VVI Class 12 PART B Sociology Chapter 3 Notes In Hindi भारतीय लोकतंत्र की कहानियाँ

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VVI Class 12 PART B Sociology Chapter 3 Notes In Hindi भारतीय लोकतंत्र की कहानियाँ

Class12th 
Chapter Nameभारतीय लोकतंत्र की कहानियाँ
Chapter numberChapter 3
PART B
Book NCERT
SubjectSociology
Medium Hindi
Study MaterialsNotes & Questions answer
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भारतीय लोकतंत्र की कहानियाँ


लोकतंत्र जनता का, जनता के द्वारा तथा जनता के लिए शासन है। लोकतंत्र की दो मुख्य श्रेणियाँ हैं—प्रत्यक्ष लोकतंत्र और प्रतिनिधिक (परोक्ष) लोकतंत्र। विशाल और जटिल आधुनिक समाज में प्रत्यक्ष लोकतंत्र की संभावनाएं बहुत कम है। 

आजकल हर जगह सामान्यतः प्रतिनिधिक लोकतंत्र ही पाया जाता है, चाहे वह 50,000 की जनसंख्या वाला एक कस्बा हो या फिर 10 करोड़ की जनसंख्या वाले राष्ट्र । इसमें सार्वजनिक हित की दृष्टि से राजनीतिक निर्णय लेने, कानून बनाने और कार्यक्रमों को लागू करने के लिए नागरिक स्वयं अधिकारियों को चुनते हैं। हमारे देश में प्रतिनिधिक लोकतंत्र है। 

VVI Class 12 PART B Sociology Chapter 3 Notes In Hindi भारतीय लोकतंत्र की कहानियाँ

प्रत्येक नागरिक को अपने प्रतिनिधि के रूप में मत देने का अधिकार है। लोग पंचायत, नगर निगम बोर्ड, विधान सभाओं, संसद आदि सभी स्तरों पर अपना प्रतिनिधि चुनते हैं।

“प्रत्येक राज्य के लिए संविधान का होना अनिवार्य रूप से आवश्यक है। इसका कारण यह है कि संविधान के बिना किसी भी राज्य का शासन हो पाना बड़ा कठिन है। अगर राज्य न हो तो एक ओर समाज में जंगलराज कायम होने का पूरा खतरा बना रहता है, तो दूसरी ओर उस राज्य में संविधान न होने पर शासनकर्ताओं की मनमानी, निरंकुशता और अत्याचार का डर उत्पन्न हो जाता है।

राज्य की भूमिका सामाजिक आर्थिक सुधारों के संबंध में बहुत महत्त्वपूर्ण है। कल्याणकारी राज्य वह व्यवस्था है जिसमें सरकार अपने नागरिकों के कल्याण की जिम्मेदारी प्राथमिक रूप से स्वीकार करती है। 

राज्य यह निश्चित करता है कि लोगों के पास भोजन, मकान, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार जैसी सुविधाएँ पर्याप्त मात्रा में हों। सभी नागरिकों के कल्याण के लिए सरकार विभिन्न योजनाओं का निर्माण करती है। हमारा लोकतंत्र संसार में सबसे बड़ा है। हमने गणतंत्रीय संविधान व शासन प्रणाली को स्वीकार किया। 

हमने सभी नागरिकों के लिए न्याय, स्वतंत्रता, समानता तथा भाईचारे को प्राप्त करने का निश्चय किया। भारत एक प्रभुसत्ता संपन्न, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक संसदीय शासन तंत्रयुक्त गणराज्य है। यह गणराज्य संविधान द्वारा शासित है। इस संविधान में नागरिकों को कुछ मूलभूत अधिकार प्रदान किये गये हैं। वे मौलिक अधिकारों के रूप में जाने जाते हैं। मीलिक अधिकारों की छः श्रेणियाँ हैं। 

संविधान के अनच्छेद 12 से 35 में इनका उल्लेख किया गया है। ये अधिकार हैं-समानता का अधिकार, स्वतंत्रता का अधिकार, शोषण के विरुद्ध अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार, सांस्कृतिक और शैक्षणिक अधिकार, संवैधानिक उपचारों का अधिकार।

संविधान ने राज्य की नीतियों के लिए नीति निर्देशक सिद्धांतों का प्रावधान किया है। मूल अधिकारों के समान ही नीति निर्देशक सिद्धांतों की अवधारणा हमारे स्वतंत्रता आंदोलन के केंद्र में समाहित है। 

आजादी के बाद राज्यों द्वारा बनाई गई योजनाओं को दिशा-निर्देश देने के लिए इन निर्देशक तत्त्वों का समावेश किया गया है। राज्य लोगों के कल्याण को बढ़ावा देने के लिए एक ऐसे सामाजिक ढाँचे को मजबूत बनाने के लिए प्रयास करेगा जिसमें सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय राष्ट्रीय जीवन की सभी संस्थाओं को संपोषित करेगा। राज्य से सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक कार्यक्रम निश्चित करने के लिए उचित कदम उठाने की अपेक्षा की जाती है।



मौलिक अधिकारों और राज्य के नीति निर्देशक तत्त्वों में एक अंतर यह भी है कि मौलिक अधिकारों में होने वाले किसी भी हस्तक्षेप को न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है, परन्तु नीति निर्देशक तत्वों के संदर्भ में ऐसा नहीं किया जा सकता। नीति निर्देशक तत्त्व देश के शासन में आधारभूत है तथा यह राज्य का कर्तव्य होगा कि वह कानूनों के निर्माण में उनका ध्यान रखें। भारतीय संविधान में नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों का भी निर्धारण किया गया है। 

इसके अनुसार प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य होगा कि वह संविधान का पालन करें, देश की अखंडता और प्रभुसत्ता की रक्षा के लिए प्रयत्न करे, राष्ट्र के लिए सेवाएं प्रदान करे। भारतीय संविधान देश की महिलाओं और पुरुषों को राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक क्षेत्र में समान अधिकार एवं अवसर प्रदान करता है और लिंग के आधार पर भेदभाव को रोकता है। 

