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Class 12 Philosophy Important Questions in Hindi


Class12th 
Book NCERT
SubjectPhilosophy
Medium Hindi
Study MaterialsImportant questions answers
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Ncert Class 12 Philosophy Important Questions in Hindi


Ncert Class 12 Philosophy Important Questions in Hindi PDF Download

1. आध्यात्मिक अनुभूति किस दर्शनशास्त्र में बौद्धिक ज्ञान से उच्च माना गया है? 

(1) भारतीय दर्शन (Indian philosophy)

(2) पाश्चात्य दर्शन (Western philosophy)

(3) (1) एवं (2) दोनों (Both (1) and (2))

(4) इनमें से कोई नहीं (None of these)

Ans. (1)

2. निम्नलिखित में कौन-सा बौद्धिक दर्शन है? (Which of the following Philosophies is intellectual?).

(1) भारतीय दर्शन (Indian Philosophy)

(2) पाश्चात्य दर्शन (Western Philosophy) 

(3) (1) एवं (2) दोनों (Both (1) and (2))

(4) इनमें से कोई नही (None of these)

Ans. (2)

3. भारतीय दर्शन है (Indian philosophy is)

(1) व्यावहारिक (practical)

(2) अव्यावहारिक (impractical)

(3) सोपाधिक (hypothetical)

(4) इनमें से कोई नहीं (none of these)

Ans. (1)

4. भगद्गीता भगवान श्रीकृष्ण द्वारा कुरुक्षेत्र के युद्ध में किसको दिया गया उपदेश है ? 

(1) युधिष्ठिर (Yudhisthira)

(2) अर्जुन (Arjuna)

(3) भीम (Bhim)

(4) इनमें से कोई नहीं (None of these)

Ans. (2)

5. अनासक्ति योग नामक ग्रंथ की रचना किसने की है ? 

(1) बाल गंगाधर तिलक (Bal Gangadhar Tilak)

(2) महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi)

(3) डॉ. राधाकृष्णन (Dr. Radhakrishnan) 

(4) इनमें से कोई नहीं (None of them)

Ans. (2)

6. गीता रहस्य की रचना किसने की है? 

(1) बाल गंगाधर तिलक (Bal Gangadhar Tilak)

(2) महात्मा गाँधी (Mahatma Gandhi)

(3) श्री अरविन्द (Sri Aurobindo)

(4) इनमें से कोई नहीं (None of them)

Ans. (1)

7. गीता में योग शब्द का व्यवहार हुआ है 

(1) आत्मा से मिलन का (Collation with Soul)

(2) परमात्मा से मिलन का (Collation with God)

(3) आत्मा से परमात्मा के मिलन का (Collation of Soul with God)

(4) इनमें से कोई नहीं (None of these) 

Ans. (3) 

8. ग्रीक दर्शन के जनक हैं (The father of Greek Philosophy is)

(1) सुकरात (Socrates)

(2) बेलिज (Thales) 

(3) अरस्तु (Aristotle)

(4) प्लेटो (Plato)

Ans. (1)

9. किसके अनुसार गीता महाभारत का अंग है ? 

(1) श्री अरविन्द (Sri Aurobindo) 

(2) महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi)

(3) डॉ. राधाकृष्णन (Dr. Radhakrishnan)

(4) बाल गंगाधर तिलक (Bal Gangadhar Tilak) 

Ans. (4)

10. ज्ञान की प्राप्ति जन्मजात प्रत्यय से होती है। ऐसा मानना है (The knowledge is acquired by innate ideas is according to)

(1) अनुभववाद वा (Empiricism)

(2) बुद्धिवाद का (Rationalism)

(3) समीक्षाबाद का (Criticism)

(4) इनमें से कोई नहीं (None of these)

Ans. (1)

11. प्रागनुभविक ज्ञान संबंधित है 

(1) अनुभव से (Experience)

(2) बुद्धि से (Reason)

(3) (1) एवं (2) दोनों (Both (1) and (2))

(4) इनमें से कोई नहीं (None of these)

Ans. (3)

12. प्लेटो का दर्शन किस सिद्धांत से आरंभ होता है ? 

(1) बुद्धिवाद (Rationalism)

(2) अनुभववाद (Empiricism)

(3) ज्ञान सिद्धांत (Theory of knowledge)

(4) इनमें से सभी (All of these)

Ans. (1)

13. आधुनिक दर्शन ने विकास किया 

(1) ज्ञान सिद्धांत (Theory of knowledge).

