Class 12 Political Science Notes Ch-17 In Hindi PART-B | क्षेत्रीय आकांक्षाएँ कक्षा 12 पाठ 17 के प्रश्न उत्तर भाग-B

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Class 12 Political Science Notes Ch-17 In Hindi में यह अध्याय काफी महत्वपूर्ण है| इस अध्याय से काफी प्रश्न परीक्षा में पूछे जा चुके हैं तथा यह अध्याय विद्यार्थी के लिए अति आवश्यक है क्योंकि इस अध्याय से हमें विश्व की राजनीति समझ में आती है|

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मैं खुद 12वीं का टॉपर रहा हूं और मुझे पता है कि 12वीं की परीक्षा में किस तरह के प्रश्न पूछे जाते हैं। वर्तमान में, मैं एक शिक्षक की भूमिका भी निभा रहा हूँ, और अपने छात्रों को कक्षा 12वीं की महत्वपूर्ण जानकारी और विषयों का अभ्यास भी कराता हूँ। मैंने यहां 5 वर्षों से अधिक के अपने अनुभव के साथ प्रश्न-उत्तर लेख लिखा है। इस पोस्ट की मदद से आप परीक्षा में इस अध्याय से राजनीति विज्ञान में बहुत अच्छे अंक प्राप्त कर सकेंगे।

Class 12 Political Science Notes Ch-16 In Hindi PART-B | जन आंदोलनों का उदय कक्षा 12 पाठ 16 के प्रश्न उत्तर भाग-B

कक्षा | Class12th 
अध्याय | Chapter17
अध्याय का नाम | Chapter Nameक्षेत्रीय आकांक्षाएँ
बोर्ड | Boardसभी हिंदी बोर्ड
किताब | Book एनसीईआरटी | NCERT
विषय | Subjectराजनीति विज्ञान | Political Science
मध्यम | Medium हिंदी | HINDI
अध्ययन सामग्री | Study Materialsप्रश्न उत्तर | Question answer

पाठ के मुख्य बिंदु | Main Point of This chapter

भारत एक बहुल समाज है जिसमें विभिन्न जाति, धर्म, संस्कृति, भाषा, बोली व भौगोलिकताओं के लोग रहते हैं। भारत विभिन्न क्षेत्रों व राज्यों का संघ है। भारत में विभिन्नता में एकता है। राष्ट्रीय आन्दोलन की लड़ाई में सभी राज्यों क्षेत्रों के प्रत्येक वर्ग के लोगों ने अपनी-अपनी भूमिकाएँ निभार्थी। 

15 अगस्त, 1947 को देश आजाद हुआ राष्ट्रीय आन्दोलन के राष्ट्रवाद की संस्कृति व नेतृत्व का प्रभाव आजादी के बाद के कुछ दशकों तक रहा लेकिन बाद में धीरे-धीरे विभिन्न क्षेत्रों व राज्यों से अपने-अपने हितों के विकास की माँग उठने लगी। इसी सन्दर्भ में केन्द्र व प्रान्तों के सम्बन्धों की व्याख्या की माँग भी उठने लगी।

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1980 के बाद यह माँग और अधिक प्रबल रूप से उठने लगी व राज्यों में आक्रामक आन्दोलन भी प्रारम्भ हो गये जो अपने राज्यों के लिए स्वायत्तता की माँग कर रहे थे। इस प्रकार केन्द्र व प्रान्तों में संघर्ष का दौर शुरू हुआ व साथ-साथ बातचीत व संवाद की प्रक्रिया भी प्रारम्भ हुई। विभिन्न क्षेत्रों के विकास को तेज करने के लिए अनेक कदम उठाये गाए। केन्द्र व प्रान्तों के बीच समझीतों का दौर चला।

भारत ने विविधता के सवाल पर लोकतान्त्रिक दृष्टिकोण को अपनाया है। लोकतन्त्र में क्षेत्रीय आकांक्षाओं की राजनीतिक अभिव्यक्ति की अनुमति है व क्षेत्रवाद को क्षेत्रीय विकास के अर्थों में राष्ट्रीय हितों के साथ सामंजस्य रखते हुए स्वीकार्य है। 

इसके अतिरिक्त लोकतान्त्रिक राजनीति में इस बात के पूरे अवसर होते हैं कि विभिन्न दल व समूह क्षेत्रीय पहचान, आकांक्षा अथवा किसी खास क्षेत्रीय समस्या को आधार बनाकर लोगों की भावनाओं का प्रतिनिधित्व करें ऐसी अवस्था में मतभेद का उभरना व सम्बन्धों में अपेक्षाओं में तनाव उत्पन्न होना भी स्वाभाविक है। 

