Class 12 Political Science Notes Ch-7 In Hindi | समकालीन विश्व में सुरक्षा कक्षा 12 विषय राजनीति विज्ञान पाठ 7 के प्रश्न उत्तर

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Class 12 Political Science Notes Ch-7 In Hindi में यह अध्याय काफी महत्वपूर्ण है| इस अध्याय से काफी प्रश्न परीक्षा में पूछे जा चुके हैं तथा यह अध्याय विद्यार्थी के लिए अति आवश्यक है क्योंकि इस अध्याय से हमें विश्व की राजनीति समझ में आती है|

तो छात्रों, इस लेख को पढ़ने के बाद, आपको इस अध्याय से परीक्षा में बहुत अधिक अंक प्राप्त होंगे, क्योंकि इसमें सभी परीक्षाओं से संबंधित प्रश्नों का वर्णन किया गया है, इसलिए इसे पूरा अवश्य पढ़ें।

मैं खुद 12वीं का टॉपर रहा हूं और मुझे पता है कि 12वीं की परीक्षा में किस तरह के प्रश्न पूछे जाते हैं। वर्तमान में, मैं एक शिक्षक की भूमिका भी निभा रहा हूँ, और अपने छात्रों को कक्षा 12वीं की महत्वपूर्ण जानकारी और विषयों का अभ्यास भी कराता हूँ। मैंने यहां 5 वर्षों से अधिक के अपने अनुभव के साथ प्रश्न-उत्तर लेख लिखा है। इस पोस्ट की मदद से आप परीक्षा में इस अध्याय से राजनीति विज्ञान में बहुत अच्छे अंक प्राप्त कर सकेंगे।

Class 12 Political Science Notes Ch-6 In Hindi | अंतर्राष्ट्रीय संगठन कक्षा 12 विषय राजनीति विज्ञान पाठ 6 के प्रश्न उत्तर

कक्षा | Class12th 
अध्याय | Chapter07
अध्याय का नाम | Chapter Nameसमकालीन विश्व में सुरक्षा
बोर्ड | Boardसभी हिंदी बोर्ड
किताब | Book एनसीईआरटी | NCERT
विषय | Subjectराजनीति विज्ञान | Political Science
मध्यम | Medium हिंदी | HINDI
अध्ययन सामग्री | Study Materialsप्रश्न उत्तर | Question answer

पाठ के मुख्य बिंदु | Main Point of This chapter

संयुक्त राष्ट्रसंघ की स्थापना 1945 में हुई। इसके उद्देश्यों में प्रथम उद्देश्य अन्तर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को बनाए रखना है। पाठ्यक्रम में शांति के अध्याय में शांति के उद्देश्य, व्यापक अर्थों और उसकी प्राप्ति के लिए उठाए गए विभिन्न कदमों का उल्लेख किया गया था। यहाँ सुरक्षा के अर्थों तथा उसको बनाए रखने के उपायों और आज के विश्व में सुरक्षा की स्थिति के बारे में उल्लेख किया जा रहा है।

Class 12 Political Science Notes Ch-7 In Hindi | समकालीन विश्व में सुरक्षा कक्षा 12 विषय राजनीति विज्ञान पाठ 7 के प्रश्न उत्तर
image credit: shaala.com

सुरक्षा शब्द का प्रयोग व्यक्ति दैनिक जीवन में प्रयोग करता है जैसे कि व्यक्ति की सुरक्षा, जान-माल की सुरक्षा, राष्ट्रीय सुरक्षा, अन्तर्राष्ट्रीय सुरक्षा आज ( मार्च 2007) जम्मू-कश्मीर में साझा सरकार है, कॉंग्रेस और पी. डी. पी का गठबन्धन है। 

परन्तु पी.डी.पी की माँग है कि जम्मू-कश्मीर में सैनिकों को घटाया जाए और कॉंग्रेस तथा आम जनता का कहना है कि कश्मीर में सेना की मात्रा में कमी करने का अर्थ है राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे का निमंत्रण देना, आतंकवादी गतिविधियों को छूट देना और राष्ट्रीय हितों तथा राष्ट्रीय सुरक्षा से खिलवाड़ करना। बेशक आम आदमी सुरक्षा शब्द के सही अर्थों को नहीं जानता परन्तु इस शब्द का प्रयोग करता है। 

आज लगभग सभी राजनीतिक नेताओं को सुरक्षा प्रदान की गई है अर्थात् सुरक्षा गार्ड उनके साथ आगे-पीछे चलते हैं। कई वार राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री का कहीं का पहले से निश्चित दौरा सुरक्षा खतरों (Security concerns) के कारण रद्द कर दिया जाता है या उनकी यात्रा का रूट बदल दिया जाता है। 

सुरक्षा के अर्थों को जानने से व्यक्ति को सरकार तथा अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय की बहुत सी गतिविधियों के कारण आसानी से समझ में आ जाते हैं। राष्ट्र की सुरक्षा केवल युद्धों और आक्रमणों तथा आतंकवादी हिंसक गतिविधियों से ही खतरे में नहीं पड़ती बल्कि भुखमरी, बीमारी, महामारी, भूकम्प, सुनामी अथवा समुद्री तूफान, बाढ़ और सूखा, ओलावृष्टि आदि से भी खतरे में पड़ती है। भारत ने इन खतरों से सुरक्षा के लिए समुचित प्रयास किए हैं।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न | VERY SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS

Class 12 Political Science Notes
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Q.1.सुरक्षा नीति का संबंध किससे होता है ? इसे क्या कहा जाता है ? इसे रक्षा कब कहा जाता है ?

