Class 12th Geography Chapter 5 Notes In Hindi | प्राथमिक क्रियाएँ कक्षा 12 पाठ 5 के प्रश्न उत्तर

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मैं खुद 12वीं का टॉपर रहा हूं और मुझे पता है कि 12वीं की परीक्षा में किस तरह के प्रश्न पूछे जाते हैं। वर्तमान में, मैं एक शिक्षक की भूमिका भी निभा रहा हूँ, और अपने छात्रों को कक्षा 12वीं की महत्वपूर्ण जानकारी और विषयों का अभ्यास भी कराता हूँ। मैंने यह लेख 5 वर्षों से अधिक के अपने अनुभव के साथ लिखा है। इस पोस्ट की मदद से आप परीक्षा में इस अध्याय से भूगोल में बहुत अच्छे अंक प्राप्त कर सकेंगे।

Class 12th Geography Chapter 5 Notes In Hindi | प्राथमिक क्रियाएँ कक्षा 12 पाठ 5 के प्रश्न उत्तर

कक्षा | Class12th 
अध्याय | Chapter05
अध्याय का नाम | Chapter Nameप्राथमिक क्रियाएँ
बोर्ड | Boardसभी हिंदी बोर्ड
किताब | Book एनसीईआरटी | NCERT
विषय | Subjectभूगोल | Geography
मध्यम | Medium हिंदी | HINDI
अध्ययन सामग्री | Study Materialsप्रश्न उत्तर | Question answer

पाठ के मुख्य बिंदु | Main Point of This chapter

★ व्यापारिक मत्स्यन—ये क्षेत्र शीतोष्ण कटिबन्ध में पाये जाते हैं। 

★ पशुपालन- व्यापारिक पशुपालन, शीतोष्ण कटिबन्धीय घास के मैदान स्टेपी, प्रेयरीज, डाऊन आदि में प्रचलित है।. 

★ लकड़ी काटना —यह क्रिया शीतोष्ण वन क्षेत्रों में होती है। 

★ चलवासी पशुचारण – यह पशुओं पर आधारित जीवन निर्वाह करने की प्रक्रिया है। ये स्थायी जीवन व्यतीत नहीं करते इसलिए ये चलवासी कहे जाते हैं। 

★ संग्रहण- आदिकालीन मानव द्वारा अपने भोजन के लिए पौधों से फल, जड़ें और पत्तियाँ इकट्ठी करना संग्रहण कहलाता है। 

★ आखेट -आदिमानव द्वारा संग्रहण से भोजन आपूर्ति न होने पर शिकार करना आखेट कहलाता है। मत्स्य ग्रहण- मत्स्य ग्रहण से तात्पर्य मछली पकड़ना है। आज यह एक उद्योग के रूप में विकसित है। 

★ प्राथमिक व्यवसाय- – कृषि, पशुचारण, लकड़ी काटना, मछली पकड़ना आदि क्रिया-कलापों द्वारा प्राकृतिक साधनों से खाद्य-पदार्थों, रेशों, इमारती लकड़ी, ईंधन और खनिजों का उत्पादन करना। द्वितीयक व्यवसाय — वे व्यवसाय जिनमें प्राथमिक व्यवसायों से प्राप्त उत्पादों को संशोधित किया जाता है। ★ तृतीयक व्यवसाय — इसमें लोगों को दी जाने वाली सेवाएँ सम्मिलित हैं ।

चतुर्थक व्यवसाय — इसमें अधिक बौद्धिक क्षमता वाली विशेष सेवाएँ सम्मिलित हैं। 

चलवासी – जो लोग पशु पालते हैं, वे अपने पशुओं के साथ इधर-उधर घूमते रहते हैं। ऐसे लोग चलवासी कहलाते हैं। ऋतु प्रवास अपने पशुओं के साथ लोगों के ऋतुओं के अनुसार प्रवास को ऋतु प्रवास कहते हैं। 

★ व्यापारिक पशुपालन- पशुओं का बड़े-बड़े फार्मों पर वैज्ञानिक ढंग से पालन-पोषण करना। मसाई—पूर्वी अफ्रीका (कीनिया, तंजानिया) के चलवासी पशुचारक। ★ खनन —वह आर्थिक क्रिया जो भूगर्भ से व्यावसायिक स्तर पर लाभदायक खनिज- पदार्थों की खुदाई या निष्कर्षण से संबंधित होती है। 

★ खनिज-खनिज एक या एक से अधिक तत्वों से मिलकर बना रासायनिक संयोजन होता है। 

★ धात्विक खनिज वे खनिज जिनसे हमें धातुओं की प्राप्ति होती है जैसे— लोहा, ताँबा, सोना आदि। * अधात्विक खनिज – वे खनिज जिनसे धातुओं की प्राप्ति नहीं होती, जैसे सल्फर, पोटाश । * खनिज ईंधन — कोयला तथा पेट्रोलियम जैसे खनिजों की संरचना में कार्बनिक तत्वों का योगदान होता है। इनका उपयोग ईंधन के रूप में होता है, इन्हें खनिज ईंधन कहते हैं। 

★ अयस्क – शैल जिनमें कोई धात्विक खनिज संकेन्द्रित रूप में मिलता है। 

★ संपूर्ति साधन-वे साधन जो एक बार या बार-बार प्रयोग करने के बाद भी समाप्त नहीं होते, जैसे जल, वायु, सौर ऊर्जा इत्यादि । 

