दो मुझे

वेदना को रोकने को ।

चोट खाकर राह चलते होश के भी होश एटे, 

हाथ जो पाथेय थे, 

ठग- ठाकुरों ने रात लूटे, 

कंठ रुकता जा रहा है, 

आ रहा है काल देखो।

शब्दार्थ : वेदना पीड़ा, दुख पाथेय संदल, रास्ते का भोजन। ठाकुर मालिक, स्वामी प्रसंग प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘अंतरा’ में संकलित सूर्यकांत त्रिपाठी निराला द्वारा रचित कविता ‘गीत गाने दो मुझे’ से ली गई हैं।

इस कविता में निराला जी ने संसार की विषम परिस्थति की ओर संकेत किया है। कवि ने ऐसे समय का वर्णन किया है, जब मानव जीवन अत्यंत कठिन हो गया था। उस समय लोगों की चेतना को जगाने के लिए कवि गीत गाना चाहता है।

व्याख्या-कवि कहता है कि वेदना को रोकने के लिए मुझे गीत गाने दो। रास्ते में चलते हुए घोट खाकर होश वालों के भी होश छूट गए हैं। जो कुछ भी संबल हाथ में था, उसे रात समय ठगों-लुटेरों ने लूट लिया है। कंठ की आवाज बंद होती जा रही है। देखों, काल आ रहा है भाव यह है कि संसार की स्थिति ऐसी हो गई है कि यहाँ जीवन जीना कठिन हो है। 

जीवन की कठिनाइयों का सामना करते हुए लोग किंकर्तव्यविमूढ़ हो गए हैं। जीवन में ज कुछ भी मूल्यवान था, वह लुटता जा रहा है। विनाश को सामने देखकर लोग कुछ कह न पा रहे हैं। इस दशा में कविता ही लोगों की व्यथा को रोक सकती है, उनमें चेतना जगा सकती है।

सौन्दर्य-बोध-काव्यांश में सरल, सशक्त एवं प्रवाहमयी भाषा का प्रयोग किया गया है ‘गीत गाने’, ‘ठग ठाकुरो’ में अनुप्रास अलंकार है। ‘पाथेय’ को मानवीय मूल्यों के प्रतीक के रूप में चित्रित किया गया है। शब्दों का अत्यंत सटीक प्रयोग किया गया है।

2. भर गया है जहर से

संसार जैसे हार खाकर, 

देखते हैं लोग लोगों को,

सही परिचय न पाकर, 

बुझ गई है लौ पृथा की,

जल उठो फिर सींचने को । 

शब्दार्थ जहर विष। 

प्रसंग — प्रस्तुत काव्यांश ‘गीत गाने दो मुझे’ नामक कविता से उद्धृत है। इसके रचयिता सुप्रसिद्ध कवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ हैं।’ इन पंक्तियों में कवि ने दुनिया की भयावह स्थिति का वर्णन किया है। कवि का मानना है कि संपूर्ण विश्व विष से भर चुका है और पृथ्वी की लौ बुझ गई है। उसे पुनः जलाने के लिए कवि गीत गाना चाहता है।

व्याख्या— कवि कहता है कि पूरा संसार हार मानकर जहर से भर गया है। मनुष्य को उसकी सही पहचान नहीं मिल रही है। लोग एक-दूसरे की ओर अपरिचित निगाहों से देख रहे हैं अर्थात् मानवता हार चुकी है। लोगों का सौहार्द समाप्त हो चुका है। 

मनुष्य की जीजिविषा खत्म हो गई। है। पृथ्वी की ली बुझ गई है। इसे पुनः जगाने की आवश्यकता है। इसके लिए कवि लोगों का आह्वान करता है कि बुझती हुई ली को फिर से जागृत करने के लिए तुम जल उठो अर्थात् संसार की विसंगतियों को दूर करने के लिए संघर्षरत हो जाओ।