(2) परिचात्य दर्शन (Western Philosophy)

(3) सत्य भीमांसा (Metaphysics)

(4) इनमें से सभी (All of these)

Ans. (4)

14. अनुभववाद के समर्थक हैं (The supported of Empiricism is)

(1) देवास (Descartes)

(2) स्पीनोजा (Spinoza) 

(3) धूम (Hume)

(4) इनमें से कोई नहीं (None of these)

Ans. (3)

15. किसी वस्तु की उत्पत्ति में जिस उपादान या कच्चे माल का व्यवहार होता है उसे कहा जाता है 

(1) उपादान कारण (Material cause) 

(2) निमित्त कारण (Efficient cause)

(3) आकारिक कारण (Formal cause) 

(4) प्रयोजन कारण (Teleological cause)

Ans. (1)

16. कार्य कारण नियम है (The law of causation is)

(1) वैज्ञानिक ( scientific)

(2) सामाजिक (social)

(3) दार्शनिक (philosophical)

(4) सामान्य (common) 

Ans. (1)

17. कारण क्या होता है ? (The causation is)

(1) पूर्ववर्त्ती ( antecedent) 

(2) अनोपाधिक (unconditional)

(3) नियत (regular) 

(4) इनमें से सभी (all of these) 

Ans. (4)

18. निम्न में से कौन संदेहवाद से संबंधित हैं ? (Which of the following thinkers is related to scepticism?)

(1) लॉक (Locke)

(2) स्पीनोजा (Spinoza)

(3) ग्रूम (Hume)

(4) प्लेटो (Plato)

Ans. (2)

19. एनीसेल्म के समय में किस सिद्धांत का वर्चस्व था ? (Which theory existed in the period of Aneselm ?)

(1) बल सिद्धांत (Force theory) 

(2) गति सिद्धांत (Motion theory)

(3) गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत (Graviration theory)

(4) इनमें से सभी (All of these)

Ans. (4)

20. स्पीनोजा के अनुसार मन एवं शरीर का संबंध है 

(1) क्रियावाद (Actionism)

(2) समानान्तरवाद (Parallelism)

(3) (1) एवं (2) दोनों

(4) इनमें से कोई नहीं 

Ans. (2)

21. वस्तु ज्ञाता से स्वतंत्र है। यह सोच है (Objects are independent from the knower. This thought is)

(1) भौतिक (Physical)

(2) तात्विक (Materialistic) 

(3) समीक्षा (Criticism)

(4) इनमें से कोई नही 

Ans. (1)

22. देकार्त ने स्वीकार है (Descartes accepted)

(1) समानान्तरवाद को (Parallelism)

(2) अयवाद की (Interactionism)

(3) पूर्वस्थापित सामंजस्य को (Pre-established harmony)

(4) इनमें से कोई नहीं (None of these)

Ans. (2)

23. लाइबनित्स का चिदणु विज्ञान किसका उदाहरण है ? 

(1) स्यादवाद (Syadvada)

(2) आध्यात्मिकता (Spiritual pluralism)

(3) अनेकपद (Anckanntarvada)

(4) इनमें से कोई नहीं (None of these)

Ans. (2)

24. ‘दर्शन’ शब्द व्युत्पन्न है (The word ‘Philosophy’ is originated from)

(1) दृश् धातु से (drish verb)

(2) कृ पातु से (kr verb)

(3) तम् धातु से (tam verb)

(4) इनमें से कोई नहीं 

Ans. (1)

25. फिलॉसॉफी का अर्थ है (The meaning of Philosophy is)

(1) ज्ञान के प्रति प्रेम (Love for knowledge)

(2) नियमों की खोज (Invention of laws)

(3) अमरत्व के लिए तीव्र उत्कंठा (Eagerness for immortality)

(4) इनमें से कोई नहीं (None of these)

Ans. (1)

26. “दर्शन संपूर्ण विश्व को उसके सर्वाश में समझाने का बौद्धिक प्रयास है।” यह परिभाषा है 

(1) मानवशास्त्र की (anthropology)

(2) दर्शनशास्त्र की (philosophy);

(3) धर्मशास्त्र की (religion) 

(4) इनमें से कोई नहीं 

Ans. (2)

27. आत्मा है (Atman (soul) is)

(1) आनन्द (Bliss)

(2) ज्ञान (Knowledge) 

(3) ब्रह्मा (Absolute )

(4) इनमें से सभी (All of these)

Ans. (4)

28. ‘दुख है’। इसकी चर्चा बुद्ध किस आर्य सत्य में करते हैं ? 

