अर्थशास्त्र-II कक्षा 12वीं अध्याय 6 नोट्स | Economics-II Class 12 Chapter 6 Questions And Answers In Hindi Easy PDF

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अर्थशास्त्र-II कक्षा 12वीं अध्याय 6 नोट्स | Economics-II Class 12 Chapter 6 Questions And Answers In Hindi Easy PDF, अर्थशास्त्र नोट्स Class 12 PDF Download


खुली अर्थव्यवस्था : समष्टि अर्थशास्त्र | OPEN ECONOMY: MACRO ECONOMICS


पूँजी खाता : यह वित्तीय लेन-देन से संबंधित होता है। इसमें सभी प्रकार के अल्पकालीन और दीर्घकालीन पूँजी अन्तरण शामिल किए जाते हैं। चालू खाता : भुगतान शेष का चालू खाता अल्पकालिक सौदों (प्राप्ति तथा भुगतान) को दर्शाता है। इसमें दृश्य एवं अदृश्य दोनों प्रकार की मर्दे सम्मिलित होती हैं।

व्यापार शेष : वस्तुओं के निर्यात मूल्य तथा वस्तुओं के मूल्य का अन्तर व्यापार शेष कहलाता है। आर्थिक सौदे मूल्य के सौदे को आर्थिक सौदे कहते हैं। यह एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें : आर्थिक वस्तुओं के स्वामित्व में परिवर्तन होता है और एक देश के निवासी दूसरे देश के निवासी को आर्थिक सेवाएँ प्रदान करते हैं।

स्थिर विनिमय बाजार स्थिर विनिमय दर के अन्तर्गत विनिमय दर का निर्धारण सरकार के द्वारा किया जाता है। विनिमय दर प्रायः स्थिर रहती है। यदि इसमें कोई परिवर्तन होता भी है तो दर निर्धारित सीमाओं के अंतर्गत होता है। अवमूल्यन : इस बाजार में विदेशी मुद्राओं का क्रय-विक्रय किया जाता है।

दृश्य व्यापार : वस्तुओं के निर्यात और आयात को दृश्य व्यापार कहते हैं। व्यापार शेष : व्यापार शेष दृश्य निर्यात और दृश्य आयात का अंतर है। भुगतान शेष भुगतान एक ऐसा लेखा है जिसमें एक देश के दूसरे देशों से होनेवाले सभी आर्थिक लेन-देनों का उल्लेख होता है। यह एक देश की विश्व के अन्य देशों से प्राप्तियाँ तथा अन्य देशों को दिये गये भुगतानों को दर्शाता है।

भुगतान शेष के घटक : (a) चालू खाता तथा (b) पूँजी खाता। भुगतान शेष की अन्य मदें (a) भूलचूक तथा (b) सरकारी रिजर्व सौदे सम्मिलित किए जाते हैं।  

भुगतान शेष के चालू खाते की मदें : (a) दृश्य वस्तुओं का आयात तथा निर्यात ।

(b) अदृश्य मदों का आयात तथा निर्यात, (c) यात्रियों के खर्च, (e) निवेश आय, (d) विशेषज्ञों की सेवायें, (f) सरकारी लेन-देन, (g) दान व उपहार (h) फीस तथा रॉयल्टी आदि । 

भुगतान शेष की प्रतिकूलता जब किसी देश को अपने भुगतान को संतुलित रखने के लिए स्वर्ण देना पड़ता है अथवा अल्पकालिक ऋण लेने पड़ते हैं तो इस स्थिति को भुगतान शेष की प्रतिकूलता कहते हैं।



भुगतान शेष में असंतुलन : यह असंतुलन बचत वाला भी और घाटे वाला भी हो सकता है। विदेशी विनिमय दर के प्रकार (a) स्थिर विदेशी विनिमय दर तथा (b) लोचशील विदेशी विनिमय दर |

विदेशी मुद्रा की माँग : विदेशी मुद्रा की माँग कई उद्देश्य की प्राप्ति के लिए की जाती है। आयातों की मात्रा, विदेशी ऋण, विदेशी सहायता, विदेशों में निवेश आदि विदेशी मुद्रा माँग व संबंध उसकी कीमत से विपरीत होता है। की • विदेशी की साम्य दर का निर्धारण विदेशी साम्य के विनिमय दर का निर्धारण उस बिंदु पर होता है जहाँ विदेशी मुद्रा की माँग पूर्ति के बराबर होती है।


Economics-II Class 12 Chapter 6 Questions And Answers In Hindi


Class12th 
Chapter Nameखुली अर्थव्यवस्था : समष्टि अर्थशास्त्र
Chapter numberChapter 6
PART B
Book NCERT
Subjectअर्थशास्त्र | Economics
Medium Hindi | हिंदी
Study Materialsनोट्स & question answer
Download PDFClass 12 economics-II Chapter 6 pdf
II कक्षा 12वीं अध्याय 6 नोट्स Economics II Class 12 Chapter 6 Questions And Answers In Hindi Easy PDF

VERY SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS


1. विदेशी विनिमय दरों में परिवर्तन को क्या कहते हैं ?

Ans. विदेशी विनियम दरों में परिवर्तनों को मुका अवमूल्यन या अवमूल्यन कहते हैं। 

2. स्थिर विनिमय दर की परिभाषा लिखें।

 Ans. स्थिर विनिमय दर से अभिप्राय उस विनिमय दर से है जो एक निश्चित स्तर पर रहती है। इसमें गुद्रा की माँग व पूर्ति में परिवर्तन होने पर परिवर्तन नहीं होता है ।

 3. क्या स्थिर विनिमय दर से भुगतान शेष घाटे या अधिशेष को समायोजित किया जा सकता है ? 

Ans. स्थिर विनिमय दर से भुगतान शेष घाटे या अधिशेष को समायोजित नहीं किया जा सकता है।

4. प्रबंधित तरणशील विनिमय दर का अर्थ लिखें।

Ans. प्रबंधित तरणशील विनिमय दर स्थिर विनिमय दर तथा सोचशी विनिमय दर का मिश्रण होती है। इस प्रणाली में प्रत्येक अर्थव्यवस्था का केन्द्रीय बैंक विनिमय दर में मामूली परिवर्तन के द्वारा विदेशी मुद्रा को क्रय विक्रय में हस्तक्षेप कर सकता है ।

 5. उन देशों के नाम लिखें जिन्होंने लोचशील विनिमय दर को अपनाया।

Ans. 1970 के दशक के आरंभ में स्विट्जरलैंड एवं जापान ने लोचशील विनिमय दर को अपनाया था। 

6. एक बंद अर्थव्यवस्था में घरेलू वस्तुओं के माँग के स्रोत लिखें। 

Ans. घरेलू वस्तुओं की माँग के स्रोत (1) उपभोग, (ii) सरकारी उपभोग, (iii) घरेलू निवेश |

7. खुली अर्थव्यवस्था में घरेलू वस्तुओं की माँग के स्रोत लिखें। 

Ans. घरेलू वस्तुओं की माँग के स्रोत- (i) उपभोग, (ii) सरकारी व्यय, (iii) घरेलू निवेश, (iv) शुद्ध निर्यात । 

9. आधुनिक अर्थव्यवस्थाएँ कैसी है? 

Ans. आधुनिक अर्थव्यवस्थाएं खुली अर्थव्यवस्थाएँ है ।

10. एक खुली अर्थव्यवस्था क्या होती है ?

Ans. एक खुली अर्थव्यवस्था वह अर्थव्यवस्था होती है जिसके दूसरी अर्थव्यवस्थाओं के साथ आर्थिक संबंध होते हैं खुली अर्थव्यवस्था कहलाती है । 

11. अर्थव्यवस्था के खुलेपन की माप क्या होती है ? 

Ans. कुल विदेशी व्यापार (आयात व निर्यात का सकल घरेलू उत्पाद के साथ अनुपात की अर्थव्यवस्था के खुलेपन को मापते हैं । 

12. 2004-05 में भारत का विदेशी व्यापार कितना था ? 

