Elective Hindi Class 12 Chapter 1 Question Answer NCERT, Summary, जयशंकर प्रसाद

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मैं खुद 12वीं का टॉपर रहा हूं और मुझे पता है कि 12वीं की परीक्षा में किस तरह के प्रश्न पूछे जाते हैं। वर्तमान में, मैं एक शिक्षक की भूमिका भी निभा रहा हूँ, और अपने छात्रों को कक्षा 12वीं की महत्वपूर्ण जानकारी और विषयों का अभ्यास भी कराता हूँ। मैंने यह लेख 5 वर्षों से अधिक के अपने अनुभव के साथ लिखा है। इस पोस्ट की मदद से आप परीक्षा में इस अध्याय से भूगोल में बहुत अच्छे अंक प्राप्त कर सकेंगे।

Elective Hindi Class 12 Chapter 1 Question Answer NCERT, Summary, जयशंकर प्रसाद

कक्षा | Class12th 
अध्याय | Chapter01
अध्याय का नाम | Chapter Name(क) देवसेना का गीत
(ख) कार्नेलिया का गीत
कवि का नाम | Poet Nameजयशंकर प्रसाद
किताब | Bookअंतरा ऐच्छिक | Hindi Elective
खंड | Sectionकाव्य खंड | Poetry Section
अध्याय का नाम | Chapter Nameजयशंकर प्रसाद
बोर्ड | Boardसभी हिंदी बोर्ड
किताब | Book एनसीईआरटी | NCERT
विषय | Subjectहिंदी | HINDI
अध्ययन सामग्री | Study Materialsप्रश्न उत्तर | Question answer

जयशंकर प्रसाद का जीवन परिचय कक्षा 12 | jaishankar prasad ka jivan parichay

प्रश्न- जयशंकर प्रसाद का जीवन-परिचय देते हुए उनकी रचनाओं, भाषा-शैली तथा साहित्यिक विशेषताओं का उल्लेख कीजिए ।

उत्तर-जीवन-परिचय– जयशंकर प्रसाद का जन्म सन् 1889 ई. में वाराणसी के प्रसिद्ध सुँघनी साहू के परिवार में हुआ था। वहीं क्वींस कॉलेज में आठवीं कक्षा तक पढ़ाई करने के पश्चात् उन्होंने घर पर ही संस्कृत, हिंदी, फारसी तथा उर्दू का अध्ययन किया। पिता-माता और बड़े भाई के असामयिक निधन के बाद युवावस्था में ही उनकी पत्नी भी चल बसीं। सांसारिक नश्वरता. एवं चिरवेदना का यही प्रभाव उनकी रचनाओं में भी प्रतिविम्बित हुआ। सन् 1937 ई. में उनका देहावसान हो गया।

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image credit: Pinterest

रचनाएँ—ऐसी विषम पारिवारिक स्थितियों में प्रसाद जी ने जितना लिखा है और जिस स्तर का लिखा है, उसे देखकर आश्चर्य होता है। प्रसाद ने काव्य के क्षेत्र में झरना, आँसू, लहर और कामायनी जैसी कृतियाँ दी हैं। कामायनी आधुनिक युग के हिंदी साहित्य का सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ (महाकाव्य) है। नाटक के क्षेत्र में प्रसाद जी चंद्रगुप्त, स्कंदगुप्त, अजातशत्रु व ध्रुवस्वामिनी जैसी अमर रचनाएँ प्रदान की हैं। 

एकांकी के क्षेत्र में उनका ‘एक घूँट’ हिंदी का प्रथम एकांकी माना जाता है। उपन्यास के क्षेत्र में तितली, कंकाल व इरावती (अधूरा) उनकी प्रतिभा के परिचायक हूँ। आकाशदीप, आँधी और इंद्रजाल उनके प्रमुख कहानी संग्रह हैं। रचना की दृष्टि से प्रसाद जी का क्षेत्र बहुविध आयाम वाला है। हिंदी व संस्कृत के साहित्य में कालिदास के बाद प्रसाद जी के समान बहुमुखी प्रतिभा संपन्न साहित्यकार नहीं हुआ है।

भाषा-शैली–प्रसाद जी के काव्य में खड़ी बोली हिंदी का परिष्कृत रूप दृष्टिगत होता है। इनकी प्रारंभिक रचनाओं की भाषा सहज एवं कोमलकांत पदावली से युक्त है। परवर्ती काव्य की भाषा में तत्सम शब्दों की प्रधानता है। प्रसाद जी के काव्य में लक्षणा एवं व्यंजना शब्द-शक्ति का पर्याप्त प्रयोग हुआ है। ध्वन्यात्मकता संगीतात्मकता एवं चित्रात्मकता इनकी रचनाओं का सहज गुण है। प्रतीक योजना, विम्ब विधान एवं अलंकारों का सुंदर प्रयोग प्रसाद जी के काव्य को उत्कृष्ट बना देता है।

साहित्यिक विशेषताएँ–प्रसाद छायावादी काव्य के उन्नायकों में से प्रथम हैं। उनको अधिकांश आलोचक छापाबाद का जनक मानते हैं द्विवेदी युग की इतिवृत्तात्मकता के विरुद्ध नकों के इस विरोध का बिगुल सर्वप्रथम प्रसाद जी ने ही बजाया था। 

वे छायावाद की परित्या करते हुए कहते हैं—“पौराणिक युग की किसी घटना अथवा देश-विदेश की किसी सुदरी के बाह्य वर्णन से भिन्न वेदना के आधार पर जब स्वानुभूतिमयी अभिव्यक्ति होने लगी, तब हिंदी में उसे छायावाद के नाम से अभिहित किया गया।” स्पष्ट है कि प्रसाद स्वानुभूतिमयी व्यक्त कर रहे थे।

