कक्षा 12वी के महत्वपूर्ण संपादकीय-लेखन | Important Class 12th Hindi sampadak ko Patra Writing Formats

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कक्षा 12वी के महत्वपूर्ण संपादकीय-लेखन | Class 12th Hindi sampadak ko Patra

जब विचारों, समाचारों, आलेखों, प्रतिवेदनों तथा किसी भी बात की अभिव्यक्ति मुद्रित रूप में होती है, तो उसे प्रिंट माध्यम कहा जाता है। प्रिंट माध्यम के अन्तर्गत समाचार लेखन, संपादकीय, आलेख तथा प्रतिवेदन इत्यादि सम्मिलित किए जा सकते हैं। ये मुद्रित रूप में होते हैं। इनका अलग-अलग वर्णन किया जा सकता है।

कक्षा | Class12th 
अध्याय का नाम | Chapter Nameसंपादकीय-लेखन | sampadak ko Patra
अध्याय प्रकार | Chapter typeहिंदी व्याकरण | Hindi grammar
किताब | Bookहिंदी कोर | HINDI CORE
बोर्ड | Boardसभी बोर्ड | All India Board
किताब | Book एनसीईआरटी | NCERT
विषय | Subjectहिंदी | HINDI


प्रिंट माध्यम (संपादकीय, रिपोर्ट, आलेख एवं समाचार लेखन)


कक्षा 12वी के महत्वपूर्ण संपादकीय-लेखन | Important Class 12th Hindi sampadak ko Patra Writing Formats

(i) संपादकीय लेखन

संपादकीय लेखन का अर्थ-संपादकीय का अर्थ है- समाचार पत्र के संपादक के विचार । प्रत्येक समाचार पत्र में संपादक हर रोज किन्हीं ज्वलंत विषयों पर अपने विचार व्यक्त करता है। संपादकीय लेख समाचार-पत्र की नीति सोच और विचारधारा को प्रकट करता है। इस लेख के लिए संपादक स्वयं जिम्मेदार भी होता है। इसलिए संपादक को चाहिए कि वह इसमें संकलित टिप्पणियाँ ही प्रस्तुत करें।

संपादकीय लेखन संपादन कला का सैद्धांतिक व व्यावहारिक दस्तावेज होता है क्योंकि प्रत्येक समाचार-पत्र के कुछ मूलभूत सिद्धांत होते हैं जिनका पालन प्रत्येक संपादकीय लेखक नीति निदेशक तत्वों की भांति करता है। संपादकीय में संपादक जन आकांक्षाओं को शब्द देता है। संपादक निर्णय देता है तथा घटना का मूल्यांकन करता है।

संपादकीय लेख में किसी घटना पर प्रतिक्रिया हो सकती है, किसी विषय या प्रवृति पर अपने विचार हो सकते हैं, किसी आंदोलन की प्रेरणा हो सकती है, किसी उलझी हुई स्थिति का विश्लेषण हो सकता है। 

जो भी हो, एक अच्छे संपादकीय में निम्नलिखित गुण अवश्य होने चाहिए—

(i) संपादकीय लेख की शैली प्रभावशाली एवं सजीव होनी चाहिए। 

(ii) भाषा बिल्कुल स्पष्ट, सशक्त और प्रखर होनी चाहिए। 

(iii) बात में अगर चुटीलापन भी हो तो लेख आकर्षक बन जाता है।

(iv) संपादक की हर बात बेबाक और सुस्पष्ट होनी चाहिए। 

(v) दुलमुल शैली, हर बात को सही ठहराना और अंत में कुछ न कहना ये संपादकीय के दोष हैं। इनसे बचना चाहिए। नीचे कुछ घटनाएँ, सूचनाएँ या समाचार दिए जा रहे हैं। उनके आधार पर संपादकीय लिखने के उदाहरण दिए जा रहे हैं।


संपादक को पत्र class 12 | sampadak ko patra


1. ऑल इण्डिया इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा का प्रश्न-पत्र लीक हो गया। दिल्ली, अहमदाबाद, पुणे और जयपुर में पेपर बिकते पाए गए। पुणे में मिलने वाले पेपर शेष सबसे अलग थे। इस घटना पर प्रतिक्रिया करते हुए संपादकीय लिखिए। 


पेपर लीक होने की बीमारी 


लगता है, देश में भ्रष्टाचार के दीमक ने चौखट को ऊपरी सिरे तक खा लिया है। जिस तरह देश की सर्वोच्च मानी जाने वाली प्रवेश परीक्षा के प्रश्न-पत्र लीक हो रहे हैं, उससे लगता है कि शिक्षा-जगत में शासन और दंड से बेखौफ अपराधी तत्वों ने अड्डा जमा लिया है। 

हालांकि परीक्षा आयोजित करने का दायित्व उच्च स्तर के शिक्षाविदों को सौंपा जाता है। उनसे किसी प्रकार की बेईमानी करने की आशा नहीं की जाती। 

प्रश्न-पत्र बनवाने और छपवाने की प्रणाली भी इतनी गोपनीय और फुल प्रूफ है कि स्वयं आयोजकों को प्रश्न-पत्र के बारे में ठीक से कुछ ज्ञात होता। फिर भी प्रश्न-पत्र लीक हो जाते हैं।

