NCERT Solutions for Class 12 Hindi Core – अपठित काव्यांश-बोध Easy Notes

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NCERT Solutions for Class 12 Hindi Core – अपठित काव्यांश-बोध Easy Notes


1 जिसका पहले से अध्ययन न किया गया हो, उसे अपठित कहते हैं। परीक्षा में इसी तरह का काव्यांश देकर उसपर आधारित प्रश्न पूछे जाते हैं। उसे हल करते समय निम्नलिखित बिंदुओं का ध्यान रखना आवश्यक है- 

1. सबसे पहले काव्यांश को दो से तीन बार ध्यानपूर्वक पढ़ना चाहिए। इस प्रक्रिया काव्यांश का मूल भाव समझ में आ जाएगा।

2. फिर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर काव्यांश में रेखांकित करने चाहिए।

3. अब उन प्रश्नों का उत्तर सरल व सहज भाषा में देना चाहिए।

4. प्रश्नों के उत्तर सिर्फ काव्यांश पर ही आधारित होने चाहिए।

5. प्रश्नों के उत्तर सीधे, संक्षिप्त व सटीक होने चाहिए।


कक्षा | Class12th 
अध्याय का नाम | Chapter Nameअपठित काव्यांश-बोध
अध्याय प्रकार | Chapter typeहिंदी व्याकरण | Hindi grammar
किताब | Bookहिंदी कोर | HINDI CORE
बोर्ड | Boardसभी बोर्ड | All India Board
किताब | Book एनसीईआरटी | NCERT
विषय | Subjectहिंदी | HINDI


महत्त्वपूर्ण अपठित काव्यांश बोध


NCERT Solutions for Class 12 Hindi Core – अपठित काव्यांश बोध Easy Notes

निम्नलिखित काव्यांशों को ध्यान से पढ़िए और तत्संबंधी प्रश्नों के उत्तर दीजिए-

1. ब्रह्मा से कुछ लिखा भाग्य में मनुज नहीं लाया है, अपना सुख उसने अपने भुजबल से पाया है। प्रकृति नहीं डर कर झुकती है कभी भाग्य के बल से, सदा हारती वह मनुष्य के उद्यम से, श्रमजल से । ब्रह्मा का अभिलेख पढ़ा- करते निरुद्यमी प्राणी, धोते वीर कु-अंक भाल के ब्रह्मा ध्रुवों से पानी । भाग्यवाद आवरण पाप का और शस्त्र शोषण का, जिससे रखता दबा एक जन भाग दूसरे जन का । 

प्रश्न 

(क) प्रकृति मनुष्य के आगे कब झुकती है ?

(ख) भाग्य-लेख कैसे लोग पढ़ते हैं ? 

(ग) भाग्यवाद को ‘पाप का आवरण’ और ‘शोषण का शस्त्र’ क्यों कहा गया है ?

(घ) इस काव्यांश से आपको क्या प्रेरणा मिलती है ?

(ङ) ‘भाल के कु-अंक’ से कवि का क्या तात्पर्य है ?

उत्तर — 

(क) प्रकृति मनुष्य के आगे तब झुकती है, जब वह पसीना बहाकर परिश्रम करता है। 

(ख) श्रम से बचने वाले कामचोर लोग भाग्य का लेख पढ़ा करते हैं।

(ग) भाग्यवाद को ‘पाप का आवरण’ और ‘शोषण का शस्त्र’ इसलिए कहा गया है क्योंकि इसी के बल पर एक साधन-संपन्न प्राणी दूसरे का हिस्सा मार लेता है। प्रायः यनी लोग गरीबों का धन चूस लेते हैं और अपनी अमीरी तथा गरीबों की गरीबी को भाग्य का खेल मानते हैं। 

(घ) इस काव्यांश से हमें भाग्य के भरोसे न बैठकर परिश्रम करने की प्रेरणा मिलती है। बुरी रेखाओं ‘भाल के कु-अंक’ से कवि का आशय है-बुरी किस्मत। माथे पर लिखी का आशय है-भाग्य खराब होना।


2. यह देखिए, अरविंद-से शिशुवृंद कैसे सो रहे हैं नेत्र माता के इन्हें लख तृप्त कैसे हो रहे । क्यों खेलना, सोना, रुदन करना, विहँसना आदि सब, देता अपरिमित हर्ष उसको देखती वह इन्हें जब ? वह प्रेम है, वह प्रेम है, वह प्रेम है, वह प्रेम है, है अचल जिसकी मूर्ति, हाँ-हाँ, अटल जिसका नेम है । 

(क) शिशुओं की तुलना किससे की गई है और क्यों ? 

(ख) ‘वह प्रेम है कथन को बार-बार क्यों दुहराया गया है ? 

(ग) सोते समय बच्चे को देखकर माँ की आँखों में कौन-सा भाव दिखाई पड़ता है ?

(घ) माँ को असीम आनंद कब प्राप्त होता है ?

(ङ) संतान के प्रति माता-पिता के प्रेम को क्या कहते हैं ? 

