NCERT Solutions Entrepreneurship Class 12 Chapter 6 Hindi Notes PDF

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Entrepreneurship Class 12 Chapter 6 Hindi Notes PDF, NCERT Solutions Entrepreneurship Class 12 Chapter 6 Hindi Notes PDF, NCERT Solutions Class 12 Entrepreneurship Chapter 6 Hindi Notes PDF

Entrepreneurship Class 12 Chapter 6 Hindi Notes PDF

Class12th 
Chapter Nameस्रोतों का मूल्यांकन | RESOURCE ASSESSMENT
Chapter number06
Book NCERT
SubjectEntrepreneurship
Medium Hindi
Study MaterialsImportant questions answers
Download PDFEntrepreneurship Class 12 Chapter 6 Hindi Notes PDF

स्रोतों का मूल्यांकन | RESOURCE ASSESSMENT

उद्यमिता के अन्तर्गत स्रोतों के मुल्यांकन के संबंध में वित्तीय नियोजन एक महत्त्वपूर्ण विषय-वस्तु है। वित्तीय नियोजन के अन्तर्गत पूँजी का प्रबंधन किया जाता है। किसी व्यापार या उद्योग के लिए वित्त की आवश्यकता पड़ती है। इसके बिना उपक्रम के कार्यों को नहीं चलाया जा सकता है। वित्तीय नियोजन के अन्तर्गत आवश्यकता के अनुसार वित्त की व्यवस्था करना और उसका अधिकतम उपयोग करना है। 

वित्तीय नियोजन करते समय किसी उपक्रम की वर्तमान तथा भविष्य की वित्तीय आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर किया जाता है। साथ ही स्थायी सम्पत्तियों और कार्यशील पूंजी की आवश्यकता का अनुमान भी लगाया जाता है।

NCERT Solutions Entrepreneurship Class 12 Chapter 6 Hindi Notes PDF

वित्तीय नियोजन के अन्तर्गत पर्याप्त पूंजी की व्यवस्था की जाती है। वित्तीय नियोजन वित्तीय कार्यों से संबंधित है जिसमें उपक्रम की वित्तीय उद्देश्यों, वित्तीय नीतियों और वित्तीय कार्यवाही के संबंध में योजना बनायी जाती है। वित्तीय नियोजन के विभिन्न उद्देश्य हैं जैसे—वित्तीय साधनों का निर्धारण करना, पूँजी के स्रोतों का निर्धारण करना, वित्तीय नीतियों तथा वित्तीय नियंत्रण का निर्धारण करना, लोचपूर्ण होना, सरलता का गुण होना तथा उच्च प्रबंध को प्रतिवेदन करना इत्यादि ।

वित्तीय नियोजन की आवश्यकता या महत्त्व बहुत अधिक है क्योंकि इसके माध्यम से व्यावसायिक उपक्रम में नगद कोषों की व्यवस्था की जाती है और पर्याप्त पूँजी का प्रबंधन किया जाता है। साथ ही उचित वित्तीय अनुशासन भी कायम रखा जाता है। 

उचित नियोजन के आधार पर साधनों का अधिकतम प्रयोग होता है और कोषों का विनियोग सही ढंग से होता है। इसके अतिरिक्त वित्तीय नियोजन के द्वारा वित्तीय नियंत्रण स्थापित किया जा सकता है।

वित्तीय आवश्यकताओं का अनुमान लगाना भी आवश्यक है। इस संबंध में लघु और दीर्घ अवधि की वित्तीय आवश्यकताओं का अनुमान सही रूप से लगाना चाहिए। 

वित्तीय नियोजन को प्रभावित करने वाले विभिन्न कारक हैं, जैसे- व्यवसाय की प्रकृति, जोखिम की मात्रा, औद्योगिक इकाई की स्थिति, संसाधनों के विकल्पों का मूल्यांकन, प्रबंध का दृष्टिकोण, बाहरी पूँजी की मात्रा की आवश्यकता तथा सरकारी नियंत्रण इत्यादि । एक व्यावसायिक उपक्रम के लिए कार्यशील पूँजी का प्रबंधन करना आवश्यक है।

क्योंकि इसके द्वारा व्यवसाय के कार्यों को चलाने के लिए पर्याप्त पूँजी की व्यवस्था की जाती है। कार्यशील पूँजी के माध्यम से व्यवसाय का कार्य सुचारु रूप से चलाया जाता है। कार्यशील पूंजी को विभिन्न स्रोतों से प्राप्त किया जा सकता है, जैसे स्वयं का कोष, विविध लेनदार से प्राप्त रकम, लघु वित्त से प्राप्त रकम, बैंक से प्राप्त ऋण की रकम, नगद रुपए का प्रबंध इत्यादि स्रोतों से कार्यशील पूँजी एकत्र की जाती है।

किसी उद्योग या व्यापारिक संस्था के लिए स्थायी पूँजी भी बहुत महत्त्वपूर्ण होती है। गैर- चालू सम्पत्तियों के विनियोग को स्थायी पूँजी कहा जाता है। स्थायी सम्पत्तियों से स्थायी पूँजी का अनुमान लगाया जाता है। 

वास्तव में, स्थायी पूँजी वैसी पूँजी होती है जो स्थायी सम्पत्तियों में लगी होती है और जो लाभ कमाने में सहायक होती है। यह पूँजी किसी व्यावसायिक संस्था की स्थायी आवश्यकता की पूर्ति करती है। स्थायी पूँजी एक व्यावसायिक इकाई में महत्त्वपूर्ण स्थान