वास्तव में प्रश्न-पत्र लीक करने का काम निचले स्तर के कर्मचारियों की सहायता से होता है। कुछ दलाल टाइप लोग लोभ-लालच देकर प्रश्न-पत्रों की सुरक्षा करनेवाले कर्मचारियों मिलीभगत करके प्रश्न-पत्र एक दिन पहले प्राप्त कर लेते हैं। 

फिर उनकी चाँदी हो जाती है आज फैक्स और फोटोकॉपी की सुविधा इतनी सुलभ है कि पलक झपकते ही प्रश्न-पत्र देश-भर में यात्रा कर लेता है। जहाँ ऐसे ढीठ और घाघ लोग हों, वहाँ किसी प्रकार का सुरक्षा तंत्र काम नहीं आता। 

परीक्षा से पूर्व कुछ चालाक लोग परीक्षार्थियों को बेवकूफ बनाकर भी पैसा लूट ले जाते हैं। पुणे में प्राप्त प्रश्न-पत्र अन्य प्रश्न-पत्रों से अलग है। 

इससे यह संभावना भी बनती है कि सभी जगह या कुछ जगहों पर फर्जी प्रश्न-पत्र बनाकर लोगों से पैसे ऐंठे जा रहे हैं ऐसी स्थिति में सरकार का कर्तव्य है कि वह दोषी लोगों के विरुद्ध ऐसी कंठोर कार्रवाई करे ताकि भविष्य में ऐसा पाप करने के बारे में कोई सोच भी न सके।

2. टी. वी. पर दिखाए गए विज्ञापन और सीरियल समाज के वातावरण को विकृत कर रहे हैं। नंगेपन, फूहड़ता और अश्लीलता को बढ़ावा मिल रहा है। किसी सीरियल या विज्ञापनों का उदाहरण देते हुए संपादकीय लिखिए।


टी. वी. द्वारा अपसंस्कृति का प्रसार


आजकल दूरदर्शन पर जिस प्रकार के फूहड़ विज्ञापन और सीरियल दिखाए जा रहे हैं, उन्हें देखकर किसी भी सभ्य नागरिक को देश की भावी पीढ़ी के प्रति चिंता होने लगती है। 

क्या हम अपनी कन्याओं को उसी वेशभूषा में देखना चाहते हैं जिनमें उन्हें प्रदर्शित किया जा रहा है ? क्या मल्लिका शेरावत की नग्नप्रायः वेशभूषा हमारे समाज को अछूता छोड़ देगी ? इसे रोकने की जिम्मेदारी किसकी है? 

पीछे एक जूता बेचने वाली कंपनी ने एक युवक और युवती को बिलकुल नग्न रूप में प्रदर्शित किया। क्या ऐसे विज्ञापन को कोई सभ्य परिवार आँखें उठाकर देख सकता है? यदि नहीं, तो फिर ऐसी हरकतों को रोकने की जिम्मेदारी किसकी है ?

अब चकाचौंध भरे बड़े-बड़े सीरियलों का जमाना है। इन सीरियलों में भारतीय परिवारों का जितना घिनौना और विकृत रूप दिखाया जा रहा है, वह सचमुच चिंतनीय है। 

इनके पात्र, विशेषकर नारी पात्र मानो प्लास्टिक के गुड्डे-गुड़ियाँ या टेंटू हैं जिन्हें तोड़-मरोड़कर कैसे भी दिखाया जा सकता है। एक-एक नारी अनेक अनेक पतियों से संबंधित है। 

प्रायः सभी पुरुष विवाह के अतिरिक्त भी संबंध रखते हैं। यह समाज का विकृत और भौंडा चित्र है। इसी से क्षुब्ध होकर कवि अशोक वक्र ने लिखा है-

यह टी. वी. पर कैसी कैक्टस संस्कृति है। जो नित्य नई नागफनियाँ उगा रही है किसी को मेनका, किसी को अपर्णा तो किसी को कोमलिका बना रही है और हमने और आपने जो बनाई थी— वह प्रेरणा और अनुराग की संस्कृति वो घुटनों में सर अपने आँसू बहा रही है।

इन सीरियलों को रोकने के दो उपाय हैं–जन-आंदोलन तथा इन्हें न देखने का संकल्प। लाचार होकर इन्हें देखते चले जाने का रास्ता हमें सर्वनाश की ओर ले जाएगा। 3. नर्मदा बचाओ, आंदोलन के सिलसिले में मेधा पाटकर ने भूख हड़ताल की। 

आमिर खान ने उसका समर्थन किया। उधर गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और राजस्थान की जनता बाँध बनने के समर्थन में जुटी हुई है। नरेन्द्र मोदी बाँध के समर्थन में अनशन पर बैठ गए।

लोगों ने आमिर खान के प्रति क्रोष प्रकट किया, उसके पोस्टर जलाए। इस स्थिति के प्रति चिंता प्रकट करते हुए एक संपादकीय लिखिए। नर्मदा बाँथ में हिल्लोल नर्मदा बाँध परियोजना गत अनेक वर्षों से प्रगति पर है। इस योजना के जन्म से ही इसके अनेक विवाद जुड़ गए थे, जो आजकल अपने चरम पर है। 

CLASS 12 NCERT SOLUTION IN ENGLISHCLASS12 NCERT SOLUTION IN HINDI
Historyइतिहास
Geography भूगोल
Political science राजनीति विज्ञान
English SubjectResult
Hindi SubjectHistory answer keys

प्रश्न यह है कि नर्मदा बाँय साम महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश और राजस्थान की जनता को मिलेगा किंतु इसके कारण जिन लाखों लोगों को घर से बेघर होना पड़ेगा, उनका क्या होगा ? उनका पुनर्वास कैसे होगा ? कहाँ जाएँगे? यदि सरकारें उनके पुनर्वास का आश्वासन दे भी दें तो आश्वासनों के बल पर जीवन नहीं करता। फिर गरीब जनता की सुनेगा कौन ? 

