Class 12 Political Science Notes Ch-13 In Hindi PART-B | भारत के विदेश सम्बन्ध कक्षा 12 पाठ 13 के प्रश्न उत्तर भाग-B

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Class 12 Political Science Notes Ch-13 In Hindi में यह अध्याय काफी महत्वपूर्ण है| इस अध्याय से काफी प्रश्न परीक्षा में पूछे जा चुके हैं तथा यह अध्याय विद्यार्थी के लिए अति आवश्यक है क्योंकि इस अध्याय से हमें विश्व की राजनीति समझ में आती है|

तो छात्रों, इस लेख को पढ़ने के बाद, आपको इस अध्याय से परीक्षा में बहुत अधिक अंक प्राप्त होंगे, क्योंकि इसमें सभी परीक्षाओं से संबंधित प्रश्नों का वर्णन किया गया है, इसलिए इसे पूरा अवश्य पढ़ें।

मैं खुद 12वीं का टॉपर रहा हूं और मुझे पता है कि 12वीं की परीक्षा में किस तरह के प्रश्न पूछे जाते हैं। वर्तमान में, मैं एक शिक्षक की भूमिका भी निभा रहा हूँ, और अपने छात्रों को कक्षा 12वीं की महत्वपूर्ण जानकारी और विषयों का अभ्यास भी कराता हूँ। मैंने यहां 5 वर्षों से अधिक के अपने अनुभव के साथ प्रश्न-उत्तर लेख लिखा है। इस पोस्ट की मदद से आप परीक्षा में इस अध्याय से राजनीति विज्ञान में बहुत अच्छे अंक प्राप्त कर सकेंगे।

Class 12 Political Science Notes Ch-13 In Hindi PART-B | भारत के विदेश सम्बन्ध कक्षा 12 पाठ 13 के प्रश्न उत्तर भाग-B

कक्षा | Class12th 
अध्याय | Chapter13
अध्याय का नाम | Chapter Nameभारत के विदेश सम्बन्ध
बोर्ड | Boardसभी हिंदी बोर्ड
किताब | Book एनसीईआरटी | NCERT
विषय | Subjectराजनीति विज्ञान | Political Science
मध्यम | Medium हिंदी | HINDI
अध्ययन सामग्री | Study Materialsप्रश्न उत्तर | Question answer

पाठ के मुख्य बिंदु | Main Point of This chapter

जिस समय भारत एक स्वतंत्र प्रभुसत्ता सम्पन्न राज्य के रूप में अस्तित्व में आया, उस समय की दुनिया अनेक प्रकार के घटनाचक्रों से गुजर रही थी उपनिवेशवाद अपनी अन्तिम साँसे के रहा था। द्वितीय महायुद्ध की आग के बाद प्राप्त हुई राख में कुछ-कुछ गर्मी का अहसास था

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image credit : social media

जिसके सन्दर्भ में नई विश्व रचना हो रही थी। साथ-साथ एक ऐसी अन्तर्राष्ट्रीय संस्था का निर्माण करने के लिए प्रयास हो रहे थे जो 1920 में बनी राष्ट्रसंघ के अनुभवों से सीख लेकर, विन शान्ति व विश्व सहयोग को निश्चित करे व किसी भी प्रकार के रूप में तृतीय विश्वयुद्ध की सम्भावनाओं को समाप्त करे।

उधर द्वितीय महायुद्ध के बाद अमेरिका व सोवियत संघ दो महाशक्तियों के रूप में उपर कर आए। विभिन्न आन्तरिक व विश्व युद्धों के कारण यूरोप की स्थिति कमजोर हो गयी थी। एशिया, अफ्रीका व लैटिन अमेरिका में नये स्वतंत्र देश अस्तित्व में आ रहे थे जो अपने-अपने राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में लगे थे। दुनिया दो खेमों में बंट गई। एक सोवियत संघ व दूसरा अमेरिका गुट। भारत के एक स्वतंत्र देश के रूप में अनेक आन्तरिक व बाह्य चुनौतियाँ थीं। 

पंडित जवाहरलाल नेहरू देश के प्रथम प्रधानमंत्री थे जिनको अन्तर्राष्ट्रीय विषयों पर उनकी बारीक समझ थी। भारत के सामने विदेश नीति का निर्माण करने में एक बड़ा कार्य था। इसके निर्माण में अन्य तत्त्वों व विद्वानों के अलावा पंडित जवाहरलाल नेहरू का अपना विशेष योगदान रहा। इसलिए ही पंडित जवाहरलाल को भारत की विदेश नीति का निर्माता माना जाता है।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न | VERY SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS

Class 12 Political Science Notes
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Q.1. विदेश नीति से क्या अभिप्राय है? 

