NCERT Solutions Entrepreneurship Class 12 Chapter 13 Hindi Notes PDF

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Entrepreneurship Class 12 Chapter 13 Hindi Notes PDF, NCERT Solutions Entrepreneurship Class 12 Chapter 13 Hindi Notes PDF

Entrepreneurship Class 12 Chapter 13 Hindi Notes PDF

Class12th 
Chapter Nameलागतों और लाभों का निर्धारण | DETERMINATION OF COSTS AND PROFITS
Chapter number13
Book NCERT
SubjectEntrepreneurship
Medium Hindi
Study MaterialsImportant questions answers
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लागतों और लाभों का निर्धारण | DETERMINATION OF COSTS AND PROFITS

किसी भी वस्तु के उत्पादन कार्य करने के लिए कुछ-न-कुछ लागत अवश्य लगती है विभिन्न प्रकार के सामग्रियों और खर्चों का उपयोग करके उत्पादन प्राप्त किया जाता है। सामग्रियों के मूल्य और कुल खचों के योग को लागत कहा जाता है। इस लागत के आधार पर ही उत्पादन कार्य होता है। विभिन्न प्रकार के लागतों के कुल योग को कुल लागत कहा जाता है। 

कुल लागत में लाभ का निश्चित प्रतिशत जोड़कर उत्पादित वस्तु के मूल्य का निर्धारण किया जाता है । इसी मूल्य पर उत्पादक बाजार में अपने माल को बेचते हैं और लाभ कमाते हैं । लागत विभिन्न प्रकार के होते हैं, जैसे स्थायी लागत, चल लागत, उत्पादन लागत,

प्रशासनिक लागत, बिक्री और वितरण लागत, सीमान्त लागत, अवसर लागत इत्यादि । इन लागतों की अपनी प्रकृति और लक्षण होते हैं । 

NCERT Solutions Entrepreneurship Class 12 Chapter 4 Hindi Notes PDF

लागत का निर्धारण करते समय विभिन्न तत्वों पर ध्यान रखा जाता है। किसी वस्तु के बनाने में तीन लागतों को प्रत्यक्ष लागत कहा जाता है। ये लागतें हैं- सामग्रियाँ, श्रम, खर्चे इत्यादि। सामग्री वे वस्तुएँ होती हैं जिनके सहयोग से किसी वस्तु का निर्माण कार्य किया जाता है। सामग्री दो प्रकार की होती हैं जिन्हें प्रत्यक्ष सामग्री और अप्रत्यक्ष सामग्री कहते हैं। 

कच्चे माल से उत्पादन कार्य करने के लिए श्रम लगाया जाता है। श्रम भी दो प्रकार का होता है जिन्हें प्रत्यक्ष श्रम और अप्रत्यक्ष श्रम कहा जाता है। इसी प्रकार वस्तु के निर्माण कार्य में कुछ व्यय भी होते हैं जिन्हें निर्माण खर्च कहते हैं। यह दो प्रकार के होते हैं जिन्हें प्रत्यक्ष व्यय और अप्रत्यक्ष व्यय कहा जाता है।

उपरिव्यय के अन्तर्गत विभिन्न प्रकार के खर्च शामिल होते हैं, जैसे-निर्माण व्यय कारखाने की व्यय, प्रशासनिक व्यय, बिक्री और वितरण व्यय इत्यादि । माल को बनाते समय ये सभी खर्च अवश्य ही होते हैं। साथ ही माल के विज्ञापन और इसका बिक्री कार्य करने के लिए ये खर्चे अवश्य होते हैं।

वस्तु का निर्माता कुल लागत का पता लगाने के बाद ही अपने लाभ का निर्धारण करता है। जितना कुल लागत होता है उसमें अपना उचित लाभ जोड़कर उस वस्तु के मूल्य को निर्धारित करता है । इसी बिक्री मूल्य पर निर्माता अपनी वस्तुओं को बाजार में बेचते हैं। इससे उत्पादक या निर्माता को लाभ के रूप में आय की प्राप्ति होती है।


अति लघु उत्तरीय प्रश्न (VERY SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS)


1. लागत से आप क्या समझते हैं ?

Ans. किसी भी वस्तु के उत्पादन कार्य में जो कच्चा माल, अन्य सामग्रियाँ तथा जो भी खर्चे होते हैं, उनके योग को लागत कहा जाता है। वस्तु का उत्पादन करते समय कुछ-न-कुछ लागत अवश्य लगती है।

2. चलन लागत क्या है ?

Ans. चलन लागत का अर्थ उस लागत से लगाया जाता है जिसका संबंध उत्पादन तथा बिक्री से है। जितनी मात्रा में अधिक उत्पादन होगा उतनी ही मात्रा में चलन लागत अच्छी होगी। 

3. चलन लागत कितनी प्रकार की होती है ? नाम लिखें।

Ans. चलन लागत तीन प्रकार की होती है, जिनके नाम ये हैं- (i) स्थायी लागत (ii) चल लागत (iii) अर्द्ध-चल लागत।

4. कुल लागत क्या है ?

Ans. किसी भी वस्तु के उत्पादन कार्य में लागत विभिन्न प्रकार के होते हैं, जिनके कुल योग को कुल लागत कहा जाता है। इसमें प्रारंभिक लागत, कारखाना लागत, कार्यालय इत्यादि शामिल रहते हैं।

5. लाभ के निर्धारण का क्या अर्थ है ?

Ans. जब किसी भी वस्तु के उत्पादन के कुल लागत का पता लग जाता है तो उसके बाद इसके बिक्री मूल्य के निर्धारण का प्रश्न उपस्थित हो जाता है। ऐसी हालत में बिक्री मूल्य का निर्धारण उत्पादन द्वारा किया जाता है। कुल लागत में लाभ का एक निश्चित प्रतिशत रकम जोड़कर वस्तु की बिक्री मूल्य निर्धारित की जाती है। 

अतः उत्पादक अपना लाभ कमाने के लिए एक निश्चित प्रतिशत रकम उस उत्पादन मूल्य में जोड़ देते हैं। लाभ का निर्धारण उचित रूप से किया जाता है जिससे कि प्रतियोगिता वाले बाजार में उस वस्तु की बिक्री हो सके।

6. मूल लागत से आप क्या समझते हैं ? 

