अर्थशास्त्र कक्षा 12वीं अध्याय 5 नोट्स | Economics Class 12 Chapter 5 Questions And Answers In Hindi Easy PDF

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Economics Class 12 Chapter 5 Questions And Answers In Hindi, अर्थशास्त्र कक्षा 12वीं अध्याय 5 नोट्स | Economics Class 12 Chapter 5 Questions And Answers , बाजार संतुलन | MARKET-EQUILIBRIUM


बाजार संतुलन | MARKET-EQUILIBRIUM


संतुलन कीमत (Equilibrium price)—संतुलन कीमत वह कीमत है जिस पर माँग तथा पूर्ति एक-दूसरे के बराबर होते हैं या जहाँ क्रेताओं की खरीद या विक्रेताओं की बिक्री एक दूसरे के समान होती है।

संतुलन मात्रा (Equilibrium Quantity ) — संतुलन मात्रा वह मात्रा होती है जिस पर माँग की मात्रा तथा पूर्ति की मात्रा दोनों बराबर होती है। माँग में परिवर्तन का प्रभाव (Effect of Change in Demand ) — यदि पूर्ति स्थिर रहे, तो माँग में वृद्धि से संतुलन कीमत बढ़ती तथा माँग में कमी से संतुलन कीमत घटती है। माँग में वृद्धि होती है और माँग में कमी से संतुलन मात्रा घटती है।

पूर्णतया लोचदार पूर्ति की स्थिति में (In Case of Perfectly Elastic Supply)– किसी वस्तु की माँग में वृद्धि या कमी के कारण इसकी कीमत में कोई परिवर्तन नहीं होता यदि वस्तु की पूर्ति पूर्णतया लोचदार है। केवल संतुलन मात्रा क्रमशः बढ़ती या घटती है।

पूर्णतया बेलोचदार पूर्ति की स्थिति में (In case of Perfectly Inelastic Supply)— यदि वस्तु की पूर्ति बेलोचदार है तो माँग में वृद्धि या कमी के कारण संतुलन मात्रा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। केवल संतुलन कीमत ही क्रमशः बढ़ेगी या घटेगी।

पूर्ति में परिवर्तन का प्रभाव (Effects of Change in Supply ) – यदि माँग स्थिर रहे तो पूर्ति के बढ़ने पर संतुलन कीमत घटती तथा पूर्ति के घटने पर संतुलन कीमत बढ़ती है। यदि पूर्ति में वृद्धि होती है तो संतुलन मात्रा में वृद्धि होती है और पूर्ति में कमी होती है तो संतुलन मात्रा में भी कमी होती है।

पूर्णतया लोचदार माँग की स्थिति में (In Case of Perfectly Elastic Demand)— यदि माँग पूर्णतथा लोचदार है तो वस्तु की पूर्ति में वृद्धि या कमी से संतुलन कीमत में कोई परिवर्तन नहीं होगा। केवल संतुलन मात्रा ही क्रमशः बढ़ेगी या घटेगी।

पूर्णतया बेलोचदार माँग की स्थिति में (In Case of Perfectly Inelastic De- mand)—–— यदि माँग पूर्णतया बेलोचदार है तो पूर्ति में कमी के कारण कीमत में वृद्धि तथा पूर्ति में वृद्धि के कारण संतुलन कीमत में कमी होगी। संतुलन मात्रा में कोई परिवर्तन नहीं होगा।



माँग तथा पूर्ति में एक साथ परिवर्तन का प्रभाव (Effect of a Simultaneous Change in Demand and Supply)-

  • (i) यदि माँग पूर्ति की तुलना में अधिक बढ़ती है तो संतुलन कीमत बढ़ेगी। 
  • (ii) यदि मांग तथा पूर्ति में बराबर की वृद्धि होती है तो संतुलन कीमत में कोई परिवर्तन नहीं होगा।
  • (iii) यदि पूर्ति माँग की तुलना में अधिक बढ़ती है तो संतुलन कीमत में कमी होगी।

Economics Class 12 Chapter 5 Questions And Answers In Hindi


Class12th 
Chapter Nameबाजार संतुलन
Chapter numberChapter 5
PART A
Book NCERT
Subjectअर्थशास्त्र | Economics
Medium Hindi | हिंदी
Study Materialsनोट्स & question answer
Download PDFClass 12 economics chapter 5 pdf

कक्षा 12वीं अध्याय 5 नोट्स Economics Class 12 Chapter 5 Questions And Answers In Hindi Easy PDF

अति लघु उत्तरीय प्रश्न (VERY SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS)


1. संतुलन कीमत तथा मात्रा का निर्धारण किस प्रकार किया जाता है ? 

