Class 12th Geography-II Chapter 5 Notes In Hindi | भूमि संसाधन और कृषि कक्षा 12 पाठ 5 के प्रश्न उत्तर

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मैं खुद 12वीं का टॉपर रहा हूं और मुझे पता है कि 12वीं की परीक्षा में किस तरह के प्रश्न पूछे जाते हैं। वर्तमान में, मैं एक शिक्षक की भूमिका भी निभा रहा हूँ, और अपने छात्रों को कक्षा 12वीं की महत्वपूर्ण जानकारी और विषयों का अभ्यास भी कराता हूँ। मैंने यह लेख 5 वर्षों से अधिक के अपने अनुभव के साथ लिखा है। इस पोस्ट की मदद से आप परीक्षा में इस अध्याय से भूगोल में बहुत अच्छे अंक प्राप्त कर सकेंगे।

Class 12th Geography-II Chapter 5 Notes In Hindi | भूमि संसाधन और कृषि कक्षा 12 पाठ 5 के प्रश्न उत्तर

कक्षा | Class12th 
अध्याय | Chapter05
भाग | Part II
अध्याय का नाम | Chapter Nameभूमि संसाधन और कृषि
बोर्ड | Boardसभी हिंदी बोर्ड
किताब | Book एनसीईआरटी | NCERT
विषय | Subjectभूगोल | Geography
मध्यम | Medium हिंदी | HINDI
अध्ययन सामग्री | Study Materialsप्रश्न उत्तर | Question answer

पाठ के मुख्य बिंदु | Main Point of This Chapter

★ संसाधन संसाधन मानव की आवश्यकताओं को पूरा करने वाले उपाय हैं। ये प्राकृतिक संसाधन हवा, पानी, भूमि, खनिज, कृषि और ऊर्जा आदि है। 

* वर्धनकाल- फसलों के बोने, उगने, चढ़ने और पकने के लिए उपयुक्त मौसम वाला समय 

★ आर्द्र भूमि कृषि-75 से.. मी. से अधिक वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्रों में की जाने वाली कृषि को आर्द्र कृषि कहते हैं। 

★ शुष्क भूमि कृषि जो फसलें वर्षा पर निर्भर करती हैं, उन्हें शुष्क भूमि कृषि कहते हैं 

Class 12th Geography-II Chapter 5 Notes In Hindi | भूमि संसाधन और कृषि कक्षा 12 पाठ 5 के प्रश्न उत्तर
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★ शस्य गहनता — कुल बोये गए क्षेत्र तथा शुद्ध बोये गए क्षेत्र का अनुपात शस्य गहनता कहलाती है। इसे प्रतिशत में व्यक्त किया जाता है। 

★ परती भूमि- मृदा उर्वरता को बढ़ाने के लिए किसान कुछ समय के लिए खेत में कोई फसल नहीं बोता और उसे खाली छोड़ देता है। ऐसी भूमि को परती भूमि कहते हैं। 

★ हरित क्रान्ति- भारतीय कृषि का आधुनिकीकरण करने की योजना को हरित क्रांति कहते हैं। 

★ कृषि असंतुलन- भारतीय कृषि में प्रादेशिक असंतुलन है। 

★ कृषि काल—भारत में दो कृषि काल खरीफ तथा रखी है। जैव प्रौद्योगिकी और जीन क्रांति-अब एक और क्रांति जीन क्रांति जो जैव प्रौद्योगिकी की देन है। चर्चा है। इसके द्वारा हरित क्रांति की थकान मिटाकर नई स्फूर्ति लाई जा सकती है और भारत की खाद्य सुरक्षा का समाधान किया जा सकता है। जैव प्रौद्योगिक कृषि की अनोखी समस्याओं है तथा कृषि उत्पादों के मूल्य (गुणवत्ता) में वृद्धि कर सकती है। हल कर सकती

याद रखने योग्य बातें

  • 1. कृषि प्रधान देश (Agricultural Country) – भारत एक कृषि प्रधान देश है। कृषि-मौनसून पवनों पर जुआ है (Gamble on Monsoons)।
  • 2. फसलों के प्रकार (Types of Crops)— 
  • (i) खाद्यान्न (Food Grains) — गेहूं, चावल, मोटा अनाज ।
  • (ii) पेय पदार्थ (Beverages)—चाय तथा कहा। 
  • (iii) रेशेदार (Fibrecrops ) — कपास तथा पटसन ।
  • (iv) तिलहन (Oil Seeds), तिल, सरमों, अलसी 
  • (v) कच्चे माल (Raw Materials)- गन्ना, तम्बाकू, रबड़।
  • 3. हरित क्रान्ति (Green Revolution ) – भारतीय कृषि को आधुनिकीकरण बनाने योजना को हरित क्रान्ति कहते हैं।
  • 4. कृषि-असन्तुलन (Agricultural inbalances) भारतीय कृषि के विकास में प्रादेशिक असन्तुलन है।
  • 5. कृषि काल (Crops-Season ) भारत में दो कृषि तथा रथी भारतीय कृषि में हमारी प्रधान मजबूरी ऊष्मा कारक नहीं बल्कि आर्द्रता कारक है।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न | VERY SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS

Class 12th geography
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Q.1. ‘परी’ को मुख्य फसलें कौन-सी है?

Ans. खरीफ की मुख्य फसलें-चावल, मक्का, ज्वार, बाजरा, तुर, मूंग, उड़द, कपास, जूट तिक्त पूँगफली, सोयाबीन आदि। दक्षिण पश्चिम मानसून की धातु को खरीफ की ऋतु कहा जाता है । इस ऋतु में अधिक आवंता और उच्च तापमान चाहने वाली फसलें पैदा की जाती हैं । 

Q. 2. रवी की ऋतु कौन-सी होती है ?

Ans. कोरी की करते हैं। इसकी मुख्य फसलें हैं गेहूँ, जौ, पौरि और सरसों, अलसी, मसूर घना है। 

Q. 3. छालों का भोजन में क्या महत्त्व है ? 

Ans: भोजन में चारों प्रोटीन का मुख्य स्रोत हैं। ये फलीदार फसलें हैं तथा ये अपनी जहाँ बारा ख़ुदा में नाइट्रोजन की मात्रा को बढ़ाकर उसकी उर्वरता में वृद्धि करती है। चना देश में दाल की प्रमुख फसल है ।

Q.4. भारतीय कृषि की मुख्य समस्याएँ क्या है ?

Ans. बहुत अधिक प्रयासों के बाद भी भारतीय कृषि की उत्पादकता कम है । इस परिस्थिति के लिए अनेक कारक जिम्मेदार हैं- (1) पर्यावरणीय, (ii) आर्थिक, (iii) संस्थागत, (iv) प्रौद्योगिकीय |

Q.5. प्राकृतिक संसाधनों के भौतिक लक्षण क्या हैं ?

Ans. भौतिक लक्षण जैसे-भूमि, जलवायु, मृदा, जल, खनिज तथा जैविक पदार्थ, जैव- वनस्पति, वन्य जीव, मत्स्य क्षेत्र शामिल हैं ।

Q.6. वीकरणीय संसाधन से आप क्या समझते हैं ?

Ans. यह प्राकृतिक संसाधन जिनका पुनरुत्पादन किया जा सके, उनका संपूर्ण रूप से विनाश में किया गया हो, नवीकरणीय संसाधन कहलाते हैं 

Q.7. असमाप्य और अपरिवर्तनीय संसाधन कौन से हैं?

Ans. इनमें जल, सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जलवायु मृतिका, वायु आदि शामिल हैं। 

class 12th NotesMCQ
HistoryPolitical Science
EnglishHindi

Q.8. कृषीय भूमि का क्या अर्थ है ? 

Ans. कृषीय भूमि का अर्थ है-जोता गया क्षेत्र इसमें शुद्ध फसलगत क्षेत्र और परती भूमि शामिल है। वर्ष में फसलगत क्षेत्र को बोया गया शुद्ध क्षेत्र कहते हैं। 

Q. 9. भारतीय कृषि के तीन मुख्य कार्य क्या है ?

Ans. 

  • (i) भारत की विशाल जनसंख्या को भोजन प्रदान करना । 
  • (ii) कृषि आधारित उद्योगों को कच्चा माल प्रदान करना । 
  • (iii) कृषि पदार्थों के निर्यात से विदेशी मुद्रा प्राप्त करना

 Q.10. शस्य गहनता से क्या तात्पर्य है ?

Ans. शस्य गहनता है एक ही खेत में एक कृपीय वर्ष में उगाई गई फसलों की संख्या गए शुद्ध क्षेत्र के प्रतिशत के रूप में सकल फसलगत क्षेत्र शस्य गहनता की माप को प्रकट करता है

Q. 11. फसलों को कितने भागों में बाँटा जा सकता है ? 

Ans. फसलों को दो भागों में बाँटा जा सकता है। खाद्य फसलें तथा गैर खाद्य फसलें । फसलों को पुनः तीन उपवर्गों में विभाजित किया जा सकता है

  • (i) अनाज और बाजरा, 
  • (iii) फल तथा सब्जियाँ ।
  • (ii) दालें, और

Q. 12. कृषि ऋतुएँ कितनी हैं ?

Ans. देश में तीन कृषि ऋतुएँ हैं-खरीफ, रवी और जायद भारत की जलवायु दशाएँ ऐसी हैं कि यहाँ सारे साल फसलें पैदा की जा सकती हैं ।

Q.13. संसाधन से आप क्या समझते हैं ? 