* अनापूर्ति साधन- वे साधन जो एक बार या बार-बार उपयोग किए जाने के पश्चात् समाप्त हो सकते हैं जैसे कोयला, पेट्रोलियम आदि। 

* प्रगलन—वह प्रक्रिया जिसके द्वारा धातुओं को उनके अयस्कों से अलग किया जाता है। 

* खुली खान- गहरे खनिज निक्षेपों तक पहुँचने के लिए भूपर्पटी में किया गया बड़ा और गहरा छिद्र ।

महत्वपूर्ण प्रश्न | important question

Q.1. चलवासी पशुचारण और वाणिज्य पशुधन पालन में अन्तर कीजिए। 

Ans. चलवासी पशुचारण एक प्राचीन जीवन निर्वाह व्यवसाय रहा है। जिसमें अपने भोजन, वस्त्र, शरण, औजार एवं यातायात के लिए पशुओं पर ही निर्भर रहता था। अपने पालतू पशुओं के साथ पानी एवं चारागाह की उपलब्धता एवं गुणवत्ता के अनुसार एक ही स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित होते रहते थे। चलवासी पशुचारण क्षेत्रों में कई प्रकार के पशु पाले जाते हैं।

उष्णकटिबंधीय अफ्रीका में गाय-बल प्रमुख पशु है, जबकि सहारा ए एशिया के मरुस्थलों में भेड़, बकरी एवं ऊंट पाला जाता है तिब्बत एवं एंडीज के पर्वतीय में चॉक व लाभा एवं आर्कटिक और उप उत्तरी ध्रुवीय क्षेत्रों में रेडियर पाला जाता है। चलवासी पशुचारण की अपेक्षाकृत वाणिज्य पशुधन पालन अधिक व्यवस्थित एवं पूजा 1 है वाणिज्य पशुधन पालन पश्चिम से प्रभावित है एवं फार्म भी स्थायी होते हैं। 

यह फार्मास क्षेत्र पर फैले होते हैं एवं संपूर्ण क्षेत्र को छोटी-छोटी इकाइयों में विभाजित कर दिया जाता है। चराई को नियंत्रित करने के लिए इन्हें बाड़ लगाकर एक दूसरे से अलग कर दिया जाता है जब चराई के कारण एक छोटे क्षेत्र की घास समाप्त हो जाती है तब पशुओं को दूसरे छोटे में ले जाया जाता है। वाणिज्य पशुधन पालन में पशुओं की संख्या भी चारागाह की वहन क्षमत के अनुसार रखी जाती है।

यह एक विशिष्ट गतिविधि है, जिसमें केवल एक ही प्रकार के पशु पाले जाते हैं। प्रमुख पशुओं में भेड़, बकरी, गाय-बैल एवं घोड़े हैं। इनसे मांस, खालें तथा ऊन वैज्ञानिक ढंग से प्राप्त कर विश्व के बाजारों में निर्यात किया जाता है। 

Q. 2. रोपण कृषि की मुख्य विशेषताएं बतलाइए एवं भिन्न-भिन्न देशों में उगाई जाने वाली कुछ प्रमुख रोपण फसलों के नाम बतलाइए ।

Ans. इस कृषि की प्रमुख विशेषता यह है कि इसमें कृषि क्षेत्र का आकार बहुत विस्तृत होता है। इसमें अधिक पूँजी निवेश, उच्च प्रबंध एवं तकनीकी आधार एवं वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग किया जाता है। यह एक फसली कृषि है जिसमें किसी एक फसल के उत्पादन पर ही संकेंद्रण किया जाता है। श्रमिक सस्ते मिल जाते हैं एवं यातायात विकसित होता है जिसके द्वारा बागान एवं बाजार सुचारू रूप से जुड़े रहते हैं।

पश्चिमी अफ्रीका में कॉफी एवं कोकोआ, भारत एवं श्रीलंका में चाय, मलेशिया में रबड़ एवं पश्चिमी द्वीप समूह में गन्ना और केले की रोपण फसल उगाई जाती है। फिलीपाइंस में नारियल व गन्ने, इंडोनेशिया में गन्ना तथा ब्राजील में कॉफी आदि के रोपण फसल उगाई जाती है ।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न | VERY SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS

Class 12th geography
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Q.1. किग्रा. चावल उत्पन्न करने के लिए कितनी मात्रा में जल की आवश्यकता होती है ?

Ans. 10,000 किग्रा. पानी आवश्यक होता है। 

Q.2. संसार की खाद्य आपूर्ति में कौन-कौन-सी फसलों का प्रभुत्व है ?

Ans. गेहूँ, चावल, मक्का, आलू तथा कसावा हैं।

Q. 3. भोजन संग्रह विश्व के किन भागों में किया जाता है ?

Ans. (i) उच्च अक्षांश के क्षेत्र जिसमें उत्तरी कनाडा, उत्तरी यूरेशिया एवं दक्षिणी चिली आते हैं। (ii) निम्न अक्षांश के क्षेत्र जिसमें अमेजन बेसिन, उष्ण कटिबंधीय अफ्रीका, आस्ट्रेलिया एवं दक्षिणी पूर्वी एशिया का आंतरिक प्रदेश आता है। 

Q. 4. निर्वाह कृषि क्या है ?

Ans. इस प्रकार की कृषि में कृषि क्षेत्र में रहने वाले स्थानीय उत्पादों का संपूर्ण अथवा लगभग का उपयोग करते हैं।

0.5. रोपण कृषि में बोई जाने वाली फसलें कौन-कौन-सी हैं ?

