Class 12 Hindi Ncert Solutions Vitan Chapter 3 : अतीत में दबे पाँव सारांश, प्रश्न उत्तर, Easy अतीत में दबे पाँव summary

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मैं खुद class 12 का टॉपर रह चुका हूं और साथ ही साथ वर्तमान में मैं एक शिक्षक भी हूं। वर्तमान मे, मेरे पास कक्षा 12वीं के काफी विद्यार्थी हैं । जिनको मैं  बारहवीं की तैयारी करवाता हूं । यह पोस्ट को मैं अपने अनुभव से लिख रहा हूं । इस लेख को मैंने CBSE, NIOS, CISCE, ICSE और अन्य राज्य के board  को ध्यान में रखते हुए तैयार किया। 


Class 12 Hindi Ncert Solutions Vitan Chapter 3 अतीत में दबे पाँव


कक्षा | Class12th 
अध्याय का नाम | Chapter Nameअतीत में दबे पाँव | ateet mein dabe paon
लेखक | writerओम थानवी | Om Thanvi
अध्याय संख्या | Chapter number03
अध्याय प्रकार | Chapter typeकहानी | Story
किताब | Bookहिंदी कोर | HINDI CORE
पुस्तक का नाम | BOOK Nameहिंदी वितान | Hindi Vitan
बोर्ड | Boardसभी बोर्ड | All India Board
किताब | Book एनसीईआरटी | NCERT
विषय | Subjectहिंदी | HINDI
अध्ययन सामग्री | Study Materialsप्रश्न उत्तर | Question Answer


अतीत में दबे पाँव पाठ का सारांश


प्रश्न― ओम थानवी द्वारा रचित ‘अतीत में दबे पाँव’ नामक पाठ का सारांश लिखिए।। 

उत्तर— ओम थानवी द्वारा लिखित ‘अतीत में दबे पाँव’ एक संस्मरण है। पाकिस्तान के सिंग प्रांत में ‘मुअनजो-दड़ो’ नामक एक पुरातात्त्विक स्थान है। यहीं पर प्राचीन सिंधु सभ्यता बसी हुई थी। मुअनजो-दड़ो दुनिया का सबसे पुराना नियोजित शहर था। वह पूरा शहर आज खंडहरों के रूप में अपनी प्राचीन कथा कहता हुआ नजर आता है। 

दुनिया के पुरातत्त्वविद, इतिहासकार द जिज्ञासु व्यक्ति इस पुराने शहर के वीरान दृश्यों को देखने के लिए वहाँ जाते हैं। इस पाठ के लेखक ओम थानवी भी उनमें से एक हैं, जो इस महान प्राचीन शहर को देखने के लिए वहाँ गए। वहीं का वर्णन लेखक ने संस्मरण के रूप में यहाँ किया है।

लेखक कहता है कि मुअनजो-दड़ो और हड़प्पा प्राचीन भारत के ही नहीं, प्रत्युत दुनिया के सबसे प्राचीन नियोजित शहर थे। मुअनजोदड़ो पाकिस्तान के सिंघ प्रांत में और हड़प्पा पंजाब प्रांत में स्थित है। मुअनजोदड़ो ताम्रकाल के शहरों में सबसे बड़ा था।

 यह शहर व्यापक खुदाई के बाद प्राप्त हुआ। यहाँ पर बड़ी संख्या में इमारतें, सड़कें, धातु-पत्थर की मूर्तियाँ, चाक पर बने चित्रित माँड़े, मुहरें, खिलीने आदि मिले हैं। इन अवशेषों की संख्या लगभग पचास हज़ार है। 

मुअनजो-दड़ो सिंधु घाटी सभ्यता का केन्द्र रहा है। यह शहर दो सौ हेक्टेयर क्षेत्र में फैला हुआ, पाँच हजार वर्ष पुराना एक महानगर था। पूरा मुअनजोदड़ो छोटे-मोटे कई टीलों पर बसा था । ननुष्य निर्मित ये टीले पक्की ईंटों से निर्मित हैं। इसे सिंधु नदी के पानी से बचाने के लिए

टीलों पर बसाया गया। इस शहर ने सड़कें व गलियाँ इतनी चौड़ी थीं कि आज उनमें घूम-फिर सकते हैं। वहाँ के टीलों पर बने खंडहरों के पायदानों पर खड़े होकर अनुभव किया जा सकता है कि आप दुनिया की छत पर हैं। वहाँ से आप इतिहास के पार झाँक रहे हैं।

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अतीत में दबे पाँव | ateet mein dabe paon

वहाँ पर पच्चीस फुट ऊंचे चबूतरे पर एक बड़ा बौद्ध स्तूप है, जो मुअनजोदड़ो सभ्यता के बिखरने के बाद एक पुराने टीले पर बना है। इस चबूतरे पर भिक्षुओं के चबूतरे भी हैं। 1922 ई. में राखालदास बनर्जी इसी स्तूप की खोज में यहाँ आए थे। 

जब इसके इर्द-गिर्द खुदाई की गर्द तो यहाँ पर पुरानी सभ्यता के निशान पाए गए। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के तत्कालीन महानिदेशक जॉन मार्शल के निर्देश पर यहाँ खुदाई का व्यापक अभियान शुरू हुआ। फलतः वहाँ प्राचीन महान नगर के अवशेष प्राप्त हुए। लेखक सबसे पहले इसी बौद्ध स्तूप पर गए। यह मुअनजो-दड़ो के सबसे खास हिस्से पर स्थित है। इस हिस्से को पुरातत्त्वविद् ‘गढ़’ कहते हैं। 

यह मुअनजो-दड़ो का सत्ता केन्द्र था। यहाँ पर एक महाकुंड (पानी का तालाब) है, जो अब भी अपने मूल स्वरूप के निकट है। यह कुंड चालीस फीट लम्बा, पच्चीस फीट चौड़ा और सात फीट गहरा है। इसके तीन तरफ साधुओं के स्नानघर बने हैं। उत्तर में दो पंक्तियों में आठ स्नानघर हैं। यह सिद्ध वास्तुकला का एक नमूना है। कुंड के पानी को शुद्ध रखने के लिए इसकी दीवारों में विशेष गारा भरा गया है। 

कुंड में पानी भरने के लिए एक कुआँ है और पानी को बाहर बहाने के लिए नालियों हैं। ये पक्की ईंटों से बनी है और की हुई है। पानी निकासी की ऐसी सुविधाजनक व्यवस्था इससे पहले इतिहास में नहीं मिलती है।

मुअनजो-दड़ो नगर नियोजन की अनोखी मिसाल है। यहाँ की सड़कों और गलियों का विस्तार स्पष्ट है। सड़कें सीधी और आड़ी हैं। यहाँ पर तैंतीस फीट चौड़ी मुख्य सड़क भी है, जो बाजार में पहुँचती है। बड़ी सड़क के दोनों ओर घर हैं। लेकिन दरवाजे अन्दर गलियों में हैं। ढँकी हुई नालियाँ मुख्य सड़क तथा गलियों के दोनों तरफ समांतर दिखाई देती हैं।