Ans. विदेश नीति से अभिप्राय (Meaning of the Foreign Policy) आधुनिक में प्रत्येक राष्ट्र को दूसरे राष्ट्रों के साथ सम्पर्क स्थापित करने के लिए विदेश नीति निर्धारित करनी पड़ती है। संक्षेप में, विदेश नीति से तात्पर्य उस नीति से है जो एक राज्य द्वारा अन्य राज्यों के प्रति अपनाई जाती है। 

वर्तमान युग में कोई भी स्वतंत्र देश संसार के अन्य देशों से अलग नहीं सकता। उसे राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक जरूरतों को पूरा करने के लिए एक-दूसरे पर निर्भर रहना पड़ता है। इस संबंध को स्थापित करने के लिए वह जिन नीतियों का प्रयोग करता है, उन नीतियों को उस राज्य की विदेश नीति कहते हैं।

class 12th NotesMCQ
HistoryPolitical Science
EnglishHindi

Q.2. विदेश नीति के लक्ष्यों का वर्णन कीजिए। 

Ans. विदेश नीति के मुख्यतः दो लक्ष्य होते हैं-

1. राष्ट्रीय हित (National Interests ) — राष्ट्रीय हितों में आर्थिक क्षेत्र में राष्ट्रीय विकास, राजनीतिक क्षेत्र में राष्ट्रीय स्थिरता या स्वामित्व, रक्षा क्षेत्रों में राष्ट्रीय सुरक्षा आदि का विशेष ध्यान रखना पड़ता है।

2. विश्व समस्याओं के प्रति दृष्टिकोण (Attitudes towards international prob lems)- इनमें प्रमुख रूप से विश्वशांति राज्यों का सहअस्तित्व, राज्यों का आर्थिक विकास, मानव अधिकार आदि शामिल है।

Q. 3. विदेश नीति के चार अनिवार्य कारक बताइए । 

Ans. किसी भी राष्ट्र की विदेश नीति निश्चित करने के लिए निम्नलिखित चार कारक अनिवार्य माने जाते हैं-

  • 1. राष्ट्रीय हित 
  • 2. राज्य की राजनीतिक स्थिति 
  • 3. पड़ोसी देशों से संबंध 
  • 4. अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक वातावरण

Q.4. भारतीय विदेश नीति के वैचारिक मूलाधारों की चर्चा कीजिए । 

Ans. भारत की विदेश नीति के वैचारिक मूलाधारों की चर्चा निम्न प्रकार की जा सकती है—

  • 1. भारत की विदेश नीति का उदय संसार में होने वाले राष्ट्रीय आन्दोलनों के युग में हुआ था। अतः यह स्पष्ट है कि भारतीय विदेश नीति का जन्म एक विशेष पर्यावरण में हुआ था।
  • 2. हमारी विदेश नीति का उदय दूसरे विश्व युद्ध के बाद परस्पर निर्भरता वाले विश्व के पैर में हुआ था।
  • 3. भारत की विदेश नीति के मूलाधारों को उपनिवेशीकरण के विघटन की प्रक्रिया को भी एक कारक माना जा सकता है।
  • 4. भारत की विदेश नीति का जन्म उस समय हुआ था जबकि विश्व में सामाजिक, आर्थिक राजनीतिक परिवर्तन हो रहे थे। 

Q5. प्रथम एफ्रो एवं एशियाई एकता सम्मेलन कहाँ और कब हुआ ? इसकी कुछ बताइए।

Ans. प्रथम एफ्रो-एशियाई एकता सम्मेलन इंडोनेशिया के एक बड़े नगर बांडुंग 1955 में हुआ।