Ans. मूल लागत का आशय उस लागत से है जिसमें प्रत्यक्ष सामग्री, प्रत्यक्ष श्रम और प्रत्यक्ष व्यय शामिल होते हैं। किसी वस्तु के निर्माण करने में जो प्रत्यक्ष सामग्री और प्रत्यक्ष श्रम प्रयोग

किया जाता है और उनपर होने वाले व्ययों में यदि प्रत्यक्ष व्यय भी जोड़ दिया जाए तो इस कुल व्यय को कुल लागत कहा जाता है। इस लागत को Direct cost या First cost भी कहा जाता है।

7. कारखाना लागत क्या है ?

Ans. कारखाना लागत का अर्थ उस लागत से है जो मूल लागत में कारखाने के खर्च जोड़ने से प्राप्त होती है। इसे Work cost या Factory cost भी कहा जाता है।

8. कार्यालय लागत क्या है ?

Ans. कार्यालय के खर्चों को कारखाने की लागत में जोड़कर कार्यालय लागत प्राप्त की जाती है। इसमें बिक्री और वितरण के व्यय शामिल नहीं किए जाते हैं। इसे Office cost या Production cost भी कहा जाता है।

9. बिक्री मूल्य से आप क्या समझते हैं ?

Ans. यदि कुल लागत में एक निश्चित प्रतिशत लाभ जोड़ दिया जाता है, तब उसे बिक्री मूल्य कहते हैं। इस प्रकार बिक्री मूल्य में लाभ सम्मिलित कर लिया जाता है। 

10. सीमान्त लागत से आप क्या समझते हैं ?

Ans. सीमान्त लागत ऐसी लागत होती है जो एक अतिरिक्त इकाई के उत्पादन करने पर कुल लागत को प्रभावित करती है। कुल लागत में वृद्धि या कमी केवल चल लागत के कारण होती है।

11. लेखांकन अवधि से संबंधित लागतों का वर्गीकरण कीजिए।

Ans.(i) पूँजी लागतें (Capital Costs) – पूँजी लागत वह लागत होती है जिससे स्थायी सम्पत्तियाँ खरीदी जाती हैं और उनके उपयोग से व्यवसायी आय कमाता है। मशीन क्रय की लागत पूँजी लागत है।

(ii) आयगत लागत ( Revenue Costs) – इस श्रेणी में लागतों (Normal Costs) तथा असामान्य लागत में बाँटा जाता है।

12. सामान्यतः के आधार पर लागत का वर्गीकरण कीजिए।

Ans. (i) सामान्य लागत (Normal Costs) – सामान्य लागत वे लागत होती हैं जो सामान्य स्तर पर के उत्पादन के लिए की जाती है। ऐसी लागत सामान्य परिस्थितियों में की जाती है।

(ii) असामान्य लागत (Abnormal Costs) – यह ऐसी लागत होती है जो एक निश्चित उत्पादन स्तर के लिए नहीं होती है। ऐसी लागते असावधानी के कारण होती हैं, अथवा आकस्मिक परिस्थितियों के कारण हो सकती हैं। सामान्य लागत उत्पादन लागत का हिस्सा होती है जबकि असामान्य लागतों को उत्पादन लागतों में से निकाल दिया जाता है। इसको लाभ-हानि खाते में डाल दिया जाता है (अन्य खर्चों की भाँति ।

13. समय के आधार पर लागत का वर्गीकरण कीजिए।

Ans. समय के आधार पर लागतों को ऐतिहासिक लागतों में तथा पूर्व-निर्धारित लागत में बाँटा जा सकता है।

(i) ऐतिहासिक लागतें (Historical Costs) – इस प्रकार की लागतों में वे लागते आ हैं जिन्हें हो जाने के बाद लिखा जाता है। ये भूतकाल की होती है अर्थात् उत्पादन हो जाने के बाद। इस प्रकार दोनों अवधि में समय अन्तर का निर्णय करते समय ध्यान में रखना चाहिए।

(ii) पूर्व-निर्धारित लागत (Pre-determined Costs) इस प्रकार की लागतों को भविष्य की लागत भी कहा जाता है। ऐसी लागते किसी वैज्ञानिक आधार पर अनुमानित की जाती हैं। इसको प्रमाण लागत कहते हैं। प्रमाण लागत तथा वास्तविक लागत से तुलना की जाती है और विचलन की तुलना की जाती है। इस प्रकार के विचलनों को प्रबंधक ठीक करके। सुधारात्मक निर्णय ले सकता है।

14. वितरण व्यय (Distribution Expenses) क्या है ?

Ans. वितरण व्ययों में वे व्यय आते हैं जहाँ उत्पादन क्रिया पूरी हो जाती है वहाँ से लेकर जब तक उत्पाद उपभोक्ता तक पहुँचता है तब तक के व्यय आते हैं। जैसे—गोदाम के खर्चे, माल ढोने वाली गाड़ी के व्यय, बैंकिंग के व्यय, भेजने के व्यय आदि ।


लघु उत्तरीय प्रश्न (SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS)


1.सामग्री लागत से क्या तात्पर्य है ? 

Ans. सामग्री लागत से अभिप्राय सामग्री की विभिन्न मदों की लागत से है, जैसे कच्ची सामग्री,

पुर्जे एवं मशीन के खाली पार्ट्स, रख-रखाव सामग्री, कार्यालय सामग्री, पैकिंग सामग्री आदि जिन्हें एक व्यवसाय प्रयोग करता है। पुनः सामग्री को निम्न प्रकार से विश्लेषित किया जा सकता है-

(अ) प्रत्यक्ष सामग्री लागत एवं 

(ब) अप्रत्यक्ष सामग्री लागत।

(अ) प्रत्यक्ष सामग्री लागत (Direct Material Cost) – प्रत्यक्ष सामग्री लागत से अभिप्राय प्रत्यक्ष सामग्री की लागत से है। प्रत्यक्ष सामग्री वह सामग्री है जिसे उत्पाद में पहचाना जा सकता है तथा जिसे आसानी से मापा जा सकता है और जो उत्पाद की लागत में प्रत्यक्ष रूप में चार्ज किया जा सकता है। 