सौन्दर्य-बोध– इन पंक्तियों में अत्पंज सरल, सशक्त एवं प्रवाहमयी भाषा का प्रयोग किया गया है। ‘लोग लोगों’ और ‘परिचय न पाकर’ में अनुप्रास अलंकार की छटा है। ‘भर गया है जैसे हार खाकर’ में उपमा अलंकार है । शब्दों का अत्यंत सटीक प्रयोग हुआ है। में संगीतात्मकता का गुण है। संसार की विषम स्थिति का भावपूर्ण चित्रण हुआ है।

सरोज स्मृति सप्रसंग व्याख्या एवं शब्दार्थ | सरोज स्मृति मुझे सप्रसंग व्याख्या Ncert

1. देखा विवाह आमूल नवल, 

तुझ पर शुभ पड़ा कलश का जल ।

देखती मुझे तू हँसी मंद, 

होठों में बिजली फँसी स्पंद

उर में भर झूली छवि सुंदर

प्रिय की अशब्द श्रृंगार-मुखर तू खुली एक उच्छ्वास संग, 

विश्वास स्तब्ध बँध अंग-अंग नत नयनों से आलोक उतर काँपा अधरों पर थर-थर-थर देखा मैंने, 

वह मूर्ति धीति मेरे वसंत की प्रथम गीति

शब्दार्थ : आमूल-मूल अथवा जड़ तक पूरी तरह नवल नया उर हृदय, मन । स्तब्ध-स्थिर, गतिहीन उच्छ्वास ऊपर खींची गई सौंस, आह भरना, प्रोत्साहन, भरणं धीति प्यास, पान, । 

प्रसंग — प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक अंतर (भाग-2) में संकलित ‘सरोज स्मृति’

नामक कविता से उद्धृत है। इसके रचयिता सुप्रसिद्ध कवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ हैं। निराला जी ने यह शोकगीत अपनी प्रिय पुत्री सरोज के असामयिक निधन पर लिखा था। इस काव्यांश में कवि ने सरोज के विवाह के समय उसके अधरों पर खिली मुस्कान के साथ उसके अप्रतिम सौन्दर्य का वर्णन किया है।

व्याख्या— निराला जी अपनी पुत्री सरोज को संबोधित करते हुए कहते हैं कि मैंने तुम्हारा विवाह देखा। तु पूरी तरह नया रूप धारण किए हुए थी। तुझ पर कलश का शुभ जल पड़ा। उस समय तू मुझे मंद मुस्कान के साथ देखती थी। तुम्हारी वह मुस्कुराहट ओठों पर बिजली के समान कौंध रही थी। उस समय तुम्हारे हृदय में प्रिय पति की सुंदर छवि तैर रही थी। 

वह मीन शृंगार मुखरित हो रहा था। तुम्हारा रूप सौन्दर्य एक उच्छ्वास की तरह विकसित होकर जंग-प्रत्यंग में स्थिर हो गया था। यह पति के प्रति तुम्हारे प्रगाढ़ प्रेम और अचल विश्वास का प्रतीक था। लज्जा व संकोच से झुकी हुई तुम्हारी आँखों में एक नया प्रकाश उमर आया था। सौन्दर्य का वह प्रकाश आँखों से उतर कर तुम्हारा ओठों पर आ गया था, इस कारण तुम्हारे अपरों में एक स्वाभाविक कंपन हो उठा था। उस समय मैंने देखा कि मेरे वसंत की प्रथम गीति की प्यास उस मूर्ति में साकार हो उठी है।

सौन्दर्य-बोध– इन पंक्तियों में विवाह के समय सरोज के सौन्दर्य, लज्जा, संकोच आदि हाव-भाव का अत्यंत स्वाभाविक चित्रण हुआ है। तत्सम प्रधान गंभीर, सरस एवं प्रवाहमयी भाषा का प्रयोग हुआ है। ‘अंग-अंग’ तथा ‘थर-थर-थर’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है। ‘मूर्ति धीति’ में मानवीकरण अलंकार है। शब्दों का चयन अत्यंत सटीक व भावपूर्ण है।

