अर्थशास्त्र-II कक्षा 12वीं अध्याय 1 नोट्स | Economics-II Class 12 Chapter 1 Questions And Answers In Hindi Easy PDF

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अर्थशास्त्र-II कक्षा 12वीं अध्याय 1 नोट्स | Economics-II Class 12 Chapter 1 Questions And Answers In Hindi Easy PDF, अर्थशास्त्र-II कक्षा 12वीं अध्याय 1 नोट्स & Questions And Answers In Hindi | Economics-II Class 12 Chapter 1 Questions And Answers In Hindi


अर्थशास्त्र-II कक्षा 12वीं अध्याय 1 नोट्स


अंग्रेजी भाषा का Macro शब्द ग्रीक भाषा के मैक्रोस (Makros) से लिया गया है जिस अर्थ है-‘बड़ा’ (Large)। अतएव समष्टि अर्थशास्त्र में आर्थिक समस्याओं का सारी अर्थव्यवस के दृष्टिकोण से अध्ययन किया जाता है। 

इस प्रकार, समष्टि अर्थशास्त्र को अर्थशास्त्र की उ शाखा के रूप में परिभाषित किया जाता है जो कि समस्त अर्थव्यवस्था के स्तर पर आर्थिक प्र या आर्थिक समस्याओं का अध्ययन करती है। (Macro economics is defined as the branch of economics which studies economic issues or economic problems= the level of an economy as a whole.) जैसे- बेरोजगारी की समस्या, मुद्रा स्फीति = समस्या, मंदी की समस्या इत्यादि। यह समस्त अर्थव्यवस्था के स्तर पर आर्थिक चरों पर प्रक डालती है। 

जैसे सकल माँग, सकल पूर्ति, सामान्य कीमत स्तर, राष्ट्रीय आय इत्यादि। ये सम आर्थिक चर (Macro economic Variables) कहलाते हैं। इसलिए, समष्टिगत/सम अर्थशास्त्र में संसाधनों के पूर्ण रोजगार तथा अर्थव्यवस्था की पूर्ण प्रणाली पर विचार किया ज है। दूसरे शब्दों में, यह सामान्य से विशेष तक का अध्ययन है। इस प्रकार विकास, रोजग

कीमत, मुद्रा आदि की समस्याएँ इसके कुछ उदाहरण हैं। समष्टिगत अर्थशास्त्र में किसी विशेष विचार पर बल नहीं दिया जाता, बल्कि समस्त दिवा के समूह पर बल दिया जाता है। यह संपूर्ण रूप से आर्थिक प्रणाली है, इसलिए इसे सामूहि अर्थशास्त्र (Aggregative Economics) भी कहा जाता है ।।


प्रमुख स्मरणीय तथ्य


समष्टि अर्थशास्त्र (Macro economics) : समष्टि अर्थशास्त्र अर्थशास्त्र, की वह है जिसमें समस्त अर्थव्यवस्था के स्तर पर आर्थिक समस्याओं (या आर्थिक विषयों) अध्ययन किया जाता है। 

क्लासिकी विचारधारा (The Classical School of Thought) : क्लासिकी दिवास स्वतंत्र अर्थव्यवस्था में पूर्ण रोजगार को एक सामान्य स्थिति मानती है। जो कि स्वतः बनी रहती है।

केन्जियन विचारधारा (The Keynesian School of Thought) : केन्जियन विचारसर पूर्ण रोजगार को अर्थव्यवस्था की सामान्य स्थिति नहीं मानती है। इसके अनुसार आदि समस्याओं के समाधान के लिए सरकारी हस्तक्षेप आवश्यक है।

व्यष्टि अर्थशास्त्र तथा समष्टि अर्थशास्त्र की परस्पर निर्भरता (Interdependent between Microeconomics and Macroeconomics): व्यष्टि अर्थशास्त्र ए समष्टि अर्थशास्त्र स्वतंत्र नहीं है। वे परस्पर निर्भर हैं। व्यष्टि निर्भरता का उदाहरण (Example of Micro Dependence) एक  बेरोज किया जाने वाला निवेश अर्थव्यवस्था में किए जाने वाले समस्त निवेश पर निर्भर करता है।



