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Ncert Solutions Home Science Class 12 Chapter 12 Notes In Hindi PDF

Class12th 
Chapter Nameउपभोक्ता शिक्षण एवं संरक्षण | Consumer Education & Protection
Chapter number12
Book NCERT
SubjectHome Science
Medium Hindi
Study MaterialsImportant questions answers
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उपभोक्ता शिक्षण एवं संरक्षण | Consumer Education & Protection


प्रस्तुत अध्याय में उपभोक्ता शिक्षण और संरक्षण के बारे में जानकारी की बातें दी गयी हैं इस संबंध में विशेष रूप से उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 की व्यवस्थाओं का विवेचन किया गया है।

जो व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए वस्तुओं/सेवाओं को खरीदता है, उपभोग करता है उसे उपभोक्ता कहते हैं। उपभोक्ता को विभिन्न समस्याओं का सामना करना पड़ता है । 

जैसे- अस्थिर कीमतें और दुकानदारों के कुचक मिलावट का अर्थ है-मूलवस्तु की गुणवता, आकार और रचना में से कोई तत्त्व निकालकर या डालकर परिवर्तन लाना । दुकानदार वस्तुओं का संचय करके कृत्रिम कमी पैदा कर देते हैं जिसके फलस्वरूप उपभोक्ता को सामग्री की कीमत अधिक चुकानी पड़ती है । 

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प्रतिष्ठित ब्राण्ड की कमियाँ इतनी चतुराई से ढंक दी जाती हैं कि उपभोक्ता असली और नकली लेबल की पहचान नहीं कर सकता । दुकानदार उपभोक्ता को एक खास वस्तु/ब्राण्ड खरीदने के लिए प्रेरित करते हैं, क्योंकि उस ब्राण्ड पर उन्हें अधिक कमीशन मिलता है।

उपभोक्ता को आकर्षित करने के लिए विज्ञापन एक बहुत ही सबल माध्यम है जिसमें कि उपभोक्ता उसे खरीदने के लिए तत्पर हो जाता है। उपभोक्ता शिक्षण से खरीददार को परिवार की आवश्यक सामग्री का सही चुनाव करने में मदद मिलती है । उपभोक्ता को अपने अधिकारों व दायित्वों के प्रति जागरूक होना चाहिए ।

उपभोक्ता के अधिकार-मूल आवश्यकताएँ, जागरुकता, चयन, सुनवाई, स्वस्थ वातावरण, उपभोक्ता शिक्षण तथा क्षतिपूर्ति हैं। उपभोक्ता के लिए अपने अधिकारों और दायित्वों के प्रति जागरूक होना अत्यन्त आवश्यक है। उपभोक्ता शिक्षण से उपभोक्ता को अपने हित की सुरक्षा के लिए बने कानूनों की जानकारी मिलती है।


अति लघु उत्तरीय प्रश्न (VERY SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS)


Q. 1. कॉफी और चाय की पत्ती को दिए जाने वाले मानक चिह्न बताइए |

Ans. (i) कॉफी – I.S.I (ii) चाय की पत्ती Agmark

Q. 2. वस्त्रों का चयन करते समय किन दो बातों का ध्यान रखना चाहिए ? 

Ans. (i) अच्छी टेक्सटाइल मिल द्वारा निर्मित कपड़ा खरीदना । विश्वसनीय फुटकर (Retails) दुकान से खरीदना

Q.3. उपभोक्ताओं के लिए विज्ञापन किन दो प्रकार सहायक होते हैं ?

Ans. विज्ञापन ( Advertisement ) सेवाओं के बारे में ज्ञान प्राप्त करता है। 

(1) विज्ञापन द्वारा उपभोक्ता अनेक पदार्थों एवं

(ii) विज्ञापन द्वारा वह एक हो वस्तु की कई किस्मों की जानकारी रखता है। 

Q. 4. उपभोक्ता की तीन विशेष समस्याओं के नाम लिखिए ।

Ans.

(1) वस्तुओं में मिलावट

(2) वस्तुओं पर अपूर्ण लेबल ।

(3) दोषयुक्त माप बतौल के साधन ।

Q. 5. विभिन्न सेवाओं का चयन करते समय किन दो यातों का ध्यान रखना चाहिए? 

Ans. (1) विषय विशेषज्ञ द्वारा सेवा प्राप्त करना ।

(2) विश्वसनीय स्थान से सेवा प्राप्त करना ।

Q.6. अन्य उपयोगी उपकरणों का चयन करते समय किन दो बातों का ध्यान रखना चाहिए ?

Ans. (1) आई. एस. आई मार्का वाले उपकरण खरीदना ।

(2) खरीदार को विभिन्न कम्पनियों द्वारा निर्मित उपकरणों तथा उनके मूल्यों का न होना। 

Q.7. आम पाउडर (अमचूर) और बिस्कुटों पर मानक चिह्नों के नाम बताइए ।

Ans. (i) कन्डेस्ड दूध – I.S.I (ii) सिरका – F.P.O. 