रखती है। स्थायी सम्पत्ति किसी नयी कम्पनी के लिए बहुत ही आवश्यक है। स्थायी पूँजी विभिन्न स्रोतों द्वारा प्राप्त की जा सकती है, जैसे-समता एवं पूर्वाधिकार अंशों का निर्गमन, ऋण पत्रों का निर्गमन, वित्तीय संस्थाओं से प्राप्त ऋण की रकम तथा लाभ का पुनः विनियोग करके पूँजी की कमी को पूरा करना इत्यादि ।

कोष प्रवाह विवरण एक ऐसा विवरण है जो सम्पत्तियों और दायित्वों में परिवर्तन को स्पष्ट करता है। इस विवरण के माध्यम से यह पता लगाया जाता है कि कोष कहाँ से आता है और उनका उपयोग किस प्रकार होता है। वास्तव में, कोप प्रवाह विवरण एक ऐसा विवरण पत्र जिसमें पन के प्रवाह के स्रोतों को दिखाया जाता है। 

कोष प्रवाह विवरण के विभिन्न उद्देश्य है जैसे—वित्तीय स्थिति का ज्ञान प्राप्त करना, अंशपूँजी में बढ़ोतरी का ज्ञान होना, व्यवसाय के लाभ-हानियों का ज्ञान प्राप्त करना तथा कार्यशील पूँजी में उतार-चढ़ाव की जानकारी प्राप्त होना इत्यादि ।

सम-सीमान्त बिन्दु ऐसा बिंदु होता है जहाँ पर आय और व्यय बराबर होते हैं। इसके माध्यम से लाभ-हानि को दिखाया जाता है। सम-सीमान्त बिंदु के विभिन्न लाभ हैं, जैसे-लाभ या हानि की जानकारी प्राप्त होना, न्यूनतम उत्पादन जानने में सहायक होना, उस न्यूनतम बिक्री का ज्ञान होना जहाँ न लाभ होता है और न हानि होती है। 

साथ ही विभिन्न निर्णय लेने में सहायक होना और नए बिक्री मूल्य के निर्धारण में सहायक होना इत्यादि । वास्तव में, सम-सीमान्त बिन्दु व्यावसायिक उपक्रम के लिए बहुत लाभदायक होता है।


अति लघु उत्तरीय प्रश्न (VERY SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS)


1.वित्तीय नियोजन क्या है ?

Ans. वित्तीय नियोजन किसी संगठन की पूँजी की आवश्यकता को निर्धारित करता है। यह निश्चित नीतियाँ बनाती है जिसमें पूँजी का उपयोग और प्रशासन एक निश्चित योजना के द्वारा होता है। 

2. वाकर और बॉगन ने वित्तीय नियोजन की परिभाषा किस प्रकार दी है ?

Ans. वाकर और बॉगन ने वित्तीय नियोजन की परिभाषा देते हुए कहा है कि वित्तीय नियोजन वित्तीय कार्यों से संबंधित है जिसमें फर्म की वित्तीय उद्देश्यों, वित्तीय नीतियों और वित्तीय कार्यवाही से संबंधित होती है।

3. वित्तीय नियोजन के कौन-कौन उद्देश्य हैं ? 

Ans. वित्तीय नियोजन के उद्देश्य इस प्रकार हैं- (i) वित्तीय साधनों का निर्धारण करना, (ii) पूँजी के स्रोतों का निर्धारण, (iii) वित्तीय नीतियों का निर्धारण, (iv) वित्तीय नियंत्रण का निर्धारण, (v) उच्च प्रबंध को प्रतिवेदन करना, (vi) लोचपूर्ण, (vii) सरलता का तत्व ।

4. वित्तीय नियोजन की आवश्यकता किन कारणों से होती है ? 

Ans. वित्तीय नियोजन की आवश्यकता विभिन्न कारणों से होती है जैसे— (i) पर्याप्त नकद कोषों का प्रावधान करना, (ii) उचित वित्तीय अनुशासन, (iii) कोषों का विनियोग, (iv) बचतों का बँटवारा, (v) साधनों का अधिकतम उपयोग, (vi) पूँजी पर अधिकतम प्रत्यय, (vii) वित्तीय नियंत्रण |

5. वित्तीय नियोजन की सीमाएँ क्या हैं ?

उत्तर- वित्तीय नियोजन की सीमाएँ या समस्याएँ इस प्रकार हैं- (i) पूर्वानुमान की समस्या, (ii) परिवर्तन करने की समस्या, (iii) समन्वय की समस्या, (iv) शीघ्र परिवर्तन करने की समस्या, (v) वित्तीय आवश्यकताओं के अनुमान की समस्या तथा (vi) बाह्य कारणों की समस्या इत्यादि ।

6. एक अच्छी वित्तीय नियोजन की कौन-कौन विशेषताएँ हैं?