 हर घर में एक स्नानघर है जिसका पानी नालियों में जाता है। बस्ती की छोटी सड़कें नौ-से-बारह फीट तक चौड़ी हैं। कुएँ, कुंड, स्नानागार और बेजोड़ पानी निकासी व्यवस्था सिंधु घाटी सभ्यता के व्यवस्थित नगर होने के प्रतीक हैं। यहाँ पर कुओं का व्यापक प्रबन्ध है। इतिहासकार कहते हैं कि यह सभ्यता की पहली ज्ञात संस्कृति है, जो कुएँ खोदकर भूजल तक पहुँची है। 

केवल मुअनजो-दड़ो में सात सौ कुएँ उपलब्ध हैं। कुल यहाँ एक विशाल गोदामघर है। इसमें अनाज जमा किया जाता था। यहाँ नौ-नी चौकियों की तीन कतारें हैं। उत्तर में एक गली है, जहाँ बैलगाड़ियों से माल ढुलाई होती होगी।

महाकुंड के उत्तर-पूर्व में एक बहुत बड़ी लम्बी-सी इमारत के अवशेष हैं। इसके बीचोबीच खुला बड़ा दलान तथा तीन तरफ बरामदे हैं। इतिहासकारों के अनुसार धार्मिक अनुष्ठानों में ज्ञानशालाएँ सटी हुई होती थीं। 

उस दृष्टि से इसको कॉलेज ऑफ प्रीस्ट्स माना जा सकता है। दक्षिण में एक टूटी हुई इमारत है। इसमें बीस खम्बों वाला एक बड़ा हॉल है। अनुमान है कि यह राज्य सचिवालय, सभा भवन या कोई सामुदायिक केन्द्र रहा होगा।

गढ़ के पूरब की बस्ती रईसों की बस्ती है। यहाँ पर बड़े घर, चौड़ी सड़कें और कुएँ अधिक हैं। शहर की सड़कें इसी बस्ती में है। बस्ती के भीतरी भाग में छोटी सड़कें व गलियाँ हैं। इन घरों की दीवारें ऊँची और मोटी हैं। सभी घर ईंटों के हैं। 

इन घरों में सामने की दीवार पर केवल प्रवेशद्वार है, खिड़कियाँ नहीं हैं। बड़े घरों में आँगन के चारों तरफ बने कमरों में खिड़कियाँ जरूर हैं। छोटे-बड़े सभी घर एक कतार में बने हुए हैं। ज्यादातर घरों का आकार तीस गुणा तीस फीट है। कुछ इससे दुगुने और तिगुने आकार के भी हैं। 

एक घर को मुखिया का घर कहा गया है। इसमें दो आँगन और करीब बीस कमरे हैं। इससे कुछ आगे पूरब में एक घर से दाढ़ी वाले याजक नरेश की मूर्ति मिली थी। एक छोटे घर से प्रसिद्ध नर्तकी की मूर्ति मिली थी। शिल्पकला की दृष्टि से विद्वान इसकी बड़ी प्रशंसा करते हैं।

गढ़ी के पश्चिम की ओर एक रंगरेज का कारखाना भी था। यहाँ जमीन में ईंटों के गोल-गोल गड्ढे उभरे हुए हैं। शायद इनमें रंगाई के बर्तन रखे जाते थे। दो कतारों में सोलह एकम मकान हैं। 

सब घरों में स्नानघर हैं। बाहर बस्ती में कुएँ सामूहिक प्रयोग के हैं। वे कामगारों के रहे होंगे। मुअनजोदड़ो में एक छोटा-सा अजायबघर भी बना है। उसको भी लेखक देखने गया।

मुजनजोदड़ो से प्राप्त महत्त्वपूर्ण चीजें तो दिल्ली, लाहौर, कराँची व लंदन के संग्रहालयों में पड़ी है। इस अजायबघर में मुट्ठी भर चीजें प्रदर्शित हैं, जो सिंधु सभ्यता की झलक दिखाने के लिए काफी हैं। 

यहाँ पर अब काला पड़ गया गेहूँ, ताँबे व काँसे के बर्तन, मुहरें, वाय, चाक पर बने विशाल मृद भौड, चौपड़ की गोटियाँ दीए, माप-तौल पत्थर, ताँबे का आईना, मिट्टी की बैलगाड़ी, खिलौने, चक्की, कंपी, मिट्टी के कंगन, पत्थर के औजार आदि हैं।

लेखक कहता है कि सिंधु सभ्यता में औज़ार तो मिले हैं, परन्तु हथियार कहीं नहीं मिले। विद्वान अनुमान लगाते हैं कि इस सभ्यता में राजतंत्र था, लेकिन सैन्य सत्ता नहीं थी। यहाँ पर अनुशासन जरूर था, पर ताकत के बल पर नहीं। 

सम्पूर्ण नगर व्यवस्था वहाँ के अनुशासन को प्रदर्शित करती है। यह अनुशासन सामाजिक व धार्मिक था, जिसका पालन लोग कर्तव्य समझकर करते थे।

सिंधु सभ्यता में प्रभुत्व व शानो-शौकत के प्रतीक नहीं दिखाते देते हैं। सिंधु सभ्यता में न भव्य राजमहल मिले हैं, न मंदिर, न राजाओं व महन्तों की समाधियों। यहाँ पर मुकुट वाले नरेश का प्रतीक तो है, लेकिन उसे टाट-बाट व विलासिता का कोई चिन्ह नहीं मिला। 

यह लघुता में ‘महत्ता अनुभव करने वाली संस्कृति थी। सिंधु सभ्यता समृद्ध संस्कृति का प्रतीक है, लेकिन उसमें भव्यता व आडम्बर नहीं है। इस संस्कृति के बारे में विद्वानों को अनुमान पर ही सन्तुष्ट होना पड़ता है। यहाँ की लिपि अब भी पढ़ी नहीं जा सकी। यहाँ के लोगों में कला का महत्त्व अधिक था। 

ये एक सभ्य व सुशिक्षित सभ्यता प्रतीत होती है। वास्तुकला व नगर नियोजन ही नहीं, धातु व पत्थरों की मूर्तियों, विभिन्न प्रकार के बर्तन, सुनिर्मित मुहरें, उनमें बारीकी से उत्कीर्ण आकृतियाँ, खिलौने, केश विन्यास आदि सिंधु सभ्यता को कला-सिद्ध जाहिर करते हैं। 

इसीलिए एक पुरातत्त्वविद ने कहा है, “सिंधु सभ्यता की खूबी उसका सौंदर्यबोध है, जो राज-पोषित या धर्म-पोषित न होकर समाज पोषित था।” इसीलिए उसमें आकार का भव्यता के स्थान पर कला की भव्यता दिखाई देती है।

अजायबघर में विभिन्न प्रकार की सुइयाँ थीं। उनमें कई सुईयाँ ताँबे व काँसे की थीं तथा तीन सुइयाँ सोने की भी थीं, जो महान बुनाई के काम आती होंगी। इसके अतिरिक्त वहाँ हाथी दाँत की सुइयाँ भी थीं, जो मोटी सिलाई के काम आती होगी। इस प्रकार मुअनजोदड़ो प्राचीन सिंधु सभ्यता का एक जीता-जागता नमूना है।


