कक्षा 12वी के महत्वपूर्ण आलेख-लेखन | Important Class 12th Hindi Aalekh Writing

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कक्षा 12वी के महत्वपूर्ण आलेख-लेखन | Important Class 12th Hindi Aalekh Writing


Q. आलेख किसे कहते हैं ? aalekh kise kahate hain?


Aalekh kise kahate hain : आलेख को लेख या निबंध का ही एक रूप मानना चाहिए। ‘लेख’ में किसी एक विषय से संबंधित विचार होते हैं। ‘आलेख’ में लगा ‘आ’ उपसर्ग यह प्रकट करता है कि वह लेख सर्वांगपूर्ण और सम्यक् होना चाहिए। इस प्रकार आलेख गद्य लेखन की यह विधा है जिसमें किसी एक विषय पर सर्वांगपूर्ण तथा सम्यक् विचार होते हैं।

कक्षा | Class12th 
अध्याय का नाम | Chapter Nameआलेख-लेखन
अध्याय प्रकार | Chapter typeहिंदी व्याकरण | Hindi grammar
किताब | Bookहिंदी कोर | HINDI CORE
बोर्ड | Boardसभी बोर्ड | All India Board
किताब | Book एनसीईआरटी | NCERT
विषय | Subjectहिंदी | HINDI


अच्छे आलेख के गुण- एक अच्छे आलेख के निम्न गुण होते हैं-

(i) एक अच्छा आलेख नवीनता और ताजगी से संपन्न होना 

(ii) उसमें जिज्ञासा उत्पन्न करने की शक्ति होनी चाहिए। चाहिए। 

(iii) विचार इतने स्पष्ट तथा बेबाक होने चाहिए कि पाठक उन्हें पढ़ता चला जाए।

(iv) भाषा अत्यंत सरल, सुगम तथा प्रभावी होनी चाहिए। 

(v) एक ही बात को बार-बार दोहराना नहीं चाहिए। 

(vi) आलेख में विचार होते हैं, कथा नहीं। अतः कथा शैली की बजाय विवेचन और विश्लेषण- शैली का प्रयोग करना चाहिए।

(vii) प्रायः आलेख ज्वलंत मुद्द, प्रसिद्ध विषयों, महत्वपूर्ण व्यक्तियों, चरित्रों तथा अवसरों पर लिखे जाते हैं।

(viii) आलेख का आकार अधिक बड़ा नहीं होना चाहिए।


कुछ प्रमुख आलेख के उदाहरण


1. धार्मिक संवाद की आवश्यकता


12वी के महत्वपूर्ण आलेख लेखन Important Class 12th Hindi Aalekh Writing

पिछले दिनों डॉ. महीप सिंह जमाअत इस्लामी हिंद द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में सम्मिलित हुए। अवसर था ‘हजरत मोहम्मद जीवन और संदेश’ नामक हिंदी पुस्तिका तथा कुरआन सीडी (उर्दू अनुवाद) का लोकार्पण कार्यक्रम की अध्यक्षता संस्था के उपाध्यक्ष मौलाना सैयद जलालुद्दीन उमरी ने की थी। 

लेखक ने जमाअत इस्लामी हिंद को इस बात के लिए बधाई। दी कि उसने हजरत मोहम्मद से संबंधित ऐसे आयोजन में कुछ गैर-मुसलमानों को भी आमंत्रित कर संवाद को महत्व दिया। 

दूसरी बात, जिस पर उन्होंने आग्रह किया कि संसार में वह दिन कभी नहीं आएगा जब सभी लोग एक धर्म, एक धर्मग्रंथ और एक प्रवर्तक या पैगंबर के अनुयायी हो जाएँगे। इस संसार में सदा ही विविधताएँ रही हैं और भविष्य में भी रहेंगी। 

इस प्रकार की विविधताओं और उनके कारण उत्पन्न मतभेदों, विग्रहों के कारण विभिन्न धर्मों के माननेवाले की प्राप्ति लोग आपस में खूनी जंग लड़ते रहे हैं और एक-दूसरे का संहार करते रहे हैं। 

सभी धर्म शांति और भाईचारे का उपदेश देते हैं, किंतु मानव इतिहास इस बात का साक्षी है कि विभिन्न धर्मो की आपसी लड़ाइयों में आज तक जितने लोग मारे गए हैं उतने राजनीतिक प्रभुता के लिए लड़े गए युद्धों, प्राकृतिक आपदाओं या दुर्भिक्षों के कारण नहीं मारे गए।

इन अनुभवों के आधार पर चिंतनशील लोग इस निर्णय पर पहुँचे हैं कि सभी प्रकार की धार्मिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक या आर्थिक विभिन्नता और विषमता रहते हुए भी मनुष्य सहअस्तित्व के मंत्र के आधार पर जिएगा और आपस में सहयोग करते हुए आगे बढ़ेगा। 

वहाँ एक बात उन्होंने और कही कि आज इस्लाम और मुस्लिम समुदाय आतंकवाद का पर्याय बन गए हैं। आतंकवाद शत्रु से युद्ध नहीं करता। आतंकवादी वही बनता है जो अपने शत्रु से सीधे-सीधे युद्ध करने की क्षमता नहीं रखता। 

इस्लामी विद्वानों का दावा है कि इस्लाम पूरी तरह शांति और सभी की भलाई का धर्म है। वह बेगुनाहों की हत्या को अक्षम्य मानता है और किसी भी स्तर पर भेदभाव नहीं करता। कुरआन मजीद की जो प्रति इस्लामी विद्वानों ने लेखक को दी थी उसके प्रारंभिक पृष्ठों में हजरत मोहम्मद की संक्षिप्त जीवनी दी गई है। 

उसके अंतिम पृष्ठों में लिखा है कि हजरत मोहम्मद ने आखिरी हज किया और उसमें एक तकरीर की। उसमें उन्होंने कहा- “खुदा एक है और तमाम इन्सान आदम की औलाद हैं और वे सब बराबर हैं।” “अरबी को अजमी (गैर-अरबी) पर और अजमी को अरबी पर काले को गोरे पर और गोरे को काले पर कोई फजीलत (श्रेष्ठता) नहीं। अगर किसी की बड़ाई है तो नेक काम की वजह से है।” 

इन शब्दों से यह स्पष्ट है कि पैगंबर की दृष्टि में अरबी, गैर-अरबी और काले-गोरे की श्रेष्ठता उसके नेक कामों से बनती है। इस कथन का यदि विस्तार किया जाए तो मुसलमान और गैर-मुसलमान में श्रेष्ठता की कसौटी उसका धर्म नहीं है, बल्कि उसके नेक काम हैं।

डॉ. अब्दुल मुधनी की लिखी पुस्तक है— ‘इस्लाम और आतंकवाद’। इस पुस्तक में कुरआन की अनेक आयतों का उदाहरण देते हुए यह सिद्ध किया गया था कि इस्लाम किसी भी रूप में आतंकवाद का समर्थन नहीं करता। एक आयत में कहा गया है कि अल्लाह ने हजरत मोहम्मद को सभी इन्सानों के लिए वरदान बना कर भेजा। वे सभी लोगों के उद्धारक हैं, भले ही उनका दर्जा, मजहब और जाति कुछ भी क्यों न हो। इस्लाम के साथ जेहाद शब्द को जोड़कर देखा जाता है और सामान्यतः उससे यही अर्थ लिया जाता है कि इस्लाम में अपने विरोधियों और विधर्मियों के साथ सदैव युद्धरत रहने को जेहाद कहते हैं।

अनेक उग्रवादी इस्लामी संगठन अपने आप को जेहादी संगठन कहते हैं, किंतु नसीम गाजी ने अपनी पुस्तक ‘कुरआन पर अनुचित आक्षेप’ में लिखा है कि जेहाद का अर्थ युद्ध या लड़ाई नहीं है, बल्कि इसका अर्थ जद्दोजहद करना, संघर्ष करना, जी तोड़ कोशिश करना, दबाव डालना, कठिनाइयाँ और कष्ट उठाना है। 

कुरआन मजीद में एक स्थान पर कहा गया है—“ऐ पैगंबर, सत्य का इनकार करनेवालों का अनुसरण कदापि न करो और इस कुरआन को लेकर उनके साथ जबरदस्त जेहाद (प्रयत्न) करो।” लेखक का मत है कि कुरआन की इस आयत में जेहाद से अभिप्राय युद्ध और लड़ाई नहीं, बल्कि जी तोड़ कोशिश करना है। हदीस के अनुसार हजरत मोहम्मद का कथन है कि सबसे बड़ा जेहाद अपने मन पर नियंत्रण पाना है। 