Ans. वातावरण के उपयोगी तत्त्वों को जो मानव की आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं, संसाधन कहलाते हैं प्राकृतिक तथा सांस्कृतिक वातावरण मानव की अनेक प्रकार की आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं ।

Q.14. संसाधन की उपयोगिता किन कारकों पर निर्भर करती है ?

Ans. 

  • (i) मानव की बुद्धिमता,
  • (ii) मानवीय संस्कृति का विकास स्तर,
  • (iii) वैज्ञानिक तथा तकनीकी ज्ञान, 
  • (iv) किस क्षेत्र की प्रकृति ।

Q. 15. उर्वर मृदा से क्या अभिप्राय है ?

Ans. वे मृदा जिसमें पादप पोषक की पूर्ति करने की क्षमता होती है, उसे उर्वर मृदा कहते है। मृदा प्राकृतिक रूप से उर्वर है, परन्तु उसमें खाद और उर्वरकों को मिलाकर कृत्रिम रूप से उर्वर बनाया जाता है । 

लघु उत्तरीय प्रश्न | SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS

Class 12th geography
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Q. 1. ‘भारतीय कृषि का मुख्य उद्देश्य भोजन प्राप्त करना है।’ व्याख्या करें। 

Ans. भारतीय कृषि का मुख्य उद्देश्य देश की लगभग 100 करोड़ जनसंख्या को भोजन प्रदान करना है। स्वाधीनता के पश्चात् भारत में खाद्यान्न उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। देश की लगभग 3/4 कृषि भूमि पर खाद्यान्नों की कृषि की जाती है। भारत खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर है । स्वाधीनता के पश्चात् लगभग 50 वर्षों में खाद्यान्न उत्पादन में तीन गुणा वृद्धि

हुई है जबकि जनसंख्या 2.5 गुना बढ़ गई है । 1950 में प्रति व्यक्ति खाद्यान्न उत्पादन 395 ग्राम प्रतिदिन था जो 1995-96 में बढ़कर 580- ग्राम प्रतिदिन हो गया ।

Q. 2. फसलों की गहनता से आप क्या समझते हैं ?

Ans. फसलों की गहनता से अभिप्राय यह है कि एक खेत में एक कृषि वर्ष में कितनी फसलें उगाई जाती है । यदि वर्ष में केवल एक फसल उगाई जाती है तो फसल का सूचकांक 100 है, यदि दो फसलें उगाई जाती हैं तो यह सूचकांक 200 होगा । अधिक फसल अधिक भूमि

उपयोग की क्षमता प्रकट करती है । शस्य गहनता को निम्नलिखित सूत्र की मदद से निकाला जा सकता है

शस्य गहनता = कुल बोया क्षेत्र बोया क्षेत्र x 100/

पंजाब राज्य में शस्य गहनता 166 प्रतिशत, हरियाणा में 158 प्रतिशत, पश्चिम बंगाल में 147 प्रतिशत तथा उत्तर प्रदेश में 145 प्रतिशत है। उच्चतर शस्य गहनता दास्तव में कृषि के उच्चतर तीव्रीकरण को प्रदर्शित करती है ।

Q. 3. शस्य गहनता को प्रभावित करने वाले कारकों का वर्णन करें। 

Ans. शस्य गहनता को बढ़ाने से ही खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाया जा सकता है। निम्नलिखितकारक शस्य गहनता पर प्रभाव डालते हैं- 

  • (i) एक बार से अधिक बोये क्षेत्र के विस्तार के कारण शस्य गहनता का सूचकांक अधिक होता है तथा प्रति इकाई क्षेत्र उत्पादकता भी बढ़ जाती है । 
  • (ii) सिंचाई क्षेत्र के विस्तार से वर्षों की कमी पूरी हो जाती है तथा वर्ष में एक से अधिक फसलें बोई जा सकती हैं ।
  • (iii) उर्वरक के प्रयोग से शस्य गहनता अधिक होती है । इस प्रकार भूमि को परती नहीं छोड़ा जाता ।
  • (iv) शीघ्र पकने वाली किस्मों से एक कृषि वर्ष में एक खेत एक से अधिक फसलें प्राप्त करता है ।
  • (v) कीटनाशक दवाइयों के उपयोग से पौधों की रक्षा करके शस्य गहनता को बढ़ाया सकता है ।
  • (vi) यन्त्रीकरण जैसे ट्रैक्टर, पम्प सैट के प्रयोग से शस्य गहनता सूचक बढ़ जाता है ।

Q.4. शुष्क प्रदेश से क्या अभिप्राय है ? उन प्रदेशों में उत्पादन बढ़ाने के क्या उपाय किए जा रहे हैं ? 

Ans. 30 से.मी. से अधिक वर्षा वाले उप आई तथा आई क्षेत्रों में कृषि की जा सकती है। 30 से.मी. वार्षिक वर्षा से कम वर्षा वाले प्रदेश शुष्क प्रदेश कहलाते हैं जहाँ लगभग सारा वर्ष नमी का अभाव रहता है जैसे पश्चिमी राजस्थान, दक्षिणी पठार का वृष्टि छाया क्षेत्र, गुजरात तथा दक्षिण-पश्चिम हरियाणा । इन भागों में उत्पादकता कम होती है। मोटे अनाज, दालें, तिलहन प्रमुख फसल है । इन्टरनेशनल काप रिसर्च इन्स्टीट्यूट फार सेमीऐरि ट्रापिक्स (I.C.R.I.S.A.T) हैदरावाद तथा सेंट्रल एरिड जोन रिसर्च इन्स्टीट्यूट (C.A.Z.R.I.) जोधपुर में तकनीकी अनुसंधान और विकास का कार्य किया जा रहा है । जिनके द्वारा शुष्क क्षेत्रों में सिंचाई के बिना शुष्क कृषि की जा सके ।

Q.5. परती भूमि से क्या अभिप्राय है ? परती भूमि की अवधि को किस प्रकार घटाया जा सकता है ?

Ans. एक ही खेत पर लम्बे समय तक लगातार फसलें उत्पन्न करने से मृदा के पोषक तत्व समाप्त हो जाते हैं। मृदा की उपजाऊ शक्ति को पुनः स्थापित करने के लिए भूमि को एक मौसम या पूरे वर्ष बिना कृषि किये खाली छोड़ दिया जाता है । इस भूमि को परती भूमि कहते हैं। इस प्राकृतिक क्रिया द्वारा मृदा का उपजाऊपन बढ़ जाता है । 

जब भूमि को एक मौसम के लिए खाली छोड़ा जाता है तो उसे चालू परती भूमि कहते हैं । एक वर्ष से अधिक समय वाली भूमि को प्राचीन परती भूमि कहते हैं । इस भूमि में उर्वरक के अधिक उपयोग से परती भूमि की अवधि को घटाया जा सकता है । 

Q.6. भारत में पारम्परिक कृषि तथा आधुनिक कृषि पद्धति में क्या अन्तर है ? स्पष्ट करो 

पारम्परिक कृषिआधुनिक कृषि
(1) जोतों का आकार इस पद्धति में – जोतों का आकार छोटा होता है । (i) इस पद्धति में जोतों का आकार चकबन्दी के कारण मध्यम होता है । 
(ii) निवेश- -कृषक प्रायः निर्धन होते हैं। इसलिए निवेश की मात्रा कम है। रक का प्रयोग कम है। आधुनिक विधियों तथा जल सिंचाई साधनों की कमी है।(ii) कृषक प्रायः धनी है तथा अधिक निवेश करने में समर्थ हैं । रासायनिक उर्वरक, महीनरी ट्यूबवैल तक आधुनिक का अधिक प्रयोग होता है।

Q.7. भारत में कपास उत्पादन में अग्रणी राज्य का नाम बताएँ । अच्छी फसल के लिए आवश्यक भौगोलिक दशाओं का उल्लेख कीजिए । 

Ans. भारतवर्ष में कपास का उत्पादन गुजरात राज्य में सबसे अधिक होता है । उपज की भौगोलिक दशाएँ-कपास उष्ण प्रदेशों की उपज है तथा खरीफ की फसल है ।

  • (i) तापमान तेज धूप तथा उच्च तापमान की आवश्यकता होती है । पाला इसके लिए हानिकारक है । अतः इसे 200 दिन पाला रहित मौसम चाहिए ।
  • (ii) वर्षा-कपास के लिए 50 से.मी. वर्षा चाहिए । चुनते समय शुष्क पाला रहित मौसम चाहिए । 
  • (iii) जल सिंचाई कम वर्षा वाले क्षेत्रों में जल सिंचाई के साधन प्रयोग किए जाते हैं जैसे पंजाब तथा नदियों की कांप की मिट्टी (दोमट मिट्टी) में भी कपास की कृषि होती है। 
  • (iv) मिट्टी-कपास के लिए लावा की काली मिट्टी सबसे अधिक उचित है । लाल मिट्टी- चावल। 

Q.8. पंजाब तथा हरियाणा में 100 से.मी. से कम वार्षिक वर्षा होते हुए एक मुख्य फसल क्यों है? 