उत्तर- 

(क) शिशुओं की तुलना अरविंद अर्थात् कमल से की गई है। शिशु स्वभाव से कोमल तथा निर्मल होते हैं। इस कारण इनकी तुलना अरविंद से की गई है। 

(ख) प्रेम के महत्त्व पर बल देने के लिए यह कथन बार-बार दोहराया गया है। 

(ग) सोते बच्चे को देखकर माँ की आँखों में तृप्ति का भाव दिखाई देता है। (घ) बच्चे को सौता, हँसता, खेलता, रोता देखकर माँ के मन में असीम आनंद की अनुभूति होती है।

(ङ) वात्सल्य।


3. है अगम चेतना की घाटी, कमजोर पड़ा मानव का मन, ममता की शीतल छाया में, होता कटुता का स्वयं शमन ! ज्वालाएँ जब घुल जाती हैं, खुल-खुल जाते हैं मुद्दे नयन, होकर निर्मलता में प्रशांत, वहता प्राणों का क्षुव्य पवन । संकट में यदि मुसका न सको, भय से कातर हो मत रोओ ! यदि फूल नहीं बो सकते हो, काँटे कम से कम मत बोओ ! 

प्रश्न – 

(क) फूल या काँटे बोने का भाव क्या है ?

(ख) मानव मन की कड़वाहट कैसे दूर हो सकती है ?

(ग) ‘ज्वालाएँ’ किसका प्रतीक है ? 

(घ) उत्तेजित मन कब शांत हो जाता है ?

(ङ) कवि कठिनाई के क्षणों में क्या करने या न करने का परामर्श दे रहा है ?

उत्तर- 

(क) फूल बोने का अर्थ है-सुख देने वाले भले काम करना । काटे बोने का आशय है-दुखदायी काम करना । 

(ख) ममता की शीतल छाया में रहकर मान-मन की कड़वाहट दूर हो जाती है।

(ग) ज्वालाएँ सांसारिक कष्टों की प्रतीक हैं। 

(घ) उत्तेजित मन ममता की शीतल छाया में निर्मल होने पर शांत हो जाता है।

(ङ) कवि कठिनाई के क्षणों में फूल बोने अर्थात् सुख देने वाले कर्म करने की प्रेरणा दे रहा है। वह भयभीत न होने तथा दुखदायी कार्य न करने की भी प्रेरणा दे रहा है।


4. थका-हारा सोचता मन सोचता मन उलझती ही जा रही है एक उलझन । अँधेरे में अँधेरे से कब तलक लड़ते रहें सामने जो दिख रहा है, वह सच्चाई भी कहें। भीड़ अंचों की खड़ी खुश रेवड़ी खाती अँधेरे के इशारों पर नाचती गाती। थका हारा सोचता मन सोचता मन। भूखी प्यासी कानाफूसी दे उठी दस्तक अंधा बन जा झुका दे तम द्वार पर मस्तक । 

रेवड़ी की बाँट में तू रेवड़ी बन जा तू तिमिर के दरबार में दरवान सा तन जा थका हारा, उठा गर्दन जूझता मन दूर उलझन ! दूर उलझन ! दूर उलझन ! चल खड़ा हो पैर में यदि लग गई ठोकर खड़ा हो संघर्ष में फिर रोशनी होकर मृत्यु भी वरदान है संघर्ष में प्यारे सत्य के संघर्ष में क्यों रोशनी हारे। देखते ही देखते तम तोड़ता है दम और सूरज की तरह हम ठोंकते हैं खम।

प्रश्न 

(क) थके-हारे मन की उलझन क्या थी ?

(ख) अँधेरे में अंघों की भीड़ खुश क्यों थी ? 

(ग) भूख-प्यास की विवशता का क्या परामर्श था ?

(घ) जुझारू मन ने सुझाव क्यों नहीं माना ? 

(ङ) संघर्ष में विजय किसे मिलती है ?

उत्तर—

(क) थके-हारे मन की उलझन यह थी कि संघर्ष की निराशा को झेलते रहें या अँधेरे के आगे घुटने टेककर सुख लूटें । 

(ख) अँधेरे में अंधों की भीड़ रेवड़ी अर्थात् स्वार्थ भोग करके खुश थी।

(ग) भूख-प्यास की विवशता का परामर्श था कि तू भी तम के दरबार में माथा झुकाकर सुख लूट ।

(घ) जुझारू मन ने पराजय का सुझाव इसलिए नहीं माना क्योंकि उसे संघर्ष-पथ में वरदान का बोध हो गया।

(ङ) संघर्ष में विजय उसी को मिलती है जो सूरज या रोशनी की तरह डटकर खड़ा हो जाता है।


5. हँस उठते पल में आर्द्र नयन, घुल जाता होठों में विषाद, लुट जाता चिर-संचित विराग, ऑंखें देती सर्वस्व वार।

प्रश्न :- 

(क) नायिका के नयन आर्द्र क्यों हैं ?

(ख) नायिका के आई नेत्र किस कारण से हँस उठते ?

उत्तर- (क) नायिका के नयन अपने प्रिय से वियोग के कारण आर्द्र हैं। 

(ख) नायिका के आर्द्र नेत्र उसके प्रिय के आने पर हँस उठते । 


6.प्रिय के दर्शन से नायिका का चिर-संचित विराग लुट जाता। नायिका अपने प्रिय पर सब कुछ न्योछावर करने को प्रस्तुत है। जान पड़ता नेत्र देख बड़े-बड़े दीरकों में गोल नीलम हैं जड़े। स्वर्ग का यह सुमन धरती पर खिला नाम इसका उचित दी है उर्मिला। 

प्रश्न 

(क) इन पंक्तियों में कवि ने किसे सौंदर्य का वर्णन किया है ?