लेखक यह भी मानते हैं कि कुरआन में जेहाद शब्द अनेक स्थानों पर युद्ध के लिए भी आया है। संकट यही है कि धर्मग्रंथों की जब लोग अपने-अपने ढंग से व्याख्या करते हैं तो वही अर्थ निकालते हैं जो उनकी सोच के अनुरूप होता है। 

किसी भी धर्म या मजहब के अनुयायियों को यह अधिकार है कि वे उसका प्रचार-प्रसार करने का प्रयास करें और उसकी अच्छाइयों को लोगों के सामने लाएँ। इस प्रयास के दो पक्ष हैं। पहला यह हक इस प्रचार के माध्यम से वे उन लोगों को अपने विश्वास या मजहब में लाएँ जो उससे बाहर हैं। 

दूसरा पक्ष यह है कि वे अपने धर्म या मजहब के उपदेशों और मान्यताओं को सही ढंग से उन लोगों के सम्मुख रखें जो उसके अनुयायी नहीं हैं। ऐसा अंतर-धार्मिक संवाद भ्रांतियों को दूर करने में सहायक होता है।


2. शहरी विकास की चुनौतियाँ


हाल के समय में अनेक महत्वपूर्ण शहरों, विशेषकर दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों में वैध-अवैध निर्माण के विवादों ने बहुत जोर पकड़ा है। 

अवैध निर्माण हटाने के नाम पर या फुटपाथों को खाली कराने के नाम पर एक के बाद एक ऐसे कई आदेश जारी किए गए जिनसे केवल दिल्ली जैसे एक महानगर में ही लाखों लोगों की आजीविका छिनने का खतरा उत्पन्न हो गया है। 

इससे कोई इनकार नहीं करेगा कि शहरों और महानगरों में निर्माण कार्य व फुटपाथ को कई स्तरों पर अनुशासित करना बेहद जरूरी है, लेकिन दूसरी ओर यह भी उतना ही सच है कि लाखों लोगों की आजीविका को उजाड़कर कोई खुशहाल शहर नहीं बसाया जा सकता।

यदि अनुशासन लागू करने का कार्य सावधानी से और लोगों की आजीविका को बचाते हुए किया जाए तो इसका स्वागत ही होगा, क्योंकि शहरी विकास को अनुशासित करने की आवश्यकता तो सब स्वीकार करते हैं। 

अगर गंभीर दुर्घटना की संभावना रखनेवाला कोई उद्योग रिहायशी क्षेत्र में चल रहा है तो उसे वास्तव में शीघ्र से शीघ्र हटाना चाहिए या बंद करना चाहिए। यदि कोई रिहायशी क्षेत्र में चल रही दुकान आसपास के लोगों की परेशानी का कारण बन रही है तो उसे पहले चेतावनी मिलनी चाहिए और फिर भी सुधार न करने पर उसे बंद करने के आदेश होने चाहिए। 

यदि कुछ रेहड़ी वाले सफाई का ध्यान नहीं रख रहे हैं और ज्यादा भीड़ एकत्र कर रहे हैं तो उन्हें सफाई रखने व जरूरत से अधिक जगह न लेने के कड़े निर्देश दिए जा सकते हैं। न मानने पर उन्हें हटाया भी जा सकता है। 

संक्षेप में कहें तो भरसक प्रयास होना चाहिए कि गैर-जिम्मेदार व्यवहार करनेवाले या दूसरों की सुरक्षा को खतरे में डालने वाले दोषी के विरुद्ध कार्रवाई अवश्य हो, लेकिन हजारों-लाखों लोगों को बेरोजगार या बेघर करने का निर्णय न लिया जाए।

सरकार कुछ निर्माण जरूर करती है, लेकिन बुनियादी तौर पर शहरों को सरकारें नहीं बनाती है। यह कार्य लोग करते हैं। दिल्ली सरकारी नौकरियों का सबसे बड़ा केन्द्र है तो भी यहाँ के अधिकांश लोग अपने बल पर ही रोजी-रोटी प्राप्त करते हैं। 

आम लोगों की मेहनत व रचनात्मकता ने प्रतिकूल परिस्थितियों और कम संसाधनों में जो हासिल किया है उसे तिरस्कृत करना उचित नहीं। दिल्ली जैसे शहरों के कई वर्कशाप व छोटे उद्योगों से जो सामान निकलकर आता है उसके बारे में लोग हैरान होते हैं कि इतने सस्ते में इतना अच्छा काम कैसे हो जाता कार्यस्थल के पास ही रहने के कारण कम मजदूरी में भी गुजारा कर लेते हैं। बस्तियों और गलियों है? 

इस उपलब्धि के पीछे कम मजदूरी पर काम करनेवाले अनेक हुनरमंद कारीगर है, जो में कितने ही छोटे-छोटे कार्य चल रहे है, जो एक-दूसरे के पूरक है। नियोजित शहरी विकास की आयातित धारणाओं पर इन्हें अनुचित नहीं ठहराया जा सकता। जरूरत इस बात की है कि अपने शहरों और जनसाधारण की जरूरतों के आधार पर ही हम उचित शहरी विकास व शहरी

नियोजन के मानदंड तैयार करें। यह चुने हुए प्रतिनिधियों व सरकार की जिम्मेदारी है कि वह शहरी विकास को अनुशासित करने के साथ ही जनसाधारण के आवास व आजीविका के बुनियादी अधिकारों की रक्षा करें। उन्हें ऐसे कानून बनाने चाहिए, जिनसे जनसाधारण के इन अधिकारों की रक्षा हो सके। 

सभी निर्वाचित प्रतिनिधियों को इस दिशा में प्रभावशाली भूमिका निभानी होगी। यह राजनीतिक दलो के औपसी टकराव का मुद्दा नहीं है, अपितु लोकतंत्र पर जनसाधारण की आस्था बनाए रखने का कार्य है।


3. विस्फोटों का सिलसिला


वाराणसी के संकटमोचन मंदिर में हुए धमाकों से लोग अभी उबर भी नहीं पाए थे कि आतंकियों ने दिल्ली की जामा मस्जिद को अपना निशाना बना लिया। यह हमला शुक्रवार को हुआ, जब नमाज के वास्ते मस्जिद में भारी संख्या में लोग जमा थे।

हालाँकि यह भी सच है कि वहाँ जो दो विस्फोट हुए उनकी तीव्रता बहुत कम थी। फिर भी महिलाओं और बच्चों समेत 13 लोग घायल हुए। दिल्ली पुलिस-प्रशासन को पूरा यकीन है कि इन धमाकों के पीछे आतंकियों का ही हाथ है। 

दिल्ली पुलिस जामा मस्जिद धमाकों को उसी दिन जम्मू कश्मीर में हुए आधा दर्जन बम धमाकों से जोड़ कर देख रही है। पुलिस इन संभावनाओं की भी तलाश कर रही है। कि दिल्ली और जम्मू-कश्मीर में धमाके महज एक संयोग भर थे या किसी पूर्वनियोजित साजिश का हिस्सा ?

