NCERT Solutions Entrepreneurship Class 12 Chapter 8 Hindi Notes PDF

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Entrepreneurship Class 12 Chapter 8 Hindi Notes PDF, NCERT Solutions Entrepreneurship Class 12 Chapter 8 Hindi Notes PDF, Entrepreneurship Class 12 Chapter 8 Hindi Notes PDF

Entrepreneurship Class 12 Chapter 8 Hindi Notes PDF

Class12th 
Chapter Nameउद्यम प्रबंध | Enterprise Management
Chapter number08
Book NCERT
SubjectEntrepreneurship
Medium Hindi
Study MaterialsImportant questions answers
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उद्यम प्रबंध | Enterprise Management


किसी भी व्यावसायिक या औद्योगिक संस्था को कुशलतापूर्वक संचालित करने के लिए प्र का महत्वपूर्ण स्थान है। प्रबंध व्यवस्था कुशलतापूर्वक होने से व्यावसायिक संस्था अपने कार्य में सफल होती है। 

किसी उद्यम के संसाधनों और कार्यों की ऐसी व्यवस्था करना कि वह अपने वांछित लक्ष्य प्राप्त कर ले, उसे प्रबंध कहते हैं। यह एक कला भी है क्योंकि इसमें नवीनता पारस्परिक क्रिया, अन्तर्दृष्टि सृजनशीलता और जोखिम उठाने की योग्यता शामिल होती है। साथ ही प्रबंध एक विज्ञान भी है क्योंकि यह वैज्ञानिक सिद्धांतों पर चलता है।

Entrepreneurship Class 12 Chapter 8 Hindi Notes PDF

उद्यमशीलता एक ऐसी व्यवस्थित नवीनता है जो परिवर्तनों के लिए की गयी उद्देश्यपूर्ण एवं संगठित खोज में समाहित होती है और अवसरों के प्रणालीवाद विश्लेषण में ऐसे परिवर्तन कम खर्च वाली और सामाजिक नवीनताएँ प्रदान कर सकती हैं। 

उद्यमशीलता के अन्तर्गत उद्यमी जोखिम और अनिश्चितताओं का सामना करके उपक्रम की स्थापना करता है और कारोबार का संचालन करता है और लाभ कमाने का प्रयत्न करता है।

उद्यमशीलता और प्रबंध में अन्तर है, क्योंकि उद्यमशीलता किसी उद्यम की भावना होती है, जबकि प्रबंध किसी उद्यम के उद्देश्यों की प्राप्ति की कला और विज्ञान दोनों है। 

उद्यमशीलता के उद्यमी अपनी भूमिका को निभाता है प्रबंध में प्रबंधक ही अपनी भूमिका को पूरा करता है। साथ ही एक उद्यमी सफल प्रबंधक होता है जबकि प्रबंधक सफल उद्यमी नहीं होता है। उद्यमी की विभिन्न प्रबंध जिम्मेदारियाँ होती हैं। इस सिलसिले में स्वयं प्रबंधन और उद्यम

प्रबंधन जैसी जिम्मेदारियाँ होती हैं। एक उद्यमी की विभिन्न योग्यताएँ हो सकती हैं, जैसे- नए विचार उत्पन्न करना, नए परिवर्तन या नयी खोज करना, जोखिम उठाने की योग्यता होना, उच्च व्यक्तित्व होना, योजना को कार्यरूप देने की योग्यता होना, आत्मविश्वास होना, समस्या समाधान की ओर उन्मुख होना तथा दृढ़ता का गुण होना इत्यादि ।

किसी चुने हुए उद्देश्य की प्राप्ति के लिए योजना बनाने, संगठन बनाने, कार्य को पूरा करने तथा मानव और माल दोनों संसाधनों को नियंत्रित करने की स्पष्ट प्रक्रियाओं को ही उद्यम का प्रबंध कहा जाता है। उद्यम का प्रबंध जब उद्यम अच्छे ढंग से करता है तो उपक्रम या उद्यम सफल होता है।

उद्यम की सफलता अच्छे संचार पर निर्भर करती है। संचार का अर्थ होता है सामान्य रूप से विचारों में भागीदारी। इससे विचारों का आदान-प्रदान होता है। संचार के अन्तर्गत सार्थक सूचना और स्पष्ट विचार होना चाहिए। यह सूचना या संदेश लिखित होना चाहिए। बदलती आवश्यकताओं और पर्यावरण से समन्वय बनाने के लिए प्रबंध व्यवस्था को लचीला होना चाहिए। 

संचार प्रमुख रूप से तीन प्रकार के होते हैं जिन्हें मौखिक संचार, लिखित संचार और संकेतात्मक संचार कहा जाता है। मौखिक संचार आपसी वार्तालाप और मुख के माध्यम से होती है, जैसे- आमने-सामने बातचीत करने, टेलीफोन और मोबाइल से बातचीत करने, सभा और सम्मेलन करके आपस में विचार-विमर्श करना मौखिक संचार है। 

लिखित संचार लिखित रूप में होता है, जैसे—-पत्र, वार्षिक रिपोर्ट, ज्ञापन, कार्यालय प्रकाशन, फैक्स, रिपोर्ट, टेलीविजन, फिल्म स्लाइड, कम्प्यूटर, समाचार-पत्र, डायरी इत्यादि लिखित संचार के माध्यम हैं। संकेत या पोस्टरों के प्रयोग से सूचना का आदान-प्रदान होना संकेतात्मक संचार कहा जाता है। जैसे— गर्मजोशी से हाथ मिलाना, गले लगना, शाबाशी में पीठ थपथपाना और किसी संचार के लिए संकेत करना संकेतात्मक संचार कहलाता है।

जब एक उद्यमी अपने व्यवसाय या उद्योग के संबंध में उचित निर्णय लेता है तो वह अपने कारोबार में सफल होता है। निर्णय लेने का अर्थ है कि कई विकल्पों में से एक कार्यवाही का चयन करके उसपर उचित निर्णय लेना। जब उद्यमी या साहसी व्यवसाय और उद्योग से संबंधित. बातों का पर्यावरण और परिस्थिति के अनुसार उचित निर्णय लेता है तो अवसरों का लाभ उठाया जा सकता है। परिणामस्वरूप उपक्रम सफल होता है।


अति लघु उत्तरीय प्रश्न (VERY SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS)


1. प्रबंध का क्या अर्थ है ?