अतीत में दबे पाँव कठिन शब्दों के अर्थ


अतीत में दबे पाँव – प्राचीन काल के अवशेष मुअनजोदड़ो पाकिस्तान के सिंघ प्रांत में स्थित पुरातात्त्विक स्थान, जहाँ सिंधु घाटी सभ्यता बसी थी। मुअनजो-दड़ो का अर्थ है-मद का टीला। 

हड़प्पा-पाकिस्तान के पंजाब प्रांत का पुरातात्विक स्थान, जहाँ सिंधु घाटी की सभ्यता का दूसरा प्रमुख नगर बसा था। परवर्ती—बाद के काल का परिपक्व दौर-समृद्धि काल। ताम्र काल वह युग, जब मानव ने ताँबे का प्रयोग सीख लिया था। उत्कृष्ट-सर्वश्रेष्ठ । व्यापक- विस्तृत। 

तादाद—संख्या चित्रित भांडे-यह वर्तन जिन पर चित्र बने हों। साक्ष्य-प्रमाण सबूत। घाटी की सभ्यता — सिंधु घाटी की सभ्यता। आबाद-स्थित टीले-छोटे-छोटे मिट्टी के शिखर । प्राकृतिक — प्रकृति के द्वारा बने हुए खूबी-विशेषता आदिम अत्यंत प्राचीन । सहसा — अचानक । 

सहम— डर । महसूस—अनुभूत । इहलाम—– अनुभूति । निर्देश— आदेश, आज्ञा । व्यापक विस्तृत । अभियान तेजी से कार्य करना। सर्पिल टेढ़ी-मेढ़ी। पगडंडी-संकरा मार्ग। अपलक निर्निमेष, पलक न डालना। नागर— नागरिक सभ्यता। लैंडस्केप— भू-दृश्य, प्राकृतिक दृश्य, परिदृश्य। आलम- संसार। बबूल कीकड़ निहारें देखें। 

जेहन—– दिमाग । ऐतिहासिक इतिहास – प्रसिद्ध। ज्ञानशाला – विद्यालय। कोठार-भंडार। अनुष्ठानिक—पर्व, त्योहार, उत्सव आदि के निमित्त। महाकुंड – यज्ञ का विशाल कुंड । अद्वितीय – अनोखा । वास्तुकौशल— भवन निर्माण की चतुराई। अंदाजा – अनुमान। नगर नियोजन- शहर के बसाने की विधि ।

अनूठी अनुपम मिसाल- उदाहरण मतलब आशय सहज-स्वाभाविक भांपना- अनुमान लगाना । कमोबेश—थोड़ी बहुत । अराजकता — अव्यवस्था, अशांति । 

प्रतिमान—मानक साक्ष शिक्षित कामगर मजबूर इतर भिन्न संपन्न- मालदार, धनवान। विहार—बौद्ध आश्रम सायास—प्रयत्न सहित। संयोग — बिना किसी प्रयास के । धरोहर – उत्तराधिकार में प्राप्त । देव । ईश्वरीय। सामूहिक स्नान—— बहुत से व्यक्तियों का एक साथ नहाना। अनुष्ठान—— आयोजन । ।

बहुतायत पाँत — पंक्ति। पार्श्व—अलग बगल की जगह । समरूप—समान। धूसर — धूल के रंग के । निकासी—निकालना । बंदोबस्त—इंतजाम । परिक्रमा—चक्कर लगाना । विशाल कोठार—बहुत बड़ा भंडार। जगजाहिर सभी द्वारा जाना हुआ। दौर—काल। निर्मूल—शंकारहित। अधिकता । परखना—परीक्षा लेना। 

आयात बाहर से मँगाना। निर्यात — बाहर भेजना। अवशेष चिन्ह । ज्ञानशालाएँ—पाठशालाएँ। भग्न-टूटी हुई। हलका क्षेत्र वास्तुकला — भवन निर्माण कला। चेतन—मस्तिष्क का वह भाग जिसके द्वारा आदमी काम करता है। अवचेतन मस्तिष्क का वह भाग जिसमें सुप्त भाव पड़े रहते हैं। मैल—गंदगी। सरोकार — प्रयोजन। ज्ञात-परिचित, जानी हुई। 

तकरीबन लगभग। कमोबेश – थोड़ा-बहुत कायदा नियम। याजक-नरेश यज्ञकर्ता राजा। शिल्प—कलाकारी । संग्रहालय – अजायबघर ध्वस्त-टूटी हुई। चौकोर—जिस आकार की चारों भुजा बराबर हो। आयताकार – जिस आकार की आमने-सामने की भुजा बराबर हो। अचरज— आश्चर्य। शायद संभवतः । साज-सज्जा — सजावट । 

संकरी-तंग। आम सामान्य । प्रावधान—व्यवस्था । जानी-मानी — प्रसिद्ध । रोज दिन । अंतराल – मध्य । अजनबी.____ अनजाना। अनधिकार—अधिकार रहित। चहल कदमी-टहलना। अपराध-बोध- गलती का अहसास । अहसास — अनुभूति । विशद प्रबंध-विशाल ग्रंथ । इज़हार — प्रकट । 

मेज़बान — जिसके घर अतिथि आए हों। अहम मुख्य पंजीकृत — सूचीबद्ध । मृद्-भांड— मिट्टी के बर्तन । आईना- दर्पण । महसूस करना— अनुभव करना। राजतंत्र — वह व्यवस्था, जिसमें समस्त शक्ति राजा में निहित रहती हैं। भव्य विशाल एवं मनोरम राजप्रासाद राजमहल, राजाओं का निवास। 

समृद्ध—संपन्न। आडंबर – दिखावा । उद्घाटित — प्रकट । उत्कीर्ण— खोदी हुई। केश विन्यास—बालों की सजावट। सुघड़ – संदुर बनी हुई। नरेश-राजा, शासक। गुलकारी—–— कशीदाकारी, कपड़ों पर फूल या चित्र अंकित करने की कला। साक्ष्य – प्रमाण । क्षार-नमक।


अतीत में दबे पाँव प्रश्न उत्तर


प्रश्न 1. सिंधु सभ्यता साधन-सम्पन्न थी, पर उसमें भव्यता का आडम्बर नहीं था, कैसे ?

उत्तर—सम्पन्न सिंधु सभ्यता — मुअनजो-दड़ो और हड़प्पा दोनों प्राचीन सिंधु सभ्यता के अवशेष हैं। मुअनजो-दड़ो वर्तमान पाकिस्तान के सिन्ध प्रांत में है और हड़प्पा पंजाब प्रांत में है। 

मुनजोदड़ो विश्व का सबसे प्राचीन नियोजित शहर था। यह दो सौ हेक्टेयर क्षेत्र में फैला था। सम्पूर्ण शहर वास्तुकला की दृष्टि से पूर्ण नियोजित था। वहाँ भवनों, बन्द नालियों, विभिन्न वस्तुओं, मकानों के जो अवशेष मिले हैं, वे उस काल की अत्यन्त विकसित व सम्पन्न सभ्यता को प्रदर्शित करते हैं।

आडम्बर का अभाव — विकसित व सम्पन्न सभ्यता होने पर भी यहाँ के महलों व धर्म-तंत्र के प्रतीक मंदिरों, मूर्तियों आदि में कोई दिखावा नहीं है। जबकि यहाँ पर राज व्यवस्था भी थी और धार्मिक अनुष्ठान भी होते थे, लेकिन उनमें आडम्बरों का पूर्ण अभाव था। 

प्रश्न 2. ‘सिंधु सभ्यता की खूबी उसका सौंदर्य-बोध है जो राज-पोषित या धर्म घोषित न होकर समाज पोषित था।’ ऐसा क्यों कहा गया ? 

