VVI Class 12 PART B Sociology Chapter 2 Notes In Hindi सांस्कृतिक परिवर्तन

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Class 12 PART B Sociology Chapter 2 Notes In Hindi सांस्कृतिक परिवर्तन

Class12th 
Chapter Nameसांस्कृतिक परिवर्तन
Chapter numberChapter 2
PART B
Book NCERT
SubjectSociology
Medium Hindi
Study MaterialsNotes & Questions answer
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सांस्कृतिक परिवर्तन


सामाजिक व्यवस्था में संरचनात्मक परिवर्तन समय-समय पर हुए हैं। संरचनात्मक परिवर्तन के अंतर्गत सांस्कृतिक, आधुनिक तथा पश्चिमीकरण और लौकिकीकरण जैसे-विषय-वस्तु आते हैं। प्रभावशाली समूहका अधीनस्थ समूह पर पड़ने वाले प्रभाव को संस्कृतिकरण कहा जाता है। 

जबकि परंपराओं को त्यागकर नये विचारों को ग्रहण करना थुनिकीकरण कहलाता है। धर्मनिरपेक्षीकरण सामाजिक परिवर्तन की वह प्रक्रिया है जिसके 16 सार्वजनिक मामलों में धर्म का प्रभाव कम हो जाता है।

वर्तमान में सामाजिक परिवर्तन लाने में समाज-सुधार आन्दोलनों के महत्त्व को तीव्रता के साथ स्वीकार किया जाता है और इस बात पर जोर दिया जाता है कि कल्याणकारी समाज की स्थापना के लिए समाज सुधार आन्दोलनों की अत्यन्त आवश्यकता है। 

कल्याणकारी समाज में समाज के सभी सदस्यों को समानता के आधार पर अपने व्यक्तित्व को संतुलित रूप से विकसित करने के अधिक अवसर व सुविधाएँ प्राप्त होती हैं। इस प्रकार कल्याणकारी समाज का लक्ष्य जनता के लिए उचित न्यूनतम जीवन स्तर को प्राप्त करना होता है। 


VVI Class 12 PART B Sociology Chapter 2 Notes In Hindi सांस्कृतिक परिवर्तन

इस लक्ष्य की प्राप्ति उसी दशा में संभव है जबकि समाज को सामाजिक कुरीतियों व धार्मिक अन्धविश्वासों से मुक्त कर दिया जाए। यह कार्य समाज-सुधार आन्दोलनों के माध्यम से ही संभव हो केवल कानून

बना देने से ही ऐसा सामाजिक परिवर्तन या वांछित सामाजिक परिवर्तन नहीं लाया जा सकता सामाजिक पुननिर्माण के लिए परम आवश्यक है। इस संदर्भ में भारतीय उदाहरण पर्याप्त महत्त्वपूर्ण हैं।

भारत में अनेक समाज सुधार आंदोलन सफल रहे हैं जिनमें प्रमुख हैं—वा समाज, आर्य समाज, प्रार्थना समाज, थियोसोफिकल सोसाइटी, रामकृष्ण मिशन, राधास्वामी मत, भारत सेवक समाज, मुस्लिम-सिक्ख, पारसियों के सुधार आंदोलन, स्वदेशी आंदोलन, जनजातीय आंदोलन आदि। 

आधुनिकीकरण की प्रक्रिया भारत में बहुत पहले से प्रारंभ हो गई थी। भारतीय सामाजिक विचारक डी. पी. मुखजी ने कहा कि यदि मध्यम वर्ग आम जनता से अपना संपर्क पुनः स्थापित करता है तो भारत परंपराओं से अनुकूलन करके आधुनिकता के मार्ग पर अग्रसर हो सकता है। 

भारतीयों को अपनी परंपराओं के संदर्भ में न तो क्षमायाचना करने की आवश्यकता है और नही आत्मश्लाघा की। उन्हें परंपराओं की जीवंतता को नियंत्रित करने के लिए प्रयत्न करना चाहिए जिससे आधुनिकता द्वारा आवश्यक परिवर्तनों के साथ समायोजन कर सके।

पश्चिमीकरण सामाजिक परिवर्तन की दूसरी बड़ी प्रक्रिया है। पश्चिमीकरण शब्द का प्रयोग भारत में सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तन के बाहरी स्रोतों का विश्लेषण करने के लिए किया गया है। पश्चिमीकरण की अवधारणा में 150 वर्षों से अधिक के अंग्रेजी शासन के फलस्वरूप भारतीय समाज में आए परिवर्तन तथा विभिन्न स्तरों पर प्रौद्योगिकी संस्थाओं, विचारधारा तथा मूल्यों में आए परिवर्तन शामिल हैं। 

पश्चिमीकरण शब्द भारतीय संस्कृति पर अंग्रेजों के प्रभाव की व्याख्या करने के लिए उपयुक्त शब्द है। पश्चिमीकरण द्वारा नए विवार और सिद्धांत सामने आए। इनमें से सबसे महत्त्वपूर्ण मानवतावाद है। इसमें समानता, स्वतंत्रता और धर्मनिरपेक्षता की अवधारणाएँ मानवतादाद की मूल अवधारणा में शामिल हैं। पश्चिमीकरण का दूसरा प्रभाव। व्यवसायी, मध्यवर्ग तथा व्यापारी वर्ग का उदय था। पश्चिमीकरण ने राजनीतिक विचारों तथा सोच को भी प्रभावित किया।

संस्कृति ऐसे विचारों, प्रतीकों और भौतिक उत्पादों का समुच्चय है जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी से हस्तांतरित होती है। संस्कृति सामाजिक गतिविधियों का नियमन करती है। परिवर्तन की सांस्कृतिक प्रक्रियाएँ उन विभिन्न तरीकों को दर्शाती हैं जिनके द्वारा भारतीय संस्कृति में आरंभ हुए विविध परिवर्तनों को प्रभावित करती है। 