Ans. संतुलन कीमत तथा मात्रा का निर्धारण बाजार माँग तथा बाजार पूर्ति को प्रतिच्छेदन बिंदु पर होता है, जबकि फर्मों की संख्या निश्चित होती है। 

2. कोई फर्म कितने श्रम का नियोजन करेगी ?

Ans. कोई भी फर्म उस बिंदु तक नियोजन करती है जहाँ श्रम की सीमांत आगम उत्पादकत मजदूरी दर के बराबर हो जाती है।

3. माँग तथा पूर्ति वक्रों में एक साथ खिसकाव संतुलन कीमत तथा मात्रा को किस प्रकार प्रभावित करते हैं? 

Ans. माँग तथा पूर्ति वक्रों में एक साथ खिसकाव होने पर संतुलन मात्रा या संतुलन कीमत पर प्रभाव वक्रों के ढाल तथा परिवर्तन के विस्तार पर निर्भर करता है।

4. फर्मों की निर्वाध आवाजाही की स्थिति में संतुलन कीमत का निर्धारण किस प्रकार किया जाता है ?

Ans. जब स्वतंत्र प्रवेश तथा निकासी की अनुमति होती है कीमत सदा फर्मों की न्यूनतर औसत लागत के बराबर होती है। 

5. हम कब कहते हैं कि बाजार में किसी वस्तु की अधिक माँग है ?

Ans. माँग-आधिक्य वहाँ होता है, जहाँ कीमत संतुलन कीमत से कम होती है। 

6. बाजार सन्तुलन का अर्थ लिखो।

Ans. बाजार की वह स्थिति जिसमें दी गई कीमत पर किसी वस्तु की बाजार माँग उसकी बाजार पूर्ति के समान होती है, साम्य कीमत कहलाती है। संतुलन की अवस्था में न तो उपभोक्ता माँग में परिवर्तन करना चाहते हैं और न ही उत्पादक पूर्ति में परिवर्तन करना चाहते हैं।

7. साम्य कीमत का अर्थ लिखो।

Ans. वह कीमत स्तर जिस पर किसी वस्तु की माँगी गई मात्रा व पूर्ति की जाने वाली मात्र दोनों बराबर होती है, साम्य कीमत कहलाती है।

8. साम्य मात्रा पर वक्र में बायीं ओर खिसकाव का प्रभाव लिखो ।

Ans. जब माँग वक्र बायीं ओर खिसकता है तो साम्य मात्रा कम हो जाती है। 

9. माँग व पूर्ति में एक साथ परिवर्तन होने पर साम्य कीमत पर किससे निर्धारित होता है ?

Ans. माँग वक्र व पूर्ति वक्र के ढाल एवं दोनों में खिसकाव की माप के द्वारा साम्य कीमत पर पड़ने वाले प्रभाव का निर्धारण होता है।

10. एक वस्तु का पूर्ति वक्र पूर्णतया लोचदार है और माँग वक्र बायीं ओर खिसक है, क्या साम्य कीमत बदल जायेगी ?

Ans. जब वस्तु का पूर्ति वक्र पूर्णतया लोचदार है और माँग वक्र बायी और माँग वक्र बाय खिसकने पर साम्य कीमत पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

11. जय माँग वक्र पूर्णतया लोचदार हो और पूर्ति दायीं ओर खिसक जाता है तो साम्य पर क्या प्रभाव पड़ेगा ?

Ans. जब माँग वक्र पूर्णतया लोचदार हो और पूर्ति दायीं ओर खिसक जाता है तो साम्य त्रा बढ़ जायेगी।

12. जब माँग वक्र पूर्णतया लोचदार हो और पूर्ति वक्र दायीं ओर खिसक जाए तो साम्य नीमत पर क्या प्रभाव पड़ता है ? 

“Ans. जब माँग पूर्णतया लोचदार हो और पूर्ति वक्र दायीं ओर खिसक जाए तो साम्य कीमत कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

13. यदि किसी वस्तु का माँग वक्र पूर्णतया बेलोचदार हो व पूर्ति वक्र दायीं ओर खसक जाए तो साम्य कीमत पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है ? 

Ans. यदि किसी वस्तु का माँग वक्र पूर्णतया बेलोचदार हो एवं पूर्ति वक्र दायीं ओर खिसक आए तो साम्य कीमत घट जाती है। 

14. यदि किसी वस्तु का माँग वक्र पूर्णतया बेलोचदार हो एवं पूर्ति वक्र दायीं ओर खसक जाए तो साम्य मात्रा पर इसका प्रभाव पड़ेगा बताइए ।

Ans. यदि किसी वस्तु का माँग वक्र पूर्णतया बेलोचदार हो एवं पूर्ति वक्र दायीं ओर खिसक जाए तो साम्य मात्रा अपरिवर्तित रहेगी। 

15. क्या प्रतियोगी वस्तु की कीमत पूर्णप्रतियोगी बाजार में वस्तु की साम्य कीमत को प्रभावित करती है ?