Economics-II Class 12 Chapter 1 Questions And Answers In Hindi


Class12th 
Chapter NameINTRO
Chapter numberChapter 1
PART B
Book NCERT
Subjectअर्थशास्त्र | Economics
Medium Hindi | हिंदी
Study Materialsनोट्स & question answer
Download PDFClass 12 economics-II chapter 1 pdf
II कक्षा 12वीं अध्याय 1 नोट्स Economics II Class 12 Chapter 1 Questions And Answers In Hindi Easy PDF

अति लघु उत्तरीय प्रश्न (VERY SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS)


1. व्यष्टि अर्थशास्त्र में किन समस्याओं का अध्ययन किया जाता है ?

Ans. व्यष्टि अर्थशास्त्र में विशिष्ट अथवा व्यक्तिगत स्तर पर आर्थिक समस्याओं क अध्ययन किया जाता है। 

2. समष्टि अर्थशास्त्र में किन आर्थिक इकाइयों का अध्ययन किया जाता है? 

Ans. सामूहिक या वृहत स्तर पर आर्थिक चरों का अध्ययन समष्टि अर्थशास्त्र में किया जाता है।

3. पूर्ण रोजगार का अर्थ लिखें।

Ans. वह स्थिति जिसमें सभी इच्छुक व्यक्तियों को उनकी रुचि एवं योग्यतानुसार मजदूरी दर पर कार्य करने का अवसर प्राप्त हो जाता है पूर्ण रोजगार की स्थिति कहलाती है । 

4. रोजगार के परंपरावादी सिद्धान्त का अर्थ लिखें। 

Ans. रोजगार के परंपरावादी सिद्धान्त के अनुसार पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में प्रचलित मजदू दर पर सदैव पूर्ण रोजगार की स्थिति रहती है। 

5. समष्टि अर्थशास्त्र का विरोधाभास क्या है ?

Ans. समष्टि अर्थशास्त्र का विरोधाभास यह है कि जो बात एक व्यक्तिगत आर्थिक के बारे में सत्य होती है आवश्यक नहीं कि सामूहिक आर्थिक घरों के बारे में भी सत्य हो।

6. स्वतंत्र आर्थिक घरों का अर्थ लिखें।

Ans. वे आर्थिक चर जो दूसरे किसी आर्थिक चर/चरों को प्रभावित करता है स्वतंत्र आर्थिक चर कहलाते हैं। जैसे राष्ट्रीय आय आदि ।

7. आश्रित आर्थिक चर का अर्थ लिखें। 

Ans. वह आर्थिक चर दूसरे किसी आर्थिक चर से प्रभावित होता है आश्रित चर कहलाता है। जैसे उपभोग, बचत आदि।

8. समष्टि अर्थशास्त्र के घरों के उदाहरण लिखिए । 

Ans. समष्टि चरों के उदाहरण-

(i) सामूहिक माँग (ii) सामूहिक पूर्ति (iii) रोजगार सामान्य कीमत स्तर आदि ।। 

9. ‘से’ का नियम क्या है ?

Ans. ‘से’ का नियम बताता है कि किसी वस्तु की आपूर्ति उसकी मांग की स्वयं जननी होती है। 10. 1929-1933 की अवधि में महामंदी के मुख्य बिन्दु लिखें ।

Ans. आर्थिक महामंदीकाल में बाजारों में वस्तुओं की आपूर्ति उपलब्ध थी लेकिन वहाँ मांग की कमी की समस्या थी और बेरोजगारी का स्तर भी बढ़ गया था। 

11. चार परंपरावादी अर्थशास्त्रियों के नाम लिखें।

Ans. चार परंपरावादी अर्थशास्त्री- (i) डेविड रिकार्डो, (ii) जे. बी. से, (iii) जे. एस. मिल तथा (iv) आल्फ्रेड मार्शल।

12. अन्तःक्षेपण का अर्थ लिखिए । 

Ans. वे आर्थिक क्रियाएँ जिनसे राष्ट्रीय आय में बढ़ोतरी होती है अन्तःक्षेपण कहलाती है। जैसे निवेश, उपभोग आदि । 