भारत की सांस्कृतिक संरचना में परिवर्तन आंतरिक और बाह्य दोनों प्रकार के स्रोतों से उत्पन्न हुए हैं। सांस्कृतिक प्रक्रियाओं की अवधारणा संस्कृतिकरण, इस्लामीकरण, पश्चिमीकरण और धर्म-निरपेक्षीकरण के माध्यम द्वारा स्पष्ट की जा सकती है। संस्कृतिकरण भारत में सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तनों की व्याख्या करने की सर्वाधिक प्रभावशाली अवधारणा है। 

संस्कृतिरण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें निम्न हिन्दू जाति अपनी परंपरा, रीति-रिवाज, सिद्धांत और जीवन-शैली को एक उच्च और द्विज जाति के नियमों में परिवर्तित कर देती है। अपने कई रीति-रिवाजों को अपवित्र समझकर छोड़ दिया जाता है। संस्कृतिकरण किसी जाति की उच्च स्थिति के लिए आंतरिक स्रोत है। संस्कृतिकरण हिन्दू जातियों तक ही सीमित नहीं है, यह आदिवासी समूहों में भी पाया जाता है। 



संस्कृतिकरण की प्रक्रिया भारत के प्रत्येक भाग में हुई है। इस प्रक्रिया ने नई जातियों और उपजातियों को भी जन्म दिया। संस्कृतिकरण एक ऐसी प्रक्रिया है जो विभिन्न जातियों की प्रतिष्ठा में परिवर्तन लाती है।

धर्म-निरपेक्षीकरण सामाजिक परिवर्तन की एक अन्य प्रक्रिया है जिसके द्वारा सार्वजनिक मामलों में धर्म का प्रभाव कम होता जाता है। धर्म-निरपेक्षीकरण शब्द का सांकेतिक अर्थ है कि वे मुद्दे जो पहले धार्मिक समझे जाते थे अब उसी रूप में नहीं देखे जाते। भारत में धर्मनिरपेक्षता एक शताब्दी में पश्चिमीकरण का परिणाम है। औद्योगीकरण और नगरीकरण में स्थानिक गतिशीलता में वृद्धि हुई है। लोग नगरों में रोजगार की खोज में आते हैं। 

शिक्षा के प्रचार-प्रसार में धर्मनिरपेक्षता की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में सहायता की है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान धर्मनिरपेक्षता की भावना में सुधार हुआ। व्यक्ति के सामाजिक जीवन के हर पहलू को इसने प्रभावित किया है। अब पवित्रता और अपवित्रता की धारणा कमजोर हुई है। धर्म और जाति के. रूढ़िवादी तत्त्व धीरे-धीरे अपनी प्रतिष्ठा खो रहे हैं। वास्तव में सामाजिक परिवर्तन के कारण समाज में रहने वाले लोगों के जीवन में भी महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं। सांस्कृतिक परिवर्तन होने से संस्कृतिकरण और धर्मनिरपेक्षीकरण के अच्छे परिणाम सामने आए हैं।


Class 12 PART B Sociology Chapter 2 question answer


1. संस्कृतिकरण पर एक आलोचनात्मक लेख लिखें।

Ans. संस्कृतिकरण एक ऐसी प्रक्रिया का संकेतक है जिसमें व्यक्ति सांस्कृतिक दृष्टि से प्रतिष्ठित समूहों के रीति-रिवाज एवं नामों का अनुकरण कर अपनी प्रस्थिति को उच्च बनाते हैं। संदर्भ प्रारूप अधिकतर आर्थिक रूप में बेहतर होता है। 

दोनों ही स्थितियों में यह संकेत विद्यमान है कि जब व्यक्ति धनवान होने लगते हैं तो उनकी आकांक्षाओं और इच्छाओं को प्रतिष्ठित समूह भी स्वीकारने लगते हैं। संस्कृतिकरण की अवधारणा की अनेक स्तरों पर आलोचना की गई है।

(i) सामाजिक गतिशीलता निम्न जाति का ऊर्ध्वगामी परिवर्तन करती है सर्वप्रथम इस अवधारणा की आलोचना में यह कहा जाता है कि इसमें सामाजिक गतिशीलता निम्न जातिका सामाजिक स्तरीकरण में ऊर्ध्वगामी परिवर्तन करती है। 

(ii) जीवन-शैली के अनुकरण की इच्छा-दूसरा, आलोचानात्मक पक्ष यह है कि अवधारणा की विचारधारा में उच्च जाति की जीवनशैली उच्च एवं निम्न जाति के लोगों का जीवनशैली निम्न है। अतः उच्च जाति के लोगों की जीवनशैली का अनुकरण करने की इच्छा को वांछनीय और प्राकृतिक मान लिया गया है। 

(iii) असमानता एवं अपवर्जन की बात- -तीसरी आलोचना यह है कि संस्कृतिकरण की अवधारणा एक ऐसे प्रारूप को सही ठहराती है जो दरअसल असमानता और अपवर्जन पर आधारित है। इससे संकेत मिलता है कि पवित्रता और अपवित्रता के जातिगत पक्षों को उपयुक्त माना जाए और इसलिए ये लगता है कि उच्च जाति द्वारा निम्न जाति के प्रति भेदभाव एक प्रकार का विशेषाधिकर है। इस प्रकार के दृष्टिकोण वाले समाज में, समानता की कल्पना कठोर है। निम्नांकित उद्धरण से पता चलता है कि समाज पवित्रता अपवित्रता को कितना महत्त्व देता है।