श्रीनगर में धमाके सुबह 11 बजे शुरू हुए और शाम पाँच बजे तक अलग-अलग स्थानों पर होते रहे। इन विभिन्न हमलों में आतंकियों ने हथगोलों का इस्तेमाल किया, जो इन्होंने पुलिस और सुरक्षा बलों के वाहनों को निशाना बना कर फेंके थे। 

इन धमाकों में जो लोग मारे गए या घायल हुए वे निर्दोष महिला-पुरुष और बच्चे थे। इन धमाकों में कुछ सैन्य कर्मियों समेत पाँच लोग मारे गए और तीस के लगभग घायल हुए। माना जा रहा है कि इनका मकसद आम जन को जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव में शामिल होने से रोकने की चेतावनी देना था। 

दूसरे, वे शांति प्रक्रिया को भी इसके जरिये निशाना बनाना चाहते थे। श्रीनगर बम धमाकों की जिम्मेदारी पाकिस्तान आधारित या समर्थित आतंकी संगठनों ने ली है। इन धमाकों के संदर्भ में कथित तौर पर जैश-ए-मोहम्मद के कुछ आतंकी गिरफ्तार भी किए गए। 

इसके विपरीत दिल्ली की जामा मस्जिद बम धमाकों की किसी भी संगठन ने लिखित जिम्मेदारी नहीं ली है। पुलिस चार लोगों को हिरासत में ले कर उनसे पूछताछ कर रही है। बताते हैं कि पुलिस एक संदिग्ध महिला के बारे में भी जानकारियाँ जुटा रही है जो न सिर्फ रहस्यमय तरीके से घटनास्थल से गायब हो गई, बल्कि उसके अन्य क्रियाकलाप भी संदिग्ध प्रतीत हो रहे थे। 

जामा मस्जिद के शाही इमाम सैयद अहमद बुखारी समेत तमाम अन्य का मानना है कि इन हमलों का मकसद मुख्य तौर पर दहशत है पैदा करने के साथ-साथ सांप्रदायिक सौहार्द्र बिगाड़ कर देश को दंगों में झोंकना था। 

वाराणसी के संकटमोचन मंदिर में हुए बम धमाकों का मकसद भी सांप्रदायिक सौहार्द्र बिगाड़ना ही था। उस वक्त भी हिंदू-मुस्लिम नेतृत्व ने दोनों वर्गों से शांति बनाए रखते हुए राहत कार्यों में मदद की अपील की थी। इसमें वे सफल भी रहे थे। दोनों ही समुदायों ने राहत कार्यों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था।

शाही इमाम ने भी इन धमाकों के बाद शांति बनाए रखने और माहौल न बिगड़ने देने की अपील की। उन्होंने तो जामा मस्जिद धमाकों समेत संकटमोचन मंदिर हमले की सीबीआई जाँच की माँग तक कर डाली। हालाँकि इस क्रम में असल प्रयास तो आमलोगों को ही करने होते हैं।

1990 के दशक के अंत में दिल्ली के आईटीओ क्षेत्र में पुलिस मुख्यालय के सामने हुई आतंकी वारदात में बड़ी संख्या में लोग हताहत हुए थे। इसके पहले ब्लू लाइन बस को आतंकियों ने अपना निशाना बनाया था यस को निशाना बनाने से पूर्व आतंकी शांतिवन, कौड़िया पुल और किंग्सवे कैंप क्षेत्र में भी शृंखलाबद्ध धमाके कर चुके थे। 

दिल्ली ही क्यों, देश के अन्य भागों से आतंकी हमलों की बाकायदा एक लंबी फेहरिस्त मौजूद है। प्रश्न यह उठता है कि इन इस्लामिक आतंकी संगठनों के पीछे कौन है ? साथ ही उनका मकसद क्या है? उन्हें अपनी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए धन कहाँ से मुहैया हो रहा है? 


4. आत्मविश्वास बढ़ाइये


हममें से अधिकांश लोग कुछ नया करने की इच्छा रखते हैं पर उसे नहीं कर पाते। तब मन में यही बात आती है कि कितना अच्छा होता कि दुनिया के सफल लोगों की तरह हम भी आत्मविश्वास से भरे हुए होते।

“अधिकतर लोगों को आत्म-विश्वास उनके पारिवारिक और सामाजिक संबंधों से ही प्राप्त होता है। इसलिए यह जरूरी है कि हम अपने संबंधों को सकारात्मक बनायें।

हमारे जीवन में संबंधों की शुरूआत माता-पिता से होती है और हमारे संबंधों की असफलता और अपूर्णता की जड़ें भी वहीं से शुरू होती हैं।

बड़े होकर हम सभी का यह दायित्व बनता है कि हम अपने व्यवहार को देखें। यही नहीं, अपने आसपास के उनलोगों के जीवन और व्यवहार को भी परिपक्व दृष्टिकोण से देखें, जिनसे हमें बचपन में या बाद में भी समस्याएँ मिली हो। 

इससे न हमें सिर्फ दूसरों को समझने का मौका मिलेगा, बल्कि अपने आपको भी हम बचकानी भावुकता से उबार सकते हैं।

पारिवारिक समस्याओं से गुजरना तो एक ऐसा कटु अनुभव है, जिसे कोई भी पसंद नहीं करता। पर इन समस्याओं से बाहर निकलने के बाद हर व्यक्ति स्वयं को अधिक मजबूत और आत्मविश्वास से पूर्ण महसूस करता है। 

यह जरूरी है कि हम समस्याओं की अनदेखी न करें। अपना प्रतिरोध या गुस्सा जरूर व्यक्त करें।

अधिकांश लोग अपने सामाजिक संबंधों को महत्व नहीं देते। लेकिन हमारे सामाजिक संबंध न सिर्फ हमें सामाजिक सुरक्षा देकर हमारा आत्मविश्वास बढ़ाते हैं, बल्कि हमें हमारी पहचान भी देते हैं और यह सामाजिक पहचान हमारे आत्मविश्वास को बढ़ाती है। 

अपने भीतर आत्मविश्वास पैदा करने के लिए अपनी सामाजिक भूमिका को पहचानिये। जब हम अपनी परेशानियों में अकेले होते हैं, तो बुरी तरह टूट जाते हैं। क्योंकि तब हमें दुनिया में अपनी ही परेशानी दिखलायी देती है लगता है बाकी सारी दुनिया मजे कर रही है। जब हम अपने ध्यान को बाहरी दुनिया पर जमा नहीं कर पाते, तो घूम-फिरकर हमारा ध्यान हमारी समस्या को कुरेदने लगता है। 

घर तक ही सीमित रहने वाली पढ़ी-लिखी शहरी महिलाओं की यह प्रमुख समस्या है। इससे उबरने के लिए जरूरी है कि वे अच्छे मित्र बनायें, जिनसे कि उन्हें अपनी समस्याओं से बाहर निकलकर बाहरी दुनिया की व्यापक समस्याओं को देखने का भी मौका मिले। 

जब हम दुनिया की अपने से बड़ी समस्याओं को देखेंगे तो हमारे मन में व्यापक समस्याओं को देखने का भी मौका मिलेगा। जब हम दुनिया की अपने से बड़ी समस्याओं को देखेंगे तो हमारे मन में व्यापकता के भाव उत्पन्न होंगे। इससे हमारा आत्मविश्वास बढ़ेगा जो हमें हर कठिन काम को भी करने के लिए प्रेरित करेगा।


5. नक्सलवाद का समाधान


पिछले सप्ताह नक्सली हिंसा से प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों और आला अफसरों की बैठक में प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने खुद स्वीकार किया कि नक्सलवाद अब हमारी आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे गंभीर खतरा बन गया है। 

गत रविवार को छत्तीसगढ़ में सुरक्षाकर्मियों पर नक्सलियों का हमला भी इसी बात का सबूत है। हमारे यहाँ राजनेता बहुत बड़ी-बड़ी समस्याओं को बहुत हल्के ढंग से लेते हैं और उसके समाधान की ईमानदार कोशिश के बजाय निबटाने बाले अंदाज में सिर्फ अपना पीछा छुड़ाते हैं।

नक्सलवाद के अब तक के इतिहास पर अगर नजर डाली जाए तो भी यही बात सामने – किसान आंदोलन के रूप में हुई थी, लेकिन आज देश के तेरह राज्यों के 160 जिले इससे आती है। इसकी शुरूआत सन् 1967 में पश्चिम बंगाल के एक छोटे से गाँव नक्सलबाड़ी से प्रभावित है। 

ऐसा तब है जब पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर राय अपने समय में यह दावा कर चुके थे कि नक्सलवाद को उन्होंने समूल नष्ट कर दिया है। ऐसा लगता है कि उस समय नक्सलवाद नष्ट नहीं हुआ, सिर्फ दब भर गया था। 

सरकार की कार्रवाई के भय से सभी नक्सली या तो छिप गए थे या फिर आसपास के अन्य राज्यों में भाग गए थे। दूसरे राज्यों में जाकर वह अपने आंदोलन को धीरे-धीरे विस्तार देते रहे और संगठन को मजबूत बनाते रहे। 

आज वही थोड़े से नक्सली इस स्थिति में पहुँच गए हैं कि प्रधानमंत्री को कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों और प्रमुख अधिकारियों की बैठक बुलाकर इससे निबटने के उपायों पर विचार करना पड़ रहा है।