प्रसाद जी के काव्य में छायावादी कविता की अतिशय काल्पनिकता, सौंदर्य का सूक्ष्म चित्रण, देश-प्रेम युक्त राष्ट्रीय भावना, प्रकृति का आलम्बनवत वर्णन, लाक्षणिकता, मानवीकरण नारी सौंदर्य का आंतरिक वर्णन जैसी प्रवृत्ति प्रमुखता से मिलती है। प्रसाद जी वर्णनीय विषय की गहराई को समझते हुए उसका व्यापक वर्णन करने की क्षमता रखते हैं। मानव हृदय का सूक्ष्म भावनाओं की अभिव्यक्ति की क्षमता है। 

प्रसाद जी भारत के गौरवशाली अतीत के गायक है उनके साहित्य में भारतीय संस्कृति का मुखर चित्रण है। इस दृष्टि से ये कालिदास व तुलसीदास ी परंपरा में आते हैं। उनका साहित्य शक्ति व पौरुष का गायक है। इस काव्य में मानव-प्रेम देश-प्रेम की उमंग है, वलिदान की भावना है, समर्पण का भाव है, करुणा का पारावार है और सौंदर्य के अनोखे बिम्ब हैं। तया

अलंकार—‘आशा आह’’, ‘हारी होड़’, ‘पंख पसारे’, ‘समीर सहारे’, ‘नीड़ निज’ – अनुप्रास । ‘लघु सुरधनु से पंख पसारे’–उपमा । “चढ़कर मेरे जीवन रथ पर-रूपक। 

विंव-योजना– हेम कुंभ ले ऊषा सवेरे भरती दुलकाती सुख मेरे ।  मंदिर ऊँपते रहते जब जगकर रजनी भर तारा। 

चित्रात्मकता – लघु सुरधनु से पंख पसारे शीतल मलय समीर सहारे । उड़ते खग जिस ओर मुँह किए समझ नीड़ निज प्यारा ।

देवसेना का गीत कविता का सारांश | Summary of Devasena’s Geet Kavita

Hindi Class 12 Chapter 1 Question Answer

देवसेना का गीत रचनाकार श्री प्रसाद द्वारा रचित स्कंदगुप्त नाटक का एक चर्चित अंश है। मालवा के राजा बंधुवर्मा की बहन का नाम देवसेना रखा गया है। प्रस्तुत अंश का संबंध हूणों के आक्रमण से उत्पन्न संकट से है जिसमें बंधुवर्मा सहित उस परिवार के सभी लोगों को वीरगति प्राप्त हुई। बची हुई देवसेना भाई के स्वप्नों को साकार करने का और राष्ट्रसेवा का व्रत लिए हुए थी। 

जीवन में देवसेना को स्कंदगुप्त की चाह थी, किंतु स्कंदगुप्त मालवा के धनकुबेर की कन्या (विजया) का स्वप्न देखते थे। जीवन के अंतिम मोड़ पर स्कंदगुप्त देवसेना को पाना चाहता है। किंतु देवसेना तब तक वृद्ध पर्णदत्त के साथ आश्रम में गाना गाकर भीख माँगती है और महादेवी की समाधि परिष्कृत करती है। स्कंदगुप्त के अनुनय-विनय पर जब वह तैयार नहीं होती, तो स्कंदगुप्त आजीवन कुँवारा रहने का व्रत ले लेता है। 

इधर देवसेना कहती है – ” ह्रदय की कोमल कल्पना सो जा। जीवन में जिसकी संभावना नहीं, जिसे द्वार पर आए हुए लौटा दिया था, उसके लिए पुकार मचाना क्या तेरे लिए अच्छी बात है ? आज जीवन के भावी सुख, आशा और आकांक्षा सबसे मैं विदा लेती हूँ”, तब वह गीत गाती है-आह । वेदना मिली विदाई !

देवसेना का गीत कविता में देवसेना अपने जीवन पर दृष्टिपात करते हुए अपने अनुभवों में अर्जित वेदनामय क्षर्णों को याद कर रही है। जीवन के इस मोड़ पर अर्थात् जीवन संध्या की बेला में वह अपने यौवन के क्रियाकलापों को याद कर रही है। वह अपने यौवन के क्रियाकलापों को भ्रमवश किए गए कर्मों की श्रेणी में ही रख रही हैं और पश्चात्तापस्वरूप उसकी आँखों से आँसू की अजस्र धारा वहती जा रही है। 

अपने आसपास उसे सबकी प्यासी निगाहें ही दिखाई पड़ती हैं और वह स्वयं को इनसे बचाने की कोशिश करती है। फिर भी जो उसके जीवन की पूँजी है, सारी कमाई है, वह उसे बचा नहीं सकी, यही विडंबना है, यही वेदना है। प्रलय स्वयं देवसेना के जीवनरथ पर सवार है। वह अपनी द्रुतमान दुर्बलताओं और हारने की निश्चितता के बावजूद प्रलय से लोहा ले रही है। गीत के शिल्प में रची गई यह कविता वेदना के क्षणों में मनुष्य और प्रकृति के संबंधों को भी व्यक्त करती चलती है। इसमें देवसेना की मनोकथा का अत्यंत हृदयग्राही चित्रण हुआ है।

कार्नेलिया का गीत कविता का सारांश | Summary Of The Poem The Song Of Cornelia

कार्नेलिया का गीत प्रसाद के चंद्रगुप्त नाटक का एक प्रसिद्ध गीत है। कार्नेलिया सिकंदर के सेनापति सेल्यूकस की बेटी है। सिंधु के किनारे ग्रीक शिविर के पास वृक्ष के नीचे बैठी हुई है। कहती है-“सिंधु का यह मनोहर तट जैसे मेरी आँखों के सामने एक नया चित्रपट उपस्थित कर रहा है। इस वातावरण से धीरे-धीरे उठती हुई प्रशांत स्निग्धता जैसे हृदय में प्रवेश कर रही है। लंबी यात्रा करके जैसे मैं वहीं पहुँच गई हूँ जहाँ के लिए चल थी। वह कितना निसर्ग सुंदर है, कितना रमणीय है? हाँ वह ! आज वह भारतीय संगीत का पाठ देखें भूल तो नहीं गई ?” तब वह यह गीत गाती है-‘अरुण यह मधुमय देश हमारा !’ 