Q.9. खाद्य पदार्थों का चयन करते समय किन्हीं दो बातों के नाम बताइए ।

Ans. (1) खाद्य पदार्थों को उनके मौसम में खरीदना ।

(2) डिब्बाबन्द खाद्य पदार्थों की सील तथा डिब्बे का निरीक्षण ।

Q. 10. उपभोक्ता संरक्षण का क्या अर्थ है ?

Ans. उपभोक्ता संरक्षण का अर्थ है-उपभोक्ता के हितों की रक्षा। इनके संरक्षण के लिए सरकारी संस्थाएँ, गैर-सरकारी संस्थाएँ व अन्य संस्थाएँ मिल-जुलकर उपभोक्ता के हितों की रक्षा के लिए कार्यरत हैं।

Q. 11. उपभोक्ताओं को पर्चे किन दो प्रकार से मदद करते हैं ?

Ans. पत्रक (Leaflets) – 1. पत्रकों द्वारा उपभोक्ता को बाजार में नई वस्तु के आने का पता चलता है।

2. उसकी विशेषताओं और प्रयोग की विधि के बारे में पता चलता है। कई बार वस्तु के निर्माण के बारे में जानकारी दी जाती है। 

Q. 12. उपभोक्ता संरक्षण से आप क्या समझते हैं ?

Ans. उपभेक्ता संरक्षण संसार के अन्य देशों की भाँति दिन-प्रतिदिन जोर पकड़ता जा रहा है, क्योंकि आज उपभोक्ता विक्रेता को धोखा-धड़ी की प्रवृत्ति से परेशान है । 

उपभोक्ता संरक्षण अर्थात् उपभोक्ता के अधिकारों का संरक्षण, ताकि उपभोक्ता दुकानदारों की कुचालों में न फंस कर अपने धन का पूरा लाभ उठा सके व सन्तुष्टि भी प्राप्त कर सके । उपभोक्ता की दयनीय स्थिति को देखते हुए यह अत्यन्त आवश्यक है कि उपभोक्ता को अधिकतम संरक्षण मिले।

Q. 13. उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम कब लागू हुआ और इससे आप क्या समझते हैं ? 

Ans. उपभेक्ता संरक्षण अधिनियम— उपभोक्ताओं के हितों की बेहतर रक्षा के लिए सरकार ने एक प्रगतिशील विस्तारपूर्ण नियम बनाया जिसे “उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम ल नाम से जाना जाता है । भारत सरकार ने उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम सन् 1986 ई में पारित किया जो 15 अप्रैल सन 1987 जम्मू कश्मीर राज्य को छोड़ कर भारत के सभी राज्यों से क्रियान्वित हुआ।

Q. 14. उपभोक्ता शिक्षण से आप क्या समझते हैं ?

Ans. उपभेक्ता शिक्षण का अर्थ-उपभोक्ता को एक कुशल क्रेता बनाने के लिए उपभोक्ता शिक्षण अत्यन्त महत्वपूर्ण है । एक उपभोक्ता को कुशल खरीदारी करने के लिए उपयुक्त शिक्षण एवं प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है । शिक्षण द्वारा उपभोक्ता का मानसिक विकास होता है, जिससे उसमें तर्क करने की शक्ति बढ़ती है । यही कारण है कि एक सुशिक्षित उपभोक्ता भावनाओं में नहीं फँसता है । उपभोक्ता द्वारा किसी भी उत्पाद या सेवाओं सम्बन्धी सम्पूर्ण जानकारी हासिल करने की प्रक्रिया को उपभोक्ता शिक्षा कहते हैं

Q. 15. उपभोक्ता दिवस कब और क्यों मनाया जाता है ? 

Ans. प्रतिवर्ष 15 मार्च को “उपभोक्ता दिवस” के रूप में मनाया जाता है । उपभोक्ता दिवस का प्रमुख उद्देश्य एक तरफ उपभोक्ता में शुद्ध और गुणवत्तापूर्ण वस्तु लेने की जागरुकता पैदा करना है, तो दूसरी तरफ उत्पादकों को यह अहसास कराना है कि उन्हें अपने उत्पादनों में

प्रमाणित मानकों का प्रयोग करना चाहिए जिससे उपभोक्ता के हितों की रक्षा के साथ-साथ उनका उत्पादन एक उच्च कोटि के स्तर को प्राप्त करे। इससे न केवल भारतीय उपभोक्ता बल्कि अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर विदेशी ग्राहक भी आकर्षित हो सकते हैं।

Q. 16. “उपभोक्ता आन्दोलन” से आप क्या समझते हैं ? 

Ans. उपभोक्ता आन्दोलन वह आन्दोलन है, जो दिन-प्रतिदिन जोर पकड़ता जा रहा है उत्पादकनकर्ता को यह जान लेना चाहिए कि उत्पादों की गुणवत्ता के निर्धारक केवल उपभोक्ता ही हैं। उपभोक्ताओं में गुणवत्ता सम्बन्धी जागरुकता लाना हो उपभोक्ता आन्दोलन का मुख्य उद्देश्य है। 

Q. 17. गुणवत्ता या स्तर नियंत्रण (quality control) क्यों आवश्यक है ? 

Ans. गुणवत्ता या ‘स्तर नियंत्रण’ इसलिए आवश्यक है ताकि उपभोक्ताओं को उनको आवश्यकतानुसार विभिन्न खाद्य पदार्थ एवं वस्तुएँ उचित किस्म एवं स्तर की पिलाना। यह केवल हमारे देश को ही नहीं अपितु पूरे विश्व की समस्या है। 

उपभोक्ता को न्यूनतम स्तर की उचित गुणवत्ता व शुद्धता की मिलावट रहित वस्तु उचित दामों पर मिल सके व उसके हितों की रक्षा। हो सके । स्तर नियंत्रण का कार्य विभिन्न मानकों की स्थापना करके किया जाता है ।

Q. 18. व्यापार चिह्न क्या है (What is Trade Mark ?) 

Ans. प्रायः व्यापारी अपूर्ण लेवल लगा कर उपभोक्ताओं को धोखा देने की कोशिश करते। यह किसी भी कम्पनी द्वारा दिया गया चिह्न होता है जो बेची जाने वाली वस्तुओं पर लगाया जाता है । प्रत्येक कम्पनी की पहचान है जैसे ‘किसान’ यह कम्पनी का व्यापार चिह्न है।