इसलिए समाजसेवी मेया पाटकर ने केन्द्र सरकार से आग्रह किया कि पहले विस्थापित लोगों के पुनर्वास का प्रबंध करे फिर बॉय का काम आगे बढ़ाए। यह आग्रह उचित ही है। सरकारें इतनी निकम्मी है कि ये पीड़ितों को मुआवजा देने में दस-बीस वर्ष भी लगा दिया करती हैं। 1984 के दंगों में पीड़ित परिवारों को 22 वर्ष बाद मुआवजा देने की घोषणा की गई है। भला ऐसे कारनामों के बाद सरकार पर कौन भरोसा करे। 

उपर इन चारों राज्यों की करोड़ों-करोड़ों जनता पानी और बिजली के लिए तरस रही है। नर्मदा पर बाँध बनना उनके लिए जीवन रेखा के समान है। अतः वे जी-जान से बाँध की ऊँचाई बढ़ाने के पक्षधर हैं। इस रस्साकशी में दोनों पक्ष जोर लगा रहे हैं। मामला सर्वोच्च न्यायालय के पास है।

बालीवुड अभिनेता आमिर खान ने जब मेघा पाटकर के समर्थन में नर्मदा बाँध को रोकने का समर्थन किया तो लोगों का गुस्सा फूट पड़ा। कॉंग्रेस के नेताओं ने उनके पोस्टरों को जूतों से पीटा तथा जलाया। उयर भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं ने भी उनका विरोप किया। 

मामला ग्लैमर से जुड़ा होने के कारण देशवासियों के केन्द्र में आ गया। मीडिया को ऐसे मौकों की तलाश रहती है जब कोई चमकता सितारा गर्दिश में हो। वास्तव में इस मामले को तूल देना दुर्भाग्यपूर्ण है। 

मजे की बात यह है कि सभी पक्ष नर्मदा बाँध की ऊँचाई बढ़ाने के पक्ष में है किंतु तरीकों के कारण वे परस्पर विरोधी बने हुए हैं। आमिर खान के विरोध को कुछ लोग कोरी राजनीति कह सकते हैं, किंतु इससे यह बात स्पष्ट है कि चमकते सितारों को विवाद की भट्टी में स्वयं को नहीं झोंकना चाहिए वरना अपनी फजीहत करवाने के लिए तैयार रहना चाहिए।

4. नई शिक्षा प्रणाली में पुस्तकों का बोझ कम करने के लिए हिंदी व्याकरण को हटा दिया गया है। पिछले कुछ वर्षों में लिखित भाषा में जो-जो संशोधन किए गए थे, उन्हें रद्द कर दिया गया। पहले ‘द्वारा’ को ‘दद्वारा’ लिखे जाने का नियम बनाया गया था। अब उसे फिर से पूर्ववत रखा गया है। इस विडंबना पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए एक संपादकीय लिखिए ।


भाषा और व्याकरण की उपेक्षा


यू. पी. ए. सरकार के बदलने के साथ देश में जो-जो नए परिवर्तन आए हैं, उनमें एक बड़ा परिवर्तन है–भाषा और व्याकरण की उपेक्षा लगता है, पाठ्यक्रम के निर्माताओं को भाषा-संस्कार में कोई रुचि नहीं है या वे देश के भाषा ज्ञान से संतुष्ट हैं। 

पाठ्यक्रम समिति ने बच्चों पर बस्ते का बोझ कम करने की जाँच की तो उन्हें व्याकरण की पुस्तक ही फालतू लगी जिसके बोझ के नीचे वे मरे जा रहे थे। आज मीडिया का जमाना है। चारों ओर सप्रेषणकर्ताओं की माँग है। 

होना तो यह चाहिए था कि भाषा को और अधिक माँजने के लिए प्रतिभाशाली लोगों को इस ओर प्रेरित किया जाता हो गया विपरीत। छठी कक्षा तक अलग से व्याकरण नहीं पढ़ाई जाएगी।

प्रश्न यह है कि क्या अंग्रेजी में भी व्याकरण को चलता कर दिया गया है ? उत्तर है नहीं। वहाँ व्याकरण अनिवार्य है। जनता को पाठ्यक्रम समिति से पूछना चाहिए कि ऐसा क्यों?

अभी कुछ ही वर्षों पूर्व एन.सी.ई.आर.टी. ने पूरे देश में भाषा के लेखन में कुछ महत्त्वपूर्ण परिवर्तन किए थे। मसलन ‘विद्या’ को ‘विद्या’ लिखा जाए। 

‘हड्डियाँ’ को ‘हडिड्याँ’ लिखा अभी यह परिवर्तन अध्यापकों और विद्यार्थियों तक ठीक से पहुँचा ही नहीं था कि नई ने इन्हें पूर्ववत रख दिया। इससे भाषा के अध्यापक और विद्यार्थी भ्रम की स्थिति में हैं। समझ ही नहीं पा रहे कि उन्हें क्या करना है ? 