लघु उत्तरीय प्रश्न (SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS)


1. संक्षेप में पूर्ण रोजगार की अवधारणा को स्पष्ट करें।

Ans. वह स्थिति जिसमें एक अर्थव्यवस्था में सभी इच्छुक लोगों को दी गई या प्रचलित मजदूरी दर पर योग्यतानसार आसानी से कार्य मिल जाता है पूर्ण रोजगार कहलाती है। परंपरावादी अर्थशास्त्री जे. बी. से का पूर्ण रोजगार के बारे में अलग विचार था। परंपरावादी रोजगार सिद्धान्त के अनुसार पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में सदैव पूर्ण रोजगार की स्थिति होती है क्योंकि प्रचलित मजदूरी पर काम करने के इच्छुक सभी व्यक्तियों को आसानी से काम मिल जाता है।

जे. एम. कीन्स के अनुसार आय के सन्तुलन स्तर पर रोजगार स्तर को साम्य रोजगार स्तर कहते हैं। आवश्यक रूप से साम्य रोजगार का स्तर पूर्ण रोजगार स्तर के समान नहीं होता है। साम्य रोजगार का स्तर यदि पूर्ण रोजगार स्तर से कम होता है तो अर्थव्यवस्था में बेरोजगारी की समस्या रहती है। परंपरावादी अर्थशास्त्री साम्य रोजगार को ही पूर्ण रोजगार कहते थे।

2. समष्टि अर्थशास्त्र में संरचना की भ्रान्ति को स्पष्ट करें। 

Ans. समष्टि अर्थशास्त्र में समूहों की अध्ययन किया जाता है। इस अध्ययन में समूह की इकाइयों में बहुत अधिक विषमता पायी जाती है। समूह की इकाइयों की विषमता को पूरी तरह से अनदेखा किया जाता है। 

इस विषमता के कारण कई भ्रान्तियाँ पैदा हो जाती है। जैसे पूँजी वस्तुओं की कीमत गिरने से सामान्य कीमत स्तर गिर जाता है। 

लेकिन दूसरी ओर खाद्यान्नों की बढ़ती हुई कीमतें उपभोक्ताओं की कमर तोड़ती रहती है। लेकिन सरकार आँकड़ों की मदद से सामान्य कीमत स्तर को घटाने का श्रेय बटोरती है।

3. सामूहिक माँग का अर्थ लिखिए।

Ans. दी गई अवधि में एक अर्थव्यवस्था में सभी वस्तुओं एवं सेवाओं की मांग के योग को कुल मांग या सामूहिक माँग कहते हैं। अर्थव्यवस्था में वस्तुओं की माँग उपभोग तथा निवेश के लिए की जाती है। इस प्रकार वस्तुओं की उपभोग के लिए माँग तथा निवेश के लिए माँग के योग को भी सामूहिक मांग कह सकते हैं। संक्षेप में-

सामूहिक माँग = उपभोग + निवेश सामूहिक माँग के संघटकों को निम्न प्रकार से भी लिखा जा सकता है-.

(i) निजी अन्तिम उपभोग व्यय. 

(ii) सार्वजनिक अन्तिम उपभोग व्यय

(ii) सकल घरेलू पूँजी निर्माण

(iv) शुद्ध निर्यात

4. समष्टि अर्थशास्त्र की अवधारणा संक्षेप में स्पष्ट करें। 

Ans. समष्टि अर्थशास्त्र का संबंध सामूहिक या समष्टीय आर्थिक चरों से है। दूसरे शब्दों में अर्थशास्त्र की इस शाखा में सामूहिक या समष्टि आर्थिक चरों का अध्ययन किया जाता है। अर्थशास्त्र की समष्टि शाखा में आय एवं रोजगार निर्धारण, पूँजी निर्माण, सार्वजनिक व्यय, सरकारी व्यय, सरकारी बजट, विदेशी व्यापार आदि विषयों का हुआ है। इस शाखा को आय एवं रोजगार सिखाना के रूप में भी जाना जाता है।