राज्य को महिलाओं के हित के लिए अलग से नियम बनाने का अधिकार प्रदान करता है। आजीविका के लिए समान अवसर तथा समान काम के लिए समान वेतन देने का निर्देश व राज्यों को काम करने के लिए योग्य, उपयुक्त एवं मानवीय परिस्थितियों को सुनिश्चित करने का निर्देश भी देता है। 

बच्चों, अनुसूचित जातियों, जनजातियों एवं अन्य पिछड़े वर्गों के कल्याण के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई है। अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए संवैधानिक सुरक्षा की व्यवस्था की गई है। पंचवर्षीय योजनाओं में समाज के उपेक्षित वर्गों के सशक्तिकरण तथा उन्हें सामाजिक न्याय प्रदान करने के लिए समुचित व्यवस्था की गई है।

CLASS 12 NCERT SOLUTION IN ENGLISHCLASS12 NCERT SOLUTION IN HINDI
Historyइतिहास
Geography भूगोल
Political science राजनीति विज्ञान
English SubjectResult
Hindi SubjectHistory answer keys

पहली बार 1992 में 73वें संविधान संशोधन के रूप में मौलिक व प्रारंभिक स्तर पर लोकतंत्र और विकेंद्रीकृत शासन का परिचय मिलता है। इस अधिनियम ने पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक प्रस्थिति प्रदान की। अब यह अनिवार्य हो गया है कि स्थानीय स्वशासन के सदस्य गाँवों तथा नगरों में हर पाँच साल में चुने जाएँ । इससे भी महत्त्वपूर्ण यह है कि स्थानीय संसाधनों पर अब चुने हुए निकार्यों का नियंत्रण होता है। संविधान के 73वें संशोधन ने बीस लाख से अधिक जनसंख्या वाले प्रत्येक राज्य में त्रिस्तरीय पंचायती राज प्रणाली लागू की।

सरकार के लोकतांत्रिक प्रारूप में राजनीतिक दल मुख्य भूमिका अदा करते हैं। राजनीतिक दल एक ऐसा संगठन होता है जो सत्ता हथियाने और सत्ता का उपयोग कुछ विशिष्ट कार्यों को सम्पन्न करने के उद्देश्य से स्थापित करता है। 

राजनीतिक दल समाज की कुछ विशेष समझ और यह कैसे होना चाहिए पर आधारित होते हैं । लोकतांत्रिक प्रणाली में विभिन्न समूहों के हित राजनीतिक दलों द्वारा ही प्रतिनिधित्व प्राप्त करके पूरा करते हैं जो उनके मुद्दों को उठाते हैं। हित समूह राजनीतिक क्षेत्र में कुछ निश्चित हितों को पूरा करने के लिए बनाए जाते हैं।


Class 12 PART B Sociology Chapter 3 Question answer


1. हित समूह प्रकार्यशील लोकतंत्र के अभिन्न अंग हैं। चर्चा कीजिए।

Ans. छित समूह अपने हितों की प्राप्ति के लिए निम्नलिखित साधनों का प्रयोग करते हैं- 

(i) जनमत का निर्माण हित समूह विभिन्न प्रश्नों के सम्बन्ध में जनता को शिक्षित करके जनमत का निर्माण करने में सहायता करते हैं। इसलिए वे समाचार पत्रों में लेख लिखवाते हैं,रोस्टर निकलवाते हैं तथा रेडियो, दूरदर्शन द्वारा प्रचार करवाते हैं। 

(ii) समाचार पत्रों पर नियंत्रण हित समूह जनमत को अपने पक्ष में करने के लिए समाचार पत्रों पर नियंत्रण रखते हैं जिससे कि उनके हितों का प्रचार हो सके। 

(iii) चुनावों में सक्रिय योगदान- यद्यपि हित समूह स्वयं को राजनीति से दूर रखते हैं परंतु वे सभी दलों में अपनी सांठ-गांठ बनाए रखते हैं। जो भी दल चुनाव जीतता है वह उनके हितों के विरुद्ध कार्य नहीं करता।

(iv) नौकरशाही पर दबाव डालना – हित समूहों के प्रतिनिधि नौकरशाही के महत्त्वपूर्ण पदाधिकारियों के साथ संपर्क बनाए रखते हैं तथा अनुचित ढंग से उनको प्रभावित करके शासकीय नीति को अपने पक्ष में बनवाने का प्रयत्न करते रहते हैं।

(V) मंत्रियों को प्रभावित करना-जिन देशों में संसदीय शासन प्रणाली की व्यवस्था की गई है वहाँ हित समूह मंत्रियों को प्रभावित करके शासकीय नीति को अपने पक्ष में करवाने का प्रयत्न करते रहते हैं कि उनके हितों के रक्षक व्यक्तियों को मंत्री बनाया जाए। 

(vi) हड़ताल तथा प्रदर्शन- कई बार हित समूह अपने हितों के लिए हड़ताल करवाते हैं तथा प्रदर्शनों का आयोजन करते हैं जिससे शासन पर दबाव पड़ सके। विश्व हिन्दू परिषद् द्वारा इस प्रकार के कार्य इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हैं।

“उपर्युक्त उदाहरणों से स्पष्ट है कि हित समूह सरकार में शामिल न होकर भी लोकतंत्र के अभिन्न अंग हैं।

2. संविधान सभा की बहस के अंशों का अध्ययन कीजिए। हित समूहों को पहचानिए । समकालीन भारत में किस प्रकार के हित समूह हैं ? ये कैसे कार्य करते हैं ?