इतनी जल्दी-जल्दी निर्णय बदलना भाषा के हित में नहीं है। शिक्षा बोर्ड नए पाठ्यक्रम तो लागू कर देता है, नए परिवर्तन भी सुझा देता है, किंतु उनके लिए अध्यापकों को प्रशिक्षित नहीं किया जाता, न ही उनसे विचार-विमर्श किया जाता है। वास्तव में भाषा के स्वस्थ विकास के लिए अध्यापकों की सक्रिय भूमिका आवश्यक है। जाए।

5. सरकार बदलने के साथ पाठ्यक्रम भी बदला । सारी पुस्तकें बदल दी गई। यह परिवर्तन केवल राजनीतिक जिदबाजी के कारण हुआ। राजनीतिक लड़ाई का शिक्षा के फेरबदल से संबंध होना अनुचित। छात्रों, अध्यापकों, प्रकाशकों को परेशानी। आगे भी सरकारें पाठ्यक्रम को अस्थिर रखेंगी। पाठ्यक्रम समिति एक स्वतंत्र संस्था होनी चाहिए। इसके अपने पैमाने हों, इस विषय पर संपादकीय लिखिए।


पाठ्यक्रम परिवर्तन की राजनीति


भारत का लोकतंत्र अभी परिपक्व नहीं हुआ है। वहाँ राजनीतिक दल और नेता स्वयं को राजनीतिक परिवर्तन तक सीमित नहीं मानते। वे अपने अधिकार असीमित मानते हैं। इसलिए वे हर कहीं अपने पाँव फैलाते नजर आते हैं। 

उन्हें शिक्षा जैसे पवित्र कर्म को भी राजनीतिक दृष्टि से देखने की बुरी आदत लग गई है। इसलिए जब एन.डी.ए. सरकार आई तो उन पर इतिहास को बलदने का आरोप लगाया गया। साम्यवादियों ने कहा कि एन.डी.ए. ने शिक्षा का भगवाकरण कर दिया है। 

वास्तव में, नई सरकार ने शिक्षा पर काबिज गिरोह को तोड़ा था। परिवर्तन के नाम पर दो-चार विवादास्पद बातें सामने आई जिन पर देश-भर में हो-हल्ला मचाया गया। इस हो-हल्ले का यह लाभ होना चाहिए था कि आनेवाली सरकारें पाठ्यक्रम में मनमाना परिवर्तन न किया करें। परंतु हुआ विपरीत।

अब यू.पी.ए. सरकार सत्ता में है। इस गठबंधन ने दो वर्ष पुराने पाठ्यक्रम को पूरी तरह नकार दिया है। यह एकाएक परिवर्तन समझ से परे है। यदि इसी प्रकार हर दो साल बाद पाठ्यक्रम बदलते रहे तो शिक्षा की गुणवत्ता पर बुरा प्रभाव पड़ेगा। 

सरकारें अपने समर्थकों को खुश करने के लिए उन्हें पाठ्यक्रम समिति में ले आती हैं, उनके लिखे अध्याय पाठ्यक्रम में रख देती हैं, करोड़ों रुपया डकार लेती हैं। यह सब तो होता ही है। सबसे बुरा तो यह होता है कि राजनीतिक दल शिक्षा के माध्यम से अपनी विचारधारा का प्रचार करने लगते हैं। 

इस बार पाठ्यक्रम समिति पर भगवा झंडा नहीं, मार्क्स का लाल झंडा सवार है। भगवा झंडे वालों ने पाठ्यक्रम में अपने गुरु, प्रतीक चिन्ह या प्रेरणा-स्रोत का वर्णन नहीं किया था, परंतु लाल झंडे वालों ने पाठ्यक्रम मार्क्स, कम्युनिज्म, दराती आदि किसी को नहीं छोड़ा। सब मानो पाठ्यक्रम के अनिवार्य अंग बन गए। यह निंदनीय प्रयास है। 

यह मानो एक खुली चुनौती है जिसकी लाठी उसकी भैंस । पाठ्यक्रम निर्माण के कुछ ठोस नियम होने चाहिए। पाठ्यक्रम समिति एक स्वतंत्र संस्था होनी चाहिए, जिसमें राजनीतिक उठापटक का प्रभाव नहीं होना चाहिए। एक पाठ्यक्रम 5-10 वर्ष की अवधि तक चलना चाहिए। 

6. पानी प्राणी जगत् के लिए अनिवार्य है। अतः पानी की बर्बादी रोकने को आधार बनाकर एक संपादकीय लिखिये ।


जल ही जीवन है


जल जीवन है। विश्व की सभी प्रमुख सभ्यताओं का विकास बड़ी-बड़ी नदियों के किनारों पर ही हुआ था क्योंकि जल के बिना इंसान का जीवन चलना सहज-सरल नहीं है। इंसान जल के महत्व को समझता है पर जब उसके पास पर्याप्त मात्राओं में जल हो तो वह उसकी परवाह नहीं करता। 