(1) प्रथम आर्य सत्य (First noble truth)

(2) द्वितीय आर्य सत्य (Second noble truth)

(3) तृतीय आर्य सत्य (Third noble truth)

(4) चतुर्थ आर्य सत्य (Fourth noble truth)

Ans. (1) 

29. बुद्ध के किस आर्य सत्य में निर्वाण का मार्ग वर्णित है ?

(1) प्रथम (First)

(2) द्वितीय (Second)

(3) तृतीय (Third)

(4) चतुर्थ (Fourth)

Ans. (4)

30. कौन-सा सिद्धांत विश्व को नियंत्रण में रखता है ? (Which theory keeps the world under control?)

(1) स्यादवाद (Syadvada)

(2) अनेकान्तवाद (Anckantavada)

(3) प्रतीत्यसमुत्पाद (Pratityasamutpada) 

(4) क्षणिकवाद (Momentariness)

31. जैन धर्म की धारणा क्या है? (What is the concept of Jain religion ?)

(1) आस्तिक धर्म (Theist religion)

(2) शाश्वत सत्य (Eternal truth).

(3) नास्तिक धर्म (Atheist religion)

(4) इनमें से कोई नहीं (None of these)

Ans. (2)

32. जैन दर्शन के प्रणेता हैं 

(1) गौतम (Gautam)

(2) कपिल (Kapil) 

(3) महावीर (Mahavira)

(4) इनमें से कोई नहीं (None of them)

Ans. (3)

33. जीव का रूप क्या है ? (What is the form of Jiva ?)

(1) नित्य (Nitya)

(2) शरीर में निवासित (Body living)

(3) प्रकाशमान ( Enlighting)

(4) इनमें से सभी (All of these) 

Ans. (4)

34. जैन दर्शन में ज्ञान की सापेक्षता का सिद्धांत है 

(1) स्यादवाद (Syadvada)

(2) अनेकान्तवाद (Anekantavada)

(3) अख्यातिवाद (Akhyativada)

(4) इनमें से कोई नहीं 

Ans. (1)

35. अनेकान्तवाद सिद्धांत संबंधित है (The theory of Anekantavada is related to)

(1) बौद्ध दर्शन से (Buddhist philosophy)

(2) जैन दर्शन से (Jain philosophy)

(3) चार्वाक दर्शन से (Charvaka philosophy) 

(4) इनमें से कोई नहीं (None of these)

Ans. (2)

36. अरस्तू के अनुसार कारण है (According to Aristotle, cause is)

(1) आकारिक (formal)

(2) उपादान (material) 

(3) अंतिम (final)

(4) इनमें से सभी (all of these)

Ans. (4)

37. काल के विभिन्न भेदानुसार नित्य एवं निराकार हैं 

(1) अव्यावहारिक काल (Impractical time)

(2) पारमार्थिक काल (Spiritual time)

(3) व्यावहारिक काल (Practical time)

(4) अपारमार्थिक काल (Non-spiritual time)

Ans. (2) 

38.बौद्ध दार्शनिक ने किस पर कोई विशेष जोर नहीं दिया है ?

(1) सम्प्रभुता (Samprabhuta) 

(2) समभूति (Samabhuti) 

(3) निज तत्व (Nija tatva)

(4) इनमें से कोई नहीं (None of these)

Ans. (2)

39. सुकरात के पहले सूफी मतं आया, उसे कहते हैं (Sufism that came before Socrates is called)

(1) सॉक्रस्ट (Sauchrast)

(2) अनुभववाद (Empiricism) 

(3) बुद्धिवाद (Rationalism) 

(4) इनमें से कोई नहीं (None of these)

Ans. (1)

40. किस काल का आरंभ एवं अन्त होता है ? 

(1) व्यावहारिक काल (Practical time)

(2) आजीव काल (Non-spirit time)

(3) पारमार्थिक काल (Spiritual time)

(4) संशयवाद काल (Scepticism time)

Ans. (1)


GROUP – A खंड- ‘क’


(अति लघु उत्तरीय प्रश्न) (Very short answer type questions) किन्हीं पाँच प्रश्नों के उत्तर दें। (Answer any Five questions)

1. बहुकारणवाद क्या है ? (What is pluralism ?)

Ans. एक घटना के अलग समय में अलग कारण का होना बहुकारणवाद कहलाता है। बेन के अनुसार बहुकारणवाद का सिद्धान्त वस्तु का तथ्य नहीं बलिक अपूर्ण ज्ञान का परिचायक है।

2. कारण का क्या अभिप्राय है ? (What do you mean by cause ?) 

