अर्थशास्त्र-II कक्षा 12वीं अध्याय 4 नोट्स | Economics-II Class 12 Chapter 4 Questions And Answers In Hindi Easy PDF

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अर्थशास्त्र-II कक्षा 12वीं अध्याय 4 नोट्स | Economics-II Class 12 Chapter 4 Questions And Answers In Hindi Easy PDF, कक्षा 12 अर्थशास्त्र के नोट्स, अर्थशास्त्र नोट्स Class 12 PDF Download 2023


आय का निर्धारण | DETERMINATION OF INCOME


घरेलू उपभोग व्यय – यह वह राशि है जो लोगों द्वारा अपनी आवश्यकताओं की प्रत्यक्ष पूर्ति के लिए वस्तुओं तथा सेवाओं के क्रय पर खर्च की जाती है, इसे C द्वारा दर्शाया जाता है। यह आय स्तर पर निर्भर करता है। दूसरे शब्दों में: C=y (g) समग्र माँग तालिका यह वह तालिका है जो आय के विभिन्न स्तरों पर माँग की विभिन्न – मात्राओं को दर्शाती है।

समग्र पूर्ति – यह अर्थव्यवस्था में उपलब्य वस्तुओं और सेवाओं के कुल उत्पादन को प्रकट करती है। यह राष्ट्रीय उत्पाद या राष्ट्रीय आय के समान होती है। इसके दो घटक हैं: (i) बचत तथा (ii) उपभोग समीकरण में AS = C+S ● सीमान्त उपभोग प्रवृत्ति-आय में परिवर्तन के कारण उपभोग में परिवर्तन के सीमान्त उपभोग कहते हैं। 

AY यह प्रायः एक से कम तथा शून्य से अधिक होती है। औसत बचत प्रवृत्ति – बचत और कुल आय में अनुपात औसत बचत प्रवृत्ति कहलाता है।

पूर्ण रोजगार इससे अभिप्राय अर्थव्यवस्था की एक ऐसी स्थिति से है जिसमें प्रत्येक शारीरिक व मानसिक दृष्टि से योग्य व्यक्ति को जो मजदूरी की चालू दर पर काम करने को तैयार है, काम मिला हुआ है। निवेश गुणक-निवेश में वृद्धि के फलस्वरूप राष्ट्रीय आय में वृद्धि के अनुपात को निवेश गुणक कहते हैं। सूत्र के रूप में

आय में परिवर्तन (AY) निवेश गुणक (K) = निवेश में परिवर्तन (AN) संक्षेप में, निवेश गुणक से अभिप्राय निवेश में परिवर्तन और आय में परिवर्तन के अनुपात

से है। गुणक की विशेषताएँ- (i) समग्र माँग से गुणक प्रभाव होता है, (ii) गुणक दोनों ओर क्रियाशील होता है- (a) पीछे की ओर तथा (b) आगे की ओर (iii) MPS तथा गुणक के

विपरीत सम्बन्ध (iv) MPC तथा गुणक का सीधा सम्बन्ध । बचत की प्रवृत्ति अथवा बचत का फलन बचत की प्रवृत्ति अथवा बचत का फलन आय – एवं बचत के बीच संबंध को दर्शाता है।

सीमांत बचत प्रवृत्ति-सीमांत बचत प्रवृत्ति आय में परिवर्तन के कारण बचत में होने वाले परिवर्तन का अनुपात है।


Economics-II Class 12 Chapter 4 Questions And Answers In Hindi

Class12th 
Chapter Nameआय का निर्धारण
Chapter numberChapter 4
PART B
Book NCERT
Subjectअर्थशास्त्र | Economics
Medium Hindi | हिंदी
Study Materialsनोट्स & question answer
Download PDFClass 12 economics-II Chapter 4 pdf

II कक्षा 12वीं अध्याय 4 नोट्स Economics II Class 12 Chapter 4 Questions And Answers In Hindi Easy PDF

अति लघु उत्तरीय प्रश्न (VERY SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS)


1. निवेश प्रेरणा से क्या अभिप्राय है ?

Ans. निवेश प्रेरणा- निवेश में वृद्धि करने की प्रेरणा को निवेश प्रेरणा कहते हैं। यह इस बात पर निर्भर करती है कि उद्यमियों को ब्याज दर की तुलना में निवेश पर किस दर से प्रतिफल मिलने की आशा है। निवेशकर्त्ता निवेश करते समय इस बात का अवश्य ध्यान रखता है कि उसे निवेश पर भविष्य में कितना लाभ प्राप्त होगा । 

2. निवेश माँग फलन क्या है ?

Ans. निवेश माँग और ब्याज दर के संबंध में निवेश माँग को फलन कहते हैं । ब्याज दरें और निवेश माँग के बीच ऋणात्मक (-) संबंध होता है । अन्य शब्दों में, यदि ब्याज की दर उच्च हो तो निवेश माँग निम्न रह जाती है ।

3. पूर्ण रोजगार संतुलन का अर्थ बताएँ। 

Ans. जब समग्र माँग (AD) तथा समग्र पूर्ति (AS) का सन्तुलन उस बिन्दु पर हो कि सभी साधनों को काम मिल जाये । पूर्ण रोजगार के लिए आवश्यक जितनी समग्र माँग की जरूरत है । समग्र माँग उतनी हो तो इसे पूर्ण रोजगार सन्तुलन कहते हैं ।

4. बचत फलन का क्या अर्थ है। 

Ans. बचत फलन- बचत फलन का अर्थ बचत तथा आय के सम्बन्ध से है। राष्ट्रीय आय बढ़ने से बचत में भी बढ़ोतरी होती है । 

5. समग्र पूर्ति से क्या समझते हैं ।

Ans. समग्र पूर्ति से आशय एक अर्थव्यवस्था में एक वर्ष की अवधि में उत्पादित कुल वस्तुओं और सेवाओं के भीद्रक मूल्य से है। सामूहिक पूर्ति = उपभोग + बचत AS = C+S

6. अर्थव्यवस्था में अभावी माँग की स्थिति कब उत्पन्न होती है ?

Ans. अर्थव्यवस्था में अभावी माँग की स्थिति तब उत्पन्न होती है जब पूर्ण रोजगार बिन्दु पर सामूहिक पूर्ति माँग से अधिक होती है। 

7. बचत प्रवृत्ति से आप क्या समझते हैं ?

