Class 12th Geography-III Chapter 3 Notes In Hindi (Practical Work) | अध्याय 3 डेटा का चित्रमय प्रतिनिधित्व कक्षा 12 के प्रश्न उत्तर

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मैं खुद 12वीं का टॉपर रहा हूं और मुझे पता है कि 12वीं की परीक्षा में किस तरह के प्रश्न पूछे जाते हैं। वर्तमान में, मैं एक शिक्षक की भूमिका भी निभा रहा हूँ, और अपने छात्रों को कक्षा 12वीं की महत्वपूर्ण जानकारी और विषयों का अभ्यास भी कराता हूँ। मैंने यह लेख 5 वर्षों से अधिक के अपने अनुभव के साथ लिखा है। इस पोस्ट की मदद से आप परीक्षा में इस अध्याय से भूगोल में बहुत अच्छे अंक प्राप्त कर सकेंगे।

Class 12th Geography-III Chapter 3 Notes In Hindi (Practical Work) | अध्याय 3 डेटा का चित्रमय प्रतिनिधित्व कक्षा 12 के प्रश्न उत्तर

कक्षा | Class12th 
अध्याय | Chapter03
भाग | Part III
अध्याय का नाम | Chapter Nameडेटा का चित्रमय प्रतिनिधित्व
बोर्ड | Boardसभी हिंदी बोर्ड
किताब | Book एनसीईआरटी | NCERT
विषय | Subjectभूगोल | Geography
मध्यम | Medium हिंदी | HINDI
अध्ययन सामग्री | Study Materialsप्रश्न उत्तर | Question answer

आँकड़ों का प्रदर्शन [REPRESENTATION OF DATA]

भौगोलिक अध्ययन में आँकड़ों के प्रयोग की महत्ता सर्वविदित है। इससे अध्ययन अधिक प्रभावशाली, प्रमाणिक और वस्तुनिष्ठ हो जाता है परन्तु इनका एक दोष यह है कि अध्ययन में प्रस्तुत लम्बे-लम्बे सारणीबद्ध आँकड़ों को देखकर सामान्य पाठक दिग्भ्रमित हो जाता है। इस दृष्टि से रेखाचित और मानचित्र अधिक लाभदायक होते हैं। वास्तव में ये आँकड़ों के मूर्त प्रदर्शन का निर्माण किया जाता है जिससे भौगोलिक अध्ययन अधिक सरल, सुग्राह्य और प्रभावशाली हो जाता है और रहती है। 

उन्हें देखने मात्र से वर्णन में लिखी गई बात समझ में आ प्रदर्शित करते हैं तो ये जटिल आँकड़े सरलतम एवं हृदय ग्राह्य हो जाते हैं।

आँकड़ों को एक दृष्टि से ही देखने मात्र से मस्तिष्क आसानी से ग्रहण कर लेता है। आँकड़ों को प्रदर्शित करने में साधारण से साधारणव्यक्ति आँकड़ों के उद्देश्यों को समझ लेता है। आँकड़ों को प्रदर्शित करके विभिन्न वस्तुओं के हैं। आँकड़ों के आधार पर अनेक रेखाचित्रों एवं मानचित्रों तुलनात्मक अध्ययन किये जा सकते हैं।

इनके द्वारा भविष्य की योजनाएँ बनाने में सुविधा जाती है। आँकड़ों को प्रदर्शित करने की उपयोगिता अंको के रूपों में तथ्यों की संख्या अधिक होने के कारण उन्हें समझना बहुत कठिन कार्य है। जटिल संख्याओं के कारण आसानी से किसीनिष्कर्ष पर नहीं पहुँचा जा सकता है।  साधारण व्यक्ति अधिक संख्याओं के कारण घबरा जाते हैं। जब हम इन आँकड़ों को विभिन्न विधियों द्वारा

आरेखों की रचना (CONSTRUCTION OF DIAGRAMS)