2. जाति और पंथनिरपेक्षीकरण पर लघु निबंध लिखें ।

Ans. जैसे-जैसे आधुनिकीकरण की प्रक्रिया में तेजी आई और विकास की गति बढ़ी, दम तथा विभिन्न प्रकार के उत्सवों, त्योहारों को मनाना, विभिन्न धार्मिक कृत्यों, विभिन्न समारोहों के आयोजनों, इन समारोहों से जुड़े निषेध विभिन्न प्रकार के दान, एवं उनके मूल्य इत्यादि में निरंतर परिवर्तन आया विशेष रूप से यह परिवर्तन निरंतर बढ़ते और परिवर्तित होते हुए नगरीय क्षेत्र में अधिक दिखाई देता है।

इस परिवर्तनात्मक दबाव में जनजातीय पहचान की अवधारणा में एक प्रतिक्रिया हुई। एक जनजाति का होने के नाते पारंपरिक व्यवहारों और उनमें निहित मूल्यों के संरक्षण को आवश्यक समझा जाने लगा। 

आधुनिकीकरण के तहत जो नारे बुलंद किए गए थे—जैसे, ‘संस्कृति समाप्त, पहचान समाप्त’-उसे एक प्रकार का उत्तर मिला जिसे समाज में हो रहे पारंपरिक चेतना के नवजागरण के रूप में देखा जाता है। त्योहार का सामूहिक तौर पर मनाया जाना तथा रीति-रिवाजों के प्रति रुझान को इसी सामाजिक प्रतिक्रिया के रूप में समझा जा सकता है। वर्तमान जनजातीय समाज में यह बहुत स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।

पहले पारंपरिक तरीके से सामाजिक समूह त्योहारों को मनाते थे। उस समूह की सामाजिक मान्यता भी होती थी और उसमें एक प्रकार की अनौपचारिकता भी थी अब उनके स्थान पर त्योहार मनाने के लिए समितियाँ बनने लगी हैं जिसकी संरचना में एक प्रकार की आधुनिकता होती है। परंपरागत रूप से, त्योहारों के दिन मौसम चक्र के आधार पर तय किए जाते थे। अब

उत्सव के दिन औपचारिक तरीके से सरकारी कैलेंडर के द्वारा निश्चित कर दिए जाते हैं। इन त्योहारों को मनाने में झंडे की कोई विशेष डिजाइन नहीं होती है, न ही कोई मुख्य अतिथि के भाषण होते हैं न ही उत्सव प्रतियोगिता होती थी लेकिन अब ये सब नई आवश्यकताएँ बन गई हैं। जैसे-जैसे तार्किक अवधारणाएँ एवं विश्व दृष्टि जनजातियों के दिमाग में जगह बनाती जा रही है वैसे-वैसे पुराने व्यवहार और समारोह पर प्रश्न उठते जा रहे हैं। 

CLASS 12 NCERT SOLUTION IN ENGLISHCLASS12 NCERT SOLUTION IN HINDI
Historyइतिहास
Geography भूगोल
Political science राजनीति विज्ञान
English SubjectResult
Hindi SubjectHistory answer keys

4. संस्कार और पंथनिरपेक्षीकरण पर लघु निबंध लिखें ।

Ans. वर्तमान में हम सामाजिक-सांस्कृतिक व्यवहार को प्रायः परंपरा तथा आधुनिकता का एक जटिल मिश्रण कह कर एक सरलीकृत उत्तर देने का प्रयास करते है जबकि इनके अपने निर्धारित सत्य हैं। 

इस प्रकार से जटिलता को सरल बनाने की प्रवृत्ति उचित नहीं हैं। यथार्थ में इससे ये भी भ्रांति उत्पन्न होती है कि भारत में एक ही तरह की परंपराओं का समुच्चय है अथवा था। हमने पहले ही देखा है कि भारत में इन परंपराओं की पहचान दो मुख्य गुणों से होती है।

बहुलता एवं तर्क-वितर्क की परंपरा भारतीय परंपराओं में निरंतर परिवर्तन होते रहे हैं और उन्हें पुनपरिभाषित करने की सामाजिक बौद्धिक चेष्टा कभी नहीं रुकी है। उसने इसका साक्ष्य 19वीं सदी के समाज सुधारको और उनके आंदोलनों में देखा। 

ये प्रक्रियाएँ भी जीवंत हैं। आधुनिक पश्चिम में पंथनिरपेक्षीकरण का मतलब ऐसी प्रक्रिया से है जिसमें धर्म के प्रभाव में कमी आती है। आधुनिकीकरण के सिद्धांत के सभी प्रतिपादक विचारकों की मान्यता रही है। कि आधुनिक समाज अधिक से अधिक पंचनिरपेक्ष होता है। 

पंथनिरपेक्षीकरण के सभी सूचक मानव के धार्मिक व्यवहार उनका संस्थानों से संबंध (जैसे चर्च में उनकी उपस्थिति) धार्मिक संस्थानों का सामाजिक तथा भौतिक प्रभाव और लोगों के धर्म में विश्वास करने की सीमा को विचार में लेते हैं। यह स्वीकार किया जाता है कि पंचनिरपेक्षीकरण के सभी सूचक आधुनिक समाज में धार्मिक संस्थानों और लोगों के बीच बढ़ती दूरी के साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं।


अति लघु उत्तरीय प्रश्न (VERY SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS)


1. प्राचीन काल में सुधारवादी आंदोलन का आधार क्या था ? Ans. प्राचीन काल में सुधारवादी आंदोलन का आधार धर्म था जिसे लेकर अनेक आंदोलन हुए।

2. विधवा विवाह संघ की स्थापना किसने की थी ?