यहाँ यह बात भी गौरतलब है कि आतंकवाद और नक्सलवाद की प्रकृति में मौलिक अंतर है। यह सभी मानते हैं कि नक्सलवाद सिर्फ कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं है। 

इसके मूल में सामाजिक-आर्थिक कारण बहुत गहरे स्तर पर निहित हैं और उनका निदान बहुत जरूरी है। यह समझा जाना चाहिए कि आतंकवाद धर्म और भावनात्मक मुद्दों का सहारा लेकर आगे बढ़ता है, जबकि नक्सलवाद जमीन, जंगल और धन पर हक की बात करके भूमिहीन मजदूरों और आदिवासियों की सहानुभूति बटोरता है। 

समाज के सुविधासंपन्न वर्गों के शोषण के शिकार और विकास के तमाम लाभों से पूरी तरह वंचित हाशिए पर जीने को मजबूर इन्हीं लोगों की सहानुभूति का फायदा उठाकर नक्सलियों ने खुद को पहले खूब मजबूत किया है और उसके बाद हमले की रणनीति अपनाई है। 

अब उनका दुस्साहस इस हद तक बढ़ गया है कि कहीं तो वे जेल तोड़ डालते हैं, कहीं ट्रेन का अपहरण कर बैठते हैं और कहीं सुरक्षाकर्मियों पर हमला कर डालते हैं।

करीब 40 साल पहले किसानों के आंदोलन के तौर पर शुरू हुआ यह आंदोलन अब अपने मकसद से किस हद तक भटक चुका है इसकी बानगी कभी इसके कर्णधार रहे कानू सान्याल की बात में देखी जा सकती है खुद सान्याल का आज के माओवादियों से पूरी तरह मोहभंग हो चुका है। 

वह उनके कार्रवाइयों को जनसमर्थन से कटा हुआ बताते हैं और कहते हैं कि व्यवस्था परिवर्तन के लिए हथियारबंद संघर्ष जरूरी है, लेकिन जनता का समर्थन भी मिलना चाहिए। 

ट्रेन का अपहरण करने, पुलिस थाना लूटने या किसी को अगवा करने से आंदोलन को कोई फायदा पहुँचने वाला नहीं है। वह कहते हैं कि माओवादियों ने उड़ीसा के कलिंगनगर या दूसरी जगहों पर किसानों के सवाल नहीं उठाए। 

अगर यह जनता के साथ होते तो किसानों की बात जरूर करते। स्पष्ट है, आज के नक्सली अपने अगुवा नेताओं और जनता दोनों का विश्वासा खो चुके हैं। इसके बावजूद उनका दायरा बढ़ता ही जा रहा है, तो इसका कारण आखिर क्या है ? 

सच तो यह है कि इसके कारण हमारी व्यवस्था में ही कहीं दबे हैं। इसका पहला उदाहरण तो यही है कि साल भर बीत जाने के बावजूद एक भी नक्सल प्रभावित राज्य के मुख्यमंत्री ने संयुक्त कार्यवल गठित करने के पहल अभी तक नहीं की है। 

विभिन्न राज्यों की पुलिस के बीच आपस में कितना समन्वय है, यह बात भी जगजाहिर है। दूसरी तरफ इस समस्या से निबटने के जो सामाजिक उपाय हैं वह भी कहीं किए जाते नहीं दिख रहे हैं। अब ऐसी विकट स्थिति में जबकि हर तरफ अन्यमनस्कता छाई हुई हो, समस्या अगर बढ़ेगी नहीं तो क्या होगा ? 

अगर सरकार इस समस्या से जनता को मुक्ति दिलाना चाहती है तो उसे इन दोनों ही स्तर पर पूरी ईमानदारी से प्रबंध करने होंगे। पहला यह कि नक्सलियों को जनता की सहानुभूति न मिले और दूसरा यह कि उन पर प्रभावी ढंग से नियंत्रण किया जा सके। 

इसमें पहला काम तो विकास प्रक्रिया और उसके तंत्र के जरिए होगा, जबकि दूसरा कार्य संयुक्त कार्यबल या एकीकृत कमान का गठन करके हो सकेगा। दोनों ही स्तरों पर पूरी ईमानदारी से प्रयत्न करने होंगे।


6. दुनिया के बाजार में भारत


19वीं सदी के उत्तरार्द्ध से पूँजीवाद की जो सुगबुगाहट शुरू हुई थी वह 21वीं सदी में अपने पूरे रंग में हमारे समक्ष उपस्थित है। आज यह पूँजी संबंध और व्यवस्थाएँ निर्देशित करनेवाले सभी प्रकार के मूल्यों का सृजन कर रही है। 

ऐसी स्थिति में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि इस व्यवस्था में भारत किस पायदान पर है? वित्तीय पूँजीवाद के युग में यह प्रश्न करना अनुदित सा लगता है कि दुनिया का नेतृत्व कौन करेगा? इसका स्वाभाविक-सा उत्तर है कि जीवादी देश, लेकिन इतना तय है कि उनकी राह निष्कंटक नहीं, बल्कि संघों पर टिकी होगी। 

यह भी होगा कि पूँजीवादी देश समस्त बौद्धिक क्षमताओं का प्रयोग नवऔपनिवेशिक प्रयोगों कसे कल्याणकारी प्रयास सिद्ध करने के लिए करेंगे। जहाँ तक पूँजीवाद की बात है तो उसका उदय भले ही यूरोप में हुआ हो, लेकिन आज अमेरिका ही पूँजीवाद का नेतृत्वकर्ता है और यूरोप उसका सहयोगी।

यूरोप और अमेरिका के मध्य कुछ दुर्वद्रव भी मौजूद है, लेकिन वे ऐसे नहीं है कि वृहत संधयों का कारण बन सकें। वे अकसर ऐसे व्यापारी की भूमिका में देखे जाते हैं जो मूल्य के बदले सहयोग देते हैं। दूसरी दुनिया के जो देश थे वे अपने मूल चरित्र को त्याग पूँजीवादियों के साथ हो लिए हैं। 

सवाल तीसरी दुनिया के उन देशों का है जो प्राकृतिक संपदा और बाजार के मामले में संपन्न हैं और तीव्र विकास की अपेक्षाएँ रखते हैं। भारत तीसरी दुनिया की नींव पड़ने के साथ ही उसका नेतृत्व करता रहा है और आज भी विश्व के अनेक मंचों में पूँजीवादी देशों की नीतियों के खिलाफ विकासशील देशों अथवा उनके संगठनों को भारत ही नेतृत्व प्रदान करता हैं। 

भारत इस समय जी-20, जी-33, जी-77 आदि समूहों का सक्रिय भागीदार होने के साथ-साथ साफ्टा का नेतृत्वकर्ता देश है, आसियान का शिखर साझीदार है और यूरोपीय संघ तथा रेबियाई आर्थिक मंचों का सक्रिय सहयोगी है। यही कारण है आए दिन शोधपत्रों, रिपोटों या वैश्विक संस्थानों द्वारा भारत के आर्थिक भविष्य को लेकर बहुत ही आशावादी भविष्यवाणियाँ की जा रही हैं। 

मैसाचुसेट्स के इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नालॉजी से संबंधित मैनेजमेंट स्कूल के एसोसिएट प्रोफेसर यू हुआंग और हावर्ड स्कूल के प्रो. तरुण खन्ना ने कुछ समय पहले अपने अध्ययन के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला था कि 2010 तक भारत चीन को आर्थिक क्षेत्र में पछाड़ देगा। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा विश्व आर्थिक परिदृश्य पर जारी नवीनतम रिपोर्ट में वैश्विक अर्थव्यवस्था की समग्र वृद्धि की सामान्य प्रवृत्ति को दर्शाया गया है। 

यह रिपोर्ट वैश्विक आर्थिक वृद्धि के इंजन के रूप में भारत को प्रस्तुत करती है। इसी तरह फोर्ब्स की सूची में भारत की कंपनियों और अरबपतियों के बढ़ते नामों को देखकर लगने लगा है कि भारत भविष्य में वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक प्रभावी किरदार निभाने की ओर अग्रसर है।

जी-8 के बाद यूरोपीय संघ और आसियान इस क्षेत्रीय संगठनों के रूप में महती भूमिका निभाते है। 27 सदस्यों वाला यूरोपीय संघ क्षेत्रीय सहयोग संगठन की दिशा में सबसे आगे है, जिसका उद्देश्य आर्थिक एकीकरण तथा मुक्त व्यापार स्थापित करना है। महत्वपूर्ण बात यह है कि यूरोपीय यूनियन की साझी मुद्रा यूरो ही भविष्य में अमेरिकी डॉलर के समक्ष सशक्त चुनौती दे सकती है। 