आरेखों की रचना करते समय निम्नांकित बिन्दुओं पर ध्यन देना चाहिए- 

  • प्रकार आँकड़ों को किस प्रकार के आरेख द्वारा प्रदर्शित किया जाये, यह जानना अत्यावश्यक होता है क्योंकि इन्हें प्रदर्शित करने के आधार पर ही आरेखों का मूल्य एवं उपयोगिता बढ़ती है।
  • मापक आरेख किसी-न-किसी मापक पर ही बनाये जाते है। मापक का चयन करते समय आँकड़ों की
  • प्रकृति, इनका आकार तथा इसके अनुसार अपने कागज का आकार ध्यान में रखना चाहिए। आरेख इतना छोटा न बने कि उसमें तथ्यों का पता भी न चले और न ही इतना बड़ा बने कि कागज छोटा पड़ जाये।
  • लेखन- आरेखों पर अनेक सूचनाओं को उनके आँकड़ों को प्रदर्शित करने के लिए कोई एक आरेख नाम लिखकर ही प्रदर्शित किया जाता है अतः इस पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। लेखन के माध्यम से ही आरेख आकर्षक बनते हैं।
  • प्रतीकीकरण- आरेखों में विभिन्न प्रतीक एवं चिन्हों का प्रयोग किया जाता है। इन्हें प्रदर्शित करने के लिए विभिन्न संकेत, आभा तथा धारियों का प्रयोग किया जाता है। इनके अलावा इन्हें नामांकन विधि द्वारा भी प्रदर्शित किया जा सकता है।
  • सजावट- आरेखों की सजावट भी आवश्यक होती है। सभी आरेखों पर सुन्दर अक्षर लेखन हो तथा मापक बना हो एवं उसके चारों और लाइन खींची गयी हो। इससे आरेख आकर्षक लगते हैं। आरेख बनाने के सामान्य नियम (General Rules for Construction of Diagrams) – आरेख बनाते समय निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखना अत्यावश्यक होता है- नहीं है। आरेखों की रचना में लम्बाई, चौड़ाई या
  • आरेख बनाने के लिए उपयुक्त विधि का चयन परमावश्यक होता है क्योंकि सभी आँकड़े भिन्न-भिन्न विधियों द्वारा ही प्रदर्शित किये जा सकते हैं। अतः यह तय करना आवश्यक है कि अमुक आँकड़े अमुक आरेख द्वारा प्रदर्शित किये जायें। महत्वपूर्ण होता है। मापक सदैव कागज के आकार तथा आँकड़ों की प्रकृति के आधार पर ही तय किया जाता है।
  • आरेख सदैव कागज के मध्य में हो दर्शाया जाना चाहिए, न कि उसके किसी एक कोने पर। 
  • आरेख के ऊपर उसका स्पष्ट एवं संक्षिप्त शीर्षकपर प्रत्येक आभा को संकेत द्वारा स्पष्ट करना चाहिए। 
  • आरेख सदैव शुद्ध बनाने चाहिए जिससे परिणाम ठीक एवं अच्छे निकाले जा सकें।
  • आरेख (चित्र) यथासम्भव सरल होने चाहिए, ताकि आसानी से समझे जा सकें।
  • आरेख सदैव आकर्षक होने चाहिए, ताकि उन्हें देखने का मन बने।

आरेखों के प्रकार (TYPES OF DIAGRAMS)

