History Class 12 important questions answer With Pdf Download in HIndi

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History Class 12 important questions answers With Pdf Download in HIndi

Class12th 
ChapterImportant Model Question Paper
Book NCERT
SubjectHistory
Medium English
Study MaterialsFree Study Materials
Ncert Cbse Board class 12 History important questions with answers and pdf Download

1. सिन्यु घाटी सभ्यता की जुड़वाँ राजधानी थी (Twin capital of Indus Valley Civilization was)-

(a) मोहनजोदड़ो-चाहुंदड़ो (Mohenjodaro-Chanhudaro)

(b) हड़प्पा-लोयल (Harappa-Lothall)

(c) हड़प्पा-मोहनजोदड़ो (Harappa-Mohenjoaro)

(d) लोयल-कालीबंगा (Lothal-Kalibanga)

उत्तर. (C)

2.महात्मा बुद्ध का जन्म हुआ था (Mahatma Buddha was born at)-

(a) बोधगया में (Bodhgaya)

(बी) लुंबिनी में (लुंबिनी)

(c) सारनाथ में (Sarnath) 

(d) कुशीनगर में (Kushinagar)

Ans. (b)

3.’अर्थशास्त्र’ की रचना किसने की? (Who wrote ‘Arthashastra’?)

(a) आदम स्मिथ (Adam Smith)

(b) चाणक्य (Chanakya)

(c) बाणभट्ट (Banabhatta)

(d) कालीदास (Kalidas)

Ans. (b)

4.मनुस्मृति में कितने प्रकार के विवाह का उल्लेख किया गया है? (How many ypes of marriage are mentioned in Manusmriti?) 

(a) चार (Four)

(b) छः (Six) 

(c) आठ (Eight)

(d) नी (Nine)

Ans. (c)

5. फाहियान किसके शासनकाल में भारत आया था?

(a) समुद्रगुप्त (Samudragupta)

(b) रामगुप्त (Ramgupta)

(c) समुद्रगुप्त-II (Chandragupta-II)

(d) स्कन्दगुप्त (Skandagupta)

Ans. (c)

6. विजयनगर साम्राज्य के संस्थापक कौन थे? 

(a) हरिहर और बुक्का (Harihar and Bukka)

(b) हसन और गंगू (Hansan and Gangu)

(c) देवराय (Devaraya)

(d) कृष्णदेवराय (Krishnadevaraya)

Ans. (a)

7. ‘बीजक’ में किसका उपदेश संगृहित है ? 

(a) कबीर (Kabir)

(c) चैतन्य (Chaitanya)

(b) गुरु नानक (Guru Nanak)

(d) रामानन्द (Ramnanda)

Ans. (a)

8. जजिया किससे लिया जाता था ? (Who had to pay Jaziya?) 

(a) व्यापारियों से (Traders)

(b) बुद्धिजीवियों से (Intellectuals)

(c) सैनिकों से (Soldiers)

(d) जिम्मियों से (Zimmis)

9.आइन-ए-अकबरी कितने भागों में विभक्त है ? 

(a) दो (Two)

(b) तीन (Three) 

(c) चार (Four)

(d) पाँच (Five)

Ans. (d)

10. भारत का अंतिम मुगल शासक कौन था ?

(a) शाह आलम (Shah Alam)

(b) बहादुर शाह जफर (Bahadur Shah Zafar)

(c) अहमद शाह (Ahmad Shah)

(d) मुहम्मद शाह (Muhammad Shah)

Ans. (b) 

11. भारत में रेलवे लाइन की शुरुआत हुई (The first railway line in India was opened in the year)-

(b) 1853 में

(d) 1861 में

(a) 1833 में

(c) 1857 में

Ans. (b)

12. 1857 के विद्रोह के समय भारत का गवर्नर जनरल कौन था ? (Who was the Governor-General of India at the time of revolt of 1857?)

(a) लॉर्ड क्लाइव (Lord Clive) 

(b) लॉर्ड बेटिक (Lord Bentinck)

(c) लॉर्ड कैनिंग (Lord Canning) 

(d) लॉर्ड डलहौजी (Lord Dalhousie)

Ans. (c) 

13. भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के प्रथम अधिवेशन की अध्यक्षता किया था (The first session of Indian National Congress was presided over by

(a) दादाभाई नौरोजी ने (Dadabhai Naroji)

(b) उमेश चन्द्र बनर्जी ने (Womesh Chandra Banerjee)

(c) फिरोज शाह मेहता ने (Firoz Shah Mehta) 

(d) गोपाल कृष्ण गोखले ने (Gopal Krishna Gokhale) 

Ans. (b)

14. महात्मा गाँधी ने पहला किसान आन्दोलन कहाँ शुरू किया ? (Where was the first peasant Movement launched by Mahatma Gandhi?)

(a) बारदोली (Bardoli)

(b) चम्पारण (Champaran) 

(c) डाँडी (Dandi)

(d) वर्षा (Wardha) 

Ans. (b)

15. भारत के संविधान का पिता किसे कहा जाता है ? (Who is called the father of the Constitution of India ?)

(a) डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को (Dr. Rajendra Prasad) (b) डॉ. बी.आर. अम्बेदकर को (Dr. B.R. Ambedkar)

(c) डॉ. सच्चिदानन्द सिन्हा को (Dr. Sachchidananda Sinha)

(d) पंडित जवाहरलाल नेहरू को (Pandit Jawaharlal Nehru)

Ans. (b)

Q. 16. गोत्र से आप क्या समझते हैं ? (What do you understand by Gotra?) 

Ans. गोत्र शब्द मूल रूप से समूचे कुल के गोधन से सम्बन्धित था। परन्तु बाद में इसका अर्थ परिवर्तित होकर मूल कुल से उत्पन्न लोगों अथवा सम्प्रदाय से हो गया।

Q. 17. ‘निर्गुण’ और ‘सगुण’ भक्ति में क्या अंतर है ? (What is the difference between ‘Nirguna and ‘Saguna’ Bhakti?) 

Ans. सगुण भक्ति परम्परा-इसमें शिव, विष्नु तथा उनके अवतार और देोिं की पूजा मूर्त रूप में हुई। गुग भक्ति परम्परा-इसमें अमूर्त, निराकार ईश्वर की उपासना की जाती थी। मुख्य भूमिका निभाने वाले चार

Q. 18. भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन में पुरुषों के नाम लिखें। (Name four men who played important role in the freedom movement of India.) 