Ans. चाय, कॉफी, कोको, रबड़, कपास, गन्ना, केले एवं अनानास आदि ।

Q.6. मिश्रित कृषि क्या है ?.

Ans. इस प्रकार की कृषि में खेतों का आकार मध्यम होता है। इसमें बोई जाने वाली फसलें गेहूँ, जी, राई, जई, मक्का, चारे की फसल एवं कंद-मूल प्रमुख हैं। 

Q.7. डेरी कृषि का कार्य नगरीय एवं औद्योगिक केन्द्रों के पास क्यों किया जाता है ? 

Ans. क्योंकि ये क्षेत्र ताजा दूध एवं अन्य डेरी उत्पाद के अच्छे बाजार होते हैं । वर्तमान समय में विकसित यातायात के साधन, प्रशीतकों का उपयोग, पास्तेरीकरण की सुविधा के कारण विभिन्न डेरी उत्पादों को अधिक समय तक रखा जा सकता है।

Q.8. वाणिज्य डेरी कृषि के तीन प्रमुख क्षेत्र कौन-कौन से हैं? 

Ans. (i) उत्तरी पश्चिमी यूरोप, (ii) कनाडा एवं (iii) न्यूजीलैंड, दक्षिणी पूर्वी आस्ट्रेलिया एवं तस्मानिया ।

Q.9. विकासशील देशों में कितने प्रतिशत लोगों का व्यवसाय कृषि है ?

Ans. लगभग 65 प्रतिशत से अधिक लोगों का व्यवसाय कृषि है। 

Q. 10. सर्वप्रथम मनुष्य ने कब खेती करना प्रारंभ किया था ?

Ans. लगभग 12 हजार वर्ष पहले।

लघु उत्तरीय प्रश्न | SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS

Class 12th geography
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Q. 1. वर्षा फसलों की वृद्धि को किस प्रकार प्रभावित करती है ? 

Ans. वर्षा से मिट्टी को नमी प्राप्त होती है जो फसलों की वृद्धि के लिए आवश्यक होती है। प्रत्येक पौधे की एक जड़ प्रणाली होती है जो एक बड़े सतह क्षेत्र पर फैलती है तथा नीचे की मिट्टी के जल सोखती रहती है। फसलों के लिए जल की आवश्यकता में अंतर पाया जाता है। 

एक किलो गेहूँ को उत्पन्न करने के लिए लगभग 1500 किग्रा. जल की आवश्यकता होती है जबकि इतनी ही मात्रा में चावल के उत्पादन में 10,000 किग्रा. पानी की आवश्यकता होती है। समुचित जल की मात्रा के अभाव में पौधों को पैदा नहीं किया जा सकता है। 

जल आपूर्ति की मात्रा में वृद्धि के अनुपात में फसलों के उत्पादन में भी वृद्धि होगी। इसके विपरीत, यदि पौर्थो को आवश्यकता से अधिक जल की आपूर्ति होती है, तो फसल के उत्पादन में कमी होगी। प्रत्येक फसल के लिए जल की एक निश्चित मात्रा की आवश्यकता होती है। उदाहरण के लिए खर तथा चाय हेतु 150 सेमी. वार्षिक वर्षा चाहिए। 

दूसरी ओर 25 से 100 सेमी. वार्षिक वर्षा वाले प्रदेशों में गेहूँ उत्पन्न किया जा सकता है। पृथ्वी तल सतह का 50 प्रतिशत से अधिक भू-भाग 25 से 100 सेमी. वार्षिक वर्षा प्राप्त करते हैं। इसलिए गेहूँ सबसे अधिक क्षेत्र पर पैदा की जाने ‘वाली फसल है।

Q. 2. पोषक तत्त्व कितने प्रकार के हैं ? पोषक तत्त्वों का तीव्र पुनर्स्थापन किस प्रकार किया जाता है ?

Ans. प्रमुख पोषक तत्त्व छः प्रकार के हैं। नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटाशियम, कैल्सियम, मैग्नीशियम तथा सल्फर इसके अतिरिक्त लोहा तथा अल्पमात्रा में बोरोन व आयोडीन जैसे तत्त्वों की भी पीयों में अल्पमात्रा में आवश्यकता पड़ती है। विभिन्न प्रकार की मिट्टी में पोषण-क्षमता अत्यधिक भिन्न होती है।