Ans. आय के विभिन्न स्तरों और बचत की विभिन्न मात्राओं के बीच कार्यात्मक सम्बन्ध

बताने वाली अनुसूची को बचत प्रवृत्ति कहते हैं। [S=F(Y)]

8. किसी देश में पूर्ण रोजगार आय का सन्तुलन स्तर कब प्राप्त होता है ? 

Ans. जब सामूहिक माँग पूर्ण रोजगार स्तर प्राप्त करने के लिए आवश्यक समग्र माँग और पूर्ण रोजगार स्तर की पूर्ति के बराबर हो । _AS= AQ

9. अपूर्ण रोजगार स्तर का उपचार कर अर्थव्यवस्था को पूर्ण रोजगार स्तर तक पहुँचाने का सूत्र किसने बताया था तथा वह सूत्र क्या है ? 

Ans. अपूर्ण रोजगार स्तर का उपचार कर अर्थव्यवस्था को पूर्ण रोजगार स्तर तक पहुँचते का सूत्र कीन्स ने बताया था । समग्र माँग में वृद्धि करके पूर्ण रोजगार प्राप्त किया जा सकता है। 

10. माँग प्रबन्धन नीति का अर्थ लिखिए ।

Ans. समग्र आपूर्ति की बजाय सरकार द्वारा समग्र माँग में परिवर्तन के अपूर्ण रोजगार स्तर से पूर्ण-रोजगार स्तर प्राप्त करने के प्रयास को माँग प्रबन्धन नीति कहते हैं। 

11. उपभोग फलन से आप क्या समझते हैं।

Ans. उपभोग और व्यय योग्य आय के बीच फलनात्मक सम्बन्ध को उपभोग प्रवृत्ति उपभोग फलन कहते हैं । 

यहाँ C=F(0),

C = उपभोग,

F = फलन,y = आय

12. स्वायत्त उपभोग का अर्थ लिखिए। 

Ans, जीवित रहने के लिए आवश्यक न्यूनतम उपभोग को स्वायत्त निवेश कहते हैं। स्वयात्त निवेश आय के शून्य स्तर पर भी होता है । स्वायत्त निवेश हमेशा धनात्मक होता है । 

13. सन्तुलन का अर्थ लिखिए।

Ans. सन्तुलन अर्थव्यवस्था की वह अवस्था है जिसमें किसी सामान्य कीमत पर समा माँग एवं समग्र अपूर्ति एक समान हो जाती है । संतुलन स्तर पर रोजगार के स्तर को सन्तुलन रोजगार कहते हैं।

14. C = C’ + cY एक अर्थव्यवस्था में कुल उपभोग का समीकरण है। इस समीकरण में स्थिरांक मद को लिखिए ।

Ans. C’ स्थिरांक मद है इसे निर्वहन उपभोग (न्यूनतम उपभोग) कहते हैं। यह उपभ स्तर अर्थव्यवस्था में शून्य आय स्तर पर भी पाया जाता है ।

15. C me (Y – 0) = CY, जहाँ का अभिप्राय सीमान्त उपभोग प्रवृत्ति से है समीकार का अभिप्राय स्पष्ट करो ।

Ans. इस समीकरण का अभिप्राय है यदि किसी विशिष्ट वर्ष में आय शून्य है तो

अर्थव्यवत्त्वा का उपयोग शून्य रहेगा अथात् अर्थव्यवस्था पूरे वर्ष भूखी रहेगी। 

16. राष्ट्रीय आय का क्या होता है जब नियोजित बचत नियोजित निवेश से कम होती है?

Ans. आय कम हो जाएगी।

17. बचत तथा निवेश में समानता कैसे लाई जाती है ?

Ans. आय के स्तर में परिवर्तन करके । 

18. MPC दी हुई होने पर निवेश गुणक (K) ज्ञात करने का सूत्र क्या है ?

Ans. K=- 1 1-MPC

19. राष्ट्रीय आय का निवेश पर क्या प्रभाव है ?

Ans. इसका गुणक प्रभाव होता है। 

20. प्रत्याशित बचत का क्या अर्थ है ?

Ans. यह वह मात्रा है जो लोग बचाने की योजना बताते हैं । 


लघु उत्तरीय प्रश्न (SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS)


1. पूर्ण रोजगार सन्तुलन एवं अपूर्ण रोजगार सन्तुलन में भेद कीजिए । 

Ans. पूर्ण रोजगार सन्तुलन यदि कोई अर्थव्यवस्था अपने सभी संसाधनों की पूर्ण क्षमता का प्रयोग कर रही है तो इसे पूर्ण रोजगार सन्तुलन की अवस्था कहते हैं । प्रतिष्ठित सिद्धान्त के अनुसार अर्थव्यवस्था में सदैव पूर्ण रोजगार संतुलन बना रहता है। इस अवस्था में समप्र माँग व आपूर्ति बराबर होती है । समग्र आपूर्ति हमेशा पूर्ण रोजगार स्तर पर उत्पादन के बराबर होती है ।

अपूर्ण रोजगार सन्तुलन यदि कोई अर्थव्यवस्था समग्र माँग व आपूर्ति की सन्तुलन अवस्था में अपने सभी संसाधनों की पूर्ण क्षमता का प्रयोग नहीं कर रही है तो इसे अपूर्ण रोजगार कहते हैं। कीन्स, ने अपूर्ण-रोजगार सन्तुलन के आधार पर ही आय एवं रोजगार सिद्धान्त का प्रतिपादन किया था ।

2. प्रतिरोधात्मक बेरोजगारी क्या दर्शाती है ?

Ans. प्रतिरोधात्मक बेरोजगारी उस स्थिति की ओर इशारा करती है जिसमें कुछ लोग किसी कारणवश एक काम को छोड़कर दूसरे काम की खोज करते हैं। नया रोजगार मिलने में समय लग सकता है। 

अतः किसी समय विशेष पर अर्थव्यवस्था में कुछ लोग बेरोजगार पाए जा सकते हैं। अतः प्रतिबन्धात्मक बेरोजगारी अस्थायी प्रकृति की होती है। इसे हल करने के लिए सरकार को अलग से प्रयास करने की आवश्यकता नहीं होती है। स्थायी बेरोजगारी की तरह यह अर्थव्यवस्था के लिए गम्भीर समस्या नहीं होती है।

3. मजदूरी दर की नम्यता श्रम बाजार को सन्तुलन में बनाए रखती है। स्पष्ट कीजिए। 

Ans. मजदूरी दर की नम्यता (लोचशीलता) के कारण श्रम की माँग व आपूर्ति सन्तुलन में रहती है। यदि श्रम की मांग, श्रम की आपूर्ति से अधिक होती है तो श्रम की मजदूरी दर में बढ़ोतरी हो जाती है । ऊँची मजदूरी दर पर श्रम की माँग में कमी आ जाती है तो श्रम क आपूर्ति बढ़ जाती है । 