  • (i) कश्मीर की समस्या
  • (ii) धर्म के आधार पर उग्रवाद व साम्प्रदायिकता 
  • (iii) सीमा से सम्बन्धित झगड़े
  • (iv) पाकिस्तान के द्वारा भारत में उग्रवादियों को मदद देना
  • (v) पाकिस्तान के द्वारा हथियारों को इकट्ठा करना। 

Q.6. संयुक्त प्रगतिशील मोर्चे (यू.पी.ए.) की विदेश नीति समझाइये। 

Ans. संयुक्त प्रगतिशील मोर्चे की सरकार भी लगभग उन्हीं सिद्धान्तों के आधार पर विदेश नीति का संचालन कर रही है जो प्रारम्भ से भारत की विदेश नीति के निर्धारक तत्व रहे है। यू.पी.ए. सरकार ने उदारीकरण व वैश्वीकरण की नीति को बढ़ाया है व परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में अमेरिका के साथ अधिक सहयोग के लिए समझौता भी किया है। चीन व सोवियत संघ के साथ भी भारत के अच्छे सम्बन्ध हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न | SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS

Class 12 Political Science Notes
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Q.1. किसी देश की विदेश नीति के आन्तरिक व बाह्य मुख्य तत्व समझाइये। 

Ans. किसी देश की विदेश नीति उसकी आन्तरिक स्थिति व अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितियों क परिणाम होते हैं। प्रमुख तत्व निम्न हैं-

  • (i) ऐतिहासिक व सांस्कृतिक परिवेश 
  • (ii) भौगोलिक व सामरिक स्थिति 
  • (iii) आर्थिक व वाणिज्य की स्थिति 
  • (iv) राष्ट्रीय हित 
  • (v) वैज्ञानिक व तकनीकी विकास 
  • (vi) सैनिक क्षमता 
  • (vii) विचारधारा 
  • (viii) राष्ट्र का नेतृत्व 
  • (ix) तत्कालीन अन्तर्राष्ट्रीय स्थिति 
  • (x) शासक दल की प्राथमिकताएँ 
  • (xi) लोगों का राष्ट्रीय चरित्र 
  • (xii) राजनीतिक व्यवस्था का स्वरूप ।

Q. 2. भारत की विदेश नीति के प्रमुख निर्धारक तत्व क्या है ? इसकी संवैधानिक स्थिति समझाइये |

Ans. भारतीय संविधान के निर्माता जिस प्रकार से भारत में सामाजिक व आर्थिक विकल के स्वरूप के सम्बन्धों में चिंतित थे व आवश्यक निर्देश संविधान में निश्चित किये उसी प्रकार से उन्होंने भारत की विदेश नीति व अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में भारत की भूमिका के बारे में भी दिशा निर्दे दिये जिनका विवरण भारतीय संविधान के चौथे भाग में राज्य की नीति के निर्देशक तत्वों के

अध्याय में अनुच्छेद 51 में किया गया है जिसकी मुख्य बातें निम्न हैं- 

  • (i) अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति व सुरक्षा को बढ़ावा देना ।
  • (ii) विभिन्न देशों के बीच आपसी सहयोग को बढ़ावा देना । 
  • (iii) अन्तर्राष्ट्रीय कानून व अन्तर्राष्ट्रीय सन्धियों के प्रति सम्मान एवं वचनबद्धता ।
  • (iv) अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं को मजबूत करने में सहायता देना। 
  • (v) अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मतभेदों व झगड़ों को बातचीत के माध्यम से हल करना।

Q.3 गुटनिरपेक्ष आन्दोलन का विकास व महत्व समझाइये। 

Ans. गुटनिरपेक्ष आन्दोलन का उदय व विकास द्वितीय युद्ध के बाद उत्पन्न शीत युद्ध के ‘सन्दर्भ में हुआ। द्वितीय युद्ध की समाप्ति के बाद तृतीय युद्ध तो नहीं हुआ परन्तु विश्व के अनेक क्षेत्रों में युद्ध जैसी स्थितियों पैदा होने से तनाव जारी रहा। इस तनावपूर्ण स्थिति को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर शीत युद्ध का नाम दिया गया। इसका मुख्य कारण उस समय की दो महान शक्तियों सोवियत संघ व अमेरिका के बीच लगातार तनाव रहा। 