Ans. पिछले कुछ वर्षों से पंजाब तथा हरियाणा में चावल के कृषि क्षेत्र में विशेष वृद्धि हुई है। यहाँ वार्षिक वर्षा 100 से.मी. से भी कम है, फिर भी इन राज्यों में उच्च उत्पादकत है। इन राज्यों में प्रति हेक्टेयर उपज 15 क्विंटल से भी अधिक है। ये राज्य भारत में की कमी वाले प्रदेशों को चावल भेजते हैं। इसलिए इन्हें भारत का चावल का कटोरा भी कहते हैं । यहाँ वर्षा की कमी को जल सिंचाई साधनों द्वारा पूरा किया जाता है। यहाँ उपजाऊ मिट्टी, उच्च तापमान तथा उत्तम बीजों के प्रयोग के कारण प्रति हेक्टेयर उपज अधिक है। 

Q.9. भारत की मुख्य फसलों के नाम लिखें।

Ans. भारत एक कृषि प्रधान देश है। यहाँ 70% लोग खेती करते हैं। इसलिए भारत को कृषकों का देश भी कहा जाता है। देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र के 42% भाग पर कृषि की जाती है। देश की भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार अनेक प्रकार की महत्त्वपूर्ण फसलें उत्पन्न की जाती है । इनमें से खाद्य पदार्थ सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण हैं । कुल बोई हुई भूमि का 80% माग खाद्य पदार्थों के लिए प्रयोग किया जाता है। भारत की फसलों को निम्नलिखित वर्गों में चौटा जाता है

  • (i) खाद्यान्न चावल, गेहूं, जौ, ज्वार, बाजरा, मक्का, चना, दालें आदि ।
  • (i) पेय पदार्थ चाय तथा कहवा । 
  • (iii) रेशेदार पदार्थ कपास तथा पटसन ।
  • (iv) तिलहन-मूँगफली, तिल, सरसों, अलसी आदि 
  • (v) कच्चे माल गन्ना, तम्बाकू, रबड़ आदि ।

Q. 10. संसाधनों का वर्गीकरण कैसे किया गया है ?

Ans. संसाधनों का वर्गीकरण साधनों की विशेषताएँ, उपयोग तथा प्रकृति के आधार पर निम्न वर्गों में किया गया है- 

  • (i) जीवीय तथा अजीवीय संसाधन
  • (ii) समाप्य और असमाप्य संसाधन,
  • (iii) संभाव्य तथा विकसित संसाधन,
  • (vi) खनिज तथा औद्योगिक संसाधन ।
  • (iv) कच्चा माल तथा ऊर्जा के संसाधन, 
  • (v) कृषि तथा पशुचारणिक साधन, 

Q. 11. प्राकृतिक संसाधनों को प्रकृति का उपहार क्यों कहा जाता है ? ये किस प्रकार किसी देश की अर्थव्यवस्था की आधारशिला हैं ?

Ans. संसाधन वातावरण के उपयोगी तत्त्व हैं । प्राकृतिक वातावरण के प्रमुख तत्त्व भूमि जल, वनस्पति, खनिज मिट्टी, जलवायु तथा जीव जन्तु प्राकृतिक संसाधन हैं। मानव को ये चिर स्थायी संसाधन बिना मूल्य के प्राप्त हो जाते हैं। इसलिए इन्हें प्रकृति का उपहार कहा जाता है। ये संसाधने किसी राष्ट्र की अर्थव्यवस्था की आधारशिला है। जलाशय मत्स्य का विकास करते हैं। वनों से लकड़ी प्राप्त होती है तथा कई उद्योगों को कच्चा माल प्राप्त होता है । जत तथा उपजाऊ मिट्टी के कारण कृषि का विकास होता है। मानव संसाधन के रूप में इन संसाधनों का उपयोग करता है। सभी आर्थिक क्रियाएँ प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर हैं। 

Q.12. भारत में कौन-से संसाधन प्रौद्योगिक विकास के कारण पिछड़े हैं ? Or, संसाधानों की उपयोगिता बढ़ाने में प्रौद्योगिकी का क्या योगदान है ? 

Ans. संसाधनों की उपयोगिता बढ़ाने में प्रौद्योगिकी का बहुत बड़ा हाथ है । संसाधनों के रूप बदलने से उनकी उपयोगिता बढ़ जाती है। इसके लिए प्रौद्योगिकी का होना आवश्यक है। प्रौद्योगिकी का विकास मानव की कार्य क्षमता, कुशलता तथा तकनीकी पर निर्भर करता है । करण द्वारा ही संसाधनों का उपयोग बढ़ाया जा सकता है। प्राकृतिक संसाधनों की उपस्थिति से यह अर्थ नहीं लगाया जा सकता कि कोई प्रदेश आर्थिक दृष्टि से विकसित है । भारत में छोटानागपुर पठार तथा बस्तर जनजातीय खण्ड संसाधन समृद्ध है । परन्तु औद्योगिकी के में आर्थिक दृष्टि से पिछड़े हुए हैं। 

Q13. भारत में प्राकृतिक संसाधनों का विशाल भंडार है, व्याख्या कीजिए ।

Ans. भारत के विशाल भू-क्षेत्र में अनेक प्राकृतिक संसाधन पाए जाते हैं। विस्तृत कृषि भूमि, बहता जक्ष, अन्तः भीम जलगृत, सभ्या वर्धन काल, विभिन्न प्रकार की वनस्पति, खनिज, पशुधन तथा मानव संसाधन हमारे आर्थिक तथा प्राकृतिक संसाधन हैं । भारत में प्राचीन काल से लेकर आज तक विभिन्न आर्थिक क्रियाएँ इन संसाधनों पर निर्भर रही है।

प्राचीन काल में भारत में लोहा, पर, तौबा उद्योग उन्नत थे। प्राचीन काल से कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था का आधार रही है। कई प्रदेशों में स्थानान्तरित कृषि, पशुचारण तथा मत्स्य पालन विकसित था। आज भी इसके प्रमाण असम में भूमिंग कृषि, कश्मीर में गुज्जर तथा बकरवाल जाति के चरवाहे तथा केरल तट पर मोपला मछुआरे है। इस प्रकार भारत में एक सम्बे समय से प्राकृतिक संसाधनों के आधार पर प्राथमिक तथा द्वितीयक व्यवसाय उन्नत होते रहे हैं । 

Q.14. आर्थिक विकास का प्रकृति से क्या संबंध है ?

Ans. प्रकृति मानव को प्राकृतिक संसाधन प्रदान करती है। ये संसाधन किसी प्रदेश के आर्थिक विकास का आधार होते है। नदी घाटियों में जल तथा उपजाऊ मिट्टी के कारण कृषि का विकास होता है। जल संसाधनों द्वारा सिंचाई तथा जल विद्युत का विकास होता है। खनिज पदार्थों पर उद्योग निर्भर करते हैं । इस प्रकार किसी प्रदेश की आर्थिक व्यवस्था उस प्रदेश के प्राकृतिक संसाधनों द्वारा निश्चित होती है । 

Q.15. “मानव और पर्यावरण का सहसम्बन्ध स्थिर नहीं है।” उदाहरण सहित व्याख्या करें।

Ans. मानव और पर्यावरण का घनिष्ठ सम्बन्ध है । प्रारम्भ में मानव संसाधनों का संग्राहक मात्रा था, क्योंकि तब संसाधनों की बहुलता थी और मानव की आवश्यकताएं कम थी । वैज्ञानिक प्रगति के साथ-साथ मानव ने संसाधनों का शोषण आरम्भ कर दिया। मनुष्य का आर्थिक विकास पर्यावरण के अनुसार पनपता है। प्राकृतिक संसाधनों का विकास प्रकृति, मानव और संस्कृति के संयोग पर निर्भर करता है। प्रकृति लगभग स्थिर है। मानव तथा संस्कृति परिवर्तनशील है। प्राचीन काल में आदि मानव संसाधनों के उपयोग से अनभिज्ञ था। परन्तु आधुनिक युग में मानय प्रौद्योगिकी की सहायता से नवीन खोगों में लगा हुआ है। इसलिए मानव तथा पर्यावरण का सम्बन्ध सदा परिवर्तनशील है। 

Q. 16. मृदा संरक्षण के विभिन्न उपायों की चर्चा कीजिए । 

Ans. 

  • (i) पर्वतीय दलानों पर समोच्य रेखीय जुताई ।
  • (ii) नियंत्रित पशुचारण
  • (iii) उन्नत कृषि पद्धति का प्रयोग । 
  • (iv) अवनलिकाओं की रोकधाम ।
  • (v) फार्मचार्ड खाद, हरी खाद तथा रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग । 
  • (Vi) जो प्रभावित क्षेत्रों तथा मरु भूमियों की सीमा पर वनारोपण ।
  • (vii) राक मेखला का रोपण । 

Q.17. भारत के उत्तरी मैदान से वनों के विलुप्त होने के तीन कारण बताइए

Ans. पंजाब से लेकर पश्चिम बंगाल तक विस्तृत उत्तरी मैदान में मन आवरण नहीं है इस क्षेत्र में वनों का विस्तार धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। इसके निम्नलिखित कारण है- “

(1) मैदानी भाग में कृषि के लिए भूमि प्राप्त करने के लिए बन साफ कर दिए गए हैं । 

(ii) अधिक जनसंख्या के कारण निवास स्थान के लिए तथा ईधन की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए वन काट दिए गए।

(iii) कई उद्योगों में कच्चे माल के लिए बनों को काटा गया है । जैसे कागज उद्योग, कृत्रिम वस्त्र उद्योग एवं फर्नीचर उद्योग ।