श्रम की मजदूरी दर में तब तक वृद्धि जारी रहती है जब तक पुनः श्रम की माँग एवं आपूर्ति दोनों समान नहीं होती है । इसके विपरीत यदि श्रम की माँग, श्रम को आपूर्ति से कम होती है तो बाजार प्रचलित मजदूरी दर कम हो जाती है । मजदूरी दर में कम श्रम की माँग व पूर्ति में पुनः सन्तुलन स्थापित करती है । 

4. वास्तविक मजदूरी का आशय स्पष्ट कीजिए।

Ans. श्रमिक अपनी शारीरिक एवं मानसिक सेवाओं के प्रतिफल के रूप में कुल जितनी उपयोगिता प्राप्त कर सकते हैं उसे वास्तविक मजदूरी कहते हैं। दूसरे शब्दों तें श्रमिक की अपनी आमदनी से वस्तुओं एवं सेवाओं को खरीदने की क्षमता को वास्तविक मजदूरी कहते हैं। वास्तविक मजदूरी का निर्धारण श्रमिक की मौद्रिक मजदूरी एवं कीमत स्तर से होता है । 

वास्वविक मजदूरी एवं मौद्रिक मजदूरी में सीधा संबंध होता है अर्थात् ऊँची मौद्रिक मजदूरी दर पर वास्तविक मजदूरी अधिक होने की संभावना होती है। वास्तविक मजदूरी व कीमत स्तर में विपरीत संबंध होता है। कीमत स्तर अधिक होने पर मुद्रा की क्रय शक्ति कम हो जाती है। अर्थात् वस्तुओं एवं सेवाओं को खरीदने की क्षमता कम हो जाती है ।

5. कीमत स्तर चाहे कुछ भी हो, उत्पादन तो पूर्ण रोजगार स्तर पर ही होता है। प्रतिष्ठित सिद्धान्त के इस कथन की पुष्टि कीजिए ।

Ans. जे. बी. से के बाजार नियम एवं मजदूरी कीमत नम्यता से मिलकर स्वचालित बाजार संतुलन की रचना होती है । दूसरे शब्दों में, लोचशील मजदूरी व कीमत के द्वारा श्रम बाजार एवं वस्तु बाजार में सदैव सन्तुलन की अवस्था कायम रहती है । 

अस्थायी सन्तुलन मजदूरी व कीमत लोच के द्वारा ठीक हो जाती है। अर्थव्यवस्था हमेशा पूर्ण रोजगार स्तर पर ही उत्पादन | करती है । इसलिए प्रतिष्ठित समग्र आपूर्ति वक्र उत्पादन के पूर्ण रोजगार स्तर पर ऊर्ध्व रेखा होती है । कीमत परिवर्तन का इस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है । संक्षेप में, कीमत स्तर चाहे कुछ भी हो, उत्पादन तो पूर्ण रोजगार स्तर पर ही रहता है । 

6. सीमान्त वचत प्रवृत्ति की परिभाषा दीजिए।

Ans. आय में परिवर्तन की वजह से बचत में होने वाला परिवर्तन की दर को सीमान्त बचत प्रवृत्ति कहते हैं।

सीमान्त उपभोग प्रवृति उपभोग में परिवर्तन आय में परिवर्तन MPC = AC AY

MPS = सीमान्त बचत प्रवृत्ति, AC = = बचत में परिवर्तन, AY = राष्ट्रीय आय में परिवर्तन

7. उपभोग फलन के संबंध में किन दो बातों का ध्यान रखना चाहिए। 

Ans. उपभोग फलन के बारे में निम्नलिखित दो बातों का ध्यान रखना चाहिए-

(i) उपभोग का स्तर वैयक्तिक प्रयोज्य आय के स्तर पर निर्भर करता है । वैयक्तिक प्रयोज्य आय वैयक्तिक आय में से प्रत्यक्ष करों के भुगतान दण्ड जुर्माना एवं सामाजिक सुरक्षा व्यय को पटाने पर प्राप्त होती है । उपभोग एवं वैयक्तिक प्रयोज्य आय का सीधा संबंध होता है। वैयक्तिक प्रयोज्य आय के ऊँचे स्तर पर उपभोग अधिक किया जाता है ।

(ii) आय का स्तर शून्य होने पर लोग उपभोग के लिए पुरानी बचतों का प्रयोग करते हैं। जब तक आय, उपभोग से कम रहती है उपभोग के लिए पुरानी बचतों का ही प्रयोग किया जाता है। यह उपभोग जीवित रहने के लिए आवश्यक न्यूनतम उपयोग कहलाता है । 

8. सीमान्त उपभोग प्रवृत्ति की सीमाओं का निधारिण किस प्रकार होता है ?

Ans. सीमान्त उपभोग प्रवृत्ति की न्यूनतम एवं अधिकतम सीमाओं का निर्धारण उपभोग के मौलिक एवं मनोवैज्ञानिक नियम की सहायता से होता है। इस नियम के आधार पर राष्ट्रीय आप के शून्य स्तर पर भी उपभोग शून्य नहीं होता है अर्थात् उपभोग प्रवृत्ति भी शून्य नहीं होती है। दूसरे शब्दों में, सीमान्त उपभोग प्रवृत्ति शून्य से ज्यादा रहती है ।

आय में वृद्धि के साथ उपभोग में वृद्धि होती है परन्तु उपभोग में वृद्धि दर आय में वृद्धि दर से कम होती है अर्थात् सीमान्त उपभोग प्रवृत्ति इकाई से कम रहती है। इन दोनों सीमाओं को मिलाकर हम कह सकते हैं कि सीमान्त उपभोग प्रवृत्ति कामान 0 व 1के बीच में होता है।

9. 45° रेखा क्या है ? इसका क्या उपयोग है ? 

