NCERT Class 12 Business Studies Chapter 4 Notes in Hindi नियोजन Pdf

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Class 12 Business Studies Chapter 4 Notes in Hindi

कक्षा | Class12th 
अध्याय | Chapter04
अध्याय का नाम | Chapter Nameनियोजन | PLANNING
बोर्ड | Boardसभी हिंदी बोर्ड
किताब | Book एनसीईआरटी | NCERT
विषय | Subjectव्यवसाय अध्ययन | business studies
मध्यम | Medium हिंदी | HINDI
अध्ययन सामग्री | Study Materialsप्रश्न उत्तर | question answer
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Planning summary | नियोजन सारांश

पाठ की प्रमुख बातें-नियोजन प्रबंध का प्राथमिक कार्य है। प्रबंध कार्य का प्रारंभ ही नियोजन से होता है। नियोजन कार्य को करने से पहले सोचने की प्रक्रिया है। वास्तव में, नियोजन तथ्यों पर आधारित एक मानसिक प्रक्रिया है जिसके अन्तर्गत मानवीय तथा भौतिक पदकों को व्यवस्थित एवं समन्वित किया जाता है ताकि निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति सर्वश्रेष्ठ सम्भावित तरीके से की जा सके। 

कल के कार्य का आज ही निर्धारण करना नियोजन है। नियोजन का व्यावसायिक प्रबंध के अन्तर्गत बहुत अधिक महत्त्व है। नियोजन पग-पग पर व्यवसायी का मार्गदर्शन करता है, भावी कठिनाइयों एवं खतरों के प्रति सचेत करता है तथा उन पर विजय पाना सुलभ बनाता है। नियोजन के विभिन्न तत्व या घटक होते हैं। जैसे-लक्ष्य, उद्देश्य, नीतियों, कार्यविधियों, पद्धतियों, बजट, कार्यक्रम तय व्यूह-रचना इत्यादि ।

NCERT Class 12 Business Studies Chapter 4 Notes in Hindi नियोजन Pdf

‘योजना चाहे छोटी हो अथवा बड़ी, उसे तर्कसंगत एवं व्यावहारिक बनाने के लिये कुछ आव कदम उठाने पड़ते हैं। इसे नियोजन प्रक्रिया भी कहते हैं। इस प्रक्रिया को पूरा करने के लिये विभिन्न प्रबंधकीय विद्वानों ने नियोजन के विभिन्न चरणों अथवा कदमों का वर्णन किया है। नियोजन का सर्वाधिक महत्त्व होते हुए भी कुछ विद्वान इसे ‘समय एवं धन की बर्बादी

‘अथवा ‘बरसाती ओले’ कहकर इसका विरोध करते हैं। उनका कहना है कि व्यावसायिक योजनाएँ अनिश्चित एवं अस्थिर परिस्थितियों की पृष्ठभूमि में तैयार की जाती है जब इनका आधार ही अनिश्चित है तो फिर यह कैसे माना जा सकता है कि नियोजन द्वारा निर्धारित बातें सदैव शत- प्रतिशत सत्य ही होगी। इस विरोध का मूल कारण नियोजन में उत्पन्न विभिन्न कठिनाइयों एवं सीमाओं का होना है। 

फिर भी नियोजन की सीमाएँ या कठिनाइयाँ होने के बावजूद भी व्यावसायिक प्रबंध के क्षेत्र में नियोजन का विशेष महत्त्व है क्योंकि नियोजन के आधार पर निर्धारित लक्ष्यों एवं उद्देश्यों को प्राप्त करने में सहायता मिलती है।


अति लघु उत्तरीय प्रश्न 


Q. 1. नियोजन से आप क्या समझते हैं ? (What do you mean by planning.) 

Ans. नियोजन कार्य को करने से पहले सोचने की प्रक्रिया है। दूसरे शब्दों में, कल के कार्य का निर्धारण आज ही करना नियोजन है। वास्तव में, निर्धारित लक्ष्यों एवं उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिये भविष्य में क्या करना है, क्यों करना है, किसे करना है, कब करना है, कैसे करना है और किन-किन साधनों के उपयोग से करना है इत्यादि बातों का पहले से ही निर्धारण करना नियोजन कहलाता है।

Q. 2. कृण्ट्ज एवं ओ ‘डोनैल के द्वारा दिये गये नियोजन की परिभाषा को लिखें। (Give the definition of Planning given by Koontz and O’Donnel.)