Q. 18. मानव सभ्यता के लिए प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण आवश्यक है । व्याख्या करें । 

Ans. वातावरण के उपयोगी तत्त्वों को प्राकृतिक संसाधन कहा जाता है । संसाधन मानव। की मूल आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। मानव जीवन जल, भूमि, पवन, वनस्पति आदि संसाधनों पर निर्भर है । प्राकृतिक संसाधन वह सम्पत्ति है जो हमारे पास भावी पीढ़ियों की धरोहर है । आधुनिक युग में प्रौद्योगिकी विकास से संसाधनों का दोहन बड़े पैमाने पर होने लगा है 1 दिन प्रतिदिन संसाधनों का उपभोग बढ़ता जा रहा है। 

संसाधनों के समाप्त होने से आधुनिक सभ्यता व मानव अस्तित्व भी समाप्त हो जाएगा । इसलिए संसाधनों का उपयोग योजनावद्ध तरीके से करना चाहिए। ताकि ये संसाधन नष्ट न हो और इनका एक लम्बे समय तक मानव हित के लिए उपयोग किया जा सके । प्राकृतिक संसाधनों का अवशोषण तीव्र गति से हो रहा हे । विकसित देशों में अति उपयोग से संसाधन लगभग समाप्त होने को हैं । भविष्य के भण्डार बहुत कम मात्रा में बचे हैं । परन्तु विकासशील देशों में प्रौद्योगिकी अभाव के कारण प्राकृतिक संसाधनों का अधिक उत्पादन नहीं हुआ है । 

विदेशी मुद्रा कमाने के लिए खनिज पदार्थों का निर्यात किया जा रहा है। मानव सभ्यता को निरन्तरता प्रदान करने के लिए संसाधनों का संरक्षण आवश्यक है। सभी आर्थिक विकास संसाधनों पर आधारित है । इसलिए मानव सभ्यता को कायम रखने के लिए संसाधनों का संरक्षण आवश्यक है ।. 

Q. 19. “प्राकृतिक संसाधनों की संकल्पना संस्कृतिबद्ध है ।” चर्चा कीजिए ।

Ans. जल, वायु, भूमि, वन, खनिज तथा शक्ति के साधन प्रकृति द्वारा प्रदान किए गए निःशुल्क उपहार है । इन संसाधनों का सांस्कृतिक विकास के स्तर से गहरा सम्बन्ध है । मानव प्रौद्योगिकी के अभाव के कारण खनिज पदार्थों तथा जल विद्युत के उपयोग से अनभिज्ञ

था। चीन में कोयला एक कठोर शैल ही था। असम में तेल स्रोतों का कोई महत्त्व नहीं था परन्तु आधुनिक युग में मानव अपनी बुद्धिमता तथा कौशल से जल विद्युत तथा खनिज संसाधनों को विकसित करने में सफल हुआ है।

 संयुक्त राज्य, जापान, रूस आदि देश सांस्कृतिक विकास के कारण उत्पन्न हैं, परन्तु अफ्रीका तथा एशिया के विकासशील देश पिछड़े हुए हैं । इस प्रकार प्राकृतिक संसाधनों की उपयोगिता किसी समाज द्वारा प्राप्त प्रौद्योगिकी के स्तर पर निर्भर करती है । प्राकृतिक संसाधनों का विकास प्रकृति, मानव तथा संस्कृति पर निर्भर करता है । प्राकृतिक संसाधनों को मानव क्षमता द्वारा ही आर्थिक संसाधनों में बदला जा सकता है । संसाधन वही है जिनका उपयोग किया जा सके। इस प्रकार प्राकृतिक संसाधनों की संकल्पना संस्कृतिबद्ध है ।

Q. 20. भारत में संसाधनों के विकास की सामान्य स्थिति का वर्णन कीजिए । 

Ans. लोग अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए जैव-भौतिक पर्यावरण का उपयोग करते रहे हैं । इस प्रक्रिया को ‘संसाधन उपयोग’ कहते हैं । जैसे-जैसे संस्कृति विकसित होती है, नए-नए संसाधनों की खोज होती जाती है तथा उनके उपयोग के बेहतर तरीके भी ढूंढ लिये। जाते हैं । इसे संसाधन विकास कहते हैं । लोगों की संख्या और गुणवत्ता संसाधनों का निर्माण करते हैं । 

प्राकृतिक संसाधन तब तक संसाधन नहीं बनते जब तक उन्हें संसाधनों के रूप में नहीं पहचाना जाता है । मनुष्य को योग्यताओं के अनुसार संसाधनों का विस्तार और संकुचन, होता है । भारतीय संस्कृति में पारितांत्रिक सीमा में संसाधनों के उपयोग की एक अंतर्निहित व्यवस्था है । जिसमें प्रकृति को अपनी हानि को फिर से पूरा करने का समय मिल जाता है । भारत में प्राकृतिक संसाधनों के विशाल भण्डार हैं ।

Q. 21. सतत् पोषणीय विकास की विवेचना कीजिए

Ans. सतत् पोषणीय विकास का तात्पर्य विकास की उस प्रक्रिया से है, जिसमें पर्यावरण की गुणवत्ता को बनाए रखा जाता है। इसमें समाप्त संसाधनों का उपयोग इस तरह से किया जाए कि सभी प्रकार की संपदा के कुल भंडार कभी खाली नहीं होने पाएँ । विकास के अनेक रूप, पर्यावरण के उन्हीं संसाधनों का हास कर देते हैं। जिन पर वे आश्रित होते हैं। इससे आर्थिक विकास धीमा हो जाता है। अतः सतत् पोषणीय विकास में पारितंत्र के स्थायित्व को सदैव ध्यान में रखना पड़ता है । अतः पालन पोषण करने वाले पारितंत्र की निर्वाह क्षमता के अनुसार जीवनयापन करते हुए मानव जीवन की गुणवत्ता में सुधार ही सतत् पोषणीय विकास । सतत् पोषणीयता के साथ-साथ जीवन की अच्छी गुणवत्ता भी जरूरी है ।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न | Long Answer Type Questions

Class 12th geography
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Q.1. निम्नलिखित के संक्षेप में उत्तर दीजिए- 

  • (i) भारत में उद्यान कृषि की फसलों के वितरण प्रतिरूप का वर्णन कीजिए । 
  • (ii) भारत में चाय और कॉफी के वितरण का वर्णन कीजिए । 
  • (iii) हरित क्रान्ति की उपलब्धियाँ क्या हैं ? 
  • (iv) कारण सहित भारत के पाँच बड़े गेहूँ उत्पादक राज्यों के नाम बताइए ।

Ans. (i) उद्यान कृषि फसलों का वितरण जलवायु की विभिन्न दशाओं के कारण भारत में विभिन्न प्रकार की उद्यान कृषि की फसलें उगाई जाती हैं । ऐसी फसलों में प्रमुख हैं-फल, सब्जियाँ, कंद फसलें, शोभाकारी फसलें, औषधीय पौधे और सुगन्धित पौधे तथा मसाले । भारत संसार में आम, केले, चीकू और नींबू के उत्पादन में भारत अग्रणी है। आम के उत्पादन में उत्तर प्रदेश का मुख्य स्थान है। नागपुर के संतरे बहुत प्रसिद्ध हैं। तमिलनाडु महाराष्ट्र और अन्य दक्षिण भारतीय राज्य केलों के लिए प्रसिद्ध हैं। महाराष्ट्र और आन्ध्र प्रदेश में अंगूर का उत्पादन बहुत बढ़ा है। 

कश्मीर और हिमाचल प्रदेश के सेब, नाशपाती, खूबानी, अखरोट और अन्य फलों की बड़ी भारी माँग है। मसालों में काली मिर्च केरल के पश्चिमी घाट में सीमित हैं, लेकिन अदरक पूर्वी राज्यों में भी पैदा होता है । भारत काजू का सबसे बड़ा निर्यातक है। संसार के कुल उत्पादन का 40 प्रतिशत काजू भारत में होता है। केरल, तमिलनाडु और आन्ध्र प्रदेश काजू के प्रमुख उत्पादक राज्य हैं । भारत संसार का सबसे बड़ा नारियल उत्पादक देश है। आन्ध्र प्रदेश मूंगफली का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य है । तोरिया और सरसों उत्पादन में राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और हरियाणा प्रमुख हैं ।

(ii) चाय और कॉफी का वितरण भारत संसार में चाय का सबसे बड़ा उत्पादक तथा उपभोक्ता है । यहाँ संसार की 28 प्रतिशत चाय पैदा होती है। चाय के बागान लगाने का प्रारम्भ असम की ब्रह्मपुत्र घाटी में सन् 1840 के दशक में हुआ । असम आज भी चाय का प्रमुख उत्पादक बना हुआ है । आजकल चाय मुख्य रूप से उत्तर-पूर्वी भारत और दक्षिण में पैदा की जाती है । ब्रह्मपुत्र घाटी में चाय बागानों के लिए अनुकूल दशाएँ हैं। पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग, जलपाईगुड़ी और कूच बिहार प्रमुख चाय उत्पादक जिले हैं। 

दक्षिण भारत में चाय तमिलनाडु और केरल में पश्चिम घाट के निचले ढालों पर नीलगिरी और कार्डायम पहाड़ियों पर उगाई जाती है । हिमाचल प्रदेश में शिवालिक की पहाड़ियों के ढालों पर उत्तरांचल की दून घाटी में चाय पैदा की जाती है । कॉफी- भारत में कॉफी का व्यापारिक उत्पादन 1820 टन के आस-पास हुआ था। 1950-51 में इसका उत्पादन 24.6 हजार टन या जो 2000-01 में 3.01 लाख टन हो गया । देश में पैदा की गई रौवस्ता और अरेबिका किस्मों की सारे संसार में भारी माँग है । केरल में देश का 23.6 प्रतिशत और तमिलनाडु में 5.6 प्रतिशत कॉफी का उत्पादन हुआ । कर्नाटक में देश के कुल उत्पादन का 58 प्रतिशत भाग में कॉफी के बागान थे । 