Ans. प्रतियोगी वस्तु की कीमत में वृद्धि होने पर वस्तु का माँग वक्र दायीं ओर खिसक जाता है जिससे साम्य कीमत बढ़ जाती है। इसके विपरीत प्रतिस्थापन वस्तु की कीमत में कमी वस्तु का माँग वक्र बायीं ओर खिसक जाता है जिससे साम्य कीमत कम हो जाती है।


लघु उत्तरीय प्रश्न (SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS


1. लागत बचाने वाली तकनीक साम्य कीमत एवं मात्रा को किस प्रकार से प्रभावित करती है ? समझाइए ।

Ans. लागत बचाने वाली तकनीक का प्रयोग करने से सीमान्त लागत घटने लगती है परिणामस्वरूप पूर्ति में वृद्धि हो जाती है। पूर्ति में वृद्धि होने से पूर्ति वक्र नीचे दायीं ओर खिसक जाता है। साम्य कीमत का स्तर कम हो जाता है परन्तु साम्य मात्रा बढ़ जाती है।

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credit: byjus

2. नियंत्रित कीमत एवं साम्य कीमत में संबंध लिखो । 

Ans. साम्य कीमत वह कीमत स्तर होता है जिस पर किसी वस्तु की माँगी गई बाजार मात्रा उसकी बाजार पूर्ति के बराबर होती है जबकि नियंत्रित कीमत वह कीमत स्तर है जो सरकार द्वारा उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा के लिए तय की जाती है। सरकार कीमत नियंत्रण करने के लिए किसी वस्तु की अधिकतम कीमत तय कर देती है। कीमत नियंत्रण होने पर उत्पादक बाजार में उससे ज्यादे कीमत पर नहीं बेच सकता है।

3. भयंकर सूखे के कारण गेहूं की आपूर्ति में बहुत कमी आ जाती है ? इस घटना गेहूँ की बाजार कीमत पर प्रभाव चित्र द्वारा समझाइए ।

Ans. भयंकर सूखे के कारण गेहूँ की आपूर्ति में बहुत कमी आने का कीमत अभिप्राय है गेहूँ का आपूर्ति वक्र बायीं ओर खिसक जायेगा। इस घटना में गेहूँ P: की कीमत में बहुत बढ़ोत्तरी होगी लेकिन मात्रा कम हो जायेगी। 

4. समर्थन कीमत से किस प्रकार अधिशेष उत्पादन / आपूर्ति किस प्रकार उत्पन्न करती है ? 

Ans. समर्थन मूल्य या न्यूनतम कीमत सरकार द्वारा किसानों या छोटे उत्पादकों के हितों रक्षा के लिए घोषित किया जाता है। समर्थन मूल्य घोषित करने का उद्देश्य किसी विशिष्ट स्तु के उत्पादन को प्रोत्साहन देना होता है। 

सामान्यतः समर्थन मूल्य बाजार कीमत से अधिक ति किया जाता है। कीमत पर उपभोक्ता वस्तु की कम मात्रा क्रय करते हैं तथा उत्पादन ज्यादा जात्रा उत्पन्न करने की इच्छा करते हैं। इसी कारण बाजार में अधिशेष आपूर्ति की स्थिति उत्पन्न जाती है।

5. एक उद्योग अक्षम्यता से क्या अभिप्राय है? 

Ans. बाजार में कभी-कभी यह स्थिति भी हो सकती है कि किसी वस्तु की बाजार नांग शून्य हो जाती है। ऐसा तब हो सकता है। 

जब किसी वस्तु की उत्पादन लागत बहुत ऊँची को उत्पादन लागत बहुत ज्यादा होने से उत्पादक कम कीमत पर वस्तु बेच नहीं सकता है और उपभोक्ता इतनी ऊँची कीमत देने को तैयार नहीं होते हैं। 

इस स्थिति में वस्तु का उत्पादन / आपूर्ति नहीं होती है। माँग वक्र पूर्ति विनिमय की किसी धनात्मक मात्रा पर नहीं काटते हैं।

6. आय में कमी से साम्य कीमत एवं मात्रा पर प्रभाव समझाइए । 

Ans. आय में कमी का साम्य कीमत एवं साम्य मात्रा पर प्रभाव वस्तु की प्रकृति पर निर्भर करता है। जैसे-

(i) सामान्य वस्तु-आय में कमी होने पर सामान्य वस्तु की मांग घट जाती है। सामान्य | वस्तु का माँग पक उपभोक्ता की आय कम होने पर बायीं ओर खिसक जाता है। इससे कीमत तथा साम्य मात्रा दोनों घट जाते है। इसे नीचे चित्र में दर्शाया गया है।

