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Home Science Class 12 Chapter 2 Notes In Hindi PDF

Class12th 
Chapter Nameशैशवकाल के निवारणात्मक रोग से बचा | Protection from Preventab Disease of Childhoo
Chapter number02
Book NCERT
SubjectHome Science
Medium Hindi
Study MaterialsImportant questions answers
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शैशवकाल के निवारणात्मक रोग से बचा | Protection from Preventab Disease of Childhoo


उपायों के संबंध में जानकारी प्रस्तुत की गयी है। शैशव काल में शिशु में विभिन्न प्रकार यो प्रस्तुत अध्याय के अन्तर्गत बच्चों के शिशु काल में होने वाले रोगों और उनसे बचाव संक्रामक रोग पाये जाते हैं। जब रोगों के जीवाणु प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से शरीर में प्रवेश कर स्वस्थ शरीर में रोग उत्पन्न करते हैं, तो उसे संक्रमण कहते हैं । 

इस प्रकार उत्पन्न रोग संक्रामक रोग कहते हैं । संक्रामक रोग शरीर के जीवाणु अथवा विषाणु द्वारा फैलते हैं । जीवा से फैलने वाले रोग डिपथीरिया, क्षय रोग, कुकरखाँसी हैं। विषाणु से फैलने वाले रोग बड़ी चेचा छोटी चेचक, खसरा, इन्फ्लूएंजा तथा पोलियो है। व्यक्ति की रोग व मृत्यु से लड़ने की क्षम को रोध क्षमता कहते हैं। यह दो प्रकार की होती हैं। प्राकृतिक और उपार्जित ।

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शिशुओं को विभिन्न प्रकार के टीकाकरण लगाए जाते हैं जो इस प्रकार हैं- (i) बी. स जी० (ii) डी० पी० टी० डिप्थीरिया परट्यरिया, टेटनस । (iii) पोलियो । (iv) एम. एवं आर.-खसरा, गलसुआ तथा रूबैला।

शैशवकाल के कुछ रोग हैजा, अतिसार, पेचिश, इन्फ्लुएन्जा और सर्दी-जुकाम, कान-द आँख दुखना, शीतला, खर्जु फोड़े, सूजकृमि संक्रमण हैं। संक्रमण के माध्यम वायु, जल, भोज संपर्क, कोड़े हैं। रोगों से सुरक्षा के लिए नियमित समय पर टीका लगवाना व पूरी खुराक दे आवश्यक है। 

माता का दूध बच्चों को बीमारियों से बचाता है क्योंकि उसमें रोगाणुओं के प्रवे होने की संभावना नहीं होती । इसीलिए माता का दूध बच्चों के लिए अमृत माना जाता है। सर्वोत्तम आहार है ।


अति लघु उत्तरीय प्रश्न (VERY SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS)


Q. 1. किस आयु में शिशु को बीसीजी और खसरे के प्रतिरक्षी टीके लगवाये जाते हैं ?

Ans. शिशु को बी. सी. जी. का टीका तीन माह की आयु पर और खसरे या ( Gama Globulin) का टीका नौ महीने की आयु पर लगाया जाता है ।

Q. 2. हैजा (Cholera) के दो प्रमुख लक्षण लिखें जिनके द्वारा रोग पहचाना जा सकता है।

Ans. हैजा पाचन-क्रिया-संबंधी रोग है जिसमें तीव्र, पतले दस्त (Rice Watery Stools) लग जाते हैं। उल्टियाँ भी लग जाती हैं ।

Q.3. डी. पी. टी. का पहला टीका कब लगता है ?

Ans. 1½ मास की आयु में डी. पी. टी. का पहला टीका लगता है।

Q. 4. प्रतिरक्षण की परिभाषा लिखें ।

Ans. प्रतिरक्षण (Immunizaton ) – व्यक्ति को रोग व मृत्यु से लड़ने की क्षमता को बढ़ाने के लिए तथा संक्रामक रोगों के भयावह प्रभावों के लिए समय से ही प्रतिक्षित करना प्रतिरक्षण कहलाता है ।

Q.5. शिशुओं के लिए स्तनपान आवश्यक क्यों है ? किन्हीं दो कारणों के नाम लिखें

Ans. स्तनपान की उपयोगिता- (i) माता के दूध में सभी पोषक तत्त्व शिशु की आवश्यकता के अनुसार विद्यमान होते हैं। (ii) माता का दूध साफ, शुद्ध, स्वच्छ व प्रति द्रव्य युक्त होता है जिससे शिशु को रोगाणुओं 

Q.6. एम. एम. आर. टीके से किन-किन रोगों से बचाव होता है ? 