(III) हरित क्रान्ति की उपलब्धियाँ – 

  • (क) खाद्यान्नों के उत्पादन में वृद्धि। 
  • (ख) रासायनिक उर्वरक और पीड़कनाशियों का उपयोग शुरू हुआ। 
  • (ग) सिंचाई की सुविधाओं में सुधार और उत्पादन पिछले कुछ सालों में हरित क्रांति के कारण देश में गेहूं की पैदावार में वृद्धि हुई | देश में लगभग 240 लाख हेक्टेयर भूमि पर 708 लाख टन गेहूँ उत्पन्न होता है उपज के क्षेत्र भारत में अधिक वर्षा वाली रेतीली भूमि तथा मरुस्थलों को छोड़कर सभी राज्यों में गेहूं की खेती होती है । पहाड़ी क्षेत्रों में शीत के कारण गेहूँ नहीं होता । पंजाब को का अन्न भंडार कहते हैं । अन्य क्षेत्र हैं-हरियाणा, मध्य प्रदेश, राजस्थान और बिहार ।

Q.3. अंतर स्पष्ट कीजिए-

  • (i) आर्द्र भूमि और शुष्क भूमि कृषि ।
  • (ii) खरीफ और रबी की फसलें ।
  • (iii) खाद्यान्न और खाद्य फसलें । 

Ans. (i) आर्द्र भूमि कृषि और शुष्क भूमि कृषि- 

आर्द्र भूमि कृषिशुष्क भूमि कृषि
(a) इसमें 75 से.मी. अधिक वर्षा वाले क्षेत्र आते हैं(a) इसमें 75 से.मी. से कम वर्षा वाले भाग आते हैं ।
(b) इसे वर्षापोषित कृषि कहते हैं (b) इसे आवरणहीन भूमि कहते हैं । 
(c) वर्षा पोषित प्रदेशों में, वर्षा ऋतु में जल की उपलब्धता फसलों की आवश्यकता से अधिक होती है ।(c) शुष्क भूमि फसलों के लिए वर्षा ही जल का एक मात्र स्रोत है । शुष्क भूमि कृषि क्षेत्रों में ग्रामीण जनसंख्या के गरीब लोग रहते हैं ।
(d) इस कृषि में जल सिंचाई साधनों के प्रयोग की आवश्यकता नहीं होती क्योंकि वर्षा की मात्रा पर्याप्त होती है ।(d) इस कृषि में जल सिंचाई की आवश्यकता होती है तथा वर्षा जल को देर तक मिट्टी में समाए रखने की पद्धति प्रयोग की जाती है । 

Q.4. निम्नलिखित का संक्षेप में उत्तर दीजिए- 

  • (iii) कारण सहित पाँच प्रमुख चावल उत्पादक राज्यों के नाम बताइए । 
  • (iv) भारत में गन्ने के वितरण का वर्णन कीजिए ।

Ans. (i) कृषि का महत्त्व भारत में 70 प्रतिशत लोग अपनी जीविका के लिए कृषि पर आश्रित हैं । सकल घरेलू उत्पाद में कृषि की 26 प्रतिशत की भागीदारी है। यह देश को खाद्य सुरक्षा प्रदान करती है तथा उद्योगों के लिए अनेक प्रकार के कच्चे माल का उत्पादन करती है। राष्ट्रीय सुरक्षा और संपन्नता का कृषि के साथ बहुत निकटता का संबंध है । भारत का आये से अधिक क्षेत्र कृषि के अन्तर्गत है ।

(ii) शस्य गहनता-शस्य गहनता का अर्थ है एक ही खेत में एक कृषीय वर्ष में उगाई गई फसलों की संख्या । बोए गए शुद्ध क्षेत्र के प्रतिशत के रूप में सकल फसलगत क्षेत्र में शस्य गहनता की माप को प्रकट करता है । शस्य गहनता ज्ञात करने का सूत्र है-

सकल फसलगत क्षेत्र बोया गया शुद्ध क्षेत्र x 100

शस्य गहनता मिजोरम की 100 प्रतिशत से लेकर पंजाब की 189 प्रतिशत के मध्य बदलती रहती है । सिंचाई शस्य गहनता का प्रमुख निर्धारक तत्त्व है। जनसंख्या का दबाव भी शस्य गहनता को प्रभावित करता है ।

(iii) पाँच प्रमुख चावल उत्पादक राज्य-पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, आन्ध्र प्रदेश, पंजाब, उत्तरांचल (उत्तर प्रदेश) प्रमुख चावल उत्पादक राज्य हैं

(iv) गन्ने का वितरण – भारत गन्ने का मूल स्थान माना जाता है। गन्ना एक सिंचित फसल है । प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्य ये हैं-महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश । इन राज्यों में गन्ने की खेती के अंतर्गत कुल क्षेत्रफल 15.5 लाख हेक्टेयर है। दक्षिणी राज्यों में गन्ने की प्रति हेक्टेयर उपज उत्तरी राज्यों की अपेक्षा अधिक है। तमिलनाडु में यह 106 टन तथा कर्नाटक में 101 टन है। बिहार में गन्ने की प्रति हेक्टेयर उपज 41.7 टन तथा उत्तर प्रदेश में 57.4 टन है । 

इसी के परिणामस्वरूप गन्ने का उत्पादन 5.02 करोड़ टन होते हुए भी महाराष्ट्र में गन्ने के उत्पादन में दूसरे स्थान पर और कर्नाटक तीसरे स्थान पर है। उत्तर भारत के प्रमुख गन्ना उत्पादक क्षेत्र सतलुज यमुना मैदान और ऊपरी व मध्य गंगा के मैदान में स्थित पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और बिहार हैं। उत्तर भारत में गुजरात, उत्तर प्रदेश के बाद दूसरे स्थान पर है। यहाँ गन्ने का कुल उत्पादन 42% है। भारत गन्ने का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश है।

Q.5. भारत में आर्थिक विकास कम क्यों है, जबकि संसाधन पर्याप्त हैं ? 

Ans. भारत में प्राकृतिक संसाधन प्रचुर मात्रा में हैं। ये संसाधन भारत की आर्थिक व्यवस्था का आधार हैं । भारत का उत्तरी मैदान कृषि के लिए एक उपहार है। देश के 2/3 भाग पर उपजाऊ मिट्टी मिलती है जो कृषि का आधार है । सारा साल जैसे तापमान मिलने के कारण यह देश फसलों के लिए एक लंबे वर्धन काल का क्षेत्र है। उत्तरी मैदान में बहने वाली नदियों जल सिंचाई तथा जल विद्युत उत्पादन में बहुत सहायक हैं। देश में खनिज पदार्थों का विशाल भण्डार है । इसलिए यह सत्य है कि भारत प्राकृतिक संसाधनों में एक धनी देश है ।

भारत में यहाँ उपस्थित संसाधनों का पूरा उपयोग नहीं किया गया है । इसका कारण प्रौद्योगिक विकास की कमी है । भारत एक लम्बे समय से कृषि उद्योग तथा परिवहन क्षेत्र की प्रौद्योगिकी में पिछड़ा है। इसी कारण भारत में कृषि क्षेत्र में प्रति हेक्टेयर उत्पादन तथा उद्योगों में प्रति श्रमिक उत्पादन बहुत कम है। प्रौद्योगिकी का स्तर अन्य देशों की तुलना में बहुत कम है। पूँजी की कमी तथा आर्थिक विकास की कमी के कारण नई प्रौद्योगिकी का प्रयोग भारत में कम है । भारत में हरित क्रान्ति के कारण कृषि उत्पादन में वृद्धि नई प्रौद्योगिकी के प्रयोग का ही परिणाम है । 

भारत में कुशल तकनीक तथा कुशल श्रमिकों की कमी है। देश में लगभग 25 लाख कुशल श्रमिक हैं, परन्तु भारत की विशाल जनसंख्या की तुलना में यह कम है। भारत में वैज्ञानिकों तथा इंजीनियरों की औसत संख्या 22 प्रति 10,000 है जबकि संयुक्त राज्य में 456 तथा रूस में 311 प्रति हजार है। भारत में अधिकतर विदेशी प्रौद्योगिकी का प्रयोग किया जा रहा है । परन्तु अब विज्ञान, खनन, तेल शोधन, अन्तरिक्ष विज्ञान, परिवहन आदि क्षेत्रों में भारत में निर्मित प्रौद्योगिकी का प्रयोग किया जा रहा है । अतः भारत में प्रौद्योगिकीय विकास का निम्न स्तर होने के कारण ही उत्पादकता कम है । 

