Class 12 Hindi Important Questions 2023 Pdf

WhatsApp Group (Join Now) Join Now
Telegram Group (Join Now) Join Now

Class 12 Hindi important questions 2023 pdf, Ncert Class 12 Hindi important questions 2023 pdf, cbse Class 12 Hindi important questions 2023 pdf, Class 12 Hindi important questions chapter ncert

Class 12 hindi important Questions 2023 pdf

Class12th 
Book NCERT
SubjectHindi Core
Medium Hindi
Study MaterialsImportant questions answers
Download PDFClass 12 hindi important questions 2023 pdf

Ncert Class 12 Hindi Important Questions 2023 Pdf

Class 12 Hindi Important Questions 2023 Pdf

खण्ड ‘क’


1. निम्नलिखित काव्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए :

शांति नहीं तब तक, जब तक

सुख-भाग न नर का सम हो, नहीं किसी को बहुत अधिक हो नहीं किसी को कम हो।

स्वत्व माँगने से न मिले, संघात पाप हो जाएँ। बोलो धर्मराज, शोषित वे

जिये या कि मिट जाएँ ? न्यायोचित अधिकार माँगने

से न मिले, तो लड़ के तेजस्वी छीनते समर को,

जीत, या कि खुद मर के।

(क) शांति के लिए क्या आवश्यक है ?

(ख) कौन-सा युद्ध निष्याप प है ?

(ग) धर्मराज से पूछे गए प्रश्न कौन से हैं?

(घ) तेजस्वी लोगों की क्या पहचान है ?

(ङ) उपर्युक्त काव्यांश का सार अपने शब्दों में लिखें ।

Ans. (क) शांति के लिए आवश्यक है-सुख के साधनों की समानता ।

(ख) जो युद्ध न्यायपूर्ण अधिकारों को पाने के लिए किया जाता है, वह निष्पाप होता है।

(ग) हे धर्मराज, अगर अपने अधिकार माँगने से न मिले और उन्हें पाने के लिए संघर्ष किया जाए तो उसे पाप कहा जाए ऐसी स्थिति में शोषित लोग कहाँ जाएँ? वे जीवित कैसे रहें? क्या वे मर जाएँ?

(घ) तेजस्वी लोगों की पहचान यह है कि वे अपने अधिकारों को पाने के लिए संघर्ष करते हैं। वे या तो अपने हक छीनकर ले लेते हैं या लड़ते-लड़ते मर जाते हैं।

(ङ) न्यायोचित संघर्ष उचित है।

Q. 2. निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर नीचे पूछे गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए :

अनुशासन समाज के नैतिक नियमों का भी हो सकता है और कानून की धाराओं का भी। उदाहरण के लिए किसी भी मंदिर, गुरुद्वारे या मस्जिद में जाने के पहले जूते उतार देना धार्मिक अनुशासन का पालन है। सड़क पर बायीं ओर चलना या जहाँ जाना मना हो, वहाँ न जाना, कानून के अनुशासन का पालन है। समय का पालन करना सामाजिक नियमों का पालन है। ठीक समय पर कहीं पहुँचना अनुशासन भी सिखाता है और लाभ भी पहुँचाता है। 

हमें हर तरह के अनुशासन का सामान्य ज्ञान होना ही चाहिए, जैसे किसी सभा में शोर मचाना अनुचित है। किसी वक्ता को अपनी बात कहने का मौका न देना अशिष्टता है। राष्ट्रगान के अवसर पर बैठे रहना या चलना या झूमना अशिष्ट व्यवहार है। 

जहाँ सब लोग बैठे हों वहाँ लेट जाना या पैर फैलाकर बैठना बहुत अनुचित है। कभी-कभी थक जाने पर इच्छा होती है कि कुरसी पर पैर रेखकर बैठें या चारपाई पर निढाल होकर पड़े रहें। अन्य लोगों की उपस्थिति में हमें अपनी ऐसी इच्छा को दबा देना चाहिए। अपने मन को संयम में रखना शिष्ट व्यवहार के लिए अत्यंत आवश्यक है।

(क) सड़क पर बायीं ओर चलना किस प्रकार के अनुशासन का पालन है ?

(ख) धार्मिक अनुशासन से क्या अभिप्राय है ?

(ग) तरह-तरह के के अनुशासन कौन-से हैं ?

(घ) सामाजिक, नैतिक और धार्मिक से भाववाचक संज्ञा बनाइए ।

(ङ) उपर्युक्त गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक दीजिए ।

Ans. (क) सड़क पर बायीं ओर चलना कानून के अनुशासन का पालन है।

(ख) धार्मिक अनुशासन का अभिप्राय है धार्मिक स्थलों पर उनके धार्मिक नियमों का पालन करना। जैसे किसी मंदिर, गुरुद्वारे या मस्जिद में प्रवेश करने के पहले जूते उतार देना।

(ग) तरह-तरह के अनुशासन में ये सब आते हैं-किसी सभा में शोर नहीं मचाना, वक्ता को अपनी बात कहने का मौका देना, राष्ट्रगान के अवसर पर सावधान की मुद्रा में रहना, जहाँ सय लोग बैठे हों बहीं पैर पसारकर नहीं बैठना या नहीं लेटना आदि।

(घ) सामाजिक सामाजिकता; नैतिक नैतिकता; धार्मिक पार्मिकता।

(ड) अनुशासन का महत्व।


खण्ड ‘ख’