(ख) कवि को नायिका के नेत्र कैसे जान पड़ते हैं ?

(ग) कवि ने नायिका को ‘स्वर्ग का सुमन’ क्यों कहा है ?

(घ) इन पंक्तियों में किस अलंकार का प्रयोग किया गया है ? 

उत्तर- 

(क) इनमें उर्मिला के सौंदर्य का वर्णन है।

(ख) कवि को नायिका के नेत्र जैसे जान पड़ते हैं मानो रीरकों में गोल नीलम जड़े हों। 

(ग) नायिका के अति उज्ज्वल सौंदर्य के कारण कवि ने नायिका को स्वर्ग का सुमन कहा है। जड़े’ में उत्प्रेक्षा अलंकार है।

(घ) ‘जान पड़ता

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English SubjectResult
Hindi SubjectHistory answer keys

7. मैंने देखा- एक बड़ा बरगद का पेड़ खड़ा है उसके नीचे कुछ छोटे-छोटे पीचे बड़े सुशील विनम्र देखकर मुझको यो बोले- हम भी कितने खुशकिस्मत हैं। जो खतरों का नहीं सामना करते। आसमान से पानी बरसे, आगी बरसे आँधी गरजे हमको कोई फिक्र नहीं है एक बड़े की वरद छत्र-छाया के नीचे हम अपने दिन बिता रहे हैं। बड़े सुखी है। 

मैंने देखा- एक बड़ा बरगद का पेड़ खड़ा है उसके नीचे कुछ छोटे-छोटे पौधे असंतुष्ट और रुष्ट देखकर मुझको यो बोले- हम भी कितने बदकिस्मत हैं। जो खतरों का नहीं सामना करते वे कैसे ऊपर बढ़ सकते हैं। इसी बड़े की छाया ने ही हमको बोना बना रखा हम बड़े दुखी हैं।

प्रश्न 

(क) इस कविता में बरगद तथा छोटे पौधे किसके प्रतीक हैं ? 

(ख) पहले अंश में पौधे अपने-आपको खुशकिस्मत क्यों समझते हैं ? 

(ग) दूसरे अंश में पौधे असंतुष्ट और रुष्ट क्यों हैं ?

(घ) पौधे स्वयं को बदकिस्मत क्यों समझते हैं ?

(ङ) विकास के लिए क्या आवश्यक है ?

(च) इस पद्यांश का शीर्षक लिखिए ।

(छ) इसका सार लिखिए।

उत्तर- (क) इस कविता में ‘बरगद’ माता-पिता या अभिभावकों का तथा नन्हीं पीढ़ी के प्रतीक हैं। ‘छोटे पीथे’ नई

(ख) पौधे अपने-आपको खुशकिस्मत इसलिए समझते हैं क्योंकि बरगद उन्हें सब मुसीबतों से बचा लेता है। उसके होते हुए वे सुरक्षित अनुभव करते हैं।

(ग) दूसरे अंश में पौधे असंतुष्ट और रुष्ट इसलिए हैं क्योंकि वे बरगद को अपने विकास में बाधक मानते हैं।

(घ) पौधे स्वयं को बदकिस्मत इसलिए मानते हैं क्योंकि उन्हें आने वाले संकटों को स्वयं झेलने का अवसर नहीं मिल पाया। इसलिए उनका विकास भी नहीं हो पाया।

(च) विकास करने के लिए आवश्यक है कि मनुष्य अपनी चुनौतियों से स्वयं निपटे । वह अपने खतरे खुद उठाए।

(छ) नन्हें पौधों की पीढ़ियाँ ।

(ज) पहले की पीढ़ियाँ ऐसी थीं जो अपने बड़े-बुजुर्गों को धन्यवाद देती थीं। वे उन्हें अपना संरक्षक तथा हितैषी मानती थीं। आज की नई पीढ़ी उन्हें अपने विकास में बाधक मानती है। यह दुर्भाग्य है। जब भी


8.भूख से लड़ने 

कोई खड़ा हो जाता है सुंदर दीखने लगता है।

झपटता बाज,

फन उठाए साँप दो पैरों पर खड़ी

काँटों से नन्हीं पत्तियाँ खातीं बकरी,

दबे पाँव झाड़ियों में चलता चीता, डाल पर उलटा लटक

फल कुतरता तोता या इन सब की जगह आदमी होता ।

जब भी

भूख से लड़ने

कोई खड़ा हो जाता है

सुंदर दीखने लगता है।

प्रश्न 

(क) इस कविता से क्या प्रेरणा मिलती है ? 

(ख) झपटते बाज और फन उठाए सांप में कवि को सौंदर्य क्यों नजर आता है ?

(ग) आदमी कब सुंदर दीखता है ? 

(घ) कवि ने विभिन्न पशु-पक्षियों को किन मुद्राओं में दिखाया है और क्यों ?