Ans. 1. महात्मा गाँधी, 2. जवाहरलाल नेहरू, 3. सुभाष चन्द्र बोस, 4. डॉ. राजेन्द्र प्रसाद।

निर्देश-निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दें, (Answer the following questions)- 

Q. 19. मोहनजोदड़ों के विशाल स्नानागार के विषय में आप क्या जानते हैं ? (What do you know about the great bath of Mohenjodaro?)

Ans. मोहनजोदड़ों की प्रमुख विशेषताओं में से एक विशेषता विशाल स्नानागार या सार्वजनिक स्नानागार है। ऐसा अनुमान है कि वह स्नानागार (तालाब) धार्मिक अवसरों पर आम जनता के नहाने के प्रयोग में लाया जाता था। यह तालाब इतना मजबूत बना हुआ है कि हजारों वर्षों के बाद भी यह वैसे का वैसा ही बना हुआ है। इस विशाल स्नानागार का जलाशय दुर्ग के टीले में है। विशाल स्नानागार एक विशाल आँगन में बना था जिसके चारों ओर गलियारा था। 

स्नानागार के तल तक जाने के लिए उत्तरी और दक्षिणी भाग में सीढ़ियों बनी हुई थीं। जलाशय के तीन और कस भी थे। जलाशय की दीवारें काफी चौड़ी बनी हुई है जो पक्की ईटों और विशेष प्रकार के सीमेंट से बनी हुई हैं ताकि पानी अपने आप बाहर न निकल सके। इसकी लम्बाई 11.88 मी., चौड़ाई 7.01 और गहराई 2.43 मी. है। पानी निकलने के लिए नालियों का भी प्रवन्ध है।”” 

Q. 20. हीनयान और महायान के अंतर को स्पष्ट करें। (Specify the difference between Hinayana and Mahayana.) 

Ans. हीनयान और महायान में अंतर 

(1) मूर्ति पूजा महायान धर्म वाले बुद्ध को देवता मानने लगे, जबकि हीनयान वाले बुद्ध को केवल महान मनुष्य ही समझते थे। वे बुद्ध की मूर्तियों बनाने के पक्ष में नहीं थे। परन्तु महायान धर्मावलम्बियों ने उनकी पत्थर की मूतियों बनानी आरम्भ कर दी। 

(ii) तर्क के स्थान पर विश्वास-हीनयान मत वाले व्यक्तिगत प्रयल और अच्छे कर्मों पर जोर देते थे। उनके अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को अपने कमौ का फ्ल अवश्य मिलता है, “जब देवता भी बुरे कर्मों के फल से नहीं बच सकते तो देवताओं की पूजा करने से क्या लाभ?” परन्तु महायान वाले विश्वास और पूजा पर अधिक जोर देते थे, इसलिए उन्होंने बुद्ध की पूजा करनी आरम्भ कर दी। इस प्रकार तर्क का स्थान विश्वास ने ले लिया।

(iii) पालि भाषा के स्थान पर संस्कृत-दोनों मतों में अंतर यह था कि महायान सम्प्रदायों की बहुत-सी पुस्तकें संस्कृत भाषा में लिखी गई, जबकि हीनयान मत वालों की सब पुस्तके पालि भाषा में है।

(iv) बौद्ध भिक्षुओं की उपासना-महायान धर्म में न केवल बुद्ध को ही भगवान का पद दिया गया है और उसकी उपासना आरम्भ हो गई बल्कि और बौद्ध भिक्षुओं की भी, जो अपनी-अपनी उपासना और पवित्रता के कारण प्रसिद्धि पा चुके चे, उपासना की जाने लगी और उनकी मूर्तियाँ बनाकर चौद्ध मंदिरों में रखी जाने लगी।

(v) निर्वाण की अपेक्षा स्वर्ग-महायान मत वालों ने भी अब जन-साधारण के सामने स्वर्ग को अपनी अंतिम मंजिल बताया। यह धर्म में एक बड़ा परिवर्तन था, जो कि साधारण मनुष्य को फुसलाने के लिए किया गया था। वास्तव में बौद्ध धर्म वाले यह अनुभव कर रहे थे कि हिन्दू धर्म उनसे अधिक प्रचारित है, इसलिए उन्होंने ऐसे ढोंग रवाने आरम्भ किये। 

(vi) प्रार्थना तथा भेंट-महात्मा बुद्ध ने स्पष्टतया किसी प्रकार की भी प्रार्थना और बलि की बुराई न की थी। परन्तु अब महायानी बौद्धों ने महात्मा बुद्ध को भगवान बना लिया और उनके सामने प्रार्थना आरम्भ कर दी: फल-फूल की भेंट दी जाने लगी।

इस प्रकार महात्मा बुद्ध भी हिन्दू देवताओं की भाँति अपने अनुयायियों की रक्षा के लिए अब उपस्थित हुए। 

Q. 21. भारत के प्राचीन काल में मंदिर निर्माण शैली के विकास के इंगित करें। (Mention the growth of temple architecture in early period of India.)

Ans. भारत, के प्राचीन काल में मंदिरों का निर्माण स्तूपों के विकास के साथ हुआ। प्रारम्भ में स्तूप अर्द्धगोलाकार जमी हुई मिट्टी के रूप होती थी जो बाद में विशाल स्तम्भ का रूप धारण कर ली। स्तूप के पास बेदिका होती थी जो पूजा-स्थल के रूप में थी। स्तूपों के साथ मंदिरों का भी विकास हुआ जहाँ देवी-देवताओं की मूर्तियों रखी जाती थीं। 

अशोक काल के दौरान पत्थरों की खुदाई कर बनाया गया गुफानुमा मंदिर भी पाया गया। प्रारम्भिक मंदिरों में एक गर्भगृह होता था जो चौकोर होता था। मूर्ति पूजा के लिए जाने के लिए एक दरवाजा होता शिखर बनाया गया। मंदिरों था। आगे चलकर गर्भगृह के ऊपर एक की दीवारों पर भित्तिचित्र बनाया जाता था। 

मंदिर स्थापत्य के विकास के साथ मंदिर के साथ विशाल सभास्थल, ऊँची दीवारों और तोरण भी जुड़ गये। चटूटानों को काटकर कृत्रिम गुफा भी बनाये गये जिनका प्रारम्भ ई.पू. तीसरी सदी में हुआ। इसका विकसित रूप कैलाशनाय के मंदिर में दिखाई देता है। जिसमें पूरी पहाड़ी काटकर उसे मंदिर का रूप दे दिया गया था। यह मंदिर हवीं शताब्दी में बनाया गया।

निर्देश-निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दें (Answer the following questions)-