Ans. अक्ष केन्द्र से 45° कोण पर खींची गई रेखा को 45° रेखा कहते हैं। दोनों अक्ष पर मापन का एक समान पैमाना लिया जाता है। अतः 45° रेखा के प्रत्येक बिन्दु पर क्षैतिज एवं ऊर्ध्व अन्तर (राष्ट्रीय आय एवं उपभोग व्यय) बराबर रहते हैं। इस रेखा की सहायता से राष्ट्रीय आय एवं उपभोग की तुलना की जका सकती है। यदि उपभोग वक्र 45° से ऊपर होता है तो उपभोग व्यय आय से अधिक होता है। जब उपभोग वक्र, 45° रेखा को काटता है तो आय व्यय दोनों एक समान होते हैं और यदि 45° रेखा उपभोग के ऊपर होती है तो उपभोग व्यय आय के कम होता है। 

10. यदि अर्थव्यवस्था में प्रायोजित बचत प्रायोजित निवेश से कम हो तो इसका राष्ट्रीय आय, रोजगार एवं कीमतों पर प्रभाव बताइए ।

Ans. अर्थव्यवस्था में यदि प्रायोजित बचत प्रायोजित निवेश से कम होती है तो इसका अभिप्राय यह है कि परिवार जितनी राशि बचा रहा है वह फर्मों के निवेश के लिए पर्याप्त नहीं होगी अर्थात् परिवार ज्यादा व्यय करना चाहते हैं। इससे उपलब्ध वस्तुओं के भण्डार में कमी आएगी। फर्मों का वास्तविक निवेश प्रायोजित निवेश से कम रह जायेगा। 

वे बाध्य होकर माल भण्डार के स्तर को वांछित स्तर पर बनाए रखने के लिए अधिक संसाधनों को कम पर लगायेंगे । परिणामस्वरूप उत्पादन, रोजगार और आय के स्तर में वृद्धि होगी। आय के ऊँचे स्तर पर बचत करने की क्षमता बढ़ेगी। परिवर्तन की यह प्रक्रिया उस समय तक जारी रहेगी जब तक बचत और निवेश समान होंगे।

11. समझाइए कि अधिक बचत कम बचत को कैसे जन्म देती है ? 

Ans. यदि अर्थव्यवस्था में परिवार अधिक बचत करते हैं तो इसका अभिप्राय यह है कि वे उपभोग को घटा रहे हैं। दूसरे शब्दों में, वे उत्पादकों द्वारा उत्पादित वस्तुओं एवं सेवाओं की वांछित मात्रा में कम क्रय करते हैं। 

इससे उत्पादकों के पास बिना बिके माल का स्टॉक बढ़ता है। बिना बिके माल के स्टॉक को कम करने के लिए उत्पादक कीमत स्तर को घटाते हैं और संसाधनों का प्रयोग भी कम करते हैं। 

परिणामस्वरूप उत्पादन, रोजगार एवं राष्ट्रीय आय के स्तर में कमी आ जाती है। आय के निम्न स्तर पर अथवा रोजगारी के स्तर पर परिवारों की बचत करने की क्षमता पर विपरीत प्रभाव पड़ता है अर्थात् बचत का स्तर कम हो जाता है । इस प्रकार अधिक बचत, बचत स्तर को घटाती है ।

Y का मान A तथा C के मानों से निर्धारित होगा । A = स्वायत्त उपभोग + स्वायत्त निवेश A का मान बढ़ने पर रेखा ऊपर की ओर खिसक जाती है । C → रेखा का ढाल है इसमें वृद्धि से रेखा ऊपर की ओर झुक जाती है ।

12. अर्थव्यवस्था में राष्ट्रीय आय का स्तर किस प्रकार निर्धारित होता है ?

Ans. राष्ट्रीय आय का स्तर उस स्थान पर AY निर्धारित होता है जहाँ समग्र माँग और समग्र पूर्ति समान होते हैं। समग्र माँग का अर्थ समग्र व्यय से है जो उपभोग और निवेश वस्तुओं पर किया जाता है। समग्र पूर्ति का अभिप्राय उस न्यूनतम राशि से है जो उत्पादक को लागत रूप में अवश्य मिलनी चाहिए। 

इसलिए समग्र पूर्ति और राष्ट्रीय आय समान होते हैं। संतुलन-स्तर पर समग्र माँग को प्रभावी माँग कहते हैं। इसलिए आय के स्तर में वृद्धि के लिए प्रभावी माँग में वृद्धि आवश्यक है। चित्रानुसार समग्र माँग (AD) रेखा और समग्र पूर्ति (AS) रेखा एक-दूसरे को E बिन्दु पर काटते हैं, जहाँ आय का स्तर 0Q निर्धारित होता है।

13. राष्ट्रीय आय का संतुलन स्तर पूर्ण राजगार स्तर से पहले कब निर्धारित होता है ? 

Ans. यदि पूर्ण रोजगार स्तर पर मॉंग संभव उत्पादन स्तर को बनाए रखने के लिए पर्याप्त नहीं हैं, तो उत्पादन का स्तर कम हो जाएगा, परिणामस्वरूप कुछ साधन बेकार हो जाएँगे। ऐसा तब होता है जब राष्ट्रीय आय का संतुलन स्तर पूर्ण रोजगार के पहले निर्धारित होता है। ऐसी है स्थिति में, अनैच्छिक बेरोजगारी उत्पन्न होती है। यह अभावी माँग की स्थिति है, क्योंकि माँग का स्तर, संतुलन स्तर पर संसाधनों के पूर्ण प्रयोग के लिए पर्याप्त नहीं है।

14. नकद आरक्षण अनुपात (CRR) क्या है ? CRR का बढ़ाया जा घटाया जाना किस प्रकार साख उपलब्धि को प्रभावित करता है ? 

Ans. सभी वाणिज्यिक बैंक अपनी जमा का एक भाग रिजर्व बैंक के पास नकदी के रूप में रिवर्ज रखते हैं, इसे नकद आरक्षण अनुपात कहा जाता है। जब नकद आरक्षण अनुपात बढ़ जाता है, बैंकों की तरलता घट जाती है तथा इसी प्रकार उनकी साख सृजन क्षमता भी । यह माँग आधिक्य को कम करने के लिए किया जाता है। माँग को बढ़ाने के लिए, नकद आरक्षण अनुपात कम किया जाता है जिससे बैंक अधिक साख का सृजन कर सकें। 

15. सरकारी क्षेत्र के समावेश का अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ता है ?