(ङ) इसका शीर्षक लिखें। 

(च) इसका सार लिखें।

उत्तर- क) इस कविता से भूख शांत करने के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा मिलती है। 

(ख) झपटते बाज और फन उठाए साँप में कवि को इसलिए सौंदर्य नजर आता है क्योंकि दोनों पेट भरने के लिए ऐसा कर रहे हैं।

(ग) कवि कहता है कि आदमी तभी सुंदर दीखता है, जबकि वह भी रोजी-रोटी के लिए संघर्ष करता है। 

(घ) कवि ने विभिन्न पशु-पक्षियों को संघर्ष की मुद्रा देना चाहता है कि रोटी के लिए घोर परिश्रम करो। में दिखाया है। ऐसा दिखाकर वह प्रेरणा

(च) भूख और संघर्ष। 

(छ) भूख से लड़ने वाला प्राणी सुंदर लगता है, चाहे वह झपटता बाज हो, फन उठाए साँप हो, काँटों से पत्तियाँ खाती बकरी हों, दबे पाँव आता चीता हो, उलटा लटकता तोता हो या संघर्ष करता हुआ आदमी हो।


9.शांति नहीं तब तक, जब तक

सुख भाग न सवका सम हो।

नहीं किसी को बहुत अधिक हो । नहीं किसी को कम हो ।

स्वत्व माँगने से न मिले, संघात पाप हो जाएँ।

बोलो धर्मराज, शोषित वे

जियें या कि मिट जाएँ ? न्यायोचित अधिकार माँगने

से न मिले, तो लड़ के । तेजस्वी छीनते समर को,

जीत, या कि खुद मर के । किसने कहा, पाप है समुचित

स्वत्व प्राप्ति-हित लड़ना ?. उठा न्याय का खड्ग समर में अभय मारना मरना ?

प्रश्न 

(क) शांति के लिए क्या आवश्यक है ?

(ख) कौन-सा युद्ध निष्पाप है ? 

(ग) धर्मराज से पूछा गया प्रश्न हिंदी गद्य में लिखें।

(घ) तेजस्वी लोगों की क्या पहचान है ?

(ङ) इसका शीर्षक लिखें। 

(च) इसका सारांश लिखें।

उत्तर- 

(क) शांति के लिए आवश्यक है—सुख के साधनों की समानता ।

(ख) जो कुछ न्यायपूर्ण अधिकारों को पाने के लिए किया जाता है, वह निष्पाप होता है। 

(ग) हे धर्मराज, अगर अपने अधिकार माँगने से न मिले और उन्हें पाने के लिए संघर्ष किया जाए तो उसे पाप कहा जाए। ऐसी स्थिति में शोषित लोग कहाँ जाएँ ? वे जीवित कैसे रहें ? क्या वे मर जाएँ ?

(घ) तेजस्वी लोगों की पहचान यह है कि वे अपने अधिकारों को पाने के लिए संघर्ष करते हैं। वे या तो अपने हक छीनकर ले लेते हैं या लड़ते-लड़ते मर जाते हैं। 

(ङ) न्यायोचित संघर्ष उचित है।

(च) जब तक सुख के साधनों का बँटवारा बराबर नहीं होगा तब तक अशांति बनी रहेगी। अगर माँगने से भी अधिकार न मिले तो अपने न्यायोचित अधिकारों के लिए संघर्ष करना पाप नहीं है। तेजस्वी वीर अपने अधिकारों को संघर्ष और बलिदान देकर प्राप्त कर लेते हैं। न्याय के लिए तलवार उठाना गलत नहीं है।


10. आदर्शों से आदर्श भिड़े, प्रज्ञा प्रज्ञा पर टूट रही। प्रतिमा प्रतिमा से लड़ती है, धरती की किस्मत फूट रही।

आवतों का है विषम जाल, निरुपाय बुद्धि चकराती है, विज्ञान-यान पर चढ़ी हुई सभ्यता डूबने जाती है। जब-जब मस्तिष्क जयी होता, संसार ज्ञान से चलता है,

शीतलता की है राह हृदय, तू यह संवाद सुनाता चल । 

प्रश्न- 

(क) धरती की किस्मत फूटने का कारण स्पष्ट कीजिए।

(ख) सभ्यता के डूबने का अर्थ एवं कारण स्पष्ट कीजिए। 

(ग) मन को शांति कैसे मिलती है ? 

(घ) मस्तिष्क जयी होने का क्या अर्थ है ? उसका क्या दुष्परिणाम होता है ?

(ङ) इसका शीर्षक लिखिए। 

(च) इसका एक-तिहाई शब्दों में सारांश लिखिए

उत्तर- 

(क) आदर्शों से आदर्श टकरा रहे हैं, विचारों से विचार टकरा रहे हैं। इस आपसी टकराहट के कारण धरती की किस्मत फूट रही है।

(ख) वैचारिक प्रगति के कारण सभ्यता डूबने जा रही है। आशय यह है कि आज संसार में विचारधाराओं और धर्मों की टक्कर के कारण पूरी मानव जाति का संहार होने का खतरा मँडराने लगा है।

(ग) हृदय अर्थात भावनाओं के विकास से मन को शांति मिलती है। 

(घ) ‘मस्तिष्क जयी’ होने का अर्थ है-कोमल भावनाओं की बजाय तर्क और बुद्धि से जीवन जीना। इसका दुष्परिणाम यह होता है कि तर्क से आपसी संघर्ष और अलगाव बढ़ते हैं।