कोरिया संकट व हंगरी संकट अरब- इजराइल युद्ध, पाकिस्तान व भारत के बीच कश्मीर विवाद ऐसे विषय रहे जिन पर अमेरिका व सोवियत संघ आमने-सामने दिखाई भी दिए जिससे युद्ध तो नहीं हुआ परन्तु युद्ध जैसी परिस्थितियाँ व्यापक रहीं। दोनों ही महाशक्तियाँ नये स्वतंत्र देशों पर अपना-अपना प्रभाव बढ़ा रहे थे जिससे इनकी स्वतंत्रता को खतरा पैदा हो रहा था। 

इस प्रभाव को नियमित करने व एशिया द अफ्रीका के देशों की स्वतंत्रता को सुरक्षित करने के लिए गुटनिरपेक्षता के सिद्धान्त पर आधारित गुट निरपेक्ष आन्दोलन का विकास हुआ। इसकी आवश्यकता व महत्त्व को समझते व स्वीकार करते हुए इसका विकास हुआ। प्रारम्भ में इसकी सदस्य संख्या 25 थी, परन्तु 2004 तक इसकी संख्या 103 हो गयी जो इसकी आवश्यकता व महत्त्व को दर्शाता है। इसका प्रथम शिखर सम्मेलन 1961 में हुआ था।

Q. 4. आज के विश्व में गुटनिरपेक्ष आन्दोलन की प्रासंगिकता समझाइये। 

Ans. गुटनिरपेक्ष आन्दोलन अपने अस्तित्व से आज तक विश्व राजनीति में विशेषकर तृतीय विश्व के देशों के राजनीतिक व आर्थिक विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहा है। आज विश्व के लगभग 200 देशों में से 103 सदस्य देश गुटनिरपेक्ष आन्दोलन के सदस्य हैं। जिस समय गुट निरपेक्ष आन्दोलन 1961 में अस्तित्व में आया उस समय विश्व दो गुटों में बँटा था। एक सोवियत संघ का गुट व दूसरा अमेरिका का गुट दोनों गुटों के बीच शीतयुद्ध का दौर था।

अब क्योंकि विश्व में, सोवियत संघ टूटने से इस गुट का प्रभाव समाप्त हो गया है व विश्व की रचना का स्वरूप ही बदल गया है। अतः इस प्रकार के प्रश्न उठने लगे हैं कि क्या अब गुटनिरपेक्ष आन्दोलन के अस्तित्व की कोई प्रासंगिकता है ? इस सम्बन्ध में यह कहा जा सकता है कि भले ही विश्व रचना का स्वरूप बदल गया हो परन्तु गुटनिरपेक्ष आन्दोलन की प्रासंगिकता आज भी है क्योंकि इसका उद्देश्य तृतीय विश्व के देशों के लिए स्वतंत्रता है।

Q.5. पंडित जवाहरलाल नेहरू की भारत की विदेश नीति के निर्माता के रूप में भूमिका (समझाइये।

Ans. पंडित जवारलाल नेहरू को भारत की विदेश नीति का निर्माता कहना न्यायोचित है क्योंकि वे देश के प्रथम प्रधानमंत्री ही नहीं थे बल्कि भारत के प्रथम विदेशमंत्री भी थे। काँग्रेस के प्रमुख नेता थे व चमत्कारिक व्यक्तित्व के धनी थे। 

पंडित जवाहरलाल नेहरू को अन्तर्राष्ट्रीय विषयों की अच्छी समझ थी। पंडित जवाहरलाल नेहरू अफ्रो-एशियन एकता व इन देशों के आर्थिक विकास के बहुत बड़े समर्थक थे। सोवियत संघ की नियोजित अर्थव्यवस्था से वे बहुत प्रभावित थे। 