आजादी के तुरन्त बाद देश को विभाजन, विस्थापन देशी रियासतों के विलय व राज्यों के पुनर्गठन जैसे कठिन मामलों से जूझना पड़ा। इसके बाद क्षेत्रीयता के आधार पर ही कश्मीर को समस्या, पंजाब की समस्या, उत्तर पूर्वी राज्यों के विकास में पक्षपाती रवैयों के कारण उभरती नाराजगी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ा। आज भी क्षेत्रीयता के आधार पर अपना-अपना अस्तित्व बनाने के कवायद जारी हैं।

भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में कुछ ऐसे विषयों का प्रवेश होता रहा है जिन्होंने क्षेत्रवाद, क्षेत्रीय आन्दोलनों व अलगाववादी सोच को जन्म दिया। कुछ मुद्दे भारतीय राजनीतिक व्यवस्था को इतिहास से विरासत में मिले जो भारतीय राजनीति में लगातार तनाव व अलगाववाद का कारण बनते रहे हैं।

भाषा के मुद्दे ने भी भारत में क्षेत्रीयता व क्षेत्रीय राजनीतिक के विकास को प्रबल आधार दिया। देश में भाषा के आधार पर राज्यों के गठन की माँग करते हुए कई क्षेत्रों में जन आन्दोलन चले। 

भाषा के आधार पर इन आन्दोलनों के कारण अनेक राज्यों का गठन किया गया। दक्षिण के विशेषकर तमिलनाडू में हिन्दी भाषा के विरोध में आन्दोलन चलते रहे जिसके चलते आज तक भारत में कोई राष्ट्रीय भाषा नहीं बनी। 1966 में भाषा के आधार पर पंजाब का विभाजन कर हरियाणा बनाया गया। 

भाषा के अलावा विकास के क्षेत्र में असन्तुलन की राजनीति ने कई राज्यों में आन्दोलनों को जन्म दिया जिसके कारण अनेक राज्यों से अन्य राज्यों निर्माण की माँग उठ रा है, छत्तीसगढ़, झारखंड, उत्तराखंड इन्हीं माँगों का परिणाम है। उत्तरी पूर्व राज्यों जैसे अस

अति लघु उत्तरीय प्रश्न | VERY SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS

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Q. 1. बीसवीं सदी के कौन-से दशक को स्वायत्तता की माँग के दशक के रूप में खा जा सकता है ? इसके क्या मुख्य राजनीतिक प्रभाव दृष्टिगोचर हुए ? केवल उल्लेख कीजिए ।

Ans. 1980 के दशक को स्वायत्तता की माँग के दशक के रूप में भी देखा जा सकता है। दौर में देश के कई हिस्सों के स्वायत्तता की माँग उठी और इसने संवैधानिक हदों को भी पार या इन आंदोलनों में शामिल लोगों ने अपनी माँग के पक्ष में हथियार उठाए, सरकार ने उनको दबाने के लिए जवाबी कार्रवाई की और इस क्रम में राजनीतिक तथा चुनावी प्रक्रिया अवरुद्ध हुई। 

Q. 2. ‘क्षेत्रवाद एवं राष्ट्रीय सरकार’ विषय पर संक्षिप्त नोट लिखिए।

Ans. (1) क्षेत्रवाद ने राष्ट्र के लिए चिंता उत्पन्न की। राष्ट्रीय सरकार को कई बार हथियार उठाकर इन्हें कुचलने का प्रयास करने पड़े।

(2) यह निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता कि स्वायत्तता की माँग को लेकर चले अधिकतर संघर्ष लंबे समय तक जारी रहे और इन संघर्षों पर विराम लगाने के लिए केन्द्र सरकार को सुलह की बातचीत का रास्ता अख्तियार करना पड़ा अथवा स्वायत्तता के आंदोलन की अगुवाई कर रहे समूहों से समझौते करने पड़े।

(3) क्षेत्रवाद के समर्थक गुटों / नेताओं आदि एवं देश की सरकार के मध्य हुई बातचीत की एक लंबी प्रक्रिया के बाद दोनों पक्षों के बीच समझौता हो सकता। वातचीत का लक्ष्य यह रखा गया कि विवाद के मुद्दों को संविधान के दायरे में रहकर निपटा लिया जाए। बहरहाल, समझौते तक पहुँचने की यह यात्रा बड़ी दुर्गम रही और जब-तब हिंसा के स्वर उभरे।