उष्ण कटिबंधीय प्रदेशों में उच्च वर्षा के कारण पोषक तत्त्व सरलतापूर्वक घुलकर बह जाते हैं। शीतोष्ण प्रदेशों में मिट्टी में पोषक तत्त्वों की मात्रा अधिक होती है। पौधों तथा पशु जैविकों के विघटन से मिट्टी में पोषक तत्त्वों का प्राकृतिक पुनर्स्थापन होता रहता है। लेकिन यह धीमी प्रक्रिया है। पोषक तत्त्वों की तीव्र पुनर्स्थापना के लिए मिट्टी में रासायनिक उर्वरकों मुख्यतः नाइट्रोजन, फास्फोरस तथा पोटाशियम को मिलाया जाता है। 

class 12th NotesMCQ
HistoryPolitical Science
EnglishHindi

Q. 4.  ‘उत्पादन दक्षता’ किस प्रकार प्राप्त की जा सकती है ?

Ans. ‘उत्पादन दक्षता’ दो प्रकार से प्राप्त की जाती है-

  • (i) उन्नत निवेश जैसे बीज उर्वरक तथा फफूंदीनाशी का प्रयोग जिससे अधिक उपज प्रोत्साहित हो एवं
  • (ii) विशिष्टीकृत मशीनरी ( के प्रयोग से) उत्पादन में तीव्रता आती है तथा फसल बोने, सिंचाई करने तथा तैयार फसल कटाई एवं उसके पश्चात् के कृषि कार्यों में लगने वाले श्रमिकों की संख्या में कमी होती है। संयुक्त राज्य में कृषि का उत्पादन दो गुणा हो गया है, जबकि यहाँ कृषि कार्य करने वालों की संख्या में तीन गुना से अधिक की कमी हुई है। श्रमिकों की संख्या में कमी यह दर्शाती है कि फार्म, खेत तथा पशु समूह बड़े होते चले जा रहे हैं। इससे, इस प्रकार श्रमिक तथा उत्पादन लागत में अधिक बचत होती है।

Q. 5. खनन कार्य को प्रभावित करने वाले कारक कौन-कौन से हैं ?

Ans. (i) भौतिक कारक- खनिज निक्षेपों के आकार, श्रेणी एवं उपस्थिति की अवस्था को सम्मिलित करते हैं।

(ii) आर्थिक कारक – जिसमें खनिज की माँग, विद्यमान तकनीकी ज्ञान एवं उसका उपयोग, अवसंरचना के विकास के लिए उपलब्ध पूँजी एवं यातायात व श्रम पर होने वाला व्यय आता है। 

Q.6. सामूहिक कृषि पर टिप्पणी लिखिए।

Ans. सभी कृषक अपने संसाधन जैसे भूमि, पशुधन एवं श्रम को मिलाकर कृषि कार्य करते हैं। ये अपनी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भूमि का छोटा-सा भाग अपने अधिकार में भी रखते हैं। सरकार उत्पादन का वार्षिक लक्ष्य निर्धारित करती है एवं उत्पादन को सरकार ही निर्धारित मूल्य पर खरीदती है। लक्ष्य से अधिक उत्पन्न होने वाला भाग सभी सदस्यों को वितरित कर दिया जाता है या बाजार में बेच दिया जाता है। उत्पादन एवं भाड़े पर ली गई मशीनों पर कृषकों को कर चुकाना पड़ता है। सभी सदस्यों को उनके द्वारा किए गए कार्य की प्रकृति के आधार पर भुगतान किया जाता है। असाधारण कार्य करने वाले सदस्य को नकद या के रूप में पुरस्कृत किया जाता है।

Q.7. स्थानान्तरी कृषि किसे कहते हैं ? यह किस भाग में पाई जाती है ? 

Ans. कृषि के प्रारंभ चलवासी पशुचारण के स्थान पर से अपेक्षाकृत स्थायी जीवन की शुरुआत हुई । कृषि के सबसे आदिम स्वरूप को स्थानान्तरी कृषि कहते हैं।

इस प्रकार की कृषि अभी संसार के कुछ भागों में प्रचलित है। यह मुख्यतः ‘उष्ण कटिबंधीय वनों में अपनाई जाती है। इस प्रकार की कृषि में वनों को साफ करने के लिए वृक्षों को काटकर उन्हें जला दिया जाता है। इन खेतों में पहले से तैयार की गई फसलों को रोपते हैं। कुछ वर्षों तक फसलों का उत्पादन करने के पश्चात् इनकी मिट्टी अनुपजाऊ हो जाती है। 

तब इन खेतों को परती छोड़ दिया जाता है तथा नये स्थानों की सफाई की जाती है। स्थानान्तरी कृषि की ‘प्रकृति प्रवासी होती है। इसने लोगों को एक स्थान पर अधिक समय तक स्थायी रूप से रहने के लिए प्रेरित किया।

Q. 8. स्थायी कृषि प्रणाली का संसार में कैसे विस्तार हुआ ?

Ans. धीरे-धीरे अनुकूल जलवायु एवं उपजाऊ मिट्टी वाले क्षेत्रों में धीरे-धीरे स्थायी खेतों तथा गाँवों में स्थायी कृषि प्रणाली का उदय हुआ। उपजाऊ नदी घाटियों जैसे दजला-फरात, नील, सिंधु, हांगहो तथा चेंग जिआंग में लगभग 6 हजार वर्ष पूर्व स्थायी कृषि के आधार पर महान सभ्यताओं का निर्माण हुआ। धीरे-धीरे इस स्थायी कृषि प्रणाली का संसार के अधिकांश भागों में विस्तार हुआ।

Q.9. पौधों के विसरण तथा कृषि के औद्योगीकरण का कृषि पर क्या प्रभाव पड़ा ? 