Ans. 2004-05 में भारत का विदेशी व्यापार सकल घरेलू उत्पाद का 38.9 प्रतिशत इसमें 17.1 प्रतिशत आयात व 11.8 प्रतिशत निर्यात था ।

13. वर्ष 1985-86 में भारत का विदेशी व्यापार कितना था ? 

Ans. 1985-86 में भारत का विदेशी व्यापार सकल घरेलू उत्पाद का 16 प्रतिशत था।

14. विदेशी आर्थिक एजेन्ट राष्ट्रीय मुद्रा को कब स्वीकार करते हैं? 

Ans. विदेशी आर्थिक एजेन्ट राष्ट्रीय मुद्रा को तब स्वीकार करते हैं जब उन्हें विश्वा होता है मुद्रा की क्रय शक्ति स्थिर रहेगी ।

15. मुद्रा का अधिक मात्रा में प्रयोग करने वाले लोगों का विश्वास जीतने के लिए सरकार क्या काम करती है ?

Ans. सरकार को यह घोषणा करनी पड़ती है कि मुद्रा को दूसरी परिसंपत्तियों में स्थिर कीमतों पर परिवर्तित किया जायेगा ।

16. भुगतान शेष के चालू रखते में क्या दर्ज किया जाता है ? 

Ans. वस्तुओं एवं सेवाओं का निर्यात-आयात तथा हस्तांतरण भुगतान चालू खाते में दर्ज किए जाते हैं।

17. भुगतान शेष के पूँजीगत खाते में क्या दर्ज किया जाता है ? 

Ans. भुगतान शेष के पूँजीगत खाते में मुद्रा, स्टॉक, बॉण्ड आदि का विदेशी के साथ क्रय-विक्रय दर्ज किया जाता है।

18. अन्तर्राष्ट्रीय भुगतानों का सार क्या होता है ?

Ans. अन्तर्राष्ट्रीय भुगतानों का सार है कि आप से अधिक खर्च की विदेशी ऋण आदि के द्वारा की जायेगी ।

19. चालू खाते में घाटे का वित्तीय स्रोत लिखें।

Ans. चालू खाते में घाटे का वित्तीय स्रोत शुद्ध पूँजी प्रवाह से किया जाता है । 

20. वह अवधि लिखें जिसमें भारत का व्यापार शेष घाटे वाला था।

Ans. लगभग 24 वर्ष भारत का व्यापार शेष घाटे वाला था ।

21. वह अवधि लिखें जिसमें भारत का व्यापार शेष घाटा कम हो गया और अधिशेष में बदल गया।

Ans. 2001-02 से 2003-04 की अवधि में भारत का चालू घाटे में अधिशेष था ।

22. चालू खाते में अधिक घाटे को किससे पूरा नहीं चाहिए ? 

Ans. अदृश्य अधिशेष से चालू खाले के घाटे की भरपाई नहीं करना चारिण। 

23. भुगतान शेष के समग्र घाटे (अधिशेष) का अर्थ लिखो।

Ans. आधिकारिक आरक्षित कोष में कमी (वृद्धि) को भुगतान शेष का समय प (अधिशेष) कहते हैं।

24. भुगतान शेष का मूल वचन ( वायदा) क्या है ? 

Ans. भुगतान शेष का मूल वचन यह है कि मौद्रिक सत्ता भुगतान शेष के किसी घाटे को पूरा करने के लिए उत्तरदायी होती है।

25. एक अर्थव्यवस्था साम्य की अवस्था में कब कही जाती है ? 

Ans. एक अर्थव्यवस्था भुगतान शेष के संबंध में सन्तुलन में कही जाती है जब इसके चालू खाते तथा पूँजी खाते के गैर आरक्षित कोर्यो का योग शून्य होता है ।

26. भुगतान शेष के चालू खाले को सन्तुलित करने की विधि लिखो ।

Ans. बिना आरक्षित कोष में परिवर्तन किए अन्तर्राष्ट्रीय उधार से चालू खाते को संतुलित किया जाता है।

27. किन मदों को रेखा से ऊपर कहते हैं?

Ans. स्वायत्त मदों को रेखा से ऊपर कहते हैं । 

28. स्वायत्त मदों का अर्थ लिखो।

Ans. ऐसे विनिमय (लेन-देन) जो भुगतान शेष की स्थिति से स्वतंत्र होते हैं, स्वायत्त मे कहलाती हैं।

29. किन मदों को रेखा से नीचे कहा जाता है ?

Ans. समायोजन मर्दों को रेखा से नीचे कहा जाता है ।

30. आधिकारिक लेन-देन किस श्रेणी में रखे जाते हैं ? 

Ans. आधिकारिक लेन-देन समायोजन या रेखा से नीचे वाले मदों में रखे जाते हैं।


लघु उत्तरीय प्रश्न (SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS)


1. विस्तृत सीमा पट्टी व्यवस्था पर चर्चा करें। 

Ans. विस्तृत सीमा पट्टी व्यवस्था में देश की सरकार अपनी मुद्रा की विनिमय दर की घोषणा करती है । परन्तु इस व्यवस्था में स्थिर घोषित विनिमय दर के दोनों ओर 10 प्रतिश उतार-चढ़ाव मान्य होने चाहिए । इससे सदस्य देश अपने भुगतान शेष के समंजन का आसानी से कर सकते हैं । 

उदाहरण के लिए यदि किसी देश का भुगतान शेष घाटे का है तो इस समस्या से छुटकारा पाने के लिए उस देश को अपनी मुद्रा की पर 10 प्रतिशत तक घटाने की छूट होनी चाहिए । मुद्रा की दर कम होने पर दूसर देशों के लिए उस देश की वस्तुएँ एवं सेवाएँ सस्ती हो जाती है जिससे विदेशों में उस देश की वस्तुओं की भी बढ़ जाती और उस देश को विदेशी मुद्रा पहले से ज्यादा प्राप्त होता है।

2. प्रबंधित सरणशीलता की अवधारणा स्पष्ट कीजिए।

Ans. प्रबंधित तरणशीलता स्थिर एवं सम्य विनिमय दर के बी की व्यवस्था है। व्यवस्था में विनिमय दर को स्वतंत्र रखा जाता है। देश के मौद्रिक अधिकारीपदा करते हैं। मौदिक अधिकारी अधिकारिक रूप से बनाए गए नियमों एवं सूत्रों के अन्तर्गत हस्तक्षेप कर सकते हैं। अधिकारी विनिमय दर तय नहीं करते हैं। 

विनिमय दर के उतार-चढ़ की कोई सीमा तय नहीं की जाती हैं हस्तक्षेप की आवश्यकता महसूस होने पर म अधिकारी समन्वय के लिए उचित कदम उठा सकते हैं। नियमों एवं मार्गदर्शकों के अभाव यह व्यवस्था गन्दी तरनशीलता बन जाती है।

3. क्रय शक्ति समता सिद्धान्त की तीन आलोचनाएँ लिखें। 

Ans. (i) यह सिद्धान्त यह मानता है कि विनिमय दर केवल वस्तुओं के आयात-निर्यात से प्रभावित होती है। जबकि कीमत सूचकांक अनिश्चित एवं अविश्वसनीय होते हैं।

 (ii) अदृश्य मदों की उपेक्षा यह सिद्धान्त यह मानता है कि विनिमय दर केवल वस्तु के आयात-निर्यात से प्रभावित होती है। सेवाएँ प्रभावित नहीं करती है जबकि व्यवहार में यह बात सही नहीं है।

(III) ऊपरी लागतों की उपेक्षा इस सिद्धान्त में परिवहन व्यय की अनदेखी की गई है. जबकि परिवहन व्यय एक देश में वस्तुओं की कीमत कम ज्यादा कर सकता है।

4. लोग विदेशी मुद्रा की माँग किसलिए करते हैं ?