  • आरेख विभिन्न प्रकार के होते हैं क्योंकि सांख्यिकीय मोटाई या क्षेत्रफल की गणना की जाती है। अतः आरेख निम्न प्रकार के होते हैं- (अ) एक विमीय आरेख (One Dimensional
  • (ब) द्विविमीय आरेख (Two Dimensional Dia- grams) (स) त्रिविमीय आरेख (Three Diemensional Diagrams)
  • (द) अन्य आरेख (Other Diagrams)।
  • (अ) एक विमीय आरेख (One Dimensional Diagrams)- जिन आरेखों में केवल एक विस्तार के आधार पर गणना की जाती है, उन्हें एक विमीय आरेख कहते हैं। इनमें प्रमुख रूप से ऊँचाई पर ही अधिक ध्यान दिया जाता है। ये आरेख निम्नलिखित हैं-
  • (i) साधारण रेखा आरेख या ग्राफ (Simple Line Graph), (ii) बहुरेखा ग्राफ (Polygraph), (iii) संयुक्त रेखा ग्राफ या पट्टिका ग्राफ (Combined Line Graph or Band Graph), (iv) क्लाइमो ग्राफ (Climograph), (v) हीदरग्राफ (Hythergraph), (vi) क्लाइमेटोग्राफ (Climatograph), (vii) पवन आरेख (Wind Rose Diagram), (viii) तारा आरेख (Star Diagram), (ix) (2) आरेख बनाने से पूर्व उपयुक्त मापक का चयन भी साधारण दण्ड आरेख (Simple Bar Diagram), (x) बहुदण्ड आरेख (Multiple Bar Diagram), (xi) मिश्रित दण्ड आरेख (Compound Bar Diagram), (xii) (3) आरेख सदैव कागज के अनुपात में ही रखना विचलन दण्ड आरेख (Deviation Bar Diagram) एवं (xiii) पिरामिड आरेख (Phyramid Diagram) !
  • (ब) द्वि-विमीय आरेख (Two Dimensional Diagrams)- जब किसी आरेख में लम्बाई के साथ-साथ चौड़ाई या मोटाई को भी अपनाया जाये तो उसे दो विमीय (5) आरेख में एक से अधिक आभाएँ प्रदर्शित करने आरेख कहते हैं। इन्हें कभी-कभी क्षेत्रफल आरेख एवं घातक आरेख भी कहा जाता है। द्विविमीय आरेख निम्न प्रकार के होते हैं- होना चाहिए।
  • (i) आयत आरेख (Rectangular Diagrams), (ii) वृत्त आरेख (Circle Diagrams),
  • (iii) वर्गाकार आरेख (Square Diagrams) एवं (iv) चक्राकार आरेख अथवा पाई आरेख (Wheel Diagrams or Pie Diagrams) |
  • (स) त्रिविम आरेख (Three Dimensional Diagrams) – त्रिविम आरेख वे हैं जिनकी रचना में लम्बाई, चौड़ाई व ऊँचाई (मोटाई, गहराई) तीनों को दर्शाया जाता है। ऐसे आरेख प्रायः तब बनाये जाते हैं जब आँकड़ों में अन्तर अधिक हो। त्रिविम आरेखों के निम्न प्रकार हैं- (i) घनाकार आरेख (Cubic or Volume Dia- grams),
  • (ii) गोलाकार आरेख (Sphere Diagrams) एवं (iii) इष्टिका पुंज या ब्लॉक ढेरी आरेख (Block Pile Diagrams) ।
  • (द) अन्य आरेख (Other Diagrams) – उपर्युक्त आरेखों के अतिरिक्त निम्नांकित अन्य आरेखों का भी प्रयोग किया जाता है-
  • (i) चित्रात्मक आरेख (Pictorial Diagrams), (ii) अर्गोग्राफ (Ergograph),
  • (Erthograph of Geddes and Ogilive), (iv) आयताकार विरंजक चित्र (Rectangular उन्हें आरोही (Ascending) अथवा अवरोही (Descend-
  • Cartogram) एवं (v) यातायात विरंजक चित्र (Traffic Flow Cartogram) |
  • पाठ्यक्रमानुसार यहाँ निम्नलिखित आरेखों का विवरण बनाये जा सकते हैं। दिया जा रहा है- (i) दण्ड आरेख, (ii) मिश्रित दण्डारेख, (iii) वृत्तारेख
  • (iv) चक्राकार, (v) प्रत्युत्पन्नी