Ans. पौधों के विसरण तथा कृषि के औद्योगीकरण से कृषि उत्पादन अत्यधिक बढ़ा। इसके फलस्वरूप कृषि में श्रमिकों की माँग कम होने से बड़ी संख्या में श्रमिकों ने दूसरी आर्थिक क्रियाओं को अपनाया, क्योंकि कम लोगों के साथ मशीनों द्वारा अधिक उत्पादन किया जाना संभव हुआ। इस प्रकार संसार के औद्योगिक देशों द्वारा आर्थिक विकास के संकेत के रूप में जनसंख्या के क्रम से प्राथमिक कार्यों से द्वितीयक तथा तृतीयक कार्यों की ओर स्पष्ट स्थानांतरण देखा गया। यद्यपि विकासशील देशों में जन रोजगार संरचना में प्राथमिक से सीधे तृतीयक क्षेत्र में बदला।

Q. 10 फसल के उत्पादन पर तापमान का क्या प्रभाव पड़ता है ? 

Ans. तापमान फसलों के वितरण को प्रभावित करने वाला एक महत्त्वपूर्ण नियंत्रक है, क्योंकि उपयुक्त तापमान की दशायें बीज के अंकुरण तथा पौधों की सफलतापूर्वक वृद्धि हेतु आवश्यक होता है। तापमान की आवश्यकता के आधार पर फसलों को दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है-

  • (i) उष्ण कटिबंध के उच्च तापमान वाली फसलें। 
  • (ii) उप ऊष्ण एवं शीतोष्ण क्षेत्रों के निम्न तापमान वाली फसलें । ऊष्ण कटिबंधीय फसलें जो उच्च तापमान की दशाओं में विसारित होने वाली फसले (31°C से 37°C तक)। ये फसलें, शून्य तापमान से नीचे तथा पाला पड़ने पर नष्ट हो सकती हैं। उनमें से कुछ शीत से इतनी अधिक प्रभावित होती हैं, कि वे 10°C से कम तापमान पर ही नष्ट हो जायेगी।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न | Long Answer Type Questions

Class 12th geography
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Q.1. विश्व में गेहूँ तथा चावल की खेती तथा उनके वितरण प्रतिरूप के लिए आवश्यक भौगोलिक दशाओं का वर्णन कीजिए ।

Ans. (1) चावल-अनेक मूल प्रजातियों के वृहत् संकेन्द्रण के आधार पर यह समझा जाता है कि भव पूर्वोत्तर भारत के पूर्वी हिमालय पर्वतीय भागों हिंद-चीन तथा दक्षिण-पश्चिमी चीन से हुआ है। पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर, चांग-जियांग डेल्टा में, चावल की कृषि का सबसे पहले प्रारंभ 7000 वर्ष पूर्व हुआ था। अगले 6000 वर्षों में इसकी खेती का विस्तार शेष दक्षिणी और पूर्वी एशियाई भागों में हुआ। आज विश्व में लगभग 65 हजार से अधिक स्थानीय किस्मों के चावल की खेती होती है। चावल मुख्य रूप से ऊष्ण आर्द्र जलवायु वाले मानसूनी एशिया की फसल है। 

परम्परागत रूप से सुप्रवाहित नदी घाटियों एवं डेल्टा क्षेत्रों में ही चावल पैदा किया जाता था। तथापि, सिंचाई की सहायता से अब चावल की खेती उच्च भूमियों तथा शुष्क क्षेत्रों में भी की जा रही है। चावल का पौधा अर्थात् धान के वर्धन काल में उच्च तापक्रम (27°C से 30° सेल्सियस) तथा वर्षा की अधिक मात्रा (लगभग 100 सेंटीमीटर) होनी चाहिए वस्तुतः इसके पौधों की प्रारंभिक अवस्था में खेतों में पानी भरा होना चाहिए। इसलिए ढाल के खेतों में 10 से 25 सेंटीमीटर पानी खड़ा रहता है। पर्वतीय क्षेत्रों में सीढ़ीनुमा खेतों में चावल उगाया जाता है। चीकायुक्त दोमट मिट्टी जिसमें पानी भरा रह सके, इस फसल के लिए सर्वोत्तम मिट्टी है।

बावल की खेती के लिए अधिक संख्या में सस्ते श्रम की आवश्यकता होती है, क्योंकि इसमें अधिकांश कार्य हाथ से करना पड़ता है-जैसे पौधशाला से पौध को निकालना, पानी भरे हुए खेतों में उन्हें रोपना, खेतों से समय-समय पर खर-पतवार निकालना तथा फसल की कटाई आदि । चावल का पोषक मूल्य अधिक होता है। विशेषतः उस समय जब चावल की बाहरी पस्त पर पाये जाने वाले महत्त्वपूर्ण विटामिन तत्त्व को धान की कुटाई के समय हटा नहीं दिया जाता। संसार की लगभग आधी जनसंख्या का मुख्य भोजन चावल है।

(2) गेहूँ-गेहूँ मुख्यतः शीतोष्ण कटिबंधीय प्रदेश में बोई जाने वाली फसल है। लेकिन अपनी अनुकूलनशीलता के कारण आज गेहूँ का उत्पादन सभी खाद्यान्न फसलों के क्षेत्र से अधिक विस्तृत क्षेत्र पर किया जाने लगा है। आज संसार का कोई विरला ही देश होगा जहाँ यह फसल कुछ न कुछ मात्रा में पैदा न की जाती हो। प्रोटीन तथा कार्बोहाइड्रेट की समुचित मात्रायुक्त गेहूँ एक सर्वाधिक पौष्टिक अन्नों में से एक है। विश्व के अधिकांश भागों के लोगों के भोजन का यह एक खाद्यान्न है।