(ङ) बौद्धिक प्रगति की हानियाँ ।

(च) आज हर मनुष्य अपने-अपने विचार, सिद्धांत, आदर्श और आस्था पर दृढ़ है। वैचारिक संघर्ष से विज्ञान की उन्नति तो खूब हो रही है, लेकिन आपसी संघर्ष भी बहुत बढ़ गए हैं। अब तो युद्धों के कारण सर्वनाश का खतरा मँडराने लगा है। आज अगर शांति लानी है तो हमें कोमल भावनाओं को महत्त्व देना होगा। वस्तुतः कोमलता और नम्रता से ही शांति स्थापित हो सकता है।


11. यह समर तो और भी अपवाद है चाहता कोई नहीं इसको, मगर जूझना पड़ता सभी को, शत्रु जब आ गया हो द्वार पर ललकारता । छीनता हो स्वत्व कोई और तू त्याग तप से काम ले, यह पाप है। पुण्य है विच्छिन्न कर देना उसे बढ़ रहा तेरी तरफ जो हाथ हो।

युद्ध को तुन निंद्य कहते हो मगर जब तलक हैं उठ रहीं चिंगारियाँ

भिन्न स्वार्थी के कुलिश संघर्ष की, युद्ध तब तक विश्व में अनिवार्य है।

और जो अनिवार्य है, उसके लिए खिन्न या परितप्त होना व्यर्थ है। तू नहीं लड़ता, न लड़ता, आग यह फूटती निश्चय किसी भी ब्याज से

प्रश्न – 

(क) कवि ने किसे पाप कहा है ?

(ख) युद्ध कब तक जारी रहेगा ?

(ग) युद्ध के लिए पछतावा न करने की बात क्यों कही गई है ? चाहता ?

(घ) किस चीज को कोई नहीं 

(ङ) इसका शीर्षक लिखिए ।

(च) इसका एक-तिहाई शब्दों में सारांश लिखिए ।

उत्तर— 

(क) अधिकार को छिनता देखकर भी त्याग तप की नीति पर चलना पाप है। 

(ख) जब तक लोगों के स्वार्थ टकराते रहेंगे, युद्ध जारी रहेगा। 

(ग) जब युद्ध होना अनिवार्य है, उसे टाला नहीं जा सकता, तो उसके लिए पछतावा नहीं करना चाहिए।

(घ) युद्ध करना कोई नहीं चाहता। 

(ङ) युद्ध एक आवश्यक मजबूरी।

(च) युद्ध करना कोई नहीं चाहता। परंतु जब यह सिर पर आ पड़े तो लड़ना ही पड़ता है। अधिकारों को छिनता देखकर युद्ध न करना पाप है। अन्यायी के हाथ काट देना पुण्य है। जब तक स्वार्थ प्रबल रहेंगे, युद्ध होते ही रहेंगे। इसलिए युद्ध की इस मजबूरी के लिए पछताना नहीं चाहिए।


12. चूके, मुझ पर त्रैलोक्य भले ही थूके, जो कोई जो कह सके, कहे, क्यों चूके ? छीने न मातृपद किंतु भरत का मुझसे, हे राम, दुहाई करूँ और क्या तुझसे ? कहते आते थे यही अभी नरदेही, ‘माता न कुमाता, पुत्र-कुपुत्र भले ही।’ अब कहें सभी यह हाय। 

विरुद्ध विधाता, ‘है पुत्र पुत्र ही, रहे कुमाता माता।’.. परमार्थ न देखा, पूर्ण स्वार्थ ही साधा, इस कारण ही तो हाय आज यह बाधा।

युग-युग तक चलती रहे कठोर कहानी, ‘रघुकुल में भी थी एक अभागिन रानी’ निज जन्म-जन्म में सुने जीव यह मेरा धिक्कार। उसे था महा स्वार्थ ने घेरा।’

प्रश्न- 

(क) इस काव्यांश का वक्ता कौन है ? 

(ख) वक्ता अपने पर थूकने की बात क्यों कर रहा है ?

(ग) लोगों में माता-पुत्र के बारे में कौन-सी उक्ति प्रचलित है ? 

(घ) ‘बस मैंने इसका बाह्य मात्र ही देखा’ में किसकी बात हो रही है ?

(ङ) इसका शीर्षक लिखिए।

(च) इसका एक-तिहाई शब्दों में सारांश लिखिए ।

(छ) रघुकुल की अभागिन रानी कौन थी ? उसने कौन-सा महास्वार्थ दिखलाया ? 

उत्तर- (क) इस काव्यांश की वक्त्री है-कैकेयी ।

(ख) कैकेयी ने राम को मिलने वाला राज्य भरत को दिला दिया था और राम को चौदह रही है। वर्ष का वनवास दिलवा दिया था। 

(ग) लोगों में माता-पुत्र के बारे में यही उक्ति प्रचलित है— पुत्र – कुपुत्र भले ही हो जाए, किंतु कह माता कभी कुमाता नहीं होती।

(घ) इसमें भरत की चारित्रिक दृढ़ता और उदारता की बात हो रही है।

(ङ) कैकेयी का पछतावा । 

(च) कैकेयी राम के सामने पछतावा प्रकट करती है। वह अपने पर हर कलंक सहने को तैयार है, किंतु वह भरत की बेरुखी नहीं सहन कर सकती। उसने भरत के चरित्र को ठीक से जाना नहीं था। उसे नहीं पता था कि उसका बेटा भरत इतना न्यायी, उदार, सच्चा और भ्रातृ-स्नेही होगा। वह पछतावा प्रकट करती हुई कहती है कि मैंने जो स्वार्थ प्रकट किया है, इसके लिए मुझे दुनिया सदा धिक्कारती रहे।