2. श्रृंगार, रहा’ जो निराकार, 

रस कविता में उच्छ्वासितधार गाया स्वर्गीया-प्रिया-संग- भरता प्राणों में राग-रंग, 

रति – रूप प्राप्त कर रहा वही, 

आकाश बदल कर बना मही। 

हो गया ब्याह, 

आत्मीय स्वजन, 

कोई से कहीं न आमंत्रण था भेजा नहीं, 

विवाह-राग भर रहा न घर निशि-दिवस जाग;

प्रिय मौन एक संगीत भरा नव जीवन के स्वर पर उतरा ।

शब्दार्थ निराकार जिसका कोई आकार न हो। रतिरूप कामदेव की पत्नी रति जैसी रूपवती, अत्यंत सुंदर। मही पृथ्वी निशि-रात नव-नया। 

प्रसंग प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘अंतरा’ (भाग-2) में संकलित ‘सरोज स्मृति नामक कविता से ली गई हैं। इसके रचयिता सुप्रसिद्ध कवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ है।

इस काव्यांश में कवि ने सरोज के सौन्दर्य में अपनी पत्नी के रूप-रंग के दिखाई देने का वर्णन किया है। इसमें कवि द्वारा पुत्री के अत्यंत सादगी भरे विवाह को भी चित्रित किया गया है।

व्याख्या कथि अपनी पुत्री से कहता है कि मैंने अपनी रचनाओं में सौन्दर्य के जिस निराकार भाव को अभिव्यक्त किया था, वही भाव तुम्हारे रूप में साकार हो उठा। मेरी कविताओं में रस की जो उच्छ्वासित धारा बह रही थी और जिस प्रेम गीत को मैंने अपनी स्वर्गीया पत्नी के साथ मिलकर गाया था, 

वह आज भी मेरे प्राणों में अनुरागपूर्ण उत्साह का संचार कर रहा है तुम्हारे हृदय में वह सब साकार रूप में प्रकट हो गया है। राग-रंग की वही कल्पनाएँ, वही अनुपम सौन्दर्य तुम्हारे रति के समान सुंदर रूप में साकार हो गया है। ऐसा प्रतीत हो रहा है। कि मेरी ये शृंगारिक कल्पनाएँ आकाश से उतरकर पृथ्वी पर आ गई हैं।

तुम्हारा विवाह सम्पन्न हो गया, परंतु इस विवाह में कोई भी आत्मीय स्वजन नही आये। मैंने स्वयं किसी को आमंत्रित नहीं किया था। विवाह के राग-रंग मेरे घर में रात-दिन नहीं हुए, अर्थात् मेरे घर में किसी प्रकार की चहल-पहल नहीं रही। बस, एक प्रिय संगीत भरा मौन नब जीवन के स्वर पर उतर आया अर्थात् बिना किसी मुखर संगीत के चुपचाप तुम्हारा प्रेम भरा नया जीवन शुरू हो गया है।

सौन्दर्य-बोध– इन पंक्तियों में कविताओं में वर्णित शृंगार का मूर्तिमान रूप बताकर सरोज के सौन्दर्य की विशिष्टता का बोध कराया गया है ‘राग-रंग’, ‘रति रूप’ में अनुप्रास अलंकार की छटा है।  काव्यांश में मानवीकरण अलंकार है। शब्दों की योजना सराहनीय है। 

3. माँ की कुल शिक्षा मैंने दी, 

पुष्प-सेज तेरी स्वयं रची, 

सोचा मन में, 

“वह शकुंतला, 

पर पाठ अन्य यह, अन्य कला ।

” कुछ दिन रह गृह तू फिर समोद, 

बैठी नानी की स्नेह-गोद । 

मामा-मामी का रहा प्यार, 

भर जलद घरा को ज्यों अपार; 

वे ही सुख-दुख में रहे न्यस्त, 

तेरे हित सदा समस्त व्यस्त; 

वह लता वही की, 

जहाँ कली तू खिली, 

स्नेह से हिली, पली, अंत भी उसी गोद में शरण ली, 

मूंदे दुग वर महामरण !