चीन व भारत के आपसी सम्बन्धों को सुदृढ़ आधार देने के लिए उन्होंने 1954 में मीन के तत्कालीन प्रधानमंत्री के साथ पंचशील का समझौता किया। पंचशील का समझौता न केवल भारत व चीन के सम्बन्धों का आधार था बल्कि विश्व के देशों में आपसी सम्बन्धों को मजबूत आधार देने के लिए एक मजबूत सेतु था। 

दुनिया के गरीब देशों के आर्थिक विकास व उनकी स्वतंत्रता को निश्चित करने के लिए पंडित नेहरू ने गुटनिरपेक्षता के सिद्धांत के प्रतिपादन व इसके विकास में अपना विशेष योगदान दिया। पंडित नेहरू का न केवल भारत की विदेश नीति के निर्माण में योगदान था, बल्कि अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति सुरक्षा को मजबूत करने के लिए अन्तराष्ट्रवाद के विकास में भी पंडित नेहरू का अथाह योगदान रहा।

Q.6. भारत की विदेश नीति के प्रमुख तत्व समझाइये जिन्होंने इसके निर्धारण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। 

Ans. भारत की विदेश नीति पर पंडित जवाहरलाल नेहरू की विचारधारा, प्राथमिकता व।दृष्टिकोणों की अमिट छाप है। जिन प्रमुख तत्वों ने भारत की विदेश नीति के निर्धारण में अहम भूमिका अदा की है निम्न है- (i) गुटनिरपेक्षता (ii) पंचशील (iii) संयुक्त राष्ट्र को मजबूत करना (iv) अन्तर्राष्ट्रवाद का विकास करना (v) सैनिक गुटों का विरोध करना (vi) निःशस्त्रीकरण में सहयोग करना (vii) रंगभेद को नीति का विरोध करना (vii) अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों का प्रजातन्त्रीयकरण करना (ix) पोली देशों के साथ अच्छे सम्बन्ध कायम करना (x) मानव अधिकारों की रक्षा करना । 

Q7. भारत व पाकिस्तान के बीच युद्ध व तनाव के प्रमुख विषय क्या हैं ?

Ans. अगस्त 1947 में भारत का विभाजन हुआ जिसके कारण भारत व पाकिस्तान के रूप में दो स्वतंत्र राज्यों का उदय हुआ। यह विभाजन व्यापक हिंसात्मक माहौल में हुआ जिसने अनेक प्रश्न पीछे छोड़ दिये जो आज भी भारत व पाकिस्तान के बीच युद्ध व तनाव का कारण बने हुए है। 

1947 से अब तक तीन युद्ध भारत व पाकिस्तान के बीच हो चुके हैं ये विषय निम्न है 

  • (i) सीमा विवाद 
  • (ii) कश्मीर की समस्या 
  • (iii) उग्रवादियों का भारत में प्रवेश व हिंसात्मक कार्यवाही करना 
  • (iv) भारत में पाकिस्तानी उग्रवादियों का हस्तक्षेप 
  • (v) परमाणु परीक्षण 
  • (vi) पाकिस्तान के द्वारा जरूरत से ज्यादा सैनिक सामग्री इकट्ठा करना 
  • (vii) भारत का विश्व शक्ति के रूप में उभरना 
  • (viii) कश्मीर के प्रश्न का अन्तर्राष्ट्रीयकरण पर नियन्त्रण (ix) सीम क्षेत्र में हस्तक्षेप करना 
  • (x) कारगिल घटना। 