अन्य शब्दों में, प्रत्यक्ष सामग्री यह सामग्री है जिसे उत्पाद के निर्माण में प्रयोग किया जाता है तथा जिसे मापा जा सकता है एवं उसे किसी उत्पाद प्रक्रिया या उप-कार्य (Job) को चार्ज किया जा सकता है। लकड़ी के फर्नीचर में प्रयोग की गई लकड़ी, ईंटों में प्रयुक्त मिट्टी, गृह निर्माण में प्रयोग की गई ईंटें, एक लोहे की मट्ठी में काम आने वाला कच्चा लोहा, प्रत्यक्ष सामग्री के उदाहरण हैं।

(ब) अप्रत्यक्ष सामग्री लागत (Indirect Material Cost ) – अप्रत्यक्ष सामग्री लागत से अभिप्राय अप्रत्यक्ष सामग्री की लागत से है। अप्रत्यक्ष सामग्री उन सामग्रियों को कहते हैं जिन्हें आसानी से उत्पाद में पहचाना नहीं जा सकता। यह ऐसी सामग्री है जो एक निर्मित उत्पाद का साधारण हिस्सा नहीं है परन्तु जिन्हें प्रयोग किया जाता है, जैसे उपभोग्य, मरम्मत एवं रख-रखाव सामग्री, कार्यालय सामान आदि ।

2. प्रत्यक्ष सामग्री से आप क्या समझते हैं ?

Ans. प्रत्यक्ष सामग्री (Direct Material) – जो सामग्री उत्पादन में प्रत्यक्ष रूप से प्रयोग की जाती है और निर्मित वस्तु का प्रमुख अंग होती है, वह प्रत्यक्ष सामग्री कही जाती है। प्रत्यक्ष सामग्री का आशय वास्तव में उस सामग्री से है जिससे कि वस्तु बनी है, जैसे-मेज बनाने के लिए लकड़ी का प्रयोग करना प्रत्यक्ष सामग्री है। 

प्रत्यक्ष सामग्री को निम्न नामों से भी प्रकट किया जाता है- (A) विधि सामग्री (Process Material) (B) उत्पादन सामग्री (Production Material), (C) स्टोर्स सामग्री (Stores Material), (D) निर्माण सामग्री (Construction Material) तथा (E) मूल लागत सामग्री (Prime Cost Material)।

प्रत्यक्ष सामग्री के अन्तर्गत निम्न सामग्रियाँ शामिल की जाती हैं— (i) वह सभी सामग्री जो किसी विशेष उपक्रम, आदेश या विधि के लिए खासतौर पर क्रप की गई हो। (ii) वह सभी सामग्री (प्रारम्भिक सामग्री और कच्चे माल सहित) जो कि स्टोर से किसी विशेष उत्पादन आदेश के लिए ली गई है। (iii) प्रारम्भिक पैकिंग का सामान, जिसमें कच्चा माल आया है, जैसे—कार्ड बोर्ड के सन्दूक आदि। (iv) एक विधि से दूसरी विधि में जाने वाला सामान।

सामग्री पर आयात कर, डाक व्यय, सामग्री का यातायात, सामग्री का भण्डार में रखना, सामग्री को कप और प्राप्त करने की लागत इन सभी को सामग्री के बीजक मूल्य में जोड़ दिया जाता है और फिर इस जुड़े हुए मूल्य के आधार पर मूल लागत निकाली जाती है।

3. अप्रत्यक्ष सामग्री से आप क्या समझते हैं ?

Ans. अप्रत्यक्ष सामग्री (Indirect Material) – अप्रत्यक्ष सामग्री का आशय उस सामग्री से है जो वास्तव में निर्मित वस्तु का अंग नहीं बनती है, परन्तु बिना इस सामग्री के निर्माण कार्य भली-भाँति एवं सुचारु रूप से नहीं चलाया जा सकता है, जैसे-एक कारखाने में यन्त्रों को साफ करने के लिए कपड़ा तथा तेल अप्रत्यक्ष सामग्री कहलायेंगे। 

बहुत कम मूल्य की छोटी सामग्री जो यद्यपि उत्पादन की जाने वाली वस्तु में प्रयोग की जाती है उसे अप्रत्यक्ष सामग्री माना जाता है, क्योंकि इसकी प्रति इकाई लागत निकालना कठिन होता है, जैसे जूते में प्रयोग होने वाली कीलें या किताबों की बाइण्डिग में प्रयोग होने वाला धागा।

4. प्रत्यक्ष श्रम क्या है ?

Ans. प्रत्यक्ष श्रम (Direct Labour ) – जो श्रम सामग्री के रूप अथवा आकार में परिवर्तन करने हेतु प्रयोग किया जाता है, उसे प्रत्यक्ष श्रम कहते हैं। इसका स्थान निर्मित वस्तु में वही है जोकि प्रत्यक्ष सामग्री का है, जैसे-मेज बनाने में बढ़ई (Carpenter) का श्रम प्रत्यक्ष श्रम है। प्रत्यक्ष श्रम को निम्न नामों से भी सम्बोधित किया जाता है- 

(i) विधि श्रम (Process Labour), (ii) उत्पादन श्रम (Productional Labour), (iii) क्रियात्मक श्रम (Operating Labour) और (iv) मूल लागत श्रम (Prime Cost Labour)।

5. अप्रत्यक्ष श्रम क्या है ?

Ans. अप्रत्यक्ष श्रम (Indirect Labour ) – वह श्रम जो सामग्री पर प्रत्यक्ष रूप से प्रयोग नहीं किया जाता है, अर्थात् जिसका कोई भाग वस्तु के निर्माण में प्रत्यक्ष रूप से प्रयोग नहीं किया जाता है, ‘अप्रत्यक्ष श्रम’ कहलाता है, जैसे-कारखाने में प्रत्यक्ष रूप में कार्य करने वाले श्रमिको की देखभाल करने वाले का श्रम, फैक्ट्री के द्वार पर पहरा देने वाले सन्तरी (Watchman) का श्रम एवं फोरमैन की मजदूरी आदि। 

6. प्रत्यक्ष व्यय का क्या अर्थ है ?