Ans. कारण सभी भावात्मक तथा निषेधात्मक उपाधियों का संकलन है “A cause is the sum total of the conditions positive and negative taken together”। भावात्मक कारणांश वह है जिसकी उपस्थिति में कार्य पैदा होता है। अभावात्मक कारणांश यह है जिसकी अनुपस्थित में कार्य होता है।

3. वस्तुवाद कितने प्रकार के होते हैं ? (How many kinds of realism are there ?)

Ans. वस्तुवाद के दो प्रकार के होते है जो ये हैं- 

(i) लोकप्रिय वस्तुवाद (ii) दार्शनिक वस्तुवाद।

4. बुद्धिवादी दार्शनिकों के नाम बताइए। (Name the rationalist philosophers.)

Ans. पारमेनाइट्स, हेराक्लाइड्स, डोमोक्राइटस, सुकरात, प्लेटो, वूल्फ हीगेल, ऐकार्त, लेबनीज, स्पिनोजा आदि बुद्धिवादी दार्शनिक है।

5. देकार्त्त कौन थे ? (Who was Descartes ? )

Ans. देव बुद्धिवादी दार्शनिक थे।

6. उपाधि क्या है? (What is condition ?)

Ans. उपाधि यह मान और सम्मान है जो मनुष्य की उस क्षेत्र में जिसके लिए यह उपाधि दी गयी विशेष और उल्लेखनीय कार्य किया हो। दर्शनशास्त्र के अन्तर्गत बहुत सी स्थितियाँ मिलकर किसी कारण की रचना करती है इसलिए उपाधि सम्पूर्ण रूप में रहता है।

7. घटना एवं कारण के संबंध में आपका क्या कहना है ? (What do you say about the relationship of phenomena and cause ?)

Ans. पटना एवं कारण के सम्बंध में हमारा यह कहना है कि घटना सदा कारण के बाद ही घटित होती है। कारण महज एक संयोग होता है। जो घटना की शुरुआत को बताती है। यह क्षणिक होता है। कारण और घटना की संबंध में विकल्प का पूर्ण रूप से अभाव रहता है।


GROUP B खंड-‘व’


(लघु उत्तरीय प्रश्न) (Short answer type questions) किन्हीं पाँच प्रश्नों के उत्तर दें। (Answer any Five questions)

8. युद्धिवाद के अवगुण कौन से हैं? (What are the demerits of rationalism ?)

Ans. बुद्धिवाद का सबसे प्रमुख अवगुण यह है कि चखियाद केवल निगमन विधि को बताता है। जबकि ज्ञान की प्राप्ति के लिए निगमन और आगमन दोनों विधि जरूरी है। साथ ही बुद्धिवाद का एक अवगुण यह भी है कि इन्द्रिय जन ज्ञान आवश्यक नहीं है। जबकि ऐसी बात नहीं होती है क्योंकि प्रत्यक्षिकरण कल्पना स्मृति और चिन्तन इत्यादि का इन्द्रियाँ होती है।

9. लाइयनित्स का पूर्व स्थापित सामंजस्यवाद क्या है ? संक्षेप में समझाइए (What is pre-established harmony theory of Leibnitz ? Explain in short.)

Ans. पूर्व स्थापित सामंजस्य का सिद्धान्त मन और देह के सम्बन्ध का समस्या का विश्लेषण करने के लिए निरूपित किया गया था। लाइवनि के अनुसार विवाणु (मन) अनेक है तथा सबका अपना-अपना स्वप्न है, परन्तु सर्वो में एकता भी है, विविधता में भी सामजस्य है। 

अतः लाइवनि का भरत था कि मन और देठ के उद्देश्य की एकता का विधान कौन करता है? लाइनिज ने इसका जवाब दिया कि विदाणु भिन्न-भिन्न है, परन्तु सबमें चेतन शक्ति है और कोई भी चिदाणु अचेतन तथा शक्तिहीन नहीं है। विदाणु में जो आंतरिक एकता है अर्थात् मन और देह की एकता का कारण ईश्वर है। 

सृष्टि के समय में ही ईश्वर ने मन और देह के रस सामंजस्य एवं एकता का विधान किया था। लाइनिज इसे ही पूर्व स्थापित सामंजस्य (pre-established harmony) मानते हैं। विदाणु में पारस्परिक एकता तथा विश्व में व्यवस्था पहले से हो स्थापित है।