Q. 3. निम्नलिखित में से किसी एक विषय पर एक निबन्ध लिखिए 10

(क) यदि मैं झारखंड का मुख्यमंत्री होता ।

(ख) पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं । 

(ग) आत्मविश्वास का महत्व 

(घ) राष्ट्र के निर्माण में छात्रों की भूमिका 

Ans. (क) यदि मैं झारखंड का मुख्यमंत्री होता

‘प्रभुता पाई को न मदमाही’ यानि प्रभुता या सत्ता पाने पर कीन मद में चूर नहीं होता। तुलसीदास जो कह गये हैं वह आज पूरी तरह चरितार्थ हो रहा है। मुख्यमंत्री बनने पर या प्रधानमंत्री बनने पर लोगों का कष्ट भूल जाते हैं। भ्रष्टाचार और अपराधीकरण को बढ़ावा देते हैं। लेकिन में ऐसा मुख्यमंत्री नहीं बनना चाहता। यदि में झारखंड का मुख्यमंत्री होता या होऊँ तो में राज्य में क्या करता या करूंगा यह तो जनता देखती या देखेगी। 

बस एक बार मौका तो मिले। में दिखा दूँ कि राज्य कर चहुमुखी विकास कैसा होता है। यदि में झारखंड का मुख्यमंत्री बन जाऊँ तो सर्वप्रथम जनता की बुनियादी सुविधाओं की ओर विशेष ध्यान दूँगा। सर्वप्रथम राज्य को भ्रष्टाचार मुक्त बनाऊँगा । राज्य को स्वच्छ प्रशासन देकर नोकरशाही को दुरुस्त करूंगा जो काफी हद तक बिगड़ चुकी है।

अभी चारों ओर अराजकता का बोलबाला है। आये दिन अपराध की घटनाएँ बढ़ रही है। रात तो रात, दिन-दहाड़े अपराध हो रहे हैं। पर से निकला हुआ व्यक्ति चाहे वह पुरुष हो या महिला, जब सुरक्षित घर वापस आ जाता है तो वह राहत की साँस लेता है। 

वरन किसी को नहीं पता कि कब किसी की इज्जत लुट जाय, किसी की हत्या हो जाय। आज अपराधों का राजनीतिकरण हो गया है। अपराधियों को राजनेताओं द्वारा संरक्षण दिया जा रहा है। यदि में मुख्यमंत्री हुआ तो कानून-व्यवस्था की बिगड़ती हालत को सबसे पहले सुपारूंगा।

किसी भी राज्य के मुख्यमंत्री का दायित्व बनता है कि वह राज्य में चतुर्दिक विकास पर ध्यान दे। आज विकास का कार्य रुका हुआ है। बिजली की समस्या बनी हुई है। झारखंड में पानी की भी समस्या है। यातायात की समस्या है। विधि-व्यवस्था चरमरा गयी है। बेरोजगारी सुरसा के मुँह की तरह बढ़ती जा रही है। किसानों एवं मजदूरों का शोषण जारी है। शिक्षा का स्तर गिर गया है। 

यदि में झारखंड का मुख्यमंत्री होता तो उपर्युक्त समस्याओं का हल अतिशीघ्र निकालने का प्रयत्न करता। बिजली आपूर्ति नियमित करवाता, गाँवों तक को पेयजल के संकट से मुक्त करता। सड़क तो ऐसी बनवाता कि लोग जो भी एक बार झारखंड राज्य के दौरे पर आते तो यहाँ की सड़कों का उदाहरण पेश करते कि हाँ, सड़क है तो झारखंड में। 

बेरोजगारी दूर करने के लिए नये उद्योग-धंधों, कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देता। शिक्षा को रोजगारोन्मुखी बनाता ताकि । आगे बेरोजगारी न बढ़े। किसानों को सस्ते दामों में बीज, खाद, कृषि उपकरण आदि उपलब्ध करवाता।

हमारा राज्य खनिज संपदा में अग्रणी है, लेकिन इसमें होने वाली आय का समुचित अंश केन्द्र द्वारा राज्य को नहीं दिया जा रहा है। में इसके लिए भी केन्द्र सरकार पर दबाव डालता। यानि में यदि झारखंड का मुख्यमंत्री होता तो पूरी निष्ठा से अपने को राज्य के प्रति समर्पित कर उसका सर्वांगीण विकास करता। लोग देखते, यहाँ की जनता खुशहाल होती और अन्य राज्यों की जनता मेरा उदाहरण देते कि वाह ! मुख्यमंत्री हो तो झारखंड के मुख्यमंत्री जैसा। दूसरे राज्यों की जनता भी यहीं आकर बसने को तरसती।

धोरी, डकैती, हत्या, आदि अपराध का नामो-निशान मिटा देता। राज्य को पूरी तरह अपराधमुक्त बना देता।

Q. 4. अपने नगर में बिजली की आपूर्ति को नियमित कराने के लिए बिजली बोर्ड के अध्यक्ष को एक पत्र लिखिए । 

Ans.