Ans. संविधान सभा की बहस के अंश : के. टी. शाह ने कहा कि लाभदायक रोजगार को श्रेणीगत बाध्यता के द्वारा वास्तविक बनाया जाना चाहिए और राज्य की यह जिम्मेदारी हो कि वह सभी समर्थ व योग्य नागरिकों को लाभदायक रोजगार उपलब्ध कराए। 

 बी. दास ने सरकार के कार्यों को अधिकार क्षेत्र व अधिकार क्षेत्र से बाहर की श्रेणियों में वर्गीकृत करने का विरोध किया, “मैं समझता हूँ कि मुखमरी को समाप्त करना, सभी नागरिकों को सामाजिक न्याय देना और सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करना सरकार का प्राथमिक कर्तव्य …….लाखों लोगों की कभी वह मार्ग नहीं ढूंढ पाई कि संघ का संविधान उनकी भूख से मुक्ति सुनिश्चित करेगा, सामाजिक न्याय, न्यूनतम मानक जीवन स्तर और न्यूनतम जन स्वास्थ्य सुनिश्चित करेगा।”

अंबेदकर का उत्तर इस प्रकार था – “संविधान का जो प्रारूप बनाया गया है वह देश के शासन के लिए केवल एक प्रणाली उपलब्ध कराएगा। इसकी यह योजना बिल्कुल नहीं है कि कोई विशेष दल सत्ता में लाया जाए, जैसा कि कुछ देशों में हुआ है। अगर व्यवस्था लोकतंत्र को संतुष्ट करने की परीक्षा में खरी उतरती है, तो यह जनता द्वारा निश्चित किया जाएगा कि कौन सत्ता में होना चाहिए। 

लेकिन जिसके हाथ में सत्ता है वह मनमानी करने के लिए स्वतंत्र नहीं है। उसे निदेशक सिद्धांत कहे जाने वाले अनुदेशों का सामना करना पड़ेगा जिन्हें वह अनदेखा नहीं कर सकता है। हाँ, इनके उल्लंघन के लिए वह न्यायालय में उत्तरदायी नहीं होगा। लेकिन चुनाव के समय निर्वाचकों के सामने उसे इन बातों का उत्तर देना होगा। निदेशक सिद्धांत जिन महान मूल्यों से संपन्न हैं उन्हें तभी अनुभव किया जा सकता है जब सत्ता पाने के लिए सही योजना का क्रियान्वयन किया जाए।”

भूमि-सुधार के विषय में नेहरू ने कहा कि सामाजिक शक्ति इस तरह की है कि कानून इस संदर्भ में कुछ नहीं कर सकता है जो इन दोनों की गतिशीलता का एक रोचक प्रतिबिंब है । “अगर कानून और संसद स्वयं को बदलते परिदृश्य के अनुकूल नहीं करते तो ये स्थितियों पर नियंत्रण नहीं कर पाएँगे।”

संविधान सभा की बहस के समय आदिवासी हितों की रक्षा के मामले में जयपाल सिंह जैसे नेता, नेहरू के निम्नलिखित शब्दों द्वारा आश्वस्त किए गए- “यथासंभव उनकी सहायता करना हमारी अभिलाषा और निश्चित इच्छा है; यथासंभव उन्हें कुशलतापूर्वक उनके लोभी पड़ोसियों से बचाया जाएगा और उन्हें उन्नत किया जाएगा।”

संविधान सभा ने ऐसे अधिकारों को जिन्हें न्यायालय लागू नहीं करवा सकता, राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांतों के शीर्षक के रूप में स्वीकार किया तथा सर्व स्वीकृति से कुछ अतिरिक्त सिद्धांत जोड़े गए। इनमें के. संघानम का वह खंड भी सम्मिलित है जिसमें राज्य को गाम पंचायतों की स्थापना करना तथा स्थानीय स्वशासन के लिए उन्हें अधिकार व शक्ति भी देनी चाहिए।


अति लघु उत्तरीय प्रश्न (VERY SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS)


1.प्रत्येक राज्य के लिए संविधान की आवश्यकता और अनिवार्यता क्यों है ? 

Ans. प्रत्येक राज्य के लिए संविधान की आवश्यकता और अनिवार्यता इसलिए है कि इसमें सरकार के सभी अंगों के कार्य और अधिकार तथा नागरिकों और राज्य के आपसी संबंधों का कर दिया जाता है। अतः शासन आसानी से चलाया जा सकता है।

2. संविधान के अभाव में समाज की स्थिति कैसी होगी ? 

Ans. संविधान के अभाव में समाज के अंदर ‘जंगलराज कायम’ हो जायेगा।

3. भारतीय संविधान किस तिथि से लागू हुआ ?

Ans. भारतीय संविधान 26 जनवरी, सन् 1950 से लागू हुआ। 

4. लोकक्षेत्र से क्या तात्पर्य है ?

Ans. लोकक्षेत्र या सावर्जनिक क्षेत्र से अभिप्राय उस क्षेत्र से है जिसमें केंद्रीय, राज्य व स्थानीय सरकारें होती हैं। सभी उद्यमों पर सरकारी नियंत्रण और स्वामित्व होता है। ये उद्यम आर्थिक कल्याण की दृष्टि से संचालित किए जाते हैं। 

5. निजी क्षेत्र से क्या अभिप्राय है ?

Ans. वह आर्थिक क्षेत्र जहाँ उत्पादन की गतिविधियाँ निजी उद्यमियों द्वारा चलाई जाती हैं। यह उद्यम निजी व्यक्ति या व्यक्तियों के प्रबंध, नियंत्रण और स्वामित्व में होती है। उसे निजी क्षेत्र क उद्यम कहते हैं। वह लाभ कमाने के उद्देश्य से उत्पादन की क्रिया का संचालन करता है।

6. निजीकरण से क्या अभिप्राय है ? 

Ans. जब सरकारी उद्यम व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह को बेचे जाते हैं अथवा चलाने के लिए दिए जाते हैं तो यह प्रक्रिया निजीकरण कहलाती है।

7. उदारीकरण से क्या अभिप्राय है ?

