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Class12th 
Chapter Nameअच्छे स्वास्थ्य के लिए जल | Water for Good Health
Chapter number07
Book NCERT
SubjectHome Science
Medium Hindi
Study MaterialsImportant questions answers
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अच्छे स्वास्थ्य के लिए जल | Water for Good Health

प्रस्तुत अध्याय में मनुष्य के अच्छे स्वास्थ्य के लिए जल के महत्व का विवेचन किया गय है । हम जानते हैं कि जल ही जीवन है। विशेष रूप से अच्छे स्वास्थ्य के लिए स्वच्छ जल क होना आवश्यक है । जल के बिना मनुष्य और अन्य प्राणी जीवित नहीं रह सकते हैं ।

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शरीर के सभी तन्तुओं का मूल आधार जल है । आहार में अन्य पौष्टिक तत्वों की भार जल हमारे लिए अति आवश्यक है । क्योंकि जल के अभाव में मनुष्य अधिक समय तक जीवि नहीं रह सकता है । संक्रमिक पेयजल से होनेवाले रोग हैजा, टाइफायड व पेचिश हैं ।

जल की भौतिक, रासायनिक व जैविक विशेषताएँ हैं। जल को पीने से पहले कुछ आस घरेलू विधियों द्वारा शुद्ध एवं सुरक्षित किया जा सकता है; जैसे-छानना, उबालना, फिटकरी का उपयोग तथा क्लोरीन । पानी के नमक व चीनी के घोल को जीवन रक्षक घोल कहते हैं। पाचन रक्तवाहन, अन्तः व बाह्य योगदान है। अतः जीव, जगह और माननीय जीवन के लिए स्वच्छ जल बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। स्वच्छ जल पीने से मनुष्य का स्वास्थ्य ठीक रहता है।


अति लघु उत्तराय प्रश्न (VERY SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS)


Q. 1. पीने योग्य पानी के साफ व स्वादहीन के अतिरिक्त दो और गुण कौन-क से हैं ?

Ans. यह गंधरहित तथा कीटाणुरहित होना चाहिए 1

Q. 2. घर में पीने के पानी योग्य न रहने (दूषित होने) के चार कारणों की सूची बनाइए ।

Ans. (क) ऐसे टैंकों अथवा वर्तनों में पेयजल संचित करना जिन्हें पर्याप्त समय से साप न किया गया हो अथवा जो स्वास्थ्य की दृष्टि से हानिकारक हो ।

(ख) पेयजल में गन्दे व दूषित हाथ डालकर ।

(ग) जल उत्पादित संक्रामक रोगों के दिनों में जल को उबालकर न पीना गन्दे व दूषित गिलास तथा बर्तनों आदि का पानी पीकर ।

Q. 3. उत्तम स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित पेयजल की क्या महत्त्व है ?

Ans. प्रत्येक व्यक्ति अपने शरीर को भली-भाँति चलाने के लिए काफी मात्रा में जल पीता है। पीने वाला पानी स्वच्छ व साफ और ढंका हुआ होना चाहिए। ताकि कोई भी संक्रामक रोग फैल सके क्योंकि गंदा और संक्रमित पानी हैजा, पेचिश, गैस्ट्रो, टाइफायड आदि रोगों का कारण है

Q.4. जल को साफ करने के घरेलू उपाय कौन-कौन से हैं?

Ans. 

(1) स्कन्दन या जमाना (Coagulation) 

(2)छानना (Filtration),

(3) उबालना (Boiling)

(4) विसंक्रमण करना ( Disinfection)

Q.5. शारीरिक जल की संरचना लिखिए ।

Ans. शरीर का वजन का 65% भाग जल है जो सभी तन्तुओं में विद्यमान है । खून (85%) लैच्छिक मांसपेशियाँ (75%), हड्डियाँ (20.25%), दाँत (5%) ।

Q. 6. शरीर में जल का अभाव क्या है? 

Ans. निर्जलीकरण के कारण व्यक्ति को सिरदर्द, थकावट, अचानक बेहोशी, अत्यधिक प्यास से मुँह सूखता है व त्वचा का लचीलापन समाप्त हो जाता है, जो जल के अभाव का कारण है ।

