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Ncert Solutions Home Science Class 12 Chapter 1 Notes In Hindi PDF

Class12th 
Chapter Nameशिशुओं के विकास की आवश्यक जानकारी | Some Specific Characteristics of Children
Chapter number01
Book NCERT
SubjectHome Science
Medium Hindi
Study MaterialsImportant questions answers
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शिशुओं के विकास की आवश्यक जानकारी | Some Specific Characteristics of Children


प्रस्तुत अध्याय शिशुओं को जानिये के अन्तर्गत शिशुओं के जन्म से लेकर छः वर्ष की आयु तक के शिशुओं के शारीरिक एवं क्रियात्मक विकास के बारे में कुछ प्रमुख आवश्यक बातों की जानकारी प्रस्तुत की गयी है। हम जानते हैं कि जब बच्चे का जन्म होता है तो सबसे पहले उसका पालन-पोषण माँ की गोद में होता है। 

उसके भोजन की आवश्यकता सबसे पहले माँ के दूध से पूरी होती है। धीरे-धीरे शिशु का विकास होते रहता है । शारीरिक एवं क्रियात्मक विकास के साथ-साथ शिशुओं का सामाजिक, संवेगात्मक भाषा तथा ज्ञान का विकास होता है।

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विकास का अर्थ गुणात्मक परिवर्तनों से है। विकास क्रमिक सम्बद्धतापूर्ण परिवर्तनों की प्रगतिशील श्रृंखला है। प्रगति का अर्थ है-दिशात्मक परिवर्तनों का होना, वे परिवर्तन पृष्ठोन्मुख की अपेक्षा अग्रोन्मुख होते हैं। परिवर्तन श्रृंखला की वह अवस्था जिसमें बच्चा भ्रूणावस्था से लेकर प्रौढ़ावस्था तक गुजरता है विकास कहलाती है। 

विकास सामान्य प्राप्ति से अधिक महत्त्व की चीज है। विकास का अवलोकन किया जा सकता है। किसी सीमा तक इसका मूल्यांकन मापन भी किया जा सकता है ।

विकास के विभिन्न स्वरूप हैं- (i) शारीरिक विकास, (ii) मानसिक विकास, (iii) संवेगात्मक विकास, (iv) सामाजिक विकास, (v) भाषा विकास, (vi) गति विकास, (vii) बोधात्मक विकास ।

शारीरिक विकास का अर्थ है शरीर के विभिन्न अंगों में लगातार बढ़ोतरी एवं उनके कार्य करने की क्षमता में विकास होना, जैसे-ऊँचाई, भार, अनुपात, हड्डियाँ, दाँत, स्नायु संस्थान, ज्ञानेंद्रिय अंगों का विकास, आंतरिक विकास इत्यादि । 

क्रियात्मक विकास के दो क्रम होते हैं- (क) मस्तकाधोमुखी विकास क्रम (Cephalocauda development sequence) (ख) निकट दूर का विकास क्रम (Proxidistal sequence) | 

संवेगात्मक विकास संवेदों एवं क्रियाओं का विकास है, जैसे-दृष्टि, श्रवण, घ्राण, स्वाद । बच्चों के सामाजीकरण का अर्थ है उन्हें परिवार व समाज के तरीके, विश्वास, जीवन-मूल्य, रीति-रिवाज व परम्पराएँ सिखाना बच्चा समाजीकरण (i) बड़ों का अनुकरण करके (Immitation) (ii) स्वयं को अपने माता-पिता अथवा बड़ों के समरूप समझना (Identifying with parents or elders) (iii) पुरस्कार एवं दण्ड (Reward and purishment) संवेगात्मक विकास दो प्रकार का होता है- (i) दुखद संवेग जैसे-क्रोध, भय, ईर्ष्या तथा (ii) सुखद संवेग जैसे-हर्ष, स्नेह, जिज्ञासा । 

बच्चे के ज्ञानात्मक विकास का अर्थ है बच्चे की उन मानसिक प्रक्रियाओं का विकास जिनके परिणास्वरूप वह अपने तथा अपने आस-पास के संसार के बारे में ज्ञान प्राप्त करता है। ज्ञानात्मक विकास की चार अवस्थाएँ हैं- (i) संवेदीगात्मक अवस्था (ii) पूर्व सक्रियात्मक अवस्था (iii) मूर्त सक्रियात्मक अवस्था (iv) अमूर्त संक्रियात्मक अवस्था । भाषा पूर्व प्रकार (i) रोना या चिल्लाना (ii) आसान ध्वनियाँ निकालना (iii) तुतलाना (iv) संकेत अथवा हावभाव । भाषा प्रचार में बोलने के विकास में (i) अर्थग्रहण अथवा समझ (ii) वाक्य रचना (iii) उच्चारण का होना आवश्यक है ।


अति लघु उत्तरीय प्रश्न (VERY SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS)


Q. 1. विकास की परिभाषा दें।

Ans. विकास की क्रमिक सम्बद्धतापूर्ण परिवर्तनों की प्रगतिशील श्रृंखला है जिसमें बच्चे के मानसिक सामाजिक व भावात्मक पक्षों में परिपक्वता आती है। विकास जन्मभर चलते रहने वाली प्रक्रिया है जिसे प्रत्यक्ष रूप से नहीं देखा जा सकता है न मापा जा सकता है। परन्तु इसका केवल एहसास किया जा सकता है।

Q.2. विकास की कोई दो विशेषताएँ लिखें।

Ans. (क) विकास अर्थात् शिशु का सम्पूर्ण विकास । विकास सदा प्रगतिपूर्ण श्रृंखला में घटित होता है। (ख) विकास में होने वाले परिवर्तन क्रमिक होते हैं एवं इनमें निरंतरता पायी जाती है।