Ans. प्रबंध शब्द को कई अर्थों में प्रयोग किया जाता है। कभी-कभी एक संगठन में कार्यरत प्रबंधकीय कर्मियों के समूह का प्रबंध करने के लिए किया जाता है। अन्य समय में प्रबंध का तात्पर्य नियोजन, संगठन, कार्मिकता, निर्देशन, समन्वयन एवं नियंत्रण प्रक्रिया के रूप में लिया जाता है। 

इसे ज्ञान के स्वरूप, व्यवहार एवं अनुशासन में जाना जाता है। अनेक लोग हमें इसे नेतृत्व एवं निर्णयन का तकनीक मानते हैं अथवा समन्वयन का साधन तथा कुछ लोग प्रबंध को एक आर्थिक साधन, उत्पादन का एक घटक अथवा अधिग्रहण की व्यवस्था मानते हैं।

2. हेनरी फियोल द्वारा दी गयी प्रबंध की परिभाषा को लिखें। 

Ans. हेनरी फियोल ने प्रबंध की परिभाषा देते हुए कहा है कि प्रबंध ने एक योजना होती है। संगठन होता है आज्ञा होती है, समन्वय होता है, नियंत्रण होता है, वित्तीय साधनों को एकत्र करना होता है, आगे देखना होता है तथा भविष्य की परीक्षा और कार्य करने के लिए योजना बनायी जाती है।

3. उद्यमशीलता क्या है ?

Ans. उद्यमशीलता एक ऐसी व्यवस्थित नवीनता है जो परिवर्तनों के लिए की गयी उद्देश्यपूर्ण एवं संगठित खोज में अन्तर्निहित होती है और सुअवसरों के प्रणालीबद्ध विश्लेषण में ऐसे परिवर्तन कम खर्च वाली और सामाजिक नवीनताएँ प्रदान कर सकती हैं।

4. उद्यमी और उद्यम में क्या संबंध है ?

Ans. उद्यमी और उद्यम का संबंध वैसा ही है जैसो आत्मा और शरीर का उद्यमी निर्देश और ऊर्जा प्रदान करता है। जबकि उद्यम निवेश को संसाधित करके उसे उत्पादन में बदलता है। किसी भी उद्यमी को धन्धे को सफल बनाने के लिए उद्यमी को दोहरी भूमिका निभानी पड़ती है। एक तो उद्यमी की और दूसरी सफल प्रबंधक की। 

5. एक उद्यमी की दो जिम्मेदारियाँ कौन-कौन हैं ?

Ans. एक उद्यमी की दो जिम्मेदारियाँ ये हैं- (i) स्वयं प्रबंधन – इसके अन्तर्गत उद्यमी संबंधी युग और प्रेरणा प्राप्ति और उसे बनाए रखना है। (ii) उद्यम प्रबंधन – इसके अन्तर्गत प्रबंधात्मक प्रक्रिया प्रबंधात्मक कार्य आते हैं।

6. संगठन क्या है ?

Ans. संगठन किसी उद्यम के सदस्यों के बीच संबंध स्थापित करने की प्रक्रिया है। यह संबंध अधिकार और कर्तव्यों के हिसाब से बनाए जाते है। प्रत्येक व्यक्ति को एक विशेष कार्य सौंपा जाता है। साथ ही उस कार्य को करने का अधिकार भी दिया जाता है।

7. संचार से आप क्या समझते हैं ?

Ans. संचार शब्द लैटिन भाषा के शब्द Communis से निकला है जिसका अर्थ होता है- सामान्य। अतः Communication अर्थात् संचार का मतलब हुआ कि सामान्य रूप से विचारों में भागीदारी। अर्थात् दो या दो से अधिक लोगों के बीच तथ्यों, विचारों, मतों और भावनाओं को समझने के लिए साझी भूमिका निभाना संचार है।

8. निर्णय लेना का क्या अर्थ है ?

Ans. निर्णय लेने का अर्थ है कि विभिन्न विकल्पों जैसे एक विकल्प का चयन करके कार्यवाही करना। यह योजना बनाने का बीजाकोष होता है। सही निर्णय लेने से उपक्रम या उद्यमी सफल होता है।


लघु उत्तरीय प्रश्न (SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS)


1. प्रबंध की परिभाषा देते हुए इसके अर्थ को स्पष्ट कीजिए ।

Ans. किसी उद्यम के संसाधनों और कार्यों की ऐसी व्यवस्था करना कि वह अपने वांछित लक्ष्य प्राप्त कर ले, उसे प्रबंध कहते हैं। यह एक कला भी है क्योंकि इसमें नवीनता, पारस्परिक क्रिया, अन्तर्दृष्टि सृजनशीलता और जोखिम उठाने की योग्यता शामिल होती है। साथ ही, प्रबंध एक विज्ञान भी है क्योंकि यह वैज्ञानिक सिद्धांतों पर चलता है। प्रबंध की परिभाषा (Definition of Management)

(i) हेनरी फेयोल के अनुसार, “प्रबंध में एक योजना होती है, संगठन होता है, आज्ञा होती है, समन्वय होता है, नियंत्रण होता है, आगे देखना होता है, वित्त साधनों को जुटाना होता है, भविष्य की परीक्षा और कार्य करने के लिए योजना बनायी जाती है।” 

(ii) हेनरी एस. सिस्क के अनुसार, “प्रबंध में सभी साधनों को समन्वित किया जाता है: नियोजन द्वारा, संगठित करके, निर्देशन देकर तथा नियंत्रण जिससे वर्णित उद्देश्यों को प्राप्त किया जा सके।” 

उद्यमशीलता उद्यम की भावना होती है। उद्यम शीलता एक फ्रेंच शब्द (Entrepredure) शब्द से लिया है, जो उस व्यक्ति के लिए उपयोग किया जाता है जो किसी कार्य के आरंभकर्ता होते हैं और नये उपक्रम के जोखिम उठाते थे।