Q. 3 . संत हरचंद सिंह लोंगेवाल का संक्षिप्त परिचय दीजिए।

Ans. संत हरचंद सिंह लोंगेवाल 1932 में जन्मे थे। वे अकाली होने के साथ-साथ सिक्खों के धार्मिक एवं राजनैतिक नेता थे। उनकी राजनैतिक नेता के रूप में शुरुआती अकाली नेता के. रूप में 20वीं शताब्दी के छठे दशक में हुई। 1980 में वह अकाली दल के अध्यक्ष बने। उन्होंने अकालियों की प्रमुख मांगों को लेकर प्रधानमंत्री राजीव गांधी से एक समझौता किया जो इतिहास में राजीव लोंगेवाल समझौते के नाम से प्रसिद्ध हुआ। वह पंजाब के अलगाववादी हिंसक आंदोलन है विरोधी रहे। इसीलिए एक कट्टरपंथी अज्ञात सिक्ख युवक द्वारा उनकी हत्या कर दी गई और इस तरह वह 1985 में स्वर्ग सिधार गए।

Q.4. अंगधी जापू फिजी कौन थे ? संक्षेप में परिचय दीजिए। 

Ans. अंगमी जापू फिजो का जन्म 1904 में हुआ। वे पूर्वोत्तर भारत में नागालैंड की आजादी के आंदोलन के नेता के रूप में प्रसिद्ध हुए। वे नागा नेशनल काउंसिल के अध्यक्ष बने । उन्होंने नागालैंड को भारत से अलग देश बनाने के लिए भारत सरकार के विरुद्ध अनेक वर्षों तक सशस्त्र संघर्ष चलाया। वे भूमिगत हुए। उन्होंने पाकिस्तान में शरण ली और अपने जीवन के अंतिक तीन वर्ष ब्रिटेन में गुजारे। 1990 में उनका निधन हो गया। आज भी नागा समस्या देश के समक्ष है।

Q.5. काजी दूध दोरजी खंगसरपा का संक्षिप्त परिचय दीजिए।

Ans. काजी लैदुप दोरजी खंगसरपा का जन्म 1904 में हुआ। वे सिक्किम के इतिहास में लोकतंत्र की स्थापना के आंदोलन के रूप में प्रसिद्ध हुए। वे सिक्किम प्रजामंडल एवं सिक्किम राज्य कॉंग्रेस के संस्थापक थे। 1962 में उन्होंने सिक्किम नेशनल कांग्रेस की स्थापना की। सिक्किम में आम चुनाव हुए। चुनाव में काजी लैंप को विजय मिली। इस विजय के उपरांत उन्होंने सिक्किम के भारत में विलय का पुरजोर समर्थन किया।

Q. 6.राजीव गाँधी का संक्षिप्त परिचय दीजिए।

Ans. राजीव गाँधी, फिरोज गाँधी और इंदिरा गाँधी की संतान थे। वे 1944 में जन्मे थे। 1980 के बाद वे देश की सक्रिय राजनीति में शामिल हुए। अपनी माँ इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद वे राष्ट्रव्यापी सहानुभूति के वातावरण में भारी बहुमत से 1984 में देश के प्रधानमंत्री बने और 1989 के बीच वे प्रधानमंत्री पद पर रहे। उन्होंने पंजाब के आतंकवाद के विरुद्ध उदारपंथी नीतियों के समर्थक लोंगेवाल से समझौता किया। उन्हें मिजो विद्रोहियों और असम में छात्र संघों से समझौता करने में सफलता मिली।

class 12th NotesMCQ
HistoryPolitical Science
EnglishHindi

Q.7. आनंदपुर साहिब प्रस्ताव का सिक्खों एवं देश पर क्या प्रभाव पड़ा ? 

Ans. आनंदपुर साहिब प्रस्ताव का सिक्ख जन-समुदाय पर बड़ा कम असर पड़ा। कुछ साल बाद जब 1980 में अकाली दल की सरकार बर्खास्त हो गई तो अकाली दल ने पंजाब तथा पड़ोसी राज्यों के बीच पानी के बँटवारे के मुद्दे पर एक आंदोलन चलाया। धार्मिक नेताओं के एक सबके ने स्वायत्त सिक्ख पहचान की बात उठायी। कुछ चरमपंथी तबकों ने भारत से अलग होकर ‘खालिस्तान’ बनाने की वकालत की।

Q.8.असम आन्दोलन के प्रमुख कारण क्या थे?