Ans. लोग विदेशी मुद्रा की माँग निम्नलिखित उद्देश्यों की पूर्ति के लिए करते हैं- 

(i) दूसरे देशों से वस्तुओं एवं सेवाओं को खरीदने के लिए ।

 (ii) विदेशों में उपहार भेजने के लिए। 

(iii) दूसरे देश में भौतिक एवं वित्तीय परिसंपत्तियों को क्रय करने के लिए ।

(iv) विदेशी मुद्राओं के मूल्य के संदर्भ में व्यापारिक दृष्टि से सट्टेबाजी के लिए।

(v) विदेशों में पर्यटन के लिए।

(vi) विदेशों में स्वास्थ्य एवं शिक्षा सेवाएँ प्राप्त करने के उद्देश्य के लिए आदि ।

5. भुगतान शेष की संरचना के पूँजी खाते को समझाएँ । 

Ans. पूँजी खातों में दीर्घकालीन पूँजी के लेन-देन को दर्शाया जाता है। इस खाते में निजी व सरकारी पूँजी लेन-देन, बैंकिंग पूँजी प्रवाह में अन्य वित्तीय विनिमय दर्शाए जाते हैं। पूँजी खाते की मदे इस खाते की प्रमुख मदें निम्नलिखित है-

(i) सरकारी पूँजी का विनिमय इससे सरकार द्वारा विदेशों से लिए गए ऋण तथा विदेशों को दिए गए ऋणों के लेन-देन, ऋणों के भुगतान तथा ऋणों की स्थितियों के अलावा विदेशी मुद्रा भण्डार, केन्द्रीय बैंक के स्वर्ण भण्डार, विश्व मुद्रा कोष के लेन-देन आदि को दर्शाया

जाता है। (H) बैंकिंग पूंजी बैंकिंग पूँजी प्रवाह में वाणिज्य बैंकों तथा सहकारी बैंकों की विदेशी लेनदारियों एवं देनदारियों को दर्शाया जाता है। इसमें केन्द्रीय बैंक के पूँजी प्रवाह को शामिल नहीं करते हैं।

(iii) निजी ऋण इसमें दीर्घकालीन निजी पूँजी में विदेशी निवेश ऋण, विदेशी जमा आदि को शामिल करते हैं। प्रत्यक्ष पूँजीगत वस्तुओं का आयात व निर्यात प्रत्यक्ष रूप से विदेशी निवेश में शामिल किया जाता है ।

6. विदेशी विनिमय बाजार में सीमाबन्ध व्यवस्था की भूमिका समझाइए । 

Ans. चलित सीमा बन्ध व्यवस्था स्थिर एवं नम्य व्यवस्थाओं के बीच की व्यवस्था होती है। इस व्यवस्था में एक देश की सरकार विनिमय दर की घोषणा करने के बाद उसे दोनों ओर 1 प्रतिशत परिवर्तन कर सकती है अर्थात् विनिमय दर को 1 प्रतिशत बढ़ा भी सकती है और पटा भी सकती है । 

परन्तु देश के विनिमय भण्डारों की समीक्षा के कारण निश्चित विनिमय र में समय-समय पर संशोधन किए जाते हैं। संशोधन करते वक्त मुद्रा की आपूर्ति व कीमतों में उतार-चढ़ाव का भी ध्यान रखा जाता है। इस व्यवस्था में विनिमय दर की उच्चतम एवं न्यूनतम सीमाओं का निर्धारण किया जाता है। देश के मौद्रिक अधिकारी उच्चतम एवं न्यूनतम सीमाओं के माध्यम से वित्तीय अनुशासन रख सकते हैं। 

17. चालू खाते व पूँजीगत खाते में अंतर स्पष्ट कीजिए ।

Ans.

चालू खातापूंजी खाता
(i) भुगतान शेष के चालू खाते में वस्तुओं व सेवाओं के निर्यात व आयात शामिल करते हैं।भुगतान शेष के पूँजी खातों में विदेशी ऋणों का शामिल लेन-देन, ऋणों का भुगतान व प्राप्तियाँ, बैंकिंग पूँजी प्रवाह आदि को दर्शाते हैं
(ii) भुगतान शेष के चालू खाते के शेष का एक देश की आय पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है। यदि किसी देश का चालू खाते का शेष उस देश के पक्ष में होता है तो उस देश की राष्ट्रीय आय बढ़ती है।भुगतान शेष का देश की राष्ट्रीय आय पर प्रत्यक्ष प्रभाव नहीं पड़ता है ये केवल परिसम्पत्तियों की मात्रा को दर्शाते हैं ।

8. विदेशी मुद्रा के

(i) हाजिर बाजार, तथा (ii) वायदा बाजार क्या होते हैं ? 

Ans. (i) हाजिर बाजार विदेशी विनिमय बाजार में यदि लेन-देन दैनिक आधार पर होते हैं तो ऐसे बाजार को हाजिर बाजार या चालू बाजार कहते हैं। इस बाजार में विदेशी मुद्रा की तत्कालिक दरों पर विनिमय होता है।

(ii) वायदा बाजार विदेशी विनिमय बाजार में यदि लेन-देन भविष्य में देयता के आधार पर होता है तो इसे वायदा बाजार कहते हैं। इस बाजार में भविष्य में निश्चित तिथि पूरी होने पर लेन-देन का काम होता है ।

11. एक अर्थव्यवस्था में शुद्ध निर्यात का अर्थ लिखें।

Ans. एक लेखा वर्ष की अवधि में एक देश के शेष विश्व को निर्यात एवं अर्थव्यवस्था द्वारा शेष विश्व से आयात के अन्तर को शुद्ध निर्यात कहते हैं। जब निर्यात का मूल्य आयात के मूल्य से अधिक होता है तो शुद्ध निर्यात का मूल्य है । जब निर्यात का मूल्य आयात के मूल्य से कम होता है तो शुद्ध निर्यात का मूल्य ऋणात्मक होता है, जब निर्यात का मूल्य आयात के मूल्य के बराबर होता है तो शुद्ध निर्यात शून्य होता है। शुद्ध निर्यात के मूल्य पर व्यापार शेष निर्भर करता है। इसे निम्नलिखित ढंग से व्यक्त किया जा सकता है-

(i) निर्यात आयात = धनात्मक शुद्ध निर्यात = व्यापार शेष (ii) निर्यात आयात = ऋणात्मक शुद्ध निर्यात व्यापार शेष घाटा – = (iii) निर्यात – आयात = शून्य निर्यात = सन्तुलित व्यापार शेष

12. एक अर्थव्यवस्था में आयात की माँग के लिए निर्धारक कारक बताइए । 

Ans. एक अर्थव्यवस्था में आयात की वस्तुओं की माँग के निर्धारक कारक- (i) घरेलू आय एवं (ii) विनिमय दर घरेलू आय का स्तर जितना ऊँचा होता है आयात की माँग भी उतनी ज्यादा होती है। इस प्रकार घरेलू आय तथा आयात की माँग में सीधा संबंध होता है ।

विनिमय दर और आयात में विपरीत संबंध होता है। ऊँची विनिमय दर से आयातित वस्तुएँ महँगी हो जाती हैं । इसलिए ऊँची विनिमय दर पर आयात की जाने वाली वस्तुओं की मात्रा कम हो जाती है।

13. निर्यात की माँग के लिए निर्धारक कारक लिखें। 

Ans. निर्यात की जाने वाली वस्तुओं की माँग निम्नलिखित कारकों पर निर्भर करती है-

(i) विदेशी आय : निर्यात की जाने वाली वस्तुओं की माँग और विदेशी आय में सीधा संबंध होता है, विदेशी आय ऊँची होने पर निर्यात की जाने वाली वस्तुओं की माँग बढ़ जायेगी । 

(ii) विनिमय दर : वास्तविक विनिमय दर व निर्यात-माँग के बीच उल्टा संबंध होता है । ऊँची विनिमय दर पर निर्यातक वस्तु तुलनात्मक रूप से सस्ती हो जाती है। अर्थात् ऊँची विनिमय दर पर निर्यात की माँग अधिक होगी ।

15. आयात में वृद्धि घरेलू आय के चक्रीय प्रवाह में अतिरिक्त स्राव को जन्म देती । समझाइए । 