अगर अमेरिकी साम्राज्यवादी प्रवृत्ति पर अंकुश लगाना है तो डॉलर के एकाधिकारवाद को कमजोर करना अनिवार्य है। 

यूरोपीय संघ में इस समय भारत की स्थिति सकारात्मक है। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वर्ष 2004 में 16 प्रतिशत वृद्धि के मुकाबले वर्ष 2005 के पहले 9 महीनों के दौरान यूरोपीय संघ को होने वाले निर्यात में 18 प्रतिशत की वृद्धि हुई। 

उल्लेखनीय है कि यूरोपीय संघ भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है और भारत के वैश्विक व्यापार का 20 प्रतिशत उसके साथ ही होता है। पश्चिम में जिस तरह का किरदार यूरोपीय संघ का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है और भारत के वैश्विक व्यापार का 20 प्रतिशत उसके साथ ही होता है। 

पश्चिम में जिस तरह का किरदार यूरोपीय संघ अदा कर रहा है वैसा ही भूमिका दक्षिण-पूर्व में कमोवेश आसियान निभा सकता है। 

यह क्षेत्र बाजार की दृष्टि से यूरोपीय संघ की अपेक्षा अधिक विस्तृत है। भारत इसके साथ केवल आर्थिक में शिखर वार्ता साझीदार है और भारत-आसियान द्विपक्षीय व्यापार 2007 तक 30 अरब डॉलर मेंगर पर ही नहीं सांस्कृतिक स्तर पर भी बेहतर संबंध कायम कर सकता है। 

भारत आसियान पहुँचने की उम्मीद है। भारत की आसियान में महत्ता सिंगापुर के प्रधानमंत्री की इस बात से आंकी जा सकती है कि आसियान एक ऐसा बोइंग है जिसका एक पंख चीन, जापान और कोरिया है तो दूसरा पंख भारत। 

अगर यह बात सच है तो यह बोइंग भारत के सहयोग के बिना बहुत ऊँची और लंबी उड़ान नहीं उड़ सकता। कैरेबियाई देशों के साथ भी भारत के अच्छे व्यापारिक संबंध है। 

वित्तीय वर्ष 2003-04 को अवधि में लैटिन अमरिका देशों के प्रमुख व्यापारिक ब्लॉक मर्कासुर के साथ भारत का कुल व्यापार 1 अरब 41 करोड़ डॉलर से अधिक का था और उसी अवधि में मर्कासुर से भारत का आयात करीब 84 करोड़ 90 डॉलर का था। 

चूँकि अमेरिका के साथ भारत के संबंध लगातार प्रगाढ़ हो रहे हैं इसलिए नाफ्टा का भी लाभ उसे मिल सकता है। 


7. सामाजिक परितर्वन का मार्ग


मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह की इस घोषणा से केन्द्रीय विश्व विद्यालयों, आईआईटी और आईआईएम में अन्य पिछड़े वर्गों के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण देने के लिए केन्द्र सरकार प्रतिबद्ध है, देश में फिर से मंडल का इतिहास दोहराया जाना प्रारंभ हो गया है। 

बहुत से लोगों ने सरकार की पूरी आरक्षण नीति के प्रति प्रश्न खड़े करने प्रारंभ कर दिए हैं। यह देश शताब्दियों से ही सवर्ण-अवर्ण, ऊँच-नीच और सामाजिक-आर्थिक असमानाओं को लेकर बँटा रहा है। गौतम बुद्ध से लेकर महात्मा गाँधी तक इस असमानता के विरुद्ध आवाज उठाते रहे हैं। 

मध्ययुगीन संतों ने बार-बार इस बात पर आग्रह किया था कि यदि परमात्मा मनुष्य मात्र का पिता है तो उसके पुत्रों में असमानता कैसे हो सकती है ? प्राचीन काल से ही इस देश का बहुसंख्यक वर्ग शिक्षा से वंचित रहा है।।

एक विशिष्ट वर्ग का ही इस क्षेत्र पर एकाधिकार रहा है। इस देश की वर्ण-व्यवस्था में अवर्ण जातियों को शिक्षित करने की कभी आवश्यकता ही नहीं समझी गई। इसी के साथ अवर्ण जातियों में शिक्षित होकर समाज में अपना विशेष स्थान बनाने की कभी महती आकांक्षा नहीं थी। 

जिस किसी के मन में यह आकांक्षा उत्पन्न भी हुई उसे अनाधिकार माना गया। यह युग परिवर्तित हो गया है। पूरे संसार में सिद्धांत रूप में यह बात मान ली गई है मनुष्यमात्र अपने वर्ण, जाति, नस्ल, रंग और लिंग की विभिन्नता के बावजूद समान है। ऊँची से ऊँची शिक्षा प्राप्त करने और ऊँचे-से-ऊँचे ओहदे प्राप्त करने से उन्हें वंचित नहीं किया जा सकता। 

इसी के साथ यह सच्चाई भी सामने आई कि जो लोग सदियों से वंचित रखे गए उन्हें यदि उन वर्गों के साथ खुली प्रतियोगिता में सामने लाया गया जो पहले से ही इन क्षेत्रों में आगे बढ़े हुए हैं तो वे उनका मुकाबला नहीं कर सकेंगे। वंचित तबके को कुछ विशेष सुविधाएँ यानी आरक्षण देने की बात की गई। 

यह कहना अनुचित नहीं कि दलित दंगों के लिए आरक्षण की नीति स्वयं गाँधी जी ने स्वतंत्रता के 15 वर्ष पहले प्रारंभ कर दी थी। 1932 में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ने अपना ‘कम्युनल अवार्ड’ घोषित किया। इसमें अल्पसंख्यकों-मुसलमानों, सिखों, ईसाइयों, पारसियों के साथ ही दलित वर्गों को भी पृथक निर्वाचन प्रणाली का अधिकार मिला था। गाँधी जी दलित वर्ग को हिंदुओं से पृथक निर्वाचन के विरुद्ध थे। 

उस समय वे यरवदा जेल में थे। कम्युनल अवार्ड की इस धारा के विरुद्ध उन्होंने आमरण व्रत ले लिया। डॉ. अंबेडकर दलितों के लिए पृथक निर्वाचन प्रणाली से प्रसन्न थे। मदनमोहन मालवीय, तेज बहादुर सप्रू, राजगोपालाचारी आदि के प्रयत्नों से एक समझौता हुआ, जिसे पूना समझौता कहा जाता है। 

डॉ. अंबेडकर ने दलितों के लिए पृथक निर्वाचन प्रणाली की माँग त्याग दी थी और हिंदुओं के कोर्ट में से दलित वर्ग के लिए आरक्षण के आश्वासन को स्वीकार कर लिया।

पूना समझौते से दलितों के लिए आरक्षण की नीति की नींव पड़ी। आरक्षण नीति का मूल आधार यह है कि सदियों से समाज के जो वर्ग शिक्षा तथा अन्य क्षेत्रों में समान सुविधाओं से वंचित रखे गए उन्हें समाज के आगे बढ़े हुए लोगों के स्तर पर लाया जाए, जिससे वे भी मानवीय गरिमा की उसे अनुभूति से जुड़ सकें जो उन्हें प्राप्त नहीं हुई थी। 

ऐतिहासिक दृष्टि से शिक्षा ड क्षेत्र में आरक्षण की प्रक्रिया 1902 से महाराष्ट्र की कोल्हापुर रियासत से आरंभ हुई थी। इसमें दलितों, पिछड़े वर्गों तथा अन्य अब्राह्मण जातियों के बच्चों के लिए स्थान आरक्षित किए गए। इसके बाद 1922 से मैसूर जैसे बड़े राज्य में वंचित वर्गों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई। 

मद्रास (अब तमिलनाडु) तथा बंबई प्रेसीडेंसी (अब महाराष्ट्र) में भी यह व्यवस्था 1931 में आई। केरल की त्रावणकोर रियासत में 1935 में यह व्यवस्था लागू की गई। स्वतंत्र भारत में सबसे पहले 29 जनवरी, 1953 में काका साहब कालेलकर की अध्यक्षता में पिछड़ा वर्ग आयोग की स्थापना की गई। 