Q. 19. उपभोक्ता शिक्षण का मुख्य उद्देश्य क्या है ?

Ans. उपभोक्ता शिक्षण का मुख्य उद्देश्य उपभोक्ता को बाजार से क्रय सम्बन्धी व्यावहारिक ज्ञान प्रदान करना है । जैसे वह विभिन्न वस्तुओं का चुनाव करते समय, क्रयं सम्बन्धी विभिन्न निर्णय कैसे ले आदि ।


लघु उत्तरीय प्रश्न (SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS)


Q. 1. गुणवत्ता की दृष्टि से एक सिली-सिलाई सलवार कमीज / फ्राक खरीदने से पहले आप कौन-सी छः बातों का निरीक्षण करेंगे ? 

Ans. (1) अच्छी टेक्सटाइल मिल द्वारा निर्मित कपड़ा खरीदना । उत्तम स्तर के कपड़े के लिए हमेशा अच्छी टेक्सटाइल मिल द्वारा निर्मित कपड़े खरीदने चाहिए ।

(2) आजकल तैयार वस्त्रों का चलन बहुत हो गया है और नयी कम्पनियों वस्त्र तैयार करने

(3) कपड़े की किस्म और सिलाई देख लेनी चाहिए ।

(4) इन्हें बनाने के लिए बहुत अच्छी किस्म के कपड़े तथा सिलाई के लिए अच्छे धागों का प्रयोग होना चाहिए

(5) कई बार धोने पर इसका रंग निकल जाता है या सिलाई उपड़ जाती है या फिर फिटिंग ब्रेक न होने के कारण ये शीघ्र ही फट जाते हैं। अतः केवल अच्छी कम्पनियों द्वारा निर्मित तैयार कपड़े खरीदने चाहिए ।

(6) सेल आदि से कपड़े की किस्म की पूर्ण जानकारी करने के परवात् कपड़ा खरीडा। विश्वसनीय फुटकर (Retail) दुकान से खरीदना ।

2. भ्रामक विज्ञापन के दो गुण बताइए और ऐसे विज्ञापन का एक उदाहरण भी दीजिए।

Ans. भ्रामक विज्ञापन के दो गुण- 1. उपभोक्ता को आकर्षित करने के लिए विज्ञापन की सहायता ली जाती है तथा यह एक बहुत सबल माध्यम है।

2. वस्तु का विज्ञापन इतनी चतुराई से किया जाता है कि उपभोक्ता उसे खरीदने के लिए उत्पर हो जाता है।

उदाहरणतया चॉकलेट, चिप्स, ठण्डे पेय, जूस, जीन्स, टूथपेस्ट, अन्य साज-सज्जा के सामान और स्कूटर, गाड़ियाँ इत्यादि से सम्बन्धित विज्ञापन से अधिकतर किशोर उपभोक्ता आकर्षित हो जाते हैं। जब कोई वस्तु विज्ञापित गुणों पर खरी नहीं उतरती तो उपभोक्ता निराश हो जाते हैं।

Q.3. दुकानदार मिठाई के साथ डिब्बा भी तोल रहा है। इस संदर्भ में एक उपभोक्ता होने के नाते आपके दो कर्त्तव्य कौन-कौन से है ? 

Ans. (1) दोषयुक्त माप व तौल के साधनों के प्रयोग को रोकने के लिए यदि सहमद हों तो क्षतिपूर्ति प्राप्त कीजिए तथा कुचक्रों के विरुद्ध आवाज उठाइए ।

(2) दिल्ली में उपभोक्ता पत्रों और टेलीफोन नम्बरों पर दोषपूर्ण वजन और तौल की शिकायत कर सकते हैं

Q.4. आई. एस. आई चिह्न का एक कार्य बताइए उस संस्था का नाम लिखिए जो यह चिह्न प्रदान करती है तथा ऐसी चार खाद्य वस्तुओं के नाम लिखिए जिन पर यह चिह्न पाया जाता है।

Ans. I.S.I. (ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैण्डंस (Bureau of Indian Standard Act. 1986) एक्ट को 1986 से संसद द्वारा पास किया गया जिसमें इंडियन स्टैण्डर्ड्स इंस्टीटयूट सर्टिफिकेशन मार्क्स एक्ट, 1957 (Indian Standard Institute Certification Marks Act 1957) को विस्थापित किया गया। यह मार्क कई पदार्थों को दिया जाता है, जैसे-वनस्पति, सीमेन्ट, LPG स्टोव, प्रेशर कुकर, बिजली के उपकरण आदि। इस संस्था का कार्य कारखानों में बने पदार्थों एवं उपकरणों के लिए नियमित गुणवत्ता प्रदान करना है। 

Q.5. मसाले खरीदते समय आप किस पर अधिक विश्वास करेंगे, विज्ञापन पर अथवा लेवल पर ? अपने उत्तर के दो कारण लिखिए ।

है Ans. मात्र लेवल, आकर्षक विज्ञापन मसालों की गुणवत्ता, शुद्धता तथा स्तर की गारण्टी नहीं । हम लेबल देखेंगे कि उस पर EPO का मानक चिह्न लगा है या नहीं। यह किसी प्रसिद्ध तया

उच्च स्तरीय कम्पनी का उत्पाद है या नहीं । यह किसी हानिकारक मिलावट से युक्त तो नहीं है। 

Q.6. बिजली के उपकरणों का प्रयोग करते समय दुर्घटना से बचने के लिए आप किन चार बातों का ध्यान रखेंगे ।

Ans. (1) विश्वसनीय दुकान तथा बाजार से खरीदना । आई मार्क वाले उपकरण खरीदना ।

(2) आई. एस. 