शब्दार्थ : सेज — शय्या, विस्तर। शकुंतला — कालिदास की नाट्यकृति ‘अभिज्ञान शाकुंतलम्’ की नायिका। समोद- हर्मसहित, खुशी के साथ जलद — बादल । न्यस्त- निहित । 

प्रसंग—–प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘अंतराल’ (भाग-2) में संकलित ‘सरोज स्मृति’ नामक कविता से ली गई है। इसके रचयिता सुप्रसिद्ध कवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ हैं। इन पंक्तियों में कवि ने अपनी पुत्री सरोज के विवाह के पश्चात उसकी विदाई का वर्णन किया है। ससुराल में कुछ दिन बिताने के बाद सरोज के वापस अपनी नानी के घर आने तथा नानी की गोद में ही मृत्यु को वरण करने का वर्णन भी इस काव्यांश में हुआ है। 

व्याख्या— कवि अपनी पुत्री को संबोधित करते हुए कहता है कि तुझ मातृविहीन को मैंने ही एक माँ की सभी शिक्षाएँ दीं। तुम्हारे विवाह के उपरान्त मैने ही एक माँ के समाने अपने हाथों से तुम्हारी पुष्प-सेज सॅवारी थी। उस समय मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा थी कि तुम्हें में उसी प्रकार विदा कर रहा हूँ जिस प्रकार कण्व ऋषि ने शकुंतला को विदा किया था |

अर्थात् मेरे मन मैं भी कण्व ऋषि के समान ही असीम वेदना हो रही थी। परंतु तुम्हारी शिक्षा उस शकुंतला से अलग थी, तुम्हारी कलाएँ भी उससे भिन्न थीं अर्थात् तुम्हारा आचार-व्यवहार शकुंतला से भिन्न था। तुमने कुछ दिन अपनी ससुराल में व्यतीत किए और फिर अपनी नानी की स्नेहमयी गोद में प्रसन्नतापूर्वक बैठ गई, अर्थात् अपनी नानी के घर आ गई। वहाँ तुम्हें अपने मामा-मामी का भरपूर स्नेह मिला। 

वह प्यार उसी प्रकार का था, जिस प्रकार आकाश पर छाए बादल पूरी धरती को स्नेह रूपी जल से भर देते हैं। ये ही तुम्हारे सुख-दुख के रक्षक रहे और सदैव तुम्हारे हितचिंतक बने रहे। तुम्हारी माँ भी उसी कुल की एक लता थी, जिसमें तू एक कली के रूप में विकसित हुई। इसीलिए वहाँ तुझे अत्यधिक स्नेह मिला, तू वहाँ हिल-मिल गई और पली-बढ़ीं। इसी कारण नानी की गोद में ही तूने अंतिम शरण ली और महामरण का वरण करके अपनी आँखें सदा के लिए बन्द कर लीं।

सौन्दर्य-बोध – इन पंक्तियों में सरोज की उसके ननिहाल में मिले अपार स्नेह का अत्यंत भावपूर्ण वर्णन हुआ है। भाषा सरल एवं प्रवाहपूर्ण है। ‘पार पाट’, ‘मामा-मामी’ तथा ‘सदा समस्त’ में अनुप्रास अलंकार है। ‘भर जलद घरा को ज्यों अपार’ में उदाहरण अलंकार है। ‘रह गृह’, ‘सुख-दुख’, ‘समस्त व्यस्त’ और ‘हिली पली’ में पद मैत्री है।

4.मुझ भाग्यहीन की तू संबल युग वर्ष बाद जब हुई विकल,

दुख ही जीवन की कथा रही क्या कहूँ आज, 

जो नहीं कही! हो इसी कर्म पर वज्रपात यदि धर्म, 

रहे नत सदा माथ इस पथ पर, 

मेरे कार्य सकल हों भ्रष्ट शीत के-से शतदल ! कन्ये, 

गत कर्मों का अर्पण कर करता मैं तेरा तर्पण !