वह उसकी परवाह तब करता है जब वह समाप्त हो जाने के कगार पर पहुंच जाता है। हम देशवासियों ने वर्षों तक पानी को कभी समाप्त न होनेवाला मानकर उसे बहुत बेकार बहाया है पर अब गंगा यमुना का मैदान हो या कावेरी कृष्णा का इलाका, देश भर में अब पानी की कमी सिर पर आ खड़ी हुई है। 

घरों तक नल आ गए तो पानी की बर्बादी का एक पूरा नशा देश भर पर चढ़ गया। पानी चाहे कम हो या ज्यादा उसे ऐसा मुफ्त समझा जाने लगा है मानो हर समय मेड टू आर्डर वर्षा का इंतजाम हो गया। जब चाहा नल खोला और जितना चाहा पानी बहा दिया गया।

जिन परिवारों में पहले नारा दिन एक-दो घड़े पानी से निकल जाता था, वे रात-दिन पानी व्यर्थ बहाने लगे मानो पानी की कोई कीमत ही न हो। 

पानी की कमी के कारणों के बारे में जानना पुरानेपन की निशानी होने लगी है। बाजारों में पानी की कमी दूर करनेवाले नहीं पाने का भरपूर इस्तेमाल करनेवाले उपकरण धड़ाधड़ बिकने लगे हैं। जकूजी, बड़े टव, वाशिंग मशीनें, प्रेशराइज्ड प्लंबिंग शान की बात होने लगी। जो भी कुछ पैसे ज्यादा खर्च सकता वह अपने-अपने घर में स्विमिंग पूल तक की सोचने लगा।

सरकारों और नगरनिकायों ने पानी को ढंग से इस्तेमाल करने की सलाह दी पर सरकारी सलाह का तो देश पर असर होता ही नहीं है। अगर नलों में पानी नहीं मिला तो ट्यूबवेल लगा दिए गए और यह जानते हुए भी कि अंडरग्राउंड पानी भी एक सीमित मात्रा में है, इनकी न बिक्री में फर्क आया और न इससे निकले पानी की बर्बादी में।

पानी जीवन की मूल आवश्यकता है और यह सोचना कि कमी होने पर सरकारों को कोसने से काम चल जाएगा, गलत है। अगर पानी नहीं होगा तो सरकार को वोट के बल से बदल डालने से भी पानी पैदा नहीं हो सकता। 

पानी को राजनीति से पैदा नहीं किया जा सकता। राजनीति के नाम पर इसे बर्बाद जरूर किया जा सकता है। पानी की बचत घरों से शुरू होनी आवश्यक है। 

यह हो सकता है कि अभी भी घरों में घरेलू पानी का इस्तेमाल उद्योगों और कृषि में इस्तेमाल होनेवाले पानी में कम हो पर जब कोई बात घर-घर पहुँच जाती है तभी उसका ध्यान सभी को आता है, चाहे मामला कपड़े धोने का हो, बर्तन साफ करने का या फ्लश में डालने का, पानी की कुछ बूँदें भी हर बार बचाने की कोशिश शुरू हो जाए तो ही साफ पानी की कमी से बचा जा सकता है। 

पानी के बिना हमारा जीवन नहीं चल सकता। अभी भी समय है कि हम होश में आ जाएँ और पानी को बचाएँ। वर्षा के पानी को नालियों में बह जाने से रोकें। ‘वाटर हार- वेस्टिंग’ करें और अपनी जीवन को नष्ट होने से बचाएँ।

7. सरकार कक्षा बारह तक परीक्षा में ग्रेड प्रणाली लागू करने जा रही है। इसके कारणों तथा परिणामों पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए एक संपादकीय लिखिए।


ग्रेड प्रणाली का रहस्य


देश-भर में चर्चा है कि परीक्षाओं में ग्रेड प्रणाली लागू की जाएगी। ग्रेड प्रणाली का अर्थ है-परीक्षा-परिणाम अंकों के हिसाब से न आकर ग्रेड के हिसाब से होंगे। सभी छात्रों को ‘ए’ से ‘ई’ ग्रेड में रखा जाएगा। मसलन 90 से 95 प्रतिशत अंक पाने वाले छात्र ‘ए’ ग्रेड में होंगे और 95 प्रतिशत से अधिक अंक पाने वाले छात्र ए प्लस ग्रेड में ।

यह ग्रेड- प्रणाली समाज में बढ़ रहे तनाव को लेकर लागू की जा रही है। आजकल के बच्चे तथा उनके माता-पिता एक-एक अंक के लिए गला काट प्रतियोगिता कर रहे हैं। 

93% अंक पाने वाला छात्र भी रोता हुआ घर आता है, क्योंकि उसके सहपाठी ने 94% अंक ले लिए। छात्र से अधिक हाय-तौबा मचाते हैं-उनके हितैषी माता-पिता, जो नासमझी से अपने बच्चों को एक-एक अंक के लिए शर्मिन्दा करते हैं। 

वे बच्चे के पैदा होते ही उस पर तनाव बढ़ाना शुरू कर देते हैं कि उनका बेटा तो डॉक्टर बनेगा, उनकी बेटी तो फर्स्ट आएगी। यह उपेक्षा बच्चे के मन में गहरे बैठ जाती है। इसलिए जब वह अपेक्षा पर खरा नहीं उतरता तो अवसाद में रहने कम लगता है। 