Ans. एक अच्छी वित्तीय नियोजन की विशेषताएँ इस प्रकार हैं- (i) सरलता,(ii) संगठनात्मक उद्देश्य, (iii) लचीलापन, (iv) सरलता और शोधन क्षमता, (v) उपयोगिता, (vi) प्रबंध का प्रतिवेदन इत्यादि ।

7. अदृश्य सम्पत्ति के उदाहरण दीजिए ।

Ans. अदृश्य सम्पत्तियों के उदाहरण इस प्रकार हैं- परावर्तन व्यय, कानूनी धर्म, वित्तीय निर्गमन व्यय, ख्याति और पेटेंस इत्यादि ।

8. वित्तीय नियोजन को प्रभावित करने वाले तत्वों को लिखें ।

Ans. वित्तीय नियोजन को प्रभावित करने वाले विभिन्न कारक हैं जो इस प्रकार हैं- (i) व्यवसाय की प्रकृति, (ii) जोखिम की मात्राएँ, (iii) औद्योगिक इकाई की स्थिति, (iv) संसाधनों के विकल्पों का मूल्यांकन, (v) प्रबंध का दृष्टिकोण, (vi) बाहरी पूँजी की मात्रा की आवश्यकता, (vii) सरकारी नियंत्रण इत्यादि ।

9. कार्यशील पूँजी से आप क्या समझते हैं ?

Ans. कार्यशील पूँजी ऐसी पूँजी होती है जो व्यावसायिक उपक्रम को चलाने के लिए सदा उपलब्ध रहती है। यह तरल साधनों में होती है। इसके माध्यम से व्यवसाय के कार्यों को पूरा किया जाता है और व्यावसायिक संस्था का प्रबंध और संचालन किया जाता है।

10. स्थायी पूँजी से आप क्या समझते हैं ?

Ans. स्थायी पूँजी किसी कम्पनी या उपक्रम की स्थायी आवश्यकताओं की पूर्ति करती है। यह वैसी पूँजी होती है जो स्थायी सम्पत्तियों में लगी होती है। यह व्यावसायिक संस्था के लिए लाभ अर्जित करती है।

11. स्थायी पूँजी को प्रभावित करने वाले विभिन्न कारणों को लिखें । 

Ans. विभिन्न कारक या तत्व स्थायी पूँजी को प्रभावित करते हैं जो इस प्रकार हैं-उद्योग की प्रकृति, उत्पाद की किस्म, व्यवसाय का आकार, उत्पादन करने के ढंग, स्थायी सम्पत्ति को प्राप्त करने की विधि तथा निर्माण प्रक्रिया में बदलाव इत्यादि ।

12. कोष प्रवाह विवरण से आप क्या समझते हैं ? 

Ans. कोष प्रवाह विवरण एक ऐसा विवरण है जिसमें धन के प्रवाह के स्रोतों को दिखाया जाता है। यह स्रोत कहाँ से आए और एक निश्चित अवधि में कहाँ उपयोग किए गए, इसके बारे में जानकारी प्राप्त होती है। वास्तव में, यह ऐसा विवरण है जो सम्पत्तियों और दायित्वों में परिवर्तन को स्पष्ट करता है।

13. सम-सीमान्त बिंदु क्या है ?

Ans. सम-सीमान्त बिंदु एक ऐसा बिंदु होता है जहाँ आय और व्यय बराबर होते हैं। साथ ही लाभ और हानि भी नहीं होगा। बिक्री और उत्पादन की मात्रा सम-सीमान्त बिन्दु से अधिक होने पर लाभ होता है। दूसरी ओर सम-सीमान्त बिन्दु से नीचे बिक्री की मात्रा तथा उत्पादन की मात्रा की स्थिति में सदा हानि होती है।

14. सम-सीमान्त बिन्दु के पाँच लाभ कौन-कौन हैं ?

Ans. सम-सीमान्त बिन्दु के पाँच लाभ इस प्रकार हैं- (i) न्यूनतम उत्पादन जानने में सहायक, (ii) विक्री की रकम जहाँ लाभ-हानि नहीं हो, उसका ज्ञान होना, (iii) वांछित लाभ का ज्ञान होना, (iv) नए बिक्री मूल्य निर्धारण में सहायक होना, (v) अधिक लाभ के विभागों की जानकारी होना।


लघु उत्तरीय प्रश्न (SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS)


1. वित्तीय नियोजन का विवेचन कीजिए ।

Ans. वर्तमान उद्योगों के लिए वित्त उतना ही आवश्यक है जितना मनुष्य जीवन के लिए रक्त आवश्यक है। प्रत्येक व्यवसाय छोटा हो या बड़ा वित्त की आवश्यकता उसे होगी ही। व्यवसाय चालू हो अथवा नया दोनों को ही आवश्यक वित्तीय नियोजना करना पड़ता है। 

एक अच्छी वित्तीय नियोजन में आवश्यकतानुसार वित्त का प्राप्त करना और उसका अधिक उपयोग करना भी होता है। वित्तीय नियोजन करते समय किसी उपक्रम की वर्तमान तथा मंदिर की वित्तीय आवश्यकताओं को ध्यान में रखना चाहिए। 

सम्पत्तियों और कार्यशील पृष्ठ (Working Capital) की आवश्यकता का भली प्रकार अनुमान लगाना चाहिए। भविष्य विस्तार, आधुनिकीकरण तथा विविधिकरण भी ध्यान में रखना चाहिए।

2. एक सुद्रक वित्तीय नियोजन की विशेषताओं का विवेचन कीजिए । 

Ans. एक अच्छी वित्तीय नियोजन में निम्न मुख्य विशेषताएँ इस प्रकार है :

1. सरलता (Simplicity) वित्तीय नियोजन बहुत सरल होनी चाहिए, क्योंकि सर नियोजन को आसानी से समझा जा सकता है। 

2. संगठनात्मक उद्देश्यों पर आधारित होनी चाहिए (Based on organisation objectives)- वित्तीय नियोजन को तैयार करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि नियोजन संगष्ठन के मुख्य उद्देश्यों को शामिल कर लें। यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि कोष से कर लागत पर एकत्र किया जाय अन्यथा संस्था की लाभदायकता कम हो जायेगी। 