Q.7. शरीर में जल के मुख्य दो कार्य लिखिए । 

Ans. (i) जल से शरीर का तापमान स्थिर रहता है।

(ii) जो भोजन हम खाते हैं उसकी पाचन क्रिया भोजन नली में होता है। भोजन जब सरल स्थिति में होता है तब उस पर रासायनिक प्रक्रियाएँ उचित प्रकार से होती हैं। अतः भोजन के साथ जल का होना अनिवार्य है। 

Q.8. जल की उपयोगिता बताइये ।

Ans. जल का प्रयोग पीने, भोजन पकाने, सफाई करने, नहाने व गंदगी को बहा ले जाने के उद्देश्य से करते हैं। प्राणी के शरीर को ऑक्सीजन के बाद जल की ही सबसे अधिक आवश्यकता होती है ।

Q.9. नलकूप के पानी को पीने योग्य बनाने के दो उपाय लिखिए ।

Ans. (1) उबालना (Boiling), (2) छानना (Filtration ) । 

Q.10. पीने के पानी के दो गुण बताइए ।

Ans. 1. यह रोगाणुरहित होना चाहिए तथा स्वाद व गंध से दूषित नहीं होना चाहिए।

2. पीने का पानी अवांछित रसायनों से रहित होना चाहिए ।

Q.11. जीवनरक्षक घोल की किन्हीं दो महत्त्वपूर्ण सामग्रियों के नाम लिखिए ।

Ans. (1) नमक (खाने वाला), (2) ग्लूकोज ।

 Q. 12. पीने के पानी को साफ करने के लिए प्रयोग में लाये जाने वाले दो पदार्थों के नाम लिखिए ।

Ans. (1) पोटाश ऐलम (फिटकरी), (2) क्लोरीन ।


लघु उत्तरीय प्रश्न (SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS)


Q. 1. घर पर जल को स्वच्छ करने हेतु किसी रसायन के प्रयोग के चरण लिखिए । 

Ans. घर पर जल को क्लोरीन या फिटकरी रसायन से निम्न प्रकार स्वच्छ किया जा सकता है-

(क) पानी को बर्तन में लेकर उसमें निर्धारित मात्रा में क्लोरीन को गोलियों या फिटकरी डालकर अच्छी तरह से घुमाएँ ।

(ख) आधे घण्टे के लिए पानी रख दें ।

(ग) पानी को छानकर प्रयोग में लायें ।

Q. 2. स्कूली बच्चों को लेकर आप किसी जगह घूमने जा रहे हैं। किसी भी उपल स्रोत से जिस पानी को भी आप ग्रहण करेंगी सबसे शीघ्र व उपयुक्त तरीके का नाम लिख जल को शुद्ध करने के चरण लिखिए । 

Ans. क्लोरीन की गोलियाँ डालकर पानी साफ करने का तरीका सबसे अच्छा तरीका एक पानी की बोतल में क्लोरीन की गोलियाँ डालकर अच्छी प्रकार से हिलायें । आधे घ लिए पानी को एक जगह पर रखा रहने दें। उसके बाद साफ मलमल के कपड़े से पानी छानें और प्रयोग में लायें। सारी अशुद्धियाँ छन कर पानी साफ व कीटाणु मुक्त हो जायेग ।

Q.3. गाँव के कुएं का पानी मिट्टी वाला है। गाँव वालों को आस-पास से उपल सामग्री एकत्रित कर पानी को छानने के लिए फिल्टर बनाने की विधि बताइए ।

Ans. बर्कफील्ड फिल्टर (Berkefeld filter ) – यह फिल्टर आजकल घरों में किया जाता है । इसमें क्ले तथा पोर्सलीन मिट्टी का प्रयोग किया जाता है । इसका आकार ल टंकी के समान होता है जिसमें नीचे की ओर एक नल लगा होता है । इस टंकी में क्ले ि से बने सिलेण्डर होते हैं । 