यह आयोग ने पिछड़े वर्गों के छात्रों को सभी तकनीकी तथा व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में 70 प्रतिशत आरक्षण देने को कहा। इसी के साथ ही उसने सरकारी नौकरियों में भी आरक्षण की सिफारिश की जनता पार्टी के शासन के दौरान 20 दिसंबर, 1978 को विदेश्वरी प्रसाद मंडल की अध्यक्षता में पिछड़े वर्गों की स्थिति और प्रगति के संदर्भ में एक आयोग की स्थापना की गई। इस आयोग की गणना के अनुसार इस देश में लगभग 52 प्रतिशत जनसंख्या पिछड़े वर्ग के लोगों की है।

इस संख्या में यदि अनुसूचित जातियों ( 15 प्रतिशत) और अनुसूचित जनजातियों (7 प्रतिशत) को जोड़ दिया जाए तो इस देश की लगभग तीन-चौथाई जनसंख्या पिछड़े और अति पिछड़े लोगों की है। 

ऐसे देश में योग्यता, एक्सीलेंस, विशिष्टता और विश्व स्तर की प्रतिस्पर्धा की दौड़ केवल एक-चौथाई लोगों की सीमा में आ जाती है। यही वह वर्ग है जो अपने हितों की रक्षा के लिए आरक्षण का विरोध करता है। 

सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक निर्णय में घोषित किया है कि आरक्षण की सीमा को 50 प्रतिशत से कम रखा जाना चाहिए। मंडल कमीशन ने पिछड़े वर्गों के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण की सिफारिश की। 22.5 प्रतिशत आरक्षण पहले से ही अनुसूचित जातियों और जनजातियों को मिला हुआ है।

 इस प्रकार आरक्षण की कुल सीमा 49.5 प्रतिशत हो जाती है। अर्थात् सभी प्रकार के उच्च अध्ययन केन्द्रों में 50 प्रतिशत से अधिक स्थान 25 प्रतिशत जनसंख्या के लिए खुली स्पर्धा के लिए खुले हुए हैं। 

यह बात भी अपनेआप में महत्वपूर्ण है कि आरक्षण का जितना अधिक विरोध उत्तर भारत में होता है उतना दक्षिण भारत में नहीं। इसका करण यह है कि सामाजिक न्याय की आवाज उन्नीसवीं-बीसवीं सदी में दक्षिण भारत में उठनी प्रारंभ हुई थी। 

तमिलनाडु में रामास्वामी नायकर और केरल में श्रीनारायण गुरु जैसे समाज सुधारकों ने सामाजिक न्याय और पिछड़े वर्गों के उत्थान के लिए जिस प्रकार के आंदोलन को जन्म दिया उससे दक्षिण भारत में सामाजिक न्याय की लड़ाई को बड़ा बल मिला। था। 

तमिलनाडु के द्रविड़ आंदोलनों की जड़ें इन्हीं आंदोलनों में हैं। आरक्षण के विपक्ष में जो तर्क दिए जाते हैं उनमें कहा जाता है कि आरक्षण से योग्यता (मेरिट) तथा उत्कृष्टता (एक्सीलेंस) का महत्व घट जता है, ऊँची जातियों के आर्थिक दृष्टि से कमजोर वर्गों को हानि पहुँचती है, 

आरक्षण से पिछड़े वर्गों को विशेष लाभ नहीं पहुँचता और उच्च शिक्षण संस्थाओं में दिया गया आरक्षण सामाजिक विनाश जैसा होगा, किंतु दक्षिण भारत के राज्यों ने सिद्ध कर दिया है कि आरक्षण विरोधी ये बातें आधारहीन हैं।

आज तमिलनाडु में 69 प्रतिशत, कर्नाटक में 50 प्रतिशत और आंध्र में 49.5 प्रतिशत आरक्षण है। इनमें से कोई भी राज्य किसी भी दृष्टि से उत्तर भारत के किसी राज्य से पीछे नहीं है। लगता है कि उत्तर भारत के राज्य यथास्थितिवादी हैं। 

सामाजिक परिवर्तन का कोई भी मार्ग स्वीकार करने में इन्हें बड़ी कठिनाई होती है। संपन्न समाज के कुछ लोग अपने बच्चों को देश भर में फैले मेडिकल, इंजीनियरिंग तथा अन्य निजी संस्थानों में लाखों रुपये की कैपीटेशन फीस देकर प्रवेश दिलवा देते हैं। 

यह कार्य सभी लोग नहीं कर सकते। इस अन्याय मूलक व्यवस्था के विरुद्ध कोई आंदोलन क्यों नहीं होता ? स्पष्ट है कि आरक्षण का अंधा विरोध बंद होना चाहिए।


11. हरे भरे वृक्ष


वृक्ष का एक नाम तरू भी है। आपदा एवं दुःखों से छुटकारा दिलाने वाला होने से वृक्ष को ‘तरू’ यानी तारने वाला कहा जाता है। 

वृक्ष से मनुष्य सिर्फ फल और छाया ही प्राप्त नहीं करता बल्कि जीवन दायिनी हवा भी प्राप्त करता है, फलों से पोषक तत्व प्राप्त करता है और अपने शरीर से सतोगुण की वृद्धि कर शरीर को चुस्त दुरुस्त रखता है या रख सकता है। 

आधुनिक सभ्यता के रहन-सहन, शहरीकरण के कारण बढ़ती हुई बहुमंजिली इमारतों और कल कारखानों के निर्माण के कारण हारियाली कम होती जा रही है, वृक्षों की अंधाधुंध कटाई से हरे भरे जंगल कम होते जा रहे हैं और सीमेंट की इमारतों तथा कल कारखानों के जंगल बढ़ रहे हैं, इनसे जो प्रदूषण फैल रहा है और पर्यावरण की शुद्धता नष्ट हो रही है, इसे कैसे रोका जाए ? 

अब भारत में लगभग 19% भू-भाग में ही वृक्षों के वन शेष बचे हैं जिसके परिणाम- स्वस्थ्य देश के पंद्रह हजार किस्म के पेड़-पौधों के विलुप्त होने की आशंका है। वातावरण में कार्बन डाइ ऑक्साइड की वृद्धि हुई है क्योंकि इस विषाक्त गैस को नियंत्रित तथा संतुलित रखने वाले वृक्षों की कमी होती जा रही है। 

पर्यावरण को शुद्ध रखने, प्राण वायु देने और कार्बन डाइ आक्साइड में कमी करने का काम वृक्ष भली भाँति करते हैं। पृथ्वी की सतह से लगभग 40 किलोमीटर ऊपर, वायुमंडल में ओजोन गैस की मोटी परत रहती है जो सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी किरणों से जीव जन्तु और वनस्पति की रक्षा कवच का काम करती है। 

प्रसिद्ध वैज्ञानिक रिचर्ड हटन के अनुसार, वनों के विनाश के कारण, वायुमंडल में अतिरिक्त मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड पहुँच कर, ओजोन की परत को क्षति पहुँचा रही है। इस पद्धति को कम करने और रोकने के लिए यह जरूरी है कि वातावरण में कार्बन डाइ ऑक्साइड, मीथेन और क्लोरोफ्लोरो कार्बन गैस की मात्रा कम की जाए। 

यदि ऐसा नहीं किया जाता तो सन् 2050 तक ओजोन का लगभग 18% भाग नष्ट हो जाएगा जिससे पृथ्वी के तापमान में वृद्धि होगी। और कई प्रकार की बीमारियाँ बढ़ने का खतरा पैदा हो जाएगा जिनका समाधान करना इंसान के बस की बात शायद न हो। 

वृक्ष की एक उपयोगिता और भी है। आज कल ध्वनि प्रदूषण भी बढ़ता जा रहा है। बढ़ते हुए दुपहिया, चौपहिया, टेम्पो, टैक्सी, रेल, वायुयान आदि वाहनों, लाउड स्पीकर, कल-कारखानों आदि कई कारणों से ध्वनि प्रदूषण दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है जिनसे आज का इंसान पीड़ित है, परेशान है और अनिद्रा, स्नायविक दीर्बलय, अस्थमा, हृदय रोग, उच्च रक्त चाप, अधीरता, चिड़चिड़ापन आदि व्याधियों का शिकार हो रहा है। 