5. व्यष्टि अर्थशास्त्र की अवधारणा को संक्षेप में समझाइए । 

Ans. व्यष्टि अर्थशास्त्र का संबंध विशिष्ट या व्यक्तिगत आर्थिक चरों से है। दूसरे शब्दों में अर्थशास्त्र की इस शाखा में विशिष्ट आर्थिक इकाइयों या व्यक्तिगत आर्थिक इकाइयों के व्यवहार का अध्ययन किया जाता है। 

6. समष्टि आर्थिक चरों के उदाहरण लिखिए।

Ans. समष्टि अर्थशास्त्र अर्थव्यवस्था को इकाई मानकर सामूहिक आर्थिक चरों का विश्लेषण करता है। समष्टि अर्थशास्त्र का क्षेत्र अधिक व्यापक है। निम्नलिखित आर्थिक चरों का इस शाखा में अध्ययन किया जाता है-

(i) सामूहिक मांग

(ii) सामूहिक पूर्ति

(iii) सकल घरेलू पूँजी निर्माण

(iv) स्वायत्त एवं प्रेरित निवेश

(vi) औसत उपभोग एवं बचत प्रवृति

(v) निवेश गुणांक

(vii) सीमान्त उपभोग एवं बचत प्रवृति 

(viii) पूँजी की सीमान्त कार्य क्षमता

7. रोजगार का परंपरावादी सिद्धान्त समझाइए । 

Ans. रोजगार के परंपरावादी सिद्धान्त का प्रतिपादन परंपरावादी अर्थशास्त्रियों ने किया था। 

इस सिरान्त के अनुसार एक पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में प्रत्येक इच्छुक व्यक्ति को प्रचलित मजदूरी पर उसकी योग्यता एवं क्षमता के अनुसार आसानी से रोजगार की स्थिति होती है। काम करने के इच्छुक व्यक्तियों के लिए दी गई मजदूरी दर पर बेरोजगारी की कोई समस्या उत्पन्न नहीं होती है। 

रोजगार के परंपरावादी सिद्धान्त को बनाने में डविड रिकार्डों, पीगू, मार्शल आदि व्यष्टि अर्थशास्त्रियों ने योगदान दिया है। रोजगार के परंपरावादी सिद्धान्त में जे. बी. से का रोजगार सिद्धान्त बहुत प्रसिद्ध है।

8. परंपरावादी रोजगार सिद्धान्त की मान्यताएँ लिखिए।

Ans. आय एवं रोजगार का परंपरावादी सिद्धान्त निम्नलिखित मान्यताओं

(i) वस्तु की आपूर्ति उसकी माँग की जननी होती है।

(ii) मजदूरी दर पूर्णतया लोचदार होती है।

(iii) ब्याज दर पूर्णतया लोचदार होती है। 

(iv) वस्तु की कीमत पूर्णतया नम्य होती है।

(v) अर्थव्यवस्था में पूर्ण प्रतियोगिता पाई जाती है।

(vi) आर्थिक क्रियाकलापों के संचालन में सरकार का कोई हस्तक्षेप नहीं होता है। 

9. समष्टि अर्थशास्त्र के लिए व्यष्टि अर्थशास्त्र का महत्त्व बताइए । 

Ans. जिस प्रकार व्यक्ति-व्यक्ति को मिलाकर समाज का गठन होता है फर्म-फर्म के संयोजन से उद्योग की रचना होती है। उद्योगों को मिलाकर अर्थव्यवस्था अर्थात् समग्र बनता है। इसलिए व्यष्टि अर्थशास्त्र समष्टि अर्थशास्त्र के लिए महत्त्वपूर्ण होता है।

जैसे- (i) अलग-अलग वस्तुओं एवं सेवाओं की कीमत के आधार पर ही सामान्य कीमत स्तर का आकलन करते हैं।

(ii) व्यक्तिगत आर्थिक / उत्पादक इकाइयों के आय के योग से राष्ट्रीय आय ज्ञात की जाती है। 

(iii) आर्थिक नियोजन के लिए फर्मों व उद्योगों के नियोजन का जानना अति आवश्यक है। 

10. संक्षेप में समष्टि अर्थशास्त्र का क्षेत्र बताइए। 

Ans. समष्टि अर्थशास्त्र के क्षेत्र की एक विस्तृत श्रृंखला है। इस शाखा के कुछ क्षेत्र नीचे लिखे गए हैं-