Ans. कूण्ट्ज एवं ओ’डोनेल के अनुसार नियोजन एक बौखिक प्रक्रिया है, कार्य करने के मार्ग का सचेत निर्धारण है, निर्णयों को उद्देश्यो, तथ्यों और पूर्व-विचारित अनुमानों पर आधारित करना है।

Q. 3. नियोजन की एक अच्छी परिभाषा दीजिए। (Give a good Definition of Planning.)

Ans. नियोजन की एक अच्छी परिभाषा देते हुये यह कहा जा सकता है कि निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति के लिये भावी कार्य-कलापों के विषय में वैकल्पिक क्रियाओं से सर्वोत्तम के चयन के लिये निर्णय लिया जाना और निर्धारण किया जाना ही नियोजन है।

Q.4. नियोजन की विभिन्न विशेषताओं को बताएँ । (Discuss the features of planning.)

Ans. नियोजन की विभिन्न विशेषताएँ इस प्रकार है–

1. निर्धारित उद्देश्यों एवं लक्ष्यों का होना, 2. पूर्वानुमान करना, 3, ऐक्यता, 4. विि वैकल्पिक क्रियाओं में से सर्वोत्तम का चयन, 5. नियोजन की सर्वव्यापकता, 6. नियोजन एक नि एवं लोचयुक्त प्रक्रिया है, 7. पारस्परिक निर्भरता, 8. प्राथमिक कार्य, 9. बौद्धिक एवं मानि प्रशिष, 10. अन्य विशेषताएँ जैसे मार्गदर्शक, कार्यकुशलता।

Q.5. नियोजन की क्या प्रकृति है ? (What is the nature of planning ?)

Ans. नियोजन की प्रकृति- (i) नियोजन एक बौद्धिक क्रिया है (Planning is a intellectual activity) (ii) नियोजन एक भविष्य की किया है (Planning is a fute activity) (iii) नियोजन का उद्देश्य कुशलता को बढ़ाना है (Main aim of planning is increase effeciency)

Q.6. “ नियोजन की क्या आवश्यकता है? (Explain=”Planning is the basis of control.)

Ans. नियोजन की आवश्यकता निम्नलिखित तीन कार्यों के लिए होती है-

(i) व्यावसायिक अवसरों का लाभ उठाने के लिए। (ii) व्यावहारिक समस्याओं को हल करने के लिए।

(iii) व्यावसायिक चुनौतियों का सामना करने के लिए।

Q.7. “नियोजन नियंत्रण का आधार है।” स्पष्ट करें । (Why planning is needed

Ans. नियोजन एक बौद्धिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा प्रबंधक व्यवसाय के साधनों को व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए समयोजित करते हैं। इन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए यह निर्धारित भी करते हैं ि व्यक्ति ने क्या कार्य करना है, कैसे करना है जिससे वह व्यक्ति अपनी योग्यता अनुसार सक्रिय योगदान दे सके इस प्रकार, नियोजन को नियंत्रण का आधार कहा जा सकता है।

Q.8. “नियोजन एक सतत् प्रक्रिया है।” समझाइए । (“Planning is a continuous process.” Comments.)

Ans. नियोजन एक ऐसी प्रक्रिया है जो व्यवसाय के आरम्भ से अंत तक निरन्तर जारी रहती है। एक निश्चित अवधि के लिए सदैव नई योजना बनाई जाती है। इस प्रकार नियोजन के

प्रगति निरन्तर चलती रहती है, इसका कोई अंत नहीं। इसमें एक योजना के लागू हो जाने के बाद दूसरी योजना, फिर तीसरी योजना आदि का क्रम चलता रहता है।

Q.9. “नियोजन निर्णय तथा समन्वय को सरल बनाता है” स्पष्ट करें। (Explain – “Planning is useful in decision making and coordination.”)

Ans. नियोजन निर्णय व समन्वय को निम्न प्रकार से सरल बनाता है—

समन्वय (Coordination ) — नियोजन द्वारा दिए गए प्रत्येक कार्य को कार्यक्रम के अनुसार पूर्ण किया जाता है तथा संस्था के विभिन्न भागों में आपसी तालमेल भी रखा जाता है। नियन्त्रण ( Control) – नियोजन द्वारा व्यापार में होने वाली सभी क्रियाओं पर नियन्त्रण रख

जाता है तथा जिसकी आवश्यकता होती है, वह चीज उचित समय पर उपलब्ध कराई जाती है।।

Q. 10. नियोजन के कितने चरण होते हैं ? (How many stages of planning are there ? ) Or, नियोजन में चरणों की संक्षप में लिखिए। ( Give briefly the steps in planning.)