सिलेण्डरों के नीचे की पतली नलियाँ नीचे की ओर निकली रह तथा इन नलियों के छिद्र अत्यन्त सूक्ष्म होते हैं। ये सिलेण्डर ही जल को छानकर शुद्ध करें और छन कर जल निचले बर्तन में इकट्ठा होता रहता है जिसे नल द्वारा पीने के लिए पानी के निकाल सकते हैं। इन सिलेण्डरों की स्वच्छता का विशेष ध्यान रखना चाहिए ।

Q. 4. अपने विद्यालय में रखे घड़ों का पानी पीने योग्य है या नहीं इसका निर्णय के लिए आप कौन-सी चार बातों का ध्यान रखेंगे ?

Ans. हम यह सुनिश्चित करेंगे कि घड़ों में रखा पानी- (1) रंगहीन, गंधहीन तथा स्वादहीन होना चाहिए ।

(2) निलम्बित अशुद्धियों से रहित होना चाहिए

(3) उसमें तैरने वाली जल से हल्की अशुद्धियाँ नहीं होनी चाहिए ।

Q.5. जीवन रक्षक घोल क्या होता है तथा इसका प्रयोग किस स्थिति में के जाता है ?

Ans. उबालकर ठण्डे किये गए जल में उचित मात्रा में नमक व शर्करा (चीनी या गु मिलाने से जीवन रक्षक घोल बनता है। यह प्रायः निर्जलीकरण की अवस्था को रोकने के किया जाता है जो कि हैजा, अतिसार तथा खाद्य विषाक्तता के कारण उत्पन्न होती है।

Q. 6. अशुद्ध पानी पीने से कौन-सी बीमारियाँ होती हैं ? उबालने की विधि का प्रये कर मिट्टी वाले पानी को कैसे शुद्ध किया जाता है ?

Ans. अशुद्ध पानी पीने से होने वाली बीमारियों के नाम- टायफाइड, हैजा, अतिसार, डायरिया, हेपाटाइटिस ।

उबालना (Boiling)—उबालना जल को स्वच्छ बनाने का सस्ता तथा सरल उपाय

जिसके अंतर्गत जल को किसी पात्र में उस तापमान तक गर्म किया जाता है जब तक वह उब न लगे। इस प्रक्रिया द्वारा जल कीटाणुरहित हो जाता है क्योंकि कीटाणु इतने उच्चताप को स कर पाने में अक्षम है। 100°C /212°F पर 15-20 मिनट तक उबालने पर सभी रोगाणु न हो जाते हैं। ध्यान रखने वाली दो सावधानियाँ लिखिए ।

Q.7. पीने के पानी को स्वच्छ करने के लिए उबालने की विधि का प्रयोग करते समय क्या ध्यान रखने चाहिये? 

Ans. (1) पानी को दस मिनट तक 100: C/212°F पर उबालकर साफ करना चाहिए ।

(2) जहाँ तक हो सके उबले पानी को उसी बर्तन में रहने देना चाहिए जिससे वह दोन गंदा न हो जाए ।

Q. 8. ओ. आर एस किसे कहते हैं ? इसका प्रयोग क्यों किया जाता है ? 

Ans. ओ. आर एस का अर्थ है-ओरल रिहाईड्रेशन सॉल्यूशन ( Oral Rehydration Solution)। यह घोल अथवा विलयन उबालकर ठण्डे किए जल में उचित मात्रा में तैयार होता है। यह घोल रोगी की निर्जलता (Dehydration) की स्थिति से बचाने के लिए पिलाया जाता है। यह स्थिति शरीर में जल तथा लवण की कमी के कारण उत्पन्न होती है ।।

Q.9. सुरक्षित पीने योग्य पानी के चार गुण लिखिए । 

Ans. सुरिक्षत पेयजल में निम्नलिखित गुण होने चाहिए-

(1) यह रंगहीन, गन्धहीन तथा स्वादहीन होना चाहिए ।

(2) यह मृदुजल होना चाहिए, कठोर नहीं ।

(3) यह पूर्णतया सूक्ष्म जीवाणुओं से रहित होना चाहिए ।

(4) इसमें कोई रेडियोधर्मी तत्त्व नहीं होना चाहिए ।


दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (LONG ANSWER TYPE QUESTIONS)