उत्तर—सौंदर्य-बोध-सिंधु सभ्यता में कला को अधिक महत्त्व दिया गया है । यहाँ की वास्तुकला अनुपम है। इसके अतिरिक्त धातु व पत्थर की मूर्तियाँ, मिट्टी सुघड़ अक्षरों की लिपि आदि सिंधु सभ्यता के कला पक्ष के सौंदर्य को प्रदर्शित करते हैं। इसीलिए एक महान पुरातत्त्ववेत्ता ने कहा है, “सिंधु सभ्यता की खूबी उसका सौंदर्य बोध है ।” 

समाज-पोषित सौंदर्य-बोध- प्राचीन सभ्यताओं में मुख्यतः राजाओं के संरक्षण में कला का

विकास होता था। कहीं-कहीं धार्मिक आस्था से भी कला का सर्जन होता था। लेकिन सिंधु सभ्यता न तो राज-पोषित है और न धर्म-पोषित। उसके पोषण में समाज के हर वर्ग का हाथ था, वह समाज के लोगों द्वारा समाज के लिए पोषित था। 

प्रश्न 3. पुरातत्व के किन चिह्नों के आधार पर आप यह कह सकते हैं कि “सिंधु- सभ्यता ताकत से शासित होने की अपेक्षा समझ से अनुशासित सभ्यता थी । “ 

उत्तर— पुरातत्व के चिह्न मुअनजोदड़ो में सिंधु सभ्यता के जो भी चिन्ह मिले हैं, उनसे ज्ञात होता है कि वह एक शिष्ट व विकसित सभ्यता थी। भवनों के अवशेष, भवनों का नियोजन, वास्तुकला, मूर्तिकला, चित्रकला आदि में जो सौंदर्य है, उससे वहाँ के समाज का बौद्धिक स्तर ज्ञात होता है। धातु व पत्थरों की मूर्तियाँ, मिट्टी व धातु के बर्तन, उन पर अंकित चित्रावली, सुनिर्मित मुहरें, खिलौने, आभूषण, सुघड़ अक्षरों वाली लिपि आदि तत्कालीन समाज की समझ के द्योतक हैं। 

समझ से अनुशासित सभ्यता — सिंधु सभ्यता में सर्वत्र कला का साम्राज्य दिखाई देता है। कहीं पर भी ताकत व प्रभुता के प्रतीक चिन्ह नहीं पाए गए। किसी भी चित्रावली में राजा अथवा बलशाली व्यक्ति की चाटुकारिता या पूजा करते लोग नहीं दिखाए गए हैं। यहाँ औजार तो मिले हैं, पर हथियार नहीं। 

जो भी चिन्ह मिले हैं, उनसे यही ज्ञात होता है कि यहाँ का समाज किसी राजशक्ति की ताकत से अनुशासित नहीं था, बल्कि स्व-समझ से अनुशासित था ।

प्रश्न 4. ‘यह सच है कि यहाँ किसी आँगन की टूटी-फुटी सीढ़ियाँ अब आपको कहीं नहीं ले जातीं, वे आकाश की तरफ अधूरी रह जाती हैं। 

लेकिन उन अधूरे पायदानों पर खड़े होकर अनुभव किया जा सकता है कि आप दुनिया की छत पर हैं, वहाँ से आप इतिहास को नहीं उसके पार झाँक रहे हैं।’ इस कथन के पीछे लेखक का क्या आशय है ? 

उत्तर- दुनिया की छत मुअनजोदड़ो में किसी आँगन की सीढ़ियाँ ऊपर को जाती दिखती हैं जो टूटी-फूटी हालत में बयान करती हैं कि कभी इन सीढ़ियों से दूसरी मंजिल पर जाते थे। लेकिन आज यह सुनसान भवनों में आकाश की तरफ ताकती प्रतीत होती है। यहाँ पर खड़े होकर आज यह महसूस किया जा सकता है कि हम दुनिया की छत पर खड़े हैं। 

इतिहास के उस पार – लेखक को अनुसार सिंधु सभ्यता इतिहास की सीमा से परे हैं। वहाँ का शहर नियोजन इतना विकसित था कि आज का शहर नियोजन उसके सामने फीका पड़ जाता है। सिंधु सभ्यता से प्राप्त कलाकारी अद्वितीय व बेजोड़ है, इसलिए यह इतिहास से परे की सभ्यता है। 

प्रश्न 5. टूटे-फूटे खंडहर, सभ्यता और संस्कृति के इतिहास के साथ-साथ धड़कती जिंदगियों के अनछुए समयों का भी दस्तावेज होते हैं—इस कथन का भाव स्पष्ट कीजिए ।

उत्तर—टूटे-फूटे खंडहर — सिंधु सभ्यता व संस्कृति के प्रतीक टूटे-फूटे खंडहर, उनमें विद्यमान कमरों के अवशेष, स्नानागार, पानी निकासी के लिए ढँकी हुई नालियाँ, घरों के बीच-बीच में गलियाँ, सड़कें, कुएँ आदि केवल पुरानी बस्ती के दृश्य ही नहीं हैं, प्रत्युत वे अपने काल की कहानी को मीन भाषा में कह रहे हैं। 

ये प्राचीन काल के जन-जीवन पर प्रकाश डालते हैं। धड़कती जिन्दगी के अनछुए रहस्य – लेखक के अनुसार ये खंडहर धड़कती जिन्दगी के अनछुए समयों के दस्तावेज हैं। सूक्ष्म दृष्टि से दिखाई देता है कि कभी इनमें काफी चल-पहल रही होगी। 

वहाँ का प्रत्येक चिन्ह उस जिन्दगी की धड़कनों का अनुभव कराता है, जो कभी उनका प्रयोग करते थे। 

प्रश्न 6. इस पाठ में एक ऐसे स्थान का वर्णन है जिसे बहुत कम लोगों ने देखा होगा, परंतु इससे आपके मन में उस नगर की एक तसवीर बनती है। किसी ऐसे ऐतिहासिक स्थान जिसको आपने नजदीक से देखा हो, का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए ।

उत्तर—पाठ में आए स्थान का वर्णन-पाठ में मुअनजो-दड़ो नामक ऐसे स्थान का वर्णन है, जहाँ पर प्राचीन सभ्यता के अवशेष विद्यमान हैं। यह स्थान हमने देखा नहीं है। लेकिन पढ़कर हमारे मन में भी वहाँ की एक तस्वीर अंकित होती है। 

ऐतिहासिक स्थल जो हमने देखा है-हमने कई ऐतिहासिक स्थल देखे हैं, जिनमें महरौली का प्राचीन ऐतिहासिक स्थल देखने व याद करने योग्य है। यहाँ पर पृथ्वीराज चौहान के प्राचीन महल के अवशेष आज भी खंडहर के रूप में विद्यमान हैं। वहीं पर कुतुबमीनार भी है। 

