NCERT Solutions Entrepreneurship Class 12 Chapter 12 Hindi Notes PDF

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Entrepreneurship Class 12 Chapter 12 Hindi Notes PDF, NCERT Solutions Entrepreneurship Class 12 Chapter 12 Hindi Notes PDF

Entrepreneurship Class 12 Chapter 12 Hindi Notes PDF

Class12th 
Chapter Nameवित्त प्रबंधन | MANAGEMENT FINANCE
Chapter number12
Book NCERT
SubjectEntrepreneurship
Medium Hindi
Study MaterialsImportant questions answers
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वित्त प्रबंधन | MANAGEMENT FINANCE

किसी भी व्यावसायिक या औद्योगिक संस्था के लिए वित्त या पूँजी का होना अनिवार्य है । वित्त का समुचित प्रबंध होने से व्यावसायिक या औद्योगिक संस्था का कारोबार सुचारु रूप से चलाया जा सकता है। वित्त किसी संस्था के लिए रक्त की तरह आवश्यक है। 

जिस प्रकार बिना रक्त के शरीर काम नहीं कर सकता है, उसी प्रकार बिना वित्त के व्यावसायिक क्रियाओं को चलाना कठिन होता है। आधुनिक समय में वित्त का महत्व बहुत अधिक है क्योंकि इसके द्वारा ही व्यावसायिक और औद्योगिक संस्थाओं के कार्यों को अच्छे ढंग से चलाया जा सकता है।

NCERT Solutions Entrepreneurship Class 12 Chapter 4 Hindi Notes PDF

आवश्यक पूँजी और धन के कोष की व्यवस्था करना ही वित्त प्रबंधन कहलाता है। इसके अन्तर्गत स्थिर पूँजी और कार्यशील पूँजी दोनों की व्यवस्था की जाती है। वित्त का प्रबंध करने वाले अधिकारी को वित्त प्रबंधक कहा जाता है। 

मुख्य वित्त प्रबंधक या वित्त संचालक सभी प्रकार की वित्तीय आवश्यकताओं को पूरा करने का दायित्व निभाता है। एक वित्त प्रबंधक के विभिन्न उत्तरदायित्व हैं, जैसे- वित्तीय नियोजन तथा आवश्यक कोष प्राप्त करने के उत्तरदायित्व उसे निभाना पड़ता है। 

इसी प्रकार कोष के उपयोग तथा लाभ बाँटने के उत्तरदायित्व और अन्य वित्तीय समस्या उत्तरदायित्व को भी उसे निभाना पड़ता है।

वित्तीय प्रबंधन एक विशिष्ट प्रकार की क्रिया है जिसके अन्तर्गत वित्तीय प्रबंधक धन या पूँजी के प्रबंध का कार्य करता है। वह वित्त प्राप्त करने और उसे अच्छी तरह से खर्च करने का काम करना पड़ता है। वित्तीय प्रबंधक प्रशासनिक वित्तीय कार्य और आकस्मिक वित्तीय कार्य से संबंधित सभी क्रियाओं को करता है। 

यह उसका मुख्य काम है। इसी प्रकार एक वित्तीय प्रबंधक के विभिन्न उत्तरदायित्व भी हैं। वह विभिन्न कर्त्तव्यों को निभाता है, जैसे-वित्तीय अनुमान लगाना, अनुकूलतम स्रोतों का उपयोग करना, वित्तीय स्रोतों का मूल्यांकन करना, कोष के उपयोग पर नियंत्रण रखना तथा लाभ के समायोजन का उत्तरदायित्व निभाना इत्यादि ।

भारतीय वित्तीय प्रणाली में कई प्रमुख संस्थाएँ होती हैं, जो मुद्रा बाजार में वित्त का प्रबंध करती रहती है, जैसे- व्यावसायिक बैंक बीमा कम्पनियाँ, म्यूचुअल कोष की संस्थाएँ, नन-बैंकिंग वित्तीय कम्पनियाँ, नाबार्ड, आई. एफ. सी. आई., आई. डी. बी. आई., आई. सी. आई. सी. आई. एस. आई. डी. बी. आई. तथा को-ओपरेटिव बैंक इत्यादि संस्थाएँ भारतीय वित्तीय प्रणाली के अंग हैं। 

कई प्रमुख वित्त के स्रोत भी हैं, जैसे- भारतीय मुद्रा बाजार, पूर्वाधिकार अंश और समता अंश, पूँजी ऋणपत्र, जनता के निक्षेप, प्रतिभूतियों से प्राप्त पूँजी इत्यादि । दीर्घ कालीन वित्त के कई स्रोत हैं। साथ ही लघुकालीन वित्त के भी स्रोत हैं। कम्पनी प्रमुख रूप से अंशों और ऋणपत्रों के माध्यम से पूँजी का प्रबंध करती है। पर्याप्त पूँजी रहने से ही कम्पनी का काम सुचारु रूप से चलते रहता है।


अति लघु उत्तरीय प्रश्न (VERY SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS)


1. वित्त की परिभाषा दीजिए ।

Ans. पूँजी या धन को वित्त कहा जाता है। वित्त को धन का विज्ञान माना जाता है। वित्त को प्रशासनिक क्षेत्र या प्रशासनिक क्रियाओं जिनका संबंध नगद और साख को संगठित करने से है जिससे संगठन के कार्यों को किया जा सके और वांछित उद्देश्यों को प्राप्त किया जा सके। वास्तव में वित्त किसी संस्था के लिए रक्त की तरह होती है, क्योंकि इसके माध्यम से ही उपक्रमः का कार्य सुचारू रूप से चलाया जाता है।

2. वित्त की क्या आवश्यकता है ?