Q. 1. पेयजल को शुद्ध करने के लिए घरेलू उपाय विस्तारपूर्वक लिखिए । 

Ans. पेयजल को शुद्ध करने के घरेलू उपाय (House hold methods of making water safe for drinking) – पेयजल हम चाहे किसी भी स्रोत द्वारा प्राप्त करें, उसमें कुछ-न-कुछ अशुद्धियाँ अवश्य पाई जाती हैं। अतः जल को पीने से पहले कुछ आसान घरेलू विधियों द्वारा शुद्ध एवं सुरक्षित किया जा सकता है। ये विधियों निम्नलिखित हैं-

(1) उबालना (Boiling) (2) छानना (Filter)

(3) फिटकरी का प्रयोग (Use of Alum ) (4) क्लोरीन (Chlorine) 

(1) उबालना – पानी को शुद्ध व पीने के लिए सुरक्षित करने का सबसे आसान व विश्वसनीय साधन उबालना है। उबालने के लिए पानी को किसी बर्तन में लेकर सात से दस मिनट तक उबालने से उसमें उपस्थित लगभग सभी जीवाणु नष्ट हो जाते हैं। ठण्डा होने पर इसे छानकर किसी साफ बर्तन या घड़े में संग्रह करना चाहिए।

बर्तन या घड़े में से पानी निकालने के लिए किसी लम्बी डंडे वाले साफ बर्तन का प्रयोग करना चाहिए जिससे पानी निकालते समय उसमें गन्दे हाथ न लगें। उबालने की क्रिया द्वारा जल में आक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है जिससे उसका स्वाद बकबका हो जाता है, परन्तु उबला हुआ जल ठण्डा करके निस्संकोच पोने के लिए सुरक्षित होता है तथा अस्थाई कठोरता दूर हो जाती है। 

(2) छानना-जल को साफ करने की यांत्रिक विधि छानना है छानने के लिए कई विधियाँ अपनाई जा सकती हैं-

(i) घड़ों द्वारा छानना-घड़ों द्वारा छानने की विधि सबसे पुरानी है और प्रायः गांवों में इस विधि द्वारा कुओं, तालाबों आदि का जल छान कर आसानी से स्वच्छ किया जाता है। एक लकड़ी या लोहे के स्टैण्ड पर दो घड़ों में एक छोटा छेद होता है। सबसे ऊपर के घड़े में पिसा हुआ कोयला और उसके नीचे दूसरे घड़े में नीचे छोटे कंकड़ और ऊपर रेत होती है।

 नीचे का घड़ा साफ छना हुआ पानी संग्रह करने के लिए रखा जाता है। घड़ों के छेदों में थोड़ी-सी रुई या मलमल का कपड़ा लगाना चाहिए। सबसे ऊपर के घड़े में छानने के लिए पानी को डाला जाता है। जो धीरे-धीरे शुद्ध हो जाता है, परन्तु यदि कोयला गन्दा हो तो पानी और भी अशुद्ध ह जाता है ।

 इस विधि के प्रयोग में एक बात और ध्यान रखनी चाहिए कि समय-समय पर घड़ों का कोयला, रेत व कंकड़ों को बदलते रहना चाहिए। गांवों में पानी को साफ करने का यह सबसे सस्ता व उपयुक्त साधन है क्योंकि प्रायः सभी चीजें वहाँ आसानी से उपलब्ध होती हैं ।

(ii) वर्क फील्ड फिल्टर (Berkefeld filter )-यह फिल्टर आजकल घरों में प्रयोग किए जाते हैं । इसमें क्ले तथा पोर्सलीन मिट्टी का प्रयोग किया जाता है । इसका आकार लम्बी टंकी के समान होता है जिसमें नीचे की और एक नल लगा होता है। इस टंकी में क्ले मिट से बने सिलेण्डर होते हैं। सिलेण्डरों के नीचे की पतली नलियों नीचे की ओर निकली। तथा इन गलियों के छिद्र अत्यन्त सूक्ष्म होते हैं। ये सिलेण्डर ही जल को छानकर शुद्ध क है। और उन कर जल निचले बर्तन में इकट्ठा होता रहता है जिसे नल द्वारा पाने के लिए बाहर निकाल सकते हैं । इन सिलेण्डरों की स्वच्छता का विशेष ध्यान रखना चाहिए । 