(i) घटिया वस्तु-आय में कमी होने पर घटिया वस्तु की माँग में वृद्धि हो जाती है। घटिया वस्तु का माँग, उपभोक्ता की आय कम होने पर दायीं ओर खिसक जाता है। साम्य कीमत द साम्य मात्रा दोनों में वृद्धि हो जाती है। इस प्रभाव को नीचे चित्र में दर्शाया गया है।

7. आपूर्ति वक्र में खिसकाव के लिए उत्तरदायी कारक लिखिए।

Ans. आपूर्ति वक्र में खिसकाव के लिए उत्तरदायी कारक- 

(i) उत्पादन में प्रयुक्त साधनो की कीमत में परिवर्तन। (ii) उत्पादन तकनीक में परिवर्तन। 

(iii) फर्मों की संख्या में परिवर्तन। 

(iv) संबंधित वस्तु की कीमत में परिवर्तन 

(v) उत्पादन शुल्क की दर में परिवर्तन। 

(vi) प्राकृतिक कारकों में परिवर्तन।

8. माँग वक्र में खिसकाव के लिए उत्तरदायी कारक लिखें।

Ans. वस्तु की कीमत के अलावा अन्य वे सभी कारक जो वस्तु की माँग को प्रभावित करते हैं भौग चक में खिसकाव के लिए उत्तरदायी होते हैं। 

जैसे- 

(i) संबंधित वस्तु की में परिवर्तन। 

(ii) उपभोक्ता की आय में परितर्वन। 

(iii) उपभोक्ता की रुचि एवं अभिरुचि में परिवर्तन 

(iv) उपभोक्ताओं की संख्या में परिवर्तन। 

9. किसी वस्तु के पूर्ति वक्र में दायी ओर खिसकाव के लिए उत्तरदायी कारक लिखो।

Ans. वस्तु की कीमत के अलावा वे सभी कारक जो किसी वस्तु की पूर्ति में वृद्धि करते है. पूर्ति वल में पानी और खिसका पैदा करते हैं। उनमें से कुछ कारक निम्नलिखित है- 

(i) उत्पादन तकनीक में प्रगति।

(ii) फर्मों की संख्या में वृद्धि।

(iii) उत्पादन शुल्क की दर में कमी।

(iv) वस्तु के उत्पादन में प्रयुक्त साधनों की कीमत में कमी।

(v) प्राकृतिक कारकों में अनुकूल परिवर्तन । 

10. वस्तु के माँग वक्र में बायीं ओर खिसकाव के लिए उत्तरदायी कारक लिखें। 

Ans. वस्तु की कीमत के अलावा वे सभी कारक जो वस्तु की माँग में कमी उत्पन्न करते है माँग वक्र में बायीं और खिसकाव पैदा करते हैं। उनमें से कुछ कारक नीचे दिए गए हैं-

(i) पूरक वस्तु की कीमत में वृद्धि । 

(ii) वस्तु की प्रतिस्थापन वस्तु की कीमत में कमी।

(iii) उपभोक्ता की रुचि अभिरुचियों में प्रतिकूल परिवर्तन।

(iv) जलवायु व मौसम में प्रतिकूल परिवर्तन। 

11. यदि सरकार बाजार मजदूरी दर से न्यूनतम मजदूरी ऊंची तय करती है तो इसका बाजार पर क्या प्रभाव पड़ेगा

Ans. यदि सरकार न्यूनतम मजदूरी दर का निर्धारण बाजार मजदूरी दर से ऊपर तय करती है तो इसका बाजार पर निम्नलिखित प्रभाव पड़ेगा-

(i) यदि सरकार मजदूरी नीति को सख्ती से लागू करती है तो श्रमिकों को बाजार से ऊँची मजदूरी दर प्राप्त होगी।

(ii) ऊँची मजदूरी दर पर आपूर्ति की तुलना श्रम की माँग कम होगी। इससे श्रम बाजार में बेरोजगारी की समस्या उत्पन्न होगी।

(ii) काम करने की विवशता के कारण कुछ बेरोजगार श्रमिक नीची मजदूरी दर पर काम करने को तैयार हो जाते हैं। श्रमिक वास्तव में ऊँची मजदूरी दर पर हस्ताक्षर करते हैं और वास्तव में पाते हैं कम मजदूरी। इससे श्रम बाजार में कालाबाजारी जन्म लेती है। 

12. यदि सरकार वस्तु की कीमत का नियंत्रण बाजार कीमत से कम करती है तो इसके बाजार पर क्या प्रभाव पड़ेंगे ?