  • Ans. असम आन्दोलन के निम्न प्रमुख कारण थे–
  • (i) असमी भाषा का अन्य भाषाओं के लोगों पर प्रभुत्व
  • (ii) बिहार व बंगलादेश के लोगों का असम की अर्थव्यवस्था पर प्रभुत्व 
  • (iii) असम का केन्द्र सरकारों के द्वारा पक्षपात पूर्ण रवैया 
  • (iv) आसाम का आर्थिक पिछड़ापन

लघु उत्तरीय प्रश्न | SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS

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Q1. “ऑपरेशन विजय” का वर्णन कीजिए तथा उसका महत्व बताइए | 

Ans: पुर्तगालियों ने जब किसी भी तरह से भारतीयों की प्रार्थना की, आपसी बातचीत को व को छोड़ने के लिए नहीं माना और उसने गलतफहमी में राष्ट्रवादियों और देश प्रेमियों पर हमले करने शुरू कर दिए। सैंकड़ों लोगों को पुर्तगाली पुलिस ने जब अपना निशाना बनाया तो भारत गोवा की आजादी के लिए ‘ऑपरेशन विजय’ (Operation Vijay) नामक सैनिक कार्यवाही की ताकि गोवा के साथ-साथ गोवा और दमन दीव को अत्याचारी शासन से छुड़ाया जा सके। 

ऑपरेशन विजय नामक कार्यवाही 17-18 दिसंबर, 1961 को शुरू की गई। इस कार्यवाही के कमांडर जनरल जे. एन. चौधरी थे। दोपहर के 2 बजकर 25 मिनट पर 19 दिसंबर, 1961 को ऑपरेशन विजय नामक कार्यवाही समाप्त हो गई। यह कार्यवाही भारतीय स्वतंत्रता को पूर्ण करने वाली कार्यवाही थी। गोवा, दमन, दीव हवेली आदि में भारत का तिरंगा फहराया गया। निःसंदेह गोवा की स्वतंत्रता ने भारतीयों का स्वाभिमान बढ़ाया और उन्हें सुशोभित किया। ये भारत के अंग बन गए। भारत की भूमि से विदेशियों की अनाधिकृत उपस्थिति और वर्चस्व पूर्णतया समाप्त हो गया।

Q. 2. पुर्तगाल से गोवा मुक्ति का संक्षेप में विवरण दीजिए। Or, गोवा का भारत में विलय किस प्रकार हुआ ?

Ans. भारत में गोवा का विलय आसानी से नहीं हुआ। इसका कारण पुर्तगालियों फ्रांसीसी का जिद्दी दृष्टिकोण था। वह इसे अपनी इज्जत का चिन्ह समझते थे और वे इसे अपने नियंत्रण में रखना चाहते थे। उनका यह दृष्टिकोण भारतीय दृष्टिकोण के बिल्कुल विपरीत था जो इसे पुर्तगालियों द्वारा भारत के आक्रमण की कार्यवाही और उसे जबरदस्ती हाथियाये रखने का अपने देश के सम्मान के लिए एक धब्बा मानते थे। 

भारतीय सरकार ने भरसक कोशिश की कि पुर्तगालियों को गोवा छोड़कर जाने के लिए राजी करे गोवा को प्राप्त करने के लिए पुर्तगाल की राजधानी लिस्बन में अपना कार्यालय खोला ताकि यहाँ के सरकार को गोवा छोड़ने के लिए राजी किया जा सके लेकिन आखिरकार 1953 को यह कार्यालय बंद कर दिया गया क्योंकि भारत के तमाम कूटनीतिज्ञ प्रयास विफल हो गए।

Q3. ‘भारत में सिक्किम विलय” विषय पर एक टिप्पणी लिखिए।

Ans. भारत में सिक्किम का विलय (Annexation of Sikkim in India)— 

1. पृष्ठभूमि मतलब यह कि तब सिक्किम भारत का अंग तो नहीं था लेकिन यह पूरी तरह संप्रभु राष्ट्र भी नहीं था। सिक्किम की रक्षा और विदेशी मामलों का जिम्मा भारत सरकार का था जबकि सिक्किम के आंतरिक प्रशासन की बागडोर यहाँ के राजा चोव्याल के हाथों में थी। यह व्यवस्था कारगर साबित नहीं हो पायी क्योंकि सिक्किम के राजा स्थानीय जनता के लोकतांत्रिक आकांक्षाओं को संभाल नहीं सके।