Ans. विधवा विवाह सघ की स्थापना न्यायाधीश महादेव गोविंद रानाडे ने 1861 में की थी।

3. ब्रह्म समाज की स्थापना किसने और कब की थी ? 

Ans. सन् 1875 में मुम्बई में स्वामी दयानन्द ने आर्य समाज की स्थापना की थी। 

5. नवीन समाज की स्थापना किसने की थी ?

Ans. ब्रह्म समाज की स्थापना राजा राममोहन राय ने सन् 1828 में की थी। 

4. आर्य समाज की स्थापना किसने और कब की थी ?

Ans. नवीन समाज की स्थापना केशवचन्द्र सेन ने की थी।

5. मूलशंकर किसके बचपन का नाम था ?

Ans. मूलशंकर स्वामी दयानन्द के बचपन का नाम था । 

6. भारत में सुधार आंदोलन के प्रवर्तक कौन थे ? 

Ans. भारत में सुधार आंदोलन के प्रवर्तक राजा राममोहन राय थे। 

7. भारत के किन्हीं दो समाज सुधारकों के नाम लिखिए। 

Ans. (i) राजा राममोहन राय, (ii) स्वामी दयानन्द, (iii) स्वामी विवेकानन्द । 

8. गाँधीजी ने हरिजनों (दलितों) के लिए अस्पृश्यता आंदोलन कब चलाया था ? 

Ans. गाँधीजी ने 1922 में छुआछूत की भावना को दूर करने के लिए अस्पृश्यता आंदोलन चलाया था।

9. ‘सर्वोदय’ शब्द किसकी देन है ? इसका एक मुख्य सिद्धांत बताएँ । 

Ans. ‘सर्वोदय’ शब्द की रचना महात्मा गाँधी ने की थी। इसका प्रमुख सिद्धांत यह है कि सिद्धांतवादी व्यक्ति दूसरों को जिंदा रखने के लिए स्वयं मर सकता है। 

10. सिक्ख धर्म में उत्पन्न बुराइयों को समाप्त करने के लिए कौन-सी समिति की स्थापना की गई ?

Ans. सिक्ख धर्म में उत्पन्न बुराइयों को समाप्त करने के लिए शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति की स्थापना की गई।


लघु उत्तरीय प्रश्न (SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS)


1. समाज सुधार से आप क्या समझते हैं ?

Ans. जब समाज के प्रतिष्ठित नागरिकों द्वारा स्वस्थ सामाजिक जीवन के लिए सामाजिक चलन में परिवर्तन करने का प्रयत्न किया जाता है, तब उसे समाज सुधार कहा जाता है। 

दूसरे शब्दों में समाज को स्वस्थ व प्रगतिशील बनाने के कार्य को समाज सुधार कहा जाता है तथा जो इन कार्यो को करते हैं उन्हें समाज सुधारक कहा जाता है। सामाजिक कुरीतियों, कुप्रथाएँ, धार्मिक अंधविश्वास तथा सामाजिक भेदभाव आदि से समाज को मुक्त कराना एक सुधारक का प्रमुख लक्ष्य होता है। 

2. समाज कल्याण का क्या अर्थ है ?

Ans. समाज कल्याण के अन्तर्गत उन संगठित सामाजिक सेवाओं व प्रयासों को सम्मिलित किया जाता है। जिनके द्वारा समाज के सभी सदस्यों को अपने व्यक्तित्व को संतुलित रूप से विकसित करने के अधिक अवसर व सुविधाएं उपलब्ध होती हैं। सामाजिक कल्याण सेवाएँ, विकास की अन्य सेवाओं, जैसे- स्वास्थ्य, पोषण, शिक्षा, आवास, श्रमिक कल्याण आदि की पूरक हैं।

3. आर्य समाज की स्थापना किसने की थी ? इस संगठन के मुख्य सिद्धांत क्या थे ? 

Ans. I. स्थापना : आर्य समाज की स्थापना सन् 1875 ई. में स्वामी दयानन्द सरस्वती ने की थी। II. स्वामी दयानंद सरस्वती की मुख्य शिक्षाएँ या आर्य समाज सिद्धांत 

(i) स्वामी दयानंद सरस्वती वेदों की सर्वश्रेष्ठता एवं सर्वोच्चता में विश्वास करते हुए मानते थे कि ये ज्ञान से भरे हुए हैं तथा ये ईश्वरीय शक्ति हैं। सभी हिन्दुओं को इन्हें अपने धार्मिक ग्रन्थों के रूप में मान्यता देनी चाहिए।

(ii) स्वामी दयानन्द सभी मानवों को बराबर मानते थे तथा वे ब्राह्मणों की श्रेष्ठता या ब्राह्मणवाद के विरोधी थे।

(iii) उन्होंने वेदों की तार्किक आधार पर व्याख्या की तथा उन्हीं के अनुसार आर्य समाज के सिद्धांत बनाये।

(iv) उन्होंने वेदों की तार्किक आधार पर व्याख्या की थी उन्हीं के अनुसार आर्य समाज के सिद्धांत बनाये। 

(iv) उन्होंने जातिवाद का विरोध किया। मूर्ति पूजा में उनका विश्वास नहीं था, वे सभी प्रकार के धार्मिक अंधविश्वासों एवं बहुदेववाद के विरोधी थे। 

(v) उन्होंने पश्चिमी विज्ञानों के अध्ययन का समर्थन किया तथा कहा कि इससे देश में नया ज्ञान आयेगा एवं लोगों का दृष्टिकोण प्रगतिशील एवं वैज्ञानिक बनेगा। 

(vi) उन्होंने हर प्रकार की शिक्षा के विकास में योगदान दिया। वे मानते थे कि स्त्रियों को भी शिक्षा दी जानी चाहिए। 