Q. 22. अलबेरुनी द्वारा भारत की जाति-प्रथा के विवरण में कुछ प्रत्ययात्मक त्रुटियाँ हैं। टिप्पणी करें।

Ans. अल-वरूनी ने भारतीय प्रथाओं को समझने के लिए विभिन्न स्थानों की यात्रा तो की ही थी, साथ ही वेदों, पुराणों, भगवद्‌गीता, पतंजलि की कृतियों तथा मनुस्मृति आदि का भी अध्ययन किया।

(1) अल-बरूनी ने भारतीय जाति व्यवस्था को संस्कृत के धर्मग्रंथों के आधार पर समझने का प्रयास किया। इन ग्रंथों में ब्राह्मणों के दृष्टिकोण से जाति व्यवस्था को संचालित करने वाले नियमों का प्रतिपादन किया गया था।

(ii) उसने विभिन्न समुदायों में प्रतिक्रियाओं के माध्यम से जाति प्रथा को समझने का प्रयास किया। उसने बताया कि फारस में चार सामाजिक वर्गों की मान्यता थी। ये वर्ग निम्नलिखित है-

(a) घुड़सवार और शासक वर्ग, 

(b) भिक्षु, आनुष्ठानिक पुरोहित तथा चिकित्सक, 

(c) खगोलशास्त्री तथा वैज्ञानिक, 

(d) कृषक तथा शिल्पकार। से वह यह बताना चाहता था कि ये सामाजिक वर्ग, केवल भारत इसके माध्यम तक ही सीमित नहीं थे। 

(iii) उसने यह भी दर्शाया कि इस्लाम में सभी लोगों को समान माना जाता था और उनमें भिन्नतायें केवल धार्मिकता के पालन में थी।

(iv) जाति प्रथा के संदर्भ में वह ब्राह्मणवादी व्याख्या मानता था परंतु उसने अपवित्रता की मान्यता को स्वीकार नहीं किया। उनका मानना था कि प्रत्येक वस्तु जो अपवित्र हो जाती है, पवित्र होने का प्रयास करती है और ऐसा होता भी है।

(v) पवित्रता के सम्बन्ध में वह उदाहरण देता है। उसके अनुसार सूर्य हवा को स्वच्छ करता है और समुद्र में नमक पानी को गंदा होने से बचाता है। उसका कहना कि यदि ऐसा नहीं होता तो पृथ्वी पर जीवन असंभव हो जाता है ।

(vi) उसके अनुसार जाति व्यवस्था से जुड़ी अपवित्रता की धारणा प्रकृति के नियमों के प्रतिकूल है।

Q. 23. विजयनगर साम्राज्य के कृष्णदेवराय की उपलब्धियों का वर्णन करें। 

Ans. तुलुन वंश का सबसे प्रसिद्ध शासक कृष्णदेव था जिसे विजयनगर राज्य का सबसे महान शासक कहा जाता है। उसने पहले अपने राज्य को सुव्यवरिवत किया और विद्रोहियों की शक्ति को कुचल डाला। फिर उसने मैसूर पर आक्रमण किया और उसे जीत लिया। उसने उड़ीसा पर आक्रमण किया और उस राज्य से वे सभी प्रान्त छिन लिए जो उड़ीसा के शासकों ने कभी विजयनगर के शासकों से छीन लिये थे। 

यद्यपि गोलकुण्डा और बीपर के सुल्तानों ने उड़ीसा के शासक प्रतापरुद्र का ही साथ दिया, तथापि कृष्णदेव ने उन सबों को पराजित किया। इसी प्रकार विजयनगर राज्य शीघ्र ही बहुतं प्रसिद्ध हो गया। अब विजयनगर के शासक कृष्णदेव राय ने बहमनी राज्य की और ध्यान दिया और उससे कृलगा और तुंगभद्रा नदियों के बीच के दोआब को फिर से छीन लिया। 

उसकी अंतिम सैनिक सफलता बीजापुर के शासक के विरुद्ध बी, जिसने छीने हुए दोआब को वापस लेने का प्रयत्न किया परन्तु इसमें सफलता कृष्णदेव को ही मिली। कृष्णदेव की सैनिक सफलताओं की प्रशंसा इन शब्दों में की गई है-“वह विजयनगर के सबसे प्रसिद्ध तथा शक्तिशाली शासकों में से एक था।

उसने दक्षिण के मुसलमानों से बराबरी से टक्कर ली और अपने से पूर्व शासकों की पराजय का बदला लिया।” कृष्णदेव केवल एक विजयी शासक ही नहीं था वरन् कला और शिक्षा का भी

बड़ा प्रेमी था। वह स्वयं विष्णु का पुजारी था, परन्तु फिर भी उसका व्यवहार अन्य धर्म वालों से अच्छा था। सबके साथ न्याय किया जाता था। निर्धनों की राजकोष से सहायता की जाती थी। 

केवल यही नहीं विदेशियों के साथ भी उसका उसका व्यवहार बहुत ही अच्छा था। यह उनका आदर करता था और उनके दुःख निवारण का भी प्रयल करसा वा। कई सुन्दर मंदिर उसके राज्य में बनाये गये और ब्राह्मणों को विशेष स्थान दिया गया। 

कृष्णदेव की इतनी महान सफलताओं के कारण ही उसके विषय में यह कहा गया है कि “दक्षिण के हिन्दू तथा मुसलमान शासकों में ऐसा कोई शासक नहीं जो कृष्णदेव राय का मुकाबला कर सके।”

Q. 24. मुगलकाल में शाही महिलाओं की भूमिका का मूल्यांकन करें।  

Ans. मुगल साम्राज्य में शाही परिवार की स्त्रियों द्वारा निभाई गई भूमिका 

(1) भारतीय उपमहाद्वीप में विशेषकर शासक वर्गों में चतु-विवाह प्रया प्रचलित थी। इससे मुगल सम्राटों को कुछ सीमा तक लाभ हुआ। मुगल सम्राटों ने राजपूत घरानों में शादियों की जिसे उन्हें राजपूतों का समर्थन मिला और अपने विशाल साम्राज्य की सुरक्षा की। यद्यपि मुगल राजाओं की विभिन्न पल्लियों का दर्जा अलग-अलग था परन्तु सबने एक अच्छी पत्नी की भूमिका निभाई।

(ii) पत्नियों के अतिरिक्त मुगल परिवार में अनेक महिला तथा पुरुष गुलाम थे। ये छोटे काम से लेकर कौशल, निपुणता तथा बुद्धिमत्ता के अलग-अलग कायर्यों का सम्पादन करते थे।

(iii) नूरजहाँ के पश्चात् मुगल नारियों और राजकुमारियों ने महत्त्वपूर्ण वित्तीय स्रोतों पर नियंत्रण रखना शुरू कर दिया। शाहजहाँ की पुत्रियों जहाँआरा और रोशनआरा को ऊँची शाही मनसबदारों के समान वार्षिक आय प्राप्त होती थी। जहाँआरा को सूरत बन्दरगाह से राजस्व भी मिलता था।