Ans. यदि सरकार नियंत्रित कीमत का स्तर, बाजार कीमत से कम तय करती है तो इसके बाजार पर निम्नलिखित प्रभाव होंगे-

(i) बाजार कीमत से कम नियंत्रित कीमत पर उपभोक्ता वस्तु की अधिक मात्रा में माँग करेंगे तथा उत्पादक कम मात्रा में पूर्ति करेंगे इससे बाजार में वस्तु की स्वल्पता की समस्या उत्पन्न हो जायेगी। 

(iv) राशनिंग प्रणाली लागू होने पर रिश्वतखोरी, जमाखोरी, कालाबाजारी जैसी समस्या पनपने लगती है।

(ii) स्वल्पता की समस्या से “पहले आओ पहले पाओ” या “जिसकी लाठी उसकी भैंस” 

(iii) दूसरे क्रम पर स्थित समस्या से बचने के लिए सरकार राशनिंग प्रणाली लागू कर सकती है।

13. समर्थन कीमत का बाजार पर प्रभाव लिखें । 

Ans. सामान्य सरकार जो समर्थन मूल्य घोषित करती है उसका स्तर बाजार कीमत से ऊपर होता है। इससे बाजार में निम्नलिखित प्रभाव उत्पन्न होते हैं- 

(i) बाजार कीमत से ऊपर समर्थन कीमत पर बाजार में वस्तु की आपूर्ति उसकी माँग की तुलना में ज्यादा हो जाती है। इससे बाजार में अधिशेष उत्पादन की समस्या पैदा हो जाती है।

(ii) अधिशेष उत्पादन की स्थिति में उत्पादक बाजार में सम्पूर्ण उत्पादन नहीं बेच पाते हैं बल्कि सरकार को उस अधिशेष उत्पादन को क्रय करने की व्यवस्था करनी पड़ती है। 

(iii) अधिशेष उत्पादन को क्रय करके सरकार बफर स्टॉक बनाती है। 

(iv) उपभोक्ताओं को न्यायोचित कीमत पर उपलब्ध कराने के लिए सरकार को आर्थिक सहायता की व्यवस्था करनी पड़ती है। 

14. बाजार कीमत व सामान्य कीमत में अन्तर स्पष्ट करें। 

Ans

बाजार कीमत सामान्य कीमत
(i) बाजार कीमत का संबंध अल्पकाल से  ज्यादा होती है।(i) सामान्य कीमत का ज्यादा संबंध दीर्घकाल से होता है।
(ii) साम्य कीमत के निर्धारण में माँग पक्ष की भूमिका ज्यादा होती है।(ii) सामान्य कीमत के निर्धारण में पूर्ति पक्ष की भूमिका ज्यादा अहम होती है। 
(iii) बाजार कीमत माँग व पूर्ति की अस्थायी शक्तियों के साम्य द्वारा तय होती है।(iii) सामान्य कीमत माँग व पूर्ति के स्थायी शक्तियों के सन्तुलन से तय होती है। 
(iv) बाजार कीमत का संबंध मानव निर्मित व प्राकृतिक सभी प्रकार की वस्तु से होता है।(iv) सामान्य कीमत का संबंध केवल मानव निर्मित वस्तुओं से होता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (LONG ANSWER TYPE QUESTIONS)


1. पूर्ण प्रतियोगी बाजार में जब फर्मों का निर्वाध प्रवेश तथा निकासी हो रही हो, किसी फर्म के संतुलन का निर्धारण किस प्रकार होता है ? Or, ऐसे बाजार में फर्मों की संतुलन संख्या का निर्धारण कैसे होता है, जिसमें फर्मों के प्रवेश तथा निकास की स्वीकृति हो ।

Or, पूर्ण प्रतियोगी बाजार में फर्मों कीमत के किस स्तर पर पूर्ति करती हैं, जब बाजार में स्वतंत्र प्रवेश तथा निकास की अनुमति हो ? ऐसे बाजार में संतुलन मात्रा का निर्धारण किस प्रकार होता है?

Ans. ऐसा बाजार जिसमें फर्मों का निर्वाध प्रवेश तथा निकासी हो, ऐसे बाजार में भिन्न होता है जहाँ फर्मों की संख्या निश्चित होती है। ऐसे बाजार में कोई फर्म हमेशा उस कीमत पर पूर्ति करेगी, जहाँ किसी भी फर्म को असामान्य लाभ प्राप्त होता है। 

यदि एक फर्म असामान्य लाभ प्राप्त करती है, कुछ अन्य फर्मों ही बाजार में प्रवेश करेंगी। इससे पूर्ति में वृद्धि होती है, जो कीमत को गिरा देती है। इस प्रकार यह उस स्तर पर पहुँच जाती है, जहाँ फर्म को केवल सामान्य लाभ प्राप्त होता है। 

दूसरी तरफ, यदि किसी फर्म को सामान्य लाभ नहीं प्राप्त हो रहा है, यही वे प्रतिस्पर्धा से बाहर हो जायेगी। सामान्य लाभ की स्थिति में कीमत = AC का न्यूनतम (औसत लागत) । 