दण्ड आरेख

(BAR DIAGRAM सामान्यतः समरूपी इकाइयों वाली व विभिन्न प्रकार के मूल्यों को बताने वाली संख्याओं की तुलना करने की सबसे सरल विधि दण्ड आरेख है। इसमें किसी भी प्रकार की परिवर्तनशील मात्राएँ दर्शायी जा सकती हैं। ऐसे आरेख में बनाये गये दण्डों की प्रत्येक बार चौड़ाई समान रखी जाती है। इनमें मापनी एक ही दिशा की ओर होती है। अतः दण्ड की ऊँचाई या लम्बाई संख्याओं के मान अनुसार ही निश्चित की जाती है। इसमें सामान्यतः छोटी से छोटी एवं सबसे बड़ी संख्या के बीच अन्तर बहुत अधिक (सौ गुना से अधिक) नहीं रखा जाता है। दण्ड आरेख में समान्यतः ऊर्ध्वाधर (खड़ी) भुजा की ओर मापनी अंकित रहती है।

दण्ड आरेख वे आरेख होते हैं जिनमें वस्तुओं का प्रदर्शन दण्डों (Bars) द्वारा किया जाता है। ये आरेख

क्षैतिज एवं लम्बवत् दोनों प्रकार के बनाये जा सकते हैं। इनमें दण्ड या स्तम्भ बनाये जाते हैं। अत: इन्हें स्तम्भी आरेख (Columnar Diagram) भी कहा जाता है। मोकहाउस महोदय के अनुसार, ” स्तम्भ आरेख जो कभी-कभी दण्ड आरेख भी कहलाते हैं, निश्चित मूल्यों को प्रदर्शित करने हेतु आनुपातिक लम्बाइयों के स्तम्भ या दण्डों की एक श्रृंखला होती है। “

(Columnar diagrams, sometimes known as bar-graphs, consist of a series of columns of bars proportional length to the quantities they represent.) दण्ड आरेख बनाते समय निम्नांकित बातों पर विशेष

ध्यान देना चाहिए-

  • (1) सभी दण्डों की लम्बाई मापक के अनुसार व चौड़ाई समान रखनी चाहिए- 
  • (2) दण्ड आरेख बनाने के लिए दिये गये संख्यिकीय (iii) गेडिस तथा ओगिलवी का अर्थोग्राफ आँकड़ों को एक क्रम में रखना आवश्यक होता है।
  • (3) सांख्यिकीय आँकड़ों को क्रम में करने के लिए  क्रम में कर लेना चाहिए।
  • (4) दण्ड समान दूरी पर बनाने चाहिए। 
  • (5) ये आरेख क्षैतिज एवं लम्बवत् दोनों रूपों में
  • (6) इनमें एक से अधिक मूल्यों का प्रदर्शन एक ही आरेख में करने पर उनमें विभिन्न आभाओं का प्रयोग करना उचित रहता है। 
  • (7) आँकड़ों की निम्नतम एवं उच्चतम सीमा को अवश्य ध्यान में रखना चाहिए।
  • सरल दण्ड आरेख (Simple Bar Diagram)- दण्ड आरेख की यह प्रारम्भिक विधि है। इसमें किसी भी दण्ड का उप-विभाजन नहीं होता। इस विधि में ऐसे सभी सांख्यिकीय आँकड़े, जिनके बीच का अन्तर प्रायः 20-30 गुने से अधिक नहीं हो, सरलतापूर्वक दर्शाये जा सकते हैं। जब दण्ड खड़े या लम्बवत् बनाये जाते हैं तो उन्हें ऊर्ध्वाधर या खड़े दण्ड एवं जब उन्हें आड़ा या क्षैतिज दिशा में बनाया जाता है तो उन्हें क्षैतिज दण्ड के नाम से पुकारते हैं। दोनों के बनाने की विधि और विशेषताओं में कोई अन्तर नहीं है। ऐसे दण्डों को बना समय बाय और ऊर्ध्वाधर रेखा के सहारे मापनी निश्चित की जाती है एवं क्षैतिज भुजा पर समान दूरी पर समान चौड़ाई वाले एवं मापनी के आधार पर विभिन्न ऊँचाइयों के दण्ड बनाये जायेंगे।