(iv) मुगल साम्राज्य की स्त्रियों ने इमारतों और बागों के निर्माण में भी रुचि ली थी। उदाहरण के लिए चाँदनी चौक की रूप-रेखा जहाँआरा द्वारा बनाई गई। 

(v) अनेक पारिवारिक संघर्षों को सुलझाने में परिवार की बुजुर्ग स्त्रियों की भूमिका महत्त्वपूर्ण थी। हुमायूँनामा में इसकी स्पष्ट झलक मिलती है। 

(vi) राजनीति के क्षेत्र में भी मुगल महिलाओं की भूमिका महत्त्वपूर्ण रही। सम्राट अकबर तो काफी दिनों तक मुगल हरम के प्रभाव में था। जहाँगीर काल में नूरजहाँ की राजनीति में उल्लेखनीय योगदान था। राजतंत्र से जुड़ी महिलाओं के पदानुक्रम में उप-पत्नियों का स्थान सबसे निम्न था। इन सभी को नकद मासिक भत्ता या उपहार मिला करते थे।

भाग-III (Section – III)

Q. 25. संथाल विद्रोह के कारणों की विवेचना करें। 

Ans. स्वयं करे।

Q. 26. नये नगरों में सामाजिक जीवन की विशेषताओं पर प्रकाश डालें। 

Ans. नए शहरों में सामाजिक संबंध में बदलाव- 

(i) नये शहरों में सामाजिक जीवन अपने ही प्रकार का था। यहाँ अति सम्पन्नता और गरीबी देखने को मिलती थी।

(ii) यहाँ की जिन्दगी अति व्यस्त होती थी। यहाँ यातायात के साधन घोड़ागाड़ी, ट्राम या बस होता था। वस्तुतः काम करने का स्थान और आवास का स्थान अलग-अलग हो गया था।

(iii) नए नगरों में अनेक सार्वजनिक वस्तुएँ, टाउन हाल, पार्क, रंगशाला और सिनेमा हॉल होते थे। 

(iv) यहाँ कई सामाजिक समूह थे और विभिन्न वर्गों में काम करने के लिए आते थे।

(V) मद्रास, बम्बई और कलकत्ता के नक्शे पुराने भारतीय शहरों से भिन्न थे। इसमें बनाए गए भवनों पर औपनिवेशिक उद्भव की स्पष्ट छाप थी।

(vi) अंग्रेजों और यूरोपियों के लिए हिल स्टेशन आदर्श स्थान बन गये थे। उनकी इमारतें यूरोपीय स्थापत्य शैली की होती थी। रेलवे के आगमन के साथ हिल स्टेशनों में अनेक प्रकार के लोग पहुँचने लगे थे। भारतीयों ने भी वहाँ रहना शुरू कर दिया।

(vii) जिन हिल स्टेशनों में चाय और कॉफी के बागान लगाए गए थे, वहाँ बड़ी संख्या में मजदूर आने लगे। फलस्वरूप ये हिल स्टेशन यूरोपीय लोगों के लिए सैरगाह नहीं रह गये।

(viii) मध्यवर्गीय वर्ग-क्लको, शिक्षकों, वकीलों, डॉक्टरों, इंजीनियरों और लेखाकार की माँग बढ़ने लगी। यहाँ शिक्षित की संख्या अधिक थी।

(ix) समय के अनुसार तेजी से बदलाव आ रहे थे। औरतें भी विभिन्न कार्यों में अपना योगदान दे रही थी। सढ़िवादियों की औरतों को शिक्षा से ईर्ष्या हो रही थी। फिर वह विभिन्न रूपों में नौकरानी, फैक्ट्री मजदूर, शिक्षिका, रंगकर्मी और फिल्म कलाकारों के रूप में आगे बढ़ रही थीं।

(x) शहरों में मेहनत करने वाले मजदूरों की हालत ठीक नहीं थी। उन्हें यहाँ नया आकर्षण दिखाई दिया परन्तु साथ में उनकी आमदनी इतनी नहीं थी कि वे अपनी जीविका चला सकें।

(xi) नगरों में नस्ली भेद भी दिखाई देता था। मद्रास में व्हाइट आउन और ब्लैक टाउन में क्रमशः यूरोपीय और भारतीय अलग-अलग रहते थे। कम्पनी के लोगों को भारतीयों से विवाह करने का आदेश नहीं था। यूरोपीय ईसाई होने के कारण डच और पुर्तगाल को अंग्रेजों के साथ रहने की छूट थी। यूरोपियों के कम संख्या में होने से भी प्रशासकीय कार्य वही करते थे। मद्रास शहर की उन्नति मुट्ठी भर गोरों की आवश्यकता और सुविधाओं के अनुसार की जा रही थी।

Q. 27. राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलन में डान्डीं मार्च के महत्त्व का वर्णन करें। 

Ans. सविनय अवज्ञा आन्दोलन का प्रारम्भ दांडी यात्रा की ऐतिहासिक घटना से हुआ। इसमें गाँधी जी और विद्यापीठ तथा साबरमती आश्रम के 78 सदस्यों ने भाग लिया। यह निश्चय किया गया कि वे लोग समुद्र तट के गाँव दांडी जाकर नमक बनायेंगे और इस प्रकार नमक कानून का उल्लंघन किया जायेगा। 

12 मार्च, 1930 ई. को गाँधी जी अपने साथियों के साथ साबरमती आश्रम से दांडी के लिए प्रस्थान किया तथा 200 मील की दूरी 24 दिनों में तय की गयी। जगह-जगह पर हजारों नर-नारियों ने सत्याग्रही दस्ते का स्वागत कर उन्हें प्रोत्साहित किया। 

दांडी यात्रा के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए सुभाष चन्द्र बोस ने इसकी तुलना नेपोलियन के पोलिस मार्च और मुसोलिनी के रोम मार्च से की है। 6 अप्रैल को दांडी पहुंचकर गाँधी जी ने नमक बनान नमक कानून को भंग किया।

डांडी यात्रा के उद्देश्य-अंग्रेजों के कानूनों की अवज्ञा डांडी यात्रा का प्रमुख उद्देश्य था अवज्ञा के प्रतीक के रूप में नमक कानून तोड़ कर गाँधी जी ने लोगों को जागरूक किया और उन्हें उत्साह से भर दिया। डांडी में नमक कानून को भंग करने के बाद ही गाँधी जी ने सविनय अवज्ञा आन्दोलन के लिए निम्न उद्देश्यों/कार्यक्रमों को पेश किया-