Q. 3. नौ महीने की आयु तक पहुँचते-पहुँचते शिशु की नयी गत्यात्मक उपलब्धियाँ गिनाइए ।

Ans. (i) सहारे से बैठना (ii) बच्चा घुटने के बल चलना शुरू करता है ।

Q. 4. भाषा आदान-प्रदान के लिए शिशु साधारणतया किस आयु में एक शब्द वाले वाक्यों का प्रयोग करने लगता है ।

Ans. 10 से 12 माह की आयु में बच्चा एक शब्द वाले वाक्यों का प्रयोग करने लगता है।

Q.5. तीन वर्ष की आयु में राजू अत्यधिक चिड़चिड़ा हो गया है। उसके चिड़चिड़ेपन के दो संभावित कारण लिखिए ।

Ans. (i) राजू का मनोवैज्ञानिक विकास ठीक तरह से नहीं हुआ। बच्चे से प्यार स्नेहपूर्वक व्यवहार नहीं किया गया। (ii) उसकी पोषण आवश्यकताओं तथा अन्य भौतिक अवस्थाओं की पूर्ति नहीं का गयी ।

Q.6. शिशुवार्ता क्या होती है ?

Ans. स्वयं की भावनाओं अथवा भाव को प्रकट करने के लिए या स्नेहपूर्वक बुलाए जाने प्रति उत्तर या प्रतिक्रिया के फलस्वरूप भाषा रहित ध्वनियों को शिशुवार्ता कहते हैं।

Q.7. बबलाना किसे कहते हैं और यह किस आयु में आरंभ होता है ?

Ans. बबलाना छः महीने की आयु से आरंभ होता है। इसमें शिशु दो अक्षरी शब्द बोलता । जिनका स्वर एक ही होता है जैसे बाबा, मामा, दादा ये आवाजें बबलाना कहलाती हैं।

Q.8. भाषा की अनुपस्थिति में अपने भाव व्यक्त करने के लिए शिशु कैसी ध्वनि निकालते हैं ? किन्हीं दो ध्वनियों के नाम लिखें । 

Ans. (1) चैबलिंग शिशुवार्ता 7-9 मास की आयु में बच्चे दोहरी आवाजें निकाल सकते हैं, जैसे-बाबा, मामा, यटा, नाना, पापा, आदि ।

(2) गलगलाना 3 माह के शिशु कूजना सीख लेते हैं और कू ऊ ऊ ऊ की ध्वनि निकाल सकते हैं। जब वे संतुष्ट व खुश होते हैं तो गलगलाने की ध्यनि निकालते हैं। 

Q. 9. वृद्धि और विकास में क्या अन्तर है ?

Ans. शारीरिक आकार में बढ़ोत्तरी को वृद्धि कहते हैं तथा अन्य सभी गुणात्मक पक्षों में वृद्धि को विकास कहते है ?

Q. 10. छः महीने की आयु तक पहुंचते-पहुँचते शिशु किन दो गत्यामक क्रियाओं के लिए सक्षम हो जाता हैं ।

Ans. (1) कुर्सी पर आराम से बैठकर हिलती हुई वस्तुओं को पकड़ सकता है ।

(2) अपने हाथ से पकड़कर बोतल या कप से दूध और पानी पी सकता है । 

Q. 11. बबलू अनजान व्यक्ति द्वारा प्यार किये जाने पर रोने लगता है, एक कारण बताइए।

Ans. 10-18 माह के बीच डर की भावना जागृत होने के कारण बबलू अनजान व्यक्ति द्वारा प्यार किये जाने पर रोने लगता है।

Q. 12. बालक किस आयु में निम्न क्रियाएँ करता है (1) ठोड़ी उठाना (ii) फुटबॉल खेलना ।

Ans. (i) 10 मास की आयु में बालक ठोड़ी उठाने लगता है । करता है ।

(ii) बच्चा फुटबॉल तथा अन्य बाह्य खेल 4-6 वर्ष की आयु से

Q. 13. भावात्मक विकास की परिभाषा लिखें ।

Ans. भावात्मक विकास का अर्थ है ” अपनी भावनाओं का प्रदर्शन समाज में वांछना के अनुरूप ही अभिव्यक्त करें।”

Q. 14. बच्चे में अस्थायी दाँतों की संख्या कितनी होती है ? बच्चे का प्रथम दाँत किस आयु में निकलता है ? उसके सारे अस्थायी दाँत किस आयु तक निकल जाते हैं ?

Ans. बच्चे में अस्थायी दाँतों की संख्या 20 होती है। 6 माह की आयु में शिशु का पहला दाँत निकलता है। 8वें वर्ष के अन्त तक एक बच्चे में सभी दूध के दांत निकल आते हैं।

Q. 15. बच्चा किस आयु में (क) अपने आप बैठने लगता है (ख) सीढ़ियाँ चढ़ने लगता है ?

Ans. (क) 9 मास से 1 वर्ष या 12 मास की आयु तक (ख) लगभग 1½ से 2 वर्ष तक ।

Q. 16. एकवर्षीय विभा माँ को आस-पास न पाकर कौन-सा भाव दिखाएगी? 

Ans. अकेलापन अभिभावकों से पृथकीकरण तथा असुरक्षा का भाव विभा दिखाएगी।

Q. 17. क्रियात्मक विकास में प्रवीणता के लिए अति आवश्यक किन्हीं दो करणों की सूची बनाएँ।

Ans. (1) सौखने की इच्छा किसी भी काम को अच्छी तरह और आसानी से तभी सीखा जा सकता है जब बच्चा उसके लिए तैयार हो ।

(2) अभ्यास का अवसर किसी भी कार्य में कुशलता प्राप्त करने के लिए बच्चे को उचित समय देना चाहिए ।

Q. 18. बच्चा किस आयु में (क) वस्तुओं को पकड़ना शुरू करता है। (ख) पहला दाँत कब निकलता है ?

Ans. (क) बच्चा लगभग 4-6 मास की आयु में वस्तुओं को पकड़ना शुरू करता है- (ख) 6 मास की आयु में पहला दाँत निकलता है ।