कीमत तथा AC का न्यूनतम बराबर होते हैं। बाजार में पूर्ण प्रतियोगिता के कारण, उत्पादन

की बिक्री के प्रत्येक स्तर पर कीमत वही रहती है। यही नहीं, AC का न्यूनतम फर्मों की संख्या से प्रभावित नहीं होता। इसलिए AC वक्र का न्यूनतम एक सीधी क्षैतिज रेखा होती है। 

चूंकि AC का न्यूनतम तथा कीमत बराबर है, वे एक एकल सीधी क्षैतिज रेखा के रूप में होते हैं जैसा कि चित्र (i) में दिखाया गया है। DD नीचे की ओर डाल वाला वक्र है। संतुलन मात्रा OY, होगी तथा फर्मों की कुल संख्या OY को AC के न्यूनतम से भाग देने पर प्राप्त होगी।

Q 2. एक पूर्ण प्रतियोगी बाजार में मजदूरी दर का निर्धारण कैसे किया जाता है ?

Ans. कीमत- निधारण संयंत्र माँग पर निर्भर है तथा पूर्ति की शक्तियाँ भी श्रम बाजार में जदूरी दर निर्धारण में लागू होती है। अंतर इस तथ्य में है कि श्रम तथा श्रम की पूर्ति के साधन सरे कारकों की माँग और पूर्ति से अलग हैं। श्रम की पूर्ति परिवार से आती है तथा श्रम की फर्मों से आती है। जो श्रम को रोजगार देती है। 

मजदूरी दर वहाँ निर्धारित होती है जहाँ नम की सफल माँग, श्रम की सकल पूर्ति के बराबर है। अब हमें यह रखना है कि हम श्रम की मांग तथा श्रम की पूर्ति कैसे प्राप्त करते हैं। Y श्रम की मांग-उत्पादन प्रक्रिया में उनके योगदान के कारण श्रमिकों की माँग की जाती है। श्रम बाजार जैसा कि दिया गया है,

प्रत्येक फर्म रोजगार लेती श्रम की अंतिम (अतिरिक्त) इकाई का योगदान म का सीमांत भौतिक उत्पाद (Mpp) कहलाता है। इसे श्रम की अंतिम इकाई के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। MPP, वक्र जैसा कि चित्र (i) में दिखाया गया है, नीचे की तरफ ढालू होता है ऐसा इसलिए है क्योंकि यदि श्रम की अधिकाधिक इकाइयाँ नियोजित करते जाते हैं, सीमांत उत्पाद जो हम एक के बाद एक इकाई से प्राप्त करते हैं, जैसे गिरता जाता है।

MPP, श्रम के सीमांत उत्पाद का एक भौतिक माप है। यदि हम MPP को MR से गुणा करें, तो हमें MRP प्राप्त होता है। यदि MPP का मौद्रिक रूप है। हमने यह मान लिया है कि उत्पादन बाजार में पूर्ण प्रतियोगिता है। जैसे कि MR तथा AR बराबर हैं, इसलिए- MRP = MPp x MR = MPP × AR

परंतु MPP x AR सीमांत उत्पाद का मूल्य (VMP) है, इसलिए- MRP=VMP सभी फर्मों के VMP को जोड़कर हम बाजार का सकल VMP प्राप्त कर सकते हैं। श्रम-कर्म का संतुलन-मजदूरी किसी फर्म द्वारा दी जाती है। इसलिए, मजदूरी-रेखा एक वीतिज सीधी रेखा है, जैसा कि चित्र में दिखाया गया है। 

कोई भी फर्म VMP से ज्यादा भुगतान नहीं कर सकती। इसलिए कोई फर्म उतने श्रम को नियोजित करती है जहाँ मजदूरी = VMP चित्र (ii) में संतुलन बिंदु E है, जहाँ श्रम की नियोजित इकाइयाँ OY है।

श्रम की पूर्ति परिवार इस बात का निर्धारण करता है कि किसी दी हुई मजदूरी पर कितने श्रम की पूर्ति की जानी है। 

उनकी पूर्ति का निर्णय निश्चित रूप से आय तथा खाली समय के बीच का चुनाव है। आमतौर पर यह माना जाता है कि मजदूरी में बढ़ोत्तरी के साथ कोई भी व्यक्ति अधिक श्रम लगाता है, परंतु यह हमेशा सत्य नहीं होता। ऊँची मजदूरी दरों पर लोग काम कम तथा आराम अधिक करना पसंद कर सकते हैं। 

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3. सरकार न्यूनतम कीमत कब निर्धारित करती है ? इस नीति के क्या आर्थिक प्रभाव हैं ?