(i) रोजगार सिद्धान्त-रोजगार एवं बेरोजगार से संबंधित विभिन्न अवधारणाओं का अध्ययन समष्टि अर्थशास्त्र में किया जाता है। 

(ii) राष्ट्रीय आय का सिद्धान्त-राष्ट्रीय आय से संबंधित समाहारों जैसे बाजार कीमत पर सकल घरेलू उत्पाद, साधन लागत पर शुद्ध घरेलू उत्पाद बाजार कीमत पर सकल राष्ट्रीय उत्पाद, राष्ट्रीय प्रयोज्य आय आदि तथा अनेक संघटकों का अध्ययन किया जाता है। 

(iii) मुद्रा सिद्धान्त-मुद्रा के कार्य, मुद्रा के प्रकार, बैंकिंग प्रणाली आदि के विश्लेषण अर्थशास्त्र की इस शाखा के अन्तर्गत किया जाता है।

(iv) विश्व व्यापार का सिद्धान्त-व्यापार शेष भुगतान शेष, विनिमय दर आदि के बारे में विश्लेषण समष्टि अर्थशास्त्र में किया जाता है।

11. समष्टि अर्थशास्त्र के उपकरण बताइए।

Ans. समष्टि अर्थशास्त्र में उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित उपकरणों का उपयोग किया जाता है-

(i) आय एवं रोजगार नीति- 

  • (a) सामूहिक मांग, 
  • (b) सामूहिक पूर्ति 

(ii) राजकोषीय नीति- 

  • (a) सरकारी बजट, 
  • (b) मजदूरी नीति, 
  • (c) आयात व निर्यात नीति, 
  • (d) उत्पादन नीति

(iii) मौद्रिक नीति- 

  • (a) बैंक दर, 
  • (b) नकद जमा अनुपात, 
  • (c) संवैधानिक तरलता अनुपात, 
  • (d) खुले बाजार की क्रियाएँ, 
  • (e) साख नीति । 

12. समष्टि अर्थशास्त्र में समूहों को मापने में आने वाली कठिनाइयों को लिखिए।

Ans. अर्थव्यवस्था में विभिन्न प्रकार की वस्तुओं का उत्पादन किया जाता है। वस्तुओं एवं सेवाओं का मापन अलग-अलग इकाइयों में किया जाता है। दूसरे शब्दों में सभी उत्पादित वस्तुओं एवं सेवाओं का मापन करने के लिए कोई एक उपयुक्त इकाई नहीं है। अतः वस्तुओं एवं सेवाओं को मापने में केवल मुद्रा का प्रयोग किया जाता है। 

13. व्यष्टि अर्थशास्त्र तथा समष्टि अर्थशास्त्र की परस्पर निर्भरता स्पष्ट करें।

Ans. व्यष्टि एवं समष्टि अर्थशास्त्र की दो अलग-अलग शाखाएँ हैं। ये दोनों शाखाएँ परस्पर निर्भर है। उदाहरण के लिए एक वस्तु की कीमत निर्धारण व्यष्टि विश्लेषण के आधार पर किया जाता है और सामान्य कीमत का निर्धारण समष्टि विश्लेषण के द्वारा होता है। 

उद्योग में मजदूरी दर निर्धारण व्यष्टि अर्थशास्त्र का मुद्दा है। सामान्य मजदूरी दर का निर्धारण समष्टि अर्थशास्त्र का विषय है। इस प्रकार से कहा जा सकता है कि व्यष्टि एवं समष्टि अर्थशास्त्र एक-दूसरे पर निर्भर है। 

14. क्या व्यष्टि अर्थशास्त्र को समझने के लिए समष्टि अर्थशास्त्र का अध्ययन जरूरी है ? 