इस गीत में हमारे देश की गौरवगाथा तथा प्राकृतिक सौन्दर्य को भारतवर्ष की विशिष्टता और पहचान के रूप में प्रस्तुत किया गया। है। पक्षी भी अपने प्यारे घोसले की कल्पना कर जिस ओर उड़ते हैं, वही यह प्यारा भारतवर्ष हैं। अनजान को भी सहारा देना और लहरों को भी किनारा देना हमारे देश की विशेषता है, सही मायने में भारत देश की यही पहचान है। यहाँ के लोगों के हृदय में करुणा की असीम भावना है, इसका चित्रण भी इस कविता में हुआ है।

class 12th NotesMCQ
HistoryPolitical Science
EnglishHindi

देवसेना का गीत सप्रसंग व्याख्या एवं शब्दार्थ | देवसेना का गीत सप्रसंग व्याख्या Ncert

1.आह! वेदना मिली विदाई।

मैंने भ्रमवश जीवन संचित,

मधुकरियों की भीख लुटाई ।

छलछल थे संध्या के श्रमकण, 

आँसू-से गिरते थे प्रतिक्षण |

मेरी यात्रा पर लेती थी- 

नीरवता अनंत अँगड़ाई !

शब्दार्थ : संचित —– एकत्रित । मधुकरियों – भिक्षा। नीरवता — खामोशी। अनंत — अंतहीन, न रुकने वाली श्रमकण- श्रम करने से उत्पन्न पसीना ।

प्रसंग – वेदना और विदाई के अनुभवों के शब्दों में ढालने वाली प्रस्तुत पंक्तियाँ देवसेना की व्यथा को सूचित करती है। दी गई पंक्तियाँ ‘देवसेना का गीत’ शीर्षक कविता का एक अंश है। इन पंक्तियों के रचनाकार श्री जयशंकर प्रसाद जी हैं जो इसे स्वरचित नाटक स्कन्दगुप्त में जगह दिये हैं।

में आज में जीवन के भावी सुख, आशा और आकांक्षा से वेदनापूर्ण विदाई लेती हूँ। मैंने भ्रम व्याख्या— रचनाकार का मानना है कि देवसेना कहती है कि जीवन की इस संध्या-बेला में पड़कर जीवन भर स्कंदगुप्त से प्रेम किया और सारी एकत्रित की हुई अभिलाषा रूपी भिक्षा है दिया अर्थात् अपने जीवन भर की आकांक्षाओं की पूंजी को मैं बचा न सकी । 

रूपी यात्रा करते हुए संध्या बेला के समय अर्थात् अंतिम पड़ाव पर श्रम करने से पसीने की बूंदे आंसू की तरह हर क्षण गिरती है। मेरी यात्रा पर खामोशी अंतहीन प्राप्त न हो सका और उसे आँसुओं के अतिरिक्त कुछ नहीं मिला। उसका पूरा जीवन संघर्ष भाव यह है कि देवसेना जीवन भर जिस सुख की कामना करती वह उसे व्यतीत हुआ और वह चुपचाप उस वेदना को सहन किए जा रही थी।

सौन्दर्य-बोध– इन पंक्तियों में देवसेना के जीवन-संघर्ष और उसकी मनोव्यथा का भावपूर्ण चित्रण हुआ है। भाषा विषयनुकूल गंभीर एवं परिष्कृत है। ‘आँसू-से गिरते थे प्रति क्षण’ में उपना अलंकार है। 

‘छलछल में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है। ‘मेरी यात्रा पर लेती थी नीरवता अनंत अँगड़ाई में नीरवता का मानवीकरण किया गया है। भाषा में चित्रात्मकता का गुण विद्यमान है। 

2. श्रमित स्वप्न की मधुमाया में,

गहन विपिन की तरु-छाया में,

पथिक उनींदी श्रुति में किसने-

यह विहाग की तान उठाई।

लगी सतृष्ण दीठ थी सबकी, 

रही बचाए फिरती कबकी।

मेरी आशा आह ! बावली, 

तूने खो दी सकल कमाई ।

शब्दार्थ : श्रमित—परिश्रम करके थका हुआ। विपिन — जंगल, वन। उनींदी— नींद से भरी हुई। श्रुति-सुनने की क्रिया। विहाग अर्धरात्रि में गाया जाने वाला राग। सतृष्ण— तृष्णा के साथ। दीठ — दृष्टि । सकल- संपूर्ण ।

प्रसंग —— प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘अंतरा’ (भाग-2) में संकलित कविता ‘देवसेना का गीत’ से उद्धृत है। इसके रचयिता सुप्रसिद्ध छायावादी कवि जयशंकर प्रसाद हैं। यह कविता उनके नाटक ‘स्कंदगुप्त’ से ली गई है। अपने जीवन की संध्या बेला में देवसेना गाना गाकर भीख माँगती हुई समय गुजारती है। अपने विगत स्कंदगुप्त का प्रेम पाने में वह असफल रही थी। अब कामनाओं से विदा लेती हुई समय को याद करती है।

व्याख्या— देवसेना कहती है कि परिश्रम से थके हुए सपने के मधुर आकर्षणयुक्त सम्मोहन में घने वन के बीच पेड़ की छाया में विश्राम करते हुए यात्री की नींद से भरी हुई सुनने की अलसायी क्रिया में यह किसने राग बिहाग की स्वरलहरी छेड़ दी है ?