(3) अच्छी विश्वसनीय कम्पनी द्वारा निर्मित उपकरण खरीदना ।

(4) खरीददार को विभिन्न कम्पनियों द्वारा निर्मित उपकरणों तथा मूल्यों का ज्ञान हो

(5) उपकरण पर लगी मोहर का निरीक्षण करना ।


दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (LONG ANSWER TYPE QUESTIONS)


Q.1. आहार अधिनियम क्या है ?

Ans. विश्व स्वास्थ्य संगठन (W.H.O.) तथा खाद्य एवं कृषि संगठन (E.A.O.) आपसी सहयोग से “कोडेक्स एलिमेन्टेरियस कमीशन (Codex Alimentarious Commission) की स्थापना की गयी। इसका मुख्य कार्य खाद्य पदार्थों के स्तर से सम्बन्धित मानक-नि रित करना है। यह स्तर न्यूनतम तथा उच्चतम होते हैं ।

1. एफ. पी. ओ. (F.P.O.)—–— भारतीय सरकार ने फल-सब्जियों से बने, तैयार बेचे वाले खाद्य पदार्थों के अधिनियम की धारा III (Section III of Essential Commodities Act) के अन्तगर्त इस नियम को संशोधित करके 1955 ई. में इसे लागू किया । एफ. पी. अ के अन्तर्गत फल-सब्जियों से बने पदार्थ आदि के लिए न्यूनतम मान्य नियम दिये गये है जैसे-जैम, जैली, मुरख्या, स्क्वैश, अचार, साँस आदि । इस नियम के अनुसार बाजार में बेचे जाने वाले फल-सब्जी से खाद्य पदार्थ तैयार करने के पहले प्रत्येक निर्माता को चाहिए कि वह एफ. पी. ओ लाइसेंस ले तथा यह मार्क लेबल पर लगाए

इन खाद्य पदार्थों को तैयार करते समय इस कानून में दिये गये न्यूनतम मान्य नियमों का पालन करना अनिवार्य है । यदि कोई निर्माता इन नियमों का पालन नहीं करता है तो उसके द्वारा तैयार किये गये खाद्य पदार्थ को घटिया ( Sub-Standard) घोषित किया जाता है । यदि वह दुबार ऐसा करता है तो उसे उचित सजा दी जाती है ।

एफ. पी ओ के उद्देश्य इसका मुख्य उद्देश्य फल-सब्जी से बने संरक्षित पदार्थों न्यूनतम स्तर को बनाये रखना है। इसके लिए लाइसेंस देने से पहले निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखा जाता है-

1. कारखानों के पास गन्दा नाला नहीं होना चाहिए। गाय, भैंसों वातावरण शुद्ध तथा स्वच्छ होना चाहिए ।

की डेयरी नहीं होनी चाहिए।

2. कारखानों की खिड़की तथा दरवाजों पर जाली जरूर लगी होनी चाहिए ।

3. कारखाना ऐसी जगह पर होना चाहिए जहाँ पर भीड़-भाड़ न हो।

4. कारखानों में पानी का उचित प्रबन्ध होना चाहिए। पानी को ऐसी जगह पर संग्रह करन चाहिए जिससे वह स्वच्छ रहे।

तैयार खाद्य पदार्थों को उचित ढंग से संग्रह करने की व्यवस्था की जानी चाहिए। एफ. पी. ओ. से सम्बन्धित अधिकारी एक बार लाइसेन्स देने के बाद कारखानों का समय-समय पर निरीक्षण करते हैं। तैयार खाद्य पदार्थों की जाँच समय-समय पर की जाती है।

खाद्य पदार्थ के घटिया किस्म के पाये जाने पर निर्माता को सचेत किया जाता है और उसके द्वारा उन निर्मित पदार्थों के डिब्बों व शीशियों को रद्द कर दिया जाता है। इसके बाद भी यदि निर्मात के द्वारा निर्मित खाद्य-पदार्थ में कोई परिवर्तन नहीं आता तो उसका लाइसेन्स जब्त कर लिया जाता है।

निम्नलिखित खाद्य-पदार्थों के लिए एफ. पी. ओ. मार्क दिया जाता है-

1. जैम, जैली, मार्मलेड ।

2. अचार, चटनी, मुरब्बा । 

3.कृत्रिम सिरका ।

4. स्ववैश तथा शवंत ।

5. जमे हुए फल व सब्जियाँ (Frozen fruits and vegetables)

6. ग्लेन्ड फल व कैंडीड (Candied and glazed fruits)

7. सूखे फल व सब्जियाँ । 

8. फलों का पेय ।

9.कार्बन युक्त पेय पदार्थ-कोला पेय ।

10. संरक्षित फल ।

इस प्रकार पी. एफ. ए. तथा एफ. पी. ओ. कानूनों का मुख्य लक्ष्य बाजार में बेचे जाने। माखाद्य पदार्थों के लिए न्यूनतम मान्य नियम देना है। 

2. आई. एस. आई. मार्क (I.S.I. Mark) — आई. एस. आई॰ मार्क भारतीय मानक संस्थान (Indian Standard Institute) द्वारा उत्पादनों की उत्कृष्टता के लिए दिया गया मानपत्र है। देश के मुख्य संगठनों में भारतीय मानक संस्थान का एक महत्त्वपूर्ण स्थान है। इसकी 1 1947 में हुई थी। यह स्थापना औद्योगिक, वैज्ञानिक एवं तकनीकी संगठनों की सहायता है। 

भारतीय मानक संस्थान राष्ट्रीय स्तर का संगठन है। इसका मुख्य कार्य विभिन्न पदार्थ की किस्म को उत्तम बनाये रखना है। इसके लिए यह संस्थान विभिन्न क्षेत्रों के.. शेतकी सहायता से इन खाद्य पदार्थों के लिए समय-समय पर अपने मान्य नियम बनाता खता है- •