Ans. प्रत्यक्ष व्यय (Direct Expenses) इन व्ययों के अन्तर्गत वे सभी व्यय आते हैं। जोकि प्रत्यक्ष सामग्री एवं प्रत्यक्ष एवं प्रत्यक्ष श्रम के सम्बन्ध में किये जाते हैं। ये व्यय निर्मित वस्तु के साथ प्रत्यक्ष रूप से सम्बन्धित होते हैं और उसका एक अंग होते हैं। प्रत्येक वस्तु के निर्माण में प्रत्यक्ष सामग्री एवं प्रत्यक्ष मजदूरी के अतिरिक्त कुछ ऐसे व्यय की भी कभी-कभी आवश्यकता प्रतीत होती है जो उस वस्तु पर विशेष रूप से किये जाते हैं और उन्हें निश्चित रूप से उस वस्तु पर डाला जा सकता है। 

ऐसे व्ययों को प्रत्यक्ष व्यय कहा जाता है, जैसे- प्रत्यक्ष सामग्री को कप के स्थान से कारखाने तक लाने के व्यय। इन व्ययों के उदाहरण वस्तु विशेषज्ञ की दशाओं पर निर्भर हैं। मूल लागत निकालने के लिए व्ययों को प्रत्यक्ष सामग्री तथा प्रत्यक्ष श्रम में जोड़ दिया जाता है।

निम्न व्यय भी प्रत्यक्ष (या Chargeable) व्यय के अन्तर्गत आते हैं- (i) ऐसे पैटर्न, ड्राइंग या डिजाइन की लागत जोकि एक विशेष उपक्रम के लिए विशेष रूप से तैयार की गई हो। (ii) किसी विशेष प्रसंविदा या उपक्रम के सम्बन्ध में आरकीटेक्ट और सरवेयर्स को दी गई फीस (iii) किसी विशेष उपक्रम के लिए किये गये प्रयोगात्मक कार्य की लागत (iv) आन्तरिक गाड़ी, जोकि विशेष सामग्री को सीधा उपक्रम तक पहुँचाने में दिया जाता है। (v) विशेष या एक उद्देश्य वाली मशीन, प्लाण्ट या अन्य यन्त्र, जैसे-पोरटेबिल क्रेन, स्फेफोल्डिंग आदि का किराया ।

(vi) विशेषज्ञों के यात्रा व्यय और जीवन-निर्वाह के भत्ते जो कारखाने से दूर हो रहे कार्य के निरीक्षण के लिए दिये जाते हैं। (vii) भूस्वामी को दिया गया अधिकार शुल्क (Royalty)। (viii) किसी ठेके को लेने में किये गये व्यय, जैसे-कानूनी व्यय, यात्रा व्यय तथा अन्य व्यय। (ix) जो मशीनें किसी विशेष उपकार्य पर लगती हैं और अन्य कार्य पर नहीं लगती है (कुछ दशाओं में) उनके संचालन व्यय । 

7. अप्रत्यक्ष व्यय क्या है ?

Ans. अप्रत्यक्ष व्यय ( Indirect Expenses) ये व्यय निर्मित वस्तु से प्रत्यक्ष रूप से सम्बन्धित नहीं होते, परन्तु इतने आवश्यक होते हैं कि इनके बिना प्रायः वस्तुओं का निर्माण सम्भव नहीं होता। इनके अन्तर्गत- (A) कारखाने के व्यय (Factory or Works Expenses or Works on cost or Factory on cost), (B) कार्यालय तथा संचालन व्यय (Office and Administrative Expenses), तथा (C) विक्रय एवं वितरण व्यय (Sale and Distribution Expenses) आते हैं।

(A) कारखाने के व्यय-वे सभी व्यय जो कारखाने में निर्माण के सम्बन्ध में किये जाते हैं, कारखाने के व्यय कहलाते हैं। उदाहरणार्थ, कारखाने का किराया; शक्ति और ईंधन, कारखाने की रोशनी, गर्म एवं ठण्डा रखने के लिए किया गया व्यय; एवं मशीनों की ह्रास और मरम्मत आदि। कारखाने के व्ययों में अप्रत्यक्ष सामग्री (Indirect Materials) और अप्रत्यक्ष श्रम (Indirect Labour) को भी शामिल किया जाता है।

(B) कार्यालय तथा संचालन व्यय-इन व्ययों के अन्तर्गत कार्यालय के व्यय आते हैं, जैसे-छपाई तथा स्टेशनरी का व्यय, कार्यालय के लिपिकों का वेतन, कानूनी कार्यवाही के व्यय, कार्यालय के भवन का ह्रास, कार्यालय संचालकों का वेतन, कार्यालय का किराया तथा बीमा, कार्यालय के फर्नीचर का हास, डाक तथा टेलीफोन का व्यय तथा कार्यालय के अन्य व्यय।

(C) विक्रय एवं वितरण व्यय इन व्ययों में वे व्यय आते हैं जो माल को बेचने तथा बेचे हुए माल को एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजने के सम्बन्ध में किये जाते हैं, जैसे-विक्रय प्रतिनिधियों को दिया जाने वाला पारिश्रमिक, विज्ञापन व्यय, ऋणियों (Debtors) को दी हुई छूट, विक्रय अभिकर्त्ताओं का यात्रा व्यय, मूल्य सूची का व्यय एवं शाखाओं तथा एजेन्सियों का व्यय आदि । 

8. मूल लागत क्या है ? इसके महत्व का वर्णन कीजिए ।

Ans. मूल लागत का आशय उस लागत से है जिसमें प्रत्यक्ष सामग्री, प्रत्यक्ष श्रम और प्रत्यक्ष व्यय शामिल होते हैं। किसी वस्तु के निर्माण करने में जो प्रत्यक्ष सामग्री और प्रत्यक्ष श्रम किया जाता है और उन पर होने वाले व्ययों में यदि प्रत्यक्ष व्यय भी जोड़ दिया जाये, तो इस कुल व्यय को मूल लागत कहा जाता है। इस लागत के अंग्रेजी में विभिन्न नाम हैं, जैसे-Flat Cost और Direct Cost आदि । प्रत्यक्ष सामग्री (Direct Material) }

प्रत्यक्ष श्रम (Direct Labour) प्रत्यक्ष व्यय (Direct Expenses) = मूल लागत (Prime cost )

महत्त्व – लागत लेखे में मूल लागत सर्वप्रथम ज्ञात की जाती है, क्योंकि इसे ज्ञात करने से उत्पादक को यह मालूम हो जाता है कि वस्तु में कितनी सामग्री प्रत्यक्ष रूप से वास्तव में प्रयोग की गई है। इस सामग्री के मूल्य की तुलना पिछले वर्षों की प्रत्यक्ष सामग्री के मूल्य से करके यह पता चल सकता है कि इस वर्ष सामग्री पर अधिक व्यय किया गया है या कम। 