(iii) नल के लगने वाले छोटे फिल्टर आज वैज्ञानिक उन्नति के साथ बाजार में फिल्टर भी मिलते हैं जिन्हें सीधा नल में लगा दिया जाता है और नल खोलने पर इनमें इनक पानी शुद्ध होकर निकलता है। फिल्टर बनाने वाली इन कम्पनियों का यह दावा है कि इन फिल्ट द्वारा छाना गया पानी जीवाणु रहित होता है और पीने के लिए शत-प्रतिशत सुरक्षित होता है ।

(3) फिटकरी का प्रयोग-फिटकरी एक सस्ता रसायन है तो जल को अशुद्धियाँ साफ कहते के लिए प्रयोग किया जा सकता है। एक गैलन में दो-चार दाने फिटकरी या 4-5 लीटर में 60 से 240 मिग्रा फिटकरी जल में अशुद्धि के आधार पर पीसकर डाली जाती है | फिटकरें से जल की अशुद्धियाँ इकट्ठी होकर नीचे बैठ जाती है जिन्हें छानकर अलग किया जा सकत है । फिटकरी एक हल्का रसायन है तथा इसका जल पर कोई रासायनिक प्रभाव नहीं पड़ता है। 

(4) क्लोरीन—क्लोरीन द्वारा जल की अशुद्धियों को दूर किया जा सकता है । क्लोरीन को गैस के रूप में प्रयोग कर सकते हैं, परन्तु इसके लिए नाजुक यंत्र की आवश्यकता होती है।

ब्लीचिंग पाउडर के प्रयोग से भी जल को शुद्ध किया जाता है। जब जल में ब्लीचिंग पाउडर मिलाते हैं तो उसमें से क्लोरीन गैस निकलती हैं जो जल को शुद्ध करती है। 100 गैलन जल में अच्छे किस्म का 30 ग्राम ब्लीचिंग पाउडर अधिक मात्रा में डालना चाहिए । आजकल बाजार में जल शुद्ध करने के लिए क्लोरीन की गोलियाँ भी मिलती हैं जिन्हें जल में डालकर आसानी

से जल शुद्ध किया जा सकता है। क्लोरीन द्वारा शुद्धिकरण की विधि सस्तो, विश्वसनीय, सुरक्षित एवं आसान है। पेयजल को शुद्ध करने के उपरोक्त उपायों द्वारा जल शुद्ध तो हो जाता है परन्तु कोई भी एक विधि जल को शत-प्रतिशत सुरक्षित नहीं कर सकती है। 

अतः जल को सुरक्षित करने के लिए दो विधियों का प्रयोग कर सकते हैं। राष्ट्रीय पोषाहार संस्थान के अध्ययनों के अनुसार साफ घड़ों में संग्रह किया हुआ जल, पीतल, तांबा अथवा एल्युमीनियम के बर्तनों की अपेक्षाकृत अधिक समय तक शुद्ध रहता है

Q. 2. शरीर में जल के कार्य विस्तारपूर्वक लिखिए ।

Ans. कार्य (Functions) जल के शरीर में अनेक कार्य हैं क्योंकि कोशिकाओं में होने वाले समस्त रासायनिक परिवर्तन जल पर ही आधारित हैं।

(i) शरीर का निर्माण कार्य (Body Building ) – शरीर के पूरे वजन का 55-70% भाग पानी का होता है । जैसे-जैसे व्यक्ति बूढ़ा होता है, पानी की मात्रा कम होती है। शरीर को विभिन्न अंगों में जल की मात्रा निम्न है-

1. गुर्दे 83%, 2. रक्त 80-90%, 3. मस्तिष्क 79%, 4. मांसपेशियाँ 72%, 5. जिगर 70%, 6. अस्थियाँ 30%