(vii) स्वामी दयानन्द सरस्वती ने सामाजिक सुधारों के क्षेत्र में भी कार्य किया। वह नारी समानता के समर्थक थे। उन्होंने विधवा विवाह का समर्थन किया। स्वामी जी दिवाह आदि अवसरों पर की जाने वाली फिजूलखर्ची के विरोधी थे। 

4. “संसार के अन्य देशों से हमारा अलगाव हमारे अधःपतन का कारण है।” इस कथन में किस सुधारक के विचारों की झलक मिलती है ? आप इस कथन से कहाँ तक सहमत हैं ? कारण दीजिए ।

Ans. “संसार के अन्य देशों से हमारा अलगाव हमारे अधःपतन का कारण है। यह कथन महान सुधारक स्वामी विवेकानंद के विचारों की झलक देता है। हम इस कथन से पूर्णतया सहमत हैं। विवेकानंद ‘रामकृष्ण मिशन’ के संस्थापक थे। 

उन्होंने इस संस्था के माध्यम से अपने गुरु रामकृष्ण परमहंस के विचारों को फैलाया। विवेकानंद के विचारानुसार जातिप्रथा, छुआछुत व्य है तथा नारी को सम्मान एवं समानता मिलनी चाहिए मानवसेवा ही ईश्वर सेवा है। वैदिक धर्म सर्वश्रेष्ठ है। यह सभी लोगों का धर्म होना चाहिए। नया ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। ज्ञा आदान-प्रदान प्रगति का आधार है।

स्वामी विवेकानंद ने अनुभव किया कि भारतवासी दलित और शोषित थे । तथापि इसके लिए उन्होंने स्वयं भारतवासियों को ही उत्तरदायी ठहराया क्योंकि उनमें गतिहीनता आ गई थी। 

उन्होंने लिखा, “भारतवासियों के दलित होने का कारण संसार के अन्य देशों से अलग-थलग रहना है। इससे बचने का एकमात्र उपाय है कि वह संसार की मुख्य धारा में आ जाए। गति ही जीवन का प्रतीक हैं।” विवेकानंद को भारत की आध्यात्मिक धराहर पर गर्व था और उनका विश्वास था कि कोई भी व्यक्ति या राष्ट्र समाज की मुख्य धारा से अलग नहीं रह सकता है।

5. भारत में थियोसोफिकल सोसाइटी के क्या क्रियाकलाप थे ? इस संस्था की स्थापना का भारत पर क्या प्रभाव पड़ा था ? Or, थियोसोफिकल सोसाइटी के संस्थापक कौन थे ? इस सोसाइटी ने सामाजिक सुधार में क्या भूमिका निभायी ?

Ans. मूलतः थियोसोफिकल सोसाइटी की स्थापना संयुक्त राज्य अमेरिका में मैडम एच. डी. ब्लावात्सकी एवं कर्नल एच. एस. ओलकार द्वारा की गई थी। बाद में वे लोग भारत आ गए तथा सन् 1886 ई. में मद्रास (चेन्नई) के समीप अड्यार में उन्होंने थियोसोफिकल सोसाइटी का हैडक्वार्टर्स (मुख्य कार्यालय) स्थापित किया। श्रीमती एनी बेसेंट सन् 1893 ई. में आयीं और उन्होंने थियोसोफिकल सोसाइटी का

नेतृत्व सँभाला। इस सोसाइटी ने निम्न विचारों एवं सिद्धांतों का प्रचार-प्रसार किया- 

(i) थियोसोफिस्ट प्रचार करते थे कि हिन्दुत्व / जरथुस्त्र मत (पारसी धर्म), बौद्ध धर्म जैसे प्राचीन धर्मों को पुनर्स्थापित एवं सुदृढ़ किया जाए। 

(ii) उन्होंने आत्मा के पुनरागमन के सिद्धांत का भी प्रचार किया।

(iii) धार्मिक पुनर्स्थापनवादियों के रूप में कार्य करते हुए उन्होंने भारतीय धर्मों के साथ-साथ भारतीय दार्शनिक परम्परा का महिमामंडन भी किया।

(iv) भारत में श्रीमती एनी बेसेंट के प्रमुख कार्यों में एक था- बनारस में केन्द्रीय हिन्दू विद्यालय की स्थापना, जिसे कालान्तर में मदन मोहन मालवीय ने बनारस हिन्दु विश्वविद्यालय के रूप में विकसित किया।


दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (LONG ANSWER TYPE QUESTIONS)


1. ब्रह्म समाज ने समाज सुधार हेतु क्या कदम उठाए ? विवेचना कीजिए । भारतीय समाज सुधार आन्दोलन के प्रणेता राजा राममोहन राय थे। विवेचना कीजिए। 

Ans. सन् 1828 में राजा राममोहन राय ने ‘ब्रह्म समाज’ की स्थापना की थी जिसका न्य हिन्दू समाज को भिन्न-भिन्न धार्मिक अन्धविश्वासों से मुक्त कराना था। 

यह एक ऐस उमाज था जिसमें वे सब व्यक्ति इकट्ठे थे जो एक ईश्वर में विश्वास करते थे और मूर्ति पूजा विरोध करते थे। राजा राममोहन राय ने अपना एक निजी भवन इस सभा के लिए दे दिया ब्रह्म समाज इस प्रकार से ब्राह्मणों का समाज था 

जिसमें अन्य जातियों के व्यक्ति नहीं जा सकते थे। ब्रह्म समाज में प्रमुख समाज सुधारक तथा उनके सुधारात्मक प्रयत्नों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित हैं