Ans. आधुनिक समय में वित्त की आवश्यकता व्यवसाय के लिए ठीक उसी प्रकार से है जिस प्रकार मनुष्य के जीवन के लिए रक्त की आवश्यकता होती है। जिस प्रकार बिना रक्त के शरीर काम नहीं कर सकता है उसी प्रकार बिना वित्त के व्यावसायिक क्रियाओं को चलाना कठिन होता है। अतः व्यवसाय के कार्यों को निरंतर गति से चलाने के लिए वित्त या पूजी की आवश्यकता पड़ती है।

3. वित्तीय प्रबंधक के दो उत्तरदायित्वों को लिखें।

Ans. वित्तीय प्रबंधक के दो उत्तरदायित्व इस प्रकार हैं-

(i) वित्तीय प्रबंधक का मुख्य उत्तरदायित्व वित्तीय स्रोतों की प्राप्ति और उनकी वित्त की आवश्यकता का अनुमान लगाना है और वित्त की पूर्ति को संभव बनाना है। (ii) वित्तीय प्रबंधक का यह भी उत्तरदायित्व है कि उसे दीर्घ और लघु कालीन वित्त की आवश्यकता को पूरा करना है। 

4. अंश क्या है ?

Ans. कम्पनी की पूँजी सम-मूल्य अनेक भागों में बाँटी जाती है, जिन्हें अंश कहते हैं। फारवेल (J. Farwel) के अनुसार, “एक अंश, कम्पनी में अंशधारी की रुचि है जोकि एक मुद्र राशि में मापा जाता है, प्रथम कम्पनी के दायित्व के रूप में, द्वितीय, उसकी रुचि का सूचक तथा अंशधारियों के परस्पर सम्बन्ध के दायित्व के रूप में, द्वितीय, उसकी रुचि का सूचक तथा अंशधारियों के परस्पर सम्बन्ध की शर्तों का सम्मेलन है।” कम्पनी अधिनियम 1956 की धारा 2(46) अंश को इस प्रकार परिभाषित करती है, “कम्पनी की अंश पूँजी का एक भाग एवं जिसमें स्टॉक भी सम्मिलित है जब तक कि स्टॉक एवं अंशों का अन्तर स्पष्ट अथवा समाविष्ट रखा जाए ।”

5. ऋण पत्र क्या है ?

Ans. एक कम्पनी दीर्घवित्त, सार्वजनिक उधार लेकर एकत्रित कर सकती है। ऐसे ऋण ऋणपत्रों के निर्गमन द्वारा किए जा सकते हैं। ऋण पत्र, किसी ऋण की स्वीकृति है। थॉमस इवलिन (Tomas Evelyn) के अनुसार, “ऋण पत्र कम्पनी की सार्वमुद्रा के अंतर्गत एक प्रलेख है जो कम्पनी को मूलधन प्रदान करता है तथा उस पर एक निश्चित दर से ब्याज का भुगतान करने का अनुबंध है, जिसे प्रायः कम्पनी का स्थायी या परिवर्तनीय संपत्तियों पर प्रभार (charge) देकर प्राप्त किया जाता है तथा जो कम्पनी को दिए गए ऋण की स्वीकृति है।

” ऋण पत्र का धारक कम्पनी का ऋणदाता होता है। ऋण पत्रों पर निश्चित दर पर ब्याज देने की व्यवस्था होती है। ऐसा ब्याज कम्पनी के लाभों पर एक भार होता है। जब ऋण पत्र सुरक्षित होता है, तब अन्य

ऋणदाताओं की तुलना में उसे भुगतान प्राप्ति की प्राथमिकता भी प्राप्त है। 

6. पूर्वाधिकार अंश क्या है ?

Ans. पूर्वाधिकार अंश कम्पनी द्वारा पूँजी प्राप्त करने का एक साधन है। इस प्रकार के अंशों पर कुछ प्राथमिकता होती है जो दूसरे अंशधारियों को नहीं मिलती है, जैसे-कम्पनी के समापन के समय इनका भुगतान समता अंशों से पहले मिलता है तथा निश्चित दर से लाभांश अवश्य दिया जाता है। भले ही कम्पनी को लाभ न हो, लेकिन इस प्रकार के अंशधारियों को मताधिकार नहीं होता है।

7. समता अंश से आप क्या समझते हैं ?