उसके बगल में एक अधूरे मीनार के अवशेष हैं। अशोक के युग का एक लौह स्तम्भ भी यहाँ पर है। इनके अतिरिक्त यहाँ पर और भी कई भवनों के खंडहर हैं। 

प्रश्न 7. नदी, कुएँ, स्नानागार और बेजोड़ निकासी व्यवस्था को देखते हुए लेखक पाठकों से प्रश्न पूछता है कि क्या हम सिंधु घाटी सभ्यता को जल संस्कृति कह सकते हैं? आपका जवाब लेखक के पक्ष में है या विपक्ष में ? तर्क दें । 

उत्तर— सिंधु घाटी की नगर तथा जल व्यवस्था — सिंधु घाटी की नगर योजना को देखकर आधुनिक विद्वान दंग रह जाते हैं। वहाँ पर भवनों, गलियों आदि का निर्माण तथा स्नानागार, पानी की निकासी आदि की व्यवस्था जिस ढंग से की गई है, वैसी कई स्थानों पर आज भी नहीं मिलती।

जल संस्कृति—हाँ, हम सिंधु घाटी सभ्यता को जल संस्कृति कह सकते हैं, क्योंकि यहाँ पानी की निकासी, नदी, कुएँ, स्नानागार आदि की बेजोड़ व्यवस्था थी। मुअनजो-दड़ो के कुओं के बारे में विद्वान कहते हैं कि यह विश्व की पहली ज्ञात संस्कृति है जो कुएँ खोदकर भूजल तक पहुँची थी।

प्रश्न 8. सिंधु घाटी सभ्यता का कोई लिखित साक्ष्य नहीं मिला है। सिर्फ अवशेषों के आधार पर ही धारणा बनाई हैं। इस लेख में मुअनजो-दड़ो के बारे में जो धारणा व्यक्त की गई है। क्या आपके मन में इससे कोई भिन्न धारणा या भाव भी पैदा होता है ? इन संभावनाओं पर कक्षा में समूह चर्चा करें ।

उत्तर— मुअनजो-दड़ो के बारे में धारणा — मुअनजो-दड़ो की लिपि आज तक कोई भी विद्वान नहीं पढ़ सका है। इसलिए केवल अवशेषों के आधार पर धारणा बनाई गई है। अतः धारणाओं में मतभेद होना निश्चित है। लेखक की धारणा से हम सहमत हैं कि यह संस्कृति सौंदर्य-बोध पर आधारित है, जो कला-प्रधान है। राज-पोषित व धर्म-पोषित नहीं है। इसी प्रकार शासन व्यवस्था भी किसी ताकत के बल पर नहीं चलती थी, बल्कि लोगों की समझ के आचार पर चलती थी। यह लेखक का पक्ष है।

अन्य पक्ष 

(1) यहाँ का समाज सच्चे नियमों से बँधा था। उन नियमों का पालन करने के लिए उनमें स्वर्ग व नर्क की धारणा थी। इसीलिए उन पर ताकत का अनुशासन नहीं था बल्कि स्वयं समझ का अनुशासन था। 

(2) सौंदर्य प्रेमियों में अनुशासन के लिए ताकत की आवश्यकता नहीं होती है। 

(3) स्वअनुशासन एक सभ्य व शिष्ट समाज का प्रतीक है।


ateet mein dabe paon question and answer


प्रश्न 1. मुअनजोदड़ो की नगर रचना का वर्णन कीजिए। 

उत्तर- मुअजनोदड़ो के नगर-निर्माण के विषय में लेखक बताता है- मुअनजो-दड़ो के बारे में धारणा है कि अपने दौर में वह घाटी की सभ्यता का केन्द्र रहा होगा। यानी एक तरह की राजधानी। माना जाता है कि यह शहर दो सौ हैक्टेयर क्षेत्र में फैला था। 

आवादी कोई पचासी हजार थी। जाहिर है, पाँच हजार साल पहले यह आज के ‘महानगर’ का परिभाषा को भी लोपता होगा। दिलचस्प बात यह है कि सिंधु घाटी मैदान की संस्कृति थी, पर पूरा मुअनजोदड़ो छोटे-मोटे टीलों पर आबाद था ये टीले प्राकृतिक नहीं थे। कच्ची और पक्की दोनों तरह की ईंटों से धरती की सतह को ऊंचा उठाया गया था, ताकि सिंधु का पानी बाहर पसर आए तो उससे बचा जा सके।

नगर नियोजन की मुअनजो-दड़ो अनूठी मिसाल है – इस कथन का मतलब आप बड़े चबूतरे से नीचे की तरफ देखते हुए सहज ही भाँप सकते हैं। इमारतें भले खंडहरों में बदल चुकी हों, मगर ‘शहर’ की सड़कों और गलियों के विस्तार को स्पष्ट करने के लिए ये खंडहर काफी हैं। 

यहाँ की कमोबेश सारी सड़कें सीधी हैं या फिर आड़ी। नगर से पाँच किलोमीटर दूर सिंधु वहती है। स्तूप वाले चबूतरे के पीछे ‘गढ़’ और ठीक सामने ‘उच्च’ वर्ग की बस्ती है। दक्षिण की ओर खंडहर हैं, ये खंडहर कामगरों की बस्ती है। सामूहिक स्नान के लिए 40 x 25 x 7 फूट लंबा चीड़ा व गहरा कुंड है। 

CLASS 12 NCERT SOLUTION IN ENGLISHCLASS12 NCERT SOLUTION IN HINDI
Historyइतिहास
Geography भूगोल
Political science राजनीति विज्ञान
English SubjectResult
Hindi SubjectHistory answer keys

इसमें उत्तर-दक्षिण से सीढ़ियाँ उतरती हैं। इसके तीन तरफ साधुओं के कक्ष हैं। कुंड से पानी निकालने के लिए नालियाँ हैं। कुंड के दूसरी तरफ विशाल कोठार है। कुंड के उत्तर-पूर्व में एक बहुत लंबी-सी इमारत है। जिसमें दालान व बरामदे हैं। दक्षिण में एक बीस खंभों वाला मकान है। सड़कों की चौड़ाई तेतीस फुट तक है। गली की सड़कें नौ से बारह फुट चौड़ी हैं।

नगर की नालियों के बारे में लेखक लिखता है— ढँकी हुई नालियाँ मुख्य सड़क के दोनों तरफ समांतर दिखाई देती हैं। बस्ती के भीतर भी इनका यही रूप है। हर घर में एक स्नानघर है। घरों के भीतर से पानी या मेल की नालियाँ बाहर होदी तक आती हैं और फिर नालियों के जाल से जुड़ जाती हैं। 

कहीं-कहीं वे खुली हैं, पर ज्यादातर बंद हैं। स्वास्थ्य के प्रति मुअनजो-दड़ो के बाशिंदों के सरोकार का यह बेहतर उदाहरण है। बस्ती के भीतर छोटी सड़कें हैं और उनसे छोटी गलियाँ भी। छोटी सड़कें नौ से बारह फुट तक चौड़ी है। इमारतों से पहले जो चीज दूर से ध्यान खींचती है, वह है कुओं का प्रबंध। ये कुएँ भी पकी हुई एक ही आकार की ईंटों से बने हैं। 