(छ) रघुकुल की अभागी रानी थी कैकेयी। उसने अपने पुत्र के लिए राज्य तथा राम के लिए चौदह वर्षों का वनवास माँगकर महास्वार्थ का परिचय दिया था। 


13. जिस-जिससे पथ पर स्नेह मिला उस-उस राही को धन्यवाद। जीवन अस्थिर, अनजाने ही हो जाता पथ पर मेल कहीं सीमित पग-डग, लंबी मंजिल तय कर लेना कुछ खेल नहीं दाएँ-बाएँ सुख-दुख चलते सम्मुख थलता पथ का प्रमाद जिस-जिससे पथ पर स्नेह मिला उस-उस राही को धन्यवाद । 

जो साथ न मेरा दे पाए उनसे कब सूनी हुई डगर मैं भी न चलूँ यदि तो भी क्या राही मर, लेकिन राह अमर इस पथ पर वे ही चलते हैं जो चलने का पा गए स्वाद जिन जिससे पथ पर स्नेह मिला उस-उस राही को धन्यवाद।

प्रश्न –

(क) कवि के अनुसार जीवन कैसा है ? 

(ख) जीवन रूपी यात्रा में कैसे-कैसे अनुभव आते हैं ?

(ग) मंजिल तय करना खेल नहीं है क्यों ?

(घ) जीवन रूपी डगर पर कौन चलते हैं ?

(ङ) इसका शीर्षक लिखिए ।

(च) इसका एक-तिहाई शब्दों में सारांश लिखिए। 

(छ) कवि किसको धन्यवाद करता है और क्यों ?

(ज) राह को अमर क्यों कहा गया है ?

उत्तर— 

(क) कवि के अनुसार जीवन नश्वर है, चंचल है, क्षण-भंगुर है।

(ख) जीवन रूपी यात्रा में सुख-दुख और प्रमाद के अवसर आते रहते हैं। 

(ग) मंजिल पाने के लिए सुख-दुख, प्रमाद आदि को झेलना पड़ता है। इसकी राह बहुत लंबी होती है और चलने वाले के कदम बहुत छोटे होते हैं। इसलिए उसे पा लेना बहुत कठिन काम है।

(घ) जिनको चलने में आनंद मिलता है, वही इस डगर पर चलते हैं। 

(ङ) जीवन रूपी यात्रा।

(च) जीवन रूपी यात्रा में जिस-जिस साथी से स्नेह मिला, कवि उसे धन्यवाद देता है। इस नश्वर जीवन में अनजाने में ही किसी से मेल हो जाता है। जीवन की मंजिल बहुत दूर है और यात्री के कदम बहुत छोटे हैं। रास्ते में सुख-दुख और प्रमाद रूपी बाधाएँ भी आती रहती हैं। इसलिए मंजिल को पा लेना आसान नहीं है।

यात्री नश्वर हैं लेकिन राह अमर है। राह चलती ही रहती है। जो लोग चलने का रस पा गए, वे ही चल पाते हैं। कवि उन साथियों को धन्यवाद देता है जिन्होंने उसे समय-समय पर स्नेह दिया।

(छ) कवि उन उन साथियों को धन्यवाद देता है जिन्होंने जीवन रूपी यात्रा में कवि को स्नेह दिया। उनका स्नेह पाकर कवि का जीवन-पथ सरल तथा सुहाना हो गया। 

(ज) राह अमर है, अर्थात जीवन अनंत है। यह कभी समाप्त नहीं होता।


14. मस्त योगी हैं कि हम सुख देखकर सबका सुखी हैं, कुछ अज़ब मन है कि हम दुख देखकर सबका दुख हैं, तुम हमारी चोटियों की बर्फ को यों मत कुरेदो, दहकता लावा हृदय में है कि हम ज्वालामुखी हैं । 

लास्य भी हमने किए हैं और तांडव भी किए हैं, वंश मीरा और शिव के, विष पिया है औ’ जिए हैं, दूध माँ का, या कि चंदन या कि केसर को समझ लो, यह हमारे देश की रज है, कि हम इसके लिए हैं।

प्रश्न-

(क) इस कविता में किस देश के निवासियों की बात की गई है ? कारण दीजिए।

(ख) लास्य और तांडव से आप क्या समझते हैं ?

(ग) इस कविता में भारतीयों की किस विशेषता को उजागर किया गया है ? 

(घ) इस कविता का मूल भाव क्या है ?