यदि इस वर्ष पिछले वर्ष की तुलना में अधिक व्यय किया गया है, तो उत्पादक सामग्री के क्रय विभाग पर अधिक ध्यान देगा और यह प्रयत्न करेगा कि इसके मूल्य को उचित स्तर पर लाया जाय । मूल लागत का दूसरा महत्त्व यह है कि इसके

आधार पर अगले वर्ष के लिए प्रत्यक्ष सामग्री तथा श्रम पर होने वाले अनुमानित व्यय का प्रबन्ध करने में उत्पादक की सहायता मिलती है। मूल लागत को अलग निकालने का अर्थ प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष व्ययों को अलग-अलग करना है। ऐसा करने में उत्पादक को अप्रत्यक्ष व्ययों की स्थिति एवं महत्त्व का सही ज्ञान प्राप्त होता है। इसी आधार पर वह इसका निश्चय कर सकता है कि अपव्यय कहाँ पर है और कहाँ कुशलतापूर्वक कार्य किया जा रहा है। 

9. कारखाना लागत से आप क्या समझते हैं; इसके महत्व का विवेचन कीजिए। 

Ans. कारखाने की लागत का आशय उस लागत से है जो मूल लागत में कारखाने के व्यय जोड़ने से प्राप्त होती है। इसे अंग्रेजी में विभिन्न नामों से पुकारते हैं, जैसे-Works Cost, Factory Cost और Manufacturing Cost आदि ।

मूल परिव्यय (Prime Cot) + कारखाना उपरिव्यय (Factory Overhead) = कारखाना परिव्यय ( Factory Cost) ।

महत्त्व – मूल लागत निकालने के बाद प्रत्येक उत्पादक यह जानना चाहता है कि उसके कारखाने का लागत मूल्य क्या है ? इस मूल्य में कार्यालय, बिक्री तथा वितरण के व्यय सम्मिलित नहीं किये जाते हैं। व्यय बाजार की प्रतिस्पर्धा के कारण कम तथा अधिक होते हैं। वास्तव में इन्हें अलग करके ही कारखानों की वसूली लागत का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। इसी के आधार पर उत्पादक अपनी कार्यक्षमता का अनुमान लगाता है और अन्य उत्पादकों के साथ तुलना करता है।

लागतों को इस प्रकार विभाजित करने का वैज्ञानिक ढंग सराहनीय है। माना कि एक उत्पादक को केवल एक लागत ज्ञात है और दूसरे उत्पादक को अपने उद्योग के उत्पादन की ‘मूल लागत’ तथा ‘कारखाने की लागत’ दोनों ज्ञात है। निश्चय ही दूसरा उत्पादक पिछले की तुलना में अपने उत्पादन की भली-भाँति जाँच कर सकता है और भविष्य के लिए उचित योजनाएँ बना सकता है, अर्थात् उसे अनुत्पादक साधनों की जानकारी रहती है और वह परिस्थितियों को देखकर उन्हें कार्य में लेने या हटाने की योजना बना सकता है।

10. कार्यालय लागत क्या है ? इसके महत्व का वर्णन कीजिए।

Ans. कार्यालय के व्ययों को ‘कारखाने की लागत’ में जोड़कर कार्यालय लागत प्राप्त की जाती है। इसमें बिक्री और वितरण के व्यय सम्मिलित नहीं किये जाते हैं। इस लागत को अंग्रेजी में विभिन्न नामों से सम्बोधित करते हैं, जैसे-Office Cost or Cost of Production आदि।

कारखाना परिव्यय ( Factory Cost )+कार्यालय एवं प्रशासन उपरिव्यय (Office and Administration Overhead) = कार्यालय परिव्यय (Office Cost or Cost of Production)। महत्त्व-कारखाने की लागत जानने के बाद प्रत्येक उत्पादक की इच्छा अपनी कुल लागत

जानने की होती है। ऐसा करने के लिए वह कार्यालय की लागत में अनुमानित बिक्री और वितरण के व्यय जोड़कर कुल लागत निकालता है। वास्तव में विक्रय प्रतिनिधि जिस मूल्य को उपभोक्ता के सामने रखता है वह कार्यालय लागत के आधार पर ही निकाला जाता है। इस लागत की पिछले वर्षों से तुलना करने पर कार्यालय की क्षमता का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है और भविष्य में कार्यालय को उन्नत करने के लिए योजना बनाई जा सकती है। 

11. कुल लागत निकालने का वर्णन कीजिए।

Ans. कुल लागत निकालने के लिए कार्यालय की लागत में बिक्री एवं वितरण के अनुमानित व्यय जोड़े जाते हैं। इसमें लाभ की एक निश्चित प्रतिशत जोड़ने के बाद बिक्री मूल्य निश्चित किया जाता है। यदि कुल लागत अधिक है, तो बाजार की प्रतिस्पर्द्धा को ध्यान देते हुए लाभ की बहुत छोटी प्रतिशत जोड़ी जायेगी। 

इसके विपरीत, यदि कुल लागत कम है तो लाभ का अधिक प्रतिशत जोड़ा जा सकता है, अर्थात् उत्पादक को लाभ कम या अधिक होना उसकी कुल लागत पर निर्भर करता है।

कार्यालय परिव्यय (Offive Cost ) + विक्रय एवं वितरण उपरिव्यय (Selling and Distri- bution Overhead) = कुल परिव्यय (Total Cost)।

12. विक्रय मूल्य क्या है ?

Ans. यदि कुल लागत (Total cost) में एक निश्चित प्रतिशत लाभ (Profit) जोड़ दिया जाता है तब उसे विक्रय मूल्य कहते हैं। इस प्रकार विक्रय मूल्य में लाभ सम्मिलित कर लिया जाता है। कुल परिव्यय (Total Cost ) + अनुमानित लाभ (Estimated profit)= विक्रय मूल्य (Sell- ing Price)।

13. अप्रत्यक्ष व्यय या उपरिव्यय (Over heads) से आप क्या समझते हैं ?