2. उद्यमशीलता की परिभाषा दीजिए और इसके अर्थ को स्पष्ट कीजिए ।

Ans. उद्यमशीलता की परिभाषा करने के अनेक प्रयास किये गये हैं। यह इस पर निर्भर करती है कि आवश्यकता किस चीज की है और उसका प्रयास करने वाले व्यक्ति कौन हैं। रिचार्ड कैन्टीलन के अनुसार, “एक फ्रांसीसी अर्थशास्त्री थे जो मूल रूप से आयरलैंड के निवासी थे। उद्यमशीलता को उन्होंने अपनी पुस्तक जो उनकी मृत्यु 1755 के बाद प्रकाशित हुई, में इस प्रकार परिभाषित किया है”।

“उद्यमी एक ऐसा व्यक्ति होता है जो किसी वस्तु को अनिश्चित मूल्य पर बेचने के लिए एक निश्चित मूल्य अदा करता है। इससे वह संसाधनों को प्राप्त करने और उनका प्रयोग करने के विषय में निर्णय लेता है जिसमें उद्यम का जोखिम मिला हुआ होता है।” 

एडम स्मिथ एक अर्थशास्त्री है जो अर्थशास्त्र के विभिन्न सिद्धांतों के लिए जगत प्रसिद्ध है। ‘वेल्थ ऑफ नेशन्स’ नामक अपनी पुस्तक में वे उद्यमी को इस प्रकार परिभाषित करते हैं उद्यमी एक ऐसा व्यक्ति होता है जो सामान और सेवाओं की संभावित माँग को देखते हुए वाणिज्यिक उद्देश्यों के लिए कोई संगठन बनाना शुरू करता है। ऐसा करके वह एक किफायती एजेंट के रूप में कार्य करता है तथा माँग को पूर्ति में बदल देता है।” 

इस प्रकार उद्यमशीलता-“एक ऐसी व्यवस्थित नवीनता है जो परिवर्तनों के लिए की गई उद्देश्यपूर्ण एवं संगठित खोज में अन्तर्निहित होती है और सुअवसरों के प्रणालीबद्ध विश्लेषण में ऐसे परिवर्तन कर्म खर्च वाली सामाजिक नवीनताएँ प्रदान कर सकती हैं।” 

3. उद्यमशीलता और प्रबंध में अन्तर बतायें।

Ans. उद्यमशीलता और प्रबंध में निम्नलिखित अंतर है-

उद्यमशीलता (Entrepreneurship)प्रबंध (Management)
1. यह किसी उद्यम की भावना होती है। यह किसी उद्यम के उद्देश्यों की प्राप्ति की कला और विज्ञान है।
2. एक उद्यमी सफल प्रबंधक होता है। एक सफल प्रबंधक उद्यमी नहीं होता है।
3. उद्यमशीलता में नयी वस्तु पर्यावरण के अनुसार बनाई जाती है। प्रबंध में, प्रबंधक सभी अभिलेख और अनुशासन रखता है।
4. उद्यमशीलता में उद्यमी सही कार्य करता है। प्रबंध में प्रबंधक सही कार्य करता है।
5. उद्यमशीलता सामान के उत्पादन से संबंधित होती है।प्रबंध माल और सेवा सेवाओं के वितरण से संबंधित होती है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (LONG ANSWER TYPE QUESTIONS)


1. उद्यमी का प्रबंध उत्तरदायित्व का वर्णन कीजिए । responsibilities of an entrepreneur.) (Discuss the management 

Ans. एक उद्यमी की दो जिम्मेदारियाँ होती हैं-

(क) स्वयं प्रबंधन ( उद्यमी संबंधी गुण एवं प्रेरणा) (ख) उद्यम प्रबंधन।

(क) स्वयं प्रबंधन (Management of Self) उद्यमी शब्द उन लोगों के लिए होता है। जो नए विचार उत्पादित करते हैं और अपनी स्वतंत्र पहल करके समाज को अतिरिक्त मूल्य प्रदान करते हैं। उनकी दृष्टि मिशन की ओर उन्मुख होती है, रचनात्मक परिवर्तन के लिए प्रतिब होते हैं

तथा आवश्यक संसाधनों और ऊर्जा को इस प्रकार इकट्ठा करते हैं कि उन्हें अपेक्षित परिणाम प्राप्त हो। उद्यमी संबंधी भूमिका को प्रभावी ढंग से निभाने के लिए एक उद्यमी को सृजनशील और परिवर्तनकारी होना चाहिए। उद्यमी को अपनी प्रेरणा स्वयं भी व्यवस्थित करनी पड़ सकती है।

उद्यमी की सुयोग्यताएँ निम्नलिखित हैं-

(i) सृजनशीलता (Creativity)

(ii) नए परिवर्तन या नई खोज (Innovation)

(iii) जोखिम उठाने की योग्यता (Ability to take risk)

(iv) पहल करना (Taking Initiative)

(v) उत्कृष्टता के मानक प्राप्त करना (Attaining standards of excellence)

(vi) समस्या समाधान की ओर उन्मुख रहना (Orientation to Problem Solving)

(vii) दृढ़ता (Persistence)

(viii) योजना प्रतिमान के प्रति विश्वास एवं प्रतिबद्धता (Faith and commitment to a planning paradigm)

(ix) सूचना प्राप्त करने वाला तथा लोगों व पर्यावरण के प्रति सचेत ( Information seeking and concern for people and environment)

(x) आत्म विश्वास (Self Confidence).