Ans. उत्पादकों के हितों को ध्यान में रखकर कई बार सरकार को न्यूनतम कीमत अथवा आरक्षण कीमत (Reserve Price) की नीति को अपनाना पड़ता है। इस प्रकार की नीति से उत्पादकों को प्रोत्साहन मिलता है। ऐसी नीति उस समय अपनाई जाती है। जब बाजार कीमत या साम्य-कीमत बहुत ही कम होती है। न्यूनतम कीमत के अन्तर्गत उत्पादकों को प्रत्येक स्थिति में निर्धारित कीमत अवश्य मिलती है। यदि न्यूनतम कीमत बाजार कीमत से कम होती है तो ऐसी स्थिति में न्यूनतम कीमत-नीति सारहीन होती है।

न्यूनतम कीमत के निर्धारण से उत्पन्न समस्याओं का विवेचन चित्र की सहायता से किया जा सकता है। चित्रानुसार माँग और पूति की सहायता से निर्धारित कीमत OP और मात्रा OQ है। परन्तु किसानों (उत्पादकों) की दृष्टि से यह कीमत बहुत कम है। सरकार किसानों के हितों को ध्यान में रखकर OP, न्यूनतम कीमत निर्धारित कर देती है

 जो कि प्रत्येक स्थिति में किसानों को अवश्य मिलनी चाहिए। न्यूनतम कीमत के बाजार कीमत से अधिक होने के कारण माँग घटकर OQ, और पूर्ति बढ़कर 0Q, और पूर्ति बढ़कर 0Q, हो जाती है और इस प्रकार 2 के समान वस्तु की मात्रा अतिरिक्त (Surplus) हो जाती है। इस आधिक्य की समस्या से निपटने के लिए या तो सरकार भविष्य के लिए बफर स्टॉक बनाने के लिए स्वयं खरीद करती है या विदेशों को निर्यात कर देती है। समस्या के दीर्घकालिक समाधान के लिए सरकार किसानों के

लिए अनाज कोटा भी निर्धारित कर सकती है ताकि साम्य मात्रा OQ ही हो और अतिरेक (Surplus) की समस्या उत्पन्न न हो। 

5. श्रम बाजार में मजदूरी दर का निर्धारण समझाइए । 

Ans. श्रम बाजार में मजदूरी दर का निर्धारण श्रम की माँग व पूर्ति की शक्तियों के द्वारा होता है। परिवार क्षेत्र श्रम की आपूर्ति करता है तथा श्रम की माँग उत्पादक करते हैं। श्रम से अभिप्राय श्रमिकों की संख्या से न होकर श्रम के घंटों से होता है। जहाँ श्रम माँग व पूर्ति वक्र एक-दूसरे को काटते हैं मजदूरी दर का निर्धारण उसी बिन्दु पर होता है।

फर्म लाभ को अधिकतम करने का प्रयास करती है। अतः फर्म उस इकाई तक श्रम का नियोजन करती है। जिस पर श्रम की अतिरिक्त लागत तथा श्रम के नियोजन से प्राप्त अतिरिक्त लाभ दोनों समान हो जाते हैं। श्रम की इकाई को नियोजित करने की अतिरिक्त लागत श्रम की मजदूरी दर होती है तथा श्रम के नियोजन से प्राप्त अतिरिक्त लाभ श्रम की सीमान्त आगम उत्पादकता के समान होता है। अतः फर्म निम्नलिखित शर्त तक श्रम का नियोजन बढ़ाती है- मजदूरी दर = श्रम की सीमान्त आगम उत्पादकता

W = MRP 2 जहाँ MRP MR MP2

जब तक MRP का मूल्य मजदूरी दर से ज्यादा होता है फर्म को श्रम का नियोजन बढ़ाना लाभकारी रहता है। जब MRP का मूल्य मजदूरी दर से कम होता है तो श्रम का नियोजन करना फर्म के लिए हानिकारक रहता है। 

6. सरकार अधिकतम कीमतें कब निर्धारित करती है ? इनके आर्थिक प्रभाव क्या हैं? 

Ans. कई बार वस्तुओं की पूर्ति में कमी के कारण कीमतें बहुत ऊंचे निर्धारित हो जाती है। इससे सामान्य आय के उपभोक्ता को आवश्यक वस्तुएं भी प्राप्त करने में बड़ी कठिनाई होती। है। ऐसी स्थिति युद्ध काल में या किसी कारण उत्पादन में कमी होने के कारण उत्पन्न होती है। ऐसे समय में सरकार स्वतन्त्र बाजार में माँग और पूर्ति द्वारा निर्धारित कीमत के स्थान पर एक अधिकतम कीमत निर्धारित कर देती है। इस निर्धारित कीमत से अधिक कीमत उत्पादन लोग प्राप्त नहीं कर सकते। 