Ans. सभी अप्रत्यक्ष व्यय (अप्रत्यक्ष कच्चा माल, अप्रत्यक्ष श्रम, अप्रत्यक्ष खर्चों आदि को उपव्यय अथवा अप्रत्यक्ष व्यय कहा जाता है। इस प्रकार के व्ययों को तीन भागों में बाँटा गया है जो ये हैं-

(a) निर्माण व्यय (Manufacturing Expenses) -निर्माण व्ययों में वे अप्रत्यक्ष खर्चे आते हैं जिनमें कारखाने तथा माल बनाने के व्यय यानी कारखाने चलाने के व्यय आते हैं। इस प्रकार के व्ययों में अप्रत्यक्ष कच्चामाल, अप्रत्यक्ष श्रम, कारखाने का किराया, कारखाना प्रबंधक का वेतन, फोरमैन, पर्यवेक्षक का वेतन, कारखाने की मरम्मत, मशीन प्लान्ट का ह्रास तथा शक्ति के व्यय होते हैं ।

(b) कारखाने तथा प्रशासनिक व्यय (Office and Administration Overheads)- इस प्रकार के व्ययों में कार्यालय के व्यय जैसे कार्यालय का किराया, कर्मचारियों का वेतन, रोशनी व्यय, टेलीफोन व्यय, पोस्टेज और स्टेशनरी, संचालक फीस, बैंक व्यय आदि।

(c) बिक्री और वितरण व्यय (Selling and Distribution Costs) – इस प्रकार के व्ययों में कारखाने तक की लागत में कार्यालय व्यय जोड़े जाते हैं। इस श्रेणी में निम्न व्यय आते हैं-विज्ञापन व्यय, विक्रेताओं का वेतन कमीशन, बाजार अनुसंधान के व्यय, डूबत व्यय (Bad Debts) आदि ।

14. उत्पादन के साथ संबंध के आधार पर लागतों का वर्गीकरण कीजिए । 

Ans. ऐसी लागतों को उत्पाद लागते अथवा अवधि लागत भी कहा जाता है। (i) उत्पाद लागत (Product Costs) – इस प्रकार की लागतों में कच्चा माल, बनाने की

मजदूरी तथा प्रत्यक्ष व्यय या प्रत्यक्ष लागत तथा कारखाने के व्यय आते हैं। इसे कारखानों तक की लागत भी कहते हैं।

(ii) अवधि लागत (Period Costs) -ऐसी लागतों को उत्पादित इकाइयों के साथ प्रत्यक्ष नहीं जोड़ा जा सकता है। इनका सम्बन्ध अवधि (Time) से होता है। इस प्रकार के व्यय किसी अवधि से सम्बंधित होते हैं। इस अवधि के व्ययों में स्थिर लागत तथा चालू लागत दोनों भी हो सकती है। ऐसी लागतों के उदाहरण हैं-

सामान्य प्रशासनिक लागत, विक्रय कर्मचारियों के वेतन तथा कमीशन, कार्यालय के उपकरणों का ह्रास (Depreciation) आदि ।


दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (LONG ANSWER TYPE QUESTIONS)


1.अनुसार लागत का वर्गीकरण कीजिए ।

Ans. चलन लागत का अथ उस लागत से है जिसका संबंध उत्पादन तथा बिक्री से है। जितनी मात्रा में अधिक उत्पादन होगा उतनी ही मात्रा में चल लागत अधिक होगी। चल लागत भी तीन प्रकार की होती है जो इस प्रकार है-

1. स्थायी लागत (Fixed Cost ) – स्वायी लागतें वे लागतें होती हैं जिनका उत्पादन की मात्रा से कोई संबंध नहीं होता अर्थात उत्पादन के घटने बढ़ने का इन लागतों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। ये लागतें समान रहती हैं। इन्हें स्थिर, खड़ी, शक्ति लागत (Capacity Cost) तथा अवधि लागत (Period related cost) कहा जाता है।

स्थायी लागतों के उदाहरण : किराया, सम्पत्ति कर, वेतन, हास, विज्ञापन, बीमा आदि ।। ये लागतें समय बीतने के साथ देय हो जाती है न कि उत्पादन होने पर देय हों, इसी कारण स्थिर लागतों को प्रतिदिन, प्रतिमाह, प्रतिवर्ष होती है न कि प्रति इकाई उत्पादन के साथ जोड़ा जाता है। (i) दायित्व लागत (Committed Costs) – इस प्रकार की लागतें बंधन वाली लागत होती है। प्रबंध को ऐसी लागतों के संबंध में स्वतंत्रता नहीं होती है। ये लागते कम्पनी को अपनी कुछ सुविधाओं पर अस्तित्व को बनाने के लिए की जाती है। इस प्रकार की लागतों को समाप्त नहीं 213 किया जा सकता है। उदाहरण इस प्रकार है-किराया, डास, बीमा प्रीमियम आदि।

(ii) व्यवस्थित लागतें (Managed Costs) व्यवस्थित लागते चालू व्यवसाय से सम्बन्धित होते हैं। इस प्रकार की लागतों को व्यवसाय को चालू रखने के लिए करना पड़ता है, जैसे-प्रबंध और कर्मचारियों के वेतन।

(iii) स्वतंत्र कार्य लागतें (Discretionary Costs)- इस प्रकार की लागतें वर्तमान उत्पादन से सम्बंधित नहीं होती हैं और किसी समय क्रियाओं के लिए की जाती है, निश्चित सीमा के बाद उनको दुबारा से अनुबंधित किया जाता है। उदाहरण के लिए विज्ञापन व्यय, अनुसंधान और विकास व्यय ।

(iv) बढ़त लागत अथवा चरण लागत (Step Cost ) – इस प्रकार की लागत एक निश्चित उत्पादन तक स्थिर रहती है, और उस उत्पादन स्तर से ऊपर उत्पादन व्यय बढ़ जाते हैं। उदाहरण के लिए निर्माण कम्पनी के लिए एक पर्यवेक्षक एक निश्चित उत्पादन की देखभाल के लिए 50 श्रमिकों के काम की देखभाल कर सकता है और 1000 रु. प्रतिमाह दिया जाता है। परन्तु जैसे ही 51वें श्रमिक की संख्या होती है दूसरे पर्यवेक्षक की नियुक्ति की जाती है और पर्यवेक्षण व्यय दुगना हो जाता है।