3. लचीलापन (Flexibility) वित्तीय नियोजन को लचीला होना चाहिए, लचील नियोजन का अर्थ है नियोजन में जब भी आवश्यक हो उसमें समायोजन कर लेना चाहिए। इस प्रकार अच्छी नियोजन में यह गुण होना चाहिए जिसमें विस्तार, संकुचन तथा परिवर्तन हो । 

4. तरलता और शोधन क्षमता (Liquidity and solvency)- एक अच्छी वित्तीय नियोजन में वह भी गुण होना चाहिए कि उसके पास उचित मात्रा में कोष हो जिससे लघु तथा दीर्घकालीन दायित्वों का भुगतान कर सके। ऐसे भुगतान जिस तिथि पर देय हो उसी तिथि पर भुगतान किया जा सके। ऐसा होने से कम्पनी की प्रतिष्ठा बढ़ेगी। शोधन क्षमता भी बनी रहेगी जब कम्पनी की सम्पत्तियाँ ऐसा हो उन्हें शीघ्र ही मुद्रा में बदला जा सके।

5. उपयोगिता (Utility)—पूँजी का उपयोग संगठन के विकास के लिए करना चाहिए कोई भी धन व्यय नहीं करना चाहिए जब तक व्यय राशि की उपयोगिता का आकलन नहीं कर लिया। गया हो।

6. प्रबंध को प्रतिवेदन (Reporting to managements) – एक अच्छी वित्तीय नियोजन की विशेषता यह भी है कि यह गुण होना चाहिए कि कमियों (Defects) को उच्च प्रबंध को जब आवश्यक हो प्रेषित करें और आवश्यक सुधार भी प्राप्त कर लें।

3. कार्यशील पूँजी की आवश्यकता क्या है ?

Ans. कार्यशील पूंजी की आवश्यकता निम्न कार्यों के लिए की जाती है : (i) कच्चे माल और उपभोग के पदार्थों के क्रय के लिए (Purchase of raw materials and consumables)

(i) कार्य की चालू स्थिति (work in progress)

(ii) अर्थ-निर्मित माल (Semi-manufactured goods)

(iii) उत्पादित माल (finished goods)

(iv) व्यापार देनदार (प्राप्य बिल) (Trade Debtors (Bills Receivables)

(v) व्ययें (Expenses)।

4.स्थायी पूँजी से आप क्या समझते हैं ?

4. Ans. स्थायी सम्पत्तियाँ ऐसी सम्पत्ति होती हैं जो स्थायी प्रकृति की होती है और इन्हें आसानी से बेचा नहीं जा सकता है। प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष ऐसी सम्पत्तियाँ आय कमाने के लिए प्रयोग की जाती हैं पुनः बिक्री के लिए नहीं होती है। स्थायी सम्पत्तियों में भूमि, भवन, मशीनरी, फर्नीचर आदि आते हैं। स्थायी सम्पत्तियों में विनियोग की व्यवसाय की शुरुआत मानी जाती है। गैर-चालू सम्पत्तियों के विनियोग को स्थायी पूँजी कहा जाता है।

5. स्थायी पूँजी की परिभाषाएँ दीजिए ।

Ans. स्थायी पूँजी की निम्नलिखित परिभाषाएँ हैं :

1. होगलैंड के अनुसार, स्थायी पूँजी की परिभाषा तुलनात्मक रूप से आसान है। इसमें भूमि, भवन, मशीनरी और अन्य सम्पत्तियाँ जिनकी स्थायी अस्तित्व होती है (Fixed capital is comparatively easily defined to include land, building, machinery and other assets having a relatively permanent existence.-Hogland.).

2. शुविन के अनुसार, स्थायी पूँजी वह कोष है जो सम्पत्तियों की प्राप्ति के लिए आवश्यक होता है जिनका उपयोग लम्बी अवधि के लिए किया जाता है जैसे भूमि-भवन, मशीनरी, संयंत्र तथा औजार आदि। (Fixed capital is the fund required for the acquisition of those assets that are to be used over and over for a long period-such as land, build- ing, machinery, equipment and tools. – Shubin.)

निष्कर्ष : “स्थायी पूँजी किसी कम्पनी की स्थायी आवश्यकता की पूर्ति करती है। यह वह पूँजी होती है जो स्थायी सम्पत्तियों में लगी होती है जो कम्पनी के लिए लाभ पैदा करती है।” (Fixed capital is used for meeting the permanent requirements of a business enterprise. It is the capital which is invested in fixed assets or non-current assets to generate profits for a company.) 

6. स्थायी पूँजी का क्या महत्त्व है ?

Ans. स्थायी पूँजी एक व्यावसायिक इकाई में काफी महत्वपूर्ण होती है। स्थायी सम्पत्ति किसी नयी कम्पनी के लिए अति आवश्यक है। कोई भी कम्पनी बिना स्थायी सम्पत्ति के नहीं चल सकते हैं। शुरू से ही जब से कोई कम्पनी बनती है तभी से स्थायी सम्पत्तियों में विनियोग से शुरू होती है। 

स्थायी पूँजी की आवश्यकता केवल स्थायी सम्पत्तियों को प्राप्त करने के लिए नहीं होती वरन् कम्पनी के शुरू की अवधि से लेकर कम्पनी चलाने के लिए स्थायी पूँजी चाहिए। स्थायी पूँजी की आवश्यकता व्यवसाय विस्तार, सुधार के लिए भी आवश्यक होती है। इससे स्पष्ट है कि किसी संगठन के सफलता के लिए स्थायी पूँजी आवश्यक होती है। 