Ans. उपभोग पर प्रेरित उपभोग का कुछ भाग विदेशी वस्तुओं की माँग पर हस्तांतरित – जाता है। MPC में वृद्धि का मान धनात्मक या शून्य से अधिक होता है। अतः घरेलू वस्तुओं

माँग व घरेलू आय का प्रेरित प्रभाव कम हो जाएगा। इसीलिए आयात के अतिरिक्त वृद्धि रेलू आय के चक्रीय प्रवाह में अतिरिक्त नाव का कारण बनता है । गुणक प्रक्रिया के प्रत्येक चरण में घरेलू आय का अधिक स्राव होता है। व्यय गुणक का न कम हो जाता है ।

16. निर्यात के लिए वस्तुओं को माँग का स्वायत्त व्यय गुणक पर प्रभाव समझाइए । 

Ans. निर्यात के लिए वस्तुओं की माँग घरेलू अर्थव्यवस्था के लिए वस्तुओं की सामूहिक लॉंग को बढ़ाती है । बन्द अर्थव्यवस्था में घरेलू वस्तुओं की माँग में वृद्धि उपभोग, सरकारी व्यय एवं निवेश में वृद्धि के कारण होती है। खुली अर्थव्यवस्था में निर्यात के लिए वस्तुओं की माँग गुणक प्रक्रिया के प्रत्येक चरण में अतिरिक्त अन्तःक्षेपण को जन्म देती है इसलिए स्वायत्त गुणक में वृद्धि होती है। इसकी गणना निम्नलिखित सूत्र से की जाती है-

17. खुली अर्थव्यवस्था के दो बुरे प्रभाव बताइए। 

Ans. खुली अर्थव्यवस्था के दो बुरे प्रभाव निम्नलिखित हैं-

(i) अर्थव्यवस्था में जितना अधिक खुलापन होता है गुणक का मान उतना कम होता है।

(ii) अर्थव्यवस्था जितनी ज्यादा खुली होती है व्यापार शेष उतना ज्यादा घाटे वाला होता है। खुली अर्थव्यवस्था में सरकारी व्यय में वृद्धि व्यापार शेष घाटे को जन्म देती है। खुली अर्थव्यवस्था में व्यय गुणक का प्रभाव उत्पाद व आय पर कम होता है । इस प्रकार अर्थव्यवस्था का अधिक खुलापन अर्थव्यवस्था के लिए कम लाभप्रद या कम आकर्षक होता है । 

18. किस प्रकार से एक अर्थव्यवस्था का दूसरी अर्थव्यवस्थाओं के साथ लेन-देन चयन को व्यापक बनाता है?

Ans. एक अर्थव्यवस्था का दूसरी अर्थव्यवस्थाओं के साथ लेन-देन तीन प्रकार से चयन को व्यापक बनाता है- (i) उपभोक्ताओं एवं उत्पादकों को घरेलू एवं विदेशी वस्तुओं में चयन का अधिक अवसर प्राप्त होता है। इससे वस्तु बाजार का आकार अधिक व्यापक हो जाता है।

(ii) निवेशकों को घरेलू एवं विदेशी पूँजी बाजारों में निवेश करने के लिए अधिक अवसर प्राप्त होते हैं । इससे अनेक पूँजी बाजार आपस में जुड़कर वृहत्त पूँजी बाजार को जन्म देते हैं

(iii) फर्म उत्पादन करने के लिए सर्वोत्तम स्थिति का चयन कर सकतकी है । उत्पादन साधनों विशेष रूप से श्रमिकों को कम करने के लिए सर्वोत्तम विकल्प चुनने के अधिक अवसर प्राप्त होते हैं। 

19. विदेशी व्यापार से अर्थव्यवस्था की सामूहिक माँग किस प्रकार से प्रभावित होती है? 

Ans. विदेशी व्यापार एक अर्थव्यवस्था में सामूहिक माँग को दो प्रकार से प्रभावित करता है-

(i) जब एक देश के निवासी विदेशों से वस्तुओं को खरीदते हैं तो घरेलू आय के चक्रीय प्रवाह में से स्राव होता है इससे उस अर्थव्यवस्था में आय का स्तर गिरता है और अर्थव्यवस्था में सामूहिक माँग का स्तर कम हो जाता है ।

(ii) जब एक देश के निवासी उत्पादक वस्तुओं को विदशों में बेचते हैं तो इससे आय के चक्रीय प्रवाह में अन्तःक्षेपण होता है अर्थात् आय में बढ़ोतरी होती है। सामूहिक माँग का स्तर निर्यात के कारण बढ़ जाता है।

20. स्थायी क्रय शक्ति के विश्वास के अभाव में एक मुद्रा अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में विनिमय का माध्यम अथवा लेखे की इकाई का काम नहीं करती है। टिप्पणी करें।

Ans. जब वस्तुओं का प्रवाह अन्तर्राष्ट्रीय सीमाओं में होता है तो मुद्रा का प्रवाह, वस्तुओं के प्रवाह की विपरीत दिशा में होता है अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अकेली मुद्रा से विनिमय कार्य नहीं होता है । अतः विदेशी आर्थिक एजेन्ट ऐसी किसी मुद्रा को स्वीकार नहीं करते हैं जिसकी क्रय शक्ति में स्थिरता न हो। 

इसलिए सरकार समूचे विश्व को मुद्रा की क्रय शक्ति की स्थिरता का दायित्व लेने का विश्वास दिलाती है। अतः स्थायी क्रय शक्ति के विश्वास के अभाव में कोई भी अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर विनिमय का माध्यम अथवा लेखे की इकाई नहीं बन सकती है।

21. एक मुद्रा की साख को प्रभावित करने वाले कथनों को बताइए। 

Ans. एक मुद्रा की साख कथनों से निम्न प्रकार से प्रभावित होती है-

(i) असीमित रूप से निःशुल्क परिवर्तनीयता का गुण । मुद्रा के परिवर्तन की कीमत जिस मुद्रा में परिवर्तनीयता का गुण जितना अधिक एवं कीमत स्थिरता का दावा पेश किया जायेगा उस मुद्रा की साख उतनी ही ज्यादा होती है । इसके विपरीत मुद्रा में परिवर्तनीयता का गुण जितना कम होगा और कीमत स्थिरता का कमजोर दावा पेश किया जायेगा मुद्रा की साख उतनी ही ज्यादा कमजोर होगी ।

(ii) अन्तर्राष्ट्रीय मौद्रिक संत्ता (पद्धति) जो अन्तर्राष्ट्रीय लेन-देन में स्थिरता का आश्वासन दे।

22. सट्टा उद्देश्य एवं विनिमय दर में संबंध लिखें ।

Ans. अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा बाजार में विनिमय दर निर्यात व आयात के लिए वस्तुओं की माँग व पूर्ति की शक्तियों पर निर्भर करने के साथ-साथ सट्टा उद्देश्य के लिए मुद्रा की माँग पर भी निर्भर करती है । 

अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा बाजार में मुद्रा की माँग मुद्रा के अपमूल्यन से होने वाले संभावित लाभ पर निर्भर करती है। 

मुद्रा अवमूल्यन से जितने अधिक लाभ की संभावना होती। है उतनी अधिक मात्रा में मुद्रा की माँग की जाती है विनिमय दर ऊँची होती है। इसके विपरीत मुद्रा के अवमूल्यन से होने वाली हानि की स्थिति में मुद्रा की माँग कम की जाती है और विनिमय दर नीची पायी जाती है,

 23. व्याज दर एवं विनिमय दर में संबंध लिखिए ।

Ans. अल्पकाल में विनिमय दर निर्धारण में ब्याज दर की भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है । विनिमय दर में चलन ब्याज दरों का अन्तर होता है। बैंकों के कोष, यहुर्राष्ट्रीय कम्पनियों, पनी व्यक्ति ऊँची ब्याज दर की तलाश में पूरे विश्व में घूमते हैं । जिन देशों में ब्याज दर कम होती है उनकी मुद्रा की माँग वक्र बायीं ओर तथा पूर्ति वक्र दायीं ओर खिसक जाता है । इसके विपरीत जिन देशों में ब्याज दर ऊँची पायी जाती है उनकी मुद्रा की माँग वक्र दाय और तथा पूर्ति वक्र बायीं ओर खिसकता है वहाँ मुद्रा का अवमूल्यन होता है । 