2. सिक्किम में लोकतंत्र तथा विजयी पार्टी का सिक्किम को भारत के साथ जोड़ने का प्रयास एक बड़ा हिस्सा नेपालियों का था नेपाली मूल की जनता के मन में यह भाव घर कर गया था। चोव्याल अल्पसंख्यक लेपचा-भूटिया के एक छोटे से अभिजन तबके का शासन उन पर लाद रहा है। चोव्याल विरोधी दोनों समुदाय के नेताओं ने भारत सरकार से मदद माँगी और भारत सरकार का समर्थन हासिल किया। सिक्किम विधानसभा के लिए पहला लोकतांत्रिक चुनाव 1974 में हुआ और इसमें सिक्किम काँग्रेस को भारी विजय मिली। यह पार्टी सिक्किम को भारत के साथ जोड़ने के पक्ष में थी।

3. सिक्किम भारत का 22वाँ राज्य (प्रांत) बनाया गया – विधानसभा ने पहले भारत के ‘सह-प्रान्त’ बनने की कोशिश की और इसके बाद 1975 के अप्रैल में एक प्रस्ताव पास किया। इस प्रस्ताव में भारत के साथ सिक्किम के पूर्ण विलय की बात कही गई थी। इस प्रस्ताव के तुरंत बाद सिक्किम के पूर्ण विलय की बात कही गई थी। इस प्रस्ताव के तुरंत बाद सिक्किम विधानसभा के अनुरोध को तत्काल मान लिया और सिक्किम भारत का 22वाँ राज्य बन गया। चोग्याल ने इस फैसले को नहीं माना और उसके समर्थकों ने भारत सरकार पर साजिश रचने तथा बल-प्रयोग करने का आरोप लगाया। बहरहाल, भारत संघ में सिक्किम के विलय को स्थानीय जनता का समर्थन प्राप्त था। इस कारण यह मामला सिक्किम की राजनीति में कोई विभेदकारी मुद्दा न बन सका। 

Q. 4 गोवा को पूर्ण राज्य का दर्जा सन् 1987 में किस तरह प्राप्त हुआ ? संक्षेप में लिखिए। 

Ans. दिसंबर 1961 में पुर्तगाल से स्वतंत्रता प्राप्त करने वाला गोवा एवं भारत संघ में शामिल हुए गोवा संघ प्रदेश में शीघ्र एक और समस्या उठ खड़ी हुई महाराष्ट्रवादी गोमांतक पाटई के नेतृत्व में एक तबके ने माँग रखी कि गोवा को महाराष्ट्र में मिला दिया जाए क्योंकि यह मराठी भाषी क्षेत्र है। बहरहाल, बहुत से गोवावासी गोवानी पहचान और संस्कृति को स्वतंत्र अहमियत बनाए रखना चाहते थे। 

कोंकणी भाषा के लिए भी इनके मन में आग्रह था। इस तबके का नेतृत्व यूनाइटेड गोआ में एक विशेष जनमत सर्वेक्षण कराया। इसमें गोवा के लोगों से पूछा गया कि आप लोग महाराष्ट्र में शामिल होना चाहते हैं अथवा अलग बने रहना चाहते हैं। भारत में यही एकमात्र अवसर था जब किसी मसले पर सरकार ने जनता की इच्छा को जानने के लिए जनमत संग्रह जैसी प्रक्रिया अपनायी थी। अधिकतर लोगों ने महाराष्ट्र से अलग रहने के पक्ष में मत डाला। इस तरह गोवा संघ शासित प्रदेश बना रहा। अंततः 1987 में गोवा भारत संघ का एक राज्य बना।

Q5. जम्मू-कश्मीर की 1948 से 1986 के मध्य राजनीति से जुड़ी प्रमुख घटनाओं की चर्चा कीजिए।

Ans. जम्मू-कश्मीर में 1948 के उपरांत तथा 1952 तक की राजनीतिका पद संभालने के बाद शेख अब्दुल्ला ने भूमि सुधार की बड़ी मुहिम चलायी। उन्होंने इसके साथ- साथ जन कल्याण की कुछ नीतियों भी लागू की। इन सबसे यहाँ की जनता का फायदा हुआ। बहरहाल कश्मीर की हैसियत को लेकर शेख अब्दुल्ला के विचार केंद्र सरकार से मेल नहीं खाते थे। इससे दोनों के बीच मतभेद पैदा हुआ।