भाव यह है कि जीवन भर संघर्षरत रहती हुई देवसेना सुख की आकांक्षा लिए मीठे सपने देखती रही। जब उसके स्वप्न पूरे न हो सके, तो वह थककर निराश होकर सुख की आकांक्षा से विदाई लेती हुई उसे मुक्त हो जाना चाहती है। ऐसी स्थिति में भी करुण भरे गीत की तरह वियोग का दुख उसके हृदय को कचोट रहा है।

देवसेना कहती है कि युवावस्था में तो उसकी तृष्णा भरी अर्थात् प्यासी नजरें मेरे ऊपर लगी रहती थीं, मैं स्वयं को उनसे बचाती फिरती रहती थी। परंतु ऐ मेरी आशा ! पगली, तूने मेरी सारी कमाई हुई पूँजी ही खो दी। देवसेना के कहने का तात्पर्य यह है कि जब अपने आसपास उसे सबकी प्यासी नजरें दिखाई देती थीं, तब वह सकंदगुप्त के प्रेम में पड़ी हुई स्वयं को उनसे बचाने की कोशिश करती रही। परंतु अपनी पागल आशा के कारण वह अपने जीवन की पूँजी, अपनी सारी कमाई को बचा न सकी। अर्थात् उसे अपने प्रेम के बदले प्रेम और सुख नहीं मिल सका। 

सौन्दर्यबोध- इन पंक्तियों में देवसेना की वेदना और उसके अंतर्द्वद्वों का भावपूर्ण चि किया गया है। भाषा में गंभीरता और प्रवाहमता है। ‘श्रमित स्वप्न’ और ‘आशा आह’ में अनुप्रास अलंकार की छटा है। ‘स्वप्न’ का मानवीकरण किया गया है। भाषा में चित्रात्मकता का गुण विद्यमान है। पंक्तियों में संगीतात्मकता है।

3. चढ़कर मेरे जीवन – रथ पर, 

प्रलय चल रहा अपने पथ पर । 

मैंने निज दुर्बल पद-बल पर, 

उससे हारी-होड़ लगाई।

लौटा लो यह अपनी थाती 

मेरी करुणा हा-हा खाती विश्व ! 

न सँभलेगी यह मुझसे

इससे मन की लाज गँवाई ।

शब्दार्थ प्रलय-नाश, विलीनता, लय। पथरास्ता। निज-अपना दुर्बल कमजोर। घाती-धरोहर, अमानत । 

प्रसंग प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘अंतरा’ (भाग-2) में संकलित देवसेना का गीत’ नामक पाठ से लिया गया है। यह पाठ ‘स्कंदगुप्त’ नाटक से उद्धृत है। इसके रचयिता प्रख्यात छायावादी कवि जयंशकर प्रसाद हैं।

वाकी राजकुमारी देवसेना राजा स्कंदगुप्त से प्रेम करती थी, परंतु कंदगुप्त धनकुबेर की कन्या विजया को चाहता था। हूणों के आक्रमण में दवसेना का सारा परिवार मारा गया। देवसेना गाना गाकर भीख माँगने लग गई। उसके जीवन की संध्या बेला आ गई। वह अपने विगत समय को याद करती हुई अपनी वेदना को प्रकट करती है। 

व्याख्या– देवसेना कहती है कि मेरे जीवन रूपी रथ पर सवार होकर प्रलय अपने रास्ते

पर चला जा रहा है। मैंने अपने दुर्बल पैरों के बल पर उस प्रलय से ऐसी प्रतिस्पर्धा कर रही हूँ, मेरी हार सुनिश्चित है। “देवसेना कहती है कि ऐ संसार ! तुम यह अपनी धरोहर वापस ले लो। मेरी करुणा हाहाकार कर रही है। यह मुझझे सँभल नहीं पाएगी। 

इसी के कारण मैंने अपने मन की लज्जा को गँवाया है। भाव यह है कि यह देवसेना जीवन के संघर्ष से निराश हो चुकी है। प्रलय स्वयं देवसेना के जीवन-रथ पर सवार है। अब तो वह अपनी दुर्बलताओं और हारने की निश्चितता के बावजूद प्रलय से लोहा लेती रही है। उसका पूरा जीवन ही दुखमय रहा है। वह करुणापूर्ण स्वर में कहती है कि अंतिम समय में हृदय की वेदना अब उससे सँभल नहीं पाएगी। इसी के कारण उसे मन की लाज गँवानी पड़ी है। 

सौन्दर्य-बोध– इन पंक्तियों में देवसेना की मानसिक व्यथा का अत्यंत भावपूर्ण चित्रण हुआ है। भाषा में सरसता, गंभीरता एवं प्रवाहमयता है। ‘जीवन-रथ’ में रूपक अलंकार है। ‘पथ पर’, ‘हारी-होड़’ और ‘लीटा लो’ में अनुप्रास अलंकार है। ‘प्रलय चल रहा अपने पथ पर’ – में ‘प्रलय’ का मनवीकरण किया गया है। काव्यांश में संगीतात्मकता है। पंक्तियों में चित्रका का गुण है।

कार्नेलिया का गीत सप्रसंग व्याख्या एवं शब्दार्थ | कार्नेलिया का गीत सप्रसंग व्याख्या Ncert

1. अरुण यह मधुमय देश हमारा ! 

जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा।

सरस तामरस गर्भ विभा पर नाच रही तरुशिखा मनोहर ।

छिटका जीवन हरियाली पर-मंगल कुंकुम सारा ! 

लघु सुरधनु से पंख पसारे शीतल मलय समीर सहारे।

उड़ते खग जिस ओर मुँह किए समझ नीड़ निज प्यारा।

शब्दार्थ : अरुण–लालिमा युक्त, सुर्ख । मधुमय — मिठास से भरा हुआ। क्षितिज—–जहाँ पाती और आकाश एक साथ मिले हुए दिखाई देते हैं। तामरस-कमल, ताँबा, रक्तोत्पल। कांत, किरण, शोभा मनोहर मन को हर लेने वाली, सुंदर मलय दक्षिण भारत का इंद्रधनुष । जिस पर चंदन के वृक्षों की बहुलता है। खगपती नोड़-घोसला सुरधनु-‘कालिया का गीत’ से उद्धृत है। यह कविता जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित है एवं उनके प्रसिद्ध प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘अंतरा’ (भाग-2) में संकलित कविता नाटक ‘चंद्रगुप्त’ से ली गई है।

सिकंदर के सेनापति सेल्यूकस की पुत्री कार्नेलिया सिंधु के किनारे ग्रीक शिविर के पास वृ के नीचे बैठी हुई भारत के अनुपम सौन्दर्य को देखकर अभिभूत हो जाती है। उस समय भारत के प्राकृतिक सौन्दर्य और गौरवगाथा का वर्णन इस गीत के माध्यम से करती है। 