Q. 19. क्रियात्मक विकास किसे कहते हैं ?

Ans. क्रियात्मक विकास का अर्थ है “शिशु में माँसपेशियों व हड्डियों द्वारा विभिन्न कार्य करने की सामर्थ्य ।”

Q. 20. शिशु डर के भाव का प्रदर्शन किस आयु में करना आरम्भ करता है ? इस आयु में डर व्यक्त करने का एक विशिष्ट ढंग बताएँ ।

Ans. शिशु डर के भाव का प्रदर्शन 10-18 माह की आयु में आरम्भ करता है। वह माता की अनुपस्थिति से जितना डरता है उतना हो अनजान व्यक्ति की उपस्थिति से डरता है।

Q. 21. बच्चों के समाजीकरण से क्या समझते हैं ?

Ans. बच्चों के समाजीकरण का अर्थ है उन्हें परिवार व समाज के तरीके, विश्वास जीवन-मूल्य, रीति-रिवाज व परम्पराएँ सिखाना ।

Q. 22. बालक किस आयु में निम्न क्रियाएं करने लगता है ? (क) अपना सिर उठाना (ख) बिना सहारे के खड़े होना ।

Ans. (क) 2 माह (ख) 11 माह ।

Q. 23. संवेदनात्मक विकास का क्या अर्थ है ? 

Ans. जन्म के पश्चात् बच्चा अपने बारे में तथा अपने आस-पास के वातावरण के बारे में सम्पूर्ण ज्ञान जो अपनी ज्ञानेन्द्रियों द्वारा प्राप्त करता है, संवेदनात्मक विकास कहलाता है ।

Q. 24. बाल विकास से तुम क्या समझते हो ?

Ans. बच्चे के मानसिक, सामाजिक, भावात्मक आदि विभिन्न पक्षों में परिपक्वता आना बाल विकास कहलाता है।

Q. 25. एक वर्ष आयु के बच्चे से साधारणतया देखे जाने वाले दो संवेगों के नाम बताइए। प्रत्येक संवेगों की एक सामान्य अभिव्यक्ति लिखिए । 

Ans. (1) बच्चे एक वर्ष की आयु में अनजाने लोगों से भयभीत रहते हैं। यदि उनकी माता उनके साथ न हो तो वे डर जाते हैं अतः उनमें डर की भावना जाग्रत होती है। (2) अधिक डर जाने पर बच्चे रोने लगते हैं। क्रोध और फिर रोना तीनों संवेग पाये जाते हैं।

Q. 26. संवेगों के प्रकार कौन-कौन से हैं ?

Ans. विभिन्न संवेगों को दो वर्गों में बाँटा जाता है । 

Q. 27. विकासक्रम के भाषा पूर्व प्रकार कौन-कौन से हैं ?

Ans. (1) रोना या चिल्लाना (Crying), (2) आसान ध्वनियाँ निकालना (Cooing), (3) तुतलाना (Bassing), (4) संकेत अथवा हाव-भाव (Gestures) |

Q. 28. एक नवजात शिशु का वजन 3 कि. ग्राम है। पाँच माह तथा 2 वर्ष की आयु उसका वजन कितना होगा ?

APAN. 5.308 -6 किलोग्राम, 2 वर्ष 12 किलोग्राम ।

Q. 29, छः माह के होते-होते बच्चे में दो संज्ञानात्मक परिवर्तन कौन-कौन से हो जाते हैं ? 

Ans (1) जो भी उसके हाथ में हो, वह उसे मुँह में डालता है और चूसने लगता है।

(2) वह सीखने या समझने लगता है कि खिलौना मुँह में डालने से दूध नहीं मिलता और शांत नहीं होती ।

Q. 30. Mile Stones किसे कहते हैं ?

Ans. शैशवकाल के विभिन्न चरणों में क्रियात्मक होता है जिसे (Milestones) कहते हैं।

Q. 31. ज्ञानात्मक विकास किसे कहते हैं ?

Ans. ज्ञानात्मक विकास का अभिप्राय- बच्चे की उन मानसिक प्रक्रियाओं का विकास जिनके परिणामस्वरूप वह अपने तथा अपने आस-पास के बारे में ज्ञान प्राप्त करता है । संकल्पना बनाता है, तर्क करके निष्कर्ष निकालता है तथा अपनी समस्याओं को सुलझाता है।

Q.32. ज्ञानात्मक विकास की विभिन्न अवस्थाएं कौन-कौन सी है ?

Ans. (1) संवेदी गामक अवस्था (The sensory motor Stage)

(2) पूर्व सक्रियात्मक अवस्था ( The Preoperational Stage) ।

(3) मूर्त सक्रियात्मक अवस्था (The Concrete operational Stage) । 

(4) अमूर्त सक्रियात्मक अवस्था (The Formal operational Stage)।

Q. 33, भाषा किसे कहते हैं ?

Ans. भाषा एक ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा हम अपने विचारों एवं भावों को दूसरों के समक्ष प्रस्तुत करते हैं तथा उनके विचारों तथा भावों को समझते हैं। 

Q. 34. बच्चा क्रम से क्या-क्या सीखता है ?

Ans. बच्चा क्रम से सिर संभालना, बैठना, रेंगना, खड़ा होना, चलना, दौड़ना, कूदना, और खाना सीखता है। 

Q. 35. एक नवजात शिशु का वजन 2 किग्रा है 15 माह व एक वर्ष पर उसका वजन बताइए ।

Ans. शारीरिक भार वृद्धि सिद्धान्त के अनुसार बच्चे का वजन पाँच माह की आयु में 4-5, किग्रा (जन्म भार से लगभग दुगुना) एवम् एक वर्ष की आयु में 7 किग्रा से 8 किग्रा. (जन्म से लगभग तिगुना होगा