24. आय एवं विनिमय दर में संबंध लिखें।

Ans. जब घरेलू आय बढ़ती है तो उपभोक्ताओं का व्यय बढ़ जाता है । घरेलू अर्थव्यवस्था को वस्तुओं की माँग बढ़ने के साथ-साथ आपतित वस्तुओं या विदेशी वस्तुओं की माँग में भी वृद्धि होती है । अर्थात् विदेशी वस्तुओं की खरीद पर व्यय बढ़ जाता है । 

विदेशी वस्तुओं की मांग में वृद्धि होने पर विदेशी मुद्रा का माँग वक्र दायी ओर खिसक जाता है और घरेलू मुद्रा का अवमूल्यन हो जाता है। 

इसके विपरीत यदि विदेशी अर्थव्यवस्थाओं की आय बढ़ती है तो घरेलू अर्थव्यवस्था की वस्तुओं का माँग वक्र अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में दायी ओर खिसक जायेगा इससे घरेलू मुद्रा का अवमूल्यन होगा। अन्य बातें समान रहने पर जिस देश में वस्तुओं की माँग तेजी से बढ़ती है उस देशकी मुद्रा का अवमूल्यन होता है क्योंकि ऐसे देश में निर्यात का मूल्य आयात के मूल्य से अधिक होता है । इस देश में विदेशी मुद्रा की माँग वक्र पूर्ति वक्र की तुलना में ज्यादा दायीं ओर खिसक जाता है ।

25. स्थिर विनिमय दर प्रणाली को समझाइए ।

Ans. स्थिर विनिमय दर सरकार द्वारा तय की जाती है। अर्थव्यवस्था का केन्द्रीय बैंक इस विनिमय दर का निर्धारण करता है। सामान्यतः स्थिर विनिमय दर में कोई परिवर्तन नहीं किया जाता है । केन्द्रीय बैंक विदेशी मुद्रा बाजार में विनिमय दर को स्थिर बनाए रखने के लिए निश्चित सीमाओं के बीच में परिवर्तन कर सकता है। 

केन्द्रीय बैंक विदेशी मुद्राओं का कोष स्थापित करता है इसका प्रयोग विनिमय दर को स्थिर बनाए रखने के लिए किया जाता है। स्थिर विनिमय दर देश की स्टैण्डर्ड मुद्रा सोने (Gold) की मात्रा पर निर्भर करती है। दूसरे शब्दों में, स्थिर विनिमय दर का निर्धारण मुद्रा के सरकार द्वारा घोषित सोने के मूल्यय पर निर्भर करता है। 

माना भारत की सरकार ने एक रुपये की कीमत 1 ग्राम सोना तथा इंग्लैण्ड की सरकार ने एक पौंड कीमत 10 ग्राम सोना तय की तो पीण्ड की विनिमय दर 10 रुपया होगी तथा रुपये की विनिमय दर 11110 पींड होगी। 1977 के बाद इस विनिमय दर का प्रचलन अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के सदस्यों ने समाप्त कर दिया है। 

26. लोचशील विनिमय दर को समझाइए ।

Ans. वह विनिमय दर जो विदेशी मुद्रा बाजार में मुद्रा की माँग व आपूर्ति के सन्तुलन के आधार पर तय की जाती है उसे लोचशील विनिमय दर कहते हैं । लोचशील विनिमय दर विदेशी बाजार में मुद्रा की माँग अथवा आपूर्ति अथवा दोनों में परिवर्तन होने पर बदल जाती है। लोचशील विनिमय दर दो प्रकार की होती है- 

(i) स्वतंत्र लोचशील (ii) प्रबंधित लोचशील स्वतंत्र लोचशील विनिमय दर पूरी तरह मुद्रा की माँग व आपूर्ति की शक्तियों के आधार पर तय होती है केन्द्रीय बैंक इसके निर्धारण में कोई हस्तक्षेप नहीं करता है जबकि प्रवन्धित तोचशील विनिमय दर को प्रभावित करने के लिए केन्द्रीय बैंक विदेशी मुद्राओं का क्रय-विक्रय करता है ।

27. स्थिर और नम्य विनिमय दरों में भेद समझाइए । 

Ans. स्थिर विनिमय दर स्थिर विनिमय दर व्यवस्था के अन्तर्गत एक देश की सरकार अपनी विनिमय दर की घोषणा करती है। यदि दर स्थिर रखी जाती है। इस दर में होने वाले मामूली परिवर्तन भी अर्थव्यवस्था में सहनीय नहीं होते हैं।

नम्य विनिमय दर यदि विनिमय की दर बाजार में आपूर्ति और माँग के सन्तुलन द्वारा तय होती है तो इसे नम्य विनिमय दर कहते हैं। नम्य विनिमय दर का मान बदलत रहता है।

28. विदेशी मुद्रा की माँग को समझाइए । यह विनिमय दर को किस प्रकार प्रभावित करती है।

Ans. एक लेखा वर्ष के दौरान एक देश को समस्त विदेशी दायित्वों का निपटारा करने के लिए जितनी विदेशी मुद्रा की आवश्यकता होती है उसे विदेशी मुद्रा की माँग कहते है एक देश निम्नलिखित कार्यों के लिए विदेशी मुद्रा की माँग करता है-

(i) आयात का भुगतान करने के लिए दृश्य एवं अदृश्य सभी मदें शामिल की जाती है। 

(ii) विदशी अल्पकालीन ऋणों का भुगतान करने के लिए । 

(iii) शेष विश्व में निवेश करने के लिए।

(iv) विदेशों को उपहार या आर्थिक सहायता देने के लिए ।

विदेशी मुद्रा की माँग व विनिमय दर में ‘उल्टा संबंध है। विनिमय दर ऊँची होने पर विदेशी मुद्रा की माँग कम हो जाती है। 

29. भारतीय नागरिकों द्वारा विदेशों में खर्च विदेशी मुद्रा बाजार भारतीय रुपयों की आपूर्ति के समान है। समझाइए । 

Ans. यदि भारत के लोग विदेशों से वस्तुएँ एवं सेवाएँ क्रम करते हैं तो भुगतान करने के लिए भारत के लोगों के पास रुपये होते हैं। परन्तु विदेशी विक्रेता अपनी वस्तुओं एवं सेवाओं का मूल्य अपने देश की मुद्रा में स्वीकार करते हैं। 

अतः भारत के लोग भारतीय मुद्रा रुपये से विदेशी मुद्रा प्राप्त करते हैं। विदेशी मुद्रा के समान भारत के लोग रुपये की आपूर्ति विदेशी मुद्रा बाजार को करते हैं। इस प्रकार भारत के लोग रुपये की आपूर्ति विदेशी मुद्रा बाजार को करते हैं । इस प्रकार भाारत के लोगों का वर्ष विदेशी मुद्रा बाजार को भारतीय रुपयों की आपूर्ति होती है। माना एक भारतीय पर्यटक अमेरिका में बीमार पड़ने पर चिकित्सक की सेवाएँ प्राप्त करता है । 

चिकित्सक की फीस 20 डालर है। भारत के पर्यटक को फीस का भुगतान डालर में करना पड़ेगा । डालर प्राप्त करने के लिए वह रुपयों में भुगतान करेगा । यदि एक डालर की कीमत 40 रुपये है तो वह 20 डालर प्राप्त करने के विदेशी मुद्रा बाजार को 800 रुपये देगा । अतः विदेशी मुद्रा बाजार को 800 रुपये की आपूर्ति होती है।