सेवा में,

अध्यक्ष, विद्युत् बोर्ड, झारखंड विषय-बिजली की अनियमित आपूर्ति से संबद्ध।

महाशय,

मैं पाकुड़ क्षेत्र के निवासियों की ओर से विद्युत् की अनियमित आपूर्ति के संबंध में कुछ निवेदन करना चाहता हूँ।

विगत चार महीनों से पाकुड़ में विद्युत् की आपूर्ति में घोर अनियमितता है। 24 घंटे में मुरिकल से कुल मिलाकर दो-ढाई घण्टे तक बिजली के दर्शन होते है। शेष घण्टों में घोर तबाही, बेचैनी देकर बिजली गायब रहती है। बिजली की आपूर्ति की इस गड़बड़ी से सामान्य जन-जीवन अस्त-व्यस्त है। 

खेतों का मोटर पम्प से होने वाला सिंचाई कार्य रुका हुआ है जिससे फसलें सूख रही है। शहर के भीतर-बाहर करीव सात-आठ बड़े औद्योगिक संस्थान है जो विद्युत् आपूर्ति के अभाव में मृतप्राय है । संध्या सात बजे होते ही शहर-बाजार की सारी दुकानें बन्द हो जाती है। रात्रि के इस भयावह अंधकार में चोरी डकैती की घटनाएँ होती रहती है। इस संबंध में स्थानीय विद्युत अनुमंडल पदाधिकारी से कई बार सम्पर्क स्थापित

कर तथा कई बार लिखित सूचना के आधार पर अपेक्षित कार्रवाई कराने का प्रयास किया गया है, लेकिन परिणामस्वरूप केवल निराशा ही हाथ लगी है ।

अतः में इस समस्या और इससे उत्पन्न दुर्दशा की ओर श्रीमान का ध्यान आकृष्ट करना चाहता हूँ और निवेदन करता हूँ कि इस सम्बन्ध में तत्काल उचित कार्रवाई की जाए ।

भवदीय तिथि: 26 जून, 200….

शिवमोहन

पाकुड़, बार्ड न. 5

Q. 5. शहर में बढ़ती आपराधिक घटनाओं पर एक रिपोर्ट लिखिए । अथवा, ‘नक्सलवाद का समाधान’ विषय पर एक आलेख लिखिए।

Ans. दिनांक 15-08-200…. को संध्या के समय कुछ अज्ञात युवकों ने इंदिरा नगर के पार्क से छः वर्षीय कन्या का अपहरण कर लिया था। कुछ ही घंटो बाद उस कन्या की तलाश पार्क में पड़ी मिली। इस दिल दहला देने वाली घटना पर रोष व्यक्त करने के लिए इंदिरा नगर के महत्वपूर्ण नागरिक, नगर की कई संस्थाओं के प्रतिनिधि इकट्ठे हुए तथा नगर की कानून-व्यवस्था पर चिंता व्यक्त की। जोश और रोष से भरी इस बैठक में निश्चय किया गया कि-

(i) अधिक-से-अधिक संख्या में नगर के बाजारों से होते हुए विशाल जुलूस निकाली जाए।

(ii) नगर की दुकाने तथा व्यावसायिक प्रतिष्ठान बंद रखे जाएँ। 

(iii) अपराधियों को पकड़ने और दंडित कराने के लिए प्रशासन पर दबाव बनाया जाए।

(iv) मृतक के संबंधियों ने न्याय की गुहार करते हुए राजनीतिक दलों से प्रार्थना की कि वे इस मामले में राजनीतिक दावपेंच को दूर रखें।

अथवा, पिछले सप्ताह नक्सली हिंसा से प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों और आत्ता अफसरों की बैठक में प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने खुद स्वीकार किया कि नक्सलवाद अब हमारी आंतरिक सुरक्षा सुरक्षा के लिए सबसे गंभीर खतरा बन गया है। 

गत रविवार को छत्तीसगढ़ में सुरक्षाकर्मियों पर नक्सलियों का हमला भी इसी बात का सबूत है। हमारे यहाँ राजनेता बहुत बड़ी-बड़ी समस्याओं को बहुत हल्के ढंग से लेते हैं और उनके समाधान को ईमानदारीपूर्वक कोशिश के बजाय निबटाने वाले अंदाज में सिर्फ अपना पीछा छुड़ाते हैं।

नक्सलवाद के अब तक के इतिहास पर अगर नजर डाली जाए तो भी यही बात सामने आती है। इसकी शुरुआत सन् 1967 में पश्चिम बंगाल में एक छोटे से गाँव नक्सलवाड़ी से किसान आंदोलन के रूप में हुई थी, लेकिन आज देश के तेरह राज्यों के 160 जिले इससे प्रभावित है। 

ऐसा तब है जब पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर राय अपने समय में यह दावा कर चुके थे कि नक्सलवाद को उन्होंने समूल नष्ट कर दिया है। ऐसा लगता है कि उस समय नक्सलवाद नष्ट नहीं हुआ, सिर्फ दब भर गया था। सरकार की कार्रवाई के भय से सभी नक्सली या तो छिप गए थे या फिर आसपास अन्य राज्यों में भाग गए थे। 

दूसरे राज्यों में जाकर वे अपने आंदोलन को धीरे-धीरे विस्तार देते रहे और संगठन को मजबूत चनाते छे। आज वही थोड़े से नक्सली इस स्थिति में पहुँच गए है कि प्रधानमंत्री बने कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों और प्रमुख अधिकारियों की बैठक बुलाकर इससे निबटने के उपायों पर विचार करना पड़ रहा है। यहाँ यह बात गौरतलब है कि आतंकवाद और नक्सलवाद की प्रकृति में