Q. 36. दस माह के होते-होते बच्चे में होने वाले दो ज्ञानात्मक बदलाव कौन-कौन से होते हैं ?

Ans. दस माह के होते-होते बच्चे में होने वाले ज्ञानात्मक विकास- (1) माता-पिता तथा अपने सम्बन्धियों तथा वस्तुओं को पहचानना व मनोवैज्ञानिक विकास । अपने माता-पिता व सारे सम्बन्धिों को पहचानना ।

(2) शरीर का सीधा सन्तुलन, दाँत निकलना ।


लघु उत्तरीय प्रश्न (SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS)


Q.1. शिशु में जन्म से लेकर चार माह तक होने वाले क्रियात्मक विकास को प्रस्तुत कीजिए ।

Ans. क्रियात्मक विकास (Minor Development )- नवजात शिशु असहाय होता है। एक माह उपरान्त वह अपना सिर उठा सकने में समर्थ हो जाता है। तीन माह उपरान्त गर्दन दिखाई देने लगती है। दो माह का शिशु अपना सिर व छाती पेट के बल लेटे-लेटे ही उठा सकता है। तीन माह के शिशु के नजदीक यदि कोई वस्तु लायी जाए तो वह उसे पकड़ने की चेष्टा करता है परन्तु दृष्टि स्थिर नहीं होती। चार माह का बच्चा सहारा लेकर बैठना सोख लेता है।

Q.2. शिशु में छः मास से नौ मास के बीच हो रहे क्रियात्मक विकास की तालिका बनाएँ ।

Ans. 6-7 मास में क्रियात्मक विकास- बच्चा कुर्सी पर आराम से बैठकर हिलती हुई वस्तुओं को पकड़ सकता है। पालने के ऊपर लटके हुए रंगीन गुब्बारों पर दृष्टि स्थिर कर सकता है। अपने हाथ में पकड़कर बोतल या कप से दूध और पानी पी सकता है ।

8-9 मास के बच्चे में अपने बैठने की क्षमता आ जाती है। वह अपने आप लेटकर बैठ सकता है और फिर लेट सकता है। वह अपने आस-पास की वस्तुओं, जैसे-मेज, कुर्सी इत्यादि को पकड़कर खड़ा होने की चेष्टा करता है।

Q. 3. 0-1 वर्ष तक की आयु के बच्चों का क्रियात्मक विकास के विशिष्ट गुण कौन-कौन से हैं?

Ans. 0 1 वर्ष तक की आयु के बच्चों का क्रियात्मक विकास के विशिष्ट गुण इस प्रकार हैं-

0-1 वर्ष तक की आयु

(1) 0-3 माह

(2) 4-6 415

बच्चों का क्रियात्मक विकास के विशिष्ट गुण

प्रथम माह ठोड़ी उठाना, दो माह छाती उठाना

तीन माह वस्तु प्राप्त करने की कोशिश मगर असमर्थ ।

चार माह किसी चीज के सहारे बैठना ।

पाँच माह खिलौना आदि पकड़ना । छः माह कुर्सी पर आराम से बैठकर हिलती वस्तुओं को पकड़ना ।

सात माह अपने आप बैठना ।

आठ माह स्वयं खड़ा होना ।

नौ माह कुर्सी इत्यादि के सहारे खड़ा होना, पेट के बल सरकना ।

(4) 10 से 12 माह

10 माह हाथों को पकड़कर चलना तथा हाथों और

घुटनों के सहारे सरकना ।

11 माह अपने आप खड़े होना ।

12 माह एक हाथ पकड़ कर चलना ।

Q.4. 0-3 माह और 10-12 माह के बच्चों के क्रियात्मक विकास में अन्तर स्पष्ट करें । 

Ans. 0-3 माह तक की आयु (क्रियात्मक विकास) तक नवजात शिशु असहाय होता है। एक माह उपरान्त वह अपना सिर उठा सकने में समर्थ हो जाता है। तीन माह उपरान्त गर्दन दिखाई देने लगती है। दो माह का शिशु अपना सिर व छाती पेट के बल लेटे-लेटे ही उठा सकता है।

तीन माह के शिशु के नजदीक यदि कोई वस्तु लायी जाए तो उसे पकड़ने की चेष्टा करता है। 10-12 माह की आयु में (क्रियात्मक विकास) बच्चा हाथों व घुटनों के बल अच्छी तरह

रेंगना सीख लेता है । वह पूर्ण विकास के साथ खड़ा होने लगता है। वह खड़ा होकर अपने पिता तथा भाई-बहनों का हाथ पकड़कर हर्ष अनुभव करता है। उनके सहारे से वह एक-दो कदम चलने लगता है।

Q.5. एक से दो वर्ष तक की आयु के क्रियात्मक विकास के विशिष्ट गुण लिखें।

Ans. 13 माह अपने आप चलना । 18 माह सीढ़ियाँ उतरना चढ़ना । 2 वर्ष शुरू में किसी के सहारे चढ़ना और बाद में अपने आप । 

Q6 3 से 5 वर्ष तक की आयु के क्रियात्मक विकास के विशिष्ट गुण लिखें।

Ans. बच्चे भाग सकते हैं और खेल सकते हैं। छोटे लड़के फुटबॉल खेलना पसन्द करते दोनों पैरों पर कूद सकते हैं। लड़कियाँ रस्सी कूदना सीख लेती हैं और हाथों पैरों को पूर्ण रूप से इस्तेमाल करना सीख लेती है। उनकी पकड़ में मजबूती आ जाती है। वे पंजे पर खड़े कोकर ऊँचाई पर रखी चीजें उठा सकते हैं।