 आई. एस. आई. के लक्ष्य एवं उद्देश्य निम्नलिखित हैं-

(i) खरीदी व बेची जाने वाली वस्तुओं, उत्पादनों व स्तर सामग्री और प्रक्रिया सम्बन्धी सनक तैयार करना ।

(ii) औद्योगिक उत्पादनों को प्रामाणित करना ।

(ii) उत्तम किस्म के उत्पादनों में सहायता ।

(iv) मानकीकरण के विषय में सूचना देना ।

यह मानक तैयार करते समय खाद्य पदार्थों की बाहरी रंग-रूप व संरचना आदि विभिन्न बातों का ध्यान रखा जाता है। आवश्यकता पड़ने पर खाद्य पदार्थों में उपस्थित जीवाणुओं की मात्रा आदि को भी ध्यान में रखा जाता है।

सन् 1952 ई. में लागू किये गये तथा 1961 में संशाधित किये आई. एस. आई. सर्टिफिकेशन मार्क अधिनियम (L.S.I. Certification Mark Act) के अधीन इस संस्थान द्वारा विभिन्न खाद्य पदार्थों के उत्पादकों को आई. एस. आई मार्क की सुविधा उपलब्ध है । लेकिन आई. एस. आई. मार्क लगवाने के लिए उत्पादक (Manufacturer) को भारतीय मानक संस्थान से सम्पर्क स्थापित करना पड़ता है, लाइसेन्स (Licence) प्राप्त करना पड़ता है । उत्पादक को

लाइसेंस तभी मिलता है जब वह निम्नलिखित शर्तों को पूरा करते हैं- 

1. खाद्य पदार्थों के स्तर को भारतीय मानक संस्थान द्वारा निर्धारित मानकों को अनुरूप रखा गया हो । 

2. खाद्य पदार्थों का संरक्षण संस्थान द्वारा बतायी गयी प्रविधियों द्वारा किया गया हो । 

3. खाद्य पदार्थों के स्तर निर्धारण की जाँच आई. एस. आई. द्वारा प्रस्तावित विधि के अनुसार की गयी हो । भारतीय मानक संस्थान के निरीक्षक भी आई. एस. आई मार्क वाले खाद्य पदार्थों की

उत्तमता को बनाये रखने के लिए समय-समय पर (नियमित और आकस्मिक रूप से) इनका निरीक्षण करते रहते हैं। यह निरीक्षण खाद्य पदार्थों के लिए किया जाता है। यदि कोई वस्तु घटिया निकल जाये तो उपभोक्ता उसे बिना कोई मूल्य दिये बदलवा सकता है। उत्पादनों के परीक्षण के लिए भारतीय मानक संस्थान की अनेक प्रयोगशालाएँ हैं ।

आई. एस. आई मार्क निम्नलिखित वस्तुओं पर लगाया जाता है-

खाद्य पदार्थ-

1. पाउडर दूध ।

2. कन्डेन्स्ड दूध (Condensed milk) 

3. पनीर (cheese)

4. कस्टर्ड पाउडर (Custard powder) 

5. अरारोट (Arrowroot) |

6. साधारण नमक (Common salt) 

7. विभिन्न प्रकार के बिस्कुट (Biscuits) 

8. बेकिंग पाउडर (Baking powder) 

9. शिशु आहार (Baby food) |

10. सेवायों, मैकनी, स्मैगटी, पापड़ (Vermicelli, Macroni, Speghatti Pappad) |

11. कॉफी पाउडर, कोको पाउडर (Coffee powder, Coco powder) T

12. आइस क्रीम (Ice-cream)।

13. पानी वाली चॉकलेट ।

14, रग, बीयर, ह्विस्की, जिन, ब्रांडी (Rum, Beer, Whisky, Gin, Brandy)।

परेलू जीवन में प्रयोग में आने वाले उपकरण-

1. प्रेशर कुकर (Pressure Cooker)।

2. बिजली के पंखे, रेग्युलेटर (Electric Fan, regulartor)

3. बिजली की थी (Electric Iron) ।

4. बिजली की मिक्सी ( Mixers) |

5. बिजली की केवली (Electric Kettle)

6. बिजली के स्विच और रेगूलेटर (Electric Switch and regulator) ।

7. गैसीय चूला तथा कुकिंग रेंज (Gas Stove and cooking range) ।

8. बिजली का तन्दूर कुकिंग रेंज (Electric oven and cooking range) T भारतीय मानक संस्थान (I.S.I.) द्वारा निर्धारित सामान्य सिद्धान्त (General Prin

1. किसी भी लेबल के ऊपर सम्बन्धित सामग्री के बारे में गलत, भ्रामक, कपटपूर्ण या अन्य गलत असर छोड़ने वाली बातें प्रदर्शित नहीं की जाएँ ।

2. किसी भी भोज्य पदार्थ के बारे में ऐसा कुछ नहीं लिखा जाए जिससे किसी दूसरी तरह के भोज्य पदार्थ की कल्पना उभरे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भी ऐसा कुछ न लिखा जाए

3. इस लेबल पर उस नियम अधिनियम का कोई भी संदर्भ नहीं दिया जाए जो प्रत्यक्ष रूप से अथवा पूरी तरह से ऐसी गुणवत्ता का विरोध करता हो अथवा दावा की गयी घोषणा विवरण

आदि को संशोधित करता हो । पहले से पैक किये भोज्य पदार्थों के लेबलों पर उस भोज्य पदार्थ के बारे में निम्नांकित जानकरी दी जाये-

1. खाद्य का नाम

2. उसमें क्या तत्व है, उनकी सूची

3. शुद्ध भार

4. निर्माता का नाम, पता

5. निर्माता देश

6. भाषा

7. बैच संख्या/कोड नं.