(i) प्रत्येक गाँव में नमक बनायें।

(ii) महिलाएँ शराब की दुकानों, अफीम के अड्डों और विदेशी वस्त्र की दुकानों पर धरना दे।

(iii) छात्र शिक्षण संस्थाओं का बहिष्कार करें और सरकारी नौकर अपनी नौकर से इस्तीफा दें।

(iv) विदेशी वस्त्रों की होली जलायें।

(v) सरकार को कर (Tax) न दें।

प्रभाव एवं महत्त्व-गाँधी जी की डांडी यात्रा का ऐतिहासिक तथा प्रभावकारी महत्त्व है जो इस प्रकार है-

(i) इस घटना से गाँधी जी की छवि विश्व भर में फैल गई। इस यात्रा की यूरोप और अमेरिका के प्रेसों द्वारा व्यापक टिप्पणी दी गई।

(ii) यह पहली राष्ट्रीय गतिविधि थी जिसमें औरतों ने भी बढ़-चढ़कर भाग लिया था। समाजवादी कार्यकर्ता कमला देवी ने गाँधी जी को समझाया था कि वे अपने आन्दोलन को पुरुषों तक ही सीमित न रखें। कमला देवी स्वयं उन असंख्य औरतों में से एक थी जिन्होंने नमक या शराब कानून का उल्लंघन करते हुए सामूहिक गिरफ्तारी दी थी।

(iii) नमक कानून भंग होने से अंग्रेजों को यह अदेशा हुआ कि अब उनका राज बहुत दिनों तक टिक नहीं सकेगा और इस आन्दोलन को दबाने के लिए भारतीयों को सत्ता में हिस्सेदारी देकर संतुष्ट करना पड़ेगा।

(iv) गाँधीजी के नमक सत्याग्रह से स्वतंत्रता आन्दोलन को एक नयी गति मिली। नमक कानून से भारत की गरीब जनता त्रस्त थी। गाँधी जी के इस आन्दोलन से सभी भारतवासियों के आँखों में आशा की एक नई ज्योति जली। इस आन्दोलन ने समाज के सभी वर्ग शहरी-ग्रामीण, गरीब-अमीर, महिलाओं-पुरुषों एवं छात्रों को अंग्रेजों के विरुद्ध आन्दोलित कर दिया।

(v) नमक सत्याग्रह ने देश के हर तबके को प्रभावित किया तथा सभी के दिलो में राष्ट्रीयता का मशाल जला। इससे यह आन्दोलन देशव्यापी हो गया।

Q. 28. कैबिनेट मिशन भारत क्यों आया? इसने क्या सुझाव दिये? (Why did Cabinet Mission come to India? What recomm- endations were made by it ?) 

Ans. फरवरी, 1946 ई. में ब्रिटिश सरकार ने भारतीय नेताओं से विचार-विमर्श के लिए मंत्रियों का एक शिष्ट मंडल (Cabinet Mission) भेजा। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री श्री एटली ने घोषणा की कि हमारा विचार शीघ्र ही भारत को आजाद कर देने का है और अल्पसंख्यक दल को बहुसंख्यक दल की प्रगति के मार्ग में बाधा नहीं बनने दिया जाएगा। 

यद्यपि उसने पाकिस्तान की माँग को ठुकरा दिया था, तथापि उसने यह सुझाव दिया था कि भारत में एक संघ शासन की स्थापना की जाए, जिसमें भारतीय प्रांतों के चार क्षेत्र बनाए जाएँ। विदेश नीति, सुरक्षा एवं संचार को छोड़कर बाकी सभी विषयों में प्रत्येक क्षेत्र को पूर्ण स्वतंत्रता दी जाए और हर क्षेत्र का अपना पृथक संविधान हो। इसलिए शिष्ट मंडल ने यह सुझाव दिया कि संविधान सभा बुलाई जाए। 

इसके सदस्यों का चुनाव प्रत्यक्ष रूप से जनता द्वारा न होकर साम्प्रदायिक निर्वाचन क्षेत्रों के आधार पर प्रांतीय धारा सभाएँ करें। देशी राज्यों के प्रतिनिधियों को मनोनीत करने का अधिकार उनके राजाओं को दिया गया। काँग्रेस को हिन्दुओं के प्रतिनिधि मनोनीत करने का अधिकार दिया गया तथा मुस्लिम लीग को मुस्लिम प्रतिनिधियों को मनोनीत करने का अधिकार मिला।

कैबिनेट मिशन के सुझाव कैबिनेट मिशन ने भारतीय नेताओं से विचार-विमर्श करके 16 मई, 1946 को प्रस्ताव प्रस्तुत किए जो इस प्रकार 

(i) भारत में एक संघीय शासन की स्थापना की जाए जिसमें ब्रिटिश भारत के प्रांता और देशी राज्य शामिल होंगे। 

(ii) संघीय सरकार को देश की सुरक्षा, यातायात और वैदेशिक मामलों का अधिकार होगा।

(iii) इस संघ में ब्रिटिश भारत के और देशी रियासतों के प्रतिनिधियों को मिला कर एक व्यवस्थापिका तथा एक कार्यपालिका का निर्माण होगा।

(iv) प्रांतों को केन्द्रीय मामलों को छोड़कर सभी मामलों पर स्वायत्तता प्राप्त हो और विशिष्ट शक्तियाँ उसी के पास हो।

(v) देसी रियासतों को वे शक्तियाँ भी प्राप्त होंगी जो उन्होंने संघीय सरकार को नहीं सौंपी होंगी। 

(vi) प्रान्तों को छोटे और बड़े समूह बनाने का अधिकार प्राप्त हो और इन समूहों को व्यय के अधिकार होंगे, इनका फैसला वे स्वयं ही करेंगे। 

(vii) तब तक एक आंतरिक सरकार की स्थापना की जाए जब तक संवैधानिक सरकार की स्थापना न हो जाए। उस सरकार में प्रमुख दलों के प्रतिनिधि हों। 

(viii) भारत के लिए एक मंत्रिमंडल सभा की व्यवस्था की जाए।

खण्ड-घ (Group -D)

निर्देश-सभी प्रश्नों के उत्तर दीजिए (Answer all questions) 