शब्दार्थ : संबल-सहारा। वज्रपात भारी विपत्ति, कठोर। तर्पण-देवताओं, ऋषियों और पितरों को तिल या तंडुलमिश्रित जल देने की क्रिया । स्पंद— कंपन। स्वजन-आत्मीय, अपने लोग। शतदल कमल । अर्पण-देना, अर्पित करना, चढ़ाना। 

प्रसंग प्रस्तुत पंक्तियों हमारी पादुयपुस्तक ‘अंतरा’ (भाग-2) में संकलित ‘सरोज स्मृति’ नामक कविता से ली गई हैं। इसके रचयिता सुप्रसिद्ध कवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ हैं। उसके विषादपूर्ण जीवन की व्यव्था को इस काव्यांश में प्रत्यक्ष अनुभव किया जा सकता है। पिता की तू ही एकमात्र सहारा थी। 

व्याख्या निराला जी अपनी पुत्री सरोज को संबोधित करते हुए कहते हैं कि मुझ रेखा। परंतु अब में व्याकुल हो गया हूँ। मेरे सारा जीवन दुख में ही बीता है। मैं अपने दुख की उस कथा को इस कविता में प्रकट कर रहा हूँ, जिसे में आज तक नहीं कह पाया था। अपने धर्म पर अडिग रहते हुए मेरे इस कर्म पर वज्रपात भी हो जाए, तब भी मेरा सिर इस मार्ग पर इन पंक्तियों में निराला जी के हृदय की वेदना अत्यंत मार्मिक शब्दों में अभिव्यक्त हुई है  झुका रहेगा। 

अर्थात् कितनी भी घोर विपत्ति आ जाए, परंतु मैं अपनी व्यथा-कथा को अभिव्यक्त करने के मार्ग से विचलित नहीं होऊंगा। यदि अपने कर्तव्य और धर्म का पालन करते हुए मे सभी सत्कार्य कमल-दल की भाँति नष्ट भी हो जाएँ, तो भी मुझे चिंता नहीं है। हे पुत्री। मैं अपने विगत के समस्त पुनीत कर्मों को तुझे अर्पित कर तेरे प्रति अपनी हार्दिक श्रद्धांजलि व्यक्त करता है। 

सौन्दर्य-बोध—काव्यांश में कवि के हृदय की असमी वेदना का मार्गिक वर्णन हुआ है। साथ ही कवि की दृढ़ इच्छाशक्ति भी प्रकट हुई है। तत्सम प्रधान भाषा का प्रयोग हुआ है। ‘शीत केली शतदल’ में उपा अलंकार है। ‘क्या कहूँ आज, जो नहीं कही’ में वक्रोक्ति अलंकार है। ‘क्या कहूँ”,” ‘पथ पर’, ‘शीत के-से शतदल’, ‘कर, करता’ तथा तेरा तर्पण’ में अनुप्रास अलंकार है ।

गीत गाने दो मुझे के प्रश्न उत्तर | Class 12 Hindi Elective Chapter 2 Question Answer

प्रश्न 1. कंठ रुक रहा है, काल आ रहा है’ यह भावना कवि के मन में क्यों आई ? 

उत्तर— 

  • (i) कंट रुक रहा है, काल आ रहा है-यह भावना कवि के मन में इसलिए आई, क्योंकि ऐसा समय आ चुका है, जिसमें जीना अत्यंत कठिन हो गया है। 
  • (ii) जीवन की राह में चोट खाते-खाते होश वालों के भी होश उड़ गए हैं। 
  • (iii) जो कुछ मूल्यवान है, वह लुट रहा है।
  • (iv) लोगों की समझ में नहीं आ रहा कि वे क्या कहें, क्या करें ? 
  • (v) विनाश का समय काल बनकर सामने खड़ा हो गया है।

प्रश्न 2. ‘ठग ठाकुरों’ से कवि का संकेत किसकी ओर है ?