Ans. माँग के अभाव तथा आधिक्य की समस्याओं के समाधान से पहले हमें राजकीय क्षेत्र को अर्थव्यवस्था के आर्थिक घटनाक्रम में शामिल करना पड़ेगा। राजकोषीय क्षेत्र के शामिल होने से अब तीन क्षेत्र होंगे—परिवार, फर्मों और सरकर । सरकारी क्षेत्र उत्पादन, आय और रोजगार के स्तर को प्रभावित करता है।

(i) करों का प्रभाव-सरकार कर लगाती है। कर लगाने से प्रयोज्य (खर्च करने योग्य) आय कम हो जाती है। उपभोग व्यय प्रयोज्य आय पर निर्भर करता है। अन्य बातें समान रहने पर (जैसे विदेशी व्यापार) करों के कारण प्रयोज्य आय कम होती है और इससे उपभोग व्यय कम होता है जिसके कारण उपभोग वक्र नीचे की ओर समानान्तर रूप में खिसक जाता है। यहाँ से मान लिया जाता है कि करों की दर समान रहती है। इसे नीचे के चित्रों में इस प्रकार दशति है।


(LONG ANSWER TYPE QUESTIONS)


1. न्यून माँग को ठीक करने के राजकोषीय उपाय समझाइए । 

Ans. समग्र माँग एवं समग्र पूर्ति पर नियंत्रण करने के लिए सरकार जो उपाय करती है। उन्हें राजकोषीय नीति कहते हैं। माँग न्यूनता को ठीक करने के लिए निम्नलिखित राजकोषीय उपाय हैं-

(i) बजट – एक लेखा वर्ष के लिए सरकारी आय-व्यय के अनुमान का विस्तृत लेखा- जोखा बजट कहलाता है। न्यून माँग की स्थिति से सरकार, सार्वजनिक व्यय को आय से अधिक कर समग्र माँग के स्तर को बढ़ा सकती है। यदि सरकारी व्यय को जनकल्याण की भावना से अधिक करना असंभव हो तो सरकार संतुलित बजट बनाकर समग्र माँग के स्तर को घटने से रोक सकती है।

(ii) कर नीति-कर नीति के द्वारा सरकार प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष करों की दर तय करती है । न्यून माँग की अवस्था में सरकार उदार कर नीति बना सकती है । उदार नीति में सरकार नीचे दर से कर लगाती है। कर की नीची दर पर लोगों की प्रयोज्य आय अधिक हो जाती है। प्रयोज्य आय बढ़ने से लोगों का उपभोग अधिक हो जाता है ।

(iii) मजदूरी नीति- इस नीति के द्वारा सरकार श्रमिकों के पारिश्रमिक की दर तय करती है । न्यून माँग को ठीक करने के लिए सरकार उदार मजदूरी नीति बनाकर मजदूरों के वेतन एवं भत्ते बढ़ा सकती है । इससे मजदूरों की क्रय शक्ति बढ़ती है। वस्तुओं एवं सेवाओं की माँग बढ़ती है। 

(iv) आयात-निर्यात-आयात के द्वारा अर्थव्यवस्था शेष विश्व से वस्तुएँ क्रय करती है । इससे वस्तुओं की आपूर्ति बढ़ती है दूसरी ओर, निर्यात के द्वारा अर्थव्यवस्था शेष विश्व को वस्तुएँ बेचती है। इससे अर्थव्यवस्था में वस्तुओं की आपूर्ति कम हो जाती है और समग्र माँग बढ़ जाती है। न्यून माँग की स्थिति में आपूर्ति को घटाने के लिए उदार निर्यात नीति एवं कठोर आयात नीति बना सकती है ।

2. न्यून माँग का अर्थ बताएँ। इसे ठीक करने के मौद्रिक उपाय समझाइए ।

Ans. अर्थव्यवस्था में यदि वस्तुओं एवं सेवाओं की माँग पूर्ण रोजगार स्तरीय वांछित समय उत्पादन से कम होती है तो इसे न्यून माँग या माँग अभाव कहते हैं । न्यून माँग को ठीक करने के लिए केन्द्रीय बैंक जो उपाय करता है उन्हें मौद्रिक उपाय या मौद्रिक नीति कहते हैं। ये उपाय निम्नलिखित हैं- 

(i) बैंक दर – अर्थव्यवस्था का केन्द्रीय बैंक जिस दर पर व्यापारिक बैंकों को उधार या अग्रिम प्रदान करता है या उनके बिलों के भुगतान पर कटौती करता है उसे बैंक दर कहते हैं। न्यून माँग को ठीक करने के लिए केन्द्रीय बैंक बैंक दर को नीची कर सकता है । ऐसा करने से व्यापारिक बैंकों के लिए साख सृजन करना सस्ता हो जाता है और ज्यादा साख का सृजन होता है । परिणामस्वरूप उपभोग प्रवृत्ति बढ़ जाती है और उपभोग का स्तर अधिक हो जाता है। समग्र माँग का अभाव कम होने लगता है।

(ii) न्यूनतम जमा अनुपात-व्यापारिक बैंक अपनी जमाओं का कुछ भाग केन्द्रीय बैंक के पास जमा कराते हैं। जिस दर पर व्यापारिक बैंक को नकद राशि जमा करानी पड़ती है उसे नकद जमा अनुपात कहते हैं ।

न्यून माँग को ठीक करने के लिए केन्द्रीय बैंक नकद जमा अनुपात (CRR) की दर को बढ़ा सकता है। ऐसा करने से व्यापारिक बैंकों के पास नकद राशि बढ़ जाएगी और वे अधिक साख का सृजन कर सकेंगे। परिणामस्वरूप उपभोग प्रवृत्ति एवं उपभोग अधिक होंगे। इस प्रकार समग्र माँग का अभाव कम हो सकेगा ।

(iii) संवैधानिक तरलता अनुपात-माँग जमाओं की मांग को पूरा करने के लिए व्यापारिक बैंक को जिस दर पर नकद मुद्रा रखनी पड़ती है उसे संवैधानिक तरलता अनुपात (SLR) कहते हैं।

माँग अभाव को अधिक करने के लिए केन्द्रीय बैंक SLR को नीची कर सकता है। इससे व्यापारिक बैंकों के उधार देने की क्षमता बढ़ जाएगी। अधिक साख की वजह से उपभोग का स्तर बढ़ेगा । माँग अभाव का प्रभाव कम हो सकेगा । सरकारी

(iv) खुले बाजार की क्रियाएं इन क्रियाओं के माध्यम से केन्द्रीय बैंक प्रतिभूतियों का क्रय-विक्रय व्यापारिक बैंकों के साथ कर सकता है। “न्यून माँग को ठीक करने के लिए केन्द्रीय बैंक सरकारी प्रतिभूतियों व्यापारिक बैंकों को बेच सकता है । इससे नकद मुद्रा का प्रवाह केन्द्रीय बैंक से व्यापारिक बैंकों की ओर होने लगता है और व्यापारिक बैंकों की साख सृजन क्षमता बढ़ जाती है। परिवारों का उपभोग भी अधिक हो सकता है। इस प्रकार माँग न्यूनता पर नियंत्रण हो सकता है ।