शेख अब्दुल्ला की बर्खास्तगी एवं चुनाव 1953 में शेख अब्दुल्ला को कर दिय गया। एक साल तक उन्हें नजरबंद रखा गया। शेख अब्दुल्ला के बाद जो नेता सत्तासीन हुए दे शेख की तरह लोकप्रिय नहीं थे। केन्द्र के समर्थन के दम पर ही वे राज्य की तरह लोकप्रिय नहीं थे। केन्द्र के समर्थन के दम पर ही वे राज्य शासन चला सके। राज्य में हुए विभिन्न चुनावों में यांचली और गड़बड़ी के गंभीर आरोप लगे।

जम्मू-कश्मीर में 1953 से 1977 तक की राजनीतिक घटनाएँ 

(क) 1953 से लेकर 1974 के बीच अधिकांश समय इस राज्य की राजनीति पर काँग्रेस का असर रहा। विभाजित हो चुकी नेशनल कॉफ्रेंस (शेख अब्दुल्ला के बिना) काँग्रेस के समर्थन से राज्य में कुछ समय तक सत्तासीन रही लेकिन बाद में वह काँग्रेस में मिल गई। इस तरह राज्य की सत्ता सीधे कॉंग्रेस के नियंत्रण में आ गई। इस बीच शेख अब्दुल्ला और भारत सरकार के बीच सुलह की कोशिश जारी रही। 

(ख) अंततः 1974 में इंदिरा गांधी के साथ शेख अब्दुल्ला ने एक समझौते पर हस्ताक्षर किया और वे राज्य के मुख्यमंत्री बने। उन्होंने नेशनल कॉफ्रेंस को फिर से खड़ा किया और 1977 के राज्य विधानसभा के चुनाव में बहुमत से निर्वाचित हुए। जम्मू-कश्मीर फारुख अब्दुल्ला के प्रथम कार्यकाल में – सन् 1982 में शेख अब्दुल्ला की मृत्यु हो गई और नेशनल कॉफ्रेंस के नेतृत्व की कमान मुख्यमंत्री बने। 

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न | Long Answer Type Questions

Class 12 Political Science Notes
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Q. 1. द्रविड़ आंदोलन पर एक निबंध लिखिए ।

Ans. I. द्रविड़ आंदोलन (Dravidian Movement ) — क्षेत्रीय आंदोलनों में से एक शक्तिशाली आंदोलन था देश की राजनीति में यह आंदोलन क्षेत्रीयवादी भावनाओं की सर्वप्रथम और सबसे प्रबल अभिव्यक्ति था । 

II. आंदोलन का बदला स्वरूप — सर्वप्रथम इस आंदोलन के नेतृत्व के एक हिस्से की आकांक्षा (aspiration) एक स्वतंत्र द्रविड़ राष्ट्र बनाने की थी, परंतु आंदोलन ने तभी सशस्त्र संघर्ष (Armed Reballion) का मार्ग नहीं अपनाया। इस आंदालन के प्रारंभ में द्रविड़ भाषा में एक बहुत ज्यादा लोकप्रिय नारा दिया था जिसका हिंदी रूपांतर है। 

III. नेतृत्व और तरीके – द्रविड़ आंदोलन का नेतृत्व तमिल सुधारक नेता ई. वी. रामास्वामी नायकर जो पेरियार के नाम से प्रसिद्ध हुए, के हाथों में था। 

(क) द्राविड़ आंदोलन की प्रक्रिया से एक राजनैतिक संगठन ‘द्रविड़ कषगम’ का सूत्रपात हुआ। यह संगठन ब्राह्मणों के वर्चस्व (Domination of the Brahman) की खिलाफत (विरोध) करता था तथा उत्तरी भारत के राजनैतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक प्रभुत्व को नकारते हुए क्षेत्रीय गौरव की प्रतिष्ठा पर जोर देता था। प्रभुत्व को नकारते हुए क्षेत्रीय गौरव की प्रतिष्ठा पर जोर देता था।

(ख) कालांतर में द्रविड़ कषगम दो घड़ों में बँट गया और आंदोलन की समूची राजनीतिक विरासत द्रविड़ मुनेत्र कषगम के पाले में केंद्रित हो गई। 1953-54 के दौरान डी. एम. के. ने तीन सूत्रीय आंदोलन के साथ राजनीति में कदम रखा। आंदोलन की तीन माँगें थीं पहली, कल्लामुडभ नामक रेलवे स्टेशन का नया नाम डालमियापुरम समस्त किया जाए और स्टेशन का मूल नाम दुवारा किया जाए।