विमैटिक (विषयक) मानचित्रों को तैयार करना (PREPARATION OF THEMATIC MAPS)

  • भौतिक एवं सांस्कृतिक वातावरण के किसी भी भौगोलिक तत्व का वितरण प्रदर्शित करने वाले वाले क्षेत्रों के क्षेत्रफल को अच्छी तरह जानकारी होनी एक मानचित्र को विषयक मानचित्र कहते हैं। इसके अन्तर्गत अपने उद्देश्य के अनुसार किसी भी एक भौगोलिक तत्व जैसे-तापमान, वर्षा, मिट्टी, जलवायु, जनसंख्या, कृषि आदि का वितरण मानचित्र तैयार किया जाता है। वर्तमान समय में इस तरह के मानचित्रों का प्रचलन बढ़ा है। क्योंकि इसमें केवल एक भौगोलिक तत्व का प्रदर्शन होने के कारण ये अधिक स्पष्ट एवं प्रभावशाली होते हैं। पाठ्यक्रमानुसार यहाँ निम्नांकित तीन विषयक मानचित्रों का विवरण दिया जा रहा है-
  • (1) सभि बिन्दुओं का आकार समान होना चाहिए। चाहिए। 
  • (2) बिन्दुओं का मापक, कुल बिन्दुओं तथा वितरणकरने से पूर्व कुछ महत्वपूर्ण बातों को ध्यान में रखना चाहिए। ये महत्वपूर्ण बातें या जानकारी निम्न हैं- 
  • (3) सबसे कम मात्रा वाले तथा सबसे अधिक मात्रा वाले क्षेत्रों में बिन्दुओं को इस ढंग से अंकित करना चाहिए जिससे दूर से ही वितरण वस्तु की मात्रा की जानकारी स्पष्ट हो जाय।
  • (4) बिन्दुओं को इस ढंग से अंकित किया जाय कि उन्हें आसानी से गिना जा सके।
  • (5) बिन्दु अंकित करते समय आन्तरिक जलाशय, दलदल, वन, बस्तियाँ आदि का ध्यान रखें। उदाहरण के लिए, कहीं ऐसा न हो कि आन्तरिक झीलों के ऊपर बिन्दु
  • (6) बिन्दु विधि (Dot Method) – वितरण मानचित्रों में बिन्दु विधि सबसे सरल एवं उपयोगी विधि है। मात्राप्रधान अंकित हो जाय। मानचित्रों में वितरण दर्शाने के लिए बिन्दु को आधार मानकर मात्रा अनुसार बिन्दु बनाकर इस विधि का प्रदर्शन किया जाता है। इसमें किसी वस्तु के घनत्व को समान आकार वाले बिन्दुओं द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। इसमें जनसंख्या वितरण, फसल एवं पशु उत्पादन सरलता से प्रदर्शित किया जा सकता है। बिन्दु विधि की महत्ता को स्वीकारते हुए विन्टर बोथम ने लिखा है, “प्रतीक (चिन्ह) का सबसे सरल स्वरूप बिन्दु है और वितरण मानचित्रों का यह बहुत उपयोगी प्रकार है जिसमें मात्राओं या मानों को समान आकार वाले बिन्दुओं से दर्शाते हैं और प्रत्येक बिन्दु का एक निश्चित मान होता है।”
  • (7) बिन्दुओं को सीमा रेखा (प्रशासनिक इकाई) के समानान्तर या सरल रेखावत नहीं अंकित करना चाहिए।
  • (8) बिन्दु प्रदर्शन के समय प्रति बिन्दु मापक ऐसा होना चाहिए कि बिन्दुओं की संख्या समान लगे। बहुत अधिक बिन्दु या बहुत कम बिन्दु वितरण मानचित्र को शोभा खराब कर देते हैं।
  • बिन्दु विधि से सामान्यतः आर्थिक वस्तुओं का वितरण या जनसंख्या का वितरण दिखाया जाता है। इस प्रकार मात्रा- प्रधान वितरण मानचित्रों में बिन्दु विधि एक आकर्षक विधि है। इसमें मानचित्र निर्माता को बिन्दु प्रदर्शन करने में बड़ी सावधानी बरतनी पड़ती है। इसमें विभिन्न आकार-प्रकार से बिन्दु दर्शाने में क्षेत्रफल तथा मानचित्र के मापक का विशेष ध्यान रखना चाहिए। लघु मापक वाले मानचित्रों में बिन्दु का मान ऊँचा और बिन्दु का आकार
  • (प्रतीक का सबसे सरल रूप बिंदु है और वितरण मानचित्र का एक बहुत ही उपयोगी रूप वह है जिसमें मानों की मात्राओं को समान आकार के बिंदुओं द्वारा दर्शाया जाता है, प्रत्येक बिंदु का एक विशिष्ट मान होता है।)
  • यह विधि सर्वाधिक प्रचलित है। बिन्दु विधि द्वारा बिन्दुओं की संख्या निश्चित करने और बिन्दुओं को अंकित के आधार पर बिन्दु मानचित्र की रचना कीजिए-