उत्तर- 

  • (i) ‘ठग-ठाकुरों’ से कवि का संकेत उन लोगों की ओर है; जिन्होंने जन सामान्य के जीवन-संबल को लूटने का काम किया है।
  • (ii) इस प्रकार कवि के समाज के शोषक वर्ग को ठग ठाकुरों के रूप में चित्रित किया है। 

प्रश्न 3. ‘जल उठो फिर सींचने को’ इस पंक्ति का भाव-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए। 

  • उत्तर—भाव सौन्दर्य – (i) कवि कहता है कि पृथ्वी की ली बुझ गई है। इसको फिर से प्रज्वलित करने के लिए तुम स्वयं भी जल उठो ।
  • (ii) भाव यह है कि धरती से निराशा रूपी अंधकार को दूर करने के लिए मनुष्य को स्वयं जलकर प्रकाश देने की आवश्यकता है।
  • (iii) यहाँ संसार की विषमताओं को दूर करने के लिए कवि त्याग व संघर्ष के लिए तैयार हो जाने का आह्वान करता है। 
  • (iv) कवि का लोककल्याणकारी भाव इस पंक्ति के माध्यम से मुखरित हो उठा है।

प्रश्न 4. प्रस्तुत कविता दुख और निराशा से लड़ने की शक्ति देती है। स्पष्ट कीजिए।

  • उत्तर- (i) प्रस्तुत कविता में कवि कहता है कि संसार में जीवन की राह अत्यंत कठिन हो गई है। 
  • (ii) पूरा संसार हार मानकर जहर से भर चुका है।
  • (iii) मानवता हाहाकार कर रही है। 
  • (iv) मनुष्य की जीजिविषा समाप्त हो चुकी है। 
  • (v) ऐसी निराशा व दुखभरी स्थिति में भी कवि चुप न बैठते हुए वेदना को रोकने के लिए गीत गाने की बात कहता है। 
  • (vi) वह लोगों का आह्वान करता है कि पृथ्वी से निराशा के अंधकार को मिटाने के लिए नई आशा के साथ संघर्ष की ज्वाला प्रज्वलित कर दें।
  • (vii) इस प्रकार यह कविता दुख और निराशा से लड़ने की शक्ति देती है।

सरोज स्मृति के प्रश्न उत्तर | Class 12 Hindi Elective Chapter 2 Question Answer

प्रश्न 1. सरोज के रूप का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए । 

उत्तर:- सरोज का रूप 

  • (1) भय बनी हुई सरोज एक नवीन रूप धारण किए हुए थी। उसके ओो पर आई मुस्कान बिजली की तरह काँप रही थी। उसने हृदय में प्रियं पति की सुंदर व रमाई हुई थी। उसका रूप-सौन्दर्य एक उच्छ्वास की तरह विकसित होकर उसके प्रत्येय पर गया था। 
  • (ii) लज्जा व संकोच से झुकी हुई उसकी आँखों में एक नई आ गई थी, जो आँखों से उतर कर उसके अधरों पर भी छा गई थी। इस कारण उसके अपरों में एक स्वाभाविक कंपन हो उठा था।
  • (iii) कविताओं का निराकार सौन्दर्य उसमें साकार हो उठा था मानों कविताओं में वर्णित श्रृंगारिक कल्पनाएँ आकाश से उत्तर का धरती पर आ गई हो। 

प्रश्न 2. कवि को अपनी स्वर्गीया पत्नी की याद क्यों आई ?

  • उत्तर- (1) कवि को अपनी स्वर्गीया पत्नी की याद इसलिए आई, क्योंकि उसे अपनी पुत्री सरोज के रंग-रूप में अपनी पत्नी का रंग-रूप नजर आ रहा था। 
  • (ii) उसे सरोज के रूप में अपनी उन कविताओं का सौन्दर्य साकार दिखाई दे रहा था, जिन्हें उसने अपनी स्वर्गीया पत्नी के साथ मिलकर गाया था।

प्रश्न 3. ‘आकाश बदल कर बना मही’ में ‘आकाश’ और ‘मही’ शब्द किनकी ओर संकेत करते हैं?

  • उत्तर- (i) ‘आकात बदल कर बना महीं से कवि का तात्पर्य यह है कि उसने अपनी कविताओं में जो अद्वितीय श्रृंगारिक कल्पनाएँ की थी, ऐ उसकी पुत्री के अनुपम सौन्दर्य में साकार होकर परती पर उतर आई थीं। 
  • (ii) इस प्रकार ‘आकाश’ शब्द कवि की ‘श्रृंगारिक कल्पनाओं’ और ‘नहीं’ शब्द उसकी पुत्री ‘सरोज के सुंदर रूप’ की ओर संकेत करते हैं। 

प्रश्न 4. सरोज का विवाह अन्य विवाहों से किस प्रकार भिन्न था ? 