(v) साख को प्रोत्साहन-माँग अभाव से मुक्ति पाने के लिए केन्द्रीय बैंक व्यापारिक बैंकों को अधिक से अधिक साख सृजन करने के निर्देश देने के अलावा अधिक साख सृजन वाले बैंकों को पुरस्कृत भी कर सकता है। अधिक साख से उपभोग में वृद्धि होती है । 

3. अधिमांग का अर्थ बताइए। इसे ठीक करने के मौद्रिक उपाय समझाइए ।

Ans. अर्थब्यवस्था में यदि वस्तुओं एवं सेवाओं की माँग पूर्ण-रोजगार स्तरीय वांछित संमप्र, उत्पादन से ज्यादा होती है तो इसे अधिमांग या मांग आधिक्य कहते हैं। अधिमांग को ठीक करने के लिए केन्द्रीय बैंक जो उपाय करता है उन्हें मौद्रिक उपाय मौद्रिक नीतियाँ कहते हैं। ये उपाय निम्नलिखित हैं-

अग्रिम प्रदान करता है या उनके बिलों के भुगतान पर कटौती करता है उसे बैंक दर कहते हैं अधिमांग को ठीक करने के लिए केन्द्रीय बैंक ऊँची बैंक दर कर सकता है। ऐसा करने से व्यापारिक बैंकों के लिए साख सृजन करना महँगा हो जाता है। अतः कम साख का सृजन होता है। परिणामस्वरूप उपभोग प्रवृत्ति घट जाती है और उपभोग का स्तर कम हो जाता है । समग्र माँग का आधिक्य कम होने लगता है। 

(ii) नकद जमा अनुपात-व्यापारिक बैंक अपनी जमाओं का कुछ भाग केन्द्रीय बैंक के पास जमा कराते हैं । जिस दर पर व्यापारिक बैंक को नकद राशि जमा करानी पड़ती है उसे

(ii) बैंक दर अर्थव्यवस्था का केन्द्रीय बैंक जिस दर पर व्यापारिक बैंकों को उधार या नकद जमा अनुपात कहते हैं । अधिमांग को ठीक करने के लिए केन्द्रीय बैंक नकद जमा अनुपात CRR की दर को बढ़ा है। ऐसा करने से व्यापारिक बैंकों के पास नकद राशि कम रह जाएगी और कम साख सकता का सृजन कर सकेंगे । परिणामस्वरूप उपभोग प्रवृत्ति एवं उपभोग कम होंगें। इस प्रकार समग्र माँग का आधिक्य कम हो सकेगा । 

(iii) संवैधानिक तरलता अनुपात – माँग जमाओं की माँग को पूरा करने के लिए व्यापारिक बैंक को जिस दर पर नकद मुद्रा रखनी पड़ती है उसे संवैधानिक तरलता अनुपात (SLR ) कहते हैं।

माँग आधिक्य को कम करने के लिए केन्द्रीय बैंक SLR को ऊँची कर सकता है । व्यापारिक बैंकों के उधार देने की क्षमता घट जाएगी। कम साख की वजह से उपभोग का स्तर घटेगा और मांग आधिक्य का प्रभाव कम हो सकेगा ।

(iv) खुले बाजार की क्रियाए इन क्रियाओं के माध्यम से केन्द्रीय बैंक सरकारी प्रतिभूतियों का क्रय-विक्रय व्यापारिक बैंकों के साथ कर सकता है ।

अधिमाॅग को ठीक करने के लिए केन्द्रीय बैंक सरकारी प्रतिभूतियों व्यापारिक बैंक को बेच सकता है । इससे नकद मुद्रा का प्रवाह व्यापारिक बैंकों से केन्द्रीय बैंक की ओर होने लगता है और व्यापारिक बैंकों की साख सृजन क्षमता घट जाती है। परिवारों का उपभोग भी कम हो जाता है । इस प्रकार माँग आधिक्य पर नियंत्रण हो सकता है ।

(v) साख की राशनिंग-केन्द्रीय बैंक यदि व्यापारिक बैंकों की साख सृजन की उच्च सीमा तय कर देता है तो इसे साख की राशनिंग कहते हैं । साख राशनिंग होने से व्यापारिक बैंक निश्चित सीमा से अधिक साख का सृजन नहीं कर सकते हैं। इस प्रकार परिवारों का उपभोग भी नियंत्रण में रहता है। माँग आधिक्य बेकाबू नहीं हो पाता है ।

 4. आय एवं रोजगार का परम्परावादी सिद्धान्त समझाइए ।

Ans. आय एवं रोजगार के परम्परावादी सिद्धान्तों में जे. बी. से का बाजार नियम सबसे प्रमुख है से के नियम के अनुसार आपूर्ति अपनी माँग की स्वयं ही जननी होती है। दूसरे शब्दों में, यदि उत्पादन हो तो उसके लिए बाजार भी पैदा हो जाता है। कीमत तत्त्व के सहारे चलने वाली अर्थव्यवस्था में अति उत्पादन, बेरोजगारी एवं मुद्रा स्फीति की समस्या उत्पन्न नहीं होती है ।

 यदि उपरोक्त कोई समस्या उत्पन्न हो जाती है तो लोचशील वस्तु की कीमत, लोचशील मजदूरी दर एवं लोचशील ब्याज दर से स्वतः ही ठीक हो जाती है । अतः परम्परावादी सिद्धान्त में सरकारी हस्तक्षेप को नकारा गया है। मजदूरी कीमत नम्यता मिलकर ऐसे स्वचालित बाजार प्रक्रिया निम्नलिखित ढंग से कायम रहती है।

(i) वस्तु बाजार- कीमत नम्यता के आधार पर वस्तु बाजार में सदैव संतुलन की स्थिति हती है। आपूर्ति माँग की जननी होती है। उत्पादन से आय का सृजन होता है। सृजित आय उत्पादन साधनों को प्राप्त होती है साधनों के स्वामी वस्तुओं की मांग करते हैं। यदि किसी 1 समय समग्र आपूर्ति, समंग्र माँग से अधिक हो जाती है तो कीमत नम्यता के कारण वस्तुओं अ सान्य कीमत स्तर गिर जाता है। अतः समग्र माँग बढ़ने लगती है। कीमत में परिवर्तन  के कारण समग्र माँग में परिवर्तन उस स्थिति तक जारी रहता है जब तक समग्र मांग, आपूर्ति के बराबर होती है ।