Ans. उदारीकरण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें दो बातें सम्मिलित हैं- 

(i) निजी उद्यमियों को उन उद्यमों को चलाने की अनुमति दी जाती है जो पहले सरकार के अधिकार में थे।

(ii) निजी उद्यमों के लिए बनाए गए नियमों में ढील दी जाती है। इसमें विदेशी उद्यमों को भी चलाने की अनुमति दी जाती है। 

8. महिला सशक्तिकरण से क्या अभिप्राय है ?

Ans. जब महिलाएँ अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होती हैं उनके प्रति दृढ़ रहती हैं तो इसे महिला सशक्तिकरण कहते हैं।

9. मौलिक अधिकारों से क्या तात्पर्य है ?

Ans. भारतीय संविधान ने सभी नागरिकों को कुछ मूलभूत अधिकार प्रदान किए हैं। दे मौलिक अधिकारों के रूप में जाने जाते हैं। इन्हें मूलभूत अधिकार इसलिए कहा जाता है क्योंकि ये मानव के अस्तित्व के लिए आवश्यक है। हमारे संविधान के संदर्भ में मौलिक अधिकार इसलिए कहे जाते हैं क्योंकि वे लिखित संविधान द्वारा सुरक्षित हैं। 

10. भारतीय संविधान में कौन-से मौलिक अधिकारों का वर्णन किया गया है ?

Ans. भारतीय संविधान के तीसरे भाग के अनुच्छेद 12 से 35 में मूल अधिकार दिए गए हैं। ये निम्नलिखित हैं-

(i) समता का अधिकार 

(ii) स्वतंत्रता का अधिकार

(iii) शोषण के विरुद्ध अधिकार

(iv) धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार

(v) सांस्कृतिक और शैक्षणिक अधिकार

(vi) संवैधानिक उपचारों का अधिकार।

11. भारतीय नागरिकों के मौलिक कर्तव्य बताइये । 

Ans. राष्ट्रीय एकता को बढ़ाने से संबंधित मौलिक कर्तव्य निम्नलिखित हैं- की संप्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा के लिए कार्य करना।

(i) भारत अनुकरण करना।

(ii) देश की रक्षा करना।

(iii) भारत के सभी लोगों के भाईचारे की भावना को बढ़ावा देना।

(iv) हमारी साझा संस्कृति की समृद्ध धरोहर की सुरक्षा करना।

(v) संविधान का पालन करना तथा इसके राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रगान का सम्मान करना। 

(vi) राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों को मानना और उनका 

(vii) राष्ट्रीय पर्यावरण का संरक्षण तथा इसमें सुधार करना।

(viii) वैज्ञानिक मनोवृत्ति तथा जिज्ञासा की भावना को विकसित करना। 

(ix) सार्वजनिक संपत्ति का बचाव करना।

(x) व्यक्तिगत संपत्ति और सामूहिक गतिविधि के सभी क्षेत्रों में श्रेष्ठता के लिए प्रयास करना। 


लघु उत्तरीय प्रश्न (SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS)


1. भारतीय संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों का वर्णन कीजिए और उनकी सूची बनाइए । 

Ans. भारत के सविधान में नागरिकों को अग्रलिखित मौलिक अधिकार दिए गए हैं- 

(i) समता का अधिकार-भारत में जाति, लिंग, जन्म-स्थान तथा वर्ग आदि का भेदभाव किए बिना सबको समता का अधिकार दिया गया है। हमारे जैसे विषमताओं वाले देश में इस अधिकर का बड़ा महत्त्व है।

(ii) स्वतंत्रता का अधिकार-भारत में नागरिकों को भाषण देने की, समुदाय बनाने की, आवागमन तथा निवास करने आदि की पूर्ण स्वतंत्रता है। 

(iii) सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक अधिकार भारत में प्रत्येक नागरिक को अपनी भाषा एवं संस्कृति का विकास करने की पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त है। 

(iv) धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है, अतः उसके नागरिकों को किसी भी धर्म का अनुसरण करने का अधिकार है। 

(v) शोषण के विरुद्ध अधिकार- भारतीय संविधान के अनुसार कोई भी व्यक्ति किसी दूसरे का शोषण नहीं कर सकता। यहाँ बेगार लेने, 14 वर्ष से कम आयु वाले बच्चों को कारखाने में रखने तथा स्त्रियों और बच्चों को खरीदने-बेचने आदि की मनाही है। 

(vi) संवैधानिक उपचारों का अधिकार-भारत में कोई भी नागरिक अपने अधिकारों को रक्षा के लिए किसी भी न्यायालय की शरण ले सकता है। 

2. मौलिक अधिकारों और राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों में अंतर बताइये । 

Ans. मौलिक अधिकार मौलिक अधिकार व्यवहार्य होते हैं। यदि इन अधिकारों का हनन – होता है तो नागरिक उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय में जा सकते हैं और अपने अधिकारों की सुरक्षा की मांग कर सकते हैं। मौलिक अधिकारों का संबंध नागरिकों या व्यक्तियों से होती है जो मौलिक अधिकार पर नियंत्रण रखने का कार्य करते हैं। मौलिक अधिकर नागरिकों के सर्वांगीण विकास के अवसर प्रदान करते हैं।

राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांत-निर्देशक सिद्धांत व्यवहार्य नहीं है। यदि कोई सरकार इनकी अवहेलना करे तो हम न्यायालय की सहायता नहीं ले सकते। निर्देशक सिद्धांतों का संबंग सरकारी नीतियों से होता है। निर्देश सिद्धांत सरकार से अनुरोध करते हैं कि वे इन सिद्धांतों से लागू करने के लिए कदम उठाये। राज्यनीति के निर्देशक सिद्धांत महान आदर्श है। वे सरकार के सम्मुख लक्ष्य निश्चित करते हैं। सरकार इन लक्ष्यों को प्राप्त कर देश को कल्याणकारी राज्य बना सकती है। 

3. मौलिक अधिकार हमारे लिए क्यों महत्त्वपूर्ण हैं ?