व्याख्या—यह हमारा देश लालिमा से युक्त और मिठास से परिपूर्ण है। जहाँ पहुँचने पर अपरिचित क्षितिज को भी एक सहारा मिल जाता है। अर्थात् भारतवर्ष में ऐसे अनजान लोग को भी आश्रय मिलता है, जो यहाँ से बाहर के किसी अन्य स्थान से आये हुए होते हैं।

भारत के प्राकृतिक सौन्दर्य का अवलोकन करते हुए कार्नेलिया कहती है कि रस से परिपूर्ण कमलनाल की कांति पर पेड़ की सुंदर चोटी नाच रही है। धरती की हरियाली पर सम्पूर्ण मंगलकारी केसर के रूप में जीवन बिखरा हुआ है। भाव यह है कि सिंधु नदी के जल में कमलनाल की चमकती परछाई पर पेड़ों की चोटियों

की छाया लहरों के साथ नाचती हुई अत्यंत सुंदर लग रही है। पौधों की हरियाली के ऊपर बिखरी हुई केसर मंगलमय जीवन का संदेश दे रही है।

छोटे-छोटे इंद्रधनुषों के समान पंख फैलाए हुए पक्षी मलय पर्वत से आती हुई शीतल हवा के सहारे अपने प्यारे घोंसलों की कल्पना करते हुए जिस ओर उड़ रहे हैं, वह हमारा प्यारा भारतवर्ष है। अर्थात् हमारे देश में निवास करना पशु-पक्षियों तक को भी अत्यधिक प्यारा लगता है।

सौन्दर्य-बोध– इन पंक्तियों में भारतवर्ष के प्राकृतिक सौन्दर्य व गौरवगाथा का अत्यंत आकर्षक चित्रण किया गया है। पंक्तियों में भाषा का गंभीर, आकर्षक एवं प्रवाहमयी रूप प्रयुक्त हुआ है। ‘पंख पसारे’, ‘समीर सहारे’ और ‘नीड़ निज’ में अनुप्रास अलंकार की छटा है। ‘लघु सुरधनु से पंख पसारे पें उपमा अलंकार है। आकर्षक प्राकृतिक दृश्य साकार हो उठने के कारण चित्रात्मकता का गुण दर्शनीय है। पंक्तियों में संगीतात्मकता का गुण है। क्षितिज’ का प्रतीकात्मक प्रयोग हुआ है।

2. बरसाती आँखों को बादल बनते जहाँ भरे करुणा जल । 

लहरें टकराती अनंत की पाकर जहाँ किनारा। 

हेम कुंभ ले ऊषा सवेरे भरती दुककाती सुख मेरे ।

मंदिर ऊँघते रहते जब जगकर रजनी भर तारा । 

शब्दार्थ : करुणा—दया, रहम। अनंत- जिसका अंत न हो, असीम। हेम-सोना । कुंभ- घड़ा मंदिर मस्ती पैदा करने वाला। रजनी-रात ।

प्रसंग — प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘अंतरा’ (भाग-2) में संकलित एवं जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित कविता ‘कार्नेलिया का गीत’ से ली गई हैं। यह कविता प्रसाद जी के नाटक ‘चंद्रगुप्त’ से उद्धृत है। सिंकदर के सेनापति सिल्यूकस की पुत्री कार्नेलिया सिंधु नदी के किनारे ग्रीक शिविर के पास वृक्ष के नीचे बैठी भारत के अनुपम सौन्दर्य को निहार रही है। वह भारतवर्ष की महान परंपराओं व प्राकृतिक सुंदरता का वर्णन करती हुई ये बातें कहती हैं।

व्याख्या– जिस स्थान पर लोगों की बरसती हुई आँखों के अश्रु जल से भरे हुए बादल बन जाते हैं और जहाँ अनंत की दूरी से आती हुई लहरें भी किनारा पाकर टकराने लगती हैं, यहाँ वही प्यारा भारतवर्ष है। तात्पर्य यह है कि भारत देश के लोगों की आँखों में असीम करुणा की भावना होती है। किसी को भी दुखी देखकर वे सहानुभूति से भरकर उसकी सहायता करते हैं। जिन्हें कहीं भी आश्रय नहीं मिलता, उन लहरों के समान भटकते लोगों का भी किनारा देना हमारे देश की विशेषता है।

कार्नेलिया कहती है कि जब रात भर जागने के बाद तारे मस्ती में ऊँघते रहते हैं, तब सुबह के समय ऊषा सोने का घड़ा लेकर मेरे सुखों को भरती और दुलकाती है। अर्थात् जब रात बीत जाने के बाद सुबह की सुनहरी किरणें धरती पर छाने लगती हैं, तब उसे सुखद अनुभूति होने लगती है। कुछ क्षण बाद वह अनुभूति समाप्त भी हो जाती है।

सौन्दर्य-बोध इन पंक्तियों में भारतीय संस्कृति में करुणा की महत्ता और बेसहारों के • देने की भावना का गौरवपूर्ण चित्रण किया गया है। अत्यंत सरस, सहज एवं प्रवाहमयी भाषा का प्रायोग हुआ है। ‘बादल बनते’ तथा ‘जब जाकर में अनुप्रास अलंकार की छटा दर्शनीय सहारा है। ऊँचते हुए तारों के बीच ऊषा को सोने का घड़ा लेकर उसमें सुख को भरते और दुलकाते हुए दिखाकर कवि ने अत्यंत आकर्षक विंद का सृजन किया है। आँसुओं के बादल बनने का चित्र साकार हो उठने के कारण काव्यांश में चित्रात्मकता का गुण विद्यमान है। पंक्तियों में संगीतात्मकता है। प्रकृति का मानवीकरण किया गया है।

देवसेना का गीत के प्रश्न उत्तर | Hindi Class 12 Chapter 1 Question Answer

प्रश्न 1. मैंने भ्रमवश जीवन संचित, मधुकरियों की भीख जुदाई”पंक्ति का भाव सष्ट कीजिए। 

उत्तर- मालवा की राजकुमारी विजया को चाहने वाला स्कन्दगुप्त देवसेना की आकांक्षाओं का केन्द्र था। जीवन की संध्या बेला में देवसेना भावी सुख की आशा छोड़ बैठी और सम्पूर्ण जीवन-संघर्ष में उसे मात्र आँसू ही नसीब हुए थे। अंत में वह मिक्षाटन करने को मजबूर हो गई। वेदना की इसी बेला में देवसेना को अपने भ्रम का आभास होता है और वह मान है कि उसने भ्रमवश जीवन संचित मधुकरियों की भीख लुटाई है।”

प्रश्न 2. कवि ने ‘आशा’ को बावली क्यों कहा है?