7. स्थायी पूँजी के स्रोतों को लिखें ।

Ans. किसी उद्यम को भली प्रकार से चलाने के लिए स्थायी पूँजी की आवश्यकता का सही अनुमान लगाना आवश्यक है। ये वित्तीय आवश्यकताएँ निम्न स्रोतों से पूरी हो सकती हैं- 

(i) समता व पूर्वाधिकार अंशों का निर्गमन (Issue of Equity / Preference Shares)

(ii) ऋण पत्रों का निर्गमन (Issue of Debentures) (iii) विशिष्ट वित्तीय संस्थानों से ऋण लेकर

(iv) चालू उद्योग द्वारा लाभ का पुनः विनियोग करके पूँजी की कमी को अपने ही साधनों से पूरा कर सकती है। प्रयास यही किया जाना चाहिए कि पूँजी प्राप्ति के स्थायी स्रोतों से ही पूँजी प्राप्त करनी चाहिए।

8. स्थायी पूँजी की मांग क्यों की जाती है ? 

Ans. प्रत्येक व्यवसाय को विभिन्न प्रकार की सम्पत्तियों के क्रय के लिए वित्तीय

आवश्यकताओं की पूर्ति करनी होती है। हालाँकि वित्तीय माँग कम्पनी का पूँजी मिश्रण व्यवसाय के आकार, प्रकृति तथा उत्पादों की मात्रा से मापी जा सकती है। पूँजी की माँग निम्न के लिए की जाती है-

(i) कप प्रतिफल के भुगतान के लिए (To pay purchase consideration) 

(ii) व्यापार संचालन के व्ययों के लिए (To pay business operation expenses) 

(iii) अनायास तथा आकस्मिक व्ययों के लिए (To meet unexpected / unplanned expenses)


दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (LONG ANSWER TYPE QUESTIONS)


1. वित्तीय नियोजन की परिभाषा दीजिए। इसके उद्देश्यों का वर्णन कीजिए । (Define financial planning. Discuss its objectives.)

Ans. निम्न वित्तीय नियोजन की मुख्य परिभाषाएँ इस प्रकार हैं—

1. वाफर और माँगन के अनुसार, “वित्तीय नियोजन वित्तीय कार्यों से संबंधित है जिसमें फर्म की वित्तीय उद्देश्यों, वित्तीय नीतियों और वित्तीय कार्यवाही से संबंधित होती है। (Financial planning pertains only to the function of finance and includes the determination of the firms’s financial objectives, formulating financial poli cies and developing financial procedures, – Walker and Baughan)

2. जे. एच. वोरनवीले के अनुसार, “एक निगम के वित्तीय नियोजन के दो पहलू होते है-यह पूँजी संरचना से सम्बंधित ही नहीं है वरन् वित्तीय नीतियों से सम्बंधित है जिन्हें निगम अपनाता है या अपनाने की इच्छा रखता है।” (The financial plan of a corporation has a two-fold aspect. It refers not only to the capital structure of the corporation, but also to the financial policies which the corporation has adopted or in- tends to adopt. J. H. Bournville)

3. जॉन मेयर के अनुसार, “वित्तीय नियोजन एक ऐसा कार्य है जिसमें वित्तीय गतिविधियों की आगामी निर्णय जो निगम के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए आवश्यक होते हैं।” (Financial planning is the act of deciding in advance the financial activities that are necessary for achieving corporations, goals. John Myre) निष्कर्ष वित्तीय नियोजन किसी संगठन की पूंजी की आवश्यकता को निर्धारित करता है।

यह सुनिश्चित नीतियाँ बनाती है जिसमें पूंजी का उपयोग और प्रशासन एक निश्चित नियोजन के द्वारा हो। (financial Planning determines the amount of capital needed by an organisation. Determining suitable Policies for proper utilisation and admin- istration of capital is the Function of Financial Planning.)

वित्तीय नियोजन के उद्देश्य (Objectives of Financial Planning) : वित्तीय नियोजन के उद्देश्यों को इस प्रकार वर्णित किया जा सकता है

1. वित्तीय साधनों का निर्धारण करना ( Determining the financial resources)- वित्तीय नियोजन की मुख्य आगामी वित्तीय आवश्यकताएँ जो कम्पनी को चलाने के लिए चाहिए, का निर्धारण करना होता है।

2. पूँजी के स्रोतों का निर्धारण (Determining the Source of Capital) – वित्तीय नियोजन पूँजी के विभिन्न स्रोतों का निर्धारण किया जाता है। वित्तीय पूँजी मिश्रण (जिसमें विभिन्न जियों का अनुपात) का निर्णय किया जाता है।

3. वित्तीय नीतियों का निर्धारण (Determine Financial Policies) – वित्तीय नियोजन में नीतियों, विधियों तथा पूँजी और कोषों का प्रभावपूर्ण प्रशासन करना होता है।

4. वित्तीय नियंत्रण का निर्धारण (Determine Financial Control) – वित्तीय नियोजन एक ऐसी विधि अथवा ढंग है जिसमें साधनों को विभिन्न विभागों में बाँटने तथा उनका प्रभावपूर्ण तथा सर्वोत्तम उपयोग को निर्धारण होता है।

5. उच्च प्रबंध को प्रतिवेदन करना (Reporting to Top Management) – वित्तीय नियोजन द्वारा उच्च प्रबंध को उन घटकों की सूचना देने से होती है जिसमें वित्तीय प्रबंधक कम्पनी की आवश्यकता पर अपने विचार देती है। 