Ans. यह भी कम्पनी द्वारा पूँजी प्राप्त करने का एक साधन है। समता अंशधारी ही कम्पनी के वास्तविक स्वामी होते हैं जिन्हें मताधिकार भी प्राप्त रहता है। यह कम्पनी के कार्य कलापों पर नियंत्रण रखते हैं। इन्हें लाभांश पूर्वाधिकार अंशों के लाभांश के बाद ही दिया जाता है। प्रत्येक वर्ष की लाभांश पर बदलती रहती है। यानी कभी कम और कभी अधिक भी हो सकती है। कम्पनी का समापन होने पर पूर्वाधिकार अंशधारियों के बाद ही इन्हें पूँजी वापस की जाती है।


लघु उत्तरीय प्रश्न (SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS)


1. वित्त का परिभाषा देकर इसके अर्थ को स्पष्ट कीजिए ।

Ans. वित्त किसी के लिए रक्त की भाँति आवश्यक है। वित्त व्यवसाय की गतिविधियों को चलाने के लिए आवश्यक होता है। धन / कोष निम्न कार्यों के लिए आवश्यक होता है-

(i) स्थिर पूँजी (Fixed Capital) — स्थायी पूँजी स्थायी सम्पत्तियों को खरीदने के लिए चाहिए स्थायी सम्पत्तियाँ संयंत्र, मशीन, भूमि तथा भवन एवं फर्नीचर आदि ।

(ii) कार्यशील पूँजी (Working Capital) – इस प्रकार की पूँजी कच्चा उत्पाद, वेतन ओर मजदूरी तथा अन्य दैनिक व्ययों के भुगतान के लिए चाहिए।

वित्त को धन का विज्ञान कहा जाता है। इसमें मुद्रा पर नियन्त्रण करने के सिद्धान्त और मुद्रा प्राप्ति की विधियों पर प्रकाश डाला जाता है। मुद्रा जिन्होंने इसे बचाया है जिसके नियन्त्रण में मुद्रा होती है वही उसे विनियोग करते हैं।

हार्वड और अपदान के अनुसार, “वित्त को प्रशासनिक क्षेत्र अथवा प्रशासनिक क्रियाओं, जिनका संबंध नकद और साख को संगठित करने से है जिससे संगठन के कार्यों को किया जा सके और वांछित उद्देश्यों को भली-भाँति प्राप्त किया जा सकता है।” 

2. वित्त की क्या आवश्यकता है ?

Ans. आधुनिक समय में वित्त की आवश्यकता व्यवसाय के लिए ठीक उसी प्रकार है जिस प्रकार मनुष्य के जीवन के लिए रक्त की आवश्यकता होती है जिस प्रकार बिना रक्त के शरीर काम नहीं कर सकता है उसी प्रकार बिना वित्त के व्यावसायिक क्रियाओं को चलाना कठिन होता है। 

वित्त की आवश्यकता निम्न उद्देश्यों को पूरा करने के लिए की जाती है- (i) स्थायी सम्पत्तियों के क्रय के लिए (Needed for purchasing fixed Assets)—

जैसे-भूमि भवन, मशीन, औजार, फर्नीचर आदि ।

(ii) चालू सम्पत्तियों के लिए (For current Assets) — जैसे कच्चा उत्पाद देनदार, प्राप्य बिल।

(iii) निर्माण व्यय (Establishment Expenditure ) — इस प्रकार के व्ययों में कम्पनी निर्माण के व्यय, प्रारंभिक व्यय, कम्पनी बनाने के व्यय, विशेषज्ञों की फीस और कमीशन। 

(iv) वित्त प्राप्त करने की लागत (Cost of Procuring Finance ) — विज्ञापन व्यय,दलालों तथा अभिगोपकों का कमीशन आदि ।

(v) अदृश्य सम्पत्तियों के क्रय के लिए (For Purchasing intangible Assets)—जैसे ख्याति, पेटेन्ट्स आदि।

(vi) आधुनिक तकनीक (For purchasing modern technique) के प्रम के लिए 

(vii) व्यापार विस्तार, विविधीकरण तथा आधुनिक के लिए वित्त (Finance for expansion, Diversification and Modernisation)

3. वित्त प्रबंधक के दायित्व कौन-कौन हैं ? 

Ans. वित्त प्रबंधक के निम्न उत्तरदायित्व होते हैं-

(i) वित्तीय नियोजन के लिए उत्तरदायी (Liable for Fundraising) 

(ii) वित्त प्राप्ति के लिए उत्तरदायी (Liable for Fundraising)

(iii) प्राप्त धन का उपयोग के दायित्व (Liable of fund Application)

(iv) कोष वितरण के लिए उत्तरदायी (Liable for fund Distribution)

(v) कर्मचारी, लेनदार तथा समाज के प्रति उत्तरदायित्व (Liable for employees creditors and Societies) आदि।