(i) सृजनशीलता (Creativity) इसमें सृजनशीलता प्रक्रिया शामिल होती है- 

(a) विचार की उत्पत्ति (Idea Germination) उत्पत्ति की दशा प्राकृतिक बीज बोने की भाँति बीजने की प्रक्रिया है जो उस समय बनी है जब परागण हुए फूल के हवा द्वारा बिखेरे हुए बीजों को उपजाऊ भूमि मिल जाती है और वे जड़ पकड़ लेते हैं। रचनात्मक विचार व्यक्ति की किसी क्षेत्र में अध्ययन या किसी विशेष समस्या के बारे में रुचि अथवा जिज्ञासा से पैदा होते हैं।

(b) तैयारी (Preparation) एक बार जब जिज्ञासा का बीज विचार के रूप में उग जाता है तो व्यक्ति उनके उत्तर की तलाश शुरू कर देता है। यदि वह विचार नए उत्पादन या सेवा के बारे में हो तो व्यक्ति को बाजार में खोज हेतु जाने की आवश्यकता होती है। 

(c) उत्पत्तिकरण (Incubation) – यह समय आत्मसात करने का होता है। जो भी विचार या उसके अनेक विस्तार पैदा हुए हों वे उस व्यक्ति के अवचेतन ज्ञान का हिस्सा बन जाते हैं। 

(d) प्रबोधन (Illumination ) —— प्रबोधन की चतुर्थ दशा उस समय आती है जब यह विचार वास्तविक रूप में पुनः उभर कर आता है और व्यक्ति उसके लिए एक व्यवहार्य योजना बनाता है। 

(e) सत्यापन (Verification)—जब विचारों या योजना को वास्तविक व लाभप्रद प्रयोग में बदल दिया जाता है तो उसे सत्यापन अवस्था में पहुंचा हुआ कहा जा सकता है। सत्यापन एक विकासशील दशा होती है जिसमें ज्ञान विकसित होकर प्रयोग में आ जाता है।

(ii) नए परिवर्तन ( Innovation ) यह उद्यमीपन की प्रक्रिया है। इसमें लाभकारी विचारों को प्रयोग में बदला जाता है जिसका व्यावसायिक जगत में महत्व होता है।

2. संचार क्या है ? इसके विशेषताओं का (What is communication Explain its characteristics)

Ans. संचार (Communication ) यह शब्द लैटिन भाषा के शब्द Communis निकला है जिसका अर्थ होता है “सामान्य” । अतः communication अर्थात् संचार का हुआ कि “सामान्य रूप से विचारों में भागीदारी” इसे इस प्रकार परिभाषित किया जा सकता कि दो या दो से अधिक लोगों के बीच तथ्यों, विचारों, मतों या भावनाओं को समझने के साझी भूमिका बनाना।

संचार की विशेषताएँ (Features of Communications)

(i) सार्थक (Meaningful) संचार की सर्वप्रथम मुख्य विशेषता है कि प्रत्येक सूचना एक अर्थ होना चाहिए। अर्थ के बिना किसी सूचना और निर्देश का कोई लाभ नहीं

(ii) स्पष्ट (Clear ) संदिश, विचार, अनुदेश दाता व प्राप्तकर्ता दोनों के स्पष्ट होने

(iii) उपयुक्त (Appropriate ) — विचार, संदेश या अन्य कोई रूप उपयुक्त होना च जिसे सभी समझ सकें।

(iv) लिखित (Written ) संदेश लिखित होने चाहिए।

(v) लचीलापन (Flexible)—बदलती आवश्यकताओं या पर्यावरण से समन्वय बनाने। लिए एक अच्छी व्यवस्था को लचीला होना चाहिए। (vi) दो-तरफा संचार (Two-Way-Communication) संचार के लिए दो पक्ष होने चाहिए एक तो प्रेषक और दूसरा प्राप्तकर्ता ।

3. संचार के प्रकार का वर्णन कीजिए। (Discuss the different types of communication.)

Ans. 1. मौखिक संदेश (Face to face Communication)उद्यमिता (बारहवीं) मौखिक संदेश ( वाचिक संचार)

मौखिक का अर्थ है बोलकर या मुँह से। इसमें वार्तालाप मुँह के माध्यम से होता है। मौखिक संचार के कुछ प्रकार हैं—(i) आमने-सामने चर्चा से, (ii) टेलीफोन, इन्टरकॉम, मोबाइल फोन से, (iii) बैठकों, सम्मेलनों से, (iv) घोषणा ।

2. लिखित संचार (Written Communication)

लिखित संचार का अर्थ है सूचना को लिखित शब्दों में भेजना। ये कई प्रकार का होता है जिनमें से प्रमुख नीचे दिए गए हैं-

(i) अधोगामी संचार (Downward)- अर्थात् आदेश, परिपत्र नीतियाँ, प्रक्रियाएँ, मैनुअल, साहित्य, पत्रिकाएँ, पुस्तिकाएँ इत्यादि ।

(ii) ऊर्ध्वगामी संचार (ऊपर की ओर) अर्थात अवधी प्रगति का कार्य निष्पादन रिपोर्ट, इंकलाब अन्य।

संचार के लिखित तरीके (Written modes of Communication)

(क) पत्र (Letters) आमतौर पर कागज की कोटि, टंकण की कोटि, खुला खुला लिखना, हाशिया और यहाँ तक कि डिजाइन और छपे हुए पत्र शीर्ष का प्रकार इत्यादि चीजें उद्यम के बारे में संकेत देते हैं। अतः उद्यमी को उपर्युक्त प्रत्येक चीज की तरफ ध्यान देना चाहिए।

(ख) वार्षिक रिपोर्ट (Annual Reports) व्यापार की वार्षिक रिपोर्ट शेयर धारकों, क्रेताओं और व्यापार को बढ़ाने वालों को सूचना प्रदान करती है। राज्य की नीतियाँ व कार्य निष्पादन की जीवंत प्रस्तुति संगठन के विश्वास को बढ़ाती है।

(ग) ज्ञापन (Memorandum) अधिकांश कार्यालयों में निर्वाध परिचालित किए जाने वाले आंतरिक ज्ञापन रोजमर्रा के प्रशासन के हिस्से के रूप में सूचना और / या अनुदेश प्रदान करते हैं।

(घ) कार्यालयी प्रकाशन (Official Publication) उद्यम के बारे में बहुत सारी मूल पाठ या तालिका के रूप में प्राप्त की जाती है। ये प्रकाशन सूचना पत्रों या आवधिक पत्रिकाओं के रूप में होते हैं।

(ङ) टेलेक्स या फैक्स (Telex and Tax) — टेलेक्स संचार की ऐसी आधुनिक तरीकों में से एक है। जिसमें दूर-संचार का भी एक तत्व शामिल है। यह बहुत तेज है और पत्र का उत्तर भी लेने की व्यवस्था रखता है। टेलेक्स और फैक्स में जो ज्यादा महत्वपूर्ण बात है, यह है कि यह लिखित होता है।