रक्त में 90% मात्रा जल की होती है। जल शरीर के विभिन्न अंगों तथा द्रवों की रचना एवं कोषों के निर्माण में सहायक होता है। रक्त में स्थिर जल का मुख्य कार्य भोज्य पदार्थों द्वारा लिए गए पानी में घुलित पोषण तत्वों का शोषण करके रक्त में पहुँचाना है, और यह रक्त शरीर के निर्माण करने वाले विभिन्न अंगों के कोषों तक पोषक तत्वों से प्राप्त शक्ति को पहुंचाते हैं। कार्बन-डाइऑक्साइड को फेफड़ों तक पहुँचाना एवं वहीं से बेकार पदार्थों तथा विभिन्न लवणों । 

यदि रक्त में जल की मात्रा कम हो जाए तो रक्त गाढ़ा हो जाता है और अपने शारीरिक कार्य जो रक्त के माध्यम द्वारा करता है, सुचारू रूप में नहीं कर पाता । परिणामस्वरूप मनुष्य बीमार हो जाता है ।

(ii) ताप नियन्त्रक के रूप में ( Act as a Temperature Controller )—– जल से शरीर के तापमान को भी स्थिर रखने में सहायता मिलती है। ग्रीष्म ऋतु में पसीने के सूखने पर शरीर में ठण्डक पहुँचती है । जब बरसात के दिनों में वर्षा के उपरान्त वायु में नमी होती है ।

पसीना शीघ्र सुख नहीं पाता तो बहुत बेचैनी होती है 1 जब कभी शरीर का तापक्रम बढ़ जाता है, त्वचा और श्वासोच्छवाद संस्थान से जलवाष्म अथवा पसीने के रूप में उत्सर्जित होने लगता है।

(iii) घोलक के रूप में कार्य (Act as a Solvent ) जल ही वह माध्यम है जिसके द्वारा पोषक तत्वों को कोषों तक ले जाया जाता है तथा चयापचय के निरर्थक पदार्थों को निष्कासित किया जाता है। भोजन को कोषों तक ले जाने से पूर्व पाचन की क्रिया सम्पन्न हो जानी चाहिए। पाचन प्रक्रिया में जल का प्रयोग किया जाता है, मूत्र में 96% जल पाया जाता है। मल विसर्जन के लिए जल की अत्यन्त आवश्यकता है। भोजन में जल की मात्रा कम रहने से मल अवरोध (Constipation) होने का भय रहता है ।

(iv) स्नेहक का कार्य (Act as Lubricant ) – यह शरीर में पाए जाने वाली समस्त हड्डियों के जोड़ों में रगड़ होने से बचाता है। जोड़ों या सन्धियों (Joints) के चारों ओर थैली के समान (Sac-like) जो ऊत्तक होते हैं, उनमें जल उपस्थित रहता है। यदि आघात के कारण

यह नष्ट हो जाय या रोग के कारण परिवर्तित हो जाए तो सन्धियां जकड़ जाती हैं । 

(v) शरीर के निरुपयोगी पदार्थों का बाहर निकलना (To Excrete out the Waste Products ) — जल शरीर में बने विषैले पदार्थ को मूत्र तथा पसीने द्वारा बाहर निकालता है, इससे गुर्दों की सफाई होती रहती है। मल विसर्जन के लिए पानी की अत्यन्त आवश्यकता होती है, जल शरीर में उत्पन्न निरुपयोगी पदार्थों को अधिकतर मात्रा में घोल लेता है एवं उन्हें उत्सर्जक अंगों

यकृत, त्वचा आदि द्वारा शरीर के बाहर निकाल देता है । 

6. पोषक तत्त्वों का हस्तान्तरण (Transportation of Nutrients) – पोषक तत्त्वों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुँचाने का कार्य भी जल का ही है ।

7. शरीर में नाजुक अंगों की सुरक्षा (Protecion of delicate organs) – शरीर के कोमल अंग एक जल से भरी पतली झिल्ली की थैली से घिरे रहते हैं जो अंगों की बाहरी आघातों से रक्षा करती है ।

Q. 3. जल का हमारे जीवन में क्या महत्त्व है ?

Ans. प्रत्येक प्राणी को जीवित रहने के लिए जल की आवश्यकता होती है। पोषण तत्वों का भरपूर उपयोग करने के लिए सभी को जल में घुले पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है। जल का महत्त्व :

(क) शरीर निर्माण- हमारे शरीर का लगभग 55-70% भाग जल से बना हुआ है । 

(ख) जल एक घोलक जल विभिन्न तत्वों को घुलनशील बनाने के लिए एक घोलक कार्य करता है । का