30. विदेशी मुद्रा की पूर्ति को समझाइए । 

Ans. एक लेखा वर्ष की अवधि में एक देश को समस्त सेनदारियों के बदले जितनी मुद्रा प्राप्त होती है उसे विदेशी मुद्रा की पूर्ति कहते हैं। विदेशी विनिमय की पूर्ति को निम्नलिखित बातें प्रभावित करती हैं-

(i) निर्यात दृश्य व अदृश्य सभी मदे शामिल की जाती हैं। 

(ii) विदेशों द्वारा उस देश में निवेश ।

(iii) विदेशों से प्राप्त हस्तांतरण भुगतान। विदेशी विनिमय की दर तथा आपूर्ति में सीधा संबंध होता है। ऊँची विनिमय दर पर विदेशी मुद्रा की अधिक आपूर्ति होती है।

31. भुगतान शेष तथा राष्ट्रीय आय लेखों के बीच संबंध की व्याख्या करें। 

Ans. अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर दो प्रकार से भुगतान प्राप्त करने एवं भुगतान प्राप्त करने की जरूरत होती है । एक, उत्पादन एवं बिक्री तथा दो, वित्तीय और वास्तविक परिसंपत्तियों का क्रय-विक्रय । खुली अर्थव्यवस्था में वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन पर कुल व्यय में निजी उप सरकारी अन्तिम उपभोग, निवेश के अलावा विदेशों द्वारा आयात पर व्यय को शामिल किया जाता है ।

33. व्यापार शेष तथा भुगतान शेष में अन्तर स्पष्ट कीजिए ।

Ans.

व्यापार शेषभुगतान शेष
(i) व्यापार शेष विदेशी विनिमय की एक संकुचित अवधारणा है ।भुगतान शेष विदेशी विनिमय की विस्तृत अवधारणा है।
(i) इसमें निर्यात व आयात की केवल दृश्य मर्दों को शामिल करते हैं ।भुगतान शेष में दृश्य एवं अदृश्य सभी प्रकार की मदों को शामिल करते हैं।
(ii) व्यापार शेष संतुलित एवं असंतुलित भुगतान शेष सदैव संतुलन शेष में हो सकता है।भुगतान शेष सदैव संतुलन शेष में हो सकते हैं
(iv) व्यापार शेष विदेशी आर्थिक विश्लेषण के लिए पूरी जानकारी नहीं देता है।भुगतान शेष विदेशी लेनदारियों व देनदारियों के आर्थिक विश्लेषण के लिए पर्याप्त जानकारी देता है।

35. विनिमय का अल्पकाल तथा दीर्घकाल में संबंध लिखें। 

Ans. समयावधि जितनी अधिक होती है उतने ही व्यापार प्रतिबन्ध जैसे प्रशुल्क, फीस, विनिमय दर आदि समायोजित हो जाते हैं। विभिन्न मुद्राओं में मापी जाने वाले उत्पाद की कीमत समान होनी चाहिए लेकिन लेन-देन का स्तर भिन्न-भिन्न हो सकता है। इसलिए लम्बी समयावधि में दो देशों के बीच विनिमय दर दो देशों में कीमत स्तरों के आधार पर समायोजित होती है। इस प्रकार देशों में विनिमय की दर दो देशों में कीमतों में अंतर के आधार पर निर्धारित होती है।

35. इन खातों के घटकों की व्याख्या करें- (i) चालू खाता। (ii) पूँजी खाता ।

Ans. (i) चालू खाता : चालू खाते के घटक निम्नलिखित हैं-

(i) वस्तुओं का आयात-निर्यात (ii) सेवाओं का आयात-निर्यात

(iii) एक पक्षीय अन्तरण की प्राप्ति एवं व्यय । वस्तुओं एवं सेवाओं के निर्यात एवं विदेशों से अन्तरण भुगतानों की प्राप्ति को ‘जमा में तथा वस्तुओं एवं सेवाओं के आयात तथा अन्तरण भुगतानों पर व्यय की ‘नामे’ में दर्शाया जाता है।

(ii) पूँजीगत खाता इस खाते में पूँजीगत परिसंपत्तियों तथा दायित्वों का लेन-देन दर्शाया जाता है। इस खाते के घटक निम्नलिखित हैं-

(i) निजी लेन-देन, (iii) प्रत्यक्ष निवेश,

(ii) सरकारी लेन-देन (iv) पत्राचार निवेश ।

एक देश द्वारा विदेशों को परिसंपत्तियों की खरीद को उस देश के पूँजी खाते के नामे में और देश द्वारा विदेशों को परिसंपत्तियों की बिक्री को जमा में दर्शाया जाता है।

36. भुगतान शेष के खातों का महत्त्व लिखिए। 

Ans. भुगतान शेष के खातों का निम्नलिखित महत्त्व है- (i) भुगतान शेष के खाते एक देश की विदेशों से सभी लेनदारियों तथा उस देश की विदेशों को देनदारियों का विवरण प्रदान करते हैं जिससे किसी भी विनिमय के गलत दिशा में जाने पर उसे रोका जा सकता है । 

(ii) इन खातों से अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक लेन-देन की कमजोरियों की जानकारीप्राप्त होती है।

(iii) इन खातों के आधार पर एक देश भादी आर्थिक नीति का निर्माण कर सकता है।

(iv) अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में होने वाले लाभ व हानि की भी जानकारी प्राप्त होती है।

37. भुगतान सन्तुलन की संरचना में शामिल ‘चालू खाते’ पर टिप्पणी कीजिए ।

Ans. भुगतान शेष के चालू खाते में अल्पकालीन वास्तविक सौदों को दर्शाया जाता है। चालू खाते की मदें – अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के अनुसार चालू खाते में निम्नलिखित मदों को दर्शाया जाता है- (i) दृश्य मर्दे-इसमें एक देश द्वारा निर्यात व आयात की जाने वाली सेवाओं को शामिल करते हैं। जैसे-

(ii) अदृश्य मदें – इसमें एक देश द्वारा निर्यात व आयात की जाने वाली सेवाओं को शामिल करते हैं। जैसे- (a) व्यक्तियों द्वारा सेवाओं का विनिमय (सेवाओं का निर्यात व आयात)

(b) व्यापारिक उपक्रमों की सेवाएँ (i) बीमा व बैंकिंग, (ii) परिवहन सेवाएँ, (iii) सरकारी

लेन-देन, (iv) निवेश / पूँजी की आय, (v) हस्तांतरण भुगतान, (vi) विशेषज्ञों की सेवाएँ आदि । चालू खाते का भुगतान शेष निर्यात (दृश्य + अदृश्य मदें) आयात (दृश्य + अदृश्य) । 

38. पत्रचार निवेश क्या है ? परिसंपत्ति की खरीददारी को क्रेता देश के पूँजी खाते में ऋणात्मक चिन्ह के साथ क्यों अंकित किया जाता है ?

Ans. किसी देश द्वारा विदेशों के अंश पत्रों तथा ऋण पत्रों की खरीददारी को पत्राचार निवेश कहते हैं। इस प्रकार के निवेश से क्रेता का परिसंपत्ति पर नियंत्रण नहीं होता है । 

परंपरानुसार यदि कोई देश दूसरे देश से परिसंपत्ति की खरीददारी करता है तो इसे क्रेता देश के पूँजी खाते में ऋणात्मक चिन्ह के साथ दर्शाया जाता है क्योंकि इस लेन-देन में विदेशी मुद्रा का प्रवाह देश से बाहर की ओर होता है। यदि विदेशी मुद्रा का प्रवाह दूसरे देश की तरफ होता है तो इसे ऋणात्मक चिन्ह दिया जाता है। इसके विपरीत यदि विदेशी मुद्रा का प्रवाह दूसरे से उस देश की ओर होता है तो उसे धनात्मक चिन्ह से दर्शाया जाता है ।

39. विशेष आहरण अधिकार व्यवस्था को समझाइए । 

Ans. विशेष आहरण अधिकार व्यवस्था में अन्तर्गत एक देश अपनी मुद्रा के बदले एक तय सीमा के अन्तर्गत अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से जरूरी विदेशी मुद्राएँ प्राप्त कर सकता है । किसी देश के निधि कोष के परिवर्तन उस देश के भुगतान शेष खाते के बाकी सभी घटकों के परिणामस्वरूप होते हैं। इन कोषों की कमी से विदेशों में व्यय करने की जरूरत पूरी होती है ।

कमियाँ उत्पन्न करने से विदेशी मुद्रा का प्रवाह उस देश की ओर होता है अतः भुगतान शेष खाते के जमा पक्ष में प्रविष्टि पाते हैं। यदि कोष में वृद्धि होती है तो विदेशी मुद्रा का प्रवाह देश की ओर कम होता है अतः इसे नामे पक्ष की ओर दर्शाया जाता है ।

 40. किसी देश के केन्द्रीय बैंक द्वारा विदेशी सुरक्षित निधियों का परिवर्तन भुगतान शेष खाते को किस प्रकार प्रभावित करता है ?