Ans. युद्ध में कोई सरकार भले ही आत्मसमर्पण कर दे लेकिन वह इसे अपने देश की नीति के रूप में कभी प्रचारित नहीं करना चाहेगी। इस कारण, सुरक्षा-नीति का संबंध युद्ध की आशंका को रोकने में होता है जिसे ‘अपराध’ कहा जाता है और युद्ध को सीमित रखने अथवा उसको समाप्त करने से होता है जिसे रक्षा कहा जाता है।

Q. 2. सुरक्षा की दृष्टि से संयुक्त राष्ट्र संघ की क्या स्थिति है ? समझाइए । 

Ans. किसी देश के भीतर हिंसा के खतरों से निपटने के लिए एक जानी-पहचानी व्यवस्था होती है-इसे सरकार कहते हैं। लेकिन, विश्व राजनीति में ऐसी कोई केन्द्रीय सत्ता नहीं जो सबके ऊपर हो। यह सोचने का लालच हो सकता है कि संयुक्त राष्ट्रसंघ ऐसी सत्ता है अथवा ऐसा बन सकता है। 

बहरहाल, फिलहाल अपनी बनावट के अनुरूप संयुक्त राष्ट्रसंघ अपने सदस्य देशों का दास है और इसके सदस्य देश जितनी सत्ता इसको सौंपते और स्वीकारते हैं उतनी ही सत्ता इसे हासिल होती है। अतः विश्व-राजनीति में हर देश को अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी खुद उठानी होती है । 

Q. 3. मानव अधिकारों से आप क्या समझते हैं ? संयुक्त राष्ट्र ने मानव अधिकारों के घोषणा-पत्र को कब स्वीकृति दी ? 

Ans. मानव अधिकार उन अधिकारों को कहते हैं जो कि प्रत्येक मनुष्य को मानव होने के नाते अवश्य ही मिलने चाहिए। संयुक्त राष्ट्र ने मानव अधिकारों के घोषणा-पत्र को 10 दिसम्बर, 1948 ई. को स्वीकृति दी और प्रत्येक देश की सरकार से यह आशा की कि वह अपने नागरिकों को यह अधिकार प्रदान करेगी।

Q.4. विश्व सुरक्षा की धारणा की उत्पत्ति कैसे हुई ?

Ans. (1) विश्वव्यापी खतरे जैसे वैश्विक तापवृद्धि (Global warming) अन्तर्राष्ट्र आतंकवाद, एड्स और बर्ड फ्लू जैसी महामारियों के मद्देनजर 1990 के दशक में विश्व की उत्पत्ति हुई। 

(2) कोई भी देश इन समस्याओं का समाधान अकेले नहीं कर सकता। इ स्थितियों का दूसरे देशों पर प्रभाव पड़ सकता है। 

Q. 5. आतंकवाद क्या है ? इसके कुछ उदाहरण दीजिए । 

Ans. (1) आतंकवाद का आशय राजनीतिक हिंसा से है जो जानबूझकर और बिना कि पारण सहानुभूति के नागरिकों को अपना निशाना बनाता है। 

(2) उदाहरण–विमान अपहरण अथवा भीड़-भाड़ भरी जगहों जैसे रेलगाड़ी, होटल, बाजार या ऐसे अन्य स्थानों पर बम लगाना। अमरीका में 9/11 की घटना भी इसी का उदाहरण है।

Q. 6. मानवाधिकारों के हनन की स्थिति में संयुक्त राष्ट्र संघ को हस्तक्षेप करना चाहिए या नहीं ? 

Ans. (1) इसको लेकर विविध विचार हैं। कुछ का कहना है कि संयुक्त राष्ट्र संघ का घोषणापत्र अन्तर्राष्ट्रीय बिरादरी को अधिकार देता है कि मानवाधिकारों की रक्षा के लिए उसे हथियार उठाना चाहिए।

(2) कुछ दूसरे लोगों का तर्क है कि संभव है, ताकतवर देशों के हितों से यह निर्धारित हो कि संयुक्त राष्ट्र संघ मानवाधिकार उल्लंघन के किस मामले में कार्रवाई करेगा और किसमें नहीं।

लघु उत्तरीय प्रश्न | SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS

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Q. 1. सुरक्षा की पारंपरिक धारणा या राष्ट्रीय सुरक्षा को स्पष्ट कीजिए । 