Ans. नियोजन के निम्न सात चरण हैं-

1. लक्ष्यों को निर्धारित करना। 2. विभिन्न विकल्पों का अध्ययन करना। 3. विभिन्न विकल् का मूल्यांकन करना। 4. श्रेष्ठतम कार्यविधि का चुनाव करना। 5. आवश्यक उपयोजना का निर्माण करना। 6. नियोजन की सीमाएँ निर्धारित करना। 7. नियोजन का अनुवर्तन करना ।

Q.11. “नियोजन से व्यय में कमी आती है”। समझाइये । (Explain “Planning reduces expenses “)

Ans. बिना नियोजन के व्यावसायिक उद्देश्य अटकलबाजियों पर आधारित है, जिसमें अनेक प्रकार के धन, सन्देह एवं अव्यवस्थाएँ उत्पन्न हो जाती है। इसलिए प्रत्येक संस्था में एक अलग हे नियोजन विभाग का होना आवश्यक है, जिसका मुख्य उद्देश्य उत्पादन क्रियाओं के प्रयत्नों के व्यावसायिक उद्देश्यों की दिशा की ओर ले जाना तथा लागतों में कमी लाना है। 

Q. 12. स्थायी नियोजन से क्या अभिप्राय है? (What do you mean by stable planning ?)

Ans. स्थायी नियोजन से अभिप्राय उन योजनाओं से जिन्हें बार-बार प्रयोग में लाया जाता है अर्थात वे योजनाएँ जिनमें बार-बार परिवर्तन करने को आवश्यकता नहीं होती जो स्थायी रूप में कई बार बना दी जाती है। इन योजनाओं की अवधि लम्बी होती है। इन योजनाओं का निर्माण उच्च स्तरीय प्रबंध द्वारा किया जाता है।

Q. 13. उद्देश्य से आप क्या समझते हैं ? (What do you mean by objectives )

Ans. किसी भी संस्था, उसके विभागों तथा उप-विभागों को एक दिशा में ले जाने के लिए निश्चित किए गए लक्ष्यों को उद्देश्य कहते हैं। संस्था के सभी कार्य इन उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए ही किए जाते हैं। 

Q.14. बजट से आप क्या समझते हैं ? (What do you understand by Budget )

Ans. बजट से आशय पूर्वानुमान लगाने से है। बजट भविष्य के लिए खचों के पूर्व अनुमान सेते हैं। बजट बन जाने से खच्चों को नियंत्रित एवं नियमित किया जा सकता है। बजट कार्यों की सीमा निश्चित करता है। 

Q. 15. नियम से क्या तात्पर्य है ? (What do you mean by rule ? )

Ans. नियम कार्य सम्पादन की स्थिति का वर्णन करते हैं। नियम से तात्पर्य ऐसी योजना से है जिसके अनुसार किसी विशेष परिस्थिति में कार्य किया जाता है। नियम आवश्यक क्रियाओं का मार्गदर्शक करते हैं और इनका चयन अन्य योजनाओं की भाँति विकल्पों द्वारा किया जाता है।

Q. 16. कार्यक्रम से आप क्या समझते हैं ? (What do you mean by Programme ) 

Ans. वह योजनाएँ जो किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति हेतु बनाई जाती हैं उसे कार्यक्रम कहते हैं। इस संबंध एक योजना विशेष से होता है और योजना के पूरा होते ही यह भी स्वतः समाप्त सेता है।

Q.17. नीति को परिभाषित कीजिये तथा नीतियाँ कितने प्रकार की होती हैं ? (Define Policy and how many types of policies are there ?)

Ans. किसी भी व्यावसायिक इकाई की नीतियों उसके निर्धारित उद्देश्यों की पूर्ति का स्थान है। नीतियों लक्ष्यों की प्राप्ति में महत्त्वपूर्ण योगदान देती हैं तथा संस्था में कर्मचारियों को दिशा निर्देश प्रदान करती हैं। किसी भी संस्था के उद्देश्य निर्धारण के बाद नीतियाँ निर्धारित की जाती हैं। नीतियाँ अब प्रकार की होती हैं-

(i) लिखित एवं मौखिक नीतियाँ

(ii) प्रबन्धकीय नीतियाँ

(iii) वर्णित नीतियाँ

(iv) क्रियात्मक नीतियाँ। अर्थ स्पष्ट कीजिए।

Q. 18. मोर्चाबंदी या व्यूह रचना का (Explain the meaning of strategy) 

Ans: वर्तमान युग प्रतियोगिता का युग है। प्रतियोगिता के इस युग में सफलता प्राप्ति के लिये पूर्णतया संधि-विचार कर योजनाएं तैयार करनी होती है, जिससे व्यापार को किसी भी प्रकार की असुविधा का सामना न करना पढ़े। इन्हें व्यावहारिक योजना भी कहते हैं।