यद्यपि गेहूँ एक कठोर फसल है लेकिन अधिक गर्मी तथा आर्द्रता वाली जलवायु दशाओं में इसका सफलतापूर्वक उत्पादन नहीं होता है। इसके बीज उगने के समय मौसम ठंडा तथा मिट्टी में आईता की उपयुक्त मात्रा आवश्यक है औसत वार्षिक वर्षा 40 से 75 सेंटीमीटर के बीच होना चाहिए। फसल पकने के समय तापक्रम लगभग 16° सेल्सियस तथा आकाश साफ होना चाहिए। गेहूँ के लिए दोमंद तथा शनजम मिट्टी अधिक उपयुक्त होती है।

Q. 2. चाय तथा कहवा की खेती तथा उनके वितरण प्रतिरूप को प्रभावित करने वाली भौगोलिक दशाओं का विश्लेषण कीजिए ।

Ans. 1. चाय-चाय एक अत्यधिक प्रचलित पेय है जो एक सदाबहार झाड़ी की कीमत पत्तियों से तैयार की जाती है। इसके लिए गर्म तथा आर्द्र जलवायु की आवश्यकता पड़ती है लेकिन इसकी जड़ों में वर्षा का पानी एकत्रित नहीं होना चाहिए। इस प्रकार, यह 27° दक्षिणी अक्षांश से 43° उत्तरी अक्षांशों के मध्य पहाड़ी ढलानों पर ही 125 सेमी. से 750 सेमी. वर्षा पाने वाले क्षेत्रों में उगायी जाती है। चाय के पौधों के लिए उपजाऊ मिट्टी जिसमें ह्यूमस की मात्रा अधिक हो, आवश्यक है।

चाय एक बागानी फसल है। जिसे बड़े चाय बागानों में उगाया जाता है। चाय की झाड़ी को 40 से 50 सेमी. से अधिक नहीं बढ़ने दिया जाता है। चाय की झाड़ी की आयु 40 से 50 वर्ष है। मृदा की उर्वरता बनाये रखने के लिए नाइट्रोजन युक्त उर्वरक डालने की उपलब्धता एक आवश्यक कारक होता है।

विश्व में चाय के मुख्य उत्पादक देश-भारत, चीन, श्रीलंका, बांग्लादेश, जापान, इंडानेशिया, अर्जेण्टाइना और कीनिया हैं।

2. कहवा – कहवा भी एक रोपण फसल है जो उष्णकटिबंध के उच्च भागों में समुद्र 500 से 1500 मीटर की ऊँचाई तक पैदा होता है। कहवा की झाड़ी को पाला बहुत हानि पहुँचाता है। इसीलिए इसे छायादार पेड़ों के नीचे उगाया जाता है। इसके पौधे के लिए उच्च आर्द्रता की आवश्यकता होती है। लगभग 160 सेमी. से 250 सेमी. वर्ग वाले क्षेत्रों में गहरी, संरघ्र तथा ह्यूमस मुक्त आर्द्रता धारण करने की क्षमता वाली मिट्टी में कहवा को भली-भाँति उगाया जाता है।

Q.3. संसार के प्रमुख कृषि प्रदेशों का वर्णन कीजिए । 

Ans. कृषि प्रदेशों का सबसे प्राचीन लेकिन सबसे संतोषजनक विभाजन 1936 में डी. डिवटेलसी द्वारा प्रस्तुत किया गया था। उन्होंने संसार के कृषि प्रदेशों के विभाजन में 5 आधारों को अपनाया था—(i) फसल तथा पशु सहचर्य, (ii) भू-उपयोग की गहनता, (iii) कृषि उत्पाद का संसाधन तथा विपणन, (iv) मशीनीकरण / यंत्रीकरण का अंश और (v) कृषि समृद्ध गृहों तथा अन्य संरचनाओं के प्रकार एवं संयोजन। इस योजना में 13 मुख्य प्रकार के कृषि प्रदेश पहचाने गये थे, जो निम्न हैं-

(i) चलवासी, (ii) पशुपालन – फार्म, (iii) स्थानान्तरी कृषि, (iv) प्रारम्भिक स्थानबद्ध कृषि, (v) गहन जीविकोपार्जी या जीविका कृषि चावल प्रधान, (vi) गहन जीविकोपार्जी या जीविका कृषि चावल विहीन, (vii) वाणिज्यिक रोपण कृषि, (viii) भूमध्य सागरीय कृषि, (ix) वाणिज्यिक (अन्नोत्पादन ) अन्नकृषि, (x) व्यापारिक पशु एवं फसल कृषि, (xi) जीविकोपार्जी फसल एवं पशु कृषि, (xii) वाणिज्यिक डेयरी कृषि और (xiii) विशिष्ट उद्यान कृषि ।

चित्र में विश्व के प्रमुख कृषि प्रदेशों को सरल रूप में प्रस्तुत करने के उद्देश्य से कुछ कम महत्त्व के प्रदेशों को मिला दिया गया है।

उपरोक्त वर्गीकरण के मूल्याँकन के लिए चयन किए गये कारक मात्रात्मक के स्थान पर निष्ठ प्रतीत होते हैं। इसके होते हुए भी हिवटेलसी का यह वर्गीकरण बाद में किए गये प्रयासों के लिए आधार प्रस्तुत करता है।