Ans. खसरा, गलसुआ तथा रुबैला नामक रोगों से बचने के लिए एम०एम०आर० का टीका लगता है।

Q. 7. रोग प्रतिरोधकता किसे कहते हैं ?

Ans. व्यक्ति की रोग व मृत्यु से लड़ने की क्षमता को रोग प्रतिरोधकता कहते हैं।

Q. 8. वायु द्वारा फैलने वाले दो रोगों के नाम लिखिए ।

Ans. तपेदिक (टी० बी०) तथा चेचक एवं शीतला ।

Q. 9. टिटनेस से बचने के लिए शिशु को दिये जाने वाले टीके का नाम लिखें।

Ans. डी० पी० टी० का टीका ।

Q.10. डी० पी० टी० की टीका लगाने के दो कारण बताइए ।

Ans. डी० पी० टी० एक ट्रिपल वैक्सीन है। यह बच्चे व अन्य व्यक्तियों को निम्न रोगों से सुरक्षा हेतु दिया जाता है-D डिपथिरिया (गल-घोटू), P- कालीखाँसी, T – टेटनस ।

Q.11. एम. एम. आर का टीका जिन तीन बीमारियों के लिए लगाया जाता है, उनमें से किन्हीं दो के नाम बताइए । 

Ans. (1) गलसुआ (Mumps), (2) खसरा (Measles)

Q. 12. ऐसी किन्हीं दो बीमारियों के नाम लिखें जिनसे बचने के लिए बच्चे को टीका लगवाना चाहिए ।

Ans. (1) क्षयरोग (2) कुक्करखाँसी ।

Q. 13. दूषित भोजन द्वारा फैलने वाले दो रोगों के नाम लिखें।

Ans. हैजा, अतिसार, टाईफाइड, खाद्य विषाक्तता ।

Q. 14. दो प्रकार की रोग प्रतिरोधक शक्तियों के नाम लिखिए । 

Ans. रोगों से लड़ने की शक्ति रोग प्रतिरोधक शक्ति कहलाती है। यह दो प्रकार की होती है- (क) प्राकृतिक (Natural) (ख) उपार्जित (Acqurired)

Q. 15. शिशु की उन दो शारीरिक परिस्थितियों का नाम लिखिए जब उसे जीवन रक्षक घोल पिलाना आवश्यक हो जाता है।

Ans. जीवन रक्षक पोल प्रायः निर्जलीकरण की अवस्था को रोकने के लिए दिया जाता है. जो कि हैजा, अतिसार तथा खाद्य विषाक्तता के कारण उत्पन्न होती है।

Q. 16. संप्राप्ति काल (Incubation Period) की परिभाषा लिखिए । 

Ans. संप्राप्ति काल रोगाणुओं के शरीर में प्रवेश व रोगी के लक्षण दिखाई देने से पूर्व की अवधि है जिसमें रोगाणु तीव्र गति से संख्या में वृद्धि करके शरीर में विष उत्पन्न करने लगते हैं। 

Q. 17. एम. एम. आर. टीका किन रोगों से रक्षा करता है ? यह टीका किस आयु में लगाया जाता है ?

Ans. एम. एम. आर. टीका तीन रोगों से मुक्ति दिलाता है-खसरा, गलसुआ तथा रुबैला इसकी एक ही दया नौ माह की आयु में दी जाती है। 

Q. 18. क्षयरोग के दो प्रमुख लक्षणों का उल्लेख कीजिए ।

Ans. क्षयरोग एक संक्रामक रोग है। इसके दो प्रमुख लक्षण हैं-

(क) लगातार खाँसी के साथ बलगम रहना । (ख) वजन का निरन्तर कम होते जाना ।

Q. 19. दो वर्षीय मोहित को तेज खाँसी व वमन है। उसे कौन-सा रोग हो सकता है ? उसकी देखभाल करते समय ध्यान देने योग्य दो मुख्य बातें लिखें ।

Ans. मोहित को कुकरखाँसी रोग हो सकता है । उसकी देखभाल करते समय ध्यान देने योग्य बातें- (1) बच्चे को गर्म रखें। (2) व्यायाम न करने दें, (3) डाक्टर के अनुसार ही उपचार करें (4) साँस में कठिनाई की स्थिति में इन्हेलर तथा रेस्पिरेटर का प्रयोग करना चाहिए। 

Q.20. डी. पी. टी. का बूस्टर टीका कब और क्यों लगाया जाता है ?