यहाँ के घरों के बारे में लेखक लिखता है—घर छोटे भी हैं और बड़े भी। लेकिन सब घर एक कतार में हैं। ज्यादातर घरों का आकार तकरीबन तीस गुणा-तीस फुट का होगा। कुछ इससे दुगने और तिगुने आकार के भी हैं। इनकी वास्तु शैली कमोबेश एक-सी प्रतीत होती है। व्यवस्थित और नियोजित शहर में शायद इसका भी कोई कायदा नगरवासियों पर लागू हो। इस दृष्टि से यह नगर सुव्यवस्थित एवं नियोजित था।

प्रश्न 2. ‘अतीत में दबे पाँव’ पाठ में वर्णित बौद्ध स्तूप का वर्णन कीजिए। 

उत्तर—मुअनजो-दड़ो के खडहरों में सबसे ऊँचे चबूतरे पर एक बौद्ध स्तूप है । चबूतरा पच्चीस फुट ऊँचा है। स्तूप का निर्माण काल 2600 वर्ष पूर्व का है। चबूतरे पर भिक्षुओं के कमरे हैं। 

यह बौद्ध स्तूप भारत का सबसे पुराना लैंडस्केप है। इस स्तूप को देखकर दर्शक रोमांचित हो उठता है। पुरातत्त्वविद् मुअनजो-दड़ो के स्तूप वाले भाग को गढ़ कहते हैं। गढ़ के सामने उच्च वर्ग की बस्ती है। इसके पीछे पाँच किलोमीटर दूर सिंधु बहती है। स्तूप के टीले से महाकुंड के विहार की दिशा में उतरा जा सकता है।

प्रश्न 3. ‘अतीत में दबे पाँव’ में वर्णित महाकुंड का वर्णन कीजिए । 

उत्तर—- मुअनजो-दड़ो से एक तालाब मिला है जिसे महाकुंड नाम दिया है। इस महाकुंड की लंबाई चालीस फुट, चौड़ाई पच्चीस फुट तथा गहराई सात फुट है। कुंड में उत्तर और दक्षिण से सीढ़ियाँ उतरती हैं। उत्तर दिशा में दो पांत में आठ स्नानघर हैं। इस महाकुंड के बारे में लेखक लिखता है— वह आनुष्ठानिक महाकुंड भी जो सिंधु घाटी सभ्यता के अद्वितीय वास्तुकौशल को स्थापित करने के लिए अकेला ही काफी माना जाता है। 

असल में यहाँ यही एक निर्माण है जो अपने मूल स्वरूप के बहुत नज़दीक बचा रह सका है। बाकी इमारतें इतनी उजड़ी हुई हैं कि कल्पना और बरामद चीज़ों से उनके उपयोग का अंदाजा भर लगाया जा सकता है। कुंड के तीन तरफ साधुओं के कक्ष बने हुए हैं। कुंड वास्तुकला का अनुपम उदाहरण है।

इस कुंड में खास बात पक्की ईंटों का जमाव है। कुंड का पानी रिस न सके और बाहर का ‘अशुद्ध पानी कुंड में न आए, इसके लिए कुंड के तल में और दीवारों पर ईंटों के बीच चुने और चिरोड़ी के गारे का इस्तेमाल हुआ है। पार्श्व की दीवारों के सथ दूसरी दीवार खड़ी की गर जिसमें सफेद डामर का प्रयोग है। 

कुंड के पानी के बंदोबस्त के लिए एक तरफ कुआ है। दोहरे घेरे वाला यह अकेला कुआँ है। इसे भी कुंड के पवित्र या आनुष्ठानिक होने का प्रमाण माना गया है। कुंड से पानी को बाहर बहाने के लिए नालियाँ हैं। इनकी खासियत यह है कि ये भी पक्की ईंटों से बनी हैं और ईंटों से ढँकी भी हैं। 

प्रश्न 4. ‘सिंधु घाटी की सभ्यता मूलतः खेतिहर और पशुपालक सभ्यता थी।। स्पष्ट कीजिए। 

उत्तर–सिंधु घाटी सभ्यता के बारे में पहले यह भ्रम था कि ये अन्न उपजाते नहीं थे, उसका आयात करते थे। किन्तु नई खोज ने इस ख्याल को निर्मूल साबित किया है। बल्कि अब कुछ विद्वान मानते हैं वह मूलतः खेतिहार और पशुपालक सभ्यता ही थी। 

लोहा शुरू में नहीं था। पर पत्थर और ताँबे की बहुतायत थी। पत्थर सिंघ में ही था, ताँबे की खाने राजस्थान में थीं। इनके उपकरण खेती-बाड़ी में प्रयोग किए जाते थे। जबकि मिस्र और सुमेर में चकमक और लकड़ी के उपकरणों इस्तेमाल होते थे। इतिहाकार इरफान हबीब के मुताबिक यहाँ के लोग रबी की फसल लेते थे। 

कपास, गेहूँ, जो, सरसों और चने की उपज के पुख्ता सबूत खुदाई से मिले हैं। वह सभ्यता का तर युग था जो धीमे-धीमे सूखे में ढल गया।

विद्वानों का मानना है कि यहाँ ज्वार, बाज़रा और रागी की उपज भी होती थी। लोग खजूर, खरबूजे और अंगूर उगाते थे। झाड़ियों से बेर जमा करते थे। कपास की खेती भी होती थी । 

कपास को छोड़कर बाकी सबके बीज मिले हैं और उन्हें परखा गया है। कपास के बीज तो नहीं, पर सूती कपड़ा मिला है। ये दुनिया में सूत के दो सबसे पुराने नमूनों में एक है। ये लोग सूत का निर्यात भी करते थे।

प्रश्न 5. मुअनजो-दड़ो के अजायबघर में लेखक ने क्या-क्या देखा ? 

उत्तर- लेखक लिखता है—हमारे मेज़बान ने ध्यान दिलाया कि मुअनजो-दड़ो को अजायबघर देखना अभी बाकी है। खंडहरों से निकल हम उस साबुत इमारत में आ गए। लेकिन प्रदर्शित सामान आपके खंडहरों से निकल आने का एहसास होने नहीं देता। अजायबघर छोटा ही है। जैसे किसी कस्बाई स्कूल की इमारत हो। सामान भी ज्यादा नहीं है।

अहम चीजें कराची, लाहौर, दिल्ली और लंदन में हैं। यों अकेले मुअनजो-दड़ो की खुदाई में निकली पंजीकृत चीजों की संख्या पचास हजार से ज्यादा है। मगर जो मुट्ठी भर चीजें यहाँ प्रदर्शित हैं, पहुँची हुई सिंधु सभ्यता की झलक दिखाने को काफी हैं।

 काला पड़ गया गेहूँ, ताँबे और काँसे के बर्तन, मुहरें, वाद्य, चाक पर बने विशाल मृद्-भांड, उन पर काले-भूरे चित्र, चौपड़ की गोटियाँ, दीये, माप-तौल पत्थर, ताँबे का आइना, मिट्टी की बैलगाड़ी और दूसरे खिलौने, दो पाटन वाली चक्की, कंघी, मिट्टी के कंगन, रंग-बिरंगे पत्थरों के मनकों वाले हारे और पत्थर के औजार अजायबघर में तैनात अली नवाज बताता है, कुछ सोने के गहने भी यहाँ हुआ करते थे जो चोरी हो गए। 