Ans. कई बार व्यक्तिगत निर्णय समष्टि निर्णयों को ध्यान में रखकर लिए जाते हैं । इसी प्रकार व्यक्तिगत आर्थिक इकाइयाँ निर्णय लेने के लिए सामूहिक निर्णयों को ध्यान में रखना जरूरी होता है-

(i) एक फर्म के उत्पादन का स्तर का पैमाना कुल माँग अथवा लोगों की क्रय शक्ति को ध्यान में रखकर तय करती है (ii) एक वस्तु की कीमत उस वस्तु की मांग व पूर्ति से ही तय नहीं होती है बल्कि दूसरी वस्तुओं की माँग व पूर्ति को भी ध्यान में रखकर तय की जाती है

(ii) एक फर्म साधन भुगतान के निर्धारण के लिए दूसरी फर्मों के साधन भुगतान संबंधी निर्णय ध्यान में रखती है, आदि। 

15. वे कारक लिखिए जिन पर कीन्स का रोजगार सिद्धान्त निर्भर करता है। 

Ans. कीन्स का आय एवं रोजगार सिद्धान्त निम्नलिखित कारकों पर निर्भर है- 

(i) अर्थव्यवस्था में आय एवं रोजगार का स्तर, सामूहिक माँग के स्तर पर निर्भर होता है। सामूहिक मांग का स्तर जितना ऊँचा होता है, आय एवं माँग का स्तर नीचा होने पर आय एवं रोजगार का स्तर भी नीचा रहता है।

(ii) अर्थव्यवस्था आय एवं रोजगार के स्तर को उपभोग का स्तर बढ़ाकर बढ़ाया जात सकता है।

(iii) अर्थव्यवस्था के उपभोग का स्तर आय के स्तर व उपभोग प्रवृत्ति पर निर्भर होता है।


दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (LONG ANSWER TYPE QUESTIONS)


1. आय एवं रोजगार सिद्धान्त की कीन्स विचारधारा के मुख्य बिन्दु बताइए । 

Ans. आर्थिक महामंदीकाल (1929-1933) ने कई ऐसी आर्थिक समस्याओं को जन्म दिया जिनको व्यष्टि अर्थशास्त्र के सिद्धान्तों के आधार पर हल नहीं किया जा सका। इन समस्याओं के समाधान हेतु प्रो. जे. एम. कीन्स ने General Theory of Employment Interest & Money लिखी। इस पुस्तक में कीन्स ने आय एवं रोजगार के बारे में निम्नलिखित मुख्य बाते बतापी-

(i) एक अर्थव्यवस्था में आय एवं रोजगार का स्तर संसाधनों की उपलब्धता एवं उपयोग पर निर्भर करता है। यदि किसी अर्थव्यवस्था में कुछ संसाधन बेकार पड़े होते हैं तो अर्थव्यवस्था उन्हें उपयोग में लाकर आय एवं रोजगार के स्तर को बढ़ा सकती है। 

(ii) कीन्स ने परंपरावादियों के इस विचार को कि एक वस्तु की पूर्ति मांग की जनक होती है खारिज कर दिया। पेन्स ने बताया कि वस्तु की कीमत उपभोक्ता की आय और उपभोक्ता की उपभोग प्रवृति पर निर्भर करती है।

(iii) परंपरावादी अर्थशास्त्रियों के अनुसार सन्तुलन की अवस्था में सदैव पूर्ण रोजगार की स्थिति होती है। लेकिन कीन्स ने संतुलन स्तर के रोजगार स्तर को साम्य रोजगार स्तर का नाम दिया और स्पष्ट किया कि साम्य रोजगार स्तर आवश्यक रूप से पूर्ण रोजगार स्तर के समान नहीं होता है। यदि साम्य रोजगार स्तर, पूर्ण रोजगार स्तर से कम है तो अर्थव्यवस्था उपभोग या सामूहिक माँग को बढ़ाकर आय एवं रोजगार स्तर में वृद्धि कर सकती है। 

(iv) परंपरावादी विचार में सरकारी हस्तक्षेप को निषेध करार दिया गया था। लेकिन कीन्स ने सुझाव दिया कि विषम परिस्थितियों जैसे अभावी मॉंग, अधिमाँग आदि में हस्तक्षेप करके इन्हें ठीक करने के लिए उपाय अपनाने चाहिए।

(v) परंपरावादी सिद्धान्त में बचतों को वरदान बताया गया है जबकि समष्टि स्तर पर कीन्स ने बचतों को अभिशाप की संज्ञा दी है। व्यक्तिगत स्तर पर बचत वरदान हो सकती है। 