(च) रिपोर्ट (Report)— रिपोर्ट बहुत महत्वपूर्ण एवं लिखित संचार होता है। जिनकी प्रकृति व उद्देश्यों के अनुसार व्यापारी अनेक तथ्य, विकल्प आदि प्रस्तुत करता है और अपने निष्कर्ष व सिफारिशें व्यक्त करता है। आमतौर पर रिपोर्टें (i) नित्यचर्चा की (ii) विशेष

(iii) साविधिक (iv) तकनीकी किस्म की होती है।

(छ) छीले पृष्ठ (Yellow Pages ) उद्यमी और उसके ग्राहकों के बीच संचार “पीले पृष्ठों” के माध्यम से बड़ा लोकप्रिय हो रहा है। आवश्यक विशिष्टियों वाली फर्मों को तलाशने का यह तरीका बहुत प्रभावी है। इन पृष्ठों में उत्पादों, सेवाओं, विशेषताओं संबंधी विवरण संपर्क, पतों और दूरभाष नंबरों सहित दिया जाने के कारण समस्या और संबंधित व्यक्ति को जल्द ही

साथ ला देते हैं। (ज) दृश्य श्रव्य सहायताएँ (Audio Visual Aids)—– संचार के कई दृश्य श्रव्य साधन उपलब्ध हैं। ये साधन प्रायः क्रेताओं और प्रोत्साहकों के साथ बाह्य संचार के लिए प्रयोग किए जाते हैं। इन दृश्य साथनों में टेलीविजन, फिल्में, स्लाइडें, ओवर हेड प्रोजेक्टर, कम्प्यूटर, समाचार-पत्र, डायरी इत्यादि शामिल होते हैं।

3. संकेतात्मक संचार (Gestural Communication)–

संकेत या पोस्टरों के प्रयोग से सूचना संप्रेषित करने के माध्यम को संकेतात्मक संचार कहा जाता है। यह साधन ज्यादा लोकप्रिय नहीं है और इसकी भूमिका सीमित सी है। कुछ चुनिंदा

5. निर्णय लेने की व्याख्या करें और उसमें आने वाले विभिन्न चरणों की व्याख्या करें। (Explain decision making and the various steps involved.)

Ans. निर्णय लेने का अर्थ है कि कई विकल्पों में से एक कार्रवाई को चुनना। यह योजना बनाने का बीज-कोष होता है। जब तक कोई निर्णय-संसाधनों की प्रतिबद्धता, निर्देश या पुनरावृति नहीं होती तब तक योजना का अस्तित्व नहीं कहा जा सकता। इसलिए कोई निर्णय लेने की प्रक्रिया में जिन-जिन चीजों पर विचार किया जाना चाहिए, वे हैं—

(i) होनहार हो (ii) विकल्प की पहचान करने वाला हो, (iii) प्राप्य लक्ष्य के मद्देनजर विकल्प का मूल्यांकन करने वाला हो और (iv) विकल्प का चयन करने वाला हो। इसे ही निर्णय लेना कहते हैं।

निर्णय लेने की मूल विधियों में आठ प्रक्रियाएँ होती हैं जो निम्नलिखित हैं- (i) समस्या को परिभाषित करना (Defining the problem) – जब कोई योजना हमारे आशय के अनुसार नहीं चलती तो समस्या पैदा होती है। समस्या उत्पन्न करने वाली वह मूल हीज जिसे सुधारने की आवश्यकता हो उसका पता लगाने के लिए समस्या को परिभाषित करना कभी भी सरल नहीं होता। फिर भी व्यक्ति को उसका पता तो लगाना ही होता है ताकि समस्या की जड़ का पता लग जाए।

(ii) स्थिति का विश्लेषण व पहचान करना (Analysing and identifying the situations) सबसे पहले तो आदमी को यह स्पष्ट पता होना चाहिए कि जिसके समाधान का प्रयत्न किया जा रहा है वह स्थिति है क्या। कभी-कभी यह मामला सरल होता है। उदाहरणार्थ स्टाफ में कोई पद खाली है और आप उसे स्टाफ के कई संभव अधीनस्थों में से एक को पदोन्नत करके भरना चाहते हो। आ

पको उनमें से एक को चुनने के लिए निर्णय लेना पड़ेगा। कभी-कभी कुछ स्थितियाँ शायद स्पष्ट न हो या आपके अधिकार क्षेत्र में कोई विभाग अच्छा काम न कर रहा हो। उसके सुधार हेतु निर्णय लेने से पूर्व आपको परिस्थितियों पर विचार करना पड़ेगा। यह पता लगाना पड़ेगा कि त्रुटि क्या है और हुई क्यों है?

(iii) सूचना एकत्रित करना (Collecting information) – जब समस्या की पहचान कर ली जाए और बता दी जाए तो अगला काम होता है तथ्य एकत्रित करना किसी कार्रवाई के लिए जितने ज्यादा तथ्य एकत्रित किए जाएँगे। उतना ही कम जोखिम उसमें शामिल होगा। तथ्यों के बिना निर्णय लेने का प्रयत्न करना ठीक वैसा ही होगा जैसा किसी चौराहे पर खड़े होकर सड़क चिह्नों को पढ़े बिना ही दिशाओं का

अनुमान लगाना। समस्या पर असर डालने वाले तथ्यों को एकत्रित करने पर सर्वदा यह आवश्यक नहीं होता कि उनपर अन्वेषण किया जाए। शायद बहुत सारे लोग यह समझते हैं कि तथ्य केवल सर्वेक्षण करके और सिद्ध करने पर ही पैदा होते हैं। वे शायद यह भूल जाते हैं कि तथ्य तो सर्वदा वही होते हैं। सर्वेक्षण उन्हें पैदा नहीं करता बल्कि उन्हें केवल स्पष्ट करता है।

(iv) विकल्प विकसित करना ( Developing Alternatives) – प्रत्येक परिस्थिति में जिसमें निर्णय लेने की आवश्यकता हो उसमें दो कार्रवाइयाँ होते हैं-उदाहरणार्थ- कारवाई करें या कार्रवाई न करें। उदाहरण के लिए किसी कार्यकारी अधिकारी की रिक्ति को भरने के लिए उसे- बिना भरे छोड़ा जा सकता है। बाहर से किराये पर लिया जा सकता है।