6. लोचपूर्ण (Flixibility) – वित्तीय नियोजन लचीली

होनी चाहिए जिसे नयी / बदली परिस्थितियों में आसानी से समायोजित किया जा सके। उदाहरण के लिए, जब कोष बेकार पड़े रहें तो उन्हें अल्पकालीन विनियोगों में जिनमें जोखिम कम हो लगा देना चाहिए।

7. सरलता का तत्व (Element of Simplicity)- वित्तीय नियोजन को सरल होना चाहिए जिससे इसे आसानी से समझा जा सके एक पेंचीदगी वाली योजना बिना मतलब गड़बड़ पैदा कर देगा।

2. वित्तीय नियोजन की आवश्यकता, महत्व तथा योगदान का परीक्षण कीजिए। (Examine the need, importance and role of financial planning.)

Ans. वित्तीय नियोजन की आवश्यकता इसलिए होती है क्योंकि इसके द्वारा कोर्षो का आना और उपयोग तथा कोषों की कमी का अनुभव नहीं होने देगा और कार्यशील पूँजी की आवश्यकता को पूरा किया जाता है। निम्न कुछ ऐसे तथ्य हैं जिनके आधार पर वित्तीय नियोजन के महत्व को समझने में सहायता मिलती है-

1. पर्याप्त नकद कोषों का प्रावधान करना (Provision for adequate cash reserves) – पर्याप्त नकद कोषों की नियोजन से रोकड़ की कमी कभी नहीं होगी, साथ ही लेनदारों और दिन-प्रतिदिन के व्ययों का भुगतान ठीक समय पर हो सकेगा।

2. उचित वित्तीय अनुशासन उचित वित्तीय नियोजन वित्तीय अनुशासन के लिए भी आवश्यक होता है। वित्तीय अनुशासन में पूँजी मिश्रण पर भी ध्यान दिया जाता है, यहाँ विभिन्न यूजियों में से कौन-सी सस्ती है ध्यान में रखी जाती है।

3. कोषों का विनियोग (Investment of funds)- वित्तीय नियोजन केवल कोषों की प्राप्ति को ही नहीं बताती है, वरन् यह भी बताती है इन कोषों को कहाँ विनियोग किया जाए, कितना धन स्थायी सम्पत्तियों में तथा कितना धन कार्यशील पूँजी के लिए रखा जाय, इसके अनेक पटक होते हैं। 4. बचतों का बंटवारा (Distribution of surplus ) – वित्तीय नियोजन की आवश्यकता

इसलिए भी होती है कि व्यवसाय की बचतों को कैसे बाँटा जाय? क्या समस्त लाभों को बाँटा जाय अथवा कुछ को भविष्य के विस्तार और आधुनिकीकरण के लिए रखा जाय यह कार्य वित्तीय नियोजन संभव बनाता है।

5. साधनों का अधिकतम उपयोग (Maximum use of Resource)- उचित नियोजन के द्वारा यह सम्भावना नहीं रहती है कि कोष बिना उपयोग के नहीं रह सकते हैं। कोर्षो को विभिन्न (Heads) पर सावधानी से बाँट दिया जाता है।

6. पूँजी पर अधिकतम प्रत्याय (Maximum return on capital)- वित्तीय नियोजन का उद्देश्य कोष जहाँ आवश्यक हो व्यय करना होता है और जहाँ धन की व्यय करने की आवश्यकता नहीं है वहाँ व्यय नहीं करना चाहिए। ऐसा करने से कोर्षो से अधिकतम लाभ कमाया जा सकता है। अधिकतम लाभ से ही अंशधारियों, लेनदार तथा पूँजीकर्ताओं के दिमाग में सुरक्षा की भावना पैदा होती है।

7. वित्तीय नियंत्रण (Financial Control) – वित्तीय नियंत्रण के क्षेत्र में वित्तीय नियोजन के महत्त्व को कोई आदमी कम नहीं आँक सकता है। वित्तीय नियोजन में कुछ वित्तीय प्रभाव निर्धारित कर दिये जाते हैं, साथ ही वास्तविक परिणामों को पूर्व निश्चित प्रभावों से तुलना करते हैं। जब वास्तविक तथा अनुमानित प्रमापों में अन्तर होता है तो इन्हें ठीक करने का प्रयास किया जाता है।

3. वित्तीय नियोजन की सीमाओं का वर्णन कीजिए । (Describe the problems/limitations of financial planning

Ans. वित्तीय नियोजन की सीमाएँ / समस्याएँ इस प्रकार हैं-

1. पूर्व अनुमान की समस्या ( Problem of forcasting)- वित्तीय नियोजन भविष्य से सम्बन्धित होता है और भविष्य सदैव अनिश्चित तथा जोखिमों से भरा होता है, इस प्रकार वित्तीय नियोजन केवल अनुमान पर आधारित होता है।

2. परिवर्तन की समस्या (Problem of Change ) — वित्तीय नियोजन सदैव ही अग्रिम अवधि में बनती है और अनिश्चिता को दिमाग में रखकर बनायी जाती है, परन्तु वर्तमान दशाओं को ध्यान में रखकर परिवर्तन करना आवश्यक होता है लेकिन वित्तीय प्रबंध परिवर्तन कर नहीं सकता है। उदाहरण के लिए एक सम्पत्ति को 5 लाख रुपये में खरीदने का प्रस्ताव है, वित्त की व्यवस्था भी कर ली है, ऐसी स्थिति में परिवर्तन करना ही पड़े तब भी काफी कठिनाइयाँ सामने आएँगी।