Q. 8. संज्ञानात्मक विकास की चार विशेषताएँ बताइए ।

Ans. (1) ज्ञान का अर्थ है-बच्चे को सोचने व समस्याओं को सुलझाने की शक्ति का विकास 1 (2) इससे बच्चे में मानसिक विकास की क्षमता आती है, जैसे सोचना, तर्क करना और समस्या सुलझाने के तरीके निकालना। (3) ज्ञान का विकास वस्तुओं की स्थिरता और अनुभवों की मानसिक ग्रहण शक्ति के साथ होता है । (4) वह समस्याओं का समाधान कर सकता है।

Q. 8. वस्तु की स्थिता से क्या अभिप्राय है ? बालक किस आयु में इसका प्रदर्शन करता है ?

Ans. दो वर्ष की आयु में बच्चा सामान्य वस्तुओं तथा जन्तुओं के नाम लेने लगता है, वस्तुओं को पकड़कर ऊपर चढ़ सकता है, दरवाजा खोल लेता है, इसे वस्तु स्थिरता कहते हैं। 

Q. 9. उदाहरण देते हुए मूर्त संक्रियाओं का अर्थ समझाइए ।

Ans. मूर्त सक्रियात्मक अवस्था यह सात से ग्यारह वर्ष तक की अवस्था है तथा इसमें बच्चे अधिक व्यवहारशील व यथार्थवादी हो जाते हैं। वे कल्पना व वास्तविकता में अंतर करना सोख जाते हैं तथा सच्चाई को समझने लगते हैं। ये बच्चे पारिवारिक रिश्ते समझने लगते हैं तथा विचार क्रमबद्ध व तर्कयुक्त भी हो जाते हैं। बच्चे में संकल्पना निर्माण की क्षमता आतो है। वह वर्गीकरण कर सकता है, श्रेणी कर सकता है तथा सोच-विचार सकता है। यही कारण है कि इस आय के बच्चों को स्कूल भेजना चाहिए ।

Q. 10. छः माह से दो वर्ष की आयु तक बच्चे में होने वाले सामाजिक विकास’ चित्रित कीजिए ।

Ans. सामाजिक विकास (Social Development ) -”सामाजिक विकास का अर्थ जिस समाज में बच्चा रहता है उस समाज के अनुसार अपने व्यवहार को ढालने की बच्चे की क्षमताट सामाजिक विकास से ही समाजीकरण आरम्भ होता है। समाजीकरण वह प्रक्रिया है जिस बच्चा खाना, बोलना और खेलना सीखता है। इसका अर्थ अपने समूह के साथ अच्छा व्यवह करना भी है।

6 से 9 माह इस आयु में माता तथा बच्चे का संबंध घनिष्ठ हो जाता है । ये प्यार फटकार में अंतर समझने लगते हैं। 10 से 18 माह-परिवारजनों के साथ इस आयु के बच्चे सुरक्षित महसूस करते हैं, अनज लोगों को पसंद नहीं करते। वे असामाजिक होते हैं तथा अपने खिलौने किसी को नहीं देते ।। अपनी माता की कंघी तथा बटुए तक को हाथ में पकड़ कर रखते हैं ।

डेढ़ से 2 वर्ष अधिकार की भावना गहरी हो जाती है तथा वे अपनी माता का अविभार ध्यान चाहते हैं। यदि घर में और भी बच्चे हैं तो माता-पिता को कठिनाई हो सकती है । इस आयु के बच्चे साधारण हिदायतें समझने लगते हैं। उन्हें छोटे बच्चों की देख-रेख में

व्यस्त किया जा सकता है। उसे शिशु का लंगोट/दूध की बोतल पकड़ाने को कहा जाये तो व तुरन्त आज्ञा पालन करेगा। समझदार माता-पिता बार-बार बच्चे के अच्छे व्यवहार की सराहा करके उसका उत्साह बढ़ाते हैं और सामाजिक व्यवहार भी बढ़ता है। असामाजिक व्यवहार ओर ध्यान नहीं देना चाहिए । जहाँ तक हो सके, बच्चे को डाँटना व सजा नहीं देनी चाहिए इससे अवांछित व्यवहारों को प्रोत्साहन ही मिलता है।

दो वर्ष के ऊपर बच्चे दूसरे लोगों को देखकर समाजीकरण सीखते हैं। धीरे-धीरे सामाजिक संबंधों को समझने लगते हैं ।

Q.11. पूर्व संक्रियात्मक अवस्था में हो रहे संज्ञानात्मक विकास के दो गुण लिखें । 

Ans. (1) 2-7 वर्ष तक की अवस्था में बालक नयी सूचनाओं और अनुभवों का संग्र करता है ।

(2) मुख्यतया भाषा और वस्तुओं तथा घटनाओं के अर्थ का विकास होता है

Q. 12. एक छः माह का, एक वर्ष का और तीन वर्ष के शिशु घर के बाहर जान चाहते हैं । स्पष्ट कीजिए कि किस प्रकार प्रत्येक शिशु अपने इस भाव को प्रकट करेग व भाषा विकास की किस अवस्था में वह शिशु होगा ?

Ans. यह बिल्कुल सही है कि भाषा द्वारा भाव व्यक्त किये जाते हैं। लेकिन भाषा क विकास धीरे-धीरे होता है और केवल तीन वर्ष का बच्चा अपनी भाषा में अपना भाव बता सकत है जबकि एक वर्ष का बच्चा और छः महीने का बच्चा दोनों ही अपनी बात भाषा में व्यक्त कर, में असमर्थ होंगे। छः महीने का बच्चा केवल रोकर ही अपना भाव प्रकट करेगा जबकि एक वर्ष का बच्चा तोतली भाषा में कुछ कहने की कोशिश करेगा और हाथ से बाहर जाने का इशार करेगा । केवल तीन वर्ष का बच्चा अपनी टूटी-फूटी भाषा में बाहर चलने के लिए कहेग जैसे- चलो, बाहर आदि । 