खुले कार्य की जानकारी न रखने वाले व्यक्ति को पदोन्नत करके भरा जा सकता है। किसी प्रकार का परीक्षण करके जिससे उस कार्य के लिए आवेदकों की योग्यताओं को ग्रेड देना संभव हो सके। स्वैच्छिकों की माँग करके भरा जा सकता है।

(v) विकल्पों की तुलना करना (Comaring Alternatives) कुछेक मामलों में कार्यकारी अधिकारी के पास सौभाग्य से एक ऐसा विकल्प भी होता है जो शायद 100% संतुष्टि प्रदान कर सके। आमतौर पर प्रत्येक विकल्प के कुछ लाभ व हानियाँ होती हैं। कोई विकल्प ऐसा होता है जिसमें बहुत ज्यादा खर्च या आदमियों की आवश्यकता होती है। जहाँ निर्णय लेने में कोई कठिनाई आ रही हो तो प्रत्येक विकल्प के लाभ और हानियाँ लिख लेना ही अच्छा होता है और उसके बाद उनकी तुलना की जा सकती है।

(vi) सर्वश्रेष्ठ विकल्प का चयन (Selection of best Alternatives)—–— विभिन्न विकल्पों का ध्यानपूर्वक विश्लेषण करने के बाद सर्वश्रेष्ठ विकल्प को छाँट लिया जाए। कभी-कभी विश्लेषण से कई विकल्प निकल आते हैं जिनके गुण मिलते-जुलते होते हैं। भविष्य की अनिश्चितताओं को ध्यान में रखते हुए एक से अधिक विकल्पों का चयन करना तर्कसंगत लगता है। उनमें से एक को स्वीकार कर लिया जाए तथा दूसरा आरक्षित कर लिया जाए।

(vii) सहायक योजना का प्रतिपादन (Formulation of Supporting Plans)- विकल्पों का पता लगाने उनका विश्लेषण करने और उनमें से सर्वश्रेष्ठ का चयन करने से संगठन की मुख्य योजना तैयार हो जाती है। इस मुख्य योजना को व्यावहारिक रूप देने के लिए कई सहायक योजनाओं की आवश्यकता होती है। उदाहरण के लिए यदि दिए गए चार विकल्पों में से दूसरा विकल्प सर्वश्रेष्ठ घोषित कर दिया जाए। तो उसे स्वीकारा जा सकता है।

(viii) योजना का कार्यान्वयन (Implementation of Plans) मुख्य और सहायक योजनाओं का निर्णय होने के बाद उन्हें लागू करना होता है। योजना लागू करने के बाद विभिन्न कार्यों का क्रम तय किया जाता है। दूसरे शब्दों में यह तय किया जाता है कि कौन करेगा और यह क्या करेगा और उसे कब करेगा। इससे संगठन के उद्देश्यों की प्राप्ति सरल हो जाती है।

6. प्रबन्ध की परिभाषा लिखें ।

Ans. प्रवन्ध की परिभाषा (Definition of Management ) – प्रबन्ध के विभिन्न लेखकों ने प्रबन्ध शब्द को भिन्न-भिन्न प्रकार से परिभाषित किया है। सम्बोधन के आधार पर प्रबन्ध की कुछ एक परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं-

(i) मेरी पार्कर फॉलैट्टज (Mary Parker Follet) के अनुसार, प्रबन्ध अन्य व्यक्तियों से काम लेने की कला है।”

(ii) फ्रैंड्रिक विन्सेला टेयलर (Frederick Winston Taylor) के अनुसार, प्रबन्ध

सर्वप्रथम यह ज्ञात करना कि आप व्यक्तियों से क्या (कार्य) करवाना चाहते हैं तथा पुनः यह निश्चित करना कि वे इसे किस प्रकार सस्ते एवं श्रेष्ठतम तरीके से करें।” 

(iii) पीटर एफ. ड्रक्कर (Peter F. Drucker) के अनुसार, प्रबन्ध एक बहुआयामी अंग है जो एक व्यवसाय प्रबन्धक, श्रमिकों एवं कार्य की व्यवस्ता करता है।” 

(iv) जॉर्ज आर. टैरी (George R. Terry) के अनुसार, “प्रबन्ध एक विशिष्ट प्रक्रिया है जिसके द्वारा नियोजन, संगठन, क्रिया-संचालन, कार्य नियंत्रण किया जाए तथा व्यक्तियों एवं साधनों द्वारा निर्धारित लक्ष्यों की पूर्ति को सुनिश्चित किया जाए।” 

(v) हैरोल्ड कूज (Haroald Kohz) के अनुसार, “व्यक्तियों के जरिये एवं उनके द्वारा औपचारिक वर्गों के रूप में, कार्य सम्पन्न करने की कला है।”

इन परिभाषाओं के अवलोकन के पश्चात्, प्रबन्ध को अन्यों द्वारा कार्य सम्पन्न कराने के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। अन्य शब्दों में, यह विभिन्न कार्यों के निष्पादन तथा नियोजन, संगठन, समन्वयन, नेतृत्व एवं व्यावसायिक परिचालनों को इस प्रकार सम्पन्न करने की प्रक्रिया है ताकि व्यावसायिक फर्म के उद्देश्यों को प्राप्त किया जा सके। इसके अन्तर्गत से सभी क्रियाएँ सम्मिलित है जो व्यावसायिक नियोजन से लेकर इसके वास्तविक संपादन तक व्यापक हो।

7. प्रबन्ध के क्षेत्रों का वर्णन करें। (Discuss the scope of management.)