Q8. भारत व पाकिस्तान के बीच 1971 के युद्ध के प्रमुख कारण व परिणाम माइये।

Ans. 1970 के बाद पाकिस्तान के पूर्वी भाग में पश्चिमी पाकिस्तान के खिलाफ जनादेश आया व उतने ऊपर दोयम नागरिक की तरह व्यवहार के खिलाफ आवाज उठाने लगे। इस पर पूर्वी पाकिस्तान की आवामी पार्टी के नेता शेख मुजीबुर्रहमान को गिरफ्तार कर लिया गया व विरोध करने वाले नागरिकों पर अत्याचार किये गये। वहाँ पर एक प्रकार से आन्तरिक कलह की स्थिति पैदा हो गई। लाखों की संख्या में बंगलादेशी शरणार्थी भारत की सीमा में घुस आये जिनके कारण भारत पर बड़ा आर्थिक बोझ पड़ा। इन परिस्थितियों में भारत बांगलादेश में मानवीय आधार पर हस्तक्षेप किया जिसके कारण पाकिस्तान ने भारत पर आक्रमण कर दिया जो 16 दिसम्बर, 1971 तक चला। 16 दिसम्बर, 1971 को बांगलादेश एक स्वतंत्र राज्य के रूप में अस्तित्व में आ गया। पाकिस्तान की सेना ने भारत के सामने आत्मसमर्पण किया। 1972 में शिमला में तत्कालीन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री व श्रीमती इंदिरा गाँधी के बीच समझौता हुआ। शिमला समझौते को भारत पाकिस्तान के बीच भावी सम्बन्धों का आधार माना गया।

Q9.द्वितीय विश्व युद्ध के उपरान्त दुनिया के विभिन्न देश दो खेमों में क्यों बँट गर थे इन खेमों का स्पष्टीकरण कीजिए ।

Ans. 1. द्वितीय विश्व युद्ध दो बड़े सैन्य खेमों में लड़ा गया था। एक खेमे के देश पराजित हुए (जापान, जर्मनी तथा इटली इनमें प्रमुख थे) तो दूसरे खेमे के राष्ट्र (संयुक्त राज्य सोवियत संघ, ब्रिटेन आदि) जीते थे। इनमें से विजयी खेमे के देशों में विचारधाराओं-पूँजीवा (दक्षिणी पंथ) तथा साम्यवाद (वाम पंथ) के दो सर्वाधिक शक्तिशाली राष्ट्र संयुक्त राज्य अमेरि तथा सोवियत संघ थे। उन्होने नये स्वतंत्र राष्ट्रों तथा विकासशील देशों में से ज्यादा से ज्यादा को अपनी ओर सैन्य गुटों में मिलाने के लिए साम, दाम, दण्ड और भेद की नीतियाँ अपनाई वे अन्तर्राष्ट्रीय रंग मंच पर अपनी-अपनी वर्चस्वता का डंका बजा सके। अमेरिक किया गया।

Q10. भारत-पाकिस्तान युद्ध 1971 अथवा पाक बंगलादेश और भारत युद्ध के राजनैतिक प्रभाव लिखिए। 

Ans.

  • 1. भारतीय सेना के समक्ष 90,000 सैनिकों के साथ पाकिस्तानी सेना को समर्पण करना पड़ा।
  • 2. बांग्लादेश के रूप में एक स्वतंत्र राष्ट्र के उदय के साथ भारतीय सेना ने अपनी तर से एकतरफा युद्ध विराम घोषित कर दिया। 

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न | Long Answer Type Questions

Class 12 Political Science Notes
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Q.1. विदेश नीति से क्या अभिप्राय है ? भारत की विदेश नीति के मूलभूत सिद्धाने का विवेचन कीजिए। Or, भारत की विदेश नीति के चार आधारभूत सिद्धांत बताइए।

Ans. विदेश नीति- साधारण शब्दों में विदेश नीति से तात्पर्य उस नीति से है जो राज्य द्वारा राज्यों के प्रति अपनाई जाती है। वर्तमान युग में कोई भी स्वतंत्र देश संसार के देशों से अलग नहीं रह सकता। उसे राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक जरूरतों को पूरा के लिए एक-दूसरे पर निर्भर रहना पड़ता है। इस संबंध को स्थापित करने के लिए या नीतियों का प्रयोग करता है उन नीतियों को उस राज्य की विदेश नीति कहते हैं। भारत की विदेश नीति की प्रमुख विशेषताएँ-