Q. 13. भाषा की क्या आवश्यकता है ? छोटे बच्चों में भाषा का विकास किस प्रकार होता है ?

Ans. बच्चे बोलना शनैः-शनैः सीखते हैं। पाँच वर्ष की शब्दावली से लगभग 2000 शब्द बोलते हैं। अर्थपूर्ण शब्दों और वाक्यों से दूसरे के साथ संबंध स्थापित करते हैं ।

(1) 0-3 माह नवजात शिशु केवल रोने की ध्वनि निकाल सकता है; ये कर ही यह अपनी माता को अपनी भूख व गीला होने का आभास कराता है। तीन माह तक कूजना सीख जाता है, जैसे कू ऊ ऊ ऊ की ध्वनि निकाल सकता है ।

( 2 ) 4-6 माह इस आयु में बच्चे अ आ की ध्वनि निकाल सकते हैं। फिर वे पा, मा, टा, वा, ना आदि ध्वनि निकाल सकते हैं ।

(3) 7-9 माह इस आयु में बच्चे दोहरी आवाजें निकाल सकते हैं, जैसे-बाबा, मामा, टाटा, नाना, पापा, आदि, इसे बैबलिंग या शिशुवार्ता कहते हैं।

(4) 10-12 माह बच्चे सरल वाक्य बोलने लगते हैं। बच्चा अब बानोबॉल या बाबी बोल सकते हैं।

(5) 1-2 वर्ष अब बच्चे तीन या चार शब्दों के वाक्य बोलने लगते हैं। अब वे वाक्य बोल सकते हैं।

(6) 3-5 वर्ष बच्चों की आदत होती है कि वे नये सीखे शब्दों को बार-बार बोलते हैं। वे आवाज की नकल करते हैं।

Q. 14. प्रथम तीन वर्ष में होने वाले शारीरिक विकास के प्रमुख तीन क्षेत्रों में होने वाले परिवर्तनों की सूची बनाइए और प्रत्येक की एक-एक विशेषता का उल्लेख कीजिए।

Ans. शारीरिक विकास से तात्पर्य बच्चों के कद, वजन तथा आकार से सम्बंधित परिवर्तनों से है। शरीर के अनुपात में भी बदलाव आ जाता है। शारीरिक विकास में प्रमुखतः तीन क्षेत्रों में परिवर्तन होते हैं—(क) वजन, (ख) ऊंचाई, (ग) अनुपात ।

(क) वजन-जन्म के समय बच्चा लगभग 2.5 किलोग्राम का होता है। 6 महीने के बाद लगभग दुगुना हो जाता है। एक वर्ष बाद तिगुना हो जाता है और तीन वर्ष तक लगभग 12-15 किलोग्राम हो जाता है ।

(ख) ऊंचाई-जन्म के समय बच्चा लगभग 17-18″ का होता है। एक वर्ष के बच्चे का कद 10 “-12” बढ़ जाता है। दो वर्ष में 32 “-34” यानी दुगुना हो जाता है और 3 वर्ष तक 36 “-40” तक हो जाता है।

(ग) शारीरिक अनुपात जन्म के समय शिशु का सिर शरीर के अनुपात में काफी बड़ा

होता है । गर्भ के शिशु की भी टाँगें व हाथ व धड़ थैले-सा होता है। परन्तु अगले वर्ष में धड़ की लम्बाई बढ़ जाती है। और शरीर और धड़ के अनुपात में बदलाव आता है। पहले सिर शरीर का 1/4 हिस्सा होता है। लेकिन बाद में विकास होने पर यह शरीर का 17 हिस्सा हो जाता है।

Q.15. तीन वर्ष की आयु में राजू अत्यधिक चिड़चिड़ा हो गया है। उसके चिड़चिड़ेपन के दो सम्भावित कारण लिखिए।

Ans. (1) राजू का मनोवैज्ञानिक विकास ठीक तरह से नहीं हुआ। बच्चे से प्यार व स्नेहपूर्वक व्यवहार नहीं किया गया ।

(2) उसकी पोषण आवश्यकताओं तथा अन्य भौतिक अवस्थाओं की पूर्ति नहीं की गयी । 

Q. 16. दो वर्षीय बालक के गुस्सा होने के दो संभव कारण बताइए। इस संवेग की अभिव्यक्ति के चार संभव तरीके लिखिए

Ans. क्रोध (Anger ) – शैशवकाल में प्रदर्शित होने वाले सामान्य संवेगों में क्रोध सर्वप्रमुख है क्योंकि शिशु के पर्यावरण में क्रोध पैदा करने वाले अनेक उद्दीपन होते हैं । शिशु को बहुत जल्दी ही यह मालूम हो जाता है कि दूसरों का ध्यान आकर्षित करने के लिए अपनी इच्छाओं की पूर्ति करने के लिए जोर से रोकर, चीखकर या, चिल्लाकर अपना क्रोध प्रकट करना सबसे आसान तरीका है। 

यही कारण है कि शिशु केवल भूख या प्यास लगने पर ही नहीं अपितु जब यह चाहता है कि उसकी माता उसे गोद में उठाए तब भी जोर-जोर से रोता है। जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है तब अपने कार्य में बाधा डालने के परिणामस्वरूप भी गुरु करने लगता है जैसे जब यह खिलौने से खेलना चाहे उस समय उसे कपड़े पहनाना, उसे का में अकेला छोड़ देना, उसकी इच्छा की पूर्ति न करना आदि।

प्रायः सभी बच्चों के गुस्सा होने के कारण अलग-अलग हो सकते हैं परन्तु गुस्सा होने सभी एक-सा व्यवहार करते हैं, जैसे रोना, चीखना, हाथ-पैर पटकना, अपनी साँस रोक ले जमीन पर लेट जाना, पहुँच के अन्दर जी भी पोज हो उसे उठाकर फेंकना या फिर ठोकर मार आदि ।