Ans. सुरक्षा की पारंपरिक धारणा या राष्ट्रीय सुरक्षा-

(1) पारंपरिक अवधारणा में किसी राष्ट्र को सबसे बड़ा खतरा सेना से होता है।

(2) इस खतरे का स्रोत कोई राष्ट्र होता है जो सैनिक हमले की धमकी देकर सम्प्रभुता, स्वतंत्रता और क्षेत्रीय अखण्डता जैसे किसी देश के केन्द्रीय मूल्यों के लिए खतरा पैदा करता है। 

(3) सैनिक कार्रवाई से आम नागरिकों के जीवन को भी खतरा होता है। सैनिक कार्रवाई में सैनिकों के साथ नागरिक भी मारे जाते हैं। 

(4) युद्ध में निहत्थे स्त्री-पुरुषों को निशाना बनाया जाता है।

(5) इसमें नागरिकों और उनकी सरकार के साहस को तोड़ने का प्रयास किया जाता है। 

Q. 2. परम्परागत सुरक्षा नीति के तत्त्वों का संक्षिप्त विवरण दीजिए ।

Ans. परम्परागत सुरक्षा नीति के तत्त्व – 

आत्मासमर्पण परम्परागत सुरक्षा नीति का प्रथम तत्त्व आत्मसमर्पण है। इसमें विरोधी पक्ष की बात बिना युद्ध किए मान लेना अथवा युद्ध से होने वाले नाश को बढ़ा-चढ़ाकर संकेत देना ताकि दूसरा पक्ष डर जाए और आक्रमण न करे। युद्ध होने पर उसे पराजित करना ।

(1) सुरक्षा नीति का एक महत्वपूर्ण तत्व शक्ति संतुलन है। इसके अन्तर्गत किसी देश को अपनी शक्ति को विरोध ताकतवर देश के बराबर करना होता है और शक्ति संतुलन का पलड़ा अपने पक्ष में करना होता है।

(2) यदि कोई देश ऐसा नहीं करता है कि ताकतवर देश उसके ऊपर आक्रमण है और उसको विनाश की ओर ले जा सकता है। 

(3) शक्ति संतुलन के प्रति सभी सरकारें संवेदनशील होती है कोई भी सरकार दूसरे देशों से शक्ति संतुलन का पलड़ा अपने पक्ष में बैठाने के लिए जीतोड़ कोशिश करती है। 

(4) पड़ोसी, शत्रु या जिन देशों के साथ अतीत में लड़ाई हो चुकी हो, उनके साथ शक्ति संतुलन ” को अपने पक्ष में करने पर विशेष जोर दिया जाता है। 

(5) शक्ति संतुलन बनाये रखने के लिए गठबंधन स्थापित करना जरूरी होता है। पूर्व सोवियत संघ और अमरीका के गठबंधन के कारण विश्व में शक्ति संतुलन कायम था। 

class 12th NotesMCQ
HistoryPolitical Science
EnglishHindi

Q3. किसी देश के लिए आंतरिक सुरक्षा क्यों जरूरी है ? पारंपरिक अवधारणा की आंतरिक सुरक्षा के महत्त्व को स्पष्ट कीजिए । 

Ans. किसी देश के लिए आंतरिक सुरक्षा की आवश्यकता : 

(1) प्रत्येक देश के लिए आंतरिक शांति और कानून व्यवस्था अति आवश्यक है। आंतरिक शांति के अभाव में बाहरी आक्रमणों का सामना नहीं किया जा सकता।

(2) द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् इस पर जोर नहीं दिया गया। वस्तुतः इसका कारण यह था कि ताकतवर देशों में लगभग आंतरिक शासन स्थापित था। 

(3) 1945 के पश्चात् संयुक्त राज्य अमरीका और सोवियत संघ अपनी सीमा के अन्दर एकीकृत और शान्ति सम्पन्न है।

(4) अधिकांश यूरोपीय देशों विशेष रूप से पश्चिमी देशों के सामने अपनी सीमा के भीतर बसे समुदायों अथवा वर्गों से कोई गम्भीर खतरा नहीं था। इसलिए इन देशों ने सीमा पार के खतरों पर ध्यान दिया। 

(5) कुछ यूरोपीय देशों को अपने उपनिवेशों में जनता से हिंसा का भय था क्योंकि अब ये लोग आजादी चाहते थे।

Q.4. नवस्वतंत्र देशों की सुरक्षा के क्या खतरे थे ?