साइनिन ने दो पड़ियों के उदाहरण से मन और देश के पूर्व स्थापित एकता को स्पष्ट किया है। मान लीजिए दो पहियाँ हैं, जो एक-दूसरे से पूर्णतः अनुरूप है। यह अनुरूपता दो विधियों में से किसी एक विधि से सम्पन्न हो सकती है। पहली विधि है कि एक का दूसरे पर पारस्परिक प्रभाव हो सकता है। इसकी विधि यह है कि दोनों चौकीदार के सतत निगरानी में हो। 

दूसरी विधि यह है कि दोनों पड़ियों में प्रत्येक अपने आप मे ही ठीक-ठीक समय बता रहे हो। दोनों पहियों आरम्भ में ही इतनी कुशलता से बनाई गई से कि हम उनके ठीक-ठीक समय बताने के प्रति आश्वस्त हो। यही दूसरी विधि पूर्व स्थापित सामंजस्य की विधि है।

10. अनुभववाद को संक्षेप में समझाइए (Explain Empiricism in brief.) 

Ans. अनुभववाद ज्ञान प्राप्ति का एकमात्र साधन इन्द्रियानुभूति को मानता है। अनुभववादियों के अनुसार सम्पूर्ण ज्ञान अनुभव की ही उपज है तथा बिना अनुभव से प्राप्त कोई भी ज्ञान मन में नहीं होता है। वस्तुतः अनुभववाद बुद्धिवाद का विरोधी सिद्धान्त है। अनुभववादियों के अनुसार जन्म के समय मन साफ पट्टी के समान है और जो कुछ ज्ञान होता है उसके सभी अंग अनुभव से ही प्राप्त होता है। 

इसमें मन को निष्क्रिय माना जाता है। अनुभववाद के अनुसार आनुभाविक अंग पृथक्-पृथक् संवेदनाओं के रूप में पाए जाते हैं। यदि इनके बीच कोई सम्बन्ध स्थापित किया जाए तो सहचार के नियमों पर आधारित यह सम्बन्ध बाहरी ही हो सकता है। अन्ततः अनुभववाद में पूरी गवेषणा न करने के कारण इसमें सदा यह दृढ़ बना रहता है कि ज्ञान के सभी अंग जानुभाविक हैं। जब यह बात सिख नहीं हो पाती तब संदेहवाद इसका अंतिम परिणाम होता है।

वस्तुतः इन्द्रियानुभूति द्वारा ज्ञान प्राप्ति को ही अनुभववाद कहते हैं। 

11. देकार्त के दर्शन में ईश्वर क्या है? 

Ans. देकार्त ने ईश्वर के अस्तित्व को प्रमाणित करने के लिए दो प्रकार के प्रमाणों को प्रस्तुत किया है। ये हैं-कारण-कार्य पर आधारित प्रमाण तथा सत्तामूलक प्रमाण कारण-कार्य प्रमाण के अनुसार मानव कार्य है। उसका कारण भी होगा। मानव में पूर्ण, नित्य, शाश्वत ईश्वर की भावना है अतः मानव के अन्दर पूर्ण ईश्वर की भावना को अंकित करने वाला कारण भी पूर्ण नित्य एवं शाश्वत पूर्ण ईश्वर ही हो सकता है। 

दूसरी और सत्तामूलक प्रमाण में देकार्त या मानना है कि ईश्वर-प्रत्यय में ही ईश्वर का अस्तित्व निहित है। ईश्वर की भावना है कि यह सब प्रकार से पूर्ण (perfect) है। ‘पूर्णता’ से ध्वनित होता हैना उसकी वास्तविकता भी आवश्यक होगी। कारण कार्य प्रमाण के सम्बन्ध में दर आपत्ति है कि ईश्वर मानव विचार और जगत से परे स्वतंत्र सत्ता है जिसमें कारण-कार्य की कोटि लागू नहीं होती है। इसी तरह सत्ता-मूलक प्रमाण के बताइए। सम्बन्ध में कहा जाता है कि भावना से वास्तविकता सिद्ध नहीं होती है।. 

12. ईश्वर की सत्तामूलक युक्ति के विषय में संक्षेप में

के अनुसार (Describe in short on the ontological argument of God.) 

Ans. ईयर के सम्बन्ध में तर्क (Ontological arguments) ईश्वर की पूर्णता उसके अस्तित्व प्रमाण है। यह भी यथार्थ है कि अस्तित्व के अभाव में ईश्वर को सर्वोच्य माना जा सकता है।

13. चिदबिन्दु विज्ञान का स्वरूप क्या है ? संक्षेप में बताइए (What is the nature of monadology ? Explain in brief.) 