उत्तर— (i) कवि ने आशा को बावली इसलिए कहा है, क्योंकि वह जीवन के यथार्थ को न समझते हुए भ्रम में पड़ी रहती है। (ii) देवसेना नियति से हार स्वीकार कर चुकी है। (iii) इस विषम परिस्थिति में भी आशा उसके मन में नई आकांक्षा जगा रही है, जिसकी पूर्ति असंभव है। 

प्रश्न 3. “मैंने निज दुर्बल होड़ लगाई” इन पंक्तियों में ‘दुर्बल पद बल’ और ‘हारी होड़ में’ निहित व्यंजना स्पष्ट कीजिए ।

उत्तर— (i) ‘दुर्बल पद बल’ में निहित व्यंजना—देवसेना जीवन भर संघर्ष करती रही है। निरंतर जीवन की विषमताओं का सामना करती हुई थक चुकी है। उसके पैरों में इतनी शक्ति नहीं रह गई है कि वह जीवन रूपी यात्रा में नियति से प्रतिस्पर्धा करते हुए आगे बढ़ सके। यहाँ दुर्बल पैरों के बल पर प्रलय की गति से होड़ करने की बात कहकर यह व्यंजना की ई है कि देवसेना के पैरों में तो बल शेष रहा नहीं, फिर भी उन पैरों की दुर्बल शक्ति के सहारे आगे बढ़ रही है। अर्थात् वह विषम परिस्थितियों में भी निराश नहीं है और जीवन संघर्ष में लगी हुई है।

(ii) ‘हारी होड़ में निहित व्यंजना देवसेना उसके जीवन रथ पर चढ़ कर चल रहे प्रलय सेहरी होड़ लगाए हुए है। इसमें यह व्यंजना निहित है कि देवसेना नियति से एक ऐसी प्रतिस्पर्ध कर रही है, जिसमें उसकी हार सुनिश्चित है।

प्रश्न 4. काव्य-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए- 

(क) श्रमित स्वप्न की मधुमाया में, गहन विपिन की तरु-छाया में, पथिक उनींदी श्रुति में किसने- यह विहाग की तान उठाई।

उत्तर- काव्य-सौन्दर्य 

(i) इन पंक्तियों में देवसेना के कठिन जीवन-संघर्ष एवं उससे उत्पन्न निराशा के भाव को दर्शाया गया है।

(ii) यहाँ यह दिखाया गया है कि देवसेना के सपने परिश्रम से थक चुके हैं। 

(iii) उसकी दशा ऐसी हो चुकी है, जैसे कोई थका हुआ मुसाफिर घने जंगल में पेड़ के नीचे नींद में डूबने लग जाए।

(iv) इस प्रकार यहाँ देवसेना की आकांक्षा के पूर्ण न होने की विवशता का अत्यंत भावपूर्ण चित्रण किया गया है। 

(v) जीवन की संख्या बेला में असीम वेदना और निराशा के बीच पुनः सुख की आकाला के जग उठने को राग विहाग की तान के रूप में दर्शाकर कवि ने सुंदर व्यंजना की है। 

शिल्प-सौन्दर्य— (i) सरल, सरस एवं प्रवाहपूर्ण भाषा का प्रयोग है।

(ii) विषय की गंभीरता के अनुरूप तत्सम शब्दों का भी प्रयोग हुआ है।

(iii) ‘श्रमित स्वप्न’ में अनुप्रास अलंकार की छटा है।

(iv) ‘स्वप्न’ को थका हुआ दर्शाकर उसका मानवीकरण किया गया है।

(v) ‘विहाग की तान’ को आकांक्षा के प्रतीक के रूप में चित्रित किया गया है।

(vi) पंक्तियों में चित्रात्मकता का गुण विद्यमान है।

(vii) संगीतात्मक पदावली का प्रयोग हुआ है।

(ख).लौटा लो यह अपनी थाती मेरी करुणा हा-हा खाती विश्व ! न संभलेगी यह मुझसे इससे मन की लाज गँवाई ।

उत्तर-काव्य-र शब्दों में व्यक्त किया गया है।

सौन्दर्य -(i) इन पंक्तियों में देवसेना के हृदय की व्यथा को अत्यंत मार्मिक वेदना को उससे

(ii) देवसेना संसार से अनुरोध करती है कि वह अब तो अपनी दी हुई वापस ले ले।

(iii) यहाँ यह दर्शाया गया है कि देवसेना जीवन-संघर्ष से थक चुकी है। उसकी अवस्था अत्यधिक कलापूर्ण हो चुकी है। 

(iv) वह अपनी व्यथा को सहन करने में असमर्थ है।

(v) यहाँ कवि ने देवसेना की मनोदशा का अत्यंत भावपूर्ण चित्रण किया है। 

शिल्प-सौन्दर्य – (i) इन पंक्तियों में सरल, सरस एवं प्रवाहपूर्ण भाषा का प्रयोग किया गया है।

(ii) ‘लीटा लो’ में अनुप्रास अलंकार की छटा है।

(iii) ‘हा-हा’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।

(iv) ‘करुणा’ का मानवीकरण किया गया है।

(v) पंक्तियों में संगीतात्मकता का गुण विद्यमान है। 

(vi) ‘थाती’ शब्द का अत्यंत सटीक प्रयोग हुआ है।

प्रश्न 5. देवसेना की हार या निराशा के क्या कारण हैं ? 