Ans. यदि किसी देश का केन्द्रीय बैंक सुरक्षित निधियों में वृद्धि या कमी करता है तो इसे अधिकारिक विदेशी परिसंपत्तियों में परिवर्तन कहते हैं।

यदि किसी देश का केन्द्रीय बैंक विदेशी मुद्रा का सुरक्षित भण्डार बढ़ाता है तो दूसरे देश भुगतान शेष खाते के धनात्मक पक्ष (जमा पक्ष) में प्रविष्टि होगी क्योंकि दूसरे देश में विदेशी के मुद्रा प्रवाह बढ़ेगा या उस देश को विदेशी मुद्रा प्राप्त होगी ।


दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (LONG ANSWER TYPE QUESTIONS)


1. भुगतान शेष के असन्तुलन का क्या अर्थ है? यह कितने प्रकार का होता है ? 

Ans. समुचित भुगतान शेष सदैव सन्तुलन में रहता है। भुगतान शेष से अभिप्राय एक देश की विदेशों से समस्त लेनदारियों व विदेशों के प्रति समस्त दायित्वों के अन्तर से है ।

तुलना पत्र (Balance Sheet) में समस्त लेनदारियाँ व देनदारियाँ बराबर दर्शायी जाती हैं भुगतान शेष के असंतुलन को समझने के लिए भुगतान शेष में शामिल खातों को जानना पड़ेगा (i) बालू खाता : चाले खाते का सन्तुलन = निर्यात (दृश्य अदृश्य) – ( दृश्य अदृश्य)

(ii) पूंजी खाता पूँजी खाते का सन्तुलन = स्वर्ण आदान प्रदान + दीर्घकालीन ऋणों का आदान-प्रदान अल्पकालीन ऋणों का आदान-प्रदान

उपरोक्त दोनों खातों में समग्र रूप से सन्तुलन रहता है । परन्तु चालू खाते में सदैव संतुलन होना जरूरी नहीं है । जब किसी देश के चालू खाते में असंतुलन होता है तो उसे पूँजी खाते से पूरा किया जाता है। इसे पूरा करने के लिए कोई देश आरक्षित स्वर्ण भण्डारों व विदेशी आरक्षित मुद्रा भण्डारों में परिवर्तन कर सकता है। जैसे भुगतान शेष के घाटे को पूरा करने के लिए वह अपने उक्त भण्डारों में कमी कर सकता है।

भुगतान शेष के घाटे को पूरा करने के लिए एक देश विदेशों से अल्पकालीन व दीर्घकालीन ऋण भी ले सकता है । परन्तु भुगतान शेष के घाटे को पूरा करने के लिए उपरोक्त उपाय हमेशा उचित नहीं होते हैं ।

वास्तविक भुगतान शेष को जानने के लिए सन्तुलन के लिए इस्तेमाल किये जाने वाली मदों को अलग रखना चाहिए जैसे स्वर्ण भण्डारों व विदेशी मुद्रा के आरक्षित भण्डारों में कमी, विदेशी से अल्पकालीन या दीर्घकालीन ऋण। यदि इन मर्दों को निकाल कर किसी देश का भुगतान शेष संतुलन में है तो यह वास्तविक सन्तुलन माना जायेगा अन्यथा भुगतान शेष वास्तव में असंतुलन में माना जायेगा । असंतुलन संबंधी तीन स्थितियाँ हो सकती हैं-

(1) सन्तुलित भुगतान शेष निर्यात आयात 

(2) बचत का भुगतान शेष निर्यात आयात

(3) घाटे का भुगतान शेष-निर्यात आयात 

3. किसी अर्थव्यवस्था के लिए भुगतान संतुलन का महत्त्व समझाइए ।

Ans. आर्थिक दृष्टि से किसी देश के लिए भुगतान संतुलन का बड़ा महत्त्व होता है। इस बात की पुष्टि निम्न तथ्यों से हो जाती है-

(i) आर्थिक स्थिति का सूचक भुगतान संतुलन अर्थव्यवस्था की स्थिति के अनेक पक्षों B को उजागर करता है। जिन देशों में भुगतान संतुलन की स्थिति होती है वहीं इसे ठीक माना ।

जाता है जबकि प्रतिकूल भुगतान संतुलन की स्थिति में अर्थव्यवस्था को ठीक नहीं समझा जाता ।

(ii) विदेशी निर्भरता का सूचक भुगतान संतुलन से पता चल जाता है कि कोई देश किस सीमा तक विदेशों पर निर्भर है। किसी देश के भुगतान शेष में प्रतिकूलता जितनी अधिक होती है उसकी अन्य देशों पर निर्भरता उतनी ही ज्यादा होती है ।

(iii) शेष विश्व से प्राप्तियों एवं भुगतानों का ज्ञान शेष विश्व को किए गए कुल भुगतानों व प्राप्तियों का ज्ञान भुगतान संतुलन खाते लग जाता है । 

(iv) अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार की स्थिति का सूचक भुगतान संतुलन के अध्ययन से देश के विदेशी व्यापार की स्थिति का ज्ञान होता है ।

(v) आर्थिक नीतियों का निर्धारण भुगतान संतुलन राष्ट्रीय के अध्ययन से देश में अहम भूमिका निभाता है । अनेक बार भुगतान संतुलन की स्थिति के आधार पर ही देश की आर्थिक नीतियों में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन किए जाते हैं।

(vi) विदेशी निवेश का ज्ञान : भुगतान संतुलन से पता चल जाता है कि विदेशियों द्वारा किसी देश में किए गए निवेश से उनको कितनी आय प्राप्त हुई है और इसी प्रकार किसी देश द्वारा विदेशों में किए गए निवेश से क्या लाभ हो रहा है।

(vii) अन्तर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं के लिए सूचक : भुगतान संतुलन की स्थिति के आधार पर ही अन्तर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाएँ जैसे- विश्व बैंक, अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष आदि किसी देश के लिए सहायता राशि को तय करती है ।

(viii) भुगतान शेष के खातों की सहायता से हम यह जान सकते हैं कि संसार के साथ लेन-देन का देश की अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ता है और वह उन्हें कैसे प्रभावित करती है।

4. भुगतान शेष के चालू एवं पूंजी खाते में सम्मिलित विभिन्न मदों के ब्यौरे दर्शाइए ।

 Ans. चालू खाता- चालू खाते के घटक निम्नलिखित हैं- 

(i) वस्तुओं का आयात निर्यात 

(ii) सेवाओं का आयात निर्यात

(iii) एक पक्षीय अन्तरण भुगतानों की प्राप्ति एवं व्यय वस्तुओं एवं सेवाओं के निर्यात विदेशों से अन्तरण भुगतानों की प्राप्ति जमा में तथा वस्तुओं एवं सेवाओं के आयात तथा अन्तरण भुगतानों पर व्यय को नामे में दर्शाया जाता है। चालू खाते की मदों को तालिका में निम्न प्रकार से दर्शाया जा सकता है

5. विदेशी विनिमय बाजार की कार्यपद्धति के हाजिर बाजार एवं वायदा बाजार चर्चा कीजिए। 