Ans. प्रबन्ध के क्षेत्र को दो वर्गों में वर्गीकृत किया जा सकता है- (i) प्रबन्ध की विषय सामग्री (Subject Matter of Management ) – इसके अन्तर्गत

प्रबन्ध के विभिन्न कार्य आते हैं जैसे नियोजन, संगठन, कार्मिकता, निर्देशन एवं नियंत्रण जिनकी चर्चा पाठ में आगे की गई है।

(ii) प्रबन्ध का कार्यक्षेत्र (Functional Area of Management ) — इस पक्ष के अन्तर्गत, प्रबन्ध के अन्तर्गत निम्नांकित कार्य आते हैं-

(a) वित्तीय प्रबन्ध (Financial Management ) — इसमें व्यवसाय के वित्तीय पहलू सम्मिलित हैं जैसे लागत नियंत्रण, बजट नियंत्रण, प्रबन्धकीय लेखांकन आदि । 

(b) कार्मिक प्रबन्ध (Personnel Management ) — इसमें एक उद्यम के कार्मिकों के विभिन्न पक्ष सम्मिलित हैं जैसे भर्ती, प्रशिक्षण, पदोन्नति, पदोचित, पदमुक्ति, औद्योगिक सम्बन्ध, सामाजिक सुरक्षा, श्रम कल्याण आदि ।

(c) उत्पादन प्रबन्ध (Production Management ) — इसमें उत्पादन सम्बन्धी पहलू आते। हैं जैसे उत्पादन नियोजन, नियंत्रण, किस्म नियंत्रण आदि ।

(d) कार्यालय प्रबन्ध (Office Management )— इसमें कार्यालय रूपरेखा, कार्मिकता, यन्त्र रूपरेखा आदि।

(e) विपणन प्रबन्ध (Marketing Management )— व्यवसाय द्वारा उत्पादित उत्पाद के विपणन पक्षों से सम्बद्ध हो इसमें कीमत निर्धारण, वितरण प्रणालियाँ (Channels), विपणन अनुसंधान, विक्रय सम्वर्द्धन एवं विज्ञापन आदि आते हैं।

(1) रख-रखाव प्रबन्ध (Maintenance Management) इसका सम्बन्ध व्यवसाय की सम्पत्ति, प्लान्ट, मशीनरी एवं फर्नीचर के रख-रखाव एवं समुचित व्यवस्था से है।

8. प्रबन्ध के उद्देश्यों का उल्लेख करें। (Describe the objectives of Management)

Ans. (i) साधनों का उचित उपयोग (Proper Utilisation of Management)-

प्रबन्ध का मुख्य उद्देश्य व्यवसाय के विभिन्न साधनों का मितव्ययी ढंग से उपयोग करना है। व्यक्तियों, सामग्री, मशीनरी एवं मुद्रा के सही उपयोग द्वारा समुचित अर्जित लाभों के विभिन्न पक्षों को सन्तुष्ट करना प्रबन्ध का मुख्य उद्देश्य होता है। 

स्वामी प्रबन्ध से अधिक प्रत्याय की अपेक्षा करते हैं जबकि कर्मचारी, ग्राहक तथा जनता प्रबन्ध से अच्छे व्यवहार की आशा करते हैं। यह सभी हित तभी सन्तुष्ट होंगे जबकि व्यवसाय के भौतिक साधनों का सही उपयोग किया जाये।

(ii) सम्पादन सुधार ( Improving Performance ) प्रबन्ध का लक्ष्य उत्पादन के प्रत्येक घटक का सम्पादन सुधारना है। वातावरण इतना विशुद्ध होना चाहिये कि श्रमिक अपनी अधिकतम क्षमता समर्पित करें। उत्पादन घटकों का समुचित लक्ष्य निर्धारण द्वारा उनका सम्पादन सुधारा जा सकता है।

(iii) श्रेष्ठतम चातुर्य मंथन (Mobilizing Best Talent ) — प्रबन्ध को विभिन्न क्षेत्रों में व्यक्तियों को इस प्रकार लगाना चाहिए जिसमें श्रेष्ठतम परिणाम प्राप्त हो। विभिन्न क्षेत्रों में विशेषज्ञों की नियुक्ति उत्पादन घटकों की कुशलता बढ़ायेगी, इसके श्रेष्ठ वातावरण निर्माण करने की आवश्यकता है ताकि अच्छे लोगों को उद्यम विशेष से जुड़ने की प्रेरणा मिले। श्रेष्ठ वेतन, उचित सुविधाएँ, भावी विकास सम्भावनाएँ अधिक व्यक्तियों को व्यवसाय में जुड़ने को आकर्षित करेगा।

(iv) भविष्य हेतु नियोजन (Planning for Future) प्रबन्ध का महत्त्वपूर्ण उद्देश्य योजना तैयार करना है। किसी भी प्रबन्ध को वर्तमान कार्य से सन्तुष्ट नहीं होना चाहिए यदि वह कल की नहीं सोचता। भावी योजनाएँ यह तय करें कि आगे क्या करना है। भावी सम्पादन वर्तमान के नियोजन पर निर्भर करता है। अतः भविष्य के प्रति नियोजन किसी भी व्यावसायिक संस्था के लिए आवश्यक है।

9. प्रबन्धन में संचार के महत्त्व का वर्णन कीजिए ।

(Discuss the importance of communication in management.) 

Ans. प्रबंधन में संचार का महत्त्व (Importance of Communication in Management)—संचार संगठन के लिए वैसे ही महत्त्वपूर्ण है जैसे रक्त शरीर के लिए। समस्त प्रबन्धकीय कार्यों की सफलता प्रभावशाली संचार व्यवस्था पर निर्भर करती है। संचार के माध्यम से संगठन में चल रहे कार्यों की व्याख्या की जाती है, परिवर्तन प्रभावित किये जा सकते हैं, संगठन में कार्यरत समस्त लोगों में सहयोग की भावना जागृत कर विभिन्न कार्यों में एकता स्थापित की जा सकती है। 

विशुद्ध मानवीय सम्बन्ध स्थापित किये जा सकते हैं। उद्यम के कर्मचारियों में उद्यम का अंग होने की समान भावना उजागर की जा सकती है तथा अन्त में संगठन के उद्देश्यों की प्राप्ति की जा सकती है। संगठन में किसी भी स्तर पर कार्यरत व्यक्ति सम्प्रेषण के बिना अपने से ऊपर व नीचे व्यक्तियों के बीच सहयोग स्थापित किये बिना सफल नहीं हो सकता एवं न ही अपने लक्ष्यों को प्राप्त कर सकता है। आधुनिक काल में संगठन में कार्यशील प्रत्येक व्यक्ति के लिए संचार व्यवस्था आवश्यक है। 