“राजा राममोहन राय और ब्रह्म समाज राजा राममोहन राय को भारतीय समाज-सुधार आन्दोलन का प्रणेता माना जाता है। वे बंगाल के बर्दवान जिला के राधानगर ग्राम में एक ब्राह्मण जमीदार के घर उत्पन्न हुए थे। ये अरबी, फारसी, संस्कृति से इतने प्रभावित हुए कि इनके वस्त्र ओर रुचियाँ भी मुसलमानों जैसी हो गयीं।

राजा राममोहन राय ने अपने उपर्युक्त लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए लैटिन, ग्रीक, हिब्रू आदि भाषाओं का भी ज्ञान प्राप्त किया। कोलकाता में जैन, हिन्दू मुस्लिम तथा विभिन्न मतावलम्बियों के साथ धार्मिक विषयों पर उनका विचार-विमर्श चलता रहता था। 

इसी काल में नौकरी से अवकाश प्राप्त करने के बाद उन्होंने आत्मीय सभा तथा वेदान्त कॉलेज की स्थापना की।

राजा राममोहन राय ने हिन्दू समाज में प्रचलित मूर्ति पूजा तथा अनेक देवताओं की आराधना का विरोध किया। उन्होंने एकेश्वरवाद का प्रचार किया और यह घोषणा की कि उनके विचार वास्तविक हिन्दू ग्रंथों पर आधारित हैं। अंधविश्वासों के कारण लोग इन प्राचीन विचारों को भूल गए हैं। 

2. समाज सुधार आंदोलन के इतिहास में आर्य समाज आंदोलन की भूमिका लिखिए। Or, आर्य समाज के विषय में आप क्या जानते हैं ? संक्षेप में लिखिए। 

Ans. भारत में समाज सुधार आन्दोलन के इतिहास में आर्य समाज तथा उसके प्रवर्तक महर्षि दयानन्द सरस्वती का नाम अविस्मरणीय रहेगा। महर्षि दयानन्द का जन्म सन् 1824 में गुजरात के एक धनी ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इनका बचपन का नाम मूलशंकर था। 

इनके पिता भगवान शिव के भक्त थे और वेदशास्त्रों के ज्ञाता थे। मूलशंकर ने बचपन से ही वेद ग्रंथों का अध्ययन किया था। शिवरात्रि को मूलशंकर ने अपने पिता की आज्ञा से व्रत रखा। इस के अनुसार उन्हें रातभर शिवमूर्ति के सामने जागरण करना था। रात के समय पूजा के पश्चात् शिव के सभी भक्त ऊँपने लगे किन्तु बालक मूलशंकर, जो अपने नियम पर दृढ़ था, निरंतर जागता रहा। 

अर्धरात्रि की शांति में एक चूहा चुपचाप आया और शिवलिंग पर घूमकर चढ़ा हुआ नैवेद्य खाने लगा। यह देखकर मूलशंकर आश्चर्यचकित रह गए। उनके मन में पाखंड और अवा पूजा के प्रति घृणा उत्पन्न हो गई। मूलशंकर को यह अनुभव हुआ कि रात भर जागने और पत्थर पर फल-फूल चढ़ाने से परमात्मा की प्राप्ति नहीं होती। 

उसने अनुभव किया कि जो शिव छोटे चूहे को भी अपने ऊपर चढ़ा प्रसाद खाने से नहीं रोक सकता वह अपने सेवकों की क्या रक्षा करेगा ? उसी समय उन्होंने अपने मन में वास्तविक ज्ञान प्राप्त करने का संकल्प किया और सच्चे भगवान की खोज प्रारंभ करने का निश्वय किया।

3. समाज सुधार आंदोलन के रूप में रामकृष्ण मिशन की भूमिका की विवेचना कीजिए ।

Ans. विश्व प्रसिद्ध स्वामी विवेकानन्द के गुरु रामकृष्ण के नाम पर स्थापित रामकृष्ण मिशन समाज सुधार आन्दोलन के क्षेत्र में अपना पृथक् अस्तित्व रखता है। यह मिशन शिक्षा तथा समाज सेवा के क्षेत्र में निःस्वार्थ भाव से मानव मात्र के कल्याण के लिए क्रियाशील है। रामकृष्ण परमहंस सन् 1835 में बंगाल के एक गाँव में जन्में थे। 

बचपन में ही इन्हें संगीत और कविता का बहुत शौक था। ये इतने कल्पनाशील थे कि देवी-देवताओं की पूजा करते समय समाधिस्थ हो जाते थे। वे नाटकों में अभिनय भी करते थे। अभिनय में उन्हें परमानन्द का अनुभव प्राप्त होता था। 

रामकृष्ण परमहंस कलकत्ता (कोलकाता) के काली मंदिर के मुख्य पुजारी थे। वे काली के अनन्य भक्त थे। निरंतर देवी के ध्यान योग में वे लगे रहते थे। रामकृष्ण की आत्मिक शक्ति इतनी अधिक बढ़ गई थी कि उन्होंने देवी का, राम और कृष्ण का साक्षात् दर्शन किया था। कुछ दिन के लिए वे अपने गाँव गए और विवाह के पश्चात् पुनः मंदिर में आ गए।

यहाँ उन्होंने वैष्णव धर्म, बौद्ध धर्म, इस्लाम इत्यादि के विभिन्न सिद्धान्तों का प्रयोग किया। रामकृष्ण ने सामान्य लोगों के लाभ की दृष्टि से कहानियों के माध्यम से दर्शनशास्त्रों की व्याख्या की है। वे आधुनिक परिस्थितियों के संदर्भ में धार्मिक रूपरेखा प्रस्तुत करना चाहते थे। 