 (ii) श्रम बाजार से के अनुसार श्रम बाजार में सदैव पूर्ण रोजगार की स्थिति पायी है। यदि किसी समय अनैच्छिक बेरोजगारी उत्पन्न होती है तो मजदूरी नम्यता उसे स्वतः कर देती है । प्रचलित मजदूरी दर पर सबको काम मिल जाता है। बेरोजगारी की अवस्था मजदूरी दर गिर जाती है। कम मजदूरी दर पर श्रम की माँग अधिक होती है। अतः उ उस बिन्दु पर होता है जहाँ विश्राम वस्तुओं एवं सेवाओं के उत्पादन में ज्यादा महत्त्वपूर्ण होता ।

(iii) मुद्रा बाजार से के नियमानुसार मुद्रा की माँग एवं आपूर्ति दोनों ब्याज सापेक्ष है एवं दोनों सन्तुलन में होती है। मुद्रा की माँग निवेश के लिए की जाती है तथा मुद्रा का बचत के द्वारा होती है । ब्याज दर बचत एवं निवेश को सन्तुलन में रखती है संक्षेप में अर्थव्यवस्था में सन्तुलन का निर्धारण तोचशील कीमत, लोच मजदूरी पर लोचशील ब्याज दर से होता है। कीमत-मजदूरी नम्यता के द्वारा स्वचालित सन्तुलन कायम रहती है । 

5. उपयोग प्रवृत्ति को प्रभावित करने वाले कारक समझाइए ।

Ans. उपभोग प्रवृत्ति को निम्नलिखित कारक प्रभावित करते हैं- 

(i) राष्ट्रीय आय जे. एम. कीन्स ने उपभोग प्रवृत्ति का सबसे प्रमुख निर्धारित को बताया है । आय के बढ़ने पर उपभोग बढ़ता है परन्तु आय के बढ़ने पर उपभोग घटती है और आय के घटने पर वह घटता है । 

(ii) आय का वितरण-धन के असमान रूप से वितरण होने पर समाज के धनी बचत क्षमता बढ़ जाती है । परिणामस्वरूप उपभोग प्रवृत्ति घटती है । अतः उपभोग प्वृद्धि के लिए आय का समान वितरण आवश्यक है । 

(iii) भावी परिवर्तन-भविष्य में होने वाली घटनाओं के प्रति अपेक्षाओं से भी अपने प्रवृत्ति प्रभावित होती है । यदि किसी युद्ध या अन्य प्रकार के संकट की सम्भावना हो तो लो अधिक वस्तुओं का क्रय करेंगे और इससे उपभोग प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलेगा ।

(iv) साख की उपलब्धता -आजकल उपभोक्ताओं को किस्त व साख सुविधाएँ लगी हैं। उपभोक्ता नयी-नयी वस्तुओं जैसे मकान, कार आदि उधार क्रय करते हैं या

सुविधा प्राप्त कर किस्तों में कूद कर सकते हैं जिससे उपभोग प्रवृत्ति बढ़ती है।

(v) व्याज दर में परिवर्तन-यदि ब्याज में वृद्धि हो जाती है तो ऊँची ब्याज दर का उठाने के उद्देश्य से लोग उपभोग कम करके अधिक बचत करते हैं। अर्थात् उपभोग कम हो जाती है। 

(vi) कर नीति-यदि सरकार ज्यादा कर लगाती है तो प्रयोज्य आय कम हो जात परिणामस्वरूप उपभोग प्रवृत्ति कम हो जाती है तथा इसके विपरीत यदि सरकार कम कर है तो प्रयोग आप यह जाती है परिणामस्वरूप उपभोग प्रवृत्ति बढ़ जाती है। 

(vii) लाभांश नीति–यदि निगम अथवा संयुक्त पूँजी कम्पनियाँ अधिक धन सुरक्षित में रखने का निर्णय लेती हैं अर्थात् अंशधारियों को कम राशि लाभांश के रूप में वितरित क हैं तो लोगों को कम आय प्राप्त होगी और उपभोग कम होगा । 

(vii) भविष्य में आप परिवर्तन की सम्भावना-यदि भविष्य में लोगों को आप बढ़ोतरी की उम्मीद होती है तो वर्तमान उपभोग प्रवृत्ति बढ़ जाती है तथा इसके विपरीत भविष्य में लोगों को आय में कमी की उम्मीद होती है तो वर्तमान उपभोग प्रवृत्ति कम हो जाती

16. राजकोषीय नीति किसे कहते हैं? यह किस प्रकार माँग-अभाव एवं मांग की स्थिति को नियंत्रित कर सकती है ? Or, प्रमुख राजकोषीय संयंत्रों का वर्णन कीजिए।

Ans. सरकार करारोपण, सार्वजनिक ऋण आदि स्रोतों से सार्वजनिक आय प्राप्त है तथा इसे प्रशासन, प्रतिरक्षा, सार्वजनिक सेवाओं पर सार्वजनिक व्यय करती है। ये सब राजकोषीय क्रियाएँ हैं। इन क्रियाओं के निर्देशन एवं नियंत्रण से संबंधित नीति को कोषीय नीति कहते हैं। दूसरे शब्दों में, सार्वजनिक व्यय के नियंत्रण और निर्देशन से संबंधित को ‘राजकोषीय नीति’ कहते हैं। सार्वजनिक व्यय और सार्वजनिक आय मुख्य राजकोषीय उपकरण हैं। करारोपण, सार्वजनिक

आय का मुख्य स्रोत है। अब हम यह देखेंगे कि संयंत्रों को मांग के अभाव तथा माँग आधिक्य 17 स्थितियों को नियंत्रित करने के लिए कैसे प्रयोग में लाया जाता है। सार्वजनिक व्यय एवं करारोपण दो महत्वपूर्ण राजकोषीय उपाय हैं जिनके माध्यम से माँग आधिक्य एवं माँग में अभाव की स्थितियों को नियंत्रित किया जाता है। 

7. मौद्रिक नीति किसे कहते हैं? यह किस प्रकार अधिक एवं अप्रभाव माँग की स्थिति को दूर करने में सहायक है ?