उत्तर— (i) देवसेना स्कंदगुप्त को चाहती थी, परंतु स्कंदगुप्त मालवा के धनकुबेर की कन्या विजया से प्रेम करता था ।

(ii) हूणों के आक्रमण से देवसेना के परिवार के सभी लोगों को वीरगति प्राप्त हुई। 

(iii) देवसेना नितांत अकेली पड़ गई और उसे भीख माँगकर अपना गुजारा करना पड़ा। 

(iv) उसे अपने आस-पास सबकी प्यासी निगाहों का सामना भी करना पड़ा। 

(v) वह विषम परिस्थितियों से जूझती हुई जीवन भर संघर्ष करती रही। उसका पूरा जीवन वेदना से परिपूर्ण हो रहा। 

(vi) इस प्रकार देवसेना को मिले असीम दुखों के कारण ही उसके मन में निराशा या हार की भावना आ गई।

कार्नेलिया का गीत के प्रश्न उत्तर | Hindi Class 12 Chapter 1 Question Answer

प्रश्न 1. ‘कार्नेलिया का गीत कविता में प्रसाद ने भारत की किन विशेषताओं की ओर संकेत किया है ? 

उत्तर- कालिया का गीत कविता में प्रसाद जी ने भारत की निम्नलिखित विशेषताओं की ओर संकेत किया है-

(i) भारत देश मिठास से भरा हुआ है। 

(ii) यहाँ अनजान लोगों को भी सहारा दिया जाता है।

(iii) यहाँ के पेड़-पौधों की सुंदरता अत्यधिक मनोहर व आकर्षक है। 

(iv) यहाँ हमेशा हरियाली छाई रहती है, जिससे लोगों को जीवन का संदेश मिलता है। 

(v) पक्षी भी यहाँ की धरती और आकाश को पसंद करते हैं।

(vi) भारत के लोगों की आँखों में सबके लिए करुणा की भावना रहती है।

(vii) यहाँ लहरों को भी किनारा मिल जाता है।

प्रश्न 2. ‘उड़ते खग’ और ‘बरसाती आँखों के बादल में क्या विशेष अर्थ व्यंजित होता है ? 

उत्तर—’उड़ते खग’ में विशेष अर्थ की व्यंजना — 

(i) कवि कहता है कि इंद्रधनुष के समान पंख फैलाए हुए पक्षी मलय पर्वत की शीतल हवा के सहारे अपना प्यारा पोसला समझकर जिस और मुँह किए हुए उड़ते हैं, वही हमारा भारतवर्ष है। 

(ii) यहाँ ‘उड़ते खग’ का प्रयोग होने से अर्थ में यह विशेषता आ गई है कि जो प्राणी यहाँ निवास करते हैं केवल उन्हें ही नहीं, बल्कि दूसरे लोगों को भी भारत की महानता और नैसर्गिक सौन्दर्य आकर्षित करता है।

“बरसाती आँखों के बादल’ में विशेष अर्थ की व्यंजना- 

(i) कवि कहता है कि जहाँ लोगों की आँखों से बरसते हुए करुणा के अश्रुओं से जल से भरे बादल बन जाते हैं, वही हमारा प्यारा भारतवर्ष है। 

(ii) यहाँ ‘बरसाती आँखों के बादल’ का प्रयोग होने से अर्थ में यह विशेषता आ गई है। .. कि इससे इस बात का पूर्णतया बोध हो जाता है कि यहाँ के लोगों की करुणा भावना अत्यंत गहरी है। इस कारण दूसरों के दुख भी उन्हें द्रवित कर देते हैं।

प्रश्न 3. काव्य-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए- हेम कुंभ ले ऊषा सवेरे-भरती डुलकाती सुख मेरे मंदिर ऊँघते रहते जब जगकर रजनी भर तारा।

उत्तर – काव्य-सौन्दर्य — 

(i) इन पंक्तियों में तारों को मस्ती में ऊँपते हुए तथा ऊषा को सोने का घड़ा लिए सुख को भरते तथा ढुलकाते हुए दिखाया गया है। 

(ii) तारों की मद्धिम होती चमक से कवि यह कल्पना करता है कि रात भर जगे होने की पकान के कारण नींद की मादकता से तारे ऊँप रहे हैं।

(iii) यहाँ तारों को ऊँघते हुए दिखाकर कवि ने चित्रण को सजीव बना दिया है। 

(iv) ऊषा काल में सूर्य की किरणों के सुनहरे रंग को देखकर कवि को ऐसा प्रतीत होता है कि ऊषा के हाथ में सोने का घड़ा है। यहाँ भाव की सुंदरता दर्शनीय है।

(v) कवि यह कहता है कि ऊषा सोने के घड़े में मेरे सुख भरती है और दुलकाती है।

(vi) ऐसा कहकर कवि यह भाव प्रकट करता है कि यह सुनहरी भोर कभी तो उसे सुख देती है और अगले ही पल उसका सुख का भाव समाप्त भी हो जाता है।

शिल्प-सौन्दर्य — 

(i) इन पंक्तियों में कवि ने सरल, सरस एवं प्रवाहमयी भाषा का प्रयोग किया है। 

(i) ‘जब जगकर’ में अनुप्रास अलंकार की छटा है। 

(ii) कवि ने ऊँपते हुए तारों के बीच सोने का घड़ा लिए ऊषा को सुख भरते और दुलक अद्भुतबिंव का सृजन किया है।

(iv) प्रकृति का मानवीकरण किया गया है। 

(v) शब्दों का चयन अत्यंत सुंदर व आकर्षक है।

प्रश्न 4. जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा-पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- आशय कवि कहता है कि भारतवर्ष वह देश है, जहाँ अनजान लोगों को भी सहा दिया जाता है। अर्थात् जिनको कहीं आश्रय नहीं मिलता उनकी भी मदद करना भारतीय संस्कृत की विशेषता है।

प्रश्न 5. प्रसाद शब्दों के सटीक प्रयोग से भावाभिव्यक्ति को मार्मिक बनाने में कैसे कुशल हैं? कविता से उदाहरण देकर सिद्ध कीजिए। 

उत्तर— (i) जयशंकर प्रसाद अपनी कविताओं में शब्दों के सटीक प्रयोग से भावाभिव्यक्ति को मार्मिक बनाने में कुशल है।

(ii) ‘कार्नेलिया का गीत’ कविता में प्रसाद जी ने भारत की प्राकृतिक सौन्दर्य के वर्णन में आकर्षक शब्दों के प्रयोग के द्वारा चित्रण को अत्यंत भावपूर्ण बना दिया है। जैसे- सरस तामरस गर्भ विभा पर नाच रही तरुशिखा मनोहर । छिटका जीवन हरियाली पर मंगल कुंकुम सारा ! 