उन्होंने घोषणा की कि दुःखी मानव की सेवा करना ही वास्तव में परमात्मा की पूजा करना है। प्रत्येक मनुष्य में ईश्वर विद्यमान है; नम्रता, स्वार्थ, त्याग, पवित्रता और सबसे अधिक मनुष्य मात्र से प्रेम-भावना ही सच्ची भक्ति है। 

रामकृष्ण परमहंस ने अपनी आत्मिक शक्ति और व्यावहारिक अध्यात्मवाद से एक ऐसे महापुरुष की सृष्टि की जिसने भारत की दासता के दिनों में भी पाश्चात्य संसार के प्रत्येक छोटे-बड़े लोगों को इतना प्रभावित किया कि वे भारतमाता के उस सपूत के सामने नतमस्तक हो गए। यह महापुरुष स्वामी विवेकानन्द थे।

स्वामी विवेकानन्द ने अपनी पहली भेंट में रामकृष्ण परमहंस से पूछा था कि क्या आपने ईश्वर देखा है ? उत्तर मिला, “हाँ, मैंने उसी प्रकार ईश्वर को देखा है जिस प्रकार में तुम्हें देख रहा हूँ।” परमहंस ने विवेकानन्द को बताया कि यदि मनुष्य परमात्मा से मिलने के लिए हृदय से तड़पने लगे तो वह निश्वय ही परमात्मा का दर्शन कर सकता है। स्वामी विवेकानन्द परमहंस के शिष्य बन गए।

स्वामी विवेकानन्द ने सन् 1886 में अपने गुरु की मृत्यु के पश्चात् रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। विवेकानन्द की तीव्र बुद्धि, तेज और वाक् शक्ति से मोहित होकर देश-विदेश के अनेक लोग इस मिशन के सदस्य बन गए। विवेकानन्द ने अमेरिका में विश्व धर्म सम्मेलन में वेदान्त पर जो भाषण दिया वह भारतवर्ष के गौरव के इतिहास में स्मरणीय रहेगा। इस भाषण से मुग्ध होकर अनेक दार्शनिक, विद्वान इनके भक्त हो गए। यूरोप और अमेरिका के अनेक स्थानों पर विवेकानन्द ने भारतीय संस्कृति का प्रचार और प्रसार किया। 

विवेकानन्द केवल धार्मिक पुजारी नहीं थे। उन्होंने आध्यात्मिकता और राष्ट्रीयता का अद्भुत समन्वय करके भारतवासियों के मन में अपने देश, अपने धर्म, अपनी संस्कृति के प्रति निष्ठा उत्पन्न की। 

वास्तव में हजारों वर्षों के पश्चात् स्वामी विवेकानन्द ने विदेशों में भारतीय सभ्यता और संस्कृति को पुनः प्रतिष्ठा प्राप्त कराने का सफल प्रयास किया। वे ढोंग और आडंबर नहीं करते थे। उन्होंने भारतवासियों को निद्रा त्यागने और जागृत होकर अपने देश को अपनी शक्ति और सामर्थ्य के आधार पर एक उन्नत राष्ट्र के रूप में खड़ा करने का आह्वान किया।

4. मुस्लिम, सिक्ख तथा पारसियों में समाज सुधार की भावना की विवेचना कीजिए। 

Ans. मुसलमानों में सुधार आंदोलन – अब तक के हिन्दू धार्मिक नेताओं के समाज सुधार प्रयत्नों को देखकर मुसलमान लोगों में भी एक नयी चेतना और जागृति आई । 

अतः मुस्लिम समाज की धार्मिक और सामाजिक कुरीतियों को दूर करने के उद्देश्य से कई आन्दोलन प्रारंभ हुई उन्नीसवीं सदी में उदारतावादी सुधारक सर सैयद अहमद खाँ ने मुसलमानों को एक सूत्र में संगठित करने तथा पिछड़ेपन की स्थिति सुधारने के लिए सन् 1875 में एक शिक्षा संस्था की स्थापना की जो कि बाद में सन् 1910 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के नाम से विश्वविख्यात हुई। 

इनके द्वारा ‘मुस्लिम समाज सुधार’ नामक एक पत्रिका भी जारी की गई। इन्हीं को मुसलमानों में सामान्य रूप से तथा विशेषकर मुसलमान स्त्रियों और लड़कियों में शिक्षा का प्रचार-प्रसार करने का श्रेय प्राप्त है। इतनी अधिक जटिल पर्दा प्रथा होते हुए भी, इनकी महिलाओं में शिक्षा प्रचार हो जाना वास्तव में एक कठिन कार्य था।

अलीगढ़ आन्दोलन के अतिरिक्त मुसलमानों में ‘अहमदिया आंदोलन’ मिर्जा गुलाम अहमद कादिमी के नेतृत्व में प्रारंभ हुआ। इन्होंने ‘कदियानी सम्प्रदाय’ की नींव डाली तथा सभी धर्मों में सुधार को अपना लक्ष्य बनाया। 

इस आन्दोलन का प्रभाव पंजाब में अधिक पड़ा सन् 1885 में अंजुमन-ए-हिमायत-इस्लाम की स्थापना हुई जिसका उद्देश्य मुसलमानों की सामाजिक, नैतिक

व बौद्धिक उन्नति करना था। सन् 1894 में इसी प्रकार की एक अन्य संस्था स्थापित की गई जिसका नाम नदवाद-उल-उलेमा था। 

इन सुधार आन्दोलनों का प्रभाव बीसवीं सदी के राजनीति पर भी पड़। खान अब्दुल गफ्फार खान के नेतृत्व में ‘खुदाई खिदमतगार’ आन्दोलन चलाया गया और मुस्लिम लीग ने मुसलमानों में एकता, जागृति और सुधार का सबसे अधिक प्रचार-प्रसार किया। इतना ही नहीं, लीग के नेतृत्व में मुसलमानों में जो धार्मिक व राजनैतिक जागृति आई उसके परिणामस्वरूप पाकिस्तान के इस्लामिक गणतंत्र की स्थापना हुई ।