(i) गुट निरपक्षता दूसरे विश्व युद्ध के पश्चात् विश्व दो गुटों में विभाजित हो गय से एक पश्चिमी देशों का गुट था और दूसरा साम्यवादी देशों का। दोनों महाशक्तियों ने मात अपने पीछे लगाने के काफी प्रयास किए, परंतु भारत ने दोनों ही प्रकार के सैनिक गुटों से डना निश्चय किया और तय किया 

(ii) भारत स्वयं साम्राज्यवादी शोषण का शिकार रहा है। द्वितीय महायुद्ध के बाद एशिया, अफ्रीका व लैटिन अमेरिका के अधिकांश राष्ट्र स्वतंत्र हो गए। पर साम्राज्यवाद का अभी पूर्ण विनाश नहीं ही पाया है। भारत ने एशियाई और अफ्रीकी देशों की एकता का स्वागत किया है। 

(iii) अन्य देशों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध-भारत की विदेश नीति की अन्य विशेषता यह है कि भारत विश्व के अन्य देशों से अच्छे सम्बन्ध बनाने के लिए सदैव तैयार रहता है। भारत केवल मित्रतापूर्ण सम्बन्ध स्थापित करना चाहता है।

(iv) पंचशील और शांतिपूर्ण सहअस्तित्व पंचशील का अर्थ है पाँच सिद्धांत ये सिद्धांत हमारी विदेश नीति के मूल आधार हैं। इन पाँच सिद्धांतों के लिए “पंचशील” शब्द का प्रयोग सबसे पहले 24 अप्रैल, 1954 ई. को किया गया था। ये ऐसे सिद्धांत हैं कि यदि इन पर विश्व के सब देश चलें तो विश्व में शांति स्थापित हो सकती है। ये पाँच सिद्धांत निम्नलिखित हैं-

  • 1. एक-दूसरे की अखण्डता और प्रभुसत्ता को बनाए रखना।
  • 2. एक-दूसरे पर आक्रमण न करना। 3. एक-दूसरे के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना ।
  • 3. शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के सिद्धान्त को मानना ।
  • 4. आपस में समानता और मित्रता की भावना को बनाए रखना।

(v) पंचशील के ये पाँच सिद्धांत विश्व में शांति स्थापित करने के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। ये संसार के बचाव की एकमात्र आशा है क्योंकि आज का युग परमाणु बम और हाइड्रोजन बम का युग है। युद्ध के छिड़ने से कोई भी नहीं बच पायेगा। अतः केवल इन सिद्धान्तों को मानने से ही संसार के सभी देशों से मित्रतापूर्ण संबंध स्थापित हो सकती है।

(vi) राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा–भारत प्रारंभ से ही शांतिप्रिय देश रहा है। इसलिए उसने अपनी विदेश नीति को राष्ट्रीय हितों के सिद्धांत पर आधारित किया है। अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में भी भारत ने अपने उद्देश्य मैत्रीपूर्ण रखे हैं। इन उद्देश्यों को पूरा करने के लिए भारत ने संसार के सभी देशों से मित्रतापूर्ण संबंध स्थापित किए हैं। इसी कारण आज भारत आर्थिक, राजनीतिक व सांस्कृतिक क्षेत्रों में शीघ्रता से उन्नति कर रहा है। इसके साथ-साथ वर्तमान समय में भारत के संबंध विश्व की महाशक्तियों (रूस तथा अमेरिका) एवं अपने लगभग सभी पड़ोसी देशों के साथ पूर्ण और अच्छे है।

इस आर्टिकल में किसी भी प्रकार का त्रुटि आपको मिलती है तो हमें कमेंट करके जरूर बताएं हम उसे जल्द से जल्द ठीक करने की कोशिश करेंगे क्योंकि लिखने समय सबसे गलती हो जाती है 😅😅😅😅😅😅😅😅😅


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FAQs

Q.1. भारतीय विदेशी नीति का सार “शांतिपूर्ण सहअस्तित्व” का महत्व बताइये
Or, शांतिपूर्ण सहअस्तित्व पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।