Q2. पंजाब संकट तथा 1984 के सिक्ख विरोधी दंगों का संक्षिप्त रूप से विवेचन कीजिए। 

Ans. 1. पंजाब संकट (Punjab Crisis)— 1. 1980 की राजनीतिक या चुनावी हार के बाद से ही अकालियों के नेतृत्व में सिक्खों ने केंद्र सरकार के विरुद्ध संघर्ष छेड़ दिया था। कॉंग्रेस की आंतरिक गुटबंदी की उठा-पटक ने इस संघर्ष में जान डाल दी।

2. उस समय आंदोलन जिन माँगों को लेकर किया गया उनमें से प्रमुख माँगें ये थीं-

  • (i) अन्य राज्यों के पंजाबी भाषी क्षेत्र पंजाब में मिलाए जाएँ, 
  • (ii) चंडीगढ़ को पंजाब की राजधानी माना जाए, 
  • (iii) भाखड़ा नांगल योजना पंजाब के नियंत्रण में हो,
  • (iv) पंजाब में नारी उद्योग स्थापित किए जाएँ, 
  • (v) शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के प्रबंध में देश के सभी गुरुद्वारे हों।

3. संत भिंडरावाला उग्रवादी प्रकृति का था। उसने सिक्ख युवकों की एक विशाल वाहिनी अपने चारों ओर एकत्रित कर ली और आनंदपुर साहब प्रस्ताव की पूर्ति के नाम पर सिक्खों का अलग राज्य बनाने के लिए उकसाया।

4. सिक्ख विरोधी दंगे (Anti Sikh Riots ) — दिसंबर 1983 में जब केंद्रीय सरकार पर भिंडरवाले (Bindranwale) को गिरफ्तार करने के लिए दबाव पड़ रहा था, तब वह तथा उसके असंख्य हथियारबद्ध समर्थकों ने स्वर्ण मंदिर के दायरे में मौजूद सबसे अधिक पावन ‘भवन ‘अकाल तख्त’ में प्रवेश कर लिया। जब यह संत इस सुरक्षित स्थान में प्रवेश कर गया था, तब यह स्थान जिसे अब तक सुरक्षित समझा जाता था, इसमें ‘दंड’ की बाढ़ प्रारंभ हुई और अन्य प्रकार की ‘कार्यवाहियाँ’ पंजाब के सभी स्थानों में प्रारंभ हो गई।

5. दंगों का कारण (Cause of Riots ) — (i) 1984 के जून माह में भारत सरकार ने ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ चलाया। यह स्वर्णमंदिर में की गई सैन्य कार्रवाई का कूट नाम था। इस सैन्य अभियान में सरकार ने उग्रवादियों को तो सफलतापूर्वक मार भगाया लेकिन सैन्य कार्रवाई से ऐतिहासिक स्वर्णमंदिर को क्षति भी पहुँची। इससे सिक्खों की भावनाओं को गहरी चोट लगी ।। भारत और भारत से बाहर बसे अधिकतर सिक्खों ने सैन्य अभियान को अपने धर्म-विश्वास पर हमला माना। इन बातों से उग्रवादी और नरमपंथी समूहों को और बल मिला।

(ii) कुछ और त्रासद घटनाओं ने पंजाब की समस्या को एक जटिल रास्ते पर ला खड़ा किया। प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की 31 अक्तूबर, 1984 के दिन उनके आवास के बाहर उन्हीं के अंगरक्षकों ने हत्या कर दी। एक तरफ पूरा देश इस घटना से शोक संतप्त था तो दूसरी तरफ दिल्ली सहित उत्तर भारत के कई हिस्सों में सिक्ख समुदाय के विरुद्ध हिंसा भड़क उठी। यह हिंसा कई हफ्तों तक जारी रही।

(iii) दो हजार से ज्यादा की तादाद में सिक्ख, दिल्ली में मारे गए। देश की राजधानी दिल्ली इस हिंसा से सबसे ज्यादा प्रभावित हुई थी। कानपुर, बोकारो और चपस जैसी देश के कई जगहों पर सैकड़ों सिक्ख मारे गए। कई सिक्ख परिवारों में कोई भी पुरुष न वचा। इन परिवारों को गहरा भावनात्मक आघात पहुँचा और आर्थिक हानि उठानी पड़ी। सिक्खों को सबसे ज्यादा दुख इस बात का था कि सरकार ने स्थिति को सामान्य बनाने के लिए बड़ी देर से कदम उठाए। साथ ही, हिंसा करने वाले लोगों को कारगर तरीके से दंड भी नहीं दिया गया।