4. वित्त के स्रोतों और आवश्यकता का संक्षेप में वर्णन कीजिए।

Ans. वित्त के स्रोत : लम्बी और छोटी अवधि ऋणों और प्रतिभूतियों का वर्गीकरण, समता अंश पूँजी, पूर्वाधिकार अंश पूँजी ऋणपत्र, जनता निक्षेप मुद्रा बाजार, महत्वता अल्पकालीन वित्त के स्स्रोतों की आवश्यकता उत्पादन के चार महत्वपूर्ण घटक हैं- जमीन, श्रम, संगठन और पूँजी। पूँजी और वित्त एक ही अर्थ में उपयोग किये जाते हैं। वित्त मुद्रा का बोध कराता है। वित्त स्थायी सम्पत्ति खरीदने, भूमि-भवन, मशीन, फर्नीचर के लिए तथा चालू सम्पत्तियों और दैनिक व्ययों के लिए भी वित्त चाहिए। वित्त प्रबंधक की मुख्य कार्यवाही वित्त के सम्बंध में-

(i) कोषों को प्राप्त करना (Raising Funds)

(ii) कोषों को उपयोग में लाना (Uses of Funds)

अधिकतम लाभ कमाना तथा अधिकतम धन सम्पत्ति (Wealth) कमाना अच्छे पूँजी मिश्रण निर्भर करता है। इसके लिए वित्त प्रबंधक को निम्न निर्णय भी लेने होते हैं-

(i) विनियोग निर्णय ( Investment Decisions)

(ii) वित्त निर्णय (Financing Decisions)

(iii) लाभांश निर्णय (Dividend Decisions)

5. वित्तीय नियोजन के चरण कौन हैं ?

Ans. वित्तीय नियोजन में निम्न पर विचार किया जाता है-

(i) पूँजी ढाँचा (Capital Structure ) — पूँजी ढाँचा दीर्घकालीन वित्तीय व्यवस्था से जुड़ा होता है।

(ii) वित्त के ढंग (Mode of Financing )—– सम्भावित सर्व उपयुक्त ढंग का चयनः इसमें अनेक बातों पर ध्यान होता है जैसे-

(a) वित्त की मात्रा (Quantum of Finance ) — व्यवसाय को चलाने के लिए कितना धन चाहिए।

(b) वित्त पूर्ति की संरचना (Pattern of Financing)

(c) नीतियाँ (Policies) – उचित वित्त प्राप्त के लिए नीतियों को लागू करना

(d) प्रतिभूतियाँ चालू करने की अवधि ।

6. वित्तीय नियोजन का क्षेत्र क्या है ?

Ans. अच्छे वित्तीय नियोजन में निम्न तत्वों को सम्मिलित करना चाहिए-

(i) स्थायी पूँजी की आवश्यकता (Requirement of Fixed Capital)

(ii) कार्यशील पूँजी की आवश्यकता (Requirement of Working Capital)

(iii) उधार नीति का पालन (Credit Policy to be followed)

(iv) उधार पूँजी का अनुपात (Debt equity Ratio) (v) अन्य आकस्मिक (Other Contingencies)

7. वित्त के साधनों का विवेचन करें।

Ans. वित्त की परिभाषा से स्पष्ट है-वित्त का प्रावधान जब वित्त की आवश्यकता हो उसी समय उसकी उपलब्धता का होना। प्रत्येक छोटी और बड़ी इकाई को अपने व्यवसाय को चलाने के लिए की आवश्यकता होती है। बिना वित्त के कोई भी व्यवसाय नहीं चलाया जा सकता है। वित्तः अंशों के निर्गमन से अथवा ऋणों से लिया जा सकता है। वित्त की आवश्यकता लघु-कालीन, मध्यकालीन तथा लम्बी अवधि के लिए हो सकती है- निम्न चार्ट से स्पष्टीकरण इस प्रकार होता है—

8. जनता निक्षेप क्या है ? इसके लाभ-हानियों का वर्णन कीजिए।

Ans. यह वित्त प्राप्त करने का अच्छा स्रोत है। यहाँ जनता स्वेच्छा से अपना धन निश्चित ब्याज तथा निश्चित समय के लिए जमा करती है। व्यापारिक पर ब्याज दर अधिक होती है। बैंकों की तुलना में जनता जमा जनता जमा के लाभ (Merits Public Deposit) – इसके कुछ मुख्य लाभ इस प्रकार हैं-

(i) किसी भी प्रकार की कोई वैधानिक प्रक्रिया नहीं करनी पड़ती है। 

(ii) ऐसी जमा राशियों की प्राप्ति के लिए सम्पत्तियों को रखना आवश्यक नहीं है।

(iii) समता पूँजी पर व्यापर जनता जमा प्राप्ति राशि पर दिया जाने वाला ब्याज कम होता है उस धन से कमाया धन काफी अधिक होता है। यही कारण है समता पूँजी पर ब्याज करना होता है।

(iv) पूँजी प्रभावित नहीं होती है जब कोई कम्पनी जनता से जंमा प्राप्त करती है तब उसकी पूँजी पूर्ववत ही रहती है और जनता से प्राप्त पूँजी से लाभ में से ही दिया जाता है।

जनता जमा के दोष (Demerits Public Deposits ) — जनता से जमा राशि प्राप्त करने की निम्न हानियाँ हैं-

(i) जोखिम (Fisk) – इस प्रकार की जनता जमा से प्राप्त राशि लेने में जो जोखिम बड़ा होता है, ऐसी जमा तभी लेनी चाहिए जब कम्पनी ठीक प्रकार से कार्य नहीं कर रही हो ।

(ii) अमितव्ययी (Non-economical) – कभी-कभी कम्पनी को इस प्रकार की जनता जमा की आवश्यकता नहीं होती है फिर भी जनता अपनी जमा राशि को वापस लेना नहीं चाहती है। ऐसी दशा में कम्पनी को हानि ही होती है। 

9. लाभों के पुनः उपयोग का क्या अर्थ है ?