5. संस्कृतिकरण की प्रक्रिया को स्पष्ट कीजिए । 

Ans. समाजशास्त्री एम. एन. श्रीनिवास के अनुसार, “संस्कृतिकरण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा कोई निम्न हिन्दू जाति या कोई जनजाति अथवा अन्य समूह किसी उच्च और प्रायः द्विज जाति की दशा में अपने रीति-रिवाज, कर्मकांड, विचारधारा और जीवन पद्धति को बदलता है।” 

संस्कृतिकरण में नए विचारों और मूल्यों को ग्रहण किया जाता है। निम्न जातियाँ अपनी स्थिति को ऊपर उठाने के लिए ब्राह्मणों के तौर-तरीकों को अपनाती हैं और अपवित्र समझे जाने वाले मांस-मदिरा के सेवन को त्याग देता है। इन कार्यों से ये निम्न जातियाँ स्थानीय अनुक्रम में ऊँचे स्थान की अधिकारी हो गई हैं। 

इस प्रकार संस्कृतिकरण नये और उत्तम विचार, आदर्श मूल्य, आदत तथा कर्मकांडों को एवं अपनी जीवन स्तर को ऊँचा और परिमार्जित बनाने की क्रिया है। संस्कृतिकरण की प्रक्रिया में स्थिति में परिवर्तन होता है। इसमें संरचनात्मक परिवर्तन नहीं होता। 

जाति व्यवस्था अपने आप नहीं बदलती। संस्कृतिकरण की प्रक्रिया जातियों में ही नहीं बल्कि जनजातियों और अन्य समूहों में भी पाई जाती है। भारतीय ग्रामीण समुदायों में संस्कृतिकरण की प्रक्रिया प्रभु-जाति की भूमिका का कार्य करती है। 

यदि किसी क्षेत्र में ब्राह्मण प्रभु जाति है तो वह ब्राह्मणवादी विशेषताओं को फैला देगा जब निम्न जातियाँ ऊँची जातियों के विशिष्ट चरित्र को अपनाने लगती हैं तो उनका कड़ा विरोध होता है। कभी-कभी ग्रामों में इसके लिए झगड़े भी हो जाते हैं। संस्कृतिकरण की प्रक्रिया बहुत पहले से चली आ रही है। इसके लिए ब्राह्मणों का वैधीकरण आवश्यक है।


FAQs


1. अलीगढ़ आंदोलन के नेता कौन थे ? 

Ans. सर सैय्यद अहमद खाँ अलीगढ़ आंदोलन के नेता थे।

2. रामकृष्ण मिशन की स्थापना कब और किसने की थी ? 

Ans. सन् 1897 में स्वामी विवेकानन्द ने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की थी। 

3. संस्कृतिकरण से आप क्या समझते हैं ?

Ans. संस्कृतिकरण एक प्रक्रिया है जिसमे एक निम्न हिंदू जाति या कोई आदिवासी पा अन्य समूह अपनी परंपरा, रीति-रिवाज सिद्धांत और जीवन शैली को एक उच्च और द्विज जति के नियमों में परिवर्तित कर देता है। इससे जाति अनुक्रम के अंदर बदलाव आता है परंतु जाति व्यवस्था अपने आप में नहीं बदलती।

4 पश्चिमीकरण से आप क्या समझते हैं ? 

Ans. प्रसिद्ध समाजशास्त्री श्री निवास के अनुसार, “इस शब्द में डेढ़ सौ वर्षों से अधिक के अंग्रेजी शासन के फलस्वरूप भारतीय समाज और संस्कृति में आये परिवर्तन तथा विभिन्न स्तरों पर प्रौद्योगिकी, संस्थाओं, विचारधारा तथा मूल्यों में आए परिवर्तन सम्मिलित हैं।

5. धर्म निरपेक्षीकरण से क्या तात्पर्य हैं ?

Ans. धर्म निरपेक्षीकरण सामाजिक परिवर्तन की वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा सार्वजनिक मामलों में धर्म का प्रभाव कम होता जाता है तथा उसका स्थान व्यावहारिक दृष्टि ले लेती है। जब धर्म निरपेक्षीकरण विकसित होता है तब प्राकृतिक और सामाजिक जीवन को समझने के नजरिये के रूप में धर्म का स्थान विज्ञान ले लेता है।

NOTES & QUESTIONS ANSWER


  1. Introducing Indian Society
  2. The Demographic Structure of the Indian Society
  3. Social Institutions: Continuity and Change
  4. The Market as a Social Institution
  5. Patterns of Social Inequality and Exclusion
  6. The Challenges of Cultural Diversity
  7. suggestions for projects work
  1. Structural Change
  2. Cultural Change
  3. The Story of Indian Democracy
  4. Change and Development in Rural Society
  5. Change and Development in Industrial Society
  6. Globalisation and Social Change
  7. Mass Media and Communications
  8. Social Movements

MCQS IN ENGLISH


  1. Introducing Indian Society
  2. The Demographic Structure of the Indian Society
  3. Social Institutions: Continuity and Change
  4. The Market as a Social Institution
  5. Patterns of Social Inequality and Exclusion
  6. The Challenges of Cultural Diversity
  1. Structural Change
  2. Cultural Change
  3. The Story of Indian Democracy
  4. Change and Development in Rural Society
  5. Change and Development in Industrial Society
  6. Globalisation and Social Change
  7. Mass Media and Communications
  8. Social Movements

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