2. चल लागत (Variable Cost ) चल लागत वह लागत होती है जो उत्पादन की मात्रा के अनुसार घटती बढ़ती रहती है। उत्पादन घटने पर लागतें घटती है और बढ़ने पर बढ़ती है। घटने बढ़ने का उत्पादन से सीधा सम्बंध होता है। यह लागत प्रति इकाई समान रहती है। इसे प्रत्यक्ष लागत भी कहा जाता है। यदि उत्पादन नहीं होता है तो यह लागत शून्य होती है। उदाहरण प्रत्यक्ष कच्चा माल बनाने की मजदूरी तथा प्रत्यक्ष व्यय (सीमा शुल्क, रॉयलटी आदि) ईथन और शक्ति, कमीशन बिक्री पर आदि) 

3. मिश्रित लागत / अर्थ चल लागतें (Semi-Variable / Mixed Costs) – इस प्रकार की लागतों में स्थिर तथा चल लागतों का जोड़ होता है। लागत जब उत्पादन के साथ इस प्रकार जुड़ी होती है जो उत्पादन के बढ़ने पर बढ़ती है और उत्पादन घटने पर लागत घटती है। यहाँ कुछ लागतें उसी अनुपात में घटती बढ़ती नहीं हैं; केवल कुछ ही अनुपात में उसे अर्थ-चल तागत कहा जाता है। एक निश्चित सीमा तक के उत्पादन के लिए स्थिर रहते हैं उसके बाद चल लागत हो जाती है।

उदाहरण के लिए, एक श्रमिक को 500 रु. प्रतिमाह दिया जाता है 50 पैसे प्रति इकाई उत्पादन के लिए बोनस दिया जाता है। उत्पादन प्रति सप्ताह 500 होने पर श्रमिक की आय 500 + 250 = 750 होता है। उत्पादन की इकाई 500 से 800 प्रति सप्ताह होने पर श्रमिक की आय बढ़कर 750 + 150 = 900 रु. होगा। इस प्रकार 60% उत्पादन वृद्धि होने पर सिर्फ 20% आय में वृद्धि होती है। 

2. कार्य के आधार पर लागतों का वर्गीकरण कीजिए। (Classify the cost according to Functions.)

Ans. इस वर्गीकरण के आधार पर लागतों को विभिन्न वर्गों में बाँट दिया जाता है जिस वर्ग से वे सम्बन्धित होती हैं। जैसे-किसी संगठन में ये लागतें उत्पादन लागतें, प्रशासनिक लागतें, बिक्री तथा वितरण लागतें आती हैं।.

(i) उत्पादन लागत (Manufacturing/Production Costs) – इस प्रकार की लागतों में माल बनाने तक के व्यय सम्मिलित होते हैं। यहाँ प्रत्यक्ष लागत जिसमें (1) कच्चा माल (ii) मजदूरी (iii) प्रत्यक्ष व्यय तथा (iv) कारखाने तक के व्यय का योग आता है। (ii) प्रशासनिक लागतें (Administrative Costs) – इस प्रकार की लागतों में नीति बनाने की लागतें, संगठन करने की तथा नियन्त्रण की लागतें आती हैं ऐसी लागतों में (प्रत्यक्ष उत्पादन, बिक्री, वितरण लागते नहीं आती हैं। इनमें आते हैं कार्यालय व्यय, कर्मचारी कल्याण व्यय, बैंक व्ययं आदि।

(iii) बिक्री तथा वितरण लागतें (Selling and Distribution Costs)-बिक्री व्यय में ये व्यय आते हैं जिनके करने पर बिक्री बढ़ती है या माँग बढ़ते हैं। जैसे विज्ञापन व्यय, विक्री पर कमीशन, त्वरिण व्यय, पैकिंग व्यय, भेजने के व्यय, कर्मचारियों का वेतन (माल भेजने वाले कर्मचारी), डिलीवरी वैन के व्यय आदि। इन व्ययों से उच्च प्रबंध को प्रत्येक विभाग की कार्यक्षमता का ज्ञान हो जाता है।

3. प्रबंध निर्णयों के आधार पर लागतों का वर्गीकरण कीजिए । (Classify the Cost according to Management Decision.)

Ans. निम्न लागतें निर्णयों में सहायक होती हैं-

(i) सीमान्त लागत (Marginal Cost)- सीमान्त लागत ऐसी लागत होती है जो एक अतिरिक्त इकाई के उत्पादन करने पर कुल लागत को प्रभावित करती है। कुल लागत में घट बढ़ केवल चर लागत (Variable Cost) के कारण होती है।

(ii) अवसर लागत (Opportunity Cost ) – अवसर लागत ऐसी लागत है जो किसी अन्य स्थान पर व्यय करने से भी प्राप्त हो सकती है। उदाहरण के लिए अपनी इमारत (Building) को व्यवसाय में उपयोग कर लिया जाय तो किराया जो प्राप्त हो सकता था उसका अवसर गया-यह अवसर लागत है। इस प्रकार की लागत को तभी ध्यान में रखा जाता है जब किसी परियोजना की लाभदायकता निकाली जाती है।

(iii) नकद लागत (क्रिया) (Out of Pocket Cost ) – इस प्रकार की लागत में किसी क्रिया में जहाँ नकदी खर्च नहीं होता है जैसे हास को लागत में नहीं जोड़ा जाता है। उदाहरण के लिए एक कम्पनी के पास अपना ट्रक है। जिनको कच्चा माल और तैयार माल लाने ले जाने में उपयोग किया जाता है। अब वही कम्पनी उनको जनता के माल ढोने में लाना चाहती है।

इस स्थिति में उन ट्रकों के व्ययः गैस, तेल, चालकों के वेतन, रख रखाव आदि। ये सब लागत (Out of Pocket Cost) कही जाती है। इस प्रकार की लागतें मूल्यों को निश्चित करने में काफी उपयोगी होती है। विशेषकर अवसाद काल में इनको उपयोगी माना जाता है, बनाने और खरीदने के निर्णय में भी सहायक होते हैं।