कई छात्र-छात्राएँ तो आत्महत्या भी कर लेते हैं। पीछे विद्यार्थी में परीक्षा-परिणाम को लेकर आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ती देखी तो शिक्षा बोर्डों ने निर्णय लिया कि इस तनाव को करने के उपाय किए जाएँ। एक उपाय यह था कि अंक प्रणाली की जगह ग्रेड-प्रणाली लागू क

जाए। मेरे विचार से ग्रेड-प्रणाली मानसिक तनाव को एक सीमा तक ही कम कर सकती है। जिसे तनाव लेने की बीमारी हो, वह कम ग्रेड आने पर भी आत्महत्या कर सकता है। इसलिए आवश्यकता है तनाव के कारणों को कम करने की। विशेषकर माता-पिता को चाहिए कि वे अपने बच्चों को जुनून की हद तक कैरियरिस्ट न बनाएँ। उन्हें अच्छा, शांत और संतुलित इन्सान बनाने में उनकी सहायता करें।

8. भारतीय क्रिकेट टीम में खिलाड़ियों की अदली-बदली के कारण आए दिन विवाद खड़े हो जाते हैं। महत्वपूर्ण लोगों की दखलंदाजी के कारण प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका नहीं मिल पाता। आप अपने विचार संपादकीय के माध्यम से व्यक्त कीजिए।


भारतीय क्रिकेट में राजनीति


भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड कई बार विवादों में फँस जाता है। यहाँ टीम के चयन में प्रतिमा को दरकिनार कर दिया जाता है। ऐसा ही मामला पिछले दिनों सौरव गांगुली के साथ हुआ। 

बोर्ड ने माना कि खराब खेल-प्रदर्शन के कारण गांगुली को टीम में जगह नहीं मिल सकती। भारतीय क्रिकेट के सफलतम कप्तानों में से एक सौरव गांगुली को कप्तानी से ही नहीं टीम से भी हटा दिया गया। 

अगर खराब खेल प्रदर्शन ही टीम में जगह बनाने का पैमाना है तो सचिन तेंदुलकर, वीरेन्द्र सहवाग और मोहम्मद कैफ जैसे खिलाड़ी भी तो खराब खेल रहे हैं।

क्रिकेट बोर्ड अगर सौरव गांगुली के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार कर सकता है तो सचिन या सहवाग जैसे खिलाड़ियों के साथ भी भेदभाव हो सकता है। भारतीय क्रिकेट के इतिहास में अनेक उदाहरण हैं जब खिलाड़ी को क्रिकेट की राजनीति का शिकार बनना पड़ा है। अपने चहेतों को सुविधा देने का चलन आदर्श उदाहरण नहीं हो सकता।

किसी भी खिलाड़ी की प्रतिभा का आकलन दो-चार मैचों के आधार पर करना इसके लिए लगातार मौका मिलना चाहिए। वरिष्ठ खिलाड़ियों को चाहिए कि वे स्वेच्छा से नए खिलाड़ियों का मार्ग प्रशस्त करें। क्रिकेट टीम के साथ पूरे देश की भावनाएँ जुड़ी होती हैं। टीम मैच जीतती है तो पूरा देश खुश होता है। मैच हारती है तो गम की लहर दौड़ जाती है। 

क्रिकेट बोर्ड को चाहिए कि वह बिना भेदभाव के प्रतिभा का सम्मान करे। अगर खिलाड़ी. का प्रदर्शन लगातार खराब रहता है तो उसे ससम्मान विदाई का रास्ता दिखाना चाहिए। हर खिलाड़ी के साथ एक क्षेत्र विशेष के लोगों की भावनाएँ जुड़ी होती हैं। उन लोगों की भावनाओं को ठेस नहीं लगनी चाहिए। 

भारत जैसे विशाल देश में प्रतिभावान खिलाड़ी कम नहीं हैं। आवश्यकता है प्रोत्साहन की और सही नीतियों की क्रिकेट में राजनीति न होकर खुली प्रतियोगिता होनी चाहिए। इससे अच्छे खिलाड़ी सामने आएँगे।

9. समाज में लगातार बढ़ रहा लिंगानुपात चिंता का विषय है। लड़के की चाह में अकसर कन्या भ्रूण की हत्या कर दी जाती है। देश में 1000 पुरुषों के मुकाबले स्त्रियों की संख्या 937 है। इस विषम अनुपात के कारण निकट भविष्य में कई समस्याएँ आएँगी। आप अपने विचार संपादकीय के माध्यम से प्रस्तुत कीजिए। 


कन्या भ्रूण हत्या- दोषी कौन


समाज में दिन-प्रतिदिन स्त्री-पुरुष अनुपात में कमी हो रही है। वर्तमान में यह अनुपात 937 : 1000 है अर्थात 1000 पुरुषों के मुकावले औरतों की संख्या 937 है। एक सर्वेक्षण के अनुसार हमारे देश में प्रति वर्ष दस लाख भ्रूण हत्याएँ हो रही हैं। 

पुत्र मोह से ग्रस्त समाज में यह अच्छी कमाई वाला धंधा है। प्रति वर्ष लाखों भ्रूण कुछ हजार रुपयों की खातिर नष्ट कर दिए जाते है। जगह-जगह खुले अस्पतालों में जांच की आड़ में यह जघन्य काम किया जाता है। प्रायः वंश-वृद्धि के नाम पर कन्या भ्रूण को पैदा नहीं होने दिया जाता। 