कृषि पद्धतियाँ एवं उत्पादन विशेषताओं की मुख्य विशेषताओं के आधार पर संसार की कृषि पद्धतियों को प्रमुखतः दो वर्गों में जीविका कृषि, कृषि एवं वाणिज्यिक में विभक्त किया जा सकता है, यद्यपि किसी समय विशेष पर इन दोनों के बीच अंतर काफी धूमिल ही होता है। 

Q.4. जीविकोपार्जी अथवा जीविका कृषि का संक्षेप में वर्णन करें ।

Ans. इस कृषि में कृषक अपनी तथा अपने परिवार के सदस्यों की उदरपूर्ति के लिए फसलें उगाता है। कृषक अपने उपयोग के लिए वे सभी फसलें पैदा करता है जिनकी उसे आवश्यकता होती है। अतः इस कृषि में फसलों का विशिष्टीकरण नहीं होता। इनमें धान्य, दलहन, तिलहन

तथा सन सभी का समावेश होता है। विश्व में जीविकोपार्जी कृषि के दो रूप पाए जाते हैं- (क) आदिम जीविकोपार्जी कृषि जो स्थानान्तरी कृषि के समरूप हैं। (ख) गहन जीविकोपार्जी कृषि जो पूर्वी तथा मानसून एशिया में प्रचलित है। चावल सबसे सोयाबीन, वालें तथा

महत्त्वपूर्ण फसल है। कम वर्षा वाले क्षेत्रों में गेहूँ, जौं, मक्का, ज्वार, बाजरा, तिलहन बोये जाते हैं। यह कृषि भारत, चीन, उत्तरी कोरिया तथा म्यानमार में की जाती है। इस कृषि के महत्त्वपूर्ण लक्षण निम्नलिखित हैं-

  • 1. जोत बहुत छोटे आकार की होती है।
  • 2. कृषि भूमि पर जनसंख्या के अधिक दाव के कारण भूमि का गहनतम उपयोग होता है। 3. कृषि की गहनता इतनी अधिक है कि वर्ष में दो, तीन तथा कहीं-कहीं चार फसलें भी ली जाती हैं।.
  • 4. मशीनीकरण के अभाव तथा जनसंख्या के कारण मानवीय श्रम का बड़े पैमाने पर उपयोग
  • होता है।
  • 5. कृषि के उपकरण बड़े साधारण तथा परम्परागत होते हैं परंतु पिछले कुछ वर्षों से जापान, चीन तथा उत्तरी कोरिया में मशीनों का प्रयोग भी होने लगा है। 
  • 6. अधिक जनसंख्या के कारण मुख्यतः खाद्य फसलें ही उगाई जाती हैं और चारे की फसलों तथा पशुओं को विशेष स्थान नहीं मिलता।
  • 7. गहन कृषि के कारण मिट्टी की उर्वरता समाप्त हो जाती है। मिट्टी की उपजाऊ शक्ति बनाए रखने के लिए हरी खाद, गोवर, कम्पोस्ट तथा रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग किया जाता है। जापान में प्रति हेक्टेयर रा यनिक उर्वरक सबसे अधिक डाले जाते हैं।

Q.5. विस्तृत कृषि किसे कहते हैं ? विस्तार से बताएँ । 

Ans. विस्तृत कृषि एक मशीनीकृत कृषि है जिसमें खेतों का आकार बड़ा, मानवीय श्रम कम, प्रति हेक्टेयर उपज कम और प्रति व्यक्ति तथा कुल उपज अधिक होती है। यह कृषि मुख्यतः शीतोष्ण कटिबंधीय कम जनसंख्या वाले प्रदेशों में की जाती है। इन प्रदेशों में पहले चलवासी चरवाहे पशुचारण का कार्य करते थे और बाद में यहाँ स्थायी कृषि होने लगी। इन प्रदेशों में वार्षिक वर्षा 30 से 60 सेमी. होती है। जिस वर्ष वर्षा कम होती है उस वर्ष फसल को हानि पहुँचती है।

यह कृषि उन्नीसवी शताब्दी के आरंभ में शुरू हुई। इस कृषि विकास कृषि यंत्रों तथा महाद्वीपीय रेलमार्गों के विकसित हो जाने से हुआ है। विस्तृत कृषि मुख्यतः रूस तथा यूक्रेन के स्टेपीज (Steppes), कनाडा तथा संयुक्त राज्य अमेरिका के प्रेयरीज (Prairies), अर्जेण्टीना के पम्पास (Pampas of Argentina) तथा आस्ट्रेलिया के डाउन्स (Downs of Australia) में की जाती है।