Ans. मौलिक अधिकार हमारे लिए महत्त्वपूर्ण हैं क्योंकि-

(i) मौलिक अधिकारों के अभाव में व्यक्ति अपना सर्वागीण विकास नहीं कर सकता । 

(ii) मौलिक अधिकार ही सुखी और स्वतंत्र जीवन व्यतीत करने का नैतिक बल देते ।

(ii) मौलिक अधिकार कार्यपालिका और व्यवस्थापिका की शक्तियों पर अंकुश रखते हैं। 

(iv) इनके द्वारा नागरिक शोषण से बचता है।

(v) मौलिक अधिकार सभी प्रकार की स्वतंत्रताएँ नागरिकों को उपलब्ध कराते हैं। 

(vi) मौलिक अधिकार अल्पसंख्यकों में सुरक्षा की भावना को जगाते हैं।

(vii) बच्चों, महिलाओं और समाज के कमजोर 

4. किन्हीं पाँच मूलभूत कर्त्तव्यों की सूची बनाइए । Or, भारत के नागरिकों के मौलिक कर्तव्य क्या है ?वर्गों का कल्याण सुनिश्चित करते हैं।

Ans. भारतीय संविधान ने नागरिकों के मौलिक कर्त्तव्यों का भी निर्धारण किया है। सन् 1976 में संविधान के बयालीसवें संशोधन के अनुच्छेद 51 के अनुसार भारत के प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य होगा- 

(i) संविधान का पालन करना

(iii) राष्ट्र के स्वतंत्रता आंदोलन के पीछे विद्यमान भावनाओं का सम्मान तथा अनुसरण करना।

(iii) देश की प्रभुसत्ता और अखंडता को बनाए रखना तथा उसकी रक्षा करना।

(iv) राष्ट्र की रक्षा करना और राष्ट्र के लिए अपनी सेवा प्रदान करना।

(v) आपसी भाईचारे का विकास करना और महिलाओं के सम्मान को ठेस पहुँचाने वाले किसी कार्य को न करना।

(vi) पर्यावरण की सुरक्षा करना। 

(vii) सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा करना।

(viii) मिली-जुली संस्कृति की समृद्ध परंपरा को सुरक्षित रखना।

(ix) कार्यकलापों में उत्कृष्टता के लिए प्रयास करना।

(x) वैज्ञानिक प्रकृति व सोच को विकसित करना।

5. शोषण के विरुद्ध अधिकार की व्याख्या कीजिए। 

Ans. इस अधिकार का उद्देश्य है-समाज का कोई भी शक्तिशाली वर्ग किसी कमजोर वर्ग पर अन्याय न कर सके। इस अधिकार के अनुसार- 

(i) किसी व्यक्ति को किसी भी रूप में किसी मनुष्य का शोषण करने का अधिकार नहीं है। 

(ii) किसी भी व्यक्ति का क्रय तथा विक्रय नहीं हो सकता है।

(iii) किसी अन्य व्यक्ति से बेगार और जबरदस्ती से काम नहीं लिया जा सकता है। 

(iv) बच्चे राष्ट्र की संपत्ति हैं, उन्हीं के विकास पर राष्ट्र का भावी विकास निर्भर है। 

6. समाज के कमजोर वर्गों को क्या सुविधाएँ प्रदान की गई हैं ? 

Ans. समाज के कमजोर वर्गों के लिए सामाजिक एवं आर्थिक उत्थान के लिए विशेष अधिकार उपलब्ध कराए गए हैं। उनके स्कूलों, कॉलेजो में स्थान आरक्षित किए गए ताकि उनका शैक्षणिक रूप से उत्थान हो सके। 

व्यवस्थापिकाओं में भी आरक्षण किया गया है। उन्हें शिक्षा प्राप्त करने के लिए विशेष रियायतें दी गई है। रोजगार के क्षेत्र में भी उनके लिए स्थान आरक्षित हैं छुआछूत को दंडनीय अपराध बना दिया गया है। वे सभी सार्वजनिक स्थानों का बिना भेदभाव के प्रयोग कर सकते हैं।

7. भारत में योजनाओं के महत्त्व की व्याख्या कीजिए । 

Ans. पंचवर्षीय योजनाएँ समाज में परिवर्तन का एक महत्त्वपूर्ण कारक है। यह कारक सामाजिक नीति में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप करता है। यह सामाजिक उद्देश्य को प्रतिबिंबित करता है। 

सामाजिक विकास में सहायक है। भारत में पंचवर्षीय योजनाएं स्वतंत्रता के पश्चात् आरंभ की गई। देश के संसाधन तथा विकास के मानचित्र को तैयार करने के लिए योजना तथा आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए आयोग का गठन किया गया। पंचवर्षीय योजनाओं के मुख्य उद्देश्य- 

(i) लोगों के जीवन स्तर को तेजी से सुधारना।

(ii) विकास की उच्च दर को प्राप्त करना।

(iii) संपत्ति व आय की असमानता को कम करना। 

(iv) बेरोजगारी को दूर करना।

(v) मूल्य स्तर में स्थिरता बनाए रखना।

(vi) कृषि और उद्योग क्षेत्र का तेजी से विकास कर विदेशों से आयात को कम करना और भुगतान संतुलन की समस्याओं को हल करना ।

8. महिलाओं और बच्चों के लिए क्या संवैधानिक प्रावधान है ? 