वैज्ञानिकों ने यह सिद्ध किया है कि वृक्ष इस शोर का अवशोषण कर इसकी तीव्रता को उसी प्रकार कम करते हैं जैसे साइलेंसर आवाज को कम कर देता है। बढ़ते शोर से होनवाले ध्वनि प्रदूषण को कम करने के लिए वृक्षों की संख्या लगातार बढ़ाई जानी चाहिए।

भवनों के निर्माण और कल कारखानों की स्थापना में लकड़ी की जरूरत होती है और यह लकड़ी वृक्षों को काट कर ही प्राप्त की जाती है इसलिए भी वृक्षों की कटाई घड़ल्ले से की जा रही है। 

यही कारण है कि आज लकड़ी लोहे से महँगी हो गई है। यह बात ठीक है कि इमारती लकड़ी प्राप्त कैसे होगी लेकिन यह भी सही है कि वृक्षों की संख्या कम न होने दी जाए। इसके लिए हम क्या कर रहे हैं? यह कदापि नहीं भूलना चाहिए कि हरे भरे वृक्ष हमारे स्वास्थ्य और जीवन के रक्षक हैं। 

हम सबको चाहिए कि वृक्षों की रक्षा में तो हम हमेशा सतर्क और सक्रिय रहे हैं। साथ ही वृक्षारोपण करने में भी भरपूर सहयोग प्रदान करें ताकि वृक्षों की कमी न हो। 


8. आज का समाज, साहित्य और लेखक


कहा जाता है कि साहित्य समाज का दर्पण होता है। कुछ सीमा तक यह सही है पर जब दर्पण मटमैला हो जाता है तो वह सही तस्वीर पेश नहीं कर सकता, वह समाज की अधूरी तस्वीर ही प्रस्तुत करता है। 

यह भी कहा जाता है कि साहित्य समाज का मार्गदर्शन भी करता है, पर आज जिस प्रकार का साहित्य-सृजन हो रहा है क्या वह सही रूप में समाज का मार्गदर्शन कर सकेगा ? 

यह विचारणीय और चिंतनीय विषय है। साहित्य, समाज और साहित्यकार तीनों एक-दूसरे के पूरक है, तीनों में सही तालमेल होने पर ही लोकप्रिय और सच्चे साहित्य का निर्माण हो सकता है। अंग्रेजी के प्रसिद्ध कवि वर्डस्वर्थ ने कहा है कि कविता शांति तथा एकाग्रता के क्षणों में

उमड़ने वाली शक्तिवाली अनुभूतियों का अनायास उत्पन्न प्रवाह है। इस परिभाषा के अनुसार काव्य की अनुभूति शांति और एकांत के क्षणों में प्रस्फुटित होती है। सच्चा लेखक और साहित्यकार वह है जो समाज का चित्रण करे और उसका मार्गदर्शन भी। 

समस्या और समाधान दोनों का उत्तरदायित्व लेखक को निभाना होगा। सच्चा साहित्यकार वह है जो समाज का विघटन नहीं बल्कि उसका संगठन चाहता है। 

CLASS 12 NCERT SOLUTION IN ENGLISHCLASS12 NCERT SOLUTION IN HINDI
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Geography भूगोल
Political science राजनीति विज्ञान
English SubjectResult
Hindi SubjectHistory answer keys

आज 21वीं शताब्दी विज्ञान और प्रगति का युग है। लेखक को अपने सीमित दायरे से बाहर आना होगा। समाज का लगभग हर व्यक्ति निरंतर तनाव और व्यस्तता में जी रहा है। आज उसके पास समय कम है। चिंतन कम हो रहा है। सामाजिक मूल्यों दिन-प्रतिदिन परिवर्तन हो रहा है। 

पश्चिमी सभ्यता का बढ़ता प्रभाव, टी. वी. संस्कृति एवं इंटरनेट आदि ने युवा पीढ़ी को गुमराह ही किया है। युवा पीढ़ी को भटकाने में आज के अश्लील साहित्य का भी बड़ा हाथ है। अश्लील पत्र-पत्रिकाओं तथा पुस्तकों की बिक्री आज पड़ल्ले से हो रही है।

इसी का परिणाम है हिंसा, बलात्कार की बढ़ती घटनाएँ। इतना ही नहीं भारतीय संस्कृति के अमूल्य और शाश्वत मानवीय रिश्तों पर भी क्रूर प्रहार हो रहा है। परिवार में विघटन हो रहा है। 

टी. वी. चैनलों पर भी सनसनीखेज समाचार, परस्त्री गमन, परपुरुष गमन, झूठ फरेब आदि को ही बढ़ावा देने वाले एपिसोड अधिक आ रहे हैं। सामान्य जन के जीवन को चैनलों में कोई स्थान नहीं है। 

उपेक्षित वृद्धजनों के लिए नए-नए वृद्धाश्रम खुल रहे हैं, क्योंकि अपमानजनक माहौल में ये वृद्धजन अपने को परिवार में व्यवस्थित नहीं कर पा रहे हैं।

नैतिकता की सारी सीमाओं को पार कर चुकी अश्लील कहानियों और नग्न चित्रों से भरी पुस्तकों की आजकल काफी बिक्री हो रही है। 

शहरों के कई दुकानदार व बुकसेलर ऐसी अश्लील पुस्तकों का धंधा कर युवा पीढ़ी को बिगाड़ रहे हैं। इन पुस्तकों के लेखक भी अधिकांशतः गुमनाम होते हैं। प्रकाशक कुछ लेखकों को पारिश्रमिक देकर उनसे ऐसी पुस्तकें लिखवा लेते हैं। 

हर बार पुरानी और घिसी-पिटी बातें घुमा-फिराकर परोसी जाती हैं। फिर प्रश्न उठता है कि ऐसी पुस्तकों की बिक्री अधिक होती क्यों है ? इसका उत्तर है ऐसी पुस्तकों और पत्र-पत्रिकाओं में छपे नारियों के नग्न और अर्द्धनग्न चित्र। 

ऐसी पुस्तकों से जहाँ एक ओर हमारी भावी पीढ़ी पर गलत प्रभाव पड़ रहा है, वहीं दूसरी ओर दुकानदासर मनमानी कीमत वसूलकर ग्राहकों को ठग भी रहे हैं। अधिकांशतः ऐसी पुस्तकों और पत्रिकाओं में 8-10 अश्लील कहानियाँ और अपराध कथाएँ होती है जो पारिवारिक पवित्र रिश्तों को कलंकित करती हैं।

ऐसा अश्लील साहित्य भी है जो पूर्णतया पाश्चात्य संस्कृति पर आधारित होता है। इनमें यौन क्रियाओं (पोनोग्राफी) में लिप्त स्त्री-पुरुषों के अश्लील चित्र भी होते हैं। आज आवश्यकत है ऐसे साहित्य पर रोक लगाकर सामाजिक मान्यताओं, मूल्यों और भारतीय संस्कृति को जीवित रखने की। 

कठोर कानून और समाज के प्रावधान से ही यह संभव है अन्यथा नहीं। आजकल ऐसे लेखकों की भी कमी नहीं है जो अवसर व प्रलोभन के वशीभूत होकर अपने सिद्धांतों को तिलांजलि दे बैठते हैं। 

वे किसी भी राजनैतिक दल से संबद्ध होकर अपने पौ-बारह कर लेते हैं। देवी-देवताओं की तरह उनके गुणगान में चालीसा और कविताओं का निर्माण करते हैं। मेरे एक मित्र अच्छे लेखक और कवि हैं। 

जिस दल की सरकार बनती है उनके नेताओं से साँठगाँठ कर कई साहित्य गोष्ठियों का आयोजन कर धनोपार्जन के साथ कुछ पुरस्कार भी लपक लेते हैं। इस हाथ ले उस हाथ दे कहावत चरितार्थ करते हैं। 

एक बार मुझे कहने लगे जी आजकल जमाना ही लेन-देन और चमचागिरी का है। ज्यादा लेखन-देखन में पड़ना है। आज कितना ही लिख लो, पाठकों की प्रशंसा प्राप्त कर लो पर सरकारी, गैर सरकारी पुस्तक | 

प्राप्त करने के लिए अलग ही पापड़ बेलने पड़ते हैं। खैर जो भी सही, हमें बालकों के लिए। रोचक और वैज्ञानिक धारणा के आधार पर बाल साहित्य प्रदान करना होगा। 