Q. 29. वर्द्धमान महावीर के प्रारम्भिक जीवन और उपदेशों पर प्रकाश डालें। 

Ans. वर्द्धमान महावीर का जीवन- महावीर स्वामी जिनका बचपन का नाम वर्द्धमान था, जैन मत के संचालक माने जाते हैं। जैन लोगों के अनुसार वह उनके चौवीसवें एवं अंतिम तीर्थकर (जैनियों के उपास्य देव अथवा मुक्तिदाता) थे। महावीर स्वामी जैनियों के सबसे बड़े और लोकप्रिय तीर्थंकर थे। इनका जन्म 599 ई.पू. में वैशाली (बिहार का एक नगर) के निकट कुण्डा-ग्राम में हुआ। इनके पिता का नाम सिद्धार्थ था जो अपने क्षत्रिय गण के प्रधान है। 

आपकी माता तूपला सुप्रसिद्ध लिच्छवी वंश के नेता चेतक की बहन थी। चचपन में महावीर का विवाह राजकुमारी यशोदा से हुआ था। जिससे इनके एक पुत्री मी उत्पन्न हुई, परन्तु वैराग्य की ओर रुझान होने के कारण 30 वर्ष की आयु में ही पर छोड़कर संन्यासी हो गये।

स्वामी महावीर 12 वर्ष तक सच्चे ज्ञान की खोज में घूमते रहे। लोगों ने खूब हंसी उड़ाई परन्तु ये अपनी साधना में लीन रहे। 42 वर्ष की आयु में उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ और वे माहावीर स्वामी कहलाने लगे। अपना पूरा जीवन उन्होंने जैन मत के प्रचार में लगा दिया, 72 वर्ष की आयु में अर्थात् 527 ई. पू. में उनका देहान्त राजगृह के निकट ‘पावा’ नामक स्थान पर हुआ। उस समय तक उनके अनुयायियों की संख्या 14 हजार से भी अधिक हो चुकी थी।

वर्द्धमान महावीर के प्रमुख उपदेश निम्न हैं- 

(1) मोक्ष प्राप्ति-आत्मा को कर्म चन्धन से मुक्त करने को मुक्ति या निर्वाण कहा जाता है। जैन धर्म के अनुसार मोक्ष अर्थात् निर्वाण पाना प्रत्येक मनुष्य के जीवन का लक्ष्य है। निर्वाण पाने के तीन साधन-सम्यकू विश्वास,

सम्यकू ज्ञान और सम्यक् चरित्र है। जैनी इन्हें ‘त्रिरत्न’ कहते हैं। 

(ii) अहिंसा-जैन धर्म में अहिंसा पर सबसे अधिक बल दिया गया है। अहिंसा का अभिप्राय है-किसी जीवधारी को कष्ट न देना। जैनी पशु-पक्षी तथा पेड़-पौधों में भी जीव मानते हैं। उनके अनुसार व्यक्ति को किसी भी जीव (मानव, पशु-पक्षी और पेड़-पौधों आदि) को मन, वाणी या कर्म से दुःख नहीं देना चाहिए। इसलिए जैनी नंगे पाँव चलते है, पानी छानकर पीते हैं तथा मुँह पर पट्टी बाँधते हैं ताकि कोई जीव-हत्या न हो जाए।

(iii) घोर तपस्या और आत्म-त्याग-जैनी घोर तपस्या तथा शरीर को अधिक कष्ट देने में विश्वास रखते हैं। उनका विश्वास है कि भूखे रहकर प्राण त्यागने से मनुष्य को मोक्ष प्राप्त होता है।

(iv) ईश्वर में अविश्वास-जैनी ईश्वर के अस्तित्व को नहीं मानते। वे यह भी नहीं मानते कि ईश्वर ने संसार की रचना की है। वे ईश्वर की अपेक्षा तीर्थकरों की पूजा करते है। 

(v) जाति-प्रथा में अविश्वास-जैनी जाति-प्रया में विश्वास नहीं रखते हैं। उनके अनुसार वे सब व्यक्ति जो जैन मत में विश्वास रखते हैं, समान हैं।

(vi) वेदों और संस्कृत भाषा की पवित्रता में अविश्वास-जैन धर्म के अनुसार वेद ईश्वरीय ज्ञान नहीं और न ही संस्कृत पवित्र भाषा है। 

(vii) यज्ञ और बलि आदि में अविश्वास-जैनी यज्ञ-हवन को मोक्ष पाने के लिए आवश्यक नहीं समझते। वे पशु बलि का भी विरोध करते हैं।

(viii) पुनर्जन्म और कर्म सिद्धान्त में विश्वास-जैनी इस बात में विश्वास रखते हैं कि अच्छे कर्म जन्म का कारण बनते हैं और बुरे कर्म बुरे कर्म बुरे जन्म का। इसलिए व्यक्ति को अच्छे जन्म पाने के लिए अच्छे कर्म करने चाहिए।

(ix) उच्च नैतिक जीवन-महावीर स्वामी ने अपने अनुयायियों को चोरी-चुगली, लोभ, क्रोध आदि से दूर रहकर सदाचारी बनने का उपदेश दिया। 

Or, स्तूपों के निर्माण का उद्देश्य क्या था ? इनकी संरचना पर प्रकाश डालें। (What was the objective of the construction of the Stupas? Throw light on their construction.) 

Ans. स्तूप-अन्त्येष्टि के पश्चात् शरीर के कुछ अवशेष टीलों पर सुरक्षित रख दिये जाते थे। शवदाह से जुड़े ये टीले चैत्य के रूप में प्रसिद्ध हुए। इनके बारे में बौछ

ग्रंथों से विस्तृत जानकारी मिलती है। बुद्ध के जीवन से सम्बन्धित स्थलों का भी वर्णन मिलता है। जैसे-जन्म स्थल लुम्विनी, ज्ञानप्राप्ति स्थल-बोधगया, प्रथम उपदेश

स्थल-सारनाथ और निर्वाण स्थल-कुशीनगर आदि। ये बोद्ध धर्म के तीर्थ स्थल माने जाते हैं। लुम्बिनी में अशोक ने एक स्तंभ बनवाया था।

स्तूप निर्माण के उद्देश्य- 

(1) धार्मिक उद्देश्य स्तूपों का निर्माण धार्मिक उद्देश्य से किया जाता था। ऐसे स्थल जहाँ युद्ध से जुड़े कुछ अवशेष यथा उनकी अस्थियाँ या उनके द्वारा प्रयुक्त सामान गाड़ दिया जाता था। इन टीलों को स्तूप कहते थे। इन्हें बुद्ध या बौद्ध धर्म के प्रतीक के रूप में माना गया। अशोकावदान से ज्ञात होता है कि अशोक ने सभी प्रसिद्ध नगरों में स्तूप बनाने का आदेश दिया था। भरहुत, साँच और सारनाथ के स्तूप ई.पू. द्वितीय शताब्दी तक बन गये थे। इसलिए कई मूर्तियों यूरोप पहुँच गई।