उत्तर-सरोज के विवाह की अन्य विवाहों से भिन्नता 

  • (1) सरोज का विवाह अत्यंत सादगी से सम्मन्न हुआ। उसमें कोई बड़ा समारोह आयोजित नहीं किया गया। 
  • (ii) सरोज के विवाह में कोई भी आत्मीय स्वजन उपस्थित नहीं था, जबकि अन्य विवाहले में वर-वधू के बहुत सारे सगे-संबंधी शामिल होते हैं।. 
  • (ii) सरोज के विवाह में आर्थिक अभाव के कारण सगे-संबंधियों को आमंत्रित नहीं किया गया था, जबकि अन्य विवाहों में सारे सगे-संबंधी बुलाए जाते हैं। 
  • (iv) विवाह में रात-दिन कभी भी मंगल गीत गायन और राग-रंग भरे मनोरंजन कार्यक्रम नहीं हुए। जबकि अन्य विवाहों में हास्य-विनोद भरे अनेक मनोरंजक कार्यक्रम होते हैं और विभिन्न रस्मों पर मंगल गीत गाए जाते हैं। 
  • (v) सरोज की माँ स्वर्ग सिधार गई थी, अतः विदाई के समय माँ के द्वारा दी जाने वाली शिक्षाएँ उसे पिता निराला जी ने ही दी।
  • (vi) विवाह में पुष्प-सेज को सजाने का कार्य महिलाएँ करती हैं, परंतु मातृविहीन होने के कारण सरोज की पुष्प-सेज पिता द्वारा ही सजाई गई। 

प्रश्न 5. शकुंतला के प्रसंग के माध्यम से कवि क्या संकेत करना चाहता है ?

  • उत्तर- (1) अपनी पुत्री सरोज को विदा करते समय कपि को कोई का प्रसंग याद आ गया। 
  • (i) इस प्रसंग के माध्यम से कवि ने यह संकेत किया है कि जिस प्रकार कप्प ऋषि ने शकुंतला को अपने हाथों से विदा कर पिता का कर्तव्य निभाया था, उसी प्रकार उसने भी अपनी मातृविहीन पुत्री को विदा करते हुए अपने कर्तव्य का पालन किया। 
  • (iii) कवि यह बताना चाहता है कि पुत्री को विदा करते उसका हृदय भी वेदना से उसी प्रकार विह्वल हो उठा था, जिस प्रकार कण्व ऋषि का हृदय हुआ था। 
  • (iv) साथ ही कवि ने यह भी स्प्ट किया है कि उसकी पुत्री सरोज की शिक्षा तथा आचरण उस शकुंतला से अलग था।

प्रश्न 6. ‘वह लता वहीं की, जहाँ कली तू खिली’ पंक्ति के द्वारा किस प्रसंग को उद्घाटित किया गया है ? 

  • उत्तर— (i) कवि कहता है कि वह लता भी वहीं की थी, जहाँ पर तू कली बन कर खिली है। 
  • (ii) इस पंक्ति के द्वारा इस प्रसंग को उद्घाटित किया गया है कि सरोज का अपने ननिहाल में ही पालन-पोषण हुआ था।
  • (iii) वह उसी कुल में एक कली के रूप में विकसित हुई, जिसमें उसकी माँ एक लता के रूप में पल्लवित पुष्पित हुई थी।

प्रश्न 7. कवि ने अपनी पुत्री का तर्पण किस प्रकार किया ?