Ans. यह केवल कम्पनी के लाभों का समायोजन है। यहाँ एक विशिष्ट धन कम्पनी द्वारा रोककर पुनः विनियोग के लिए अथवा विस्तार के लिए उपयोग किया जाता है। शेष बचा लाभ अंशघारियों में लाभांश के रूप में बाँट दिया जाता है। इसे स्वयंवित्त (Self-financing) अन्तर- वित्त (Inter-Finance) अथवा आन्तरिक स्रोत से वित्त प्राप्त करना भी कहा जाता है। यही लाभों का पुनः उपयोग है। 

10. व्यावसायिक बैंकों से ऋण को समझायें।

Ans. व्यापारिक बैंक भी लघु अवधि के वित्त का स्रोत है। कार्यशील पूँजी का अधिकांश भाग व्यावसायिक बैंकों द्वारा दी जाती है। बैंक के विभिन्न स्रोत ये हैं-

अधिविकर्ष-जमा से अधिक राशि निकालना। बिल का क्रय और पुनः कटौती, बैंक द्वारा व्यापारियों के बिल खरीदना बिल कटौती की सुविधा खरीदना देना भी इसी श्रेणी में आते हैं।

ऋण देना (Loans ) साधारण ऋण भी बैंक द्वारा प्रतिभूति के आधार पर दिया जाता है, प्रतिभूति यन की मात्रा और संस्था की साख पर निर्भर करती है।

नकद साख (Cash Credit)– इस विधि में भी बैंक अपने ग्राहकों को रुपया निकालने की सुविधा, प्रतिभूति के बदले में देते हैं। ब्याज केवल उस राशि पर दिया जाता है जिसे निकाल लिया है।

11. वित्तीय संस्थाओं से ऋण को स्पष्ट करें।

Ans. इस प्रकार के वित्त बड़े उद्योगपतियों को बड़ी ही उदार शर्तों पर दिये जाते है। इस प्रकार के वित्त लम्बी और मध्य अवधि के लिए होते हैं। कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं-

(i) Industrial Finance Corporation of India (IFCI) (ii) Industrial Development Bank of India (IDBI)

(iii) The Industrial Credit and Investment Corporation of India (ICICI)

12. वित्त के साधनों का विवेचन करें।

Ans. वित्त की परिभाषा से स्पष्ट है। वित्त का प्रावधान जब वित्त की आवश्यकता हो उसी समय उसकी उपलब्धता का होना । प्रत्येक छोटी और बड़ी इकाई को अपने व्यवसाय को चलाने के लिए वित्त की आवश्यकता होती है। बिना वित्त के कोई भी व्यवसाय नहीं चलाया जा सकता है । 

वित्तः अंशों के निर्गमन से अथवा ऋणों से लिया जा सकता है। वित्त की आवश्यकता लघु-कालीन, मध्यकालीन तथा लम्बी अवधि के लिए हो सकती है- निम्न चार्ट से स्पष्टीकरण इस प्रकार होता है


दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (LONG ANSWER TYPE QUESTIONS)


1. वित्त के महत्व का वर्णन कीजिए। (Discuss the importance of finance.)

Ans. आधुनिक समय में वित्त के महत्व के सम्बंध में जितना कम कहें उतना ही ठीक है। किसी व्यावसायिक संगठन में वित्त ही उसकी सफलता की कुंजी है। बिना वित्त के कोई भी व्यावसायिक संस्था अपनी पूरी क्षमता से काम नही कर सकती है, और न ही विकास और सफलता प्राप्त कर सकती है। 

वित्त किसी संस्था को चिकनायी प्रदान करता है, यही उत्पाद विकास, मशीन ठीक प्रकार से चल सकती है। वित्त प्रबंध को उन्नति के लिए प्रोत्साहित करता है। पिछले 30 वर्षों में वित्त ने व्यवसाय के क्षेत्र में काफी महत्वता प्रदान की है। व्यवसाय प्रबंध में वित्त का काफी महत्व है, व्यवसाय वित्त नीतियों से काफी प्रभावित होता है। वित्त की महत्वता को इस प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है-

(i) प्रवर्तन के लिए वित्त की आवश्यकता (Finance is needed for Promotion of a busines) – कोई भी व्यवसाय बिना वित्त के नहीं चल सकता है। जो भी व्यक्ति व्यवसाय शुरू करता है उसे वित्तीय नियोजन करना होता है। वित्त नियोजन से ही व्यापार की सफलता तथा असफलता प्रभावित होती है। हालैंड (Hoagland) ने कहा अनावश्यक सूचनाओं की कमी खराब नियोजन के लिए उत्तरदायी है।