(ङ) इसका शीर्षक लिखिए ।

(च) इसका एक-तिहाई शब्दों में सारांश लिखिए।

उत्तर- (क) इस कविता में भारत के निवासियों की बात की गई है। मीरा, शिव, लास्य और तांडव यहीं की संस्कृति से संबंधित हैं।

(ख) पार्वती के आनंददायक नृत्य को ‘लास्य’ तथा शिव के ध्वंसकारी नृत्य को ‘तांडव’ कहते हैं।

(ग) इस कविता में भारतीयों की उदारता, मस्ती, जोश तथा विध्वंसकारी शक्ति का वर्णन

किया गया है। (घ) इस कविता का मूल भाव यह है कि भारतीय उदार जरूर हैं, किंतु वे शत्रु को नाकों चने चबवा देते हैं।

(ङ) भारत के सपूत ।

(च) भारत में आध्यात्मिक, करुणावान तथा मस्त लोग रहते हैं। वे दूसरों के कष्टों पर करुणा करते हैं। परंतु उन्हें शत्रु का विनाश करना भी आता है। वे सच्चे देशभक्त हैं। अवसर आने पर वे देश हित बलिदान करने को तैयार रहते हैं।


15. जब तक साथ एक भी दम हो, हो अवशिष्ट एक भी धड़कन । रखो आत्म गौरव से ऊँची, पलकें, ऊँचा सिर, ऊँचा मन । एक बूँद भी रक्त शेष हो, जब तक तन में है शत्रुंजय । दीन वचन मुख से न उचारो, मानो नहीं मृत्यु का भी भय । 

निर्भय स्वागत करो मृत्यु का, मृत्यु एक है विश्राम स्थल । जीव जहाँ से फिर चलता है, धारण कर नव जीवन-संबल । मृत्यु एक सरिता है, जिसमें श्रम से कातर जीव नहाकर । फिर नूतन धारण करता है, काया रूपी वस्त्र बहाकर ।

प्रश्न – 

(क) कवि मृत्यु का स्वागत करने के लिए क्यों कहता है ? 

(ख) इस कविता में किस प्रकार का जीवन जीने की प्रेरणा दी गई है ?

(ग) मृत्यु को सरिता क्यों कहा गया है ?.. 

(घ) ‘शत्रुंजय’ का क्या अर्थ है ?

(ङ) इसका शीर्षक लिखिए । 

(च) इसका एक तिहाई शब्दों में सारांश लिखिए ।

उत्तर- 

(क) कवि आत्मगौरव की रक्षा करने के लिए मृत्यु का स्वागत करने को कहता है।

(ख) इस कविता में निर्भय होकर आत्मगौरव का जीवन जीने की प्रेरणा दी गई है। 

(ग) मृत्यु को सरिता इसलिए कहा है क्योंकि वह जीवन को नया रूप प्रदान करती है। मनुष्य लंबा समय जीने के बाद मृत्यु रूपी सरिता में नहाकर फिर से तरोताजा हो जाता है, अर्थात् बच्चे के रूप में जन्म लेकर नया जीवन धारण कर लेता है।

(घ) शत्रुजय का अर्थ- शत्रुओं पर विजय पाने वाला। (ङ) निर्भय होकर जियो।

(च) मनुष्य में जब तक जीवन है, उसे आत्मगौरव से जीना चाहिए। उसे न तो कभी दीनता अपनानी चाहिए, न मृत्यु से डरना चाहिए। उसे मृत्यु को एक विश्राम स्थल या तरोताजा वाली सरिता के समान मानना चाहिए।


16.आज फिर से

धृतराष्ट्र के अंधे सपनों में पले

उसके सी-सी बिगड़ैल बेटे

शकुनि की शह पर चप्पे-चप्पे में फैल गए हैं

नगर नहीं, गाँव नहीं

संसद भवन तक पैठ गए हैं

कोई भी सरेआम भीष्म की दाढ़ी नोचता है

पर मेरे देश का नियंता कुछ नहीं सोचता है।

यह है मेरे देश की वोटिल राजनीति

जिसके मवाद में हजारों दुःशासन बिलबिलाते हैं।

कितने ही जयद्रथ, कितने दुर्योधन

कितने ही शकुनि

टेढ़ी चाल के ठहाके लगाते हैं। पर बेचारे भीष्म कुछ नहीं कर पाते हैं।

प्रश्न – 

(क) धृतराष्ट्र के अंधे सपनों में पले बिगड़ैल बेटे किस ओर संकेत कर रहे हैं ?

(ख) शकुनि की शह पर संसद भवन में पैठने का प्रतीकार्थ स्पष्ट कीजिए । 

(ग) इसमें भीष्म किसका प्रतीक है ? 

(घ) कवि ने समाज की दुर्दशा का दोषी किसे माना है ?

(ङ) इसका शीर्षक लिखिए । 

(च) इसका एक तिहाई शब्दों में सारांश लिखिए ।

उत्तर- 

(क) ‘धृतराष्ट्र के अंधे सपनों में पले बिगड़ैल बेटे’ महाभारत में दुर्योधन आदि कौरवों की ओर तथा आजकल की राजनीति में छाए दुष्ट नेताओं की ओर संकेत करते हैं।

(ख) इसमें विदेशी षड्यंत्रकारियों के इशारे पर भारतीय संसद पर हमला करने वाले पाकिस्तानी आतंकवादियों की ओर संकेत किया गया है।

(ग) भीष्म लाचार सत्ताधारी नेताओं का प्रतीक है। कवि ने वोट की राजनीति को समाज की दुर्दशा के लिए दोषी माना है। 

(ङ) देश की कुटिल राजनीति । 

(च) आज फिर से विदेशी षड्यंत्रकारियों तथा बिगड़ैल राजनीतिज्ञों का बोलबाला है। विदेशी