Q.17. एक तीन वर्षीय बच्चे में ईष्यों की भावना उत्पन्न हुई है। इसके दो संभावि कारण लिखें तथा इसे अभिव्यक्त करने के चार तरीके भी लिखें। 

Ans. ईर्ष्या (Jealousy ) – ईर्ष्या का अर्थ है-किसी के प्रति गुस्सा या विरोध करना ईर्ष्या प्रायः सामाजिक स्थितियों द्वारा उत्पन्न होती है। जब परिवार में नया शिशु जन्म लेता। तो उससे कुछ हो बड़ा परिवार का दूसरा बच्चा उससे ईर्ष्या करने लगता है क्योंकि उसे मह होता है कि उसे मिलने वाला प्यार बट गया है। 

दो वर्ष से पाँच वर्ष के बीच में सर्वाधिक होती है। छोटा बच्चा कई बार अपने से बड़े भाई अथवा बहन से भी ईर्ष्या करने लग है क्योंकि उसे लगता है कि उनका ध्यान अधिक रखा जाता है। प्रायः ऐसी स्थिति में बच बिस्तर गीला करना अंगूठा चूसना, खाने से इन्कार करने या फिर बीमारी होने का दिखावा कर बड़ों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश करता है। 

Q.18. नी माह की आयु के बच्चे में देखी जाने वाली तीन भाषा सम्बन्धी व ती गत्यात्मक उपलब्धियों का ब्यौरा दीजिए।

Ans. नौ माह की आयु के बच्चे में गत्यात्मक उपलब्धि-बच्चे में अपने आप बैठने क्षमता आ जाती है। यह अपने आप लेटकर बैठ सकता है और फिर लेट सकता है। वह अप आस-पास की वस्तुओं, जैसे मेज, कुर्सी इत्यादि को पकड़कर खड़ा होने की चेष्टा करता है अपन टांगों पर खड़ा होकर वह वाकर में चल सकता है। पेट के बल रेंगने लगता है। बच्चे का ह पर जोर देकर व टांगों पर जोर देकर चलना देखा जा सकता है। इस आयु वर्ग के बच्चे अप अंगूठे व उगलियों का उपयोग करना सीख लेते हैं।

भी माह की आयु के बच्चे में भाषा सम्बन्धी उपलब्धियाँ 9 माह इस आयु में बच्चे दोहरी आवाजें निकाल सकते हैं, जैसे बाबा, मामा, टाटा, नाना पापा आदि। इन ध्वनियों को ‘वैवलिंग’ या शिशुवार्ता कहते हैं। इसके बाद बच्चा बाजा, ड आदि कहना सीखता है। 

शुरू में ये सब आवाजे निरर्थक लगती हैं, लेकिन बाद में बच्चा अपन बात समझाने के लिए अर्थपूर्ण शब्द बोल सकता है। वह वस्तु के साथ अर्थ जोड़ने लगता और फिर शब्द चिह्नों में परिवर्तित हो जाते हैं। जैसे जब बच्चा बॉल कहता है तो उसका अ है उसे बॉल चाहिए या बॉल नहीं चाहिए। माता-पिता इन शब्दों व संकेतों से बच्चे को भा समझने लगते हैं। 1


दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (LONG ANSWER TYPE QUESTIONS)


Q. 1. शरीर के विभिन्न क्षेत्रों में क्रियात्मक विकास किन-किन विधियों द्वारा होता है । 

Ans शरीर के विभिन्न क्षेत्रों में क्रियात्मक विकास निम्नलिखित विधि से होता है-

(1) सिर के क्षेत्र का क्रियात्मक विकास (Motor development of heal region )- सिर के क्षेत्र की मांसपेशियों के नियन्त्रण का विकास तेज गति से होता है। जिस शिशु शीघ्र ही आंख की गति पर नियंत्रण करना, मुस्कुराता और सिर को संभालना सीख जाता है।

  • एक माह का बच्चा
  • दो माह का बच्चा
  • तीन माह का बच्चा
  • चार माह का बच्चा
  • उल्टा पेट के बल लेट कर छाती ऊपर करने लगता है।
  • उल्टा पेट के बल लेट कर टोदी (Chin) उपर करने लगता है।
  • चीजों को पकड़ने की कोशिश करने लगता है ।
  • सहारे के साथ बैठने लगता है।
  • पाँच माह का बच्चा
  • गोद में बैठ कर चीजों को पकड़ने की कोशिश करने लगता है और सिर मुक्त रूप से हिला-दुला सकता है।9
  • छः माह का बच्चा
  • गोद में बैठ कर अपना सिर एकदम स्थिर कर सकता है।

(2) धड़ क्षेत्र में क्रियात्मक विकास (Motor development in chest re-) धड़ क्षेत्र में दो मुख्य महत्त्वपूर्ण विकास हैं ।

(क) लेटे हुए शरीर को लुढ़काना एवं (ख) बिना सहारे के बैठना ।

(क) धड़ क्षेत्र का विकास दूसरे माह की आयु से आरम्भ हो जाता है।

प्रायः चार माह की आयु में बच्चा पीछे की ओर मुड़ने की कोशिश में सफल हो जाता है। माह की आयु में बच्चा पेट के बल लुढ़कने लगता है। इसके लिए पहले वह अपने शरीर

छः सुमाता है, तत्पश्चात् कंधे उसके बाद श्रोणी और अन्त में टाँगों की उछलकूद के साथ अपना सम्पूर्ण शरीर मोड़ लेता है ।

(ख) चार माह का बच्चा अपने शरीर को खींच कर सहारे के साथ बैठने लगता है। पाँच माह का बच्चा अपने शरीर को सीधा रखकर गोद में आराम से बैठता है। सात माह का बच्चा ‘बिना किसी सहारे के अकेला बैठने लगता है ।