6. दो जुड़ी घटनाएँ (Two connected events) (i) 1984 के चुनावों के बाद सत्ता में आने पर नए प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने नरमपंथी अकाली नेताओं से बातचीत की शुरुआत की। अकाली दल के तत्कालीन अध्यक्ष हरचरण सिंह लोंगोवाल के साथ 1985 की जुलाई में एक समझौता हुआ। इस समझौता को राजीव गाँधी लोगोंवाल समझीता अथवा पंजाब समझौता कहा जाता है।

Q3. जम्मू-कश्मीर की समस्या का मूल कारण समझाते हुए इसके निवारण का तरीका सुझाइये ।

Ans. आजादी से पहले जम्मू-कश्मीर एक देशी रियासत थी। भारत सरकार अधिनियम 1947 के आधार पर जम्मू-कश्मीर को भी यह छूट दी गयी थी कि यह चाहे तो स्वतंत्र राज्य के रूप में रहे अथवा पाकिस्तान या भारत में विलय हो जाए। 

जम्मू-कश्मीर के राज सिंह ने स्वतंत्र रहना चाहता परन्तु कविलियों के 1948 में जम्मू-कश्मीर पर आक्रमण के कारण राजा सिंह ने 1948 में कुछ शर्तों के आधार पर भारत में विलय स्वीकार कर लिया। 

परन्तु इस विलय को पाकिस्तान ने व जम्मू-कश्मीर के एक वर्ग न स्वीकार नहीं किया। इसी आधार पर पाकिस्तान के साथ भारत के सम्बन्ध लगातार खराब ही चल रहे हैं। 1948 व 1965 में पाकिस्तान व भारत के बीच युद्ध चला।

भारत ने जम्मू-कश्मीर को भारत के संविधान के अनुच्छेद 370 के आधार पर विशेष दर्जा दिया जिसके आधार पर कश्मीर का अपना अलग संविधान है व जम्मू-कश्मीर में भारतीय संसद के द्वारा बनाया गया कोई कानून तभी लागू हो सकता है जब उन कानून को जम्मू-कश्मीर की विधान सभा पारित कर दे। 

इस विलय के बाद नेशनल कॉफ्रेंस के नेता श्री शेख अब्दुल्ला को जम्मू-कश्मीर का प्रधानमन्त्री बनाया गया व यह भी निश्चत किया गया कि जब जम्मू-कश्मीर के हालात सामान्य हो जायेंगे। इस विलय पर जम्मू-कश्मीर के लोगों की राय अथवा स्वीकृति प्राप्त कर ली जायेगी।

केवल इस विलय से समस्या समाप्त नहीं हुई बल्कि इस विलय के बाद समस्या प्रारम्भ हो गयी। पाकिस्तान ने न केवल इसे अस्वीकार कर दिया बल्कि जम्मू-कश्मीर के लोगों को भी लगातार इस विषय पर गुमराह करके वहाँ पर उग्रवाद व आतंकवाद को जन्म दिया।

इस आर्टिकल में किसी भी प्रकार का त्रुटि आपको मिलती है तो हमें कमेंट करके जरूर बताएं हम उसे जल्द से जल्द ठीक करने की कोशिश करेंगे क्योंकि लिखने समय सबसे गलती हो जाती है 😅😅😅😅😅😅😅😅😅


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FAQs

Q1. जम्मू-कश्मीर की समस्या का प्रमुख कारण क्या है ? 

Ans. जम्मू-कश्मीर की प्रमुख समस्या इसका भारत में विलय का स्वरूप है। भारत सरकार अधिनियम 1947 के अनुसार सभी देशी रियासतों को यह अधिकार था कि अपना विलय भारत में करे या पाकिस्तान में उन्हें स्वतन्त्र रूप से रहने का अधिकार भी दिया गया था। जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन राजा हरिसिंह ने प्रारम्भ में स्वतन्त्र रहने की स्थिति को स्वीकारा परन्तु बाद में कविलों के आक्रमण के कारण भारत में विलय को स्वीकारा। 

Q2. अकालियों ने पंजाब की अधिक स्वायत्तता की माँग क्यों उठाई ? 

Ans. पंजाब में अकाली दल ने अधिकांशतः मिली-जुली सरकार अर्थात् गठबन्धन की सरकारें ही चलायीं। अकाली दल का नेतृत्व यह महसूस करता है कि पंजाब से हरियाणा अलग होने के बावजूद भी अकाली दल की स्थिति मजबूत नहीं हुई। 

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