मौलिक अंतर है। यह सभी मानते हैं कि नक्सलवाद सिर्फ कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं है। इसके मूल में सामाजिक-आर्थिक कारण बहुत नारे स्तर पर निहित है पर उनका निदान बहुत जरूरी है। यह समार चढ़ता चाहिए कि आतंकवाद धर्म और भावनात्मक मुद्दों का सहारा लेकर आगे बढ़ता है, जबकि नक्सलवाद जमीन, जंगल और धन रुक की बात करके भूमिहीन मजदूरों और आदिवासियों की सहानुभूति बटोरता है। 

समाज के सुविधा-संपन्न वर्गों के शोषण शिकार और विकास के समाम लाभों से पूरी तरह वंचित हाशिए पर जीने को मजबूर इन्ती लागों की सहानुभूति का फायदा उठाकर नक्सलियों ने खुद को पहले खूब मजबूत किया है और उसके बाद हमले की रणनीति अपनाई है। अब उनका दुस्साहस इस हद तक बढ़ गया है कि कहीं तो वे जेल तोड़ डालते है, कही ट्रेन का अपहरण कर बैठते हैं और कही सुरक्षाकर्मियों पर हमला कर डालते हैं।

Q. 6. ‘मोबाइल की उपयोगिता’ विषय पर एक फीचर लिखिए। अथवा, ‘झारखंड के पर्यटन स्थल’ पर एक फीचर लिखिए । 

Ans. तेजी से बदलती दुनिया में संचार क्षेत्र में चमत्कारिक परिवर्तन हुए हैं। इन्हीं परिवर्तनों की एक कड़ी मोबाइल सेवा है। मोबाइल फोन त्यरित संप्रेषण का मुख्य साधन है। मोवाइल लोगों के लिए एक आवश्यकता की वस्तु बनता जा रहा है। इस सुविधा का उपयोग करने के बाद इसके बिना अधूरेपन का अहसास होता है। मानव का जीवन इस सेवा से आसान हो गया है। मगर सुविधा के साथ असुविधा भी होती है।

वर्तमान में मोबाइल फोन में इतनी सुविधाएँ आ गई है कि उपयोग करने बाला सारा दिन व्यस्त रहता है। एस.एम.एस., रेडियो, खेल, कैमरा और टेपरिकार्डर आदि अनेक सुविधाएँ लोगों को आकर्षित करती है। हम इसके जरिए एक-दूसरे के संपर्क में रहते हैं। 

आज इंतजार का जमाना नहीं है। आज चिट्ठी-पत्रों का काम मोबाइल के माध्यम से होता है। धीरे-धीरे यह सेवा सामाजिक प्रतिष्ठा का विषय बन गई है। बच्चे, बूढ़े, युवा, महिला जेब में मोबाइल बजता सुनाई देता है। हर किसी की अनेक सुविधाएँ होते हुए भी मोवाइल फोन असुविधा पैदा करता है। कंपनियों नित नई प्रतियोगिताओं के ऑफर दे रही है। इनमें फँसकर आदमी धन व समय दोनों बर्बाद करता है। 

मोबाइल फोन से अदृश्य किरणें निकलती हैं जो हमारे स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं हैं। मोवाइल के निरंतर प्रयोग से चिड़चिड़ापन बढ़ जाता है। इसके प्रयोग से अनेक प्रकार की मानसिक उलझने खड़ी हो जाती है। मोबाइल के कारण समाज में आपराधिक गतिविधियाँ बढ़ी है। अचानक बजी मोबाइल की घंटी से हृदय पर असर पड़ता है जो धीरे-धीरे बड़ी समस्या को जन्म दे सकता है।

अथवा, 

झारखंड के पर्यटन स्थलों का भारत में महत्वपूर्ण स्थान है। यह प्रदेश अनेक पौराणिक एवं ऐतिहासिक पर्यटन स्थलों के मुक्त है। यहाँ अभ्यारण्यों एवं जल-प्रपातों की भी अधिक माप्त है। देवधर जिले का ‘वैद्यनाथ धाम’ को भला कौन नहीं जानता, जहाँ प्रतिवर्ष श्रावण मास में श्रद्धालुओं की संख्या संपूर्ण भारत से उमड़ पड़ती है। पलामू के बेतला राष्ट्रीय उद्यान का राष्ट्रीय अभ्यारण्यों में महत्वपूर्ण स्थान है। इस प्रवेश में ऐसे अनेक प्राकृतिक स्थल है, जरूरत है उन्हें पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की, पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए नेतरहाट का सूर्यादय एवं सूर्यास्त अपनी शानी नहीं रखता। प्रदेश के अन्य जिली जैसे हजारीबाग, राथी, गिरिडीह, गुमला आदि में पर्यटन स्थल भरे पड़े हैं। 

Q. 7. निम्नलिखित काव्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए:

मैं जग-जीवन का भार लिए फिरता हूँ, फिर भी जीवन में प्यार लिए फिरता हूँ,

कर दिया किसी ने झंकृत जिनको छूकर मैं साँसों के दो तार लिए फिरता हूँ।

(क) ‘जग-जीयन के भार’ से कवि का क्या अभिप्राय है ?

(ख) कवि की किस मनोदशा का वर्णन है ? 