(ग) ताप नियंत्रक पसीने के रूप में जल हमारे शरीर के तापमान को बनाए रखता है।

(घ) व्यर्थ पदार्थों का निष्कासक – व्यर्थ पदार्थों का निष्कासन मूत्र के रूप में जल के ही होता है।

(ङ) जल एक रक्षक—जल एक ऐसी चिकनाई है जिससे जोड़ों में गतिशीलता बनी रहती । जल इसके अतिरिक्त शरीर के प्रत्येक भाग की बाहरी आघातों से रक्षा करता है।

(च) पोषक तत्वों के अवशोषण में सहायक — पाचक संस्थान की सभी क्रियाएं जल की उपस्थिति में होती है और विभिन्न पोषक तत्वों का अवशोषण तरल रूप में होता है । अत: हम कह सकते हैं कि जल का हमारे जीवन में बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है।

Q. 4. पीने के पानी के गुणों या विशेषताओं का वर्णन करें । 

Ans. पीने का पानी शुद्ध व साफ होना चाहिए जिससे हमारा स्वास्थ्य ठीक रहे । इसमें निम्नलिखित गुण होने चाहिए-

(क) पीने का पानी स्वादहीन, गंधहीन व रंगहीन होना चाहिए ।

(ख) पीने का पानी शुद्ध व साफ हो व पारदर्शी हो क्योंकि गंदला पानी पीने योग्य नहीं होता है। 

(ग) पीने का पानी रोगाणुरहित होना चाहिए । 

(घ) पीने का पानी रसायनों से रहित होना चाहिए क्योंकि ये रसायन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होते हैं। 

(ङ) पीने का पानी स्वाद में अच्छा होना चाहिए, खारा पानी पीने योग्य नहीं होता ।

(च) पीने का पानी भोजन बनाने व पेय पदार्थ बनाने के अनुकूल होना चाहिए ।

(छ) पीने का पानी तटस्थ होना चाहिए।

Q.5. ग्रामीण कैम्प में भाग लेते हुए आपको जल स्वच्छता के लिए ‘छानने’ की विधि का प्रदर्शन करना है । पानी को पीने के लिए उपयुक्त बनाने की इस विधि को क्रम से लिखिए ?

Or, गांव के कुएं का पानी मिट्टी वाला है। गांव वालों को आस-पास से उपलब्ध सामग्री एकत्रित कर पानी छानने का फिल्टर बनाने की विधि बताओ ।

Ans. चार कलशों के द्वारा छानने का तरीका गांवों में अधिक प्रचलित है। पीने के पानी को केवल मलमल के कपड़े में छानने से पानी पीने योग्य नहीं बनता, क्योंकि कपड़े से छानने में तो केवल मिट्टी दूर होती है, रोग के कीटाणु दूर नहीं होते । रोग के कीटाणु दुर्गन्धयुक्त गैसें व महीन कीचड़ आदि कपड़े से छनने के बाद भी जल में विद्यमान रहते हैं ।

मिट्टी के घड़ों में पानी छानने का सिद्धान्त-

(क) इस सिद्धान्त में मिट्टी के चार घड़े लिए जाते हैं यह घड़े स्टैंड के ऊपर रखे जाते हैं ऊपर वाले घड़े के मुंह पर मलमल का सफेद साफ कपड़ा ढका होता है। सबसे नीचे वाले घड़े को छोड़कर बाकी घड़ों में छोटा छेद होता है जिसमें से पानी गुजरकर दूसरे घड़े में पहुँचता है ।

(ख) दूसरे घड़े में कोयले का चूरा डाला जाता है जिससे कि जब पानी इसमें से गुजरता है तो कोयले से पानी की दुर्गन्ध दूर हो जाती है ।

(ग) तीसरे घड़े में रेत व छोटे-छोटे पत्थर के टुकड़े होते हैं जिसमें रोग के कीटाणु फँस कर रह जाते हैं।

(घ) इस तरह चौथे घड़े में जो पानी पहुंचता है वह छन-छन कर पीने योग्य होता है।

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