Ans. भारतीय विदेश नीति का सार “शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व” है। शांतिपूर्ण यह-अस्तिद का अर्थ है : बिना किसी मनमुटाव के साथ मैत्रीपूर्ण ढंग से एक देश का दूसरे देश के साथ ह यदि भिन्न राष्ट्र एक-दूसरे के साथ पड़ोसियों की भाँति नहीं रहेंगे तो विश्व में शांति की स्थापन नहीं हो सकती। शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व विदेश नीति का मात्र सिद्धांत ही नहीं है अपितु यह राज्य के बीच व्यवहार का एक तरीका भी है। 

Q2. प्रथम गुट निरपेक्ष सम्मेलन कहाँ तथा कब हुआ था ? बाद में ऐसे सम्मेलनों की सूची तैयार कीजिए ।

Ans. प्रथम गुट निरपेक्ष सम्मेलन 1961 ई. में बेलग्रेड में हुआ था। दूसरा सम्मेलन काहिरा में 1964 ई. में हुआ था तीसरा सम्मेलन लुसाका में 1970 में हुआ था। पाँचवाँ सम्मेलन 1976 ई. में कोलम्बो में हुआ था। छठा सम्मेलन हवाना में 1979 ई. में हुआ था। सम्मेलन भारत की राजधानी नई दिल्ली में 1986 ई. में हुआ था तथा नौवाँ सम्मेलन 1989 में एक बार फिर बेलग्रेड में हुआ। दसवाँ सम्मेलन 1992 ई. में जकार्ता में तथा ग्यारहवीं मे काजिना में 1995 में हुआ। 12वाँ सम्मेलन डरबन (द. अफ्रीका) तथा 13वाँ सम्मेलन 24 फरवरी 2003 को कुआलालम्पुर (मलेशिया) में हुआ।

Q3.. एशियाई संबंध सम्मेलन 1947 पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए । 

Ans. प्रथम एशियाई संबंध सम्मेलन 23 मार्च से 2 अप्रैल, 1947 को नई दिल्ली में था। इस सम्मेलन में 25 से अधिक देशों के लगभग 250 प्रतिनिधियों ने भाग लिया था। पंडि नेहरू ने इसे एक ऐतिहासिक सम्मेलन बताया था। इस सम्मेलन के मुख्य लक्ष्य निम्नलिखित दे
1. सभी प्रकार के आक्रमणों का विरोध करना। 
2. विश्व शांति पर बल देना। 
3. एशिया अफ्रीका मित्रता पर जोर देना। 
4. परमाणु शक्ति का जोरदार विरोध करना। 
5. स्वतंत्रता, सुख तथा विकास के समान अवसरों की सभी देशों को समान उपलब्धि के लिए प्रयत्न करना। 

Q.4. विदेश नीति की परिभाषा दीजिए ।

Ans. प्रत्येक राज्य आज विश्व के दूसरे राज्यों से संबंध बनाता है। सभी राज्य एक-ए पर निर्भर रहते हैं। एक राज्य जिन सिद्धांतों के आधार पर विदेशी राज्यों से संबंध स्थापित कला है, उसे उस राज्य की विदेश नीति कहते हैं। संचन स्वामी (Ruthan Swami) के अनुसार, “विदेशी नीति वर्तमान समय में सिद्धांतों और व्यवहारों का समूह है जिनके द्वारा एक राज्य दूसरे राज्यों से संबंधों को निकरता है।” 

Q5. कारगिल की लड़ाई पर टिप्पणी लिखिए।

Ans. कारगिल की लड़ाई 1. 1999 के शुरुआती महीनों में भारतीय क्षेत्र की नियंत्रण रेखा के कई ठिकानों जैसे ग्रास, माश्कोह, काकसर और बतालिक पर अपने की गुजाहिदीन बताने वालों ने कब्जा कर लिया था पाकिस्तानी सेना की इसमें मिलीभगत भाँप कर भारतीय सेना इस कब्जे के खिलाफ हरकत में आयी इसमें दोनों देशों के बीच संघर्ष छिड़ गया। इसे ‘कारगिल की लड़ाई’ के नाम से जाना जाता है। 2. 1999 के मई-जून में यह लड़ाई जारी रही। 26 जुलाई, 1999 तक भारत अपने अधिकतर ठिकानों पर पुनः अधिकार कर चुका था।  

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