8. भण्डारण के लिए निदेश

9. बनाने की तिथि

10. स्थानीय करों को छोड़कर सर्वाधिक मूल्य

एक अच्छी लेबल पर स्पष्ट शब्दों में संक्षेप में तथा सरल भाषा में सभी जानकारी देनी चाहिए। ताकि उसे समझने के लिए उपभोक्ता को कोई तकनीकी ज्ञान की जरूरत न पड़े। सूचनात्मक लेबल लगाना अच्छा होता है। इससे भोज्य पदार्थ के बारे में, उसकी सेवा, गुण

के बारे में सही जानकारी मिलती है। यह सामग्री किस तरह प्रयोग में लाई जाए या इसकी देखभाल कैसे की जाए आदि भी लेवल पर होना चाहिए। इससे ग्राहकों को सन्तोष होता है और कम्पनी

की ईमानदारी नजर आती है। इसलिए वह बार-बार भी उसी चीज को खरीदता है स्तर पर लेबल (Grade Labelling) — इस तरह की लेबल में गुणवत्ता की कमी से कम विशिष्टताओं के अनुरूप सामग्री  होनी चाहिए। इससे स्तर भी बनता है और किसी मान्य संस्था द्वारा उसकी जाँच भी की जा सकती है । 

नियमानुसार बना है या नहीं, पश्चिमी देशों में यह प्रणाली है। वहाँ डिब्बाबन्द भोज्य पदार्थ की जाँच की जाती है। भारत में डिब्बाबन्द चीजों के लिए तो नहीं, मगर सुपर बाजार, सहकारी भण्डारों में दालों के मामले में ऐसा होता है। छाप (ब्रांड) का नाम लेबिल पर (Brand Labelling) – इस प्रकार की लेबल एक सुस्थापित प्रथा है। निर्माता लोग अपने उत्पादनों के विज्ञापन हेतु इन्हें अपनाते हैं।

ट्रेड मार्ग ( Trade Mark) एक शब्द चित्र, प्रतीक के रूप में हर एक निर्माता अपनी बनाई सभी चीजों को पैकिंग पर लगाता है। इससे वह उत्पादन और निर्माता दोनों अलग चमकते हैं। कुछ मशहूर ट्रेड मार्क हैं-ताली छाप तेल, इन्द्र धनुष, पोस्टमैन तेल, मोर छाप तम्बाकू, रथ घी ।

“यदि निम्नांकित बातों में से कोई बात सही हो तो उस भोज्य पदार्थ को गलत लेबल वाली सामग्री माना जाएगा-

11. यदि वह लेवल झूठा या भ्रामक है। किसी दूसरे भोज्य पदार्थ के नाम से बेचा जा रहा

3. यदि जानकारी किसी दूसरे भोज्य पदार्थ की है। उस हालत में निर्माता को लेबल के ऊपर ‘सूचना’ छपवानी चाहिए तत्पश्चात् सूचित भोज्य पदार्थ का नाम देना चाहिए ।

4. यदि पैकिंग के डिब्बे आदि इस ढंग से बनाये जाएँ जिससे किसी दूसरे भोज्य पदार्थ का भ्रम हो

5. यदि पैकेज फार्म से हो पता चले कि वह किस निर्माता द्वारा, किस स्थान पर बनी है। तथा उस तरह का लेबल न लगा हो ।

6. यदि लेबिल पर आवश्यक सूचना सहज व अच्छे ढंग से नहीं दी गयी हो । 

7. यदि इस पर नकली रंग या रासायनिक संरक्षण पदार्थ बने हों और वैसा ही लेबल न हो ।

8. यदि वह भोज्य पदार्थ जिसके लिए एक खास स्तर परिमाणित हो चुका है, निर्माता पहले जैसा माल नहीं बनाता।

विज्ञापन ( Advertisement)- उपभोक्ताओं को अपने माल को सूचना देने और बिक्री बढ़ाने के उद्देश्य से निर्माता लोग विज्ञापनों का सहारा लेते हैं। विज्ञापनों का अच्छा असर सभी उपभोक्ताओं पर पड़ता है। खासतौर से जबकि विज्ञापन देखने में अच्छे, सचित्र व अच्छे शब्दों या नारों के रूप में हों। उपभोक्ताओं के लिए यह एक महत्व की बात है कि ये विशेष रियायती बिक्री छूट आदि से अकर्षित न हों।

ऐसी विशेष बिक्री के स्थलों तक यात्रा करने में जो खर्च होता है, उससे छूट का लाभ बराबर हो जाता है। दूसरी ओर, होशियार खरीददार नए उत्पादनों पर नजर रखता है और निर्माताओं का यह फर्ज बनता है कि ये अपने माल की बिक्री बढ़ाने के उद्देश्य से झूठा और भ्रामक प्रचार न करें ।

मानकीकरण (Standardization) माननीकरण या प्रमाणन ही एकमात्र ऐसा तरीका है। जिससे गुण नियन्त्रण लागू किया जा सकता है। यह इसलिए किया जाता है कि भोज्य पदार्थ का न्यूनतम स्तर बना रहे। यह प्रमाणन सरकार तथा कुछेक स्वयंसेवी संस्थानों द्वारा भी किया जाता है। विश्वव्यापी खाद्य मानक कार्यक्रम को चलाने का कार्य अन्तर्राष्ट्रीय संहिता एलमेन्टा कमीशन द्वारा किया जाता है। 