Q.6. (i) प्राकृतिक संसाधनों के विकास के लिए उपाय सुझाइए ।

  • Ans. (i) प्राकृतिक संसाधनों के विकास के उपाय- 
  • (a) संसाधनों का योजनाबद्ध तरीके से प्रयोग किया जाना चाहिए ।
  • (b) संसाधनों का संरक्षण आवश्यक है
  • (c) संसाधनों का सतत् पोषण होना चाहिए ।
  • (d) जनसंख्या वृद्धि तथा संसाधन के दोहन में संतुलन रखना चाहिए ।
  • (e) खनिज धातुओं का पुनः प्रयोग किया जा सकता है जैसे- लोहा, टिन, ताँबा आदि ।
  • (i) विद्युत उद्योग में तांबे के स्थान पर एल्यूमिनियम का उपयोग किया जाने लगा । 
  • (g) खनिज तेल अथवा कोयले के स्थान पर विद्युत तथा अन्य अपारम्परिक ऊर्जा संसाधन उपयोग किए जा रहे हैं । 
  • (h) संश्लेपित उत्पादों के प्रयोग से प्राकृतिक पदार्थ कम से कम प्रयोग किए जाते हैं ।
  • (ii) राज्य/केन्द्र शासित प्रदेश में प्राकृतिक संसाधनों की सूची-

Q.7. अन्तर स्पष्ट कीजिए- 

  • (i) मानवीय तथा सांस्कृतिक संसाधन ।
  • (ii) निधि ऊर्जा संसाधन तथा प्रवाह ऊर्जा संसाधन 
  • (iii) संसाधन संरक्षण और संसाधन प्रबंधन 

Ans: (i) मानवीय तथा सांस्कृतिक संसाधन ।

मानवीय संसाधन सांस्कृतिक संसाधन
लोगों की संख्या और गुणवत्ता मानव संसाधन का निर्माण करते हैं |प्राकृतिक संसाधन तब एक संसाधन नहीं बनते जब तक मानव उन्हें संशोधन के रूप में नहीं पहचानते |
लोगों की एक निर्धारित संख्या और गुणवत्ता को हटाने पर विकास की गति धीमी भी बढ़ जाती है |मनुष्य की आवश्यकताओं और योग्यताओं के अनुसार संसाधनों का विस्तार और संकुचन होता है |
निरीक्षण और कुपोषित जनसंख्या तथा विरल जनसंख्या से विकास के मार्ग में बाधाएं खड़ी हो जाती हैं |प्राकृतिक परिघटना ओं का संसाधनों के रूप में ज्ञान संस्कृति विरासत जैसे ज्ञान अनुभव कौशल संगठन प्रौद्योगिकी आदि पर निर्भर करता है |
मनुष्य एक संसाधन नहीं उद्देश्य है |विज्ञान और प्रौद्योगिकी संस्कृति के उत्पादक है |

(ii) निधि ऊर्जा संसाधन तथा प्रवाह ऊर्जा संसाधन 

निधि ऊर्जा संसाधन प्रवाह ऊर्जा संसाधन
एक लंबे समय से इनका प्रयोग किया जा रहा है |ऊर्जा के वैकल्पिक साधन है |
कोयला तेल तथा विद्युत ऊर्जा इस प्रकार के साधन है |सौर ऊर्जा पवन ऊर्जा बायोगैस भुजरिया जाए इस प्रकार के साधन है |

(iii) संसाधन संरक्षण और संसाधन प्रबंधन 

संसाधन संरक्षणसंसाधन प्रबंधन
संसाधनों का उपयोग बुद्धिमता और संरक्षित अपूर्ण उपयोग करना ,संसाधन संरक्षण कहलाता है |संसाधन प्रबंधन संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग पर बल देता है |
लोगों के संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग के लिए तथा उनकी अत्यधिक उपयोग दुरुपयोग को छोड़ने के लिए प्रेरित करता है |इसका उद्देश्य वर्तमान आवश्यकता को पूरा करना है जिससे परितंत्र यह संतुलन भी बना रहे तथा भावी पीढ़ी की आवश्यकताओं भी पूरी होती रहे |
संरक्षण को संसाधनों के प्रति दायित्व पूर्ण व्यवहार से देखा जाता है |इससे विकास के लिए निश्चित दशाओं में संसाधनों नीतियों और प्रधान शामिल है |
संरक्षण अनेक अंत क्रियात्मक विषयों का समीकरण है |संसाधन प्रबंधन को न्याय पसंद और वचनबद्ध को ध्यान में रखकर निर्णय लेने की सोची समझी प्रक्रिया है |

Q. 8. संसाधनों और आर्थिक विकास के अंतर्सम्बंधों की विवेचना कीजिए। 

Ans. आर्थिक विकास एक जटिल प्रक्रिया है। यह अनेक कारकों पर निर्भर करती है, और प्राकृतिक संसाधन उनमें से एक हैं। संभावित संसाधनों और आर्थिक विकास के मध्य सम्बन्ध इतने सरल नहीं है। पूरे संसार में पाई जाने वाली तीन परिस्थितियों से इस बात को बल मिलता है- 

  • (i) अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के अधिकतर देशो और भारत में भी संसाधनों के विशाल भण्डार होते हुए भी आर्थिक विकास कम है । 
  • (ii) प्राकृतिक संसाधनों में सम्पन्न न होते हुए भी जापान, यूनाइटेड किंगडम और स्विट्जरलैण्ड अत्यधिक विकसित देश हैं । 
  • (iii) संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस और दक्षिण अफ्रीका आदि देश संसाधनों में संपन्नता तथा अत्यधिक विकसित अर्थव्यवस्था के उदाहरण हैं । आर्थिक विकास की प्रारम्भिक अवस्था में स्थानीय संसाधनों की उपलब्धता का बहुत महत्त्व होता है। संसाधनों का दोहन और निर्यात आर्थिक विकास के अनिवार्य कारक हैं। अतः विकास के लिए संसाधन अनिवार्य हैं। संपन्न प्रदेश और देश बाहर से संसाधनों का आयात करने में समर्थ होते हैं । इस दृष्टि से संसाधनों को दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है; हस्तांतरणीय और अहस्तांतरणीय ।
  • भूमि का उपयोग अहस्तांतरणीय संसाधन है। इसलिए कृषि का विकास अच्छी और बहुत अच्छी भूमि वाले प्रदेशों में ही हुआ है। इसके विपरीत हस्तांतरणीय संसाधनों जैसे खनिज वनोत्पादन आदि का दोहन होने के बाद औद्योगिक प्रसंस्करण और अंतिम उपयोग के लिए प्रायः निर्यात कर दिया जाता है। प्राकृतिक संसाधन विकास के लिए कच्चा माल और ऊर्जा प्रदान करते हैं । ये स्वास्थ्य और जीवन शक्ति पर भी प्रभाव डालते हैं ।
  •  इसलिए मानव जीवन और विकास की आवश्यकता है। विकास के अनेक रूप संसाधनों का हास कर देते हैं, जिन पर वे आश्रित होते हैं । इससे वर्तमान आर्थिक विकास धीमा हो जाता है तथा भविष्य की संभावनाएँ काफी हद तक घट जाती हैं । अतः सतत् विकास में पारितंत्र के स्थायित्व को सदैव ध्यान रखना चाहिए । 

Q.9. प्रौद्योगिकीय विकास और संसाधनों की उपलब्धता, शोषणीय और नवीकरणीयता के अन्तर्सम्बन्धों को विस्तार से समझाइए । अपने उत्तर की व्याख्या के लिए उपयुक्त उदाहरण दीजिए।

Ans. प्रौद्योगिकीय विकास और संसाधनों की उपलब्धता-आर्थिक तंत्र के बाहर से प्राप्त होते और अजैव पदार्थ की प्राकृतिक संसाधन है, जिन्हें मानव अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए कच्चे माल के रूप में उपयोग करता है । प्राकृतिक साधन कहलाते हैं ।

किसी निश्चित पर्यावरण में कुछ संसाधनों का उपयोग नहीं किया जा सकता । विशेष रूप से प्रौद्योगिकी की कमी के कारण कुछ संसाधनों का उपयोग नहीं किया जा सकता । प्रौद्योगिकी का विकास संसाधनों की उपलब्धता पर निर्भर करता है । खनिज, वनोत्पादन आदि का दोहन ऐसे संसाधन हैं जिन पर औद्योगिक विकास निर्भर करता है। किसी भी देश का आर्थिक विकास अनेक कारकों पर निर्भर करता है।

जिनमें से प्राकृतिक संसाधन भी एक कारक है । भारत में प्राकृतिक संसाधनों के विशाल भण्डार हैं परन्तु आर्थिक विकास कम है । जापान, यूनाइटेड किंगडम और स्विट्जरलैण्ड में प्राकृतिक साधनों के न होते हुए भी आर्थिक विकास अत्यधिक है अतः आर्थिक विकास की प्रारम्भिक अवस्था में स्थानीय संसाधनों की उपलब्धता का बहुत महत्त्व होता है ।

शोषणीय तथा नवीकरणीयता-प्राकृतिक संसाधन मानव को विकास के लिए पदार्थ, ऊर्जा और अनुकूल दशाएँ प्रदान करते हैं। दूसरे इनसे पर्यावरण का निर्माण होता है। कुछ संसाधन नवीकरणीय हैं और कुछ अनवीकरणीय । जैसे-जैसे मानव संख्या में वृद्धि हुई, उन्हें उन्नतम किस्म के औजार तथा तकनीक मिल गई, जिससे संसाधनों का शोषण बढ़ने लगा । 

मनुष्य की आवश्यकताओं और योग्यताओं के अनुसार संसाधनों का विस्तार और संकुचन होता है । संसाधनों की शोषणीयता वैज्ञानिक खोजों और प्रौद्योगिकी पर निर्भर करती है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी संस्कृति के उत्पाद है। संस्कृति की उपलब्धता, नवीकरणीयता और विशेषताओं का विस्तार संसाधनों के आपूर्ति आधार को व्यापक बनाता है ।