Ans. डी. पी. टी. का बूस्टर टीका 1-2 वर्ष की आयु में बच्चे को लगाया जाता है। यह तीनों रोगों डिप्थीरिया, काली खाँसी व टिटेनस से बचाव के लिए लगाया जाता है।

Q.21. डी. पी. टी. का टीका किस आयु में देते हैं। यह किन रोगों से शरीर की रक्षा करता है ?

Ans. डी. पी. टी. का पहला, दूसरा व तीसरा टीका क्रमश: 1½ माह 2½ माह व 3% माह में देते हैं। यह टीका डिप्थीरिया, काली खाँसी और टिटेनस रोगों से सुरक्षा प्रदान करता है। 

Q.22. डी. पी. टी. का पूर्ण रूप लिखें।

Ans. डी. डिप्थीरिया (Diptheria), पी० काली खांसी (Pertusis), टी. – टिटेनस (Tetanes)

Q. 23. ट्रिपल वैक्सीन किसे कहते है और क्यों कहते है ? 

Ans. डी. पी. टी. के टीके को ही ट्रिपल वैक्सीन कहा जाता है क्योंकि यह बच्चे की तीनों रोगों डिप्थीरिया, काली खाँसी व टिटेनस से रक्षा करता है ।

Q. 24. अतिसार से पीड़ित बच्चे में निर्जलीकरण की स्थिति को रोकने हेतु दो घरेलू उपाय बताये ?

Ans. (क) बच्चे में निर्जलीकरण की स्थिति को रोकने हेतु ओ. आर. एस. जीवन रक्षक घोल बनाकर पिलाना चाहिए। यह बाजार से बना लिया जा सकता या घर पर उबले में एक चुटकी नमक और एक चम्मच चीनी डाल कर भी बनाया जा सकता है। हुए पानी

(ख) बच्चे को भरपूर मात्रा में तरल पदार्थ जैसे शिकंजी, लस्सी, छांछ हल्की चाय, रमल पानी, चावल का मांड या फटे दूध का पानी थोड़ी-थोड़ी देर से देते रहना चाहिए।

Q. 25. रोग के संप्राप्ति काल (Incubation Period) से आप क्या समझते हैं ?

Ans. रोगाणु के शरीर में प्रवेश होने से लेकर रोग के लक्षणों के प्रकट होने तक के काल को संप्राप्ति काल कहा जाता है। यह भिन्न-भिन्न रोगों का भिन्न-भिन्न होता है ।

Q.27. संक्रामक काल से क्या समझते हैं ?

Ans. कोई भी रोगी एक निश्चित समय तक ही रोग फैलाने की क्षमता रखता है। वह काल जिसमें एक रोगी स्वस्थ व्यक्ति में रोग फैलाने की समर्थता रखता है संक्रामक काल कहलाता है।

Q. 28. टीकाकरण क्यों आवश्यक है ?

Ans. जब शरीर प्राकृतिक रूप से रोगाणुओं से लड़ने में सक्षम नहीं होता तो विभिन्न बीमारियों से बचने के लिए टीके लगाये जाते हैं और कृत्रिम रूप से रोग प्रतिरोधक शक्ति उपार्जित – करने हेतु टीकाकरण आवश्यक है ।

Q. 29. रोग प्रतिरोधकता (Immunity) किसे कहते हैं ? 

Ans. रोगों को फैलाने वाले कीटाणुओं का प्रतिकार करने की शक्ति को रोग प्रतिरोधकता या रोग प्रतिरोधक कहते हैं ।


लघु उत्तरीय प्रश्न (SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS)


Q. 1. माता का दूध रोगों से बचाव के लिए किस प्रकार सहायक है ?

Ans. माता का दूध शिशु के लिए केवल सर्वोत्तम आहार ही नहीं है बल्कि रोगों से बचाव की क्षमता भी रखता है। प्रसव के लगभग 24-28 घंटों के अन्दर माता के स्तनों से गाढ़ा पीले। रंग का पदार्थ निकलता है जिसे कोलोस्ट्राम कहते हैं। इसमें रोगाणुओं से लड़ने वाले तत्व बहुत अधिक मात्रा में पाये जाते हैं जो शिशु की तीन महीने तक संक्रामक रोगों से रक्षा करते हैं।