Ans. नवस्वतंत्र देशों की सुरक्षा के खतरे 

(1) इन देशों को बढ़ते शीतयुद्ध से डर था क्योंकि कुछ नवस्वतंत्र देश यूरोपीय शक्तियों के समान शीतकालीन गुटों में किसी न किसी के सदस्य बन गये थे। 

(2) दूसरे गुटों में जाने वाले अपने पड़ोसी देश अथवा दूसरे गुट के नेता ( अमरीका या सोवियत संघ ) से शत्रुता मोल लेना था। 

(3) अमरीका अथवा सोवियत संघ के किसी साथी देश से शत्रुता ठाननी थी। वस्तुतः द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जितने युद्ध हुए उसमें एक तिहाई युद्धों के लिए शीतयुद्ध जिम्मेदार रहा। 

(4) नवस्वतंत्र देशों को उसके यूरोपीय औपनिवेशिक शासकों के आक्रमण का भय था। ऐसे में इन देशों को एक साम्राज्यवादी युद्ध से अपनी रक्षा के लिए तैयारी करनी पड़ी। 

(5) नवस्वतंत्र देशों में आंतरिक सैन्य संघर्ष भी परा था। अलगाववादी आंदोलन तेज हो रहे थे।

Q5. निरस्त्रीकरण शब्द को स्पष्ट कीजिए । 

Ans. निरस्त्रीकरण का अर्थ है कि मानवता का संहार करने वाले अस्त्र-शस्त्रों का निर्माण बन्द हो व आणविक शस्त्रों पर प्रतिबंध लगे। विश्व के अनेक देशों ने अणुबम तथा हाइड्रोजन बम बना लिए हैं और कुछ बनाने की तैयारी कर रहे हैं। इससे अन्तर्राष्ट्रीय शांति को दिन- प्रतिदिन खतरा बढ़ रहा है। 

एक देश द्वारा बनाए गए संहारक शस्त्रों का उत्तर दूसरा देश अधिक विनाशक शस्त्रों का निर्माण करके देता है। भारत प्रारंभ से ही निरस्त्रीकरण के पक्ष में रहा है। इस दृष्टि से संसार में होनेवाले किसी भी सम्मेलन का भारत ने स्वागत किया है। 1961 ई. में भारत ने अणुबम न बनाने का प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्रसंघ की साधारण सभा में रखा था। जेनेवा में होने वाले निरस्त्रीकरण सम्मेलन में भारत ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। अन्त में हम यह कह सकते हैं कि निरस्त्रीकरण में ही विश्व का कल्याण निहित है।

Q.6. सुरक्षा की पारंपरिक धारणा में विश्वास बहाली से क्या लाभ हैं ? 

Ans. विश्वास बहाली से लाभ 

(1) सुरक्षा नीति का एक महत्त्वपूर्ण तरीका विश्वास बहाली है। इन उपायों से देशों के बीच हिंसाचार कम किया जा सकता है। 

(2) इस प्रक्रिया में हे देश सैन्य टकराव और प्रतिद्वन्द्विता वाले देश सूचनाओं तथा विचारों के नियमित आदान-प्रदान का निर्णय करते हैं। 

(3) ऐसा करके ये देश अपने प्रतिद्वन्द्वी को इस बात का आश्वासन देते हैं। कि उनकी ओर से हमले की योजना नहीं है। 

(4) इसके अलावा अन्य कई बातों का आदान-प्रदान

Q.7. आतंकवाद से आप क्या समझते है 

Ans. आतंकवाद का अर्थ एवं उदाहरण 

(1) आतंकवाद का आशय राजनीतिक हिंसा से है जिसमें निर्दयता से जनता की हत्या की जाती है। आतंकवाद से आज विश्व के कई देश ग्रस्त है।

(2) कोई राजनीतिक संदर्भ या स्थिति नापसंद हो तो आतंकवादी समूह उसे बल प्रयोग की धमकी देकर बदलना चाहते हैं। 

(3) जनमत को आतंकित करने के लिए नागरिकों को निशाना बनाया जाता है। 

(4) आतंकवाद में नागरिकों के असंतोष का इस्तेमाल किया जाता है और राष्ट्रीय सरकारों अथवा संघर्षों में शामिल अन्य पक्ष के खिलाफ कार्रवाई की जाती है। 

(5) आतंकवाद का प्रसिद्ध उदाहरण-विमान अपहरण, भीड़ भरी जगहों यथा- रेलगाड़ी, होटल, बाजार आदि पर बम से हमला किया जाता है।

Q8. मानवाधिकारों का वर्गीकरण कीजिए । 

Ans. मानवाधिकारों का वर्गीकरण: मानवाधिकारों को तीन कोटियों में विभाजित किया गया है- 

(1) पहली कोटि-इसमें राजनैतिक अधिकार आते हैं। जैसे-अभिव्यक्ति का अधिकार और सभा करने की स्वतंत्रता ।

(2) दूसरी कोटि- यह कोटि आर्थिक और सामाजिक अधिकारों की है। जैसे जीविका कमाने का अधिकार, रोजगार पाने का अधिकार आदि । 

(3) तीसरी कोटि-इसके अन्तर्गत उपनिवेशीकृत जनता अथवा जातीय और मूलवासी अल्पसंख्यकों के अधिकार आते हैं।