यह कार्य FAO और WHO (विश्व स्वास्थ्य संगठन) के अन्तर्गत चलाये जाते हैं। आयोग का कार्य अन्तर्राष्ट्रीय स्तर निर्धारित करना है जो खुद आयोग द्वारा बनाये सिद्धान्तों के अनुसार होता है। इनका लक्ष्य यही है कि उपभोक्ता का स्वास्थ्य सुरक्षित रहे तथा भोज्य पदार्थों के व्यापार में सही प्रथाएँ चलती रहें। 

इस संहिता में सभी मुख्य भोज्य पदार्थों के स्तर निर्धारित करना, उनका मानकीकरण करना शामिल है और सभी तरह के, प्रक्रिया युक्त अथवा अर्द्ध प्रक्रिया युक्त या कच्चे माल इसमें आ जाते हैं। खाद्य स्वास्थ्य रक्षा, उनमें मिलाई जाने वाली चीजें, कीटनाशक, उनका शेष भाग, दोषपूर्ण होना, लेबल लगाना, प्रस्तुतीकरण, उनके नमूने भरने और गुण-दोषों का विवेचन करने के तरीके आदि सभी बातें इसकी सीमा में आती हैं।

भारत में वर्तमान खाद्यमानक इन्हीं अन्तर्राष्ट्रीय नियमों पर आधारित हैं यद्यपि आवश्यकतानुसार इनमें थोड़ा-बहुत संशोधन, परिवर्द्धन किया गया है। ऐसे खास खास नाम हैं-मिलावट निरोध अधिनियम, फल उत्पाद आदेश, एगमार्क, भारतीय मानकीकरण संस्थान के निर्धारित स्तर (विवरण)

गुणवत्ता मानक (Quality Standards) में उस सामग्री विशेष का विवरण, भार, शुद्ध वजन, सही आकार, लम्बाई-चौड़ाई, पदार्थ की रूपरेखा तथा दूसरे गुण होते हैं ।

Q. 2. आपने बाजार से जो दाल खरीदी है यह धोने पर बहुत रंग छोड़ती है। इसका क्या कारण हो सकता है ? आप इसे कैसे परखेंगे ? ऐसी दाल के सेवन से स्वास्थ्य पर क्या कुप्रभाव हो सकते हैं ?

Ans. वह दाल जो धोने पर बहुत रंग छोड़ती चढ़ाया गया है जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है है निसंदेह मिलावट युक्त है। उस पर रंग वास्तव में दाल बहुत पुरानी है। गली सड़ी है या उसे कीड़ा लगा हुआ है। उसे छुपाने के लिए मेटानिल बेलो नामक रंग से रंगा गया है। रंग फास्टमीन तथा लैंड ब्लैक भी हो सकते है। ये रंग अमाशय तथा औत की झिल्ली को प्रभावित करते हैं जिससे उनमें अल्सर तथा ट्यूमर उत्पन्न हो सकते हैं।

Q. 3. उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 के अनुसार उपभोक्ता के अधिकार क्या हैं ? लिखिए । 

Ans. उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 के अनुसार उपभोक्ता के अधिकार-

(1) मूल आवश्यकताएँ इसके अन्तर्गत न केवल जीने के लिए बल्कि सभ्य जीवन के लिए सभी आवश्यकताओं की पूर्ति आती है। ये आवश्यकताएँ हैं-भोजन, मकान, कपड़ा, बिजली पानी, शिक्षा और चिकित्सा आदि है।

“(2) जागरुकता – इस अधिकार के अन्तर्गत चयन के लिए आपको विक्रेताओं द्वारा सही जानकारी देना ।

(3) चयन उपभोक्ताओं को सही चयन करने के लिए उचित गुणवत्ता और कीमत वाली कई वस्तुओं को दिखाना ताकि वे उनमें से उपयुक्त यस्तु खरीद सकें ।

(३) सुनवाई – इसके अन्तर्गत उपभोक्ता को अपने विचार निर्माताओं के समक्ष रखने का अधिकार है। उपभोक्ता की समस्याओं से निर्माताओं को वस्तु-निर्माण में उसकी गुणवत्ता बढ़ाने सहायता मिलती है।

 (5) स्वस्थ वातावरण – इससे जीवन और प्रकृति में सामंजस्य स्थापित करके जीवन स्तर ऊंचा किया जा सकता है ।

(6) उपभोक्ता शिक्षण सही चयन के लिए वस्तु/ सामग्री और सेवाओं की उचित जानकारी का ज्ञान का अधिकार उपभोक्ता को मिलना चाहिए ।

(7) क्षतिपूर्ति (Redressal ) – इसका अर्थ है कि यदि उचित सामान प्राप्त न हुआ हो उसका उचित परिशोधन या मुआवजा मिलने का अधिकार। जिस भी उपभोक्ता के साथ हो अन्याय हुआ हो वह अधिकारों के पास जाकर उचित क्षतिपूर्ति ले सकता है ।

Q. 4. एक नागरिक का मिलावट के प्रति क्या रवैया होना चाहिए ? 

Ans. 1. प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह मिलावट को रोकने में मदद करे। मिलावट को घटना को अनदेखा न करे । उनका पर्दाफाश करने तथा निन्दा करने में सक्रिय भाग ले ।

2. इसके दुष्परिणामों के बारे में अन्य उपभोक्ताओं को अवगत कराये । 

3. सरकारी सहायता से मिलावटी आहार को बनने से रोके। इसकी जाँच रिपोर्ट छपवाये। 

4. यदि बाजार में मिलावटी आहार देखे तो सम्बन्धित अधिकारियों को सूचित करे तथा दोषी व्यक्तियों के विरुद्ध उचित कार्यवाही करे। मिलावटी आहार को न बिकने दे । 