एन. सी. ई. आर. टी. कॉर्नर (NCERT CORNER)

प्रश्न 1. निम्नलिखित प्रश्नों के 30 शब्दों में उत्तर द्वारा आँकड़ों के रूपान्तरण को आंकड़ों का प्रस्तुतीकरण

दीजिए-

(i) थिमैटिक मानचित्र क्या है?

(ii) जब विभिन्न घटकों को तत्व/चर के एक समूह में (iii) आँकड़ों के प्रस्तुतीकरण से आपका क्या तात्पर्य है? 

(iv) बहुदण्ड आरेख और यौगिक दण्डारेख में अन्तर साथ-साथ रखे जाते हैं, उनका प्रदर्शन एक यौगिक दण्ड आरेख के माध्यम से किया जाता है। इस विधि में विभिन्न चरों को बताइये। 

(v) एक बिन्दुकित मानचित्र की रचना के लिए क्या आवश्यकताएँ हैं?अकेले दण्ड में विभिन्न आयतों द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। 

(vi) एक विन्दुकित मानचित्र की रचना के लिए 

  • (vii) सममान रेखा मानचित्र क्या है? एक क्षेपक को निम्नलिखित आवश्यकताएँ होती हैं-किस प्रकार कार्यान्वित किया जाता है? 
  • (viii) एक वर्णमात्री मानचित्र को तैयार करने के लिए अनुसरण करने वाले महत्त्वपूर्ण चरणों की विवेचना कीजिए।

मौखिक प्रश्नोत्तर (Viva Voce)

1. दण्ड आरेख किसे कहते हैं ? 

उत्तर- वे आरेख जिनके द्वारा सांख्यिकीय आँकड़ों का प्रदर्शन एक दण्ड के रूप में किया जाता है, दण्ड आरेख कहलाते है। ये दण्ड समान चौड़ाई वाले क्षैतिज एवं लम्बवत् दोनों रूपों में बनाये जा सकते हैं।

2. साधारण दण्ड आरेख किसे कहते हैं ? 

उत्तर- जब दण्ड आरेख द्वारा किसी एक ही वस्तु का वितरण दिखाया जाता है तो उसे साधारण दण्ट आरेख कहा जाता है।

3. मिश्रित दण्ड आरेख से क्या अभिप्राय हैं? 

उत्तर- जब किसी दण्ड आरेख द्वारा एक से अधिक वस्तुओं का वितरण अथवा एक ही वस्तु के विभिन्न उपयोग प्रदर्शित किये जायें तो उसे मिश्रित दण्ड आरेख कहा जाता है। मिश्रित दण्ड आरेख को प्रविभाजित दण्ड आरेख भी कहा जाता है।

4. चक्र आरेख किसे कहते हैं?