(ii) व्यावसायिक इकाइयों को सफलतापूर्वक चलाने के लिए (Needed for smooth running of business unit) किसी व्यावसायिक इकाई को ठीक प्रकार से चलाने के लिए वित्त की आवश्यकता होती है। वित्त ठीक उसी प्रकार है जिस प्रकार मशीन के लिए तेल कार्य 189 के कदम, समामेलन, करता है। वित्त व्यवसाय के सभी चरणों के लिए चाहिए, जैसे कम्पनी प्रवर्तन विकास, विस्तार तथा आधुनिकीकरण और दिन-प्रतिदिन के प्रशासनिक व्ययः ।

(iii) विभिन्न क्रियाओं में समन्वय (Co-ordination of various functional Activities) पर्याप्त वित्त विभिन्न व्यावसायिक क्रियाओं में समन्वय करता है;

जैसे विपणन, उत्पादन तथा संग्रहण । जब वित्तीय प्रबंध दूषित होता है तब प्रत्येक विभाग की कार्य क्षमता बिगड़ सकती है। उदाहरण से स्पष्टीकरण-

वित्त विभाग का यह कर्तव्य है कि क्रय विभाग के लिए व्यवस्था करे जिससे कच्चा उत्पाद खरीदा जा सके, दैनिक व्ययों का भुगतान, सुचारु उत्पादन के लिए वित्त चाहिए। यदि विभाग ने उचित वित्त की व्यवस्था नहीं की तो उत्पादन और बिक्री प्रभावित होगी। वित्तीय प्रशासन की केन्द्रीय महत्वता है। परिणामस्वरूप व्यावसायिक क्रियाओं को नियन्त्रित और समन्वित किया जाता है।

(iv) निर्णयों में सहायक (Helpful in decision-making)-वर्तमान व्यवसाय में सभी निर्णय लाभदायकता से जुड़े होते हैं। किसी भी क्रिया के अनेक विकल्प होते हैं। अच्छे प्रबंध को उनमें से किसी एक विकल्प को चुनना होता है। वित्तीय प्रशासन में अंकों के आधार पर लाभदायकता को बढ़ाने के लिए तथा जोखिम और अनिश्चितता को कम करने में इसका महत्वपूर्ण योगदान है।

(v) व्यवसाय सफलता के निर्धारक (Determinant of Business Success)-इसमें तर्क की सम्भावना कम है, वित्त प्रबंधक का व्यवसाय की सफलता तथा असफलता में बड़ा

योगदान होता है। वित्तीय प्रबंधक के पास सभी प्रकार की सूचनाएँ होने के आधार पर व्यापार की वित्तीय स्थिति का ज्ञान हो जाता है उसे उच्च प्रबंध के पास भेजा जाता है। यदि आवश्यक हो तो प्रबंध उन्हें ठीक करने की योजना भी बना सकते हैं। वित्तीय प्रबंधक निर्णय लेने में सहायक हो सकते हैं और व्यवसाय का मार्गदशन भी कर सकते हैं।

(vi) कार्य सम्पादन का माप (Measurement of Performance) – किसी भी व्यवसाय की सच्ची सफलता उसकी लाभदायकता से मापी जाती है। किसी व्यवसाय में जोखिम और लाभदायक दो महत्वपूर्ण अंग होते हैं, उचित वित्त की आवश्यकता को पूरा करने से दोनों में न्यायिक सन्तुलन बनाया जा सकता है। 

2. वित्तीय प्रबंधक के उत्तरदायित्वों का विवेचना कीजिए।. (Discuss the responsibilities of Finance Manager.)

Ans. मुख्य वित्त प्रबंधक अथवा वित्त संचालक सभी प्रकार की वित्तीय आवश्यकताओं को पूरा करना उसका दायित्व है। व्यवसाय का आकार और प्रकृति के अनुसार ही वित्त प्रबंधक के उत्तरदायित्व निर्धारित किये जाते हैं। बड़े संगठनों में वित्तीय निर्णय संचालक सभां वित्त सारिणी में लिए जाते हैं। विस्तृत और महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व जो वित्त प्रबंधक को निभाने पड़ते हैं इस प्रकार हैं-

(i) वित्तीय नियोजन का उत्तरदायित्व (Responsibilities of Financial Planning)-बड़े संगठनों में वित्तीय प्रबंधक का मुख्य उत्तरदायित्व वित्तीय स्रोतों की प्राप्ति और उनकी वित्त की आवश्यकता का अनुमान लगाना होता है। साथ ही वित्त की पूर्ति को भी बनाना उत्तरदायित्व होता है। वित्तीय प्रबंध को कोष/धन प्रवाह तथा धन / कोष प्रवाह में समानता बनाये रखना चाहिए। ऐसा होने से संगठन की ख्याति भी बढ़ेगी। उसे यह भी देखना चाहिए कि संस्था