(क) यह एक प्राकृतिक क्षमता है जो कुछ समय तक ही सीमित है। (ख) इस आरम्भिक दूध द्वारा होने वाले पाचक रसों का निर्माण भी बच्चों को बीमारियों बचाये रखाता है ।

(ग) उसके बाद भी माता का दूध बच्चों को अन्य संक्रामक रोगों से बचाए रखता है क्योंकि इसे सीधा ग्रहण किये जाने के कारण रोगाणुओं के प्रवेश की सम्भावना नहीं होती और स्वच्छता बनी रहती है। इस स्वच्छ दूध को ग्रहण करने से बच्चा पाचक संस्थान के रोगों से बचा रहता है।

माता के दूध में पाया जाने वाला प्रोटीन (लैक्टैल्ब्यूमिन) शिशु की पाचन क्रिया में सहायता करता है इससे पाचन संस्थान ठीक रहता है और पाचन संबंधी विकार पैदा नहीं होते । इसके अतिरिक्त यह दूध बच्चे को भावनात्मक सुरक्षा व संतुष्टि देता है । 

Or, राधा को एक महीने से भी अधिक समय से खाँसी व हल्का बुखार है, उसका वजन भी कम हो रहा है। उसे कौन-सा रोग हो सकता है ? उसकी देखभाल करते समय आप किन चार बातों का ध्यान रखेंगी ? बच्चों को इस रोग से बचाने के लिए आप कौन-कौन से आधारभूत नियमों का पालन करेंगी ? 

Ans. क्षय रोग को टी. बी., तपेदिक या ट्यूबर कुलोसिस भी कहा जाता है। यह विशेष प्रकार के रोगाणु Tuberculus Bacilus के द्वारा फैलता है। यह एक बहुत ही भयानक रोग है। वह धीरे-धीरे सभी अंगों को प्रभावित करता है। इसमें से फेफड़ें, आंतें हड्डी का तपेदिक

सबसे अधिक प्रचलित है। इस रोग के चार लक्षण प्रमुख हैं- (क) लगातार रहने वाली थकान

(ख) वजन का घटते जाना

Q.5. खसरे के रोग की पहचान करने के लिए दो मुख्य लक्षण बताइए तथा इससे पीड़ित रोगी को की जाने वाली देखभाल सम्बन्धी दो महत्त्वपूर्ण बातें बताइए । 

Ans. उच्च तापमान तथा त्वचा पर लाल दाने । खसरे के रोगी की देखभाल के लिए उसे कोमल, सुपाच्य आहार देना चाहिए तथा तीव्र प्रकाश और अन्य स्वस्थ बच्चों से दूर रखना चाहिए। 

Q.6. क्षयरोग का सम्प्राप्ति काल व तीन अति विशेष लक्षण बताइए जिनसे इस रोग की पहचान की जाती है। रोगी की देखभाल करने के दो सुझाव भी दीजिए ।

Ans. तपेदिक (Tuberculosis): लक्षण (Symptoms ) –

1. फेफड़े के तपेदिक वाले रोगी के सम्पर्क में जाने से बच्चा बीमार होता है।

2. बहुत दिन तक हल्का बुखार रहता है।

3. शरीर का भार घटने लगता है ।

4. खाँसी और साँस से आवाज आती है।

5. साँस की बीमारी ‘एन्टिबायोटिक’ दवाओं द्वारा ठीक नहीं होती ।

6. तेज बुखार, तेज सिर दर्द, गर्दन में ऐंठन और ‘मेनिनजाइटिस’ होने पर दौरे पड़ते हैं।