उत्तर—कवि ने अपने विगत के समस्त पुनीत कर्मों को अपनी पुत्री को अर्पित करते हुए उसका तर्पण किया। 

प्रश्न 8. निम्नलिखित पंक्तियों का अर्थ स्पष्ट कीजिए-

(क) नत नयनों से आलोक उत्तर (ख) शृंगार रहा जो निराकार

(ग) पर पाठ अन्य यह, अन्य कला

(घ) यदि धर्म, रहे नत सदा माथ

  • उत्तर—(क) अर्थ सरोज की झुकी हुई आँखों में एक विशेष चमक आ गई थी। वह चमक उसकी आँखों से उतर कर अधरों पर छा गई। 
  • (ख) अर्थ — रचनाओं में वर्णित वह अनुपम सौन्दर्य जिसकी निराकार भाव में अभिव्यक्ति हुई थी।
  • (ग) अर्थ- सरोज की विदाई भी शकुंतला की तरह ही उसके पिता के हाथों हो रही थी, परंतु उसे शकुंतला से अलग शिक्षा मिली हुई थी और उसकी कलाएँ भी अन्य तरह की थीं अर्थात् उसका आचार-व्यवहार शकुंतला से भिन्न था।
  • (घ) अर्थ अपने धर्म पर अडिग रहते हुए मेरा सिर इसी मार्ग पर झुका रहेगा, अर्थात् मैं अपनी वेदना को अभिव्यक्त करने के पथ से विचलित नहीं होऊँगा ।


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FAQs

प्रश्न 1. कवि संसार को दुखी क्यों मानता है ? 

उत्तर—कवि जानता है कि संसार में बसने वाले मानवों में सद्गुणों की पूँजी वहने लगी है। चोरी, ठगी, मुनाफाखोरी, भ्रष्टाचार, अत्याचार आदि अपना साम्राज्य फैला चुका है। मानवीय सद्गुणों (दया, सयोग, कर्मठता) का अभाव होने लगा है।

प्रश्न 2. ‘गीत गाने दो मुझे’ शीर्षक कविता एक प्रेरक रचना है, कैसे ? 

उत्तर—जीवन संघर्ष में हानि और कठिनाई की परवाह किये बिना अवरोधों को पार करते जाना ही जिन्दगी है। आशा और योजना के सहारे नित आगे बढ़ते जाने का संदेश भी प्कविता से मिलती है।

प्रश्न 3. होश वालों के भी होश क्यों छूट रहे हैं ?-‘गीत गाने दो मुझे पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए ।

उत्तर- (1) मानव जीवन अत्यधिक कठिन हो गया है।
(iii) कदम-कदम पर मुसीबतों का सामना करना पड़ रहा है। 
(iii) इस प्रकार जीवन में बार-बार संकट आ जाने के कारण होश वालों के भी होश छूट रहे हैं। कठिनाइयों भरा जीवन जीना बहुत मुश्किल हो गया है।

प्रश्न 4. कवि की कविताओं की शृंगारिक कल्पना किस रूप में साकार हुई ?

उत्तर- (i) कवि ने अपनी कविताओं में सौन्दर्य के जिस निराकार भाव को अभिव्यक्त “किया था, वह अनुपम सौन्दर्य, कल्पना रूपी आकाश से उतरकर धरती पर मूर्तिमान हो उठा था।
(ii) कवि के राग-रंग की वे शृंगारिक कल्पनाएँ रति के समान आकर्षक व दिव्य सौन्दर्य लिए हुए कवि की पुत्री सरोज के रूप में साकार हो उठीं। 

प्रश्न 5. विवाह के समय सरोज के अधरों पर कंपन क्यों आ गया था ? 

उत्तर— (i) विवाह के समय सरोज का मन नवीन उल्लास से भरा हुआ था। 
(ii) उसके हृदय में उसके प्रिय पति की सुंदर छवि समाई हुई थी। 
(iii) उस समय सुंदर पति को देखकर उसका रूप सौन्दर्य उच्छ्वास की तरह विकसित होकर अंग-प्रत्यंग पर छा गया था।
(iv) लज्जा व संकोच से उसकी आँखें झुक गईं, उनमें एक अद्भुत चमक आ गई।
(v) वह चमक आँखों से उतरकर उसके अधरों पर आ गई।
(Vi) इसी कारण सरोज के अधरों पर एक स्वाभाविक कंपन आ गया।

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