Q.9. एच. आई. वी. एड्स के दुष्प्रभावों का वर्णन कीजिए । 

Ans. एच. आई. वी. एड्स का दुष्प्रभाव 

(1) एच. आई. वी. एड्स, बर्ड फ्लू और सार्स जैसी महामारिया अप्रवास, व्यवसाय, पर्यटन और विभिन्न देशों में फैली है। सैन्य अभियानों के द्वारा बड़ी तेजी से 

(2) इन बीमारियों के फैलाव को रोकने में किसी एक देश की सफलता अथवा असफलता का प्रभाव दूसरे देशों में होने वाले संक्रमण पर पड़ता है।

(3) एक अनुमान के अनुसार विश्व में 4 करोड़ लोग एच. आई. वी. एड्स से प्रभावित हो चुके थे। इसमें 2/3 आबादी अफ्रीका में रहती है जबकि शेष 50% दक्षिण एशिया में है। 

(4) उत्तरी अमरीका तथा अन्य औद्योगिक देशों में उपचार की नई विधियाँ खोजी गई हैं.

Q.10 सहयोग मूलक सुरक्षा के लिए किस प्रकार की रणनीति तैयार करनी चाहिए ?

Ans. सहयोग मूलक सहयोग की रणनीतियाँ 

(1) यदि अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग से रणनीतियाँ तैयार की जाए तो बेहतर होगा। 

(2) सहयोग द्विपक्षीय, क्षेत्रीय, महादेशीय अथवा वैश्विक स्तर का हो सकता है। वस्तुतः यह देशों की इच्छा और खतरे की प्रकृति पर निर्भर करता है।”

(3) सहयोगमूलक सहयोग में विभिन्न देशों के अलावा अन्तर्राष्ट्रीय-राष्ट्रीय स्तर की अन्य संस्थायें जैसे अन्तर्राष्ट्रीय संगठन (संयुक्त राष्ट्र संघ, विश्व स्वास्थ्य संगठन, विश्व बैंक, अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष आदि), स्वयं सेवी संगठन, व्यावसायिक संगठन, निगम तथा प्रसिद्ध हरितयाँ (यथा नेल्सन मंडेला, मदर टेरेसा) हो सकती हैं।

(4) सहयोग मूलक सहयोग में अंतिम उपाय बल-प्रयोग हो सकता है। अन्तर्राष्ट्रीय शक्तियाँ इसमें सहयोग दे सकती हैं। उन देशों के विरुद्ध सैन्य बल का प्रयोग किया जा सकता है। जो अपनी जनता को सता रहे हैं, महामारियों से सुरक्षा नहीं दे रहे हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न | Long Answer Type Questions

Class 12 Political Science Notes
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1. सुरक्षा के पारंपरिक तरीके कौन-कौन से हैं? उनमें से प्रत्येक की संक्षिप्त व्याख्या कीजिए । 

Ans. सुरक्षा के पारंपरिक तरीके (Traditional methods of Security ) – 

प्रस्तावना (Introduction) : सुरक्षा की परंपरागत धारणा में स्वीकार किया जाता है कि हिंसा का इस्तेमाल यथासंभव सीमित होना चाहिए। युद्ध के लक्ष्य और साधन दोनों से इसका संबंध है ‘न्याय-युद्ध ‘ की यूरोपीय परंपरा का ही यह परवर्ती विस्तार है कि आज लगभग पूरा विश्व मानता है कि किसी देश को युद्ध उचित कारणों यानी आत्मरक्षा अथवा दूसरों को जनसंहार से बचाने के लिए ही कारा चाहिए। इस दृष्टिकोण के अनुसार किसी युद्ध में युद्ध-सायनों का सीमित इस्तेमाल होना चाहिए। युद्धरत सेना को चाहिए कि वह संघर्षविमुख शत्रु, निहत्थे व्यक्ति अथवा आत्मसमर्पण करने वाले शत्रु को न मारे। 

तरीके या विधियाँ (Measures of Methods) : सुरक्षा की परंपरागत धारणा संभावना से इनकार नहीं करती कि देशों के बीच एक न एक रूप में सहयोग हो। इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण है-निरस्त्रीकरण, अस्त्र-नियंत्रण तथा विश्वास की बहाली । 

(i) निरस्त्रीकरण (Disomaments) : निरस्त्रीकरण की माँग होती है कि सभी राज्य उनका आकार, ताकत और प्रभाव कुछ भी हो, कुछ खास किस्म के हथियारों से बाज आये उदाहरण के लिए, 1972 की जैविक हथियार संधि; बॉयोलॉजिकल वीपन्स कर्वेशन (BWC) 1992 की रासायनिक हथियार संधि (केमिकल वीपन्स कंवेंशन – CWC) में ऐसे हथियारों बनाना और रखना प्रतिबंधित कर दिया गया है। 