(ग) ‘किसी ने’ में कवि का क्या संकेत है ?

(घ) कवि जीवन में क्या लिए घूमता है ? 

अथवा, 

तिरती है समीर सागर पर

अस्थिर सुख पर दुख की छाया – जग के दग्ध हृदय पर निर्दय विप्लव की प्लावित माया-

यह तेरी रण-तरी भरी आकांक्षाओं से,

घन, मेरी-गर्जन से सजग सुप्त अंकुर

उर में पृथ्वी के, आशाओं से नवजीवन की, ऊंचा कर सिर, ताक रहे हैं, ऐ विप्लव के बादल ।

(क) ‘अस्थिर सुख पर दुख की छाया’ किसे कहा गया है ? 

(ख) ‘जग के दग्ध हृदय का प्रयोग किस अर्थ में किया गया है ?

(ग) बादलों के विप्लवी रूप की व्याख्या कीजिए। 

(घ) बादल निर्देय विप्लव क्यों मचा रहे हैं ?

Ans. (क) ‘जग-जीवन का भार’ से कवि का अभिप्राय है सांसारिक जिम्मेदारियाँ निभाने का दायित्व जिसे कवि को निभाना पड़ता है। 

(ख) कवि के हृदय में किसी का प्रेम झंकृत हो रहा है। यह अपने प्रिय को देना चाहता है किन्तु सांसारिक बाधाओं के कारण यह ऐसा नहीं कर पाता है।

(ग) ‘किसी ने’ से कवि का संकेत अपने प्रिय की ओर है जो दूसरों के लिए अज्ञात है। वह प्रिय कवि की प्रेमिका हो सकती है या कोई मित्र या परमात्मा हो सकता है।

(घ) कवि जीवन में अपने प्रिय को प्रेम देने की लालसा लिये घूमता है। 

अथवा, 

(क) ‘अस्थिर सुख पर दुख की छाया’ सागर के समीर पर मंडराते बादलों को कहा गया है। 

(ख) ‘जग के दग्ध हृदय’ का प्रयोग शोषितों की वेदना को लक्ष्य कर किया गया है। बादलों का विप्लवी रूप चहुत भयंकर है। उसका रूप युद्ध की नौकर के समान है। उसका गर्जन-तर्जन ही मानों उसकी रणभेरी है। लोगों के निर्मम शोषण से बादल व्यथित है, इसलिए वे निर्दय विप्लव मचा रहे हैं।

Q. 8. निम्नलिखित काव्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए: 

रक्षाबंधन की सुबह रस की पुतली छायी है घटा गगन की हलकी-हलकी बिजली की तरह चमक रहे हैं लच्छे भाई को है बाँधती चमकती राखी ।

(क) भाव-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए । 

(ख) काव्यांश में प्रयुक्त अलंकारों पर प्रकाश डालिए ।

Ans. (क) भाई-बहन का त्योहार रक्षाबंधन का सजीव वर्णन है। यहाँ दृश्य देखा जा सकता है। भाषा प्रवाहमयी एवं सहज है।

(ख) ‘हलकी-हलकी’ में पुनरुक्ति अलंकार है।’ विजली की तरह चमक रहे है, में उपमा अलंकार है। छंद रुचाई है।

Q. 9. निम्नलिखित प्रश्नों में से किन्हीं दो के उत्तर दीजिए: 

(क) छोटे चौकोने खेत को कागज का पन्ना कहने में क्या अर्थ निहित है?

(ख) भोर के रंग को राख से लीपा गीला चौका क्यों कहा गया है? 

(ग) ‘कवितावली’ के छंदों के आधार पर बताइए कि तुलसीदास को अपने युग को आर्थिक विषमता की अच्छी समझ है। 

Ans. (क) कवि कागज के पन्ने को छोटे-से चौकोने प्रेत के रूप में देख रहा है। यह यह कहना चाहता है कि में भी कृषि कार्य करता हूँ। कागज मेरा खेत है जिसने में भाव के बीज बोता हूँ, कल्पना का खाद-पानी देता हूँ। उसमें शब्द के अंकुर फूटते है। छंद-लय, बिंवादि के पत्र-पुष्प आते हैं। रस रूपी फल आता है। अतः ‘छोटे चौकने खेत को कागज का पन्ना’ कृषि कर्म व काव्य-कर्म में समानता बताने के लिए कहा गया है। 

(ख) राख से लीपे गीले चौके में पानी की मात्रा (नमी) होती है। उसमे नीलिमा और श्वेतवर्ण का मिश्रण होता है। भोर के नम में भी नमी (ओस कणों) की मात्रा होती है। उसने भी श्वेतवर्णी नीलिमा होती है। इसी कारण कवि ने भोर के नभ की तुलना राख से लीपे गीले धौके से की है।

(ग) तुलसी युग के नायक है, लोकनायक है। उनको तत्कालीन समाज का ज्ञान है। निरंकुश शासकों के इस युग में किसान, श्रमजीवी, व्यापारी, सरकारी कर्मचारी, कलाकार सभी पेट की ज्वाला बुझाने में व्यस्त रहते थे। जो जित व्यवसाय को चाहता था, उसको अवसर नहीं था। भयंकर निर्धनता थी। सब लाचारी और बेवसी अनुभव करते थे। जाति-प्रथा का जोर था। अतः तुलसी ने अपने युग की आर्थिक विषमता का सजीव चित्रण किया है। 