Q. 19. नियोजन एक बौद्धिक क्रिया है, स्पष्ट कीजिए। (Planning is an intellectual process. Explain ) 

Ans. कुल एवं ओ’डोनेल के अनुसार, “नियोजन एक बौद्धिक क्रिया है, क्रियाओं के क्रम का सचेत निर्धारण है, तथ्यों एवं उद्देश्यों एवं विचारपूर्ण अनुमानों पर आधारित निर्णयों की नींव है।”

इस प्रकार नियोजन के अन्तर्गत पूर्व निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए विभिन्न वैकल्पिक नीतिक एवं कार्यक्रमों और कार्य करने की पद्धतियों में से सर्वोत्तम चुनाव करना होता है जिसके लिए ज्ञान अनुभव एवं चिन्तन की आवश्यकता होती है।

Q. 20. लक्ष्य एवं उद्देश्य का अर्थ बतलाइए। (Explain the meaning of Object and Goal.)

Ans. नियोजन संस्था के लिये लक्ष्य निर्धारित करता है। इसके बाद नियोजन लक्ष्यों अनुसार योजनाएँ बनाता है। योजनाएं उद्देश्यों पर ध्यान केन्द्रित करती है। योजनाएँ उन क्रियाओं के बारे में भविष्यवाणी कर सकती हैं जो अन्तिम उद्देश्य की प्राप्ति के लिये आवश्यक होगी।

Q. 21. नियोजन की विधियाँ या प्रकार, नियोजन के तत्त्व या संघटक या क्षेत्र को बतलाइए। (Explain the Methods or Kinds of Planning, Elements or Components or Scope of Planning.)

Ans. नियोजन के अन्तर्गत अग्रलिखित को सम्मिलित किया जाता है— 1. संस्था के लक्ष्य एवं उद्देश्य निर्धारित करना (Objectives) 2. नीति निर्धारित करना (Policies) 3. कार्य विधियों का निर्धारण करना (Procedures) 4. नियम बनाना (Rule) 5. बजट बनाना (Budget) 6. व्यूह रचना करना (Strategy) 7. कार्यक्रम तैयार करना (Programmes ) 8. पूर्वानुमान लगाना (Forecasts)।

Q. 22. प्रबन्ध में योजना के महत्त्व को स्पष्ट कीजिए। (Explain the importance of Planning in Management.)

Ans. आज व्यवसायी को आरम्भ से अन्त तक नियोजन की सहायता लेनी होती है। निर्धारित उद्देश्यों की पूर्ति के लिए नीतियों, कार्यविधियों तथा कार्यक्रमों में उचित समन्वय नियोजन के द्वारा ही सम्भव है। 

मिलर (Millar) कहते हैं कि, “नियोजन के बिना कोई भी कार्य केवल अटकलवाजी के समान होगा तथा उससे केवल मात्र संदेह ही उत्पन्न होगा।” नियोजन एक ऐसा हथियार है जिसके द्वारा कोई भी व्यवसायी भविष्य की सुन्दरतम मूर्ति का आकार दे सकता है। 

जी. डी. एच. कोल (G.D.H. Cole) ने कहा है कि, “बिना योजना के कोई भी कार्य तीर और तुक्के के समान होगा, जिससे केवल सन्देह, भ्रम एवं अव्यवस्था की उत्पत्ति होगी।” टेरी (Terry) के अनुसार, “नियोजन एक संस्था के सफल कार्यों की आधारशिला है।” 

Q. 23. नियोजन की सीमाओं पर विजय पाने के उपाय बतलाइए। (Explain the measures to overcome limitations.)

Ans. नियोजन की सीमाओं पर विजय पाने के उपाय (Measures to overcome Limitations ) — नियोजन की सीमाओं पर विजय पाने के कुछ उपाय निम्नलिखित हैं-

1. नियोजन संतुलित एवं लोचपूर्ण होना चाहिए। 

2. नियोजन विश्वसनीय आँकड़ों पर तैयार किया जाना चाहिए। 

3. नियोजन की जानकारी सभी सम्बन्धित पक्षों को देनी चाहिए। 

4. नियोजन की सफलता के लिए सभी विभागों के कर्मचारियों का सहयोग लेना चाहिए। 

5. नियोजन का आरम्भ उच्च स्तरीय प्रबन्धकों