Ans. लाइवनिस के अनुसार असंख्य विबिन्दु (Monads) एक दूसरे से स्वतंत्र एवं गवाक्षहीन है। ईश्वर ने इन चिदबिन्दुओं को इस प्रकार श्रृंखलाबद्ध कर दिया है कि इसमें से किसी एक में परिवर्तन होने पर दूसरे विर्द्विन्दुओं में भी तदनुरूप परिवर्तन होने लगता है। ये परिवर्तन कार्य-कारण नियम द्वारा नहीं कि साहचर्य नियम से होता है। 

हमारे शरीर के विद-विन्दु अपने आंतरिक उद्देश्य से ही संचालित होते हैं और हमारे मन को चिद्विन्दु भी अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए प्रेरित होते हैं। किन्तु ईश्वर के पूर्व स्थापित सामजस्य के द्वारा ऐसा लगता है कि मन की इच्छा के अनुकूल शारीरिक व्यापार होते हैं।

14. समानान्तरवाद क्या है ? (What is parallelism ?) 

Ans. समानांतस्याद एक अलंकारिक उपकरण है जो उन शब्दों या वाक्याशी को मिलाता है जिनके समान अर्थ होते है ताकि एक निश्चित पैटन बनाया जा सके।


GROUP C खंड-‘ग’


(दीर्घ उत्तरीय प्रश्न) (Long answer type questions) किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए। (Answer any Three questions) 

15. अनुभववाद, बुद्धिवाद एवं समीक्षावाद तीनों ही ज्ञान की उत्पत्ति, एवं स्वरूप का निर्धारण करते हैं। तुलनात्मक समीक्षा करें। 

Ans. ज्ञान एवं सत्य के अन्तर्गत अनुभववाद बुद्धिवाद एवं समीक्षाबाद तीनों ही ज्ञान की उत्पत्ति एवं स्वरूप का निर्धारण करते हैं अतः इन तीनों का विशेष महत्व है। पाश्चात् दर्शन के अनुसार बुद्धिवाद ज्ञान का एक सिद्धांत है। इस सिद्धांत के अनुसार

बुद्धि या विवेक ही ज्ञान प्राप्ति का एक मात्र साधन है। पाश्चात् दर्शन के अनुसार अनुभववाद जॉन लॉक के दर्शन में दिखाई पड़ता है। अनुभववाद ज्ञान प्राप्ति का एक मात्र साधन इन्द्रियों की अनुभूति को मानता है। अनुभववादियों के अनुसार सम्पूर्ण ज्ञान अनुभव की ही उपज है और बिना

अनुभव से प्राप्त ज्ञान मन में नहीं होता है। जर्मन दार्शनिक कान्ट का ज्ञान शास्त्रीय सिद्धांत समीक्षाबाद कहलाता है। कान्ट

ने अपने समीक्षायाद में यह बताया है कि समीक्षाबाद में बुद्धिवाद तथा अनुभववाद में बुद्धिवाद तथा अनुभववाद दोनों के भावात्मक अंशों को मिलाकर ग्रहण किया जाता है।

अतः अनुभवाद बुद्धिवाद तथा समीक्षाबाद इन तीनों का अध्ययन करने से इस बात की पुष्टि होती है कि इन तीनों ही दाद (ISM) ज्ञान की उत्पत्ति एवं स्वरूप का निर्धारण करते हैं।

16. वस्तुवाद एवं प्रत्ययवाद में मुख्य अंतर क्या है ? 

 Ans. वस्तुवाद वस्तुओं के अस्तित्व ज्ञाता से स्वतंत्र मानता है यह सिद्धांत ज्ञान शास्त्रीय प्रत्ययवाद का विरोधी माना जाता है। क्योंकि ज्ञानशास्त्रीय प्रत्ययवाद मानता है कि ज्ञाता अज्ञेय में ऐसा संबंध है कि ज्ञाता से स्वतंत्र होने पर ज्ञेय का अस्तित्व कायम नहीं रह सकता है। साथ ही वस्तुवाद के अनुसार जो पदार्थ जिस रूप में रहता है वैसा ही ज्ञात होता है।

दूसरी ओर प्रत्ययवाद यह बताता है कि मूल सत्ता चेतन स्वरूप है। मूल सत्ता को चेतन स्वरूप मानने के कारण आध्यात्मक दृष्टिकोण अप्रकृतिवादी प्रयोजनवादी और इन्द्रियवादी तथा आदर्श वादी है। प्रत्ययवाद चेतना प्रत्यय आत्मा या मन को विश्व की आधारभूत सत्ता मानते हुए समस्त विश्व को अभीतिक मानता है।

इस प्रकार वस्तुवाद और प्रत्ययवाद का तुलनात्मक अध्ययन करने से इस बात की जानकारी प्राप्त होती है कि इन दोनों की प्रकृति और लक्षण अलग अलग होती है। इसलिए इन दोनों में अन्तर पाया जाता है।

17. ईश्वर के अस्तित्व संबंधी विभिन्न प्रमाण कौन से हैं? (What are the various proofs for existence of God?) 