में कोष बिना उपयोग के न हो । 

(ii) आवश्यक वित्त प्राप्त करने का उत्तरदायित्व (Responsibility of Raising Necessary Fund) – वित्तीय प्रबंधक का यह भी उत्तरदायित्व है उसे लघु दीर्घकालीन वित्त आवश्यकताओं को पूरा करना होता है। उसे यह भी देखना चाहिए कितना धन चाहिए और उसके क्या स्रोत होने चाहिए। उसे बड़ी सावधानी से स्रोतों का चयन करना चाहिए तथा प्रत्येक स्रोत की लागत क्या होगी। उसे सभी पक्षकारों के हित को ध्यान में रखना चाहिए जैसे-अंशधारियों,. लेनदारों, कर्मचारी और समाज आदि ।

(iii) कोषों के उपयोग का उत्तरदायित्व (Responsibilities of Fund uses Application) – वित्तीय प्रबंधक का यह भी कर्तव्य है कि वह यह देखे कि कोर्षो का अनुकूलतम उपयोग हो। सभी सम्पत्तियाँ जिन्हें व्यवसाय के लिए क्रय किया है पूरी तरह से लाभ कमाने के लिए उपयोग करनी चाहिए उसे अनावश्यक व्ययों और कपट पूर्ण तरीकों पर रोक लगानी चाहिए। वह विनियोग निर्णय और पूँजी संपत्तियां प्राप्त करने तथा दायित्वों का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी होता है।

(iv) लाभों के वितरण में उत्तरदायी (Responsibilities of Distribution of Profits)—लाभों का बँटवारा एक वित्त प्रबंधक का महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व है, उसे यह देखना चाहिए कि कितना लाभ अंशघारियों में बाँटा जाय और कितना भविष्य के विस्तार के लिए रखा जाय। उसे लाभ को अंशघारियों और विस्तार के लिए दोनों के बीच सावधानी से बाँटना चाहिए।

(v) अन्य सामान्य उत्तरदायित्व (Other General Responsibilities) इस श्रेणी में निम्न दायित्व है-

(a) स्वामियों के प्रति उत्तरदायित्व (Responsibility to owners) – जैसा कि सभी जानते हैं कि अंशधारी ही कम्पनी के स्वामी होते हैं, इसलिए वित्त प्रबंधक को उनके हितों का ध्यान रखना चाहिए । वित्त प्रबंधक को केवल धन प्रवाह ही नहीं वरन् यह भी देखना चाहिए कि पूँजी पर उचित प्रत्याय मिल रहा है अथवा नहीं। 

(b) कानूनी दायित्व (Legal Obligation) – वित्त प्रबंधन कानूनी उत्तर दायित्व को भी पूरा करता है बहुत से ऐसे नियम हैं जैसे कर, तथा कर नीति के सम्बंध में नियमों का पालन करना भी होता है। अच्छे वित्त प्रबंधकों को प्रचलित ऐसे सभी नियमों का ज्ञान होना चाहिए। 

(c) कर्मचारियों के प्रति उत्तरदायित्व (Liabilities towards Employees) -वित्त प्रबंधन को चाहिए रोजगार के सही अवसर बने रहें तथा उचित मजदूरी और उचित कार्य के अच्छे वातावरण को बनाकर रखा जाए।

कर्मचारियों को भी प्रबंध के निर्णय में हिस्सेदार बनाते हैं तथा उनके अनेक सुझावों का लाभ भी संगठन को मिल सकेगा। दीर्घकालीन दृष्टि से प्रबंध, कर्मचारियों तथा स्वामियों के समान हितों को ध्यान में रखना चाहिए।

(d) ग्राहकों के प्रति उत्तरदायित्व (Responsibilities to Customers) – ग्राहकों के बिलों को सही समय पर भुगतान करने के लिए प्रभावशाली वित्त प्रबंध आवश्यक होता है ऐसा होने से उत्पाद की पूर्ति भी ठीक बनी रहेगी तथा उत्पादन स्तर भी बना रहेगी।

(e) अधिक से अधिक घन (Wealth Maximisation) – वित्त प्रबंधक का मुख्य उद्देश्य अधिक से अधिक धन कमाना होना चाहिए, अन्य उद्देश्य तो स्वतः ही पूरे हो जाते हैं। निष्कर्ष यह निकाला जा सकता है वित्त प्रबंधक को वित्तीय दशा को ही ठीक नहीं रखना होता है बरनू अंशधारियों के कल्याण, लेनदारों के हितों का ध्यान तथा समाज का भी ध्यान रखकर कार्य करना चाहिए।

3. वित्तीय प्रबंधक के कार्यों की परीक्षा कीजिए। (Examine the Functions of Financial Management.)

Ans. वित्तीय प्रबंधक एक विशिष्ट प्रकार की क्रिया है जो उत्तरदायी होता है। वित्त प्राप्त करने तथा उसे भली प्रकार से व्यय करने का उत्तरदायित्व उसी का होता है।

वित्तीय प्रबंधक के मुख्य कार्य इस प्रकार हैं- 

(i) प्रशासनिक वित्तीय कार्य (Executive Financial Function) (ii) आकस्मिक वित्तीय कार्य ( Incidental Financial Function).