(ii) मूर्तिकला-इन स्तूपों के आस-पास मिली मूर्तियाँ आकर्षक और मूल्यवान थी। 

(iii) पत्थर में गढ़ी कथाएँ-साँची के स्तूप में पत्थर मूर्तियों के माध्यम से कथाओं को अंकित किया गया है। उदाहरण एक मूर्तिकला अंश में सरसरी तौर पर देखने से झोपड़ी और पेड़ों वाले ग्रामीण दृश्य दिखाई देते हैं। परन्तु यह दृश्य वेसान्तर जातक से लिया गया है। इसके एक राजकुमार अपना सब कुछ एक ब्राह्मण को देकर जंगल में चला जाता है।

(iv) उपासना के प्रतीक व प्रारम्भिक का ने बुद्ध को मानव के में न दिखाकर उनकी उपस्थिति के माध्यम से विखाने प्रयास किया। एक मूर्ति में रिक्त स्थान के रूप में। बुद्ध का प्रथम उपदेशसारी रूप में दिखाया गया है।

स्तूप निर्माण की विधि-इन स्तूपों का निर्माण दान के द्वारा किये गये थे। इयन देने वाली में राजा, शिल्पकार और व्यापारी वर्ग आदि शामिल थे। इसमें कुछ पुष्य महिलायें, भिक्षुक और भिरुणियों भी शामिल थी।

स्तूप की संरचना आरम्भ में स्तूप अर्थगोलाकार के रूप में नमी मिट्टी होती थी। इसे अंड भी कहते थे। आगे चलकर इसमें अनेक वस्तुएँ जुड़ गई। यह चौकोर गोल आकारों का मिश्रण होता था। अंड के ऊपर छन्ने जैसी आपूति बनने लगी जिसे हर्मिका कहा जाता था जो देवताओं का नियास माना जाता था। 

हर्मिका से एक मस्तूल निकलता था जिसे यष्टि कहते थे। स्तूप के चारों और वैदिका होती थी। गाँधी और भरहुत के स्तूपों में तोरणद्वार और वेदिकायें है। ये बॉस या लकड़ी के घेरे होते थे। पूर्वी तोरणद्वार से लोग दक्षिणावर्त रखूप की परिक्रमा करते थे। अन्य स्तूपों एवं कुछ अन्य संरचनायें भी मिलती है।

Q. 30. भक्ति आन्दोलन के महत्त्व एवं प्रभावों की समीक्षा करें। (Review the important effects of Bhakti

Ans. भक्ति आन्दोलन के सामाजिक प्रभाव 

(1) जाति-प्रथा पर प्रहार-भদা संतों ने जाति-प्रथा, ऊँब-नीच तया छुआछूत पर करारी चोट की। इससे देश की विभिन्न जातियों में भेदभाव के बंधन शिचिल पड़ गये और छुआछूत की भावना कम हो गई।

(ii) हिन्दुओं तथा मुसलमानों में मेल-मिलाप-भक्ति आन्दोलन के फलस्वरूप हिन्दुओं और मुसलमानों में आपसी वैमनस्य, ईर्ष्या, पूणा, द्वेष, विश्वास तथा संदेह की भावना कम होने लगी। वे एक-दूसरे को समझने लगे और उनमें आपसी मेल-गोल बढ़ा। 

(iii) व्यापक दृष्टिकोण भक्ति-आन्दोलनों ने संकीर्णता की भावना को दूर कर लोगों की दृष्टिकोण को व्यापक तथा उदार बनाने में सहायता की। लोग अब प्रत्येक बात को तर्क तथा बुद्धि की कसौटी पर कसने लगे। ब्राह्मणों को प्रत्येक वचन उनके लिए ‘वेद-वाक्य’ न रहा। अंधविश्वास तथा धर्मांधता की दीवारे गिरने लगी। देश की दोनों प्रमुख जातियों हिन्दुओं तथा मुसलमानों का दृष्टिकोण उदार तथा व्यापक होने लगा।

(iv) निम्न जातियों का उद्वार-भक्ति आंदोलन के नेताओं ने समाज में एक नया दातावरण पैदा किया। जाति-पाति के बंधन शिथिल होने लगे, ऊँय-नीच तया धनी-निर्धन की भेदभाव कम हुआ और उनमें आपसी पूणा समाप्त होने लगी।

सांस्कृतिक प्रभाव (Cultural Effects)

(v) सांस्कृतिक विकास-भक्ति आन्दोलनों के नेताओं ने अपनी शिक्षा का प्रचार जनसाधारण की भाषा में किया। इसके परिणामस्वरूप बंगाल मराठी, गुजराती, पंजाबी, हिन्दी आदि अनेक देशी भाषाओं का विकास हुआ। जयदेव कर “इत गोविन्द’, ‘सूरदास का सूरसागर’, जायसी का ‘पद्मावत’, सिक्खों का ‘आदि ग्रंथ साहिब’, तुलसीदास जी का ‘रामचरितमानस’, कबीर तथा रहीम के ‘पोहे’ तथा रसखान की ‘साखियों’ आदि हृदयग्राही तथा सदूसाहित्य रखा गया। यह भारतीय साहित्य गीि कोई कम सेवा न थी। 

(vi) हिन्दू-मुस्लिम कलाओं में समन्यय-राजनीतिक, धार्मिक तथा सामाजिक भेदभाव, कटुता तथा वैमनस्य के कम होने पर हिन्दू और मुस्लिम कलाओं में समन्दय

का एक नया युग प्रारम्भ हुआ इसमें वास्तुकला, चित्रकला तथा संगीत में आये ईरानी कलाओं का सम्मिश्रण तथा संगम हुआ और एक नई भारतीय कला का जन्म हुआ। इसका निखरा हुआ रूप मुगलकालीन भारतीय कलाकृतियों में देखने को मिलता है। 

(vii) आर्थिक प्रभाव (Economic Effects) इस आन्दोलन के भारतीय सामाजिक जीवन पर कुछ आर्थिक प्रभाव भी पड़े। संत भक्तों ने यह महसूस किया कि अधिकांश सामाजिक बुराइयों की जड़ आर्थिक विषमता है। संत कबीर तथा गुरु नानकदेव जी ने धनी वर्ग के उन लोगों को फटकारा, जो गरीबों का शोषण करके धन संग्रह करते हैं। गुरु नानकदेव जी ने इस बात पर बल दिया कि लोगों की अपनी मेहनत तथा नेक कमाई पर ही संतोष करना चाहिए। 