(ii) अस्त्र नियंत्रण (Arms Control): अस्त्र नियंत्रण के अन्तर्गत हथियारों को विकसित करने अथवा उनको हासिल करने के संबंध में कुछ कायदे-कानूनों का पालन करना पड़ता है। स 1972 की एंटी बैलेस्टिक मिसाइल संधि (ABM) ने अमेरिका और सोवियत संघ को बैलेस्टिव मिसाइलों को रक्षा कवच के रूप में इस्तेमाल करने से रोका। ऐसे प्रक्षेपास्त्रों से हमले की शुरूआत क जा सकती थी। 

(iii) संधियाँ (Treaties): अमेरिका और सोवियत संघ ने अस्त्र-नियंत्रण की कई अन्य संधियों पर हस्ताक्षर किए जिसमें सामरिक अस्त्र परिसीमन संधि-2 (स्ट्रैटजिक आर्म्स लिमिटेशन ट्रीटी – SALT II) और सामरिक अस्त्र न्यूनीकरण संधि [(स्ट्रेटजिक आर्म्स रिडक्शन ट्रीटी (START) शामिल हैं। परमाणु अप्रसार संधि [न्यूक्लियर नॉन प्रोलिफेरेशन ट्रीटी-NPT (1968)] भी एक अर्थ में अस्त्र नियंत्रण संधि ही थी क्योंकि इसने परमाण्विक हथियारों के उपार्जन को कायदे-कानून के दायरे में ला खड़ा किया। 

(iv) विश्वास की बहाली (Restoring Confidence): सुरक्षा का पारंपरिक धारणा यह बात भी मानी गई है कि विश्वास बहाली के उपायों से देशों के बीच हिंसाचार कम किया ज सकता है। विश्वास बहाली की प्रक्रिया में सैन्य टकराव और प्रतिद्वन्द्विता वाले देश सूचनाओं तथा विचारों के नियमित आदान-प्रदान का फैसला करते हैं। दो देश एक-दूसरे को अपने फौजी मकसद तथा एक हद तक अपनी सैन्य योजनाओं के बारे में बताते हैं। 

निष्कर्ष (Conclusion) : कुल मिलाकर देखें तो सुरक्षा की परंपरागत धारणा मुख्य रूप से सैन्य बल के प्रयोग अथवा सैन्य बल के प्रयोग की आशंका से संबद्ध है। सुरक्षा की पारंपरिक धारणा में माना जाता है कि सैन्य बल से सुरक्षा को खतरा पहुँचता है और सैन्य बल से ही सुरक्षा को कायम रखा जा सकता है।

Q2. भारत की सुरक्षा की रणनीतियों की चर्चा करें ।

Ans. भारत की सुरक्षा की रणनीति (Strategies of Security in India) सभी देश अपनी आंतरिक और बाह्य सुरक्षा के लिए और सुरक्षा के नए खतरों को दूर करने के लिए, अपनी नीति बनाते हैं और उन उपायों का निश्चय करते हैं जिनके अनुसार सुरक्षा व्यवस्था की जाती है। इसे सुरक्षा की रणनीति कहा जाता है। भारत की सुरक्षा की रणनीति की निम्नलिखित हैं- प्रमुख विशेषताएँ

1. सुरक्षा सलाहकार (Security Advisor) भारत सरकार ने एक सुरक्षा सलाहकार की नियुक्ति की हुई है जो भारत की सुरक्षा संबंधी मामलों पर विचार करके समय-समय पर सुरक्षा को होने वाले खतरों तथा उनके समाधान के उपायों के बारे में सरकार को सलाह देता रहता है। किसी ऐसे व्यक्ति को इस पद पर नियुक्त किया जाता है जो सुरक्षा संबंधी मामलों का विशेष हो। 

2. सैन्य शक्ति तथा सैन्य क्षमता को मजबूत करना (Strengthening of Military Power and Military Capabilities)—भारत ने बाह्य आक्रमणों तथा युद्धों से बचाव के लिए अपनी सैन्य शक्ति और उसकी क्षमता को मजबूत बनाने की नीति आरंभ से ही अपनाई है। भारत को दो कारणों से यह नीति अपनानी पड़ी। प्रथम, जब भारत स्वतंत्र हुआ तो देश के उदापनी हालात अच्छे नहीं थे। हिन्दू-मुस्लिम उपद्रव जोरों पर थे। भारत और पाकिस्तान के बीच संख्या की अदला-बदली में रक्तपात हुआ था। 

Q3. विकासशील देशों की जनसंख् विस्फोट तथा गरीबी की समस्याओं क्षण करें।

Ans. विकासशील राष्ट्रों अथवा तीसरी दुनिया के देशों में जनसंख्या विस्फोट गरीबी की समस्याएँ (Problems of Population Explosion and Poverty in the Developing Nations or the Countries of the Third World) 20वीं शताब्दी के

प्रक्रिया आरंभ हुई और विशेष रूप से 1960 अफ्रीका तथा लैटिन अमेरिका के वे देश जो वर्षों से दासता के कारण शोषण का शिकार थे, स्वतंत्र हुए। 