आतंकवादी भारत की संसद तक घुस आए हैं। वोट की राजनीति के कारण आज दुष्टों का दबदबा है। नीतिवान राजनेता चाहकर भी दुष्टों का कुछ नहीं बिगाड़ पाते।


17.मैं फिर जन्म लूँगा फिर मैं

इसी जगह आऊँगा उचटती निगाहों की भीड़ में

अभावों के बीच

लोगों की क्षत-विक्षत पीठ सहलाऊँगा। इस समय में

इस अनगिनत अचीन्हीं आवाजों में

कैसा दर्द है ! कोई नहीं सुनता

पर इन आवाजों को

और इन कराहों को दुनिया सुने, मैं यह चाहूँगा ।

मेरी तो आदत है।

रोशनी जहाँ भी हो उसे खोज लाऊँगा

कातरता चुप्पी या चीखें या हारे हुओं की खीज

जहाँ भी मिलेगी

उन्हें प्यार के सितार पर बजाऊँगा चाहे इस प्रार्थना सभा में तुम सब मुझ पर गोलियाँ चलाओ ।

मैं मर जाऊँगा लेकिन मैं कल फिर जन्म लूँगा

कल फिर आऊँगा ।

प्रश्न- 

(क) किस पर प्रार्थना सभा में गोलियाँ चलाई गई ? (ख) वक्ता फिर से क्यों जन्म लेना चाहता है ?

(ग) रोशनी खोज लाने का क्या आशय है ?

(घ) कातरता, खीज और चुप्पी को प्यार के सितार पर बजाने का क्या आशय है ?

(ङ) इसका शीर्षक लिखिए । 

(च) इसका एक-तिहाई शब्दों में सारांश लिखिए।

उत्तर— 

(क) महात्मा गाँधी पर प्रार्थना सभा में गोलियाँ चलाई गई। 

(ख) गाँधीजी दुखियों, पीड़ितों और बेचारों की आवाज को उठाने के लिए फिर से लेना चाहते हैं। 

(ग) रोशनी खोज लाने का आशय है— आशा और उत्साह का वातावरण बनना।

(घ) इसका आशय है-कायरता, खीज और चुप्पी साधने वाले शोषित जनों को प्यार देकर उनका उत्साह बढ़ाना। उन्हें संघर्ष के लिए तैयार करना। 

(ङ) गाँधी जी का संकल्प।

(थ) गाँधी जी इस अभावग्रस्त दुनिया में फिर से जन्म लेना चाहते हैं। वे घायलों, पीड़ितों और शोषितों के अनजाने दर्द को सबके सामने रखना चाहते हैं। वे निराशा में से आशा जगाना जानते हैं। ये संकल्प करते हैं कि ये दुखियों को प्यार देकर उन्हें संघर्ष के लिए तैयार करेंगे। ये गोलियाँ झेलकर भी संघर्ष करते रहेंगे।


18. मृदु मिट्टी के बने हुए, मधु-घट फूटा ही करते हैं,

लघु जीवन लेकर आए हैं, प्याले टूटा ही करते हैं,

फिर भी मदिरालय के अंदर

मधु के घट हैं, मधु प्याले हैं, जो मादकता के मारे हैं,

वे मधु लूटा ही करते हैं,

वह कच्चा पीने वाला है, जिसकी ममता घट प्यालों पर,

जो सच्चे मधु से जला हुआ कब रोता है, चिल्लाता है

जो बीत गई सो बात गई।

प्रश्न – 

(क) ‘मृदु मिट्टी के हैं बने हुए’ के दो अर्थ बताइए । 

(ख) ‘लघु जीवन’ किस-किसका होता है ? 

(ग) ‘मादकता के मारे’ का यहाँ क्या आशय है ?

(घ) ‘कच्या पीने वाला’ तथा ‘सच्चे मधु से जला हुआ’ का तात्पर्य स्पष्ट कीजिए। 

(ङ) इस काव्यांश का शीर्षक दीजिए।

(च) इस काव्यांश का मुख्य भाव/सार लिखिए ।

उत्तर- 

(क) इसका एक अर्थ है-कोमल मिट्टी से बने हुए प्याले अकसर टूट जाया करते हैं। इसका दूसरा अर्थ है— नश्वर देह वाला मनुष्य एक न एक दिन मर जाता है।

(ख) ‘लघु जीवन’ प्यालों तथा मानव शरीर का होता है। (ग) ‘मादकता के मारे’ का तात्पर्य है-प्रेम चाहने वाले, आनंद चाहने वाले ।

(घ) ‘कच्चा पीने वाला’ का अर्थ है-जीवन की समझ न रखने वाला। ‘सच्चे मधु ‘से जला हुआ’ का तात्पर्य है-प्रेमी की सच्ची भावना से ओत-प्रोत मनुष्य । 

(ङ) जो बीत गई सो बात गई।

(च) जैसे मिट्टी के प्याले नश्वर हैं, वैसे ही मानव-शरीर नश्वर है। सच्चे प्रेमी मानव शरीर पर नहीं ‘प्रेम’ पर ममता रखते हैं। वे एक मनुष्य के मरने पर दूसरे से प्रेम करना नहीं छोड़ते। मनुष्य को चाहिए कि वह बीते हुए दुख को भूलकर आगे के जीवन को प्रेममय बनाए ।



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