5. आहार नियम लागू करने में तथा इसमें पाई जाने वाली कमियों के बारे में सरकार को अवगत कराये तथा इन्हें दूर करने में सरकार का सहयोग करे ।

6. अन्य उपभोक्ताओं को मिलावट की जाँच के बारे में शिक्षित करें। विद्यालयों तथा विद्यालयों में भी इस विषय को पढ़ाई का एक विषय बनवायें तथा अपने बच्चों को भी इस बुराई का सामना करने के लिए प्रेरित करे ।

7. बाजार में उपलब्ध वस्तुओं के विषय में जानकारी रखे दोस्तों, रिश्तेदारों, पड़ोसियों बात करके एवं अखबार पढ़कर विज्ञापन देखकर ।

कोई भी वस्तु खरीदने से पहले दो-तीन दुकानों पर उसे देखकर परख ले व तुलना कर से

9. वस्तु खरीदते समय FPO, ISI Agmark आदि के चिह्न देख ले। 10. लेवल पढ़कर वस्तु खरीदे । दवाइयों पर दिनांक देख ले।

11. डीलर्स (Dealers) द्वारा दी जा रही Demostration को देखे और मानी हुई दु से वस्तुएँ खरीदे । घर-घर बेचने वाले व्यक्तियों से सावधान रहें ।

12. यदि किसी बड़ी कम्पनी का माल खराब निकलता है तो उसे वापस कर सकते है यदि दुकानदार वापस न ले तो उपभोक्ता किसी उपभोक्ता संगठन की मदद ले सकता है।

13. यदि उपभोक्ता के साथ किसी प्रकार का अन्याय हुआ है तो उसकी सुनवाई अद होनी चाहिए । सरकार की नीति के अनुसार उपभोक्ता को हमेशा सही माना जाता है।

14. नुकसान होने की हालत में उपभोक्ता को मुआवजा प्राप्त होता है। अक्सर दुकानद की मोठी बातों में आकर धोखा खाने को बाध्य हो जाता है जैसे बढ़िया चीज दिखाकर पटिए । 1 चीज दे देना। ऐसी हालत में उपभोक्ता को मुआवजा प्राप्त करने का पूरा अधिकार है। 15. उपभोक्ता को आहारीय मिलावट के सरल टेस्ट का ज्ञान होना चाहिए ।

Q.5.आपने बाजार से सरसो का तेल खरीदा है जिसमें प्राकृतिक सुगन्ध नहीं है। इसका क्या कारण हो सकता है ? आप उसका पता कैसे लगायेंगे? इसके सेवन से स्वास्थ्य पर क्या कुप्रभाव हो सकता है ?

Ans. बाजार से खरीदा गया वह सरसो का तेल जिसकी प्राकृतिक सुगन्ध नहीं है आजमंत के तेल से अपमिश्रित (मिलावटी ) हो सकता है। इस तेल को आर्जीमोन मैक्सीकाना, पीला कँटीला धतूरा नामक जंगली पौधे के बीजों से निकाला जाता है। सरसो के तेल में इसकी मिलावट की जाँच करने के लिए निम्न सरल परीक्षण किया जा सकता है। 

एक परखनली में 10 मिली मिलावट युक्त अपमिश्रित तेल लें। इसे गरम करके रंगहीन व पारदर्शक बनाएँ । फिर इसमें कुछ बूँदें सान्द्र नाइट्रिक अम्ल की डालें। यदि भूरा या लाल रंग आता है तो तेल मिलावटी है इसमें आजमोन का तेल मिलाया गया है। इसका सेवन करने पर अमाशय व आंतों में बड़े-बड़े अर हो जाते हैं। जो कई बार घातक भी हो सकते है ।

Q.6. खाद्य विक्रेता दुराचरण किस प्रकार करते हैं ? 

Ans. खाद्य विक्रेताओं के दुराचरण – जब सम्मरण से माँग ज्यादा होती है तो विक्रेत दुराचरण पर उतारू हो जाते हैं जिससे उपभोक्ता की आर्थिक स्थिति और स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है । ग्राहक को इस तरह ठगा जाता है- 

1. मिलावट से (Adulteration)।

2. दोषपूर्ण बाट और माप से (Defective Weight & Measures) । 

3. अपूर्ण लेबलों से (Inadequate Labelling) 

4. झूठे विज्ञापनों से (False Advertisements) उपभोक्ता की कोशिश यही होती है कि वह अपने पैसे से ज्यादा, अच्छा और बढ़िया मास खरीद सके । 

अपने पैसे को ठीक कीमत पाने की दृष्टि से उपभोक्ता को विभिन्न बाजारों में प्रचलित दरों की जानकारी होनी चाहिए। इसका सबसे अच्छा तरीका यह है कि नगरों में प्राप्त अनेक सरकारी भण्डारों (Stores) का लाभ उत्एँ । 

सामान खरीदने के लिए किसी सहकारी स्टोर को चुना जाए, यह इस शर्त पर निर्भर है 15 वहाँ ग्राहकों को क्या सुविधाएँ दी जाती हैं-जैसे कि मूल्य प्रदर्शन, विनम्रता, घर पर माल पहुँचाने की सुविधा और

उधार की सुविधा आदि । दोषपूर्ण बाट और मापक (Defective Weights and Measures ) – अप्रैल, 1955 में भारतीय संसद ने एक प्रस्ताव मंजूर किया जिसके अन्तर्गत दशमलव प्रणाली तथा सब जगह एक जैसी नाप, बाट आदि मीट्रिक प्रणाली में चलाये गये । 

1956 के अन्त तक बाट और नाप स्तर विधेयक (Bill) पास कर दिया गया । ऐसे स्तर निर्धारित किये गये बल्कि बाट और नाप कैसे हों, यह भी सुनिश्चित कर दिया गया ।

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