समाज में लड़की को पराया धन समझा जाता है। अधिकतर लोगों की मानसिक धारणा होती है कि बेटा हो तो कोस की प्राप्ति हो जाती है। बेटियों को समाज बोझ मानता है। दहेज की मार से घबराकर, मोक्ष-प्राप्ति की चाह और समाज में बेटे का बाप कहलाने की चाह में प्रायः कन्या भ्रूण की बलि चढ़ा दी जाती है।

भ्रूण-हत्या के इस कुकृत्य में माता-पिता तो दोषी हैं ही, साथ ही काम को पेशा बनाने वाले लोग भी दोषी हैं। हमारी सरकार भी बराबर की भागीदारी है। सरकार को कड़ा कानून बनाना चाहिए। 

दोषियों को कठोर सजा मिलनी चाहिए जो दूसरों के लिए उदाहरण का काम करें। वर्तमान सरकार ने भ्रूण हत्या के खिलाफ अभियान चलाया है। मगर यह तभी सफल होगा जब में आम आदमी की धारणा बदलेगी।

हमें विचारना होगा कि पैदा होने से पहले ही एक मासूम जान की जान लेकर हम इन्सानियत की हत्या कर रहे हैं। इतिहास बताता है कि नारियों ने देश की आन की रक्षा की है। वर्तमान में भी नारियों ने समाज के सामने उदाहरण पेश किए हैं।

10. समाज में आरक्षण के कारण अनेक योग्य नवयुवकों का भविष्य अंधकारमय हो जाता है। जाति विशेष के हित के लिए सामान्य वर्ग को दंडित नहीं किया जाना चाहिए। उच्च पदों पर बैठे राजनेता अपने निजी स्वार्थों के लिए गलत नीतियाँ बनाते हैं। आरक्षण का आधार जाति या वर्ग विशेष नहीं, आर्थिक स्थिति होनी चाहिए। आप अपने विचार प्रस्तुत करें। आरक्षण के मुद्दे पर संपादकीय लेख तैयार करें।


समाज में आरक्षण का जिन्न


आरक्षण का जिन्न देश का पीछा नहीं छोड़ा रहा। श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार गिरने का कारण आरक्षण का मुद्दा ही था। वोट बैंक की खातिर इस मुद्दे को बार-बार उछाल दिया जाता है। श्री वी. पी. सिंह को पूरे देश का विरोध सहन करना पड़ा था। 

आखिरकार इस आरक्षण के जिन्न ने उनकी प्रधानमंत्री की कुर्सी को छिन लिया था। मानव संसाधन विकास मंत्री श्री अर्जुन सिंह ने फिर से इस जिन्न को छेड़ दिया है। 

उन्होंने प्रस्ताव दिया है कि केन्द्र सरकार की मदद से चलनेवाले शिक्षण संस्थानों में पिछड़े वर्गों के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण हो। आरक्षण के इस प्रस्ताव से पूरे देश में फिर से बहस छिड़ गई है। किसी वर्ग विशेष के हित की कामना करना गलत है।

देश में सामाजिक- अन्याय के शिकार लोगों को समाज की मुख्य धारा में लाने के लिए आरक्षण का सहारा लिया गया था। आज जब देश तरक्की कर रहा है तो यह वर्गभेद समाप्त कर देना चाहिए। मगर उल्टे इसको बढ़ाया जा रहा है। 

अन्य वर्गों की उपेक्षा करना ठीक नहीं। आरक्षण के जिन्न को और खुराक नहीं दी जानी चाहिए। पहले ही हर जगह पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण की व्यवस्था है। यह विचारणीय मुद्दा है कि आरक्षण के कारण सामान्य वर्ग के प्रतिभावान छात्रों के लिए अवसरों की कमी हो जाएगी। 

अनेक उच्च शिक्षण संस्थाओं में से पहले से ही अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित सीटें खाली पड़ी रहती हैं। इसका कारण है इन वर्गों के छात्र यहाँ तक पहुँचते-पहुँचते पढ़ाई छोड़ चुके होते हैं।

सरकार को सोचना चाहिए कि इस प्रकार आरक्षण की बैसाखी पकड़कर वह वर्ग-विशेष को हमेशा के लिए पंगु बनाना चाहती है। 

आरक्षण के कारण कई विद्यार्थियों के लिए दाखिला लेना मुश्किल हो जाता है। उन्हें अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर ही नहीं मिलता। सरकार को चाहिए कि आरक्षण का लाभ जाति विशेष को न देकर आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को दे। आरक्षा का पैमाना आर्थिक स्थिति और योग्यता हो ।

11. वर्तमान समाज में मादक पदार्थों का चलन जिस गति से फैल रहा है उससे को चिंतित होना चाहिए। विशेषकर युवा पीढ़ी इस नशे के जाल में फँसती जा रही है। हमें इस स्थिति से निपटने के लिए कठोर कदम उठाने होंगे। आप अपने विचार संपादकीय के माध्यम से प्रस्तुत कीजिए।