(iii) मनोभावों का चित्रण करते हुए भी प्रसाद जी द्वारा किया गया शब्दों का सटीक प्रयोग सराहनीय है। जैसे-

बरसाती आँखों के बादल वनते जहाँ भरे करुणा जल लहरें टकराती अनंत की पाकर जहाँ किनारा।

(iv) ऐसे अनेक स्थलों पर हम देखते हैं कि सटीक शब्द चयन से प्रसाद जी भावाभिव्यक्ति को अत्यंत नार्मिक बना दिया है। 

प्रश्न 6. कविता में व्यक्त प्रकृति-चित्रों को अपने शब्दों में लिखिए ।

उत्तर— (i) नदी के जल में कमल के फूल खिले हैं। उसमें कमल नाल की कांति पर पेड़ों की सुंदर चोटियों की परछाई लहरों के साथ नाच रही है। 

(ii) सर्वत्र हरियाली छायी हुई है। उस पर बिखरी हुई केसर जीवन का संदेश दे रही है।

(iii) इंद्रधनुष के समान पंख फैलाए हुए पक्षी मलय पर्वत से आने वाली हवा के सहारे, आकाश में उड़ते हुए अपने घोंसलों की ओर जा रहे हैं। 

(iv) अनंत दूरी से आ रही विशाल लहरें किनारे पर टकरा रही हैं।

(v) रात भर जागने के कारण तारे मादकता से भरे ऊँघ रहे हैं। ऊषा सोने का घड़ा लेकर उसमें सुखों को भर रही है और दुलका रही है।



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FAQs

प्रश्न 1. देवसेना स्वयं को भ्रमवश वेदना पानेवाली कहा है। क्यों ? 

उत्तर—मालवा की राजकुमारी विजया के मोहजाल में फँसे स्कन्दगुप्त से नाता जोड़कर वह सुख, अभिलाषा, आकांक्षा आदि के मनोनुकूल होने की कामना कर रही थी। उसे जीवन भर जोड़ी गई अभिलाषाओं को त्यागकर मिक्षाटन के लिए मजबूर होना पड़ा। वह अपने जीवन भर की आकांताओं की पूँजी को बचा नहीं सकी।

प्रश्न 2. ‘देवसेना का गीत’ देवसेना को किन रूपों में प्रस्तुत किया है ? 

उत्तर— रचनाकार श्री प्रसाद ने देवसेना को निम्न रूपों में प्रस्तुत किया है- 
(i) मोहजाल में फंसी एक जिद्दी नारी ।
(ii) भ्रमजाल में फँसकर जीवन भर वेदना सहने वाली नारी । 
(iii) जीवन-संघर्ष में लड़ती हुई नारी ।
(iv) मनोव्यथा से पीड़ित नारी ।
(v) दुर्बल पद-बल, हारी होड़ तथा जीवन से हताश नारी।

प्रश्न 3. देवसेना के परिश्रम से निकली पसीने की बूंद आँसू की तरह क्यों प्रतीत हो रही थीं ?- ‘देवसेना का गीत’ पाठ के आधार पर बताइए। 

उत्तर— (i) देवसेना के परिवार के सभी सदस्य हूणों के आक्रमण का सामना करते हुए वीरगति को प्राप्त हो गए थे।
(i) देवसेना राष्ट्रसेवा का व्रत लिए हुए संघर्षरत थी।
(iii) वह जिस स्कंदगुप्त से प्रेम करती थी, उसे किसी और से ही प्रेम था।
(iv) इस प्रकार देवसेना का जीवन अत्यंत दुखों व कठिनाइयों से भरा हुआ था। 
(v) वह अपने जीवन-यापन के लिए गाना गाकर भीख माँगती फिर रही थी।
(vi) देवसेना जीवन-संघर्ष करते हुए इधर पसीने बहा रही थी और उपर उसकी मानसिक व्यथा के कारण आँखों से निकले आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे।
(vii) इस कारण उसके परिश्रम से निकली पसीने की बूंदों को आँसू की तरह गिरती हुई बताया गया है।

प्रश्न 1. ‘कार्नेलिया का गीत’ पाठ में वृक्षों की सुंदरता का वर्णन किस रूप में हुआ है ?

उत्तर- (i) ‘कार्नेलिया का गीत’ पाठ में वृक्षों की सुंदरता का वर्णन अत्यंत आकर्षक रूप में किया गया है।
(ii) नदी के जल में कमलनाल की आभा पर वृक्षों की चोटियों की परछाई अत्यंत सुंदर लग रही है।
(iii) पानी की लहरों पर वह परछाई नाचती हुई-सी लग रही है। 
(iv) सर्वत्र बिखरी हुई हरियाली पर मंगल-कुंकुम के रूप में जीवन छिटका हुआ

प्रश्न 2. भारत एक महान देश है। कैसे ?

उत्तर—निम्नलिखित लक्षणों के आधार पर भारत को एक महान देश माना जा सकता है- 
(i) भारत जगतगुरु बनकर विश्ववासियों को शिक्षित कर सकता है।
(ii) भारत धन-धान्य से परिपूर्ण हैं।
(iii) भारत में अनेक पर्वत, पठार, मैदान, नदियाँ आदि प्राकृतिक संसाधन उपलब्ध हैं। 
(iv) अतिथि सत्कार, प्रकृति-पूजन, दीन-दुखियों का सहारा, करुणा, सयहोग आदि इसके गरिमामय लक्षण हैं।

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