स्वतंत्रता के साथ ही उनके सामने बहुत सी समस्याएँ आ खड़ी हुई, जैसे कि देश का सामाजिक विकास, स्वतंत्रता की सुरक्षा, राजनीतिक व्यवस्था का विकास आदि उपनिवेश काल में इनका आर्थिक शोषण हुआ था, यहाँ गरीबी, निरक्षरता, बेरोजगारी, कृषि व उद्योगों के पिछड़ेपन आदि का वातावरण था। इन देशों ने सम्पन्न राष्ट्रों तथा अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं से आर्थिक व सैनिक सहायता व ऋण लेकर अपने विकास कार्य आरंभ किए। बहुत से ऐसे देश विकास की सीढ़ियां चढ़ रहे हैं, परन्तु अपने विकास प्रयत्नों में उन्हें कई समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। 

इनमें से जनसंख्या की अधिकता तथा गरीबी उनकी प्रमुख समस्याएँ हैं और इसमें भी शक नहीं कि ये दोनों साथ-साथ चलती हैं। जहाँ अधिक जनसंख्या होगी वहाँ गरीबी भी अपने आप आ जाती है।

संसार की लगभग तीन-चौथाई जनसंख्या एशिया, अफ्रीका तथा लेटिन अमेरिका के विकासशील देशों (तीसरी दुनिया) में रहती हैं इन्हीं देशों में जनसंख्या की वृद्धि की दर भी विकसित देशों की जनसंख्या की दर से बहुत अधिक है। यह अनुमान लगाया गया है कि 20वीं शताब्दी के अंत तक तीसरी दुनिया की जनसंख्या विश्व की जनसंख्या का 90 प्रतिशत हो जाएगी। इस बात से अनुमान लगाया जा सकता है कि विकसित और विकासशील देशों में कितनी आर्थिक व सामाजिक असमानता विद्यमान है। 

संसार का लगभग 20 प्रतिशत भाग विश्व की आय के 80 प्रतिशत भाग का उपभोग करता है और शेष 80 प्रतिशत जनसंख्या एक रुपये में से में गुजारा करती है। कुल 20 पैसे अनुमान है कि भारत में ही लगभग 35 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं। अन्य विकासशील देशों में यह प्रतिशत और भी अधिक है। तीसरी दुनिया के अधिकांश लोगों को तो पीने का शुद्ध जल भी प्राप्त नहीं होता। अनुमान है कि 800 मिलियन लोग घोर निर्धनता तथा कुपोषण के शिकार हैं। गरीबी के कारण ही लोगों को चिकित्सा सुविधाएँ प्राप्त नहीं हो पातीं और लगभग 11 मिलियन बच्चे पैदा होने के एक वर्ष के अन्दर ही मृत्यु-लोक को चले जाते हैं।

800 मिलियन लोग पूर्णतः निरक्षर हैं जिनमें से तीसरी दुनिया के देशों के लगभग 48 प्रतिशत वयस्क निरक्षर हैं तथा निर्धन हैं तथा निर्धनतम देशों में लगभग 70 प्रतिशत लोग निरक्षर हैं। इन कुछ आँकड़ों से पता चल पाता है कि विकासशील देशों में जनसंख्या तथा गरीबी की समस्या बड़ है विकट है और इसे हल किए बिना इनका सामाजिक-आर्थिक विकास नहीं हो सकता। 

भूख, बीमारी अभाव, कुपोषण, गंदे निवास, टूटी-फूटी सड़कें, अपर्याप्त सुविधाएँ तीसरी दुनिया के देशों के हिस्से में ही आई हैं और विकसित देशों में जिनकी संख्या बहुत कम है, सम्पन्नता ही सम्पन्नता है। अपनी इन समस्याओं के समाधान के लिए विकासशील देशों को धन की आवश्यकता है और विकसित देश इन्हें जो भी सहायता देते हैं वह अपने राजनीतिक उद्देश्य को पूरा करने के लिए देते हैं, इनकी वास्तविक सहायता के लिए नहीं ।

Q.4. तीसरी दुनिया के देशों द्वारा समानता की माँग का विवेचन करें। 

Ans. असमानता और तीसरी दुनिया द्वारा समता की माँग (Inequality and Demand of Equality by Third World) — संसार में आर्थिक असमानता भी अपनी चरम सीमा पर है। अधिकतर विकासशील तथा अविकसित और पिछड़े हुए देश गरीबी और अभाव का जीवन जीते हैं जबकि कुछ विकसित देशों के पास धन का बाहुल्य है और इतने अधिक साधन हैं कि वे धन को खुद भी सकते हैं। संसार में आर्थिक संसाधनों का त्रुटिपूर्ण वितरण है। 