नशे के जाल में फँसा युवा वर्ग


जाल समाज में मादक पदार्थों का चलन जिस गति से बढ़ रहा है उसके भयावह परिणाम सामने आ रहे हैं। दूसरों से अलग दिखने की चाह और तेज रफ्तार जिंदगी में युवा वर्ग नशे के में फँसता जा रहा है। 

कुछ युवा मजा प्राप्त करने के लिए तो कुछ शौक के लिए इस लत को पाल लेते हैं। मादक पदार्थों का सेवन तो मर्जी से किया जाता है, मगर जल्दी ही यह मजबूरी बन जाता है। युवक ही नहीं युवतियाँ भी अपने को असाधारण दिखाने की होड़ में इस जाल में फँस जाती हैं। उच्च वर्ग की महिलाएँ नशे को स्टेटस सिंबल बना लेती हैं।

युवाओं में यह लत विशेषकर 15 से 20 वर्ष की आयु में लग जाती है। किशोरवय के बच्चे स्कूली संगत में बीड़ी-सिगरेट आदि का सेवन करते हैं। उनका यह शौक धीरे-धीरे अफीम, चरस, गाँजे और स्मैक जैसे जानलेवा मादक पदार्थों तक पहुँच जाता है। 

इस आदत से बच्चे दूर रहें, इसके लिए जरूरी है कि पारिवारिक स्तर पर अभिभावक अपने बच्चों पर नजर रखें। स्कूलों में ऐसे उपाय करने चाहिए कि कोई भी छात्र इस बुरी आदत का शिकार न बने। शिक्षकों को चाहिए कि वे छात्रों की गतिविधियों पर नजर रखें। 

स्कूली स्तर पर मादक पदार्थों के सेवन से होनेवाले भयानक परिणामों पर समय-समय पर सेमिनार आयोजित किए जाने चाहिए। बच्चों और युवाओं को बताया जाना चाहिए कि यह खरीदी हुई मीत है।

सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयास नाकाफी हैं। सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान पर प्रतिबंध लगाने से ही काम नहीं चलेगा। मादक पदार्थों की बिक्री से प्राप्त लाभ को लोभ छोड़कर सरकार को चाहिए कि इन पदार्थों को पूर्ण प्रतिबंधित करे। 

पुलिस व प्रशासन की सख्ती से इस कारोबार को रोका जाना चाहिए। नशे के सौदागरों की पहचान कर उन्हें कठोर दंड दिया जाना चाहिए। लोगों में जागरूकता बढ़ाने के लिए संचार माध्यमों का सहारा लिया जाना चाहिए।

एक सर्वेक्षण के अनुसार दुनिया भर में हुई मौतों में 40% लोगों की मौत का कारण मादक पदार्थ हैं। इससे पहले कि यह जहर नस-नस में फैल जाए, युवा वर्ग को जाग जाना चाहिए। सच कहा गया कि बचाव में ही बचाव है। 

12. आप अपने स्कूल की वार्षिक पत्रिका के हिन्दी विभाग के छात्र संपादक हैं। इस पत्रिका के मुद्रण होने के लिए लेखों और समाचारों इत्यादि का संकलन करके पत्रिका में यथास्थान व्यवस्थित कीजिए। साथ ही इस पत्रिका के लिए संपादकीय भी लिखिए ।


स्कूल की वार्षिक पत्रिका हेतु संपादकीय 


आपकी पत्रिका आपके हाथ में है जिसमें आपने अपने ढेरों लेखों, कहानियाँ, कविताएँ चुटकुले, कार्टून आदि छपने के लिए दिए थे। मैं आप सबका आभारी हूँ । आप सब में लेखन-क्षमता है, कल्पना की उड़ान है। 

शब्दों पर पकड़ है। आप जीवन की गहराइयों को समझने लगे हैं और यही यथार्थ जीवन जीने की पहचान है। आपका अपनी मातृभाषा के प्रति मोह देख में अभिभूत हूँ। 

यद्यपि आप अपने दैनिक जीवन में अंग्रेजी का काफी अधिक प्रयोग करते हो पर हिन्दी आपकी मातृभाषा है, राष्ट्रभाषा है इसका परिचय आपके द्वारा दिए गए लेखों, कहानियों आदि से हो गया है। 

सच ही संसार में उसी देश ने तरक्की की है जिसने मातृभाषा को नहीं त्यागा चीन, रूस, जापान, फ्रांस आदि सभी देश अपनी-अपनी भाषा के महत्व को समझते हैं। 

उनकी मानसिकता गुलाम नहीं है और इसीलिए उनके व्यक्तित्व का विकास भिन्न प्रकार से हुआ है। हिन्दी तो पूर्ण रूप से वैज्ञानिक भाषा है। इसकी लिपि देवनागरी के द्वारा सभी प्रकार की ध्वनियों को प्रकट किया जा सकता है। 

हिन्दी को जैसे बोलते हैं, वैसे ही लिखते हैं। हर व्यक्ति को अधिक-से-अधिक भाषाएँ सीखनी चाहिए पर अपनी मातृभाषा के प्रति लगाव कभी नहीं छोड़ना चाहिए। आपकी वार्षिक परीक्षाएँ बिल्कुल निकट आ गयी हैं। परिश्रम करो और अपना, अपने परिवार और स्कूल का नाम ऊँचा करो। परीक्षाओं के लिए शुभ कामनाएँ।



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