संगठन में उच्च परानुक्रम के लोग अपना अधिक समय सम्प्रेषण में व्यय करते हैं, जबकि नीचे के लोग सम्प्रेषण में कम समय व्यतीत करते हैं। एक अध्ययन के अनुसार एक प्रबन्धक को समय का 40 से 60% समय संचार प्रक्रिया में लगाते हैं। निम्नांकित व्याख्या से संचार का महत्त्व समझा जा सकता है-

(i) निर्णयन का आधार (Basis of Decision Making) संचार के अभाव में उच्च प्रबन्ध के लिए निर्णय लेना सम्भव नहीं है। निर्णय लेने से पूर्व अनेक सम्बद्ध सूचना एकत्रित करके, उनसे अन्तिम स्वरूप उभर कर आता है। 

निर्णय सम्बन्धी सूचना केवल सम्प्रेषण द्वारा ही एकजित की जा सकती है। ऐसा ही नहीं कार्यान्वित भी सम्प्रेषण पर निर्भर करती है। संचार के बिना यह सुनिश्चित नहीं किया जा सकता कि क्या कहा गया है? क्या किया गया था? क्या किया जा रहा है? तथा था करना मताया है?

(ii) समन्वय का आधार (Basis of Co-ordination) व्यवसाय के आकार में विस्तार के साथ-साथ सम्प्रेषण का महत्त्व यड़ रहा है। यही इकाइयों, कार्य विभाजन तथा विशिष्टीकरण पर निर्भर हैं। बड़े उद्योग में समन्वय के कारण ही बिना अवरोध में कार्य सम्पन्न किये जाते हैं। सहयोग की प्राप्ति हेतु संगठन के प्रत्येक व्यक्ति के बीच उद्यम के उद्देश्यों के प्रति परस्पर सम्भव होना तथा यह जानना कि किन कार्यों द्वारा संगठन के उद्देश्य प्राप्त किये जा सकते हैं आवश्यक है। उन्हें कार्यों की सूचना बताई जानी चाहिए। यह केवल संचार द्वारा ही संभव है।

(iii) प्रबन्धकीय कुशलता में वृद्धि (Increases Managerial Efficiency) – प्रबन्धकीय फर्मों का नियमित एवं त्वरित निष्पादन, संचार व्यवस्था से सम्भव है। सम्प्रेषण द्वारा प्रबन्धक विभिन्न व्यक्तियों को प्रबन्ध के निश्चित उद्देश्यों की जानकारी देते हैं, निर्देश देते हैं, कार्य एवं दायित्व बाँटते हैं तथा अधीनस्थों के कार्यों पर नियंत्रण लागू करते हैं। अतः सम्प्रेषण के अभाव में प्रयत्यक केवल एक निष्क्रिय होकर रह जाता है तथा संचार की उपस्थिति में वह अपनी कार्यकुशलता बढ़ाता है।

(iv) प्रभावकारी नेतृत्व की स्थापना (Establishment of Effective Leadership)- एक सफल नेता के लिए, एक प्रबन्धक को सम्प्रेषण की कला की जानकारी होनी चाहिए। अन्य शब्दों में भावी संचार के बिना, कुशल नेतृत्व की कल्पना करना अनुपयोगी है। एक प्रबंधक संचार करता को सुधार कर कुशल मार्गदर्शक बन सकता है। एक अच्छी संचार व्यवस्था कर्मचारियों को

एक-दूसरे के निकट लाती है तथा उनके मतभेद दूर करती है। (v) औद्योगिक शान्ति की स्थापना (Promoting Industrial Peace) औद्योगिक शान्ति का अर्थ मधुर श्रम प्रबन्ध सम्बन्धों की स्थापना से है। प्रत्येक इकाई न्यूनतम लागत पर

अधिकतम लाभ कमाना चाहती है। यह तभी सम्भव है जब श्रम एवं प्रबन्ध के बीच सहयोग हो जिसके लिए मधुर वातावरण होना आवश्यक है। विशुद्ध वातावरण के लिए बि-मार्गीय सम्प्रेषण अनिवार्य है। नीचे की ओर सम्प्रेषण द्वारा प्रबन्धक अधीनस्थों को क्या कार्य करना है, बतलाता है। अधो-सम्प्रेषण द्वारा अधीनस्थ अपने सुझाव, प्रतिक्रियाएँ एवं शिकायतें प्रबन्ध तक पहुँचाता है। इस प्रकार दोनों पक्षों को अपने-अपने विचार प्रस्तुत करने का अवसर मिलता है। जिससे औद्योगिक शान्ति बढ़ती है।

(vi) प्रभावकारी नियंत्रण (Effective Control) नियंत्रण प्रक्रिया में सम्प्रेषण का विशेष महत्व है। संचार माध्यम द्वारा प्रबन्धकों को कार्य निष्पादन की जानकारी मिलती है जिसके आधार पर वे अनियमितताओं को समय रहते सुधार लेते हैं। प्राप्त सूचना द्वारा भावी योजनाओं में संशोधन किये जा सकते हैं।

(vii) संगठनात्मक छवि का आधार (Basis of Organisational Image) संचार का महत्त्व उद्यम के अन्दर ही महत्वपूर्ण नहीं है अपितु बाह्य जगत के लिए भी आवश्यक है। अनेक पक्षकार उद्यम की प्रगति में रुचि रखते हैं-अंशधारी, ऋणदाता, सरकार आदि जो संचार द्वारा प्रकट की जाती है। उद्यम अपनी छवि को अपनी प्रगति के बाह्य पक्षों को सूचना देकर सुधारता है। उद्यम समस्त मानवीय जाति को उनके हितों की रक्षा कम्पनी द्वारा सामाजिक दायित्वों के निर्वाहन द्वारा व्यक्त कर, उनका विश्वास प्राप्त किया जाता है। अतः संचार संगठन की प्रगति पर प्रकाश डालता है।

उपर्युक्त तथ्य स्पष्ट करते हैं कि एक व्यावसायिक उद्यम की सफलता हेतु संचार कुंजी है। जिस संस्था के कर्मचारी सम्प्रेषण की कला जानते हैं, उनके लिए सफलता स्वचालित है। इस सन्दर्भ में कहा जाता है कि अच्छी संचार व्यवस्था सशक्त प्रबन्धन की नींव है।

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