अजायबघर में प्रदर्शित चीजों में औजार भी हैं किंतु हथियार कोई नहीं है। अजायबघर में ताँबे व काँसे की बहुत सारी सुद्धों भी हैं। यहाँ ‘नर्तकी’ व दाढ़ी वाले ‘नरेश’ की भी मूर्ति है। हाथीदाँत और ताँबे के सुर भी हैं।

प्रश्न 6. सिंधु घाटी सभ्यता की कला का वर्णन कीजिए। 

उत्तर—सिंधु घाटी की सभ्यता की कला के विषय में लेखक लिखता है— सिंधु घाटी के लोगों

में कला या सुरुचि का महत्त्व ज्यादा था। वास्तुकला या नगर-नियोजन ही नहीं, धातु और पत्थर की मूर्तियाँ, मृदभांड, उन पर विमित मनुष्य, वनस्पति और पशु-पक्षियों की छवियों, सुर्मत मुहरें, उन पर बारीकी से उत्तीर्ण आकृतियों, खिलौने, केशविन्यास, आभूषण और सबसे ऊपर सुघड़ अक्षरों का लिपिरूप सिंधु सभ्यता को तकनीक सिद्ध से ज्यादा कला-सिद्ध जाहिर करता है। 

एक पुरातत्ववेता के मुताबिक सिंधु सभ्यता की खूबी उसका सौंदर्य बोध है, “जो राज-पोषित धर्म-पौषित न होकर समाज-पोषित था।” शायद इसीलिए आकार की भव्यता की जगह उसमें कला की भव्यता दिखाई देती है। यहाँ के लोग सुइयों से कशीदेकार का काम करते थे। सुए से दरियाँ ‘युनते थे। ‘नर्तकी’ व दाढ़ी वाले ‘नरेश’ की मूर्ति इनकी उत्कृष्ट कला के नमूने हैं। 

प्रश्न 7. प्राचीन शहर मुअजनो-दड़ो की जानकारी ‘अतीत में दबे पाँव’ के आधार पर किस प्रकार हुई ? इस संदर्भ में अपने विचार निबन्धात्मक शैली में लिखिए।

उत्तर- प्रारम्भिक प्रयास पाकिस्तान के सिन्ध प्रांत में जीर्ण अवस्था में एक बौद्ध स्तूप था। यह एक पच्चीस फीट ऊँचे चबूतरे पर विद्यमान था। सन् 1922 ई. में राखालदास बनर्जी इस स्तूप के सम्बन्ध में खोजबीन करने के लिए यहाँ गए। जब स्तूप के आस-पास खुदाई की गई तो ईसा पूर्व के निशान गए जिससे विद्वानों की रुचि इस ओर बढ़ी। खुदाई का व्यापक अभियान — भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण के तत्कालीन महानिदेशक जॉन

मार्शल को जब इस बात की जानकारी मिली तो उन्होंने इस पूरे क्षेत्र में व्यापक खुदाई का अभियान चला दिया। विशेषज्ञों की देख-रेख में यह खुदाई की गई, जिसमें इस प्राचीन शहर के अवशेष प्राप्त हुए।

प्राचीन शहर मुअनजोदड़ो इस खुदाई में जिस शहर के अवशेष मिले, उसका नाम मुअनजोदड़ो रखा गया। यह शहर दो सौ हेक्टेयर क्षेत्र में फैला हुआ था। इसमें कई प्रकार के भवनों, सड़कों, गलियों, कुओं व विभिन्न वस्तुओं के अवशेष प्राप्त हुए उन सबको देखकर विद्वानों ने अनुमान लगाया कि यहाँ अपने जमाने में एक सम्पन्न सभ्यता विद्यमान थी। 

प्रश्न 8. ‘अतीत में दबे पाँव’ के आधार पर मुअनजोदड़ो की सड़कों व गलियों पर एक निबन्ध लिखिए ।

उत्तर- सड़कों और गलियों का विस्तार – मुअनजोदड़ो के पूरे शहर में सड़कों व गलियों का जाल बिछा हुआ है, जिन्हें आज भी भली-भाँति देखा जा सकता है। यहाँ की सारी सड़कें सीपी या आड़ी हैं। 

यहाँ के सड़क नियोजन से आजकल के वास्तुकारों ने भी प्रेरणा ली है। चण्डीगढ़, जयपुर, इस्लामावाद के सैक्टर वहाँ के मिलते-जुलते हैं। प्रत्येक क्षेत्र में सड़कों व गलियों की व्यवस्था आवश्यकता के अनुरूप की गई है।

सड़कों के प्रकार – यहाँ पर लम्बाई-चौड़ाई की दृष्टि से कई प्रकार की सड़कें हैं। बड़ी सड़कों की चौड़ाई तैंतीस फीट है, जिसमें दो बैलगाड़ी एक साथ आ जा सकती हैं। ये बाजार व मुख्य स्थानों को जोड़ती है। 

छोटी सड़कें अधिक हैं, जो बत्तियों में पहुँचती हैं। इनकी चौड़ाई क्षेत्रानुसार अलग-अलग है। इनकी औसत चौड़ाई वारह फीट है। सड़कों तथा गलियों में निर्मित घर—मुअनजोदड़ो की सड़कें व गलियाँ व्यवस्थित हैं। मुख्य सड़क की ओर घरों की पीठ है। वस्ती के अन्दर छोटी सड़कें व गलियाँ निर्मित हैं। घरों के दरवाजे अन्दर गली की ओर खुलते हैं। सड़कों व गलियों के दोनों ओर ढकी हुई नालियाँ हैं।


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प्रश्न 1. दुनिया का सबसे पुराना नियोजित शहर किसे कह सकते हैं? 

उत्तर – मुअनजोदड़ो के सुव्यवस्थित नियोजन को देखकर इसे संसार का सबसे पुराना नियोजित शहर कहा जा सकता है।

प्रश्न 2. मुअनजो-दड़ो नगर का विस्तार कितना था ? 

उत्तर – मुअनजो-दड़ो नगर दो सौ हेक्टेयर विस्तृत क्षेत्र में फैला हुआ था। 

प्रश्न 3. मुअनजो-दड़ो किस धातु काल की सभ्यता थी ?

उत्तर—मुअनजोदड़ो तात्र काल की सभ्यता थी। 

प्रश्न 4. मुअनजो-दड़ो सभ्यता कितनी पुरानी थी ?

उत्तर—भुअनजोदड़ो की सभ्यता पाँच हजार वर्ष पहले की है।

प्रश्न 5. राखालदास बनर्जी मुअनजोदड़ां कब आए थे ?

उत्तर— राखालदास बनर्जी सन् 1922 ई. में मुअनजोदड़ो जाए थे । 

प्रश्न 6, मुअनजो-दड़ो की खुदाई किसके निर्देश पर हुई थी ? 

उत्तर-मुअनजोदड़ो की खुदाई भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेशक जीन मार्शल के निर्देश पर पारंभ हुई थी।

प्रश्न 7. राजस्थान और सिंध की धूप में लेखक ने क्या अंतर देखा ? 