Ans. भारतीय संविधान के चौदहवें अनुच्छेद में महिलाओं और पुरुषों को राजनीतिक, आर्थिक तथा सामाजिक क्षेत्र में समान अधिकार एवं अवसर प्रदान करने का उल्लेख है। 

पंद्रहवे अनुच्छेद में लिंग के आधार पर व्यक्ति के साथ भेदभाव पर रोक लगाई गई है। राज्य को महिलाओं के हित में अलग से नियम बनाने का अधिकार प्राप्त है। 

आजीविका के समान अवसर तथा समान कार्य के लिए समान वेतन देने का निर्देश राज्यों को प्राप्त है। संविधान का अनुच्छेद 42 राज्यों को काम करने योग्य उपयुक्त और मानवीय परिस्थितियों को सुनिश्चित करने और प्रसूति सुविधाएँ प्रदान करने का निर्देश देता है। 

अनुच्छेद (51 क) के अनुसार प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य है कि वे किसी भी ऐसे कार्य से दूर रहें जो महिलाओं के सम्मान को ठेस पहुँचाता है। संविधान का अनुच्छेद 15(3) बच्चों के हित के लिए नियम बनाने का अधिकार देता है। 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों से कार्य करने का निषेध करता है, उन्हें कारखाने, खदान और दूसरे खतरनाक व्यवसायों में काम पर नहीं लगाया जा सकता। 14 वर्ष तक के सभी बच्चों के लिए निःशुल्क शिक्षा की व्यवस्था की गई है। 

9. मिश्रित अर्थव्यवस्था से क्या तात्पर्य है ?

Ans. भारत में मिश्रित अर्थव्यवस्था प्रणाली को अपनाया गया है। इसमें निजी क्षेत्र और सार्वजनिक क्षेत्र दोनों का ही अस्तित्व है। निजी क्षेत्र में छोटे और बड़े दोनों प्रकार के उद्यम सम्मिलित है। कृषि, आवास, निर्माण से संबंधित कार्य उपभोक्ता वस्तुओं का उत्पादन आदि निजी क्षेत्रों में है। 

सार्वजनिक क्षेत्र में बैंक, बीमा कंपनियों, इस्पात संयंत्र, भारी इंजीनियरिंग उद्योग, रेल, डाक व्यवस्था आदि सभी सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम हैं। टाटा, अंबानी, बिड़ला, सिंघानियां आदि निजी क्षेत्र के प्रमुख उत्पादक हैं। योजना काल के दौरान भारत में पर्याप्त औद्योगिक विस्तार हुआ है। 

सार्वजनिक क्षेत्र ने देश में उद्योग का आधारभूत ढांचा तैयार करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। सरकार द्वारा सिंचाई, बिजली, सड़कें, पुल, बाँध, इस्पात, कारखाने, खानों का विकास, हवाई अड्डों का निर्माण आदि सार्वजनिक क्षेत्र में किए गए हैं परंतु अब विनिवेश की प्रक्रिया शुरू हो गई है और निजीकरण की मुहिम धीरे-धीरे तेज हो रही है।

10. भारत की नौवीं पंचवर्षीय योजना के उद्देश्य बताइये । 

Ans. नौवीं पंचवर्षीय योजना (1997-2002) का मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित थे-

(i) उत्पादक रोजगार में वृद्धि तथा गरीबी उन्मूलन के लिए कृषि और ग्रामीण विकास को 7 प्राथमिकता देना। (ii) आर्थिक विकास की दर को स्थिर मूल्यों द्वारा बढ़ाना । 

(iii) सभी के लिए भोजन एवं पोषण सुनिश्चित करना।

(iv) सभी के लिए पेयजल, प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाएँ, प्राथमिक शिक्षा, मकान और संपर्क साधन जैसी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करना।

(v) जनसंख्या के विकास की दर को नियंत्रित करना।

(vi) सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन एवं विकास के लिए महिलाओं और सामाजिक रूप से वंचित अन्य वर्गों; जैसे—अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़े वर्ग तथा अल्पसंख्यकों का सशक्तिकरण करना।


दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (LONG ANSWER TYPE QUESTIONS)


1. भारतीय संविधान में दिए गए समानता के अधिकार का वर्णन कीजिए । 

Ans. समानता का अधिकार- भारतीय संविधान में अनुच्छेद 14 से 18 तक समानता के अधिकार का उल्लेख किया गया है। संविधान के अनुच्छेद 14 के अनुसार, भारत के राज्य क्षेत्र में राज्य किसी भी व्यक्ति को विधि के समक्ष समानता या कानून के सामने संरक्षण से वंचित नहीं करेगा। 

संविधान के अनुसार भारतीय संघ के समस्त नागरिक समान होंगे। नागरिकों में धर्म, अति, रंग तथा लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं किया जायेगा। समानता के अधिकार के अंतर्गत नागरिकों को निम्नलिखित समानतायें प्रदान की गई हैं–

(i) भेदभाव की समाप्ति – नागरिकों से धर्म, जाति, वर्ग, रंग तथा लिंग के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जायेगा। सभी वयस्क नागरिकों को समानता का अधिकार प्रदान किया गया है।

(ii) सरकारी पद प्राप्त करने की समानता- सभी नागरिकों को बिना किसी भेदभाव के सरकारी पद प्राप्त करने का अवसर प्रदान किया गया है, संविधान के अनुच्छेद 16(1) के अनुसार, समस्त नागरिकों के लिए सरकारी पदों पर नियुक्ति के लिए समान अवसर प्राप्त होंगे। अनुच्छेद 16(2) में कहा गया है कि केवल वंश, जाति, लिंग, जन्म-स्थान या इनमें से किसी एक के आधार पर किसी नागरिक के लिए अयोग्यता न होगी तथा न विभेद ही किया जायेगा।

(iii) अस्पृश्यता की समाप्ति – भारतीय संविधान द्वारा अस्पृश्यता का अंत कर दिया ग है। किसी भी रूप में अस्पृश्यता को मानना कानून अपराध है। यह सत्य है कि अस्पृश्यता की समाप्ति द्वारा किसी विशेष अधिकार की व्यवस्था नहीं की गई है, किंतु फिर भी अनुच्छेद 17 के परिणामस्वरूप भारतीय जनता के लगभग छठे भाग को एक दलित व्यवस्था से मुक्ति मिलती है। 

(iv) उपाधियों की समाप्ति संविधान द्वारा सभी प्रकार की उपाधियों का अंत कर दिया गया है। कोई भी भारतीय नागरिक किसी भी विदेशी सरकार से उपाधि प्राप्त नहीं करेगा। शिक्षा तथा राजनीति के क्षेत्र में की गई सेवाओं के लिए ही उपाधियाँ प्रदान की जायेंगी। 

(v) सार्वजनिक स्थानों का सभी के लिए खुला होना— प्रत्येक व्यक्ति बिना किसी भेदभाव के सार्वजनिक स्थानों का उपयोग कर सकता है।

2. संवैधानिक उपचारों के अधिकार से क्या तात्पर्य है ? 