Ans. विदेशी विनिमय बाजार के विश्लेषण में लेन-देन की विधि समय अवधि से होती है। लेन-देन के समय अवधि के आधार पर इसे दो भागों में बाँटा जा सकता है

(i) हाजिर बाजार इस बाजार को चालू बाजार भी कहा जाता है। इस बाजार में लेन- दैनिक आधार पर किया जाता है। किसी देश की मुद्रा की औसत सापेक्ष शक्ति के माम प्रभावी विनिमय दर कहते हैं। प्रभावी विनिमय दर में कीमत परिवर्तन के प्रभावों को स नहीं किया जाता है ।

इसलिए इसे मौद्रिक प्रभावी विनिमय दर भी कहते हैं। विश्व विनि पर सुधार या गिरावट का अनुमान वास्तविक विनिमय दर के आधार पर किया जाता है। केवल चालू खाते के लेन-देनों में संतुलन होता है। इसका आधार यह है कि एक ही मु आकलन करने से सभी देशों में कीमतें एक समान हो जाती हैं । सापेक्ष क्रय शक्ति दर से मकी कीमत वृद्धि दर को विश्व विनिमय दर से जोड़ा जाता है । 

(ii) वायदा बाजार : इस बाजार में लेन-देन भविष्य में देयता के आधार पर होता । इस बाजार में भविष्य में किसी तिथि पर पूरे होने वाले लेन-देन का कामकाज होता है। व्यापार में ज्यादातर लेन-देन उसी दिन पूरे नहीं होते हैं जिस दिन लेन-देन के दस्तावेज दो देश हस्ताक्षर करते हैं ।

लेन-देन उसके कई दिन बाद होता है इसलिए इस बाजार में भाव में होने वाली सम्भावित विनिमय दर पर भी ध्यान दिया जाता है। इससे सदस्य देशो सम्मायित विनिमय दर से उत्पन्न होने वाले जोखिमों का उपाय करने का मौका मिल जाता है वायदा बाजार में ऐसे व्यापारी भागीदार होते हैं जिनको भविष्य में किसी दिन किसी मुद्रा जरूरत होगी अथवा वे मुद्रा की आपूर्ति करेंगे । भविष्य के सौदे करने में दो उद्देश्य होते है

 6. विनिमय दर को प्रभावित करने वाले कारक समझायें।

Ans. विनिमय दर को प्रभावित करने वाले निम्नलिखित कारण हैं- 

(i) पूँजी प्रवाह : पूँजी का अन्त प्रवाह तथा बाह्य प्रवाह में विभिन्नता विदेशी मुद्रा की म तथा पूर्ति को प्रभावित करती है। विदेशी विनिमय दर में परिवर्तन होता है। उदाहरण के लि यदि निवेश के लिए पूँजी का प्रवाह अमेरिका से भारत की ओर हो रहा है, तब विदेशी विनि बाजार में भारतीय रुपये की माँग में वृद्धि होगी। अतः भारतीय रुपये का मूल्य अमेरिकी डा में बढ़ जाएगा।

यदि भारत सरकार अमेरिका से ऋण लेता है तो ऐसी स्थिति में डालर की में वृद्धि होगी तथा डालर में भारतीय रुपये की कीमत में वृद्धि होगी। इसके विपरीत मान लीि कि भारत अमेरिका को ऋण का भुगतान करता है तब डालर रुपये में बढ़ जाएगा। इसका का यह है कि ऋण का भुगतान करने के लिए अमेरिकी डालर की माँग में वृद्धि होगी। 

(ii) बैंक दर : जब एक देश का केन्द्रीय बैंक, बैंक दर में परिवर्तन लाता है, तब विनिम दर में भी परिवर्तन हो जाता है, बैंक दर में कमी आने से पूँजी का बहिःप्रवाह होग परिणामस्वरूप विदेशी मुद्रा की पूर्ति में कमी आएगी और विनिमय दर विदेशी मुद्रा के पक्ष घरेलू मुद्रा के विपक्ष में परिवर्तित होगी। 

(iii) व्यापार का व्यवहार आयात तथा निर्यात का विनिमय दर पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ है। यदि एक देश का निर्यात आयात से अधिक होता है तब विदेशी मुद्रा की माँग बंद हो जा है। इसके विपरीत यदि आयात निर्यात से अधिक होता है तब विदेशी मुद्रा में कमी हो जाती 

(iv) विनिमय दर का नियंत्रण: जब कोई देश विनिमय पर नियंत्रण करता है तो इस विदेशी मुद्रा की माँग कम हो जाती है और विनिमय पर नियंत्रण करने वाले देश की घरेलू मु के पक्ष में विनिमय दर में परिवर्तन होता है।

(v) सट्टेबाजी सट्टा भी विदेशी विनिमय को प्रभावित करता है। यदि सट्टेबाज यह आ करते हैं कि भविष्य में ब्रिटिश पौंड के मूल्य में वृद्धि होगी। तब यह भविष्य में अधिक कीम में विनिमय बाजार में पोंड की माँग बढ़ जायेगी।


CLASS 12 NCERT SOLUTION IN ENGLISHCLASS12 NCERT SOLUTION IN HINDI
Historyइतिहास
Geography भूगोल
Political science राजनीति विज्ञान
English SubjectResult
Hindi SubjectHistory answer keys
Sociology समाज शास्त्र

FAQs


1. विदेशी विनिमय बाजार की परिभाषा लिखें। 

Ans. वह अन्तर्राष्ट्रीय बाजार जिसमें विभिन्न देशों की मुद्राओं का आदान-प्रदान होता है विदेशी विनिमय बाजार कहलाता है ।

2. विदेशी विनिमय बाजार के मुख्य भागीदार के नाम लिखें। 

Ans. विदेशी विनिमय बाजार के मुख्य भागीदार होते हैं- (i) व्यापारिक बैंक, (ii) विदेशी विनिमय एजेन्ट, (iii) आधिकाधिक डीलर्स तथा (iv) मौद्रिक सत्ता ।

3. विनिमय दर की परिभाषा लिखें। 

Ans. एक मुद्रा का दूसरी मुद्रा में मूल्य विनिमय दर कहलाता है ।

4. वास्तविक विनिमय दर की परिभाषा लिखें।

Ans. एक मुद्रा में मापी गई विदेशी कीमत एवं घरेलू कीमत के अनुपात को वास्तविक विनिमय दर कहते हैं । वास्तविक विनिमय दर =ePeP जहाँ c सांकेतिक / मौद्रिक विनिमय दर, P, विदेशी कीमत तथा P घरेलू कीमत

5. लोचशील विनिमय दर की परिभाषा लिखें। 

Ans. वह विनिमय दर जिसका निर्धारण विदेशी मुद्रा की माँग तथा पूर्ति की शक्तियों द्वारा होता है लोचशील विनिमय दर कहलाती है


कक्षा 12 अर्थशास्त्र एनसीईआरटी नोट्स


  1. व्यष्टि अर्थशास्त्र
  2. उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत
  3. उत्पादन तथा लागत
  4. पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत
  5. बाजार संतुलन
  6. प्रतिस्पर्धारहित बाजार
  1. परिचय
  2. राष्ट्रीय आय का लेखांकन
  3. मुद्रा एवं बैंकिंग
  4. आय का निर्धारण
  5. सरकार: कार्य और विषय क्षेत्र
  6. खुली अर्थव्यवस्था: समष्टि अर्थशास्त्र

वस्तुनिष्ठ प्रश्न MCQs


  1. व्यष्टि अर्थशास्त्र
  2. उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत
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  4. पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत
  5. बाजार संतुलन
  6. प्रतिस्पर्धारहित बाजार
  1. परिचय
  2. राष्ट्रीय आय का लेखांकन
  3. मुद्रा एवं बैंकिंग
  4. आय का निर्धारण
  5. सरकार: कार्य और विषय क्षेत्र
  6. खुली अर्थव्यवस्था: समष्टि अर्थशास्त्र

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