Q.10. निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर उस पर आधारित प्रश्नों के उत्तर लिखिए: 

किसी भी आदर्श समाज में इतनी गतिशीलता होनी चाहिए जिससे कोई भी बाछित परिवर्तन समाज के एक छोर से दूसरे तक संचारित हो सके। ऐसे समाज के बहुविधि हितों में सबका भांग होना चाहिए तथा सबको उनकी रक्षा के प्रति सजग रहना चाहिए। 

सामाजिक जीवन में अवाथ संपर्क के अनेक सायन य अवसर उपलब्ध रखने चाहिए। तात्पर्य यह कि दूध-पानी के मिश्रन की तरह भाईचारे का यही वास्तविक रूप है, और इसी का दूसरा नाम लोकतंत्र है। क्योंकि लोकतंत्र केवल शासन की एक पद्धति ही नहीं है, लोकतंत्र मूलतः सामूहिक जीवनचर्या को एक रीति तथा समाज के सम्मिलित अनुभवों के आदान-प्रदान का नाम है।

(क) आदर्श समाज के क्या लक्षण होते हैं ? 

(ख) लोकतंत्र के विषय में लेखक के क्या विचार हैं ?

(ग) गद्यांश का आशय स्पष्ट कीजिए । 

(घ) पाठ का शीर्षक तथा लेखक का नाम लिखिए ।

Ans. (क) आदर्श समाज गतिशील होता है और गतिशीलता या परिवर्तन से सभी लोग लाभान्वित होते हैं। बहुबिधि में सबकी भागीदारी होती है तथा उसकी रक्षा में सभी सजग रहते हैं। सामाजिक जीवन में अबाय संपर्क के अनेक साधन मौजूद रहते है। 

(ख) लोकतंत्र के विषय में लेखक का विचार है कि लोकतंत्र का साप दूप और पानी के मिश्रण की तरह होना चाहिए। लोकतंत्र यास्तव में सामूहिक दिनचर्या की रीति तथा समाज के सम्मिलित अनुभवों के आदान-प्रदान का नाम है। 

(ग) गद्यांश का आशय है कि सामाजिक संबंध दूध और पानी के मिश्रण की तरह वास्तविक होना चाहिए। मिश्रण में पानी का अलग अस्तित्व नहीं रह जाता है। उसी प्रकार ऐसे समाज का गठन हो जिसमे ऊँच-नीच का ज्ञान ही न रहे यानि भेद-भाव मिट जाय। 

(घ) पाठ है-श्रम विभाजन और जाति प्रथा तथा लेखक है-याबा साहेब भीमराव अम्बेदकर।

अथवा

इन बातों को आज पचास से ज्यादा बरस होने को आए पर ज्यों की त्यों मन पर दर्ज हैं। कभी-कभी कैसे-कैसे संदभों में ये बातें मन को कचोट जाती है, हम जाज देश के लिए करते क्या है? मॉने हर क्षेत्र में बड़ी-बड़ी है पर त्याग का कहीं नाम-निशान नहीं है। 

अपना स्वार्थ आज एकमात्र लक्ष्य रह गया है। हम चटखारे लेकर इसके या उसके प्रष्टाचार की बातें करते हैं पर क्या कभी हमने जाँचा है कि अपने स्तर पर अपने दायरे में हम उसी भ्रष्टाचार के अंग तो नहीं बन रहे हैं? काले मेघा दल के दल उमड़ते हैं, पानी अमझम बरसता है, पर गगरी फूटी की फटी रह जाती है, बेल पियासे के पियासे रह जाते हैं? आखिर कब बदलेगी यह स्थिति ? 

(क) कौन-सी बातें लेखक के मन को कचोटती हैं ?

(ख) भ्रष्टाचार के लिए जिम्मेदार कौन है ?

(ग) ‘पर गगरी फूटी की फूटी रह जाती है’ का आशय स्पष्ट कीजिए। पाठ का शीर्षक तथा लेखक का नाम लिखिए ।

(घ) Ans. (क) पचास वर्षों के बाद भी कोई परिवर्तन नहीं हुआ, भारत की पह स्थिति लेखक के मन को कचोटती है। माँगे बढ़ी-बड़ी है, किन्तु त्याग कहीं नहीं।

(घ) भ्रष्टाचार के लिए जिम्मेदार उच्च पदों पर आसीन नेता और अधिकारीगण है जो ऊपर ही ऊपर पी जाते हैं।

(ग) काले मेधा घनघोर बरसते हैं किन्तु फूटी गगरी में जल नहीं रह पाता, उसी प्रकार योजनाओं के लिए बड़ी धनराशि निर्धारित की जाती है, विदेशों से भी काफी धन आता है, किन्तु गरीब जनता तक नहीं पहुँच पाता उनका अंश। अतः जनता गरीव थी गरीब ही रह जाती है।

(घ) पाठ है- ‘काले मेधापानी दे’ तथा लेखक है-पर्मवीर भारती। 

Q. 11. निम्नलिखित में से किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर दीजिए 

(क) बाजार का जादू चढ़ने और उतरने पर मनुष्य पर क्या-क्या असर पड़ता है ?

(ख) जाति-प्रथा भारतीय समाज कारण कैसे बनती रही है में बेरोजगारी व भूखमरी का ? क्या वह स्थिति आज भी है ? भी एक

(ग) गाँव में महामारी फैलने और अपने बेटों के देहांत के बावजूद लुट्टन पहलवान डोल क्यों बजाता रहा ?