Ans. संवैधानिक उपचारों का अधिकार संवैधानिक सुरक्षा के अभाव में मूल अधिकार निरर्थक हो जाते हैं। 

जी. एन. जोशी के अनुसार, “मौलिक अधिकारों की केवल घोषणा करते तथा उन्हें संविधान में सन्निहित करने से कोई लाभ नहीं है, जब तक कि उनकी सुरक्षा की प्रभावपूर्ण तथा सरल व्यवस्था न की जाए। अतः राज्य या नागरिक द्वारा संविधान में दिये गये मौलिक अधिकारों का यदि उल्लंघन किया जाता है, 

तो उनकी रक्षा हेतु दी गई व्यवस्था को संवैधानिक उपचारों का अधिकार कहा गया है। यदि नागरिकों के मूल अधिकारों में बाधा उपस्थित की जाती है तो वे उच्चतम न्यायालय अथवा उच्च न्यायालय में अपने अधिकारों की रक्षा हेतु जा सकते हैं। न्यायालय द्वारा संवैधानिक उपचार के अंतर्गत अग्रलिखित लेख जारी किये जा सकते हैं- 

(i) बंदी प्रत्यक्षीकरण—इस लेख का अर्थ है, ‘बंदी के शरीर को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करो।’ यह अवैध रूप से बंदी किये गये व्यक्तियों की सुरक्षा करता है।

(ii) परमादेश—इस लेख के अंतर्गत न्यायालय द्वारा किसी भी अधिकारी या संस्था को अपने कर्तव्यपालन करने का आदेश दिया जा सकता है।

(iii) प्रतिषेध- इस लेख के अंतर्गत न्यायालय द्वारा किसी व्यक्ति अथवा संस्था को उस कार्य को रोकने का आदेश दिया जा सकता है, जो उसके अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत न हो।

(iv) उत्प्रेक्षण लेख – इसका अर्थ है पूर्ण रूप से सूचित करना। इस लेख के अंतर्गत उच्च न्यायालय अपने अधीनस्थ न्यायालय से कोई भी रिकॉर्ड माँग सकता है।

(v) अधिकार पृच्छा-अधिकार पृच्छा लेख किसी व्यक्ति के किसी पद पर रहने के अधिकार की जाँच करने के उद्देश्य से जारी किया जाता है। इसके अंतर्गत माँग की जाती है।

कि वह उस अधिकर को प्रस्तुत करे, जिसके अंतर्गत वह पदाधिकारी बना है। 

3. मौलिक अधिकारों और राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों में अंतर स्पष्ट कीजिए। 

Ans. (i) विषय-वस्तु में अंतर- मौलिक अधिकारों का विषय व्यक्ति है, जबकि नीति-निर्देशक तत्त्वों का विषय राज्य है। 

(ii) स्थायित्व में अंतर—-मौलिक अधिकारों को कुछ परिस्थितियों में मर्यादित, सीमित, निलंबित या स्थगित किया जा सकता है, परन्तु नीति निर्देशक तत्त्वों के साथ ऐसी कोई बात नहीं है।

(iii) निर्माण में अंतर—मौलिक अधिकार नागरिकों को प्रत्यक्षतः संविधान द्वारा प्रदान किये गए हैं, लेकिन निर्देशक तत्त्वों का उपभोग वे राज्य-विधि के आधार पर ही कर सकते हैं। 

(iv) क्षेत्र में अंतर—निर्देशक तत्त्वों की विषय-वस्तु का क्षेत्र मौलिक अधिकारों से अधिक व्यापक है। मौलिक अधिकार राज्य-क्षेत्र के अंतर्गत व्यक्ति तक ही सीमित हैं, जबकि निर्देशक तत्त्वों में अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व के सिद्धांतों की भी चर्चा की गई है।

(v) स्वरूप में अंतर-अंत में, यदि मौलिक अधिकारों का अध्याय साध्य है, जो निर्देशक का अध्याय साधन है। अगर एक उत्तम जीवन का दर्शन है तो दूसरा उसका व्यावहारिक स्वरूप है।

4. राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों में समाजवादी सिद्धांतों का वर्णन कीजिए।

Ans. समाजवादी सिद्धांत – अधिकांश निर्देशक तत्त्व एक लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना करते है। इस प्रकार राज्य का आधार समाजवाद होगा। 

(i) सभी नागरिकों को समान रूप से जीवन-निर्वाह के पर्याप्त साधन प्राप्त हो सकें। 

(ii) सार्वजनिक कल्याण के लिए समाज के भौतिक साधनों का स्वामित्व और नियंत्रण तथा समुचित वितरण हो ।

(iii) सार्वजनिक हित के विरुद्ध धन के केंद्रीयकरण को रोका जाये। 

(iv) पुरुषों तथा स्त्रियों को समान कार्य के लिए समान वेतन मिले। 

(v) शिशु और किशोरावस्था को शोषण तथा नैतिक और भौतिक परित्याग से संरक्षण प्राप्त हो।

(vi) 42वें संवैधानिक संशोधन द्वारा आर्थिक सुरक्षा संबंधी दो निर्देशक तत्त्व जोड़े गये है। ये निर्देशक तत्त्व कमजोर वर्गों के लिए निःशुल्क कानूनी सहायता और औद्योगिक संस्थाओं के प्रबंध में कर्मचारियों को भागीदार बनाने की व्यवस्था से संबंधित है। निःसंदेह उपर्युक्त नीति-निर्देशक तत्त्व एक समाजवादी राज्य की स्थापना करन चाहते हैं। 