Ans. मुद्रा एवं साख की मात्रा के नियंत्रण एवं निर्देशन से संबंधित सरकार की नीति को ‘मौद्रिक नीति’ कहते हैं। मौद्रिक नीति को देश के केन्द्रीय बैंक द्वारा लागू किया जाता है। भारत में मौद्रिक नीति को रिजर्व बैंक लागू करता है। मौद्रिक नीति का मुख्य कार्य-क्षेत्र निश्चित उद्देश्यों की पूर्ति के लिए साख की मात्रा को नियंत्रित करना है।

“साख की मात्रा में वृद्धि होने पर निवेश व्यय बढ़ता है और इससे समग्र माँग का स्तर बढ़ता है। इसके विपरीत साख की मात्रा के कम होने पर निवेश व्यय कम होता है और इससे समग्र माँग कम होती है। साख की मात्रा को नियंत्रित करने के लिए केन्द्रीय बैंक द्वारा अपनाए गर सभी उपायों को मौद्रिक नीति के उपकरण कहते हैं। मुख्य मौद्रिक उपाय निम्नांकित हैं-

(i) साख सृजन क्षमता को प्रभावित करना जिस दिशा में साख क्षमता अथवा बैंक की तरलता स्थिति प्रभावित होती है उसी दिशा में निवेश व्यय प्रभावित होता है। 

8. रोजगार के परम्परावादी सिद्धान्त तथा केन्ज (कीन्स) के सिद्धान्त में अन्तर स्पष्ट कीजिए ।

Ans.

परम्परावादी सिद्धान्तकेन्ज (कीन्स) के सिद्धान्त
(i) इस सिद्धान्त के अनुसार आय तथा रोजगार का निर्धारण पूर्ण रोजगार स्तर पर होता है।(i) इस सिद्धान्त के अनुसार आय तथा रोजगार का निर्धारण उस बिन्दु पर होगा, जहाँ पर समग्र माँग समग्र पूर्ति के बराबर होती है’ इसके लिए पूर्ण रोजगार स्तर का होना जरूरी है।
(i) इस सिद्धान्त के अनुसार पूर्ण रोजगार पूँजीवादी अर्थव्यवस्था की एक सामान्य स्थिति है ।(ii) अपूर्ण रोजगार संतुलन की एक सामान्य स्थिति है । पूर्ण-रोजगार की स्थिति तो एक आदर्श स्थिति है।
(iii) कीमत मजदूरी नम्यता के कारण पूर्ण रोजगार की स्थिति पायी जाती है ।(iv) समग्र पूर्ति कीमत के प्रति पूर्णतः लोचशील होती है ।
(iv) समय पूर्ति कीमत के प्रति पूर्णतः लोचहीन होती है।(iii) कीमत मजदूरी अनम्यता के कारण आपूर्ति पूर्णतः लोचशील होती है और अर्थव्यवस्था अपूर्ण रोजगार स्तर से पूर्ण रोजगार स्तर की ओर बढ़ सकती है ।
(v) यह सिद्धान्त से के बाजार नियम की मान्यताओं पर आधारित है ।(v) यह सिद्धान्त उपभोग के मनोवैज्ञानिक नियम पर आधारित है ।
(vi) इस सिद्धान्त में प्रतिबन्धात्मक स्वैच्छिक बेरोजगारी हो सकती है (vi) इस सिद्धान्त में अभावी माँग के कारण बेरोजगारी की अवस्था हो सकती है।
(vii) परम्परावादी सिद्धान्त के अनुसार पूँजीवादी अर्थव्यवस्था कीमत-तंत्र द्वारा संचालित होती है आर्थिक शक्तियों की स्वतंत्र क्रियाशीलता अर्थव्यवस्था मैं संतुलन स्थापित कर देती है ।(vii) केन्ज ने आर्थिक क्रियाओं में सरकारी हस्तक्षेप का समर्थन किया क्योंकि इनका मानना था कि कुल माँग और कुल पूर्ति में स्वतः समायोजन नहीं होता। इसके लिए सरकारी हस्तक्षेप की आवश्यकता पड़ती है ।
(viii) यह सिद्धान्त दीर्घकालीन मान्यता पर आधारित है।(viii) यह सिद्धान्त अल्पकालीन मान्यता पर आधारित है ।
(ix) परम्परावादी अर्थशास्त्रियों के अनुसार अर्थव्यवस्था में सामान्य अति-उत्पादन तथा सामान्य बेरोजगारी की कोई संभावना नहीं हो सकती है ।(ix) सामान्य अति उत्पादन तथा सामान्य बेरोजगारी संभव है ।

CLASS 12 NCERT SOLUTION IN ENGLISHCLASS12 NCERT SOLUTION IN HINDI
Historyइतिहास
Geography भूगोल
Political science राजनीति विज्ञान
English SubjectResult
Hindi SubjectHistory answer keys
Sociology समाज शास्त्र

FAQs


Q. ‘ऋणात्मक बचत’ से आपका क्या अभिप्राय है ?

Ans. इसका अर्थ है कि उपभोग आय से अधिक है तथा उपभोग को या तो पिछली ब से या उधार लेकर पूरा किया गया है।

Q. यदि समग्र पूर्ति समग्र माँग से अधिक हो जाती है तो राष्ट्रीय आय का क्या होता है ?

Ans. राष्ट्रीय आय में घटने की प्रवृत्ति पाई जाती है।

Q. यदि समग्र माँग समग्र पूर्ति से अधिक हो जाती है तो राष्ट्रीय आय का क्या होता है ?

Ans. राष्ट्रीय आय में बढ़ने की प्रवृत्ति पाई जाती है। 


कक्षा 12 अर्थशास्त्र एनसीईआरटी नोट्स


  1. व्यष्टि अर्थशास्त्र
  2. उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत
  3. उत्पादन तथा लागत
  4. पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत
  5. बाजार संतुलन
  6. प्रतिस्पर्धारहित बाजार
  1. परिचय
  2. राष्ट्रीय आय का लेखांकन
  3. मुद्रा एवं बैंकिंग
  4. आय का निर्धारण
  5. सरकार: कार्य और विषय क्षेत्र
  6. खुली अर्थव्यवस्था: समष्टि अर्थशास्त्र

वस्तुनिष्ठ प्रश्न MCQs


  1. व्यष्टि अर्थशास्त्र
  2. उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत
  3. उत्पादन तथा लागत
  4. पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत
  5. बाजार संतुलन
  6. प्रतिस्पर्धारहित बाजार
  1. परिचय
  2. राष्ट्रीय आय का लेखांकन
  3. मुद्रा एवं बैंकिंग
  4. आय का निर्धारण
  5. सरकार: कार्य और विषय क्षेत्र
  6. खुली अर्थव्यवस्था: समष्टि अर्थशास्त्र

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