2. समष्टि आर्थिक दृष्टिकोण की आवश्यकता को स्पष्ट करें। 

Ans. परंपरावादी अर्थशास्त्रियों जैसे पीगू, डेविड रिकार्डों, आल्फ्रेड मार्शल, जे. एस. मिल, जे. बी. से आदि ने व्यष्टि आर्थिक सिद्धान्तों को प्रतिपादित करने में अहम भूमिका निभायी। इन अर्थशास्त्रियों ने आर्थिक समस्याओं का हल ढूँढने का काम व्यष्टि स्तर तक सीमित रखा। 

1929 तक व्यष्टि आर्थिक सिद्धान्त एवं उनकी मान्यताओं से आर्थिक समस्याओं का स्वतः समाधान होता रहा। लेकिन (1929-1933) के महामंदीकाल ने व्यष्टि अर्थशास्त्रियों की मान्यताओं एवं सिद्धान्त को असफल कर दिया। वस्तुएँ प्रचुर मात्रा में बाजार में उपलब्ध थी । 

परन्तु अपनी मांग नहीं उत्पन्न कर पा रही थी। वस्तु की कीमत नम्यता के आधार पर कीमत घटने पर भी वस्तुओं की माँग नहीं बढ़ी। इसी प्रकार साधन बाजार नम्य मजदूरी पर बेरोजगारी को समस्या को ठीक नहीं कर पाई। नम्य व्याज दर से अर्थव्यवस्थाओं में अवस्फीति की स्थिति ठीक नहीं हो पा रही है। 

महामंदी की लम्बी अवधि, इसके द्वारा उत्पन्न विकट समस्याओं जैसे अभावी मॉंग, मुद्रा अवस्फीति, बेरोजगारी आदि ने अर्थव्यवस्थाओं को बेहाल बना दिया इन समस्याओं का समाधान करने में व्यवष्टि आर्थिक सिद्धान्तों के हाथ खड़े हो गए। अर्थात् व्यष्टि सिद्धान्तों से इन समस्याओं का समाधान नहीं हो पा रहा था। 

इसी संदर्भ में जे. एम. कीन्स General Theory of Income & Employment, Money and Interest लिखी। इस पुस्तक ने महामंदी की समस्याओं से छुटकारा पाने की नई राह दिखाई। इस नई राह को समष्टि अर्थशास्त्र कहते हैं। 

इस सिद्धान्त में सुझाए गये सिद्धान्तों के आधार पर अर्थव्यवस्थाओं में बेकार पड़े, साधनों का सद्योपयोग बढ़ा, जिससे उत्पादन, आय एवं रोजगार स्तर में सुधार संभव हो पाया। अतः समष्टि स्तर की समस्याओं जैसे आय का स्तर बढ़ाने, बेरोजगारी दूर करने, अवस्फीति या स्फीति आदि को ठीक करने के लिए समष्टि दृष्टिकोण आवश्यक है।

3. समष्टि अर्थशास्त्र के महत्त्वों का वर्णन करें। 

Ans. (i) आर्थिक नीतियों के निर्माण में सहायक (Helpful in formulation of Economic Policies) – आर्थिक नीतियों का निर्माण करते समय समष्टिगत अर्थशास्त्र का अध्ययन अत्यंत लाभदायक है। अर्थव्यवस्था में गरीबी, बेरोजगारी तथा आर्थिक उन्नति की बढ़ती माँग जैसी समस्याओं के समाधान के लिए, समष्टिगत अर्थशास्त्र के विचार जैसे उत्पादन, उपभोग तथा निवेश की आवश्यकता पड़ती है। इन चरों को ध्यान में रखकर विभिन्न समस्याओं के समाधान के लिए नीतियों का निर्माण किया जा सकता है।

(ii) अर्थव्यवस्था में होने वाले परिवर्तन के अध्ययन में सहायक (Helpful in the Study of fluctuations in Economics) – अर्थव्यवस्था में विभिन्न स्तरों पर परिवर्तनों के अध्ययन के लिए समष्टिगत अर्थशास्त्र का विचार जैसे उत्पादन, आय, व्यय, बचत तथा निवेश के स्तर आदि में सहायक हैं। 