Q32. अकबर की धार्मिक नीति का वर्णन करें। 

Ans. अकबर ने धार्मिक सहिष्णुता की नीति अपनायी। 1562 ई. में अकबर ने युद्ध बन्दियों को दास बनाने की प्रथा पर रोक लगायी। 1563 ई. में अकबर ने तीवर यात्रा कर बंद कर दिया। दार्शनिक व धार्मिक प्रश्नों पर वाद-विवाद करने क लिये अकबर ने फतेहपुर सीकरी में 1575 ई. में इवायतखाना का निर्माण कराया। यहाँ शेख अब्दुल नवीं एवं अब्दुल्ला सुल्तानपुरी के मध्य होनेवाले अशोभनीय झगड़ों को देखकर 1579 ई. में अकबर ने महजर की घोषणा की। इसके द्वारा किसी भी विवाह पद अकबर की राय ही अंतिम होगी। 

अकबर ने अपना ज्ञान बढ़ाने के लिए विभिन्न धर्मो के विद्वानों से उनके धर्म की जानकारी ली-

1. हिन्दू धर्म-पुरुणोत्तम एवं देवी से हिन्दू धर्म की जानकारी प्राप्त की। हिन्दू धर्म से प्रभावित होकर यह भाचे पर तिलक लगाने लगा। उसने हिन्दू धर्म। की पुस्तको का अनुवाद करवाया।

2. पारसी धर्म-दस्तूर मेहर जी राणा से पारसी धर्म की जानकारी ली। इससे प्रभावित होकर उसने सूर्य की उपासना प्रारम्भ की। दरबार में हर समय अग्नि जलाने की आक्षा दी।

3. जैन धर्म की शिक्षा आचार्य शांतिचन्द एवं हीर विजय सूरी से ली। 

4. सिक्ख धर्म से प्रभावित होकर पंजाब का एक वर्ष का कर माफ किया।

5. ईसाई धर्म-ईसाई धर्म से प्रभावित होकर आगरा एवं लाहौर में गिरजाघर का निर्माण कराया। 19 फरवरी, 1580 ई. में प्रथम जेसुइट मिशन पतेहपुर सीकरी आया। इसमे भादर एक्वदिवा एवं एण्टोनी मानसरेट थे।

दूसरा जेसुइट मिशन 1591 ई. में लाहीर आया। तृतीय मिशन भी लाहौर में 1595 ई. में आया।

प्रथम शिष्ट मण्डल के मानसरेट ने अकबर तक सुलभ पहुँच के बारे में अपने अनुभव इस प्रकार लिखे हैं-

“अक्बर से भेंट करने की इच्छा रखने वालों को उसकी पहुँच अत्यन्त सुलभ है। प्रत्येक दिन वह ऐसा अवसर निकालता है कि कोई भी आम आदमी अथवा अभिजात उसयसे मिलकर वार्तालाप कर सकें। उससे जो भी बात करने आता है

उनके प्रति वह मधुरभाषी व मिलनसार रहता है। उसे उसकी प्रजा के दिलो-दिमाग से जोड़ने में इस शिष्टाचार और भद्रता का बड़ा असाधारण प्रभाव है।”

सत्य की खोज करते-करते उसने पाया कि सभी धर्मो अच्छाइयों है मगर कोई भी धर्म सम्पूर्ण नहीं है। अतः उसने 1581 ई. में स्वयं का एक धर्म दीन-ए-इलाही चलाया। आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव ने लिखा है कि इस धर्म के द्वारा वह हिन्दू व मुस्लिम धर्म को मिलाकर साम्राज्य में राजनीतिक एकता कायम करना चाहता था। इस धर्म को स्वीकार करने वाला एकमात्र हिन्दू बीरबल था।

1564 ई. में अकबर ने जजिया कर बंद कर दिया था। यह समस्त भारत को गैर-मुस्लिम जनता से जाता था।

सुलह-ए-कुल की नीति-अकबर ने सुलह-ए-कुल की नीति अपनायी। इसका अर्थ होता है कि सबसे शांति रखने का सिद्धान्त। अबुल फजल सुलह-ए-कुल के

आदर्श को प्रबुद्ध शासन की आधारशिला मानता था। सभी अधिकारियों को प्रशासन में सुलह-ए-कुल की नीति अपनाने के निर्देश दिये गये।

Q.31. 19वीं शताब्दी में नगर नियोजन को प्रभावित करने वाले तत्वों का उल्लेख करें। (Mention the factors which influenced town planning in the 19th century.) 

Ans. 19वीं सदी में नगर नियोजन को प्रभावित करने वाले तत्त्व-

(i) शासन वग के लिए नस्ली भेद पर आधारित क्लब, रेसकोर्स और रंगमंच भी बनाए गए।

(ii) अमीर भारतीय एजेंटों और विचौलियों के विस्तृत मकान वाले ब्लैक टाउन में होते थे। वे अंग्रेज स्वामियों को खुश करने के लिए रंगीन पार्टियों करते वे और समाज में हैसियत दिखाने के लिए मंदिर बनवाते थे।

(iii) मजदूर वर्ग के लोग शहर के विभिन्न इलाकों में कच्ची झोपड़ियों में रहते थे। ये यूरोपीय और भारतीय स्वामियों के लिए खानसामा, पालकीवाहक, गाड़ीवान,

चौकीदार, पोर्टर, निर्माण और गोदी मजदूर के रूप में विभिन्न सेवाएँ उपलब्ध कराते थे। 

(iv) 1857 के विद्रोह से अंग्रेज आशंकित रहने लगे। अपनी सुरक्षा के लिए उन्होंने ‘सिविल लाइन्स’ के नाम से एक शहरी इलाके विकसित किये। इसमें केवल

अंग्रेज रहते थे और यहाँ बस्तियों को छावनियों के रूप में विकसित किया गया।

(ⅴ) इसके विपरीत ब्लैक टाउन में स्वच्छता का अभाव था और शोरगुल होता था। प्रारंभ में अंग्रेजों ने इस पर ध्यान नहीं दिया परन्तु प्लेग और हैजा फैलने से 1860-70 में स्वच्छता पर ध्यान दिया गया।

(vi) किन स्थापत्य शैलियों के आधार पर इमारतें और भवन बनवाए जाएँ, यह भी एक चिंता का विषय था। पाश्चात्य स्थापत्य शैली, भारतीय स्थापत्य शैली, ग्रीक रोमन स्थापत्य शैली अथवा गौधिक शैली विकल्प के रूप में थे।

(vii) औपनिवेशिक शासन के सामने धन की समस्या थी। शहरों के रख-रखाव, सुधार और अन्य कार्यों को लागू करने के लिए पर्याप्त धन जुटाना था। इसके लिए वाटरी कमेटी बनाया गया।



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