Ans. ईश्वर के अस्तित्व को प्रमाणित करने के लिए निम्नलिखित प्रमाण दिए गए हैं- (i) पर्याप्त करण का प्रमाण (Agreement for sufficient reason) – लाइवनिट्ज ने कहा है कि यदि किसी तथ्य अथवा उत्पत्ति को कोई भी उपयुक्त कारण हो, तो वह अन्य रूप में होनी चाहिए अन्यथा वह सत् नहीं हो सकती। 

जगत् विश्व अथवा संसार में उपस्थित असंख्य वस्तुओं का कोई-न-कोई तर्कयुक्त पर्याप्त कारण अवश्य होना चाहिए। यह कारण स्वयं Monad पूर्णतया आत्मनिर्भर नहीं है। संसार में प्रत्येक शारीरिक और देवी घटना का कोई-न-कोई अन्य कारण अवश्य होता है। इसका तो उपयुक्त कारण उसी द्रव्य में प्राप्त हो सकता है जो आत्मनिर्भर और अनिवार्य होता है। यह द्रव्य ईश्वर ही है। इस प्रकार विश्व के विभिन्न वस्तुओं के पर्याप्त कारण के स्रोत के रूप में ईश्वर का व्यक्तित्व सिद्ध होता है।

(ii) संसार का विश्व में सामंजस्य का प्रमाण (Argument of harmony in the world)- अन्य प्रयोजनवादियों के समान लाइबनिट्ज भी ईश्वर की सत्ता सिद्ध करने के लिए जगत् में उपस्थित सामंजस्य से प्रयोजनवादी अथवा भीतिक धर्मशास्त्री प्रमाण उपस्थित करता है। जगत् में सब जगह व्यवस्था दिखलाई पड़ती है। विभिन्न स्वतंत्रता Monads में भी परस्पर आदान-प्रदान परस्पर समन्वय दिखलाई पड़ती है, जो कि उन्होंने स्वयं उत्पन्न नहीं किया है, क्योंकि उन्हें एक-दूसरे से कोई मतलब नहीं है। अस्तु, यह सामंजस्य अवश्य किसी पर प्रबुद्ध द्रव्य नै स्थापित किया होगा। पूर्व निर्धारित सामंजस्य का व्यवस्थापक यह परम प्रबुद्ध सत् ही ईश्वर है।

(iii) कारणवादी तर्क (Causal Argument) – लाइवनि ईश्वर की सत्ता को सिद्ध करने के लिए कारणवादी तर्क को भी प्रस्तुत करता है लाइनिज के कारणवादी तर्क के अनुसर जगत का कारण उससे बाहर होना चाहिए। वह कारण एक ही होना चाहिए, क्योंकि विश्व एक है। जगत या विश्व का कारण विवेकयुक्त होना चाहिए, क्योंकि जगत में विवेकयुक्त व्यवस्था दिखलाई पड़ती है। इस प्रकार संसार का विवेकपूर्ण कारण के रूप में ईश्वर का अस्तित्व सिद्ध होता है। 

(iv) अनुभव पूर्व स्तर का तर्क (Argument for priori level)- द्रव्य का अस्तित्व केवल अनुभव पूर्व हो सकता है जिसमें कि संभावना और यथार्थ में कोई भेद नहीं होना चाहिए। ईश्वर में सत् और अस्तित्व में कोई भेद नहीं है। उसके अस्तित्व की अनिवार्यता में किसी प्रकार का व्याघात नहीं है। अरस्तू ईश्वर का अस्तित्व अनुभव पूर्व स्तर पर है।

(v) निरन्तरता के नियम के तर्क (Argument for the Law of continuous) संसार में विभिन्न Monads में भिन्न-भिन्न गुणों में अंशों का अंतर दिखलाई पड़ता है ज्ञान, अस्तित्व शुभत्व आदि में विभिन्न स्तर दिखलाई पड़ते हैं। अरस्तू निरन्तरता के नियम के अनुसार Monads के विभिन्न गुणों की पूर्णता में भी कहीं-न-कहीं अवश्य चरितार्थ होनी चाहिए। ये सब पूर्णताएँ ईश्वर  में हैं। Monads के गुण यथार्थ हैं और निरन्तरता का नियम भी यथार्थ है। इसी आधार पर ईश्वर का अस्तित्व सिद्ध होता है।