3. समन्वय की समस्या (Problem of Coordination)- वित्तीय नियोजन की सफलता के लिए किसी संस्था के विभिन्न विभागों (उत्पादन विभाग, कर्मचारी विभाग, विपणन विभाग, बिक्री विभाग) आदि में समन्वय आवश्यक है। जब तक विभिन्न विभागों में समन्वय नहीं होता है तब तक वित्तीय आवश्यकताओं का अनुमान लगाना भी कठिन होगा और न ही वित्तीय नियोजन भली प्रकार से हो पायेगा।

4. शीघ्र परिवर्तन (Rapid change) वर्तमान समय में परिवर्तन बड़े ही शीघ्र आ रहे हैं, उद्योगों की प्रक्रिया तथा उपभोक्ताओं का व्यवहार बड़ी जल्दी बदल रहा है। स्थायी सम्पत्तियों में एक बार विनियोग का निर्णय आसानी से नहीं बदला जा सकता है। ऐसी दशा में वित्तीय नियोजन की उपयोगिता समाप्त हो जायेगी।

5. वित्तीय आवश्यकताओं के अनुमान की समस्या (Problem of estimation of financial needs)—-वित्तीय नियोजन की सीमाओं में एक समस्या धन की आवश्यकता के अनुमान की समस्या है। प्रवर्तक और वित्तीय प्रबंधक आसानी से कोषों की आवश्यकता का सही अनुमान नहीं लगा सकते हैं। ऐसे स्थायी सम्पत्तियों के लिए धन की आवश्यकता का अनुमान कैसे लगाया जा सकता है ? सम्पत्तियों का मूल्य सदैव घटता-बढ़ता रहता है? यही समस्या कार्यशील पूंजी की आवश्यकता से सम्बंधित है। कोषों की आवश्यकता, व्यापार की प्रकृति, आकार, उत्पादन की मात्रा तथा प्रतिस्पर्धा के स्तर से ही मापी जा सकती है।

6. बाह्य कारणों की समस्या (Problem due to external factors) बाहरी घटकों को भी वित्तीय नियोजन करते समय ध्यान में रखना चाहिए। बाहरी घटक इस प्रकार हैं: (i) मुद्रा बाहार की दशाएँ, (ii) व्यापार की स्थिति, (iii) विनियोगताओं प्रवृति, सरकारी नीति, व्याज दर आदि।

4. वित्तीय आवश्यकताओं के अनुमान की समीक्षा कीजिए । (Examine the estimation of financial requirement.) Or, लघु-दीर्घ अवधि की वित्तीय आवश्यकताओं के अनुमान का परीक्षण कीजिए । (Examine estimation of short-long term financial needs.)

Ans. वित्तीय नियोजन का एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि वित्तीय आवश्यकताओं का अनुमान कैसे करें? अथवा कितनी पूंजी की आवश्यकता सम्पत्ति खरीदने के लिए चाहिए? वित्तीय नियोजन में पूँजी की आवश्यकता को जानने के लिए विभिन्न प्रकार की सम्पत्तियों की क्रय के

लिए एक निश्चित योजना बना लेना चाहिए-

(i) चालू सम्पत्तियों एवं दायित्वों के लिए वित्त आवश्यकता (Requirement of Financial for current liabilities Assets)

(ii) स्थायी सम्पत्तियों के लिए वित्त (Requirement of Finance for fixed Assets) 

(iii) अदृश्य सम्पत्तियों के लिए वित्तीय आवश्यकताएँ (Requirement of Finance for intangible Assets.) 

(i) चालू सम्पत्तियों एवं दायित्वों के लिए वित्त आवश्यकता (Requirement of Financial for current liabilities Assets) – बड़े व्यावसायिक संगठनों में काफी बड़ी मात्रा में कार्यशील पूँजी की आवश्यकता होती है। बहुत-सी चालू सम्पत्तियों को बनाए रखने के लिए कार्यशील पूँजी अवश्य चाहिए। ऐसे संगठन में चालू दायित्वों के भुगतान के लिए भी वित्तीय आवश्यकता पड़ती है। जिसके फलस्वरूप ऐसे दायित्वों को देय तिथि पर उनका भुगतान किया जा सके, उसके लिए नकद कोष चाहिए। कार्यशील पूँजी के कोषों को स्थायी सम्पत्ति के क्रय में व्यय नहीं करना चाहिए। कार्यशील पूँजी को लघु प्रतिभूतियों में लगाना चाहिए जिन्हें आवश्यकता के समय शीघ्र बेचा भी जा सकता है।

(ii) स्थायी सम्पत्तियों के लिए वित्त (Requirement of Finance for fixed 79 Assets) इस प्रकार की सम्पत्तियों की आवश्यकता लम्बी अवधि के लिए होती है। स्थायी सम्पत्तियाँ बिक्री के लिए नहीं होती हैं वरन व्यवसाय में लम्बी अवधि के लिए होती है। इस प्रकार

की सम्पत्तियाँ भूमि व भवन, मशीन संयंत्र, फर्नीचर, गाड़ियाँ आदि होती हैं। इस प्रकार की सम्पत्तियाँ नये और पुराने संगठनों को चाहिए। वर्तमान संगठनों को विस्तार, विविधिकरण तथा आधुनिकीकरण के लिए वित्त की आवश्यकता होती है।”