खतरे (Danger)- (i) बच्चा कमजोर तथा कुपोषित हो जाता है।

(ii) बच्चे के फेफड़ों पर बुरा असर पड़ सकता है ।

(iii) बच्चा कुबड़ा हो सकता है।

(iv) बच्चा के दिमाग पर असर पड़ सकता है

(v) कभी-कभी यह जानलेवा भी हो सकता है ।

Q. 7. क्षय रोग के चार लक्षण लिखें इससे बचने के दो उपाय लिखें। निम्नलिखित हैं-

Ans. क्षय रोग के चार लक्षण (1) लगातार सूखी खाँसी तथा 99-100° तक हल्का ज्वर ।

(2) धीरे-धीरे शरीर का कमजोर होते चले जाना तथा छाती में दर्द । (3) बाह्य श्वास में माँस के सड़ने जैसी दुर्गन्ध का होना । (4) कभी-कभी खाँसी के साथ रक्त आना अथवा खून की उल्टी होना ।

इसकी रोकथाम के लिए हमें B.C.G का टीका लगवाना चाहिए तथा रोगी को अन्य स्वस्थ

लोगों से पृथक रखना चाहिए ताकि उसका रोग अन्य व्यक्तियों को न लगे । 

Q. 8.खसरे के तीन लक्षण लिखें। इससे कैसे बचा जा सकता है ?

Ans. खसरे के तीन लक्षण निम्नलिखित हैं-

(क) उच्च ज्वर तापमान 102-104 फा., आँखों तथा नाक से पानी बहना ।

(ख) त्वचा का लाल होना तथा उस पर लाल दाने (विशेष रूप से चेहरे, बाजू, टाँगों तथा शरीर पर निकल आना ।

(ग) लगातार खाँसी तथा तेज रोशनी से परेशानी। नए पैदा बच्चे में इसे खसरारोधी टीकाकरण द्वारा रोका जा सकता है। इसे 5 वर्ष तक बच्चों को लगाया जाता है।

(घ) रोगी का पृथक्कीकरण भी एक प्रभावशाली विधि है जिससे इसका संक्रमण रोका जा सकता है।

Q. 9. टेटनस के चार लक्षण लिखिए। हम इससे किस प्रकार बच सकते हैं?

Ans. टेटनस (धनुषटंकार रोग) क्लोजट्रिडियन टेटनाई नामक बैक्टीरिया द्वारा उत्पन्न होता। इसके लक्षण निम्नलिखित हैं-

(1) 104 से 105 फारनहाइट तक का तीव्र ज्वर ।

(2) पेशियों के स्थायी संकुचन के कारण जबड़ों का भिंच जाना तथा गति न होना ।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (LONG ANSWER TYPE QUESTIONS)

Q. 1. कुक्कर खाँसी के लक्षण, उचार एवं रोकथाम लिखें । राज को तेज खाँसी है तथा उसमें बू की आवाज भी है। वह किस रोग से ग्रस्त है? इस रोग के दो अन्य लक्षण लिखिए तथा इस रोग से कैसे बचा जा सकता है?

Ans. कुक्कर खाँसी (Whooping Cough or Pertusis ) – यह रोग बैसीलस परट्यूसिस (Bacillus pertusis) नामक जीवाणु के संक्रमण द्वारा विशेषकर बच्चों में होता है लक्षण (1) प्रारंम्भ में बच्चे को खाँसी आने लगती है जो बाद में बढ़कर धारण कर लेती है। गम्भीर रूप

(2) खाँसी के साथ-साथ बच्चे को छींके आना, नाक बहना व आंखों से पानी निकलने लगता है ।

(3) खाँसते-खाँसते बच्चों का मुँह लाल हो जाता है और कई बार वह मौन भी कर देता है। (4) बच्चे की खाँसी के साथ छाती से एक विशेष प्रकार की आवाज भी निकलती है जिसके कारण इसे (Wooping cough) कहते हैं ।

(5) खाँसी के साथ हल्का बुखार भी रहता है । 

उपचार एवं रोकथाम 

(1) लक्षण दिखाई देने पर डॉक्टर को दिखाना चाहिए । (2) रोगी बच्चे को स्वस्थ बच्चों से अलग रखना चाहिए 

(3) रोगी बच्चे की ठण्ड व सीलन से रक्षा करनी चाहिए तथा उन्हें हवादार कमरे में रख ।

(4) रोगी को हल्का व आसानी से पचने वाला भोजन देना चाहिए ।

(5) शिशु को सही समय व अन्तराल पर डी० पी० टी० के टीके लगवाने चाहिए। 

(6) रोगी के वस्त्रों, वस्तुओं व कमरे आदि को विसंक्रमित करना चाहिए।

Q. 2. क्षयरोग ( Tuberculosis) के कारण, लक्षण, उपचार एवं रोकथाम के विषय में लिखें।

Ans. क्षयरोग-क्षयरोग वायु द्वारा संवाहित रोग है। यह शरीर के किसी भी अंग जै फेफड़े, अस्थियों, मेरुदण्ड, मस्तिष्क की झिल्ली व आँतों में हो सकता है ।