(घ) चार्ली अपने ऊपर सबसे ज्यादा कब हँसता है ?

(ङ) बाजार दर्शन से क्या अभिप्राय है ? पठित पाठ

के आधार पर उत्तर लिखिए ।

Ans. (क) (i) बाजार के जादू चढ़ने का प्रभाव जिस प्रकार चुंबक लोहे को अपनी ओर खींचता है, उसी प्रकार बाजार का जादू चढ़ने पर मनुष्य उसकी ओर आकर्षित होता है। यह जादू उसकी जेवें खाली किंतु मन भरा होने पर भी चल जाता है। उसे मालूम होता है कि में यह सामान लूँ, वह भी लूँ। उसे सभी सामान जरूरी और आराम बढ़ाने वाले मालूम होते हैं। 

(ii) बाजार के जादू के उतरने का प्रभाव-मनुष्य पर जादू के उतरने का प्रभाव होते ही उसे पता चलता है कि फैसी चीजों की बहुतायतता आराम में मदद नहीं देती, बल्कि खलल ही डालती है। उसे लगने लगता है कि इससे थोड़ी देर को स्वाभिमान को जरूर सेंक मिलता है, पर इससे अभिमान की गिल्टी को और खुराक ही मिलती है।

(ख) जाति-प्रथा भारतीय समाज है। इसके में बरोजगारी और भूखमरी का कारण रही युग के कारण कोई भी व्यवसाय एकदम मूल में कारण है कि आज के युग

बंद हो जाता है। इस कारण से मनुष्य को अपना पेशा बदलने को विवश होना पड़ता है, परंतु भारतीय समाज में व्यक्ति को पैतृक पेशा छोड़ने की इजाजत नहीं है। लेकिन वर्तमान संदर्भ में अपने देश में यह स्थिति बहुत कम देखने को मिलती है।

(ग) लुटटन पहलवान गाँव में महामारी फैलने और अपने बेटे के देहांत के बावजूद डोल में अपने आपको जिलाए रखने और भूख व महामारी से दम तोड़ रहे गाँव को मोत से लड़ने की ताकत देने के लिए ढोल बजाता रहा।

(प) चार्ली स्वयं पर सबसे ज्यादा तब हँसता है, जब यह स्वयं को गर्वोन्मत्त, आत्म-विश्वास से लबरेज, सफलता, सभ्यता, संस्कृति तथा समृद्धि की प्रतिमूर्ति, दूसरों से ज्यादा शक्तिशाली तथा श्रेष्ठ, अपने ‘बजादपि कठोराणि’ अथवा ‘मृदूनि कुसुमादपि’ क्षण में दिखलाता है। तब ही ऐसा कुछ कर बैठता कि वह हास्य का पात्र बन जाता है।

(छ) पाठ के आधार पर बाजार दर्शन का अभिप्राय है उपभोक्ता और विक्रेता का संबंध बतलाना। साथ ही उपभोक्ता की मनःस्थिति का परिचय कराना, बाजार की सार्थकता को वही पहचान सकता है जो जानता है कि वह क्या चाहता है जो इसे नहीं जानता है वह अपनी क्रय-शक्ति के गर्व पर बाजार को शैतानी शक्ति तथा व्यंग्य शक्ति ही देता है। भगत जी के माध्यम से बताया गया है कि हमें बाजार का प्रयोग किस तरह करना चाहिए । 

Q. 12. निम्नलिखित में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर दीजिए: 

(क) खेतों पर आनंदा क्या काम करता था ? 

(ख) वसंत पाटिल कौन था ? उसकी लेखक से दोस्ती क्यों और कैसे हुई ? 

(ग) यशोधर बाबू के व्यक्तित्व की विशेषताएँ लिखिए। 

Ans. (क) आनंदा खेतों पर काम करते-करते कभी अभिनय करने लगता था। पानी लगते समय अभिनय करने के कारण उसे पता नहीं चलता था कि क्यारियाँ कब भर गयीं। खेतों में काम करते हुए वह अपने आपसे खेलने लगता था। अब वह खेतों पर ही अधिक अकेला रहना चाहता था ताकि अभिनय कर सके और ऊँची आवाज में कविता गा सके। 

(ख) वसंत पाटिल एक होनहार, पढ़ाई में अव्वल परंतु शारीरिक तौर पर कमजोर बच्चा था । आनंदा उसकी प्रतिभा तथा शांत स्वभाव को देखकर प्रभावित हुआ । उसने मॉनीटर बनने के लिए बड़ा परिश्रम किया। उसने किताबों पर अखबार की जिल्द चढ़ाई। वह अपना बस्ता ठीक तरीके से रखने लगा। उसका

लगा और धीर-धीरे गणित विषय में उसके देसी ही रवि हो गयी। जैसे किसी व्यक्तित्व के संसर्ग से व्यक्ति गुणी हो जाता है वैसी ही स्थिति आनंदा के साथ हुई ।

Q. 13. निम्नलिखित में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर दीजिए :

(क) ‘जूझ’ कहानी के शीर्षक के औचित्य पर प्रकाश डालिए। 

(ख) यशोधर बाबू परिवार के बावजूद स्वयं को अधूरा क्यों मानते थे ?