उनमें अच्छे संस्कार डालने वाली पुस्तकों का सृजन करना होगा। साहित्यकारों को गुटबंदी और राजनीति के प्रदूषण से मुक्त रहकर समाज हितकारी साहित्य का सृजन करना होगा। 

साहित्यकार का सम्मान पुरस्कार है। साहित्य अनवरत रूप से समाज का सही रूप से मार्गदर्शन करने के लिए प्रयासरत रहे यह उनका लेखकीय धर्म है।


10. प्रातः जागिए और स्वस्थ रहिए


मानव के जीवन में स्वस्थ रहना सबसे बड़ा सुख है। स्वस्थ रहने के लिए मानव को प्राकृतिक नियमों के साथ समन्वय बनाए रखना आवश्यक है। इन्हीं प्राकृतिक समन्वय में से एक है प्रातः जागना। 

स्वस्थ रहने के लिए सुबह सवेरे जागना सबसे अच्छा उपाय है। प्रातःकाल जगने के महत्व को इसी से समझा जा सकता है कि विश्व के जितने भी महापुरुष हुए हैं, दे सभी प्रातःकाल नियमित रूप से जागते रहे हैं।

भारतीय सनातन संस्कृति में भी सूर्योदय से पूर्व उठने की बात है। सूर्योदय से लगभग डेढ़ घंटे पूर्व तक का समय ‘ब्रह्ममुहूर्त’ माना जाता है। 

यह वह समय होता है जब पूर्व दिशा में सूर्य की हल्की-हल्की लालिमा दिखाई देने लगती है और दो-चार ग्रह नक्षत्र भी दिखाई देते रहते हैं। इस बेला को ही ‘अमृत बेला’ कहा गया है। इस अमृत बेला में जागने से वास्तव में यह बेला स्वास्थ्य के लिए अमृत का काम करती है।

इस अमृत बेला में ही पशु-पक्षी आदि संसार के समस्त जीव-जंतु जागकर इस अमृत वेला के वास्तविक आनंद का अनुभव करते हैं। 

ऐसी दशा में यदि इस संसार का सर्वश्रेष्ठ प्राणी मानव आलस्य एवं प्रमादवश सोता हुआ प्रकृति के इस अनमोल उपहार की अवहेलना कर दे उसके लिए इससे अधिक लज्जा की बात क्या हो सकती है। 

सूर्योदय के बाद तक जो लोग सोते रहते हैं, उनकी बुद्धि और इंद्रियाँ मंद पड़ जाती हैं। रोम-रोम में आलस्य भर जाता है एवं मुख की आभा क्षीण हो जाती है। 

प्रातःकाल देर से जगने वाला प्राणी सदैव सुस्त ही बना रहता है। कहानी कहा गया है कि जिनके शरीर वस्त्र मैले रहते हैं दाँतों पर मैल जमा रहता है, बहुत अधिक भोजन करते हैं, 

सदा कठोर वचन बोलते हैं तथा जो सूर्य के उदय एवं अस्त के समय सोते हैं, वे महादरिद्री होते हैं, यहाँ तक कि चाहे विष्णु भगवान ही क्यों न हों, किंतु उनको भी लक्ष्मी छोड़ जाती है।

सूर्योदय तक सोने रहने की हानिकारक आदत का त्याग कर प्रातः काल उषा वेला में जागना चाहिए।

ब्रह्म मुहूर्त में उठकर धर्म-अर्थ का चिंतन करना चाहिए। प्रथम धर्म का चिंतन करना चाहिए यानी अपने मन में ईश्वर का ध्यान करके यह निश्चय करना चाहिए कि हमारे साथ से दिन भर संपूर्ण कार्य धर्मपूर्वक हो, अर्थ के चिंतन से तात्पर्य यह है कि हम दिन भर उद्योग कर ईमानदारी के साथ धनोपार्जन करें, जिससे स्वयं सुखी रहे एवं परोपकार भी कर सके। 

शरीर के कष्ट एवं उनके कारणों का चिंतन इसलिए करना चाहिए ताकि स्वस्थ रहा जा सके, क्योंकि आरोग्यता ही सब धर्मों का मूल है। 

हमें चाहिए कि तरीके के साथ समन्वय स्थापित कर उपाकाल में जागकर स्वास्थ्य लाभ उठाकर दिन भर निर्विघ्न रूप से अपने कार्यों को सम्पन्न करें।


12. एड्स का फैलता मकड़जाल 


एड्स का प्रेत हमारे देश को ग्रसने को तैयार बैठा है। भारत एड्स पीड़ितों का पहले नंबर का देश बनने वाला है। फिलहाल यह पीड़ादायक अपमान दक्षिणी अफ्रीका के पास है जहाँ एड्स 53 लाख रोगी हैं।

 भारत के 51 लाख रोगियों का हाल इस 106 कि दक्षिणी कोका को जल्द ही पछाड़ देंगे। भारत के 27 लाख पैदा होने वाले बच्चों ने 27 हजार एड्स- त माताओं के होते हैं और वे जन्म से ही एड्स पाते हैं। एड्स का इलाज अभी तक ढूँढा नहीं जा सका है, यह पक्का है कि ये सारे रोगी टीक

| होंगे और शायद यौन संबंधों, ब्लड ट्रेंसफ्यूजन आदि के कारण औरों को भी बीमार करगे। हमारे देश में जहाँ गरीबी की मार और अंधविश्वासों की बीमार एड्स से भी ज्यादा

बोर है, वहाँ रोगियों की देखभाल करना तो दूर उन्हें रोग न फैलाने के लिए सावधान करना सरल नहीं है।

एड्स का रोग उन लाखों वेश्याओं द्वारा देश भर में फैल रहा है जो देश के हर प्रांत, शहर विद्यमान हैं। ये उन शरीफ औरतों को उनके पतियों के माध्यम से बीमार कर डालती है, जो के पास आते हैं।

यह महामारी केवल गरीबों में ही हो, कोई जरूरी नहीं। यह समाज के हर वर्ग में हो सकती

क्योंकि कितनी ही बार बाजार में पहले की इस्तेमाल की हुई सिरिंजें पहुंच जाती हैं। अगर नमें एड्स के विषाणु जीवित हों तो निर्दोष लोग भी काल के ग्रास बन सकते हैं। 

एड्स के बारे में जनजागरण अभियान चलाने वाले ज्यादातर पैसा अंग्रेजी के माध्यमों में चार करने में फूँक रहे हैं जिसका असर लगभग नहीं होता है। समाज में एड्स को छूत का रोग मानकर रोगियों का बहिष्कार किया जाता है। एड्स के गियों को अब तिलतिल कर मरना पड़ता है क्योंकि कोई उनसे व्यवहार नहीं रखना चाहता।

अस्पतालों ने भी दरवाजे बंद करने शुरू कर दिए हैं क्योंकि अस्पताल में एड्स के रोगी के होने की बात सुनकर दूसरे सब भाग जाते हैं।

हमारे देश में शिक्षित मध्यवर्गीय समाज अभी इस एड्स रूपी मकड़जाल से बचा हुआ है। निम्न वर्ग में जहाँ यह सामान्य होता जा रहा है, वहीं तरह-तरह की समस्याएँ भी पैदा कर रहा है। एड्स के विषाणु वर्षों शरीर में सुप्त पड़े रहते हैं। विवाह के समय माँग करना कि दोनों टिस्ट कराएँ अव्यावहारिक और मानसिक वेदना देनेवाला होगा, फिर क्या किए जाए ? 

एड्स के इलाज पर काफी खोज चल रही है पर इसका कोई सुराग नहीं मिल रहा। पति-पत्नी संबंधों को तो इसने सुदृढ़ कर दिया पर जो लोग जोखिम लेने के आदी हैं उनकी वजह से उनका पूरा परिवार झंझावात में आ सकता है।

इस बीमारी के बारे में सतर्क रहना अब सबके लिए जरूरी हो गया है। यह अनैतिक संबंधों से ही नहीं, खून लेने पर भी हो सकती है क्योंकि पेशेवर खून दान करने वाले प्रायः एड्स के शिकार होते हैं।


FAQs

Q. आलेख की भाषा क्या है?

आलेख की भाषा सरल व स्पष्ट है |

Q. आलेख कितने प्रकार के होते हैं?

आलेख 3 प्रकार के होते हैं – आयत चित्र, दंड आलेख और बारम्बारता बहुभुज।


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