उत्तर- जब सांख्यिकीय आँकड़ों का प्रदर्शन एक चक्र द्वारा किया जाय तो उसे चक्र अरिख कहा जाता है। इसमें प्रदर्शन हेतु आँकड़ों को 360° के बराबर मानकर प्रत्येक घटक के आँकड़ों के अनुसार कोण ज्ञात किये जाते हैं।

5. वृत्त आरेख क्या है?

उत्तर- वह आरेख जिसमें सांख्यिकीय आंकड़ों का प्रदर्शन वृत्त द्वारा किया जाता है, वृत्त आरेख कहलाता है। इसमें वृत्त का आनुपातिक आकार जात करना पड़ता है जिसे निम्न सूत्र द्वारा ज्ञात किया जाता है-

6 यातायात प्रवाह मानारेख क्या है ?

उत्तर- यातायात प्रवाह मानारेख ये है जिनके द्वारा मार्ग के ऊपर किसी-न-किसी समय चलने वाली गाड़ियों की प्रवाह की मात्रा दर्शायी जाती है।

7. वितरण मानचित्र किसे कहते हैं?

उत्तर- वितरण मानचित्र वे मानचित्र हैं जिनमें किसीवस्तु के वितरण क्रम को प्रदर्शित किया जाता है अर्थातविभिन्न वस्तुओं की मात्रा, गुण अथवा घनत्व सम्बन्धी आँकड़े प्रदर्शित करने वाले मानचित्र वितरण मानचित्र कहलाते हैं।

8. वितरण मानचित्र कितने प्रकार के होते हैं? 

उत्तर- वितरण मानचित्र दो प्रकार के होते हैं- (1) गुण प्रधान वितरण मानचित्र (Qualititative Distribution Maps) एवं (2) मात्रा प्रधान वितरण मानचित्र (Quantitative Distribution Maps) |

9. वर्ण प्रतीकी या चिन्ह विधि क्या है? 

उत्तर- इस विधि में वस्तुओं का वितरण दिखाने के लिए विभिन्न सांकेतिक चिन्हों या अक्षरों का प्रयोग किया। जाता है।

10. मात्रा प्रधान वितरण मानचित्र किसे कहते हैं? 

उत्तर- मात्रा प्रधान वितरण मानचित्र वे हैं जिनमें किसी वस्तु के मूल्य, मात्रा अथवा घनत्व को प्रदर्शित किया जाता है।

11. वर्णमात्री या छायाविधि (Choropleth) किसे कहते हैं? 

उत्तर- जब वितरण मानचित्रों में छाया या रंगों की आभा द्वारा घनत्व आदि को दिखाते हैं तो इसे छाया विधि कहते हैं। 

12. सममान रेखा विधि क्या है? 

उत्तर- इस विधि में किसी वस्तु या इकाई का वितरण सममान रेखाओं द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। 

13 बिन्दु विधि से क्या तात्पर्य है? 

उत्तर- जब किसी वस्तु के वितरण को समान आकार वाले बिन्दुओं द्वारा प्रदर्शित किया जाता है तो उसे बिन्दु विधि कहते हैं।

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FAQs

Q. आरेखों, आलेखों और नक्शों के संदर्भ में चीनी कहावत क्या है?

एक चीनी कहावत है कि ‘एक तस्वीर हजारों शब्दों के बराबर होती है’। इसलिए, डेटा के प्रतिनिधित्व की ग्राफिक विधि हमारी समझ को बढ़ाती है और तुलना को आसान बनाती है।

Q. डेटा क्या हैं? ये कैसे महत्वपूर्ण हैं?

उत्तर:
भौगोलिक घटनाओं, मानवीय गतिविधियों और उनके अंतर्संबंधों के संख्यात्मक और मात्रात्मक माप को डेटा कहा जाता है। दूसरे शब्दों में, मात्रात्मक जानकारी को डेटम कहा जाता है। इसलिए, डेटा को मात्रात्मक जानकारी भी कहा जाता है।

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