अमीर देशों में खाद्य वस्तुओं तथा अन्य सुविधाओं का प्रति व्यक्ति उपयोग गरीब देशों के मुकाबले में 20 गुना ध है। तीसरी दुनिया के लोग ऊर्जा का कुल 16 प्रतिशत भाग ही उपभोग कर पाते हैं जबकि उनकी जनसंख्या लगभग 70 प्रतिशत है। किसी भी आर्थिक पक्ष का विश्लेषण करने पर पता चल जाता अमीर देश गरीब देशों का आर्थिक शोषण भी करते हैं गरीब देशों में बीमारी, भुखमरी है कि सभी आर्थिक सुविधाएँ और सम्पन्नता संसार के कुल 20 प्रतिशत लोगों के भाग में है और करना आवश्यक है। 

Q5. विश्व में फैला सुरक्षा और निशस्त्रीकरण में क्या संबंध है ? निःशस्त्रीकरण के लिए भारत क्या भूमिका निभाई है ? 

Ans. निशस्त्रीकरण का अर्थ (Meaning of Disarmament):-  निःशस्त्रीकरण शाब्दिक अर्थ तो सभी प्रकार के शस्त्रों के उत्पादन की समाप्ति है, परन्तु इसका वास्तविक : व्यावहारिक अर्थ है विश्व शांति और सुरक्षा के लिए विशेष प्रकार के या सभी शस्त्रों के त उत्पादन समा में कमी या समाप्ति करना। अर्थात् दो या दो से अधिक राज्यों द्वारा आपसी समझीते या स्वेच्छ से अपने शस्त्रों में कमी करना, उन्हें सीमित मात्रा में रखना अथवा उनके उत्पादन को करने का कदम निःशस्त्रीकरण होता है।

निःशस्त्रीकरण और सुरक्षा में संबंध (Relation between Disarmament and Sel curity)—

सुरक्षा और निःशस्त्रीकरण में गहरा संबंध है। जब देशों में अधिक से अधिक हथियार रखने की होड़ लग जाती है तो यह प्रक्रिया बाहरी सुरक्षा के लिए बहुत बड़ा खतरा बन जाती है। विश्व के दो विरोधी गुटों में बँट जाने से अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थिति इतनी विस्फोटक हो गई कि तीसरा विश्वयुद्ध कभी भी छिड़ सकता था और यदि तीसरा युद्ध होता या हो जाए तो परमाणु युद्ध होगा और वह मानव जाति और मानव उपलब्धियों को पूर्णतः नष्ट कर देगा। संसार ने 1944 में हीरोशिमा और नागासाकी पर गिराए गए परमाणु बमों का विनाश देख लिया था और आज भी उनका प्रभाव वहाँ के लोगों पर है।

यह महसूस किया गया कि यदि निःशस्त्रीकरण को लागू नहीं किया गया तो हम प्रलय की ओर जाएँगे। यह भी महसूस किया गया कि परमाणु शस्त्रों से सैन्य उद्देश्यों की पूर्ति नहीं हो सकती और परमाणु शस्त्रों से युद्ध कदापि नहीं लड़े जा सकते। 

परमाणु शस्त्रों का होना भय आतंक, अविश्वास, अनिश्चय तथा खतरों में वृद्धि ही करता है। राज्यों में लगी शस्त्रों की हो विश्व-शांति और सुरक्षा को एक खतरा है आज प्रत्येक राज्य परमाणु शक्ति के आधार पर सैन्य शस्त्रों के निर्माण करने पर विचार करता है। शस्त्रीकरण का कार्य अधिकतर राज्यों द्वारा अपने आर्थिक व सामाजिक विकास की आवश्यकता को अनदेखा करके भी किया जाता है। बड़ी शक्तियों के अतिरिक्त कुछ अन्य देशों ने भी परमाणु बम बना लिया है। 

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FAQs

Q. 1. आंतरिक रूप से विस्थापित जन कौन लोग होते हैं ? 

Ans. (1) ये लोग ऐसे होते हैं जो अपना घर-बार छोड़ चुके हैं परन्तु राष्ट्रीय सीमा के भीतर ही हैं। ऐसे लोगों को ही ‘आंतरिक रूप से विस्थापित जन’ कहा जाता है। 
(2) उदाहरण-1990 के दशक के प्रारम्भिक वर्षों में हिंसा से बचने के लिए कश्मीर घाटी छोड़ने वाले कश्मीरी पंडित ‘आंतरिक रूप से विस्थापित जन’ के उदाहरण हैं।

Q.2 क्योटो प्रोटोकॉल क्या है ? 

Ans. (1) 1997 में क्योटो प्रोटोकॉल पर भारत सहित राष्ट्रों के हस्ताक्षर हुए। इसमें वैश्विक तापवृद्धि पर काबू रखने के लिए ग्रीनहाउस गैस के उत्सर्जन को कम करने के संबंध में दिशा-निर्देश बताए गए हैं। 
(2) सहयोगमूलक सुरक्षा की पहल करने के कदम के समर्थन में भारत ने अपनी सेना संयुक्त राष्ट्रसंघ के शांति बहाली के मिशनों में भेजी है।

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