क्षयरोग के कारण- 1. बच्चों में निमोनिया, खसरा, प्लूरिसी आदि बीमारियाँ होने पर उनकी रोग से लड़ने की क्षमता कम हो जाती है तथा फेफड़े कमजोर हो जाने के कारण क्षयरोग के जीवाणु – शीघ्र आक्रमण करके उन्हें रोगी बना देते हैं।

2. बच्चों को क्षय रोग से ग्रस्त पशुओं का दूध पिलाये जाने से भी वे क्षय रोग से ग्रस्त हो जाते हैं ।

3. यदि माता क्षयरोग से ग्रस्त हो तो उसके दूध व निकट सम्पर्क से बच्चों जीवाणुओं से पर संक्रमित हो जाता है ।

क्षयरोग के लक्षण-क्षयरोग की तीन स्थितियाँ होती हैं-

(क) प्रारम्भिक स्थिति-जैसे हल्का बुखार, खाँसी आदि जैसे कि सामान्य संक्रमण। (ख) मध्य विकसित स्थिति- (i) बच्चा कमजोर होने लगता है तथा उसका शारीरिक

भार घटने लगता है (ii) बच्चे को हर समय बुखार रहने लगता है (iii) बच्चे को खाँसी हो ना जाती है तथा बलगम होने लगता है । (iv) बच्चे को भूख कम लगती है और भोजन के प्रति अरुचि पैदा हो जाती है। (v) बच्चा थोड़ा-सा खेलने के पश्चात् ही हाँफने लगता है।

(ग) अतिविकसित स्थिति कभी-कभी रोगी के थूक और बलगम के साथ खून आने लगता है और खून की उल्टी भी आ सकती है । उपचार एवं रोकथाम (1) यदि बच्चे को खाँसी व हल्का-हल्का बुखार रहता हो तो उसे

सामान्य लक्षण समझ कर अनदेखा नहीं करना चाहिए ।

(2) जन्म के पश्चात् शिशु को B.C.G का टीका लगवाना आवश्यक है । (3) बच्चों को साफ व हवादार स्थान में रखना चाहिए ।

(4) बच्चों के पूर्ण पौष्टिक आहार देने चाहिए जिससे वह स्वस्थ रहे और रोगाणुओं के आक्रमण से बच सके ।

(5) बच्चे की शारीरिक स्वच्छता का पूरा-पूरा ध्यान रखना चाहिए । 

(6) जनसाधारण व माताओं को विभिन्न प्रसार माध्यमों द्वारा शिक्षित करना अनिवार्य है।

Q. 3. खसरे के तीन विशिष्ट लक्षणों की सूची बनाएं तथा रोग की रोकथाम के लिए ली जाने वाली तीन सावधानियाँ भी लिखें ।

Ans. खसरा रोग के लक्षण (Symptoms of Measles )—— 1. सर्वप्रथम बच्चे को जुकाम, खाँसी व सिरदर्द के साथ-साथ बुखार होता है।

2. चार-पाँच दिन के पश्चात् बच्चे के मुंह व कनपटी के पीछे छोटे-छोटे दाने दिखाई देने लगते हैं। धीरे-धीरे ये सारे शरीर पर फैल जाते हैं तथा लाल हो जाते हैं।

3. बच्चों की नाक व आँखों से पानी बहने लगता है और उसे छींके आने लगती हैं। गले नाक में सूजन आ जाती है। 

खसरा रोग के उपचार एवं रोकथाम (Treatment and Prevention )- 

1. रोगी को पूर्णतः आराम देना चाहिए तथा एक अलग गरम व हवादार कमरे में अन्य बच्चों से अलग रखना चाहिए । 

2. रोगी को दानों में खुजली नहीं करने देनी चाहिए।

3. रोगी के वस्त्र, खिलौने व अन्य चीजें विसंक्रमित करनी चाहिए ।

4. बच्चों को नौ माह की आयु में खसरे का प्रतिरोधक टीका लगवाना चाहिए ।

Q. 4. खसरा रोग का सम्प्राप्ति काल व तीन विशेष लक्षण बताइए जिनसे रोग की पहचान होती है। बीमार की देखभाल करने के दो सुझाव भी दीजिए।