नवीकरणीय संसाधन प्राकृतिक रूप से अपना पुनरुत्पादन कर लेते हैं, यदि उनका संपूर्ण विनाश न किया जाए । वन और मछलियाँ इनके उदाहरण हैं । कुछ संस्कृतियों में पारितंत्रीस सीमाओं में संसाधनों के उपयोग की ऐसी व्यवस्था होती है। जिसमें प्रकृति अपनी हानि को फिर से पूरा कर लेती है। कुछ संस्कृतियाँ प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग इस सीमा तक करती हैं। कि उनको पुनः पूर्ति नहीं हो सकती। आधुनिक यूरोपीय संस्कृति इसी वर्ग की देन है। पहले प्रकार की संस्कृति पारितंत्र के संतुलन को बना कर संसाधनों का संरक्षण करती है ।

कुछ नवीकरणीय संसाधन सभी तक नवीकरणीय है, जब तक उनका प्रकृति द्वारा निर्धारित सीमाओं के अन्दर विवेकपूर्ण ढंग से शोषण किया जाता है कुछ नवीकरणीय संसाधन ऐसे भी हैं जो क्रियाकलापों से निरपेक्ष रहते हुए सतत् उपलब्ध है । सौर ऊर्जा और ज्वारीय ऊर्जा ऐसे ही संसाधन है । नवीकरणीय संसाधनों का तंत्र जटिल है। इस तंत्र के घटक परस्पर किया करते हैं । एक संसाधन का उपयोग दूसरे को प्रभावित कर सकता है । अतः इनका विकास नियोजित होना चाहिए ।

Q.10. निम्नलिखित प्रश्नों के संक्षेप में उत्तर दजिए : (i) मनुष्य कितने प्रकार से अपने पर्यावरण का उपयोग करता है ?

  • (ii) संसाधन की परिभाषा दीजिए । 
  • (iii) संसाधन के प्रकार्यात्मक सिद्धान्त की व्याख्या कीजिए । 
  • (iv) जैव-भौतिक पर्यावरण के ‘उदासीन उपादान’ संसाधन कैसे बन जाते हैं ?
  • (v) यह कहना कहाँ तक सही है कि संसाधन केवल प्राकृतिक पदार्थ हैं ? 

Ans. (i) संसाधन-प्राकृतिक भंडार का वह अंश, जिसका विशिष्ट तकनीकी, आर्थिक और सामाजिक दशाओं में उपयोग किया जा सकता है। संसाधन सुरक्षा और संपदा दोनों के ही आधार हैं। विकास और संसाधन एक-दूसरे पर आश्रित हैं

(ii) प्रकार्यात्मक सिद्धान्त मनुष्य को एक संसाधन नहीं मानना चाहिए । वे तो स्वयं उद्देश्य लक्ष्य हैं जिनके चारों ओर विकास के कार्य चलते रहते हैं । लोगों की संख्या और गुणवत्ता मानव संसाधनों का निर्माण करते हैं। लोगों की एक निर्धारित संख्या और गुणवत्ता घटने पर विकास की गति धीमी भी पड़ जाती है । निरक्षर और कुपोषित जनसंख्या तथा विरल जनसंख्या से विकास के मार्ग में बाधाएँ खड़ी हो जाती हैं। अतः प्राकृतिक साधन तब तक साधन नहीं बनते जब तक मानव उन्हें संसाधनों के रूप में नहीं पहचानते ।

(iii) उदासीनता उपादान लोग अपनी मांगों को संतुष्ट करने के लिए अपने जैव-भौतिक पर्यावरण का उपयोग करते आ रहे हैं। इस प्रक्रिया को संसाधन उपयोग कहते हैं । जैसे-जैसे संस्कृति विकसित होती है नए-नए संसाधनों की खोज होती जाती है और उनके उपयोग के बेहतर तरीके भी । इसे संसाधन विकास कहते हैं । मानवीय अवश्यकताओं और आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए उदासीन उपादानों को वस्तुओं और सेवाओं के रूप में परिवर्तित करके प्राकृतिक संसाधनों के रूप में उपयोग करना संसाधन उपयोग कहलाता है ।

(iv) संसाधनों की प्रायः पहचान मूर्तरूप में विद्यमान प्राकृतिक पदार्थों के रूप में की जाती। है । संसाधन जेब भौतिक पर्यावरण के तत्त्व है, लेकिन ये तब तक निष्क्रिय रहते हैं, जब तक मानव की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए उनकी उपयोगिता का ज्ञान नहीं हो जाता । उदाहरण के लिए, कोयला सदैव विद्यमान था, लेकिन यह संसाधन तभी बना जब मानव ने ऊर्जा के स्रोत के रूप में इसका उपयोग करना प्रारम्भ किया । पर्यावरण के समग्र पदार्थों के पटक प्राकृतिक संसाधन हैं । अतः स्पष्ट है कि संसाधन प्राकृतिक पदार्थ हैं, इनका उपयोग मानव के हाथ में है ।

(v) संसाधन वास्तविक वस्तुएँ हैं। ये प्रकृति के भण्डार का वह भाग है जो मानव की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए उपयोग किया जा सके । इन संसाधनों का विशिष्ट तकनीकी, आर्थिक और सामाजिक दशाओं में उपयोग किया जा सकता है । मनुष्य की आवश्यकताओं को पूरा करने में समर्थ जैव भौतिकी पर्यावरण के तत्त्वों को प्राकृतिक संसाधन कहते हैं । “वस्तुओं के उत्पादन और उपयोग के कारकों के रूप में आसानी से उपयोग के योग्य प्रकृति के लक्षण और उत्पाद प्राकृतिक संसाधन है ।” प्राकृतिक संसाधन तब तक संसाधन नहीं बनते, जब तक मानव उन्हें संसाधनों के रूप में

नहीं पहचानते । लोगों की संख्या और गुणवत्ता मानव संसाधनों का निर्माण करते हैं । अतः संसाधन प्राकृतिक वस्तुएँ हैं जिनका उपयोग मानव द्वारा किया जाता है । 

Q. 11. निम्नलिखित प्रश्नों के संक्षेप में उत्तर दीजिए :

  • (i) क्या संसाधन केवल वास्तविक वस्तुएँ हैं ? यदि नहीं, तो क्यों ? 
  • (ii) संसाधनों की संकल्पना में आए नवीन परिवर्तनों की विवेचना कीजिए । 
  • (iii) संसाधन संरक्षण की संकल्पना की व्याख्या कीजिए । 
  • (iv) संसाधन प्रबंधन को संरक्षण का नवीन रूप क्यों मानना चाहिए ?

Ans. (i) संसाधन जैव-भौतिक पर्यावरण के तत्त्व हैं; लेकिन वे तब तक निष्क्रिय रहते हैं, जब तक मानव की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए उनकी उपयोगिता का ज्ञान नहीं हो जाता । उदाहरण-कोयला सदैव विद्यमान था, लेकिन यह संसाधन तभी बना जब मानव ने ऊर्जा के स्रोत के रूप में इसका उपयोग करना प्रारम्भ किया। संसाधनों में जैव और अजैव दोनों ही प्रकार के पदार्थ शामिल हैं

(ii) प्राकृतिक संसाधन प्रचुर मात्रा में हैं फिर भी ऊर्जा के विशाल भण्डार में से बहुतकम भाग ही उपयोग हो सका, क्योंकि या तो पूरी तरह से अगम्य हैं या ऐसे रूप में हैं कि उनका उपयोग नहीं किया जा सकता यस प्रकार संसाधन प्राकृतिक भण्डार का वह अंश है, जिसका विशिष्ट तकनीकी, आर्थिक और सामाजिक दशाओं में उपयोग किया जा सकता है । इस प्रकार संसाधन मानव संस्कृति और भौतिक पर्यावरण की अंतक्रियाओं द्वारा ही बनाए जाते हैं । 

(iii) मितव्ययिता और बिना बर्बादी के उपयोग को संरक्षण कहा जाता है । संरक्षण को संसाधनों के प्रति दायित्वपूर्ण व्यवहार के रूप में देखा जाता है। संरक्षण अनेक अन्तर्क्रियाओं का सम्मिश्रण है । संरक्षण का उद्देश्य एक तरफा तो सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक तंत्रों को नियोजित करना है तथा दूसरी ओर प्राकृतिक तंत्रों का संरक्षण । 

(iv) क्योंकि, संसाधन प्रबंधन संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग पर बल देता है। इसका उद्देश्य वर्तमान आवश्यकताओं को पूरा करना है तथा यह भी ध्यान रखना है कि पारितंत्रीय संतुलन बना रहे । संसाधन प्रबन्धन निर्णय लेने की प्रक्रिया है। इसमें मनुष्य की आवश्यकताओं, आकांक्षाओं और इच्छाओं को ध्यान में रखकर उनकी कानूनी और प्रशासनिक व्यवस्थाओं के दायरे में स्थान और समय के अनुसार संसाधनों का आवंटन किया जाता है । इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए विविध प्रकार के प्रबंधकीय, तकनीकी और प्रशासनिक विकल्पों का सहारा लिया। जाता है।

Q. 12. उन कृषीय तकनीकी विधियों का उल्लेख करें जिनसे कृषि भूमि उत्पादकता की वृद्धि में सहायता मिल सकती है । 

Ans. कृषि उत्पादकता में दूसरे देशों की तुलना में भारत बहुत पीछे है। खाद्यान्नों तथा दूसरी फसलों की प्रति हेक्टेयर उपज दूसरे देशों की तुलना में बहुत कम है। भारत के अधिकतर भागों में कृषि उत्पादकता सामान्य है । 