• विस्तृत कृषि के मुख्य लक्षण निम्नलिखित हैं- 

  • 1. खेत बहुत ही बड़े आकार के होते हैं। इनका क्षेत्रफल प्रायः 240 से 1600 हेक्टेयर तक होता है। 
  • 2. बस्तियाँ बहुत छोटी तथा एक-दूसरे से दूर स्थित होती हैं। 
  • 3. खेत तैयार करने से फसल काटने तक का सारा काम मशीनों द्वारा किया जाता है। ट्रैक्टर, ड्रिल, कम्बाइन, हार्वेस्टर, थ्रेसर और विनोअर मुख्य कृषि यंत्र हैं। 
  • 4. मुख्य फसल गेहूँ है। अन्य फसलें हैं-जौ, जई, राई, फ्लैक्स तथा तिलहन। 
  • 5. खाद्यान्नों को सुरक्षित रखने के लिए बड़े-बड़े गोदाम बनाए जाते हैं जिन्हें साइलो या एलीवर्टस कहते हैं। 
  • 6. यान्त्रिक कृषि होने के कारण श्रमिकों की संख्या कम होती है। 
  • 7. प्रति हेक्टेयर उपज कम तथा प्रति व्यक्ति उपज अधिक होती है।

जनसंख्या में निरन्तर वृद्धि के कारण विस्तृत कृषि का क्षेत्र घटता जा रहा है। पूर्वी संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्यूनस आयर्स, आस्ट्रेलिया के तटीय भागों तथा यूक्रेन जैसी पनी जनसंख्या वाले क्षेत्रों से लोग विस्तृत कृषि के क्षेत्रों में आकर बसने लगे हैं जिससे कृषि का क्षेत्र कम होता जा रहा है। इस प्रकार 19वीं शताब्दी में शुरू हुई यह कृषि अब बहुत ही सीमित क्षेत्रों में की जाती है।

Q. 7. स्थानान्तरी कृषि तथा स्थानबद्ध कृषि में अंतर स्पष्ट कीजिए ।

Ans. स्थानान्तरी कृषि तथा स्थानबद्ध कृषि में अंतर – कृषि के प्रारंभ से चलव पशुचारण के स्थान पर अपेक्षाकृत स्थायी जीवन की शुरुआत हुई। कृषि के इस सबसे आणि स्वरूप को स्थानान्तरी कृषि कहते हैं, जो अभी भी संसार के कुछ भागों में प्रचलित है। मुख्यतः ऊष्ण कटिबंधीय वनों में अपनायी जाती है। इस प्रकार की कृषि में वर्गों को साफ क के लिए वृक्षों को काटकर उन्हें जला दिया जाता है। इन खेतों में पहले से तैयार की गयी फस को रोत हैं।

कुछ वर्षों तक फसलों का उत्पादन करने के पश्चात् इनकी मिट्टी अनुपजाऊ सकती है। तब इन खेतों को परती छोड़ दिया जाता है तथा वन में नए स्थानों की सफाई जाती है। ऐसी खेती को संसार के विभिन्न भागों में भिन्न-भिन्न नामों से जाना जाता है। जै उत्तरी-पूर्वी भारत में झूमिंग, फिलिपीन्स में चैंजिन, ब्राजील में रोका तथा जायरे में मसोलें क हैं। यद्यपि स्थानांतरी कृषि की प्रकृति प्रवासी होती है, इसने लोगों को एक स्थान पर अधि समय तक स्थायी रूप से रहने के लिए प्रेरित किया।

तत्पश्चात् धीरे-धीरे अनुकूल जलवायु एवं उपजाऊ मिट्टी वाले क्षेत्रों में धीरे-धीरे स्था खेतों तथा गाँवों में स्थायी कृषि प्रणाली का उदय हुआ। उपजाऊ नदी घाटियों जैसे दजला-फरात नील, सिंधु हांगहो तथा चेंग जिआंग में लगभग 6 हजार वर्ष पूर्व स्थायी कृषि के आधार पर महा- सभ्यताओं का निर्माण हुआ। धीरे-धीरे इस स्थायी कृषि प्रणाली का संसार के अधिकांश भाग में विस्तार हुआ।

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FAQs

Q. 1. दक्षिण-पश्चिम एशिया तथा पूर्वी भूमध्यसागरीय प्रदेश किस कारण महत्त्वपूर्ण हैं? 

Ans. गेहूं, जौ, तिल, मटर, अंजीर, जैतून, खजूर, लहसुन, बादाम, गाय, बैल, गेड़ और बकरियों आदि के लिए।

Q. 2. स्थानान्तरी कृषि किसे कहते हैं ?

Ans. कृषि के सबसे आदिम स्वरूप को स्थानान्तरी कृषि कहते हैं।

Q. 3. रोपण कृषि का मुख्य उद्देश्य क्या था ?

Ans. रोपण कृषि का मुख्य उद्देश्य निर्यात अथवा व्यापार द्वारा धन अर्जित करना था।

Q. 4. कृषि उत्पादन में किस कारण वृद्धि हुई ? 

Ans. कृषि उत्पादन में वृद्धि पौधों के विसरण तथा कृषि के औद्योगीकरण से हुई है।

Q. 5. कौन से कारक फसल विशेष के लिए सामान्य सीमायें निर्धारित करते हैं ? 

Ans. जलवायु, मिट्टी तथा उच्चावच ऐसे कारक हैं जो मिलकर फसल विशेष के लिए सामान्य सीमायें निर्धारित करते हैं।

Q. 6. तापमान की आवश्यकता के आधार पर फसलों को कितने भागों में विभाजित किया जा सकता है ? 

Ans. (i) उष्ण कटिबंध के उच्च तापमान में उगने वाली फसलें।
(ii) उप-उष्ण एवं शीतोष्ण क्षेत्रों में निम्न तापमान वाली दशाओं में उगने वाली फसलें।

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