(ग) मोहनजोदड़ो की गृह-निर्माण योजना पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए ।

Ans. (क) लेखक ने अपनी आत्मकथा का शीर्षक ‘जूझ’ उचित ही रखा है। लेखक बचपन से पग-पग पर समस्याओं से जूझता रहा। उसे बाल्यावस्था में खेती-बाड़ी का कठौर काम करना पड़ा। इस कारण उसको पढ़ाई से वंचित होना पड़ा। लेखक फहता है, “खेती के काम की चक्की की अपेक्षा मास्टर की छड़ी की मार अच्छी लगती थी।” लेखक को पुनः स्कूल जाने पर यहाँ भी परिस्थितियों से जूझना पड़ा। इस प्रकार यह शीर्षक कथा-नायक की जूझने की क्षमता को उजागर करता है।

(ख) कहानी में जिस परिवार की संरबना को प्रस्तुत किया गया है, उसमें प्राचीन और आधुनिक मानसिकता में द्वन्द्व दिखाया गया है। परिवार का मुखिया यशोधर पंत पुराने विचारों के परम्परावादी व्यक्ति हैं, जबकि उनके बच्चे आधुनिक विचारों के तथाकथित मॉड हैं। परिवार में माँ बच्चों के पक्ष में रहती है, जिससे वैचारिक मतभेद के कारण हर समय द्वन्द्ध छिड़ा रहता है। यह एक पारिवारिक बन्छ है, जिसमें एक-दूसरे के प्रति नफरत नहीं प्रत्युत लगाव बना रहता है। फिर भी यशोधर बाबू अपने को अधूरा मानते थे।

(ग), लेखक में यात्रा-क्रम में मोहनजोदड़ो के घरों का निरीक्षण किया और पाया कि सामने की दीवार में केवल प्रवेश द्वार होते हैं। इसमें कोई खिड़की नहीं है। ऐसा लगता है कि खिड़‌कियों शायद ऊपरी दीवारों पर बनायी जाती होंगी। बड़े घरों के अंदर के आँगन के चारों तरफ बने कमरों में बहुत खिड़कियाँ है। जिन घरों में बड़े ऑगन थे, वहाँ कुछ काम किये जाने की संभावना जतायी गयी है।

Q. 14. निम्नलिखित प्रश्नों में से किसी एक का उत्तर लीखिए : 

(क) ऐन ने डायरी क्यों लिखी ? 

(ख) यशोधर बाबू की पत्नी समय के साथ ढल सकने में सफल होती है, लेकिन यशोधर बाबू असफल रहते हैं। ऐसा क्यों होता है ? तर्क सहित उत्तर दें ।

Ans. (क) ऐन फेंक एक तेरह वर्षीया लड़की है। लोग उसको घमंडी, अक्खड़-दिमाग व तुनक मिजाज समझते हैं। इस कारण यह अक्सर अपने से बड़ों की डाँट भी खाती है। वे लोग उसको हमेशा समझाते रहते हैं, जिसे यह उपदेश मानती है। वास्तव में यह एक स्वाभिमानी लड़की है, जिसे लोग गलत समझते हैं। इसलिए वह अफसोस जाहिर करती है कि काश, कोई ऐसा व्यक्ति होता जो मेरे स्वभाव की वास्तविकता को समझता। डायरी लिखने का कारण ऐन के आसपास के लोग उसकी बात गंभीरता से नहीं सुनते थे। 

इसलिए उसने अपने हृदय के उद्‌गारों को डायरी में लिखना शुरू कर दिया। वह इसके साथ-साथ सम-सामयिक घटनाओं को भी लिख देती थी। उसकी यह डायरी आज तक ऐतिहासिक दस्तावेज है। 

(ख) यशोधर बाबू कुमाऊँ संस्कृति में पले-बढ़े थे, वहीं उन्होंने शिक्षा प्राप्त पड़े थे। दिल्ली आने पर की। । इसलिए इसलिए उनमें कुमाऊँनी संस्कार कूट-कूटकर भरे वे कृष्णानंद पांडे के क्वार्टर रहने लगे। वे उन्हें बड़े भाई होने के नाते ‘किशनदा’ कहते थे। किशनदा आजीवन कुँवारे रहे। ऑफिस से आकर बिड़ला मन्दिर जाना, प्रवचन सुनना, पूजा-संध्या उनका प्रतिदिन का नियम था। यही किशनदा, यशोधर बाबू के आदर्श पुरुष थे। इसलिए ये आणुनिकता में नहीं ढले । 

यद्यपि यशोधर बाबू को पत्नी अपने मूल संस्कारों से आधुनिक नहीं थी क्योंकि वह भी एक कुमाऊँनी महिला थी, तथापि बच्चों की तरफदारी करने की मातृ-सुलभ मजबूरी ने उन्हें आधुनिक बना डाला। इसके अतिरिक्त उत्से संयुक्त परिवार में सबसे दबकर रहना पड़ता था। इसलिए उन पर कुछ मनोवैज्ञानिक दबाव भी पड़ा। उस पर अपने बच्चों का प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ा। विशेषकर उसकी पुत्री ने उसे आधुनिकता में डाल दिया। वह आधुनिक वेशभूषा में रहती थी। बच्चों के प्रभाव से वह समय के साथ ढल सकते में सफल हो गई।





class12.in


class12.in

Leave a Comment