कृषि उत्पादकता को बढ़ाने के लिए निम्नलिखित तकनीकी विधियों को अपनाया गया है। जहाँ जल सिंचाई के विकसित साधन उपलब्ध हैं, वहाँ फसलों की गहनता में वृद्धि की गई है। 

(i) शुष्क कृषि – भारत में कृषि मानसूनी वर्षा पर निर्भर करती है । कई प्रदेशों में वर्षा की मात्रा बहुत कम है तथा जल सिंचाई के साधन भी बहुत कम हैं । ऐसे क्षेत्रों में शुष्क सिंचाई द्वारा कृषि की जाती है। अधिक समय तक नमी कायम रखने वाली मिट्टियों में कृषि की जाती है।

(ii) अधिक उपज देने वाली नई किस्मों का प्रयोग-देश में गेहूं, चावल, बाजरा आदि खाद्यान्न तथा अन्य फसलों में अधिक उपज देने वाली नई किस्मों की कृषि का विकास किया गया है । इसमें प्रति हेक्टेयर उपज कई गुना बढ़ गई है ।

(iii) हरित क्रान्ति-उत्तम बीजों, उर्वरकों तथा यान्त्रिक कृषि की सहायता से हरित क्रान्ति को सफल बनाया गया है जिससे खाद्यान्नों के उत्पादन में विशेष वृद्धि हुई है । 

(iv) यान्त्रिक कृषि-पुराने औजारों के स्थान पर आधुनिक मशीनों का प्रयोग किया जा रहा है । जल विद्युत के विकास के कारण ही ऐसा सम्भव हो सका है । कई सरकारी संस्थाएँ इन यंत्रों को खरीदने के लिए निर्धन किसानों को सहायता प्रदान करती हैं।

(v) फसलों का हेर-फेर कई क्षेत्रों में फसलों की गहनता को बढ़ाया गया है तथा खेतों के उपेन्नाऊपन को कायम रखने के लिए फसलों को हेर-फेर के साथ बोया जाता है । इससेbखेतों में उपजाऊपन बढ़ता है। 

Q. 15. भारतीय कृषि पर भूमंडलीकरण के प्रभाव की विवेचना कीजिए । 

Ans. भूमंडलीकरण के द्वारा भारतीय बाज़ार संसार के लिए खुल गए हैं । इसके द्वा अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर सरकारी नियंत्रण कम हुआ है तथा आयात और निर्यात से संबंधि नीतियों में उदारता आई है । अब कृषि उत्पादों समेत अन्य विदेशी उत्पादों का भारत में आया किया जा सकता है ।

बंधन मुक्त व्यापार में वस्तु की कीमत और गुणवत्ता प्रतिस्पर्धात्मक हो जाती है । यदि किस फसल की लागत ऊँची है, तो व्यापारी इसे कम कीमत पर अन्य देशों से आयात करके राष्ट्रीय बाजार में बेच सकते हैं । इससे भारतीय कृषि में गतिहीनता आ सकती है तथा यह पिछड़ भी सकती है या अवनति भी हो सकती है । अंतर्राष्ट्रीय बाजार में अनेक उत्पादों की कीमतें गिर रहते हैं, जबकि भारतीय बाजारों में ये बढ़ रही हैं । इसके दो कारण हैं- जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में तीव्र विकास, जिसके परिणामस्वरूप विकसित देशों में किसानों को अत्यधिक उपज देने वाले बीज उपलब्ध कराए जा रहे हैं। 

(ii) परिष्कृत कृषि यंत्रों के उपयोग के द्वारा लागत काफी घट गई है। विश्व व्यापार समझौते के अनुसार सभी देशों की कृषि क्षेत्र में दिए जाने वाले अनुदान बन्द करने पड़ेंगे । विश्य बाजार की प्रतिस्पर्धा का सामना करने के लिए भारत को अपनी कृषि की विशाल संभावनाओं का व्यवस्थित और नियोजित तरीके से उपयोग करना होगा । देश में कृषि उत्पादों के लिए एक बंधन मुक्त और एकीकृत राष्ट्रीय बाजार बनाने का कार्य सही दिशा में उठाया गया कदम होगा ।

Q. 16. उल्लेखनीय विकास’ के बावजूद, भारतीय कृषि अनेक समस्याओं से ग्रस्त है । व्याख्या कीजिए । 

Ans. भारत में कृषि के विकास के लिए बहुत अधिक प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन संसार के विकसित देशों की तुलना में हमारी कृषि की उत्पादकता अभी कम है। इसके लिए अनेक

कारक जिम्मेदार हैं-

(i) पर्यावरणीय कारक- भारतीय कृषि की गम्भीर समस्या मानसून का अनिश्चित स्वरूप है। तापमान तो सारे साल ही ऊंचे रहते हैं। देश के अधिकतर भागों में वर्षा केवल 3 या 4 महीनों में ही होती है । यहीं नहीं वर्षा की मात्रा तथा ॠतुनिष्ठ और प्रादेशिक वितरण अत्यधिक परिवर्तनशील है । इस परिस्थिति का कृषि के विकास पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है । देश के अधिकतर भाग उपाई, अर्धशुष्क और शुष्क हैं। इन क्षेत्रों में अक्सर सूखा पड़ता रहता है । सिंचाई की सुविधाओं के विकास और वर्षा जल संग्रहण के द्वारा इन प्रदेशों की उत्पादकता बढ़ाई जा सकती है ।

(ii) आर्थिक कारक कृषि में निवेश जैसे अधिक उपज देनेवाले बीज, उर्वरक आदि और परिवहन की सुविधाएँ आर्थिक कारक हैं। विपणन सुविधाओं की कमी या उचित व्याज पर ऋण न मिलने के कारण किसान कृषि के विकास के लिए आवश्यक संसाधन नहीं जुटा पाता है । 

(iii) संस्थागत कारक- जनसंख्या वृद्धि के कारण जोतों का उपविभाजन और छितराव हो रहा है। 1961-62 में कुल जोतों में से 52% जोतें सीमान्त आकार में और छोटी थीं । जोतों का अनार्थिक होना कृषि के आधुनिकीकरण की प्रमुख बाधा है । भूमि के स्वामित्व की व्यवस्था बड़े पैमाने पर निवेश के अनुकूल नहीं है, क्योंकि काश्तकारी की अवधि अनिश्चित बनी रहती है।

(iv) प्रौद्योगिकीय कारक कृषि के तरीके पुराने और अक्षम हैं। मशीनीकरण बहुत सीमित है । उर्वरकों और अधिक उपज देने वाले बीजों का उपयोग भी सीमित है । फसलगत क्षेत्र के केवल एक तिहाई क्षेत्र के लिए ही सिंचाई की सुविधाएँ जुटाई जा सकती हैं। इसका वितरण वर्षा की कमी और परिवर्तनशीलता के अनुरूप नहीं है । इन दशाओं के कारण कृषि उत्पादकता निम्न स्तर पर है ।

Q. 17. भारत में कृषि के नवीनतम विकास का वर्णन कीजिए । 

Ans. भारत में कृषि में प्रौद्योगिकीय परिवर्तन 1960 के दशक में प्रारम्भ हुए । अधिक उपज देने वाले बीजों के अलावा, रासायनिक उर्वरक और पीड़कनाशियों का उपयोग भी शुरू किया गया तथा सिंचाई की सुविधाओं में सुधार और विस्तार किया गया। इन सबके संयुक्त प्रभाव को हरित क्रान्ति कहा जाता है । हरित क्रान्ति एक महत्त्वपूर्ण कृषि योजना है। जिसका मुख्य उद्देश्य खाद्यान्न का उत्पादन बढ़ाकर देश में खाद्यान्न की कमी को दूर करना है । देश के विभाजन के पश्चात् खाद्यान्नों में

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FAQs

Q. 1 मृदा की उर्वरता समाप्त होने के क्या कारण हैं ?

(i) मृदा अपरदनं द्वारा । 
(ii) वनाच्छादित प्रदेशों में झूमिंग आदि स्थानान्तरित कृषि की दोषपूर्ण पद्धति द्वारा ।
(iii) वन की कटाई तथा अति चारण द्वारा ।
(iv) दोषपूर्ण प्रबन्ध तथा अति सिंचाई द्वारा । 

Q.2 पीने के जल की व्यवस्था के लिए कौन-सी योजनाएँ बनाई गई हैं ? 

Ans. देश में ग्रामीण जनसंख्या के लिए पीने का जल प्रदान करने के लिए त्वरित ग्राम जत पूर्ति योजना बनाई गई है । इसी उद्देश्य से नगरीय जनसंख्या के लिए, पीने के जल की व्यवस्था के लिए राष्ट्रीय मिशन नामक योजना बनाई गई है। 

Q.3 लौह खनिज क्या होते हैं ?

Ans. जिन खनिज पदार्थों में लौह धातु का अंश पाया जाता है, उन्हें लौह खनिज कहते । लोहा, मैंगनीज, क्रोमाइट, कोबाल्ट आदि खनिज हैं । 

Q.4 जीविका के प्राकृतिक साधन क्या हैं ?

Ans. पशुओं और पौधों से प्राप्त पदार्थों को जीविका के प्राकृतिक साधन कहा जाता है क्योंकि मानव इन साधनों के प्रयोग से जीवित है ।

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