5. बौद्धिक उदारवादी राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांतों का वर्णन कीजिए । 

Ans. बौद्धिक उदारवादी सिद्धांत- इस वर्ग में वे तत्त्व रखे जा सकते हैं जिन पर उदारवादियों का प्रभाव पड़ा है- (i) राज्य सभी बच्चों को चौदह वर्ष की अवस्था तक निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा देने की व्यवस्था करेगा।

(ii) राज्य कृषि एवं पशुपालन का आधुनिकता तथा वैज्ञानिक ढंग से संगठन करेगा। 

(iii) राज्य नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता प्राप्त कराने का प्रयास करेगा। 

(iv) राज्य देश की कार्यपालिका से न्यायपालिका को पृथक करेगा। 

(v) अंतर्राष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा की उन्नति, राष्ट्रों के बीच न्यायपूर्ण सम्मानपूर्ण संबंध को बनाए रखने तथा अंतर्राष्ट्रीय विवादों को मध्यस्थता द्वारा निपटाने का प्रयास करने के लिए प्रोत्साहन देगा।


FAQs


1. मौलिक अधिकार हमारे लिए क्यों महत्त्वपूर्ण हैं?

Ans. 
(i) मौलिक अधिकार के अभाव में व्यक्ति अपना सर्वांगीण विकास नहीं कर सकता। मौलिक अधिकार हमें सुखी व स्वतंत्र जीवन व्यतीत करने का नैतिक बल देते हैं। 
(ii) मौलिक अधिकार हमें नागरिक शोषण से बचाते हैं। ये कार्यपालिका और व्यवस्थापिका की शक्तियों पर अंकुश लगाते हैं। 
(iii) मौलिक अधिकार सभी प्रकार की स्वतंत्रताएँ नागरिकों को उपलब्ध कराते हैं और सुरक्षा की भावना जगाते हैं।
(iv) बच्चों, महिलाओं और समाज के कमजोर वर्गों का कल्याण सुनिश्चित करते हैं।

2. संवैधानिक उपचारों का अधिकार क्या है ?

Ans. संवैधानिक उपचारों का अधिकार वह अधिकार है जो मौलिक अधिकारों की रक्षा हेतु संविधान में सम्मिलित किया गया है। यदि राज्य किसी नागरिक के मौलिक अधिकारों में हस्तक्षेप करता है या उनका हनन करता है तो नागरिक न्यायपालिका का दरवाजा खटखटा सकता है। न्यायपालिका आदेश, परमादेश, बंदी प्रत्यक्षीकरण लेख, अधिकार पृच्छा तथा उत्प्रेक्षण लेख जारी करके नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करती है।

3. हमारे संविधान में दिए गए समानता के अधिकार का वर्णन कीजिए । 

Ans. समानता के अधिकार से तात्पर्य है कि सभी नागरिकों को समान अधिकार और समान अवसर प्राप्त हो। कानून की दृष्टि से सभी समान हैं। भारत का संविधान धर्म, लिंग, जाति या  जन्मस्थान के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करता। समान अपराध के लिए समान दंड दिया सभी के लिए शिक्षा व रोजगार के समान अवसर उपलब्ध होंगे। सभी को सार्वजनिक स्थाना का बिना भेदभाव के प्रयोग करने का अधिकार है। समान कार्य के लिए समान वेतन प्रावधान है। सभी उपाधियों को समाप्त कर दिया गया है। 

4. अधिकारों और कर्तव्यों के बीच संतुलन क्यों आवश्यक है ?

Ans. अधिकार और कर्तव्य एक-दूसरे पर निर्भर करते हैं। ये एक-दूसरे के बिना अधूरे है। कर्तव्यों के बिना अधिकार अराजकता पैदा कर देंगे। अधिकारों के अभाव में कर्तव्य तानाशाही को जोर ले जा सकते हैं। अधिकार नागरिक तैयार करते हैं और कर्तव्य नागरिकों को अधिकारों 1 का उपयोग करने में सक्षम बनाने में राज्य की सहायता करते हैं। 

5. समानता लाने के लिए कुछ वर्गों के लिए क्या प्रयत्न किए गए हैं?

Ans. संविधान में समानता के अधिकार का लक्ष्य सामाजिक और आर्थिक समानता स्थापित करना है। सभी के लिए रोजगार के समान अवसर प्रदान करना आवश्यक है। अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए विशेष सुविधाओं की व्यवस्था की गई है। सामाजिक, आर्थिक रूप से ऊँचा उठाने के लिए शिक्षा, रोजगार, आवास की सुविधाएँ दी गई हैं । सरकारी पदों में आरक्षण दिया गया है। छुआछूत को अपराध माना गया है। सार्वजनिक स्थानों पर आने-जाने में कोई रुकावट नहीं है।

NOTES & QUESTIONS ANSWER


  1. Introducing Indian Society
  2. The Demographic Structure of the Indian Society
  3. Social Institutions: Continuity and Change
  4. The Market as a Social Institution
  5. Patterns of Social Inequality and Exclusion
  6. The Challenges of Cultural Diversity
  7. suggestions for projects work
  1. Structural Change
  2. Cultural Change
  3. The Story of Indian Democracy
  4. Change and Development in Rural Society
  5. Change and Development in Industrial Society
  6. Globalisation and Social Change
  7. Mass Media and Communications
  8. Social Movements

MCQS IN ENGLISH


  1. Introducing Indian Society
  2. The Demographic Structure of the Indian Society
  3. Social Institutions: Continuity and Change
  4. The Market as a Social Institution
  5. Patterns of Social Inequality and Exclusion
  6. The Challenges of Cultural Diversity
  1. Structural Change
  2. Cultural Change
  3. The Story of Indian Democracy
  4. Change and Development in Rural Society
  5. Change and Development in Industrial Society
  6. Globalisation and Social Change
  7. Mass Media and Communications
  8. Social Movements

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