(iii) अदृश्य सम्पत्तियाँ (Intangible Assets) – बहुत सी धन राशि अदृश्य सम्पत्तियों की प्राप्ति के लिए चाहिए, इस प्रकार की धनराशि उस परिस्थिति में चाहिए जब किसी चालू व्यवसाय (Running Business) को खरीदते हो। निम्न अदृश्य सम्पत्तियाँ हैं :

(a) प्रवर्तन व्यय ( Promotion Expenses ) – इस प्रकार के व्ययों में कम्पनी प्रवर्तन व्यय कम्पनी निर्माण व्यय, प्रवर्तक की सेवाओं के व्यय आदि । 

(b) कानूनी व्यय (Statuory Expenses) – कानूनी व्यय भी कम्पनी बनाने के सम्बंध में होते हैं। कुछ व्यय कम्पनी पार्षद नियम, अन्तर्नियम तथा प्रविवरण के छपाई के व्यय तथा पंजीयन के व्यय ।

(c) वित्त निर्गमन व्यय (Financial Raising Expenses) वित्त प्राप्ति के विभिन्न व्यय होते हैं जैसे अंश निर्गमन, ऋण पत्र, निर्गमन व्यय, अभिगोपकों के कमीशन और दलाली।

(d) ख्याति और पेटेन्ट्स (Goodwill and Patents) – जब ख्याति और पेटेन्ट्स आदि को क्रय करने पर दिया भुगतान भी अदृश्य सम्पत्ति की श्रेणी में रखा जाता है।

5. वित्त नियोजन को प्रभावित करने वाले कारकों का वर्णन कीजिए । (Discuss the factors influencing financial planning.)

Ans. वित्तीय नियोजन को निम्न घटक या कारक प्रभावित करते हैं 1. व्यवसाय की प्रकृति (Nature of Business) – उद्योग दो प्रकार के होते हैं : 

(a) अधिक पूँजी वाले उद्योग (Capital intersified industries) – ऐसे उद्योगों को चलाने के लिए बड़ी मात्रा में धन की आवश्यकता होती है, सारा काम स्वचालित मशीनों से होता है। ऐसे उद्योगों की वित्तीय नियोजन पेंचीदगी वाली होती है।

(b) श्रम की मात्रा वाले उद्योग (Labour intensified insdustries) – श्रम आयारित उद्योगों को कम पूँजी की आवश्यकता होती है।

2. जोखिम की राशि (Amount of Risk) – जिन उद्योगों में जोखिम की मात्रा अधिक होती है, वे उद्योग स्वामी की पूँजी पर आधारित होते हैं। दूसरी ओर कम जोखिम वाले उद्योगों को ऋण लेकर चलाया जा सकता है। इसे समता पूँजी पर व्यापार (Trading on Equity) करना कहते हैं।

3. औद्योगिक इकाई की स्थिति (Status of Industrial Unit) – यहाँ किसी व्यवसाय की विशेषताएँ जैसे—यह उद्योग कब से काम कर रहा है? उसका आकार, कार्य क्षेत्र, ख्याति, प्रबंधकों / बड़े उद्योगों को ऐसी समस्याएँ / वित्तीय समस्याएँ / नहीं आती हैं। क्योंकि एक पुरानी कम्पनी को विनियोगी मिल ही जाते हैं। नई इकाइयों के प्रबंधकों और प्रवर्तकों को वित्त निर्गमन में अनेक समस्याएँ सामने आती हैं।

4. संसाधनों के विकल्पों का मूल्यांकन (Appraisal of alternative sources of finance)- जब किसी कम्पनी का वित्तीय नियोजन किया जाता है तो विभिन्न विकल्पों का अध्ययन करना भी आवश्यक होता है। जैसे कौन सा स्रोत अधिक प्रसिद्ध है ? उसका अंकित मूल्य और निर्गमित मूल्य की तुलना करें।

5. प्रबंध का दृष्टिकोण (Attitude of Management ) – प्रबंध का दृष्टिकोण भी वित्तीय नियोजन को प्रभावित करता है जब कोई कम्पनी यह चाहती है कि उसका प्रबंध उसी के हाथो रहे तो ऐसी कम्पनी को समता अंश (Equity Shares) का निर्गमन नहीं करना चाहिए। केवल ऋण लेकर ही विस्तार और आधुनिकीकरण करना चाहिए।

6. बाहरी पूँजी की मात्रा की आवश्यकता (Magnitude of External Capital requirement)—विस्तार के लिए पूँजी को विभिन्न स्रोतों से प्राप्त करना चाहिए। जब कोष लघु अवधि के चाहिए तो इन्हें विमोचनीय पूर्वाधिकार अंशों और ऋण पत्रों से प्राप्त करना चाहिए। जहाँ तक संभव हो यह प्रयास अवश्य करना चाहिए ऐसे अंशों और ऋण पत्रों को बार-बार जारी नहीं करनी चाहिए। ऐसा करने से पूँजी प्राप्ति की लागत बढ़ जायेगी और कम्पनी की ख्याति भी गिर जायेगी।

7. सरकारी नियंत्रण (Government Control) – वित्तीय नियोजन करते समय प्रबंध को सरकारी नीतियों को भी ध्यान में रखना चाहिए। उदाहरण के लिए कम्पनी अधिनियम 1956 के अनुसार अंश ऋण पत्रों निर्गमन करने से पहले पूँजी नियंत्रक की आज्ञा अवश्य ले लेनी चाहिए। यह स्वीकृति तभी दी जाती है जब उचित पूँजी मिश्रण किया हो।

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