(vi) ज्ञानशास्त्रीय प्रमाण (Epistemological argument) -संसार में शाश्वत और अनिवार्य सत्य दिखलाई पड़ता है जिसके उदाहरण तर्कशास्त्र और ज्यामिति के सत्य हैं। इनको बनानेवाली कोई शाश्वत वृद्धि ही होगी, इस प्रकार शाश्वत और अनिवार्य तत्वों के निर्माता के रूप में ईश्वर का अस्तित्व सिद्ध होता है।

18. अरस्तू का चतुष्कोटिक कारणवाद क्या है ? सविस्तार समझाइए । (What is the theory of four-fold causation of Aristotle ? Explain in detail. )

Ans. अरस्तू की कारणता की अवधारणा व्यापक एवं तत्वमीमांसात्मक है। आपने चार प्रकार के कारणों का उल्लेख किया है- (i) उपादान कारण (Material Cause), (ii) आकारिक कारण (Formal Cause) (iii) निमित्त कारण (Efficial Cause) और (iv) प्रयोजन कारण (Final Cuase) । इन्हें स्पष्ट करने के लिये मानव रचना के विश्लेषण द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है और इसी रचना को वैश्विक भी समझा गया है। उदाहरणार्थ, कुम्हार, बढ़ई, घर निर्माण इत्यादि के आधार पर इन कारणों को स्पष्ट किया जा सकता है।

जैसे, बढ़ई, किसी-न-किसी प्रकार की लकड़ी से कुर्सी बनाता है। लकड़ी को उपादान कारण कहा जा सकता है। फिर बढ़ई, आरा, छेनी, बटाली इत्यादि औजार के द्वारा लकड़ी को काट-छाँट कर लकड़ी को परिवर्तित कर देता है। इसे निमित्त कारण कहा जाता है। निमित्त कारण परिवर्तन का मुख्य आधार होता है। इसका संबंध शक्ति अथवा ऊर्जा के साथ रहता है। 

(It is related J to becoming), आकारिक कारण वस्तु का सार होता है जो उस वस्तु की परिभाषा के द्वारा व्यक्त किया जाता है। पर वस्तु को सारतत्त्व अथवा उसकी परिभाषा प्लेटो न प्रत्यय कहा है। अतः, आकारिक कारण वास्तव में प्लेटो द्वारा निर्दिष्ट प्रत्ययः (Idea) ही है। अन्त में प्रयोजन कारण है जिसके लिये कुर्सी बनाई जाती है। प्रयोजन कारण यह परम लक्ष्य है जिसकी ओर बढ़ाई की सभी प्रक्रियाएँ संचालित होती हैं।

19. कारणा क्या है ? इसके परिमाणात्मक लक्षणों को प्रदर्शित कीजिए । (What is cause ? Present its quantitative characteristics.)

Ans. कारण सभी भावात्मक तथा निषेधात्मक उपाधियों का संकलन है “A cause is the sum total of the conditions positive and negative T taken together”। भावात्मक कारणांश वह है जिसकी उपस्थिति में कार्य पैदा होता है। अभावात्मक कारणांश वह है जिसकी अनुपस्थित में कार्य होता है।

परिमाण के अनुसार कारण और कार्य के बीच मुख्यतः तीन प्रकार के विचार बताए गए हैं- 

(4) कारण कार्य से परिमाण या मात्रा में अधिक हो सकता है,

(ख) कारण कार्य से परिमाण या मात्रा में कम हो सकता है,

(ग) कारण कार्य से परिमाण या मात्रा में कभी अधिक और कभी कम हो सकता है।

अतः, इन तीनों को असत्य साबित किया गया है। यदि कारण अपने कार्य से कभी अधिक और कभी कम होता है तो इसका यही अर्थ है कि प्रकृति में कोई बात स्थिर नहीं है। किन्तु, प्रकृति में स्थिरता एवं समरूपता है, अतः यह सम्भावना भी समाप्त हो जाती है।

इसी तरह पहली और दूसरी सम्भावना भी समाप्त हो जाती है। ये तीनों सम्भावनाएँ निराधार हैं। अतः निष्कर्ष यही निकलता है कि कारण-कार्य मात्रा में बराबर होते हैं और यही सत्य भी है।




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