उत्तर—लेखक के मतानुसार राजस्थान की धूप पारदर्शी है, जबकि सिंघ की धूप। 

प्रश्न 8. मुअनजोदड़ो की प्रेरणा से भारत के किस शहर में मुख्य सड़क का और मकानों की पीठ हैं ? (चांघियाती है।

उत्तर—ल कार्बजिए ने मुअनजो-दड़ो की शैली पर चंडीगढ़ का नक्शा बनाया था। इस नगर का भी कोई पर मुख्य सड़क पर नहीं खुलता। 

प्रश्न 9. सिंधु घाटी की सभ्यता को जल संस्कृति क्यों कहा जाता है ? 

उत्तर—नदी, कुएँ, कुंड, स्नानागार और बेजोड़ पानी निकासी की व्यवस्था के कारण इस सभ्यता को जल संस्कृति कहते हैं। 

प्रश्न 10. मुअनजो-दड़ो के खंडहरों को देखकर लेखक को किसका स्मरण आता है?

उत्तर—मुअनजो-दड़ो की गलियों या घरों को देखकर लेखक को राजस्थान के कुलधरा गाँव का स्मरण हो आता है। जैसलमेर का यह गाँव अपने वाशिंदों से रहित डेढ़ सौ साल से खंडहर होने के लिए वाव्य है।

प्रश्न 11. मुअनजो-दड़ो की सभ्यता की संपन्नता की बात कम क्यों हुई ? 

उत्तर—मुअनजो-दड़ो की सभ्यता की संपन्नता की बात कम होने के तीन कारण रहे हैं- 

(i) इस सभ्यता में भव्यता का आडंबर नहीं है। 

(ii) दूसरे यह सभ्यता अभी पिछली शताब्दी में ही सामने आई है।

(iii) इसकी लिपि अभी पढ़ी नहीं जा सकी है। अतः रहस्य उद्घाटित न हो सके हैं।

प्रश्न 12. सिंधु घाटी में खुदाई से प्राप्त अवशेषों का अपने शब्दों में वर्णन कीजिए।

उत्तर—- सबसे पुराने नियोजित शहर—सिंधु घाटी में खुदाई से प्राप्त मोहन जोदड़ो हड़प्पा प्राचीन भारत के ही नहीं, बल्कि विश्व के दो सबसे पुराने नियोजित शहर माने जाते हैं। इसके शहर नियोजन को देखकर ज्ञात होता है कि यह अत्यन्त विकसित सभ्यता थी। खुदाई से प्राप्त अवशेष—इस क्षेत्र में व्यापक खुदाई से बड़ी तादाद में इमारतें, सड़कें, धातु व पत्थर की मूर्तियाँ, चाक पर वने चित्रित भाँडे, मुहरें, साजो-सामान और खिलौने आदि मिले।

हैं, जो उस काल की सभ्यता पर प्रकाश डालते हैं। उस उच्च कोटि के साजो-सामान को देखकर लगता है कि यह आज के महानगर की परिभाषा को भी लाँघता होगा। 

प्रश्न 13. धरती के नीचे दवे मुअनजो-दड़ो शहर का पता किस प्रकार लगा ? पाठ के आधार पर उत्तर दीजिए ।

उत्तर—प्रथम प्रयास—यहाँ के सबसे ऊँचे चबूतरे पर एक बहुत बड़ा बौद्ध स्तूप जीर्ण-शीर्ण अवस्था में था। सन् 1922 ई. में राखालदास बनर्जी यहाँ आए। वे इसी स्तृप की खोजबीन करना पाहते थे। लेकिन उसके आस-पास खुदाई करने पर उन्हें महसूस हुआ कि यहाँ पर ईसा पूर्व के निशान है।

व्यापक खुदाई का काम उन निशानों को देखकर भारत के तत्कालीन भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेशक जॉन मार्शल के निर्देश पर खुदाई का व्यापक अभियान शुरू हुआ ! धीरे-धीरे यह खोज विशेषज्ञों को आज से पाँच हजार वर्षे पुरानी सभ्यता के निकट ले गई, जहाँ पर एक महानगर दफन था।


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प्रश्न 1. मुअनजोदड़ो शब्द का क्या अर्थ है ? 

उत्तर—मुअनजो-दडो शब्द का अर्थ- मुर्दों का टीला है।

प्रश्न 2. मुअनजो-दड़ो कहाँ स्थित है ? 

उत्तर— मोहनजोदड़ो पाकिस्तान के सिंप प्रांत में स्थित है।

प्रश्न 3. सिंधु घाटी की सभ्यता का दूसरा प्रमुख नगर कौन-सा है ?

उत्तर- सिंधु घाटी सभ्यता का दूसरा प्रमुख नगर हड़प्पा है। 

प्रश्न 4. हड़प्पा कहाँ स्थित है?

उत्तर- हड़प्पा पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में स्थित है।

प्रश्न 5. प्राचीन इमारतों या सभ्यता के अवशेषों का रख-रखाव भारत में किस संस्था का उत्तरदायित्व है ? 

उत्तर- प्राचीन इमारतों या सभ्यता के अवशेषों के रख-रखाव का दायित्व भारत में ‘भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग’ का है।

प्रश्न 6. चंडीगढ़ कहाँ स्थित है ?

उत्तर—पंजाब व हरियाणा के मध्य चंडीगढ़ केन्द्र शासित क्षेत्र है। 

प्रश्न 7. पाठ में चंडीगढ़ का उल्लेख क्यों हुआ ? 

उत्तर—मुअनजी-दड़ो के समान ही चंडीगढ़ में भी मुख्य सड़कों की और मकानों की पीठ है, दरवाजे नहीं है। 

प्रश्न 8. “मुअनजोदड़ो के बारे में धारणा है कि दौर में वह घाटी सभ्यता का केन्द्र रहा होगा।” इस कथन की पुष्टि अपने शब्दों में कीजिए।

उत्तर- मुअनजो-दड़ो की स्थिति — सिंधु घाटी सभ्यता अपने समय में एक व्यापक सभ्यता थी, जिसमें मुअनजो-दड़ो को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। यह ताम्र काल के शहरों में सबसे बड़ा था। यह शहर दो सी हैक्टेयर क्षेत्र में फैला हुआ था। 

यहाँ पर बड़ी तादाद में इमारतें, सड़कें, धातु-पत्थर की मूर्तियाँ, चाक पर बने चित्रित भाँडे, मुहरें, साजो-सामान और खिलौने मिले हैं। सभ्यता का केन्द्र-विद्वानों का मानना है कि यह कभी घाटी सभ्यता का केन्द्र रहा होगा। है कि आज से पाँच हजार वर्ष यह शासन, विद्या, धर्म व कला का केन्द्र रहा होगा। ऐसा लगता पूर्व का यह नगर आज के ‘महानगर’ से भी बढ़कर था ।


लेखक के द्वारा


नमस्कार Students, मैंने इस पोस्ट को (class 12 hindi ncert solutions) CBSE, NIOS,  CISCE, ICSE और अन्य राज्य के board के मुताबिक इस पोस्ट को तैयार किया है, तथा भविष्य में जो भी लेटेस्ट अपडेट आएंगी उसके अनुसार यह पोस्ट अपडेट भी होता रहेगा । इसलिए मुझे यह आशा है कि यह पोस्ट आपके लिए काफी जानकारी पूर्ण होगा और आपके परी


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