यह अधिकतम कीमत प्रायः बाजार से कम होती है। अधिकतम कीमत द्वारा उत्पन्न समस्याओं का विश्लेषण चित्र द्वारा किया गया है। माँग पूर्ति की शक्तियों द्वारा कीमत OP और वस्तु की मात्रा OQ P निर्धारित होती है। OP कीमत अधिक होने के कारण मानों सरकार OP, अधिकतम कीमत निर्धारित कर P, देती है। इसके कारण माँग बढ़कर OQ, और पूर्ति घटकर OQ हो जाती है और इस प्रकार 2,02 वस्तु की मात्रा माँग से कम पड़ जाती है। 

अधिकतम निर्धारित कीमत पर माँग अधिक और पूर्ति कम है। स्पष्ट है इससे अधिक उपभोक्ताओं में सीमित पूर्ति को समायोजित करने की समस्या उत्पन्न हो जाती है। इसके कई उपाय है। प्रथम, फुटकर विक्रेताओं को यह छूट दे दी जाए कि वे किन उपभोक्ताओं को बेचना चाहते हैं। दूसरे, पहले आओ पहले पाओ, (First come first served) की अपनाया जाए। परन्तु ये समस्या के न्यायोचित एवं संतोषजनक समाधान नहीं।

राशनिंग एवं काला बाजार ऐसी स्थिति में सरकार राशनिंग की नीति को अपनाती है। इस नीति के अन्तर्गत प्रत्येक व्यक्ति का कोटा निर्धारित होता है जिससे अधिक वह वस्तु प्राप्त नहीं कर सकता है। राशनिंग के द्वारा वस्तु की सीमित पूर्ति का सभी में न्यायोचित वितरण हो जाता है। यह एक अच्छी नीति है। 

यदि राशनिंग की या अन्य नीतियाँ सफल नहीं होती तो काले बाजार की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। काले बाजार से अभिप्राय बाजार की उस स्थिति से है। जब उपभोक्ताको अधिकतम निर्धारित कीमत से अधिक कीमत चुकानी पड़ती है। चित्र के अनुसार अधिकतम कीमत OP है। यदि उपभोक्ता को OP, से अधिक कीमत देनी पड़े तो काते बाजार की स्थिति का सूचक हैं। इसका तात्पर्य है कि सरकार की मूल्य नियंत्रण नीति असफल रही।


CLASS 12 NCERT SOLUTION IN ENGLISHCLASS12 NCERT SOLUTION IN HINDI
Historyइतिहास
Geography भूगोल
Political science राजनीति विज्ञान
English SubjectResult
Hindi SubjectHistory answer keys
Sociology समाज शास्त्र

FAQs


Q. समर्थन कीमत का अर्थ लिखो।

Ans. छोटे उत्पादकों, किसानों आदि के हितों की रक्षा के लिए सरकार द्वारा किसी उत्पाद कि घोषित मूल्य जय करती है। को समर्थन मूल्य कहते हैं। प्रायः समर्थन मूल्य सरकार बाजार मूल्य से ज्यादा

Q. अक्षम्य (non-viable) उद्योग का अर्थ बताओ। 

Ans. वह उद्योग जिसके बाजार माँग वक्र तथा पूर्ति वक्र एक-दूसरे को नहीं काटते हैं उसे अक्षम्य उद्योग कहते हैं।

Q. अक्षम्य (non-viable) उद्योग में माँग वक्र व पूर्ति वक्र एक-दूसरे को क्यों नहीं काटते हैं? 

Ans. इस प्रकार के उद्योग में उत्पादन लागत बहुत ज्यादा होती है अतः माँग वक्र व पूर्ति वक्र एक-दूसरे को नहीं काटते हैं।


कक्षा 12 अर्थशास्त्र एनसीईआरटी नोट्स


  1. व्यष्टि अर्थशास्त्र
  2. उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत
  3. उत्पादन तथा लागत
  4. पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत
  5. बाजार संतुलन
  6. प्रतिस्पर्धारहित बाजार
  1. परिचय
  2. राष्ट्रीय आय का लेखांकन
  3. मुद्रा एवं बैंकिंग
  4. आय का निर्धारण
  5. सरकार: कार्य और विषय क्षेत्र
  6. खुली अर्थव्यवस्था: समष्टि अर्थशास्त्र

वस्तुनिष्ठ प्रश्न MCQs


  1. व्यष्टि अर्थशास्त्र
  2. उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत
  3. उत्पादन तथा लागत
  4. पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत
  5. बाजार संतुलन
  6. प्रतिस्पर्धारहित बाजार
  1. परिचय
  2. राष्ट्रीय आय का लेखांकन
  3. मुद्रा एवं बैंकिंग
  4. आय का निर्धारण
  5. सरकार: कार्य और विषय क्षेत्र
  6. खुली अर्थव्यवस्था: समष्टि अर्थशास्त्र

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