प्रारम्भ में जब बच्चा बिना सहारे के अकेला बैठने लगता है तब वह सन्तुलन बनाए रखने के लिए अपने बाजू फैला कर आगे की ओर झुकने लगता है। धीरे-धीरे वह अपने शरीर को सन्तुलित रखना भी सीख जाता है ।

(3) बाजू और हाथ क्षेत्र में क्रियात्मक विकास (Motor development it arm and hand region)-क्रियात्मक विकास की आधारभूत अवस्था बाल्यावस्था है। शैशवावस्था में ही शिशु के बाजू, कंधों और कलाई की मांसपेशियों में विकास होने लगता है और वह इन उपर नियंत्रण करना सीखता है।

  • चार माह का बच्चा
  • चीजों को पकड़ने की कोशिश करने लगता है ।
  • चीजों को एक हाथ से दूसरे हाथ में बदलने लगता है।
  • छोटी-छोटी चीजों को पकड़ने लगता है
  • छः माह का बच्चा
  • सात माह का बच्चा
  • आठ-नौ माह का बच्चा अठारह माह का बच्चा
  • दो वर्ष का बच्चा
  • तीन वर्ष का बच्चा
  • चार वर्ष का बच्चा
  • ऊँची का प्रयोग सीखने लगता है।
  • लगभग छः ब्लाक एक के ऊपर दूसरा रख सकता है । कागज पकड़कर फाड़ सकता है

जमीन पर रखी चीजों को उठाने लगता है। तीन-चार ब्लाक (Block) उठाकर एक के ऊपर दूसरा रख सकता है।

अपने आप खाना (Self feeding)-आठ माह के बच्चे को यदि उसकी बोतल दी जाए तो वह उसे स्वयं पकड़ लेता है और नौ माह का होते ही वह बोतल को अपने मुँह से बाहर निकाल कर पुनः मुँह में डाल सकता है। एक वर्ष का बच्चा दोनों हाथों से प्याला पकड़ सकता है और धीरे-धीरे एक हाथ से अपना चम्मच पकड़ कर खाना खाने की कोशिश करता है ।

अपने आप कपड़े पहनना (Self dressing ) – एक वर्ष का बच्चा अपनी जुराबें व जूते उतार सकता है। परन्तु कपड़े पहनना वह देर से सीखता है। साधारणतया 3-4 वर्ष का बच्चा अपने कपड़े स्वयं पहन व उतार सकता है। इस आयु में वह बुश पकड़ कर दांत भी साफ कर सकता है

(4) टाँगों व पैरों के क्षेत्र में क्रियात्मक विकास (Motor development in le and foot region )- टाँगों व पैरों के क्षेत्र में क्रियात्मक विकास होने पर बच्चा रेंगना, खर होना, चलना, दौड़ना, सीढ़ियाँ चढ़ना व उतरना सीखता है।

Q.2. संवेदों के प्रकार संक्षिप्त रूप में समझाइए ।

Ans. संवेदों के प्रकार (Types of emotions )- व्यक्ति के व्यवहार में किसी न किस अंश में संवेद अवश्य विद्यमान होते हैं। जिस प्रकार सुगन्ध दिखाई न देने पर भी फूल में विद्यमा रहती है, ठीक उसी प्रकार हमारे व्यवहार में संवेद व्याप्त रहते हैं। संवेद बच्चे की प्रसन्नता के

बढ़ाने के साथ-साथ उसकी क्रियाशीलता को भी बढाते हैं। विभिन्न संवेदों को दो वर्ग में बाँटा जाता है-

(1) दुःखद संवेद (unpleasent emotions) – क्रोध, भय, ईर्ष्या आदि ।

(2) सुखद संवेद (pleasent emotions) – हर्ष, स्नेह, जिज्ञासा आदि ।

(1) दुःखद संवेद-

(1) क्रोध (Anger ) – शैशवकाल में प्रदर्शित होने वाले सामान्य संवेदों में क्रोध सर्वप्रमुख है क्योंकि शिशु के पर्यावरण में क्रोध करने वाले उद्दीपन होते हैं। शिशु को बहुत जल्दी ही या मालूम हो जाता है कि दूसरों का ध्यान आकर्षित करने के लिए या फिर अपनी इच्छाओं की पूर्ति

करने के लिए जोर से रोकर, चीखकर या चिल्ला कर अपना क्रोध प्रकट करना सबसे आसा तरीका है। यही कारण है कि शिशु केवल भूख या प्यास लगने पर ही नहीं रोता अपितु जय वह चाहता है कि उसकी माता उसे गोद में उठाए तब भी जोर-जोर से रोता है।

जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है तब वह अपने कार्य में बाधा डालने के परिणामस्वरूप में गुस्सा करने लगता है, जैसे जब वह खिलौनों से खेलना चाहे उस समय उसे कपड़े पहनाना, उ कमरे में अकेला छोड़ देना, उसकी इच्छा की पूर्ति न करना आदि ।

प्रायः सभी बच्चों के गुस्सा होने के कारण अलग-अलग हो सकते हैं परन्तु गुस्सा होने है। सभी एक-सा व्यवहार करते हैं; जैसे रोना, चीखना, हाथ-पैर पटकना, अपनी साँस रोक लेना जमीन पर लेट जाना, पहुँच के अन्दर जो भी चीज हो उसे उठाकर फेकना या फिर ठोकर मारन आदि ।

(ii) भय (Fear ) – क्रोध के विपरीत, शिशु में भय पैदा करनेवाले उद्दीपन अपेक्षाकृत कम होते हैं । शैशवावस्था में शिशु प्रायः निम्न स्थितियों में डरता है। अंधेरे कमरे, ऊँचे कमरे ऊंचे स्थान, तेज शोर, दर्द, अपरिचित लोग व जगह, जानवर आदि। जैसे-जैसे शिशु बड़ा होता है उसके मन में भय की संख्या और तीव्रता भिन्न-भिन्न होती है।

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