Ans. खसरा (Measles ) ससुप्तावस्था (Incubation Period) 10-12 दिन लक्षण (Symptom )- 1. प्रारम्भिक लक्षणों में बुखार, जुकाम तथा खाँसी होती है । 2. उसकी आँखें लाल हो जाती हैं तथा उनसे पानी बहता है।

3. तीसरे से सातवें दिन के बीच मुँह पर छोटे-छोटे लाल दाने उभर आते हैं ये दाने सूखते हैं तथा उनका छिलका उतरना आरम्भ हो जाता है । यह एक तीव्र संक्रमण काल होता है । । समयानु

खतरे (Danger )—1. बच्चा कमजोर हो जाता है ।

2. बच्चे को फेफड़ों कान, आँख और पेट की बीमारियाँ लगने का खतरा बढ़ जाता है 3. बिगड़ने पर यह रोग जानलेवा हो सकता है।

  • प्रतिवर्ष एक लाख बच्चे खसरे से प्रभावित होते हैं । उनमें से लगभग एक से तीन प्रति बच्चे खसरा बिगड़ जाने के कारण मर जाते हैं।
  • टीका (Vaccination)-खसरे का टीका ।
  • टीका लगाने का समय (Age of Vaccination)-9-12 माह के अंदर केवल एक टीम ही काफी है।

Q.5. निमोनिया के लक्षण, उपचार व रोकथाम लिखें।

Ans. निमोनिया तीन प्रकार के जीवाणुओं से होता है-

(i) न्यूमोकोकस (Pneumococus)

(ii) स्ट्रेप्टोकोकस (Streptococus)

(iii) स्टैफाइलोकोकस (Stephylococus)

(1) रोगी को तेज ज्वर बढ़ता है और चेहरा लाल हो जाता है।

(2) रोगी को खाँसी आती है और सीने में दर्द होता है।

(3) रोगी की श्वास लेने की गति अति तीव्र हो जाती है। (4) रोगी को सीधा लेटने में कष्ट होता है।

(5) कई बार अधिक खाँसने के कारण थूक या बलगम में खून भी आने लगता है। उपचार एवं रोकथाम (1) रोग के लक्षण दिखाई देते ही डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए।

(2) रोगी का ठंड से बचाव करना चाहिए । (3) रोगी को हवादार कमरे में जहाँ स्वच्छ वायु व सूर्य का प्रकाश आता हो, रखना चाहिए।

(4) रोगी के आहार का विशेष ध्यान रखना चाहिए ।

(5) रोगी को स्वस्थ व्यक्तियों से अलग रखना चाहिए तथा पूरा आराम देना चाहिए।

Q.6. गलघोंटू रोग के लक्षण, उपचार एवं रोकथाम लिखें।

Ans. गलघोंटू रोग (Diptheria ) कोरिने बैक्टीरियम डिपीथीरिए (Coryna bacterium diphtheriae) नामक जीवाणु से फैलता है ।

गलघोंटू रोग के लक्षण- (1) प्रारम्भ में रोगी को गले से हल्का-सा दर्द होता है व सूजन आ जाती है। सांस लेने में तथा निगलने में कठिनाई होती है। 

(2) रोगी की श्वास नली के ऊपर हल्की स्लेटी रंग की झिल्ली बन जाती है जिसे रोगी को

(3) रोगी को तेज बुखार 101 से 104F तक चढ़ता है

(4) रोगों को खाँसी आती है तथा गर्दन की लसिका गिल्टियाँ बढ़ जाती हैं

उपचार एवं रोकथाम 

(1) यदि संक्रमण तीव्र हो तो रोगी को संक्रामक रोग अस्पताल में रखना चाहिए ।

(2) शिशुओं को डी० टी० पी० के टीकों की तीनों खुराकें सही समय व सही अन्तराल पर देनी चाहिए ।

(3) स्वस्थ बच्चों को रोगी से अलग रखना चाहिए।

(4) रोग के संक्रमण काल में बच्चों की खखार तथा नाक से निकले पदार्थों की जाँच करा लेनी चाहिए।

(5) रोगी की देखभाल करने वाले व्यक्ति को कीटनाशक घोल से गरारे करना चाहिए

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