(iv) विभिन्नात्मक लागतें (Differential Cost ) – जब कभी प्रबंध निर्णय करती है कि कौन-सा उत्पादन चुना जाय, इस तथ्य पर निर्भर करता है कि किस उत्पादन में लाभदायकता अधिक है। इस प्रकार की लागत में दो उत्पादों की लागतों में तुलना की जाती है। इसके लागत में अतिरिक्त चल लागत को कुल लागत में जोड़ा जाता है। कभी-कभी बढ़ी लागतें (Incremental) और विभिन्नात्मक लागतों को एक ही माना जाता है। तकनीकी अर्थ में दोनों का समान अर्थ नहीं है। बढ़त लागत (Incremental) में एक विकल्प से दूसरे विकल्प की लागत में अन्तर आता है यदि लागत कम होती है तो इसे घटी लागत (Decremental Cost) कहा जाता है।

विभिन्नात्मक लागत (Differential Costs ) – विभिन्नात्मक लागत को विस्तृत रूप में लिया जाता है। इसमें बढ़त और घटत दोनों प्रकार की लागतों को सम्मिलित किया जाता है। दूसरे शब्दों में विभिन्नात्मक लागत में कुल परिवर्तनः ऊपर / नीचे दोनों प्रकार की लागत विकल्पों का निष्कर्ष होता है। इस प्रकार की लागतों के अध्ययन का उपयोग सर्वोत्तम विकल्पों का चयन ही होता है। (v) डूबी लागत (Sunk Costs) – डूबी लागत अथवा भूतकाल की लागतें हैं जो हो चुकी है। और किसी नये निर्णय से बदली नहीं जा सकती है। ऐसे व्ययों में प्लान्ट और मशीनरी पर किये गये व्यय को वापस नहीं लिया जा सकता है और निर्णय में इसका कोई योगदान नहीं होता है।

(vi) नियन्त्रित और अनियन्त्रित लागतें (Controllable and Non-Controllable Costs) – नियन्त्रित लागतें ऐसी लागतें होती हैं जिन पर प्रभाव हो सकता है और जिन्हें प्रबंध अपने अधिकार में रख सकता है। निर्माण करने वाली संस्थाओं में विभिन्न विभागों के उत्तरदायित्व केन्द्रित होते हैं जिनका प्रबंध एक विशेष स्तर के प्रबंधक द्वारा किया जाता है। 

ऐसा प्रबंधक अपने विभाग से सम्बन्धित लागतों पर नियन्त्रण रख सकता है, परन्तु अन्य विभागों की लागतों पर नहीं, उत्पादन विभाग का प्रबंधक प्रत्यक्ष श्रम लागत तथा कारखाने के व्ययों को नियन्त्रित कर सकता है। परन्तु वह स्वयं अपने वेतन तथा दूसरे प्रबंधकों की मजदूरी / वेतन को नियंत्रित नहीं कर सकता है। ऐसा इसलिए होता है कि वेतन निर्धारण उसके नियन्त्रण में नहीं है।

इस प्रकार की लागतें 100% नियन्त्रित नहीं होती है। कुछ लागतें ऐसी भी होती हैं जो एक से अधिक विभाग से संबंधित होती है। उदाहरण के लिए रख-रखाव की लागत नियन्त्रित लागत होती है। जैसे अच्छे कुशल व्यक्ति से मरम्मत कराकर रख-रखाव कर सकता है ऐसा करने के लिए उसे मशीन और समय संयंत्र का कुशलतापूर्वक उपयोग करना होता है।

अनियन्त्रित लागतें (UnControllable Costs) – ऐसी लागतें होती हैं जो किसी विशेष व्यक्ति से प्रभावित नहीं होती है। इस प्रकार की लागतें किसी स्तर के प्रबंधकों तक सीमित होती. है। इस प्रकार की लागतों से अभिप्राय लागतें कम करने तथा इन्हें नियंत्रित करने से होता है।

प्रबंधक का प्रयास यही रहता है कि उन क्षेत्रों को ढूँढें जहाँ लागतों को कम किया जा सकता है। (vii) दोषित लागतें (Imputed Cost ) – इस प्रकार की लागतों में नकदी व्यय नहीं होता है। ये काल्पनिक होती है और वित्तीय लेखों में सम्मिलित नहीं किया जाता है। परन्तु ये लागते निर्णय लेते समय महत्वपूर्ण होती है। जैसे पूँजी पर ब्याज, अवतरित लाभ, अपने भवन का किराया वित्तीय लेखांकन में लेखा नहीं किया जाता है परन्तु किसी परियोजना की लाभदायकता के लिए

इन्हें ध्यान देना आवश्यक है। (viii) सामान्य लागतें (Common Costs) – साधारण लागते वे लागतें होते हैं जो एक से अधिक परियोजनाओं, उत्पादों तथा कार्यों के लिए की जाती है। इस प्रकार की लागतें किसी लागत केन्द्र (Cost Centre) से संबंधित करना आसान नहीं होता है। उदाहरण के लिए किसी कारखाने में किये गये अप्रत्यक्ष व्ययों को विभिन्न उत्पादों में बाँटा जा सकता है। ठीक इसी प्रकार से कारखाने का किराए को भी उस कारखाने के विभिन्न विभागों में बाँटा जा सकता है जो उस कारखाने में स्थित हैं

(ix) संयुक्त लागतें (Joint Costs) – जब कभी सामग्री से दो या अधिक उत्पाद बनते हो ऐसी लागत को सभी उत्पादों में बाँट देने को संयुक्त लागत कहा जाता है। उदाहरण के लिए मिट्टी का तेल, ईंधन, गैस आदि कच्चे तेल से निकाले जाते हो तो संयुक्त लागत उस बिन्दु तक होती है। है जहाँ से वे अलग-अलग होती है। सामान्य लागत (Common Cost) और संयुक्त लागतें (Joint Costs) एक दूसरे के साथ अदला बदलती होती है जबकि दोनों में अन्तर इस प्रकार है-

संयुक्त लागतें-ये लागतें दो या अधिक उत्पादों के लिए होती है जबकि सामान्य लागतों- में ऐसा नहीं है। इन्हें लागत लेखों में लिखना कठिन होता है।

(x) बनाने / बदलती लागतें (Conversion Costs) – इस प्रकार की लागतों का स्वरूप बदलती लागत (Transforming costs) भी कहा जाता है। जैसे कच्चे माल से तैयार माल बनाना। इस प्रकार के व्ययों में कारखाने तक के व्यय आते हैं जैसे कच्चा माल, बनाने की मजदूरी, प्रत्यक्ष व्यय तथा कारखाने के व्यय आदि ।

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