(A) प्रशासनिक सम्बन्धी वित्त कार्य (Executive Financial Functions) – इस प्रकार के कार्यों में वित्तीय निर्णयों जिनके संचालन के लिए विशेष प्रशासनिक योग्यता होती है। 191 इस शीर्षक में निम्न कार्य आते हैं-

(i) वित्तीय आवश्यकताओं का अनुमान (Estimating Financial Requirements)- किसी वित्तीय प्रबंधक का यह महत्वपूर्ण कार्य है जिसके अनुसार उसे उस कम्पनी की वित्तीय आवश्यकता का अनुमान लगाना चाहिए। एक कम्पनी को वित्त केवल दो कार्यों के लिए चाहिए 

(a) स्थायी सम्पत्तियों के खरीदने के लिए 

(b) चालू सम्पत्तियों में विनियोग के लिए। ‘वित्तीय प्रबंधक को दोनों प्रकार के वित्त की आवश्यकता की पूर्ति करनी होती है।

(ii) वित्त स्रोत सम्बन्धी निर्णय (Decision about the sources of finance)-वित्त की आवश्यकता का अनुमान लगाने के पश्चात, वित्त प्रबंधक की समस्या स्रोत चुनाव की होती है। वित्त विभिन्न स्रोतों से प्राप्त किया जा सकता है जैसे अंशों के निर्गमन से, ऋण पत्रों से, बैंक से ऋण, जनता के निक्षेप आदि। प्रत्येक स्रोत के अलग-अलग लाभ-हानि होते हैं। प्रत्येक स्रोत को भली-भाँति अध्ययन के बाद वित्तीय प्रबंधक को यह निर्णय लेना होता है कि कौन-सा स्रोत उस व्यवसाय के लिए उपयोगी होगा।

(iii) वित्त के सौदे (Negotiation for finance) – वित्त के स्रोत के चयन के बाद महत्वपूर्ण कार्य उन पक्षों से सीदे व्यवहार करना है जिनसे वित्त प्राप्त करना है। वित्त की शर्तें निश्चित की जाती है- व्याज दर, ऋण की अवधि, ऋण की प्रतिभूतियाँ आदि। वित्त प्राप्त करने

के बाद उससे सम्पत्ति क्रय करना ।

(iv) लाभों का बंटवारा (Distribution of Profits) – व्यापार शुरू तभी माना जाता है। जब वित्त वांछित सम्पत्तियों में लगा दिया जाता है। अंत में वह दिन आता है जिसकी इच्छा स्वामी करता है उसे लाभ कहा जाता है। वित्त प्रबंधक लाभों को बाँटता है। लाभ का कुछ हिस्सा भविष्य के लिए (विस्तार / आधुनिकीकरण) रखा जाता है। वित्त प्रबंधक लाभ को बाँटने तथा कोषों में हस्तांतरण करते समय संतुलन बनाकर कार्य करता है। उसे अंशधारियों को भी सन्तुष्ट करना होता है तथा भविष्य की आवश्यकताओं को भी ध्यान में रखना चाहिए।

(v) रोकड़ का उचित प्रबंध (Proper Cash Management ) – एक उचित नकद कोष एक व्यापार के लिए रखा जाना अति आवश्यक होता है। नकद कोषों की कमी व्यापार में रुकावट पैदा करती है, और आवश्यकता से अधिक रोकड़ बिना अर्थ बचत (Surplus) रोकड़ सम्पत्ति है फिर भी कोई आय पैदा नहीं करती है। वित्त प्रबंधक को यह ध्यान देना चाहिए कि आने वाले समय में धन की कमी न हो और यदि कमी होती भी है तो बैंक से लघु-कालीन अवधि के ऋण लेकर पूरा करना चाहिए। जब कभी बड़ी रकम बचत के रूप में हो उन्हें अल्प-अवधि के विनियोग में लगा देना चाहिए।

(vi) वित्तीय व्यवहारों पर नियन्त्रण (Check upon Financial Performance ) – वित्त प्रबंधक के कार्य सीमित नहीं होते हैं कि उन्हें वित्तीय क्रियाओं के निर्णय ही लेने हैं वरन् उनसे यह आशा भी की जाती है कि परिणाम क्या रहे। इसीलिए समय-समय पर उसे यह देखना भी चाहिए कि कोषों को ठीक प्रकार से उपयोग किया जा रहा है अथवा नहीं यदि कार्य इच्छा के अनुसार नहीं हो रहा है तो उसे निर्णयात्मक और सुधारात्मक कदम उठाने चाहिए। 

(vii) उच्च प्रबंध को परामर्श (Advise to top Management ) – वित्त प्रबंधक का अंतिम कार्य यह है कि उसे उच्च प्रबंधों सभी मामलों की सूचना समय-समय पर देनी चाहिए। उसे अपनी अनुभवी राय भी देनी चाहिए, कठिनाई के समय में उच्च प्रबंध को अपनी राय भी देनी चाहिए। 

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