(iii) तुलना करने में सहायक (Helpful in comparison)- समष्टि अर्थशास्त्र में राष्ट्रीय आय, आर्थिक प्रगति की दर तथा अर्थव्यवस्था की प्रकृति आदि के अध्ययन की सहायता से विभिन्न देशों से तुलना करना संभव हो जाता है। 

(iv) आर्थिक विकास का माप (Measurement of Economic Development )- समष्टिगत अर्थशास्त्र में आर्थिक विकास से संबंधित चरों जैसे उत्पादन, उपभोग, आय का सृजन, पूँजी निर्माण, राष्ट्रीय धन, रोजगार आदि पर विचार किया जाता है, जिसके द्वारा देश के आर्थिक विकास को मापा जा सकता है।

(v) कल्याण का अनुमान (Estimation of welfare) – व्यष्टिगत अर्थशास्त्र द्वारा केवल व्यक्तिगत स्तर पर कल्याण का माप किया जा सकता है। संपूर्ण अर्थव्यवस्था के आर्थिक कल्याण का अनुमान लगाने के लिए समष्टिगत अर्थशास्त्र के अध्ययन की आवश्यकता पड़ती है। 

(vi) स्फीति तथा अस्फीति के अध्ययन में सहायक (Helpful in study of inflation and deflation)- जैसा कि हम जानते हैं, अर्थशास्त्र की दो शाखाओं (व्यष्टि तथा समष्टि) होती है। इसी प्रकार समष्टिगत (Macro) अर्थशास्त्र के भी दो आधार स्तंभ हैं, कुल माँग तथा कुल पूर्ति। इनकी सहायता से देश में स्फीति तथा अस्फीति की स्थितियों का अध्ययन किया जा सकता है, जोकि देश की आर्थिक स्थिति तथा व्यक्तियों के जीवन स्तर को जानने में सहायक हैं।


CLASS 12 NCERT SOLUTION IN ENGLISHCLASS12 NCERT SOLUTION IN HINDI
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Geography भूगोल
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Hindi SubjectHistory answer keys
Sociology समाज शास्त्र

FAQs


Q. समष्टि अर्थशास्त्र का उदय किस कारण हुआ ?

Ans. केन्द्रीय क्रांति अथवा आर्थिक महामंदी के बाद समष्टि अर्थशास्त्र का उदय हुआ।

Q. सामूहिक मांग की परिभाषा लिखें।

Ans. अर्थव्यवस्था में सभी वस्तुओं एवं सेवाओं की माँग के योग को कुल माँग सामूहिक मांग कहते हैं।

Q. उपभोग फलन का अर्थ लिखें। 

Ans. उपभोग राष्ट्रीय आय का फलन है। दूसरे शब्दों में उपभोग फलन, उपभोग व राष्ट्रीय आय के बीच संबंध को व्यक्त करता है।


कक्षा 12 अर्थशास्त्र एनसीईआरटी नोट्स


  1. व्यष्टि अर्थशास्त्र
  2. उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत
  3. उत्पादन तथा लागत
  4. पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत
  5. बाजार संतुलन
  6. प्रतिस्पर्धारहित बाजार
  1. परिचय
  2. राष्ट्रीय आय का लेखांकन
  3. मुद्रा एवं बैंकिंग
  4. आय का निर्धारण
  5. सरकार: कार्य और विषय क्षेत्र
  6. खुली अर्थव्यवस्था: समष्टि अर्थशास्त्र

वस्तुनिष्ठ प्रश्न MCQs


  1. व्यष्टि अर्थशास्त्र
  2. उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत
  3. उत्पादन तथा लागत
  4. पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत
  5. बाजार संतुलन
  6. प्रतिस्पर्धारहित बाजार
  1. परिचय
  2. राष्ट्रीय आय का लेखांकन
  3. मुद्रा एवं बैंकिंग
  4. आय का निर्धारण
  5. सरकार: कार्य और विषय क्षेत्र
  6. खुली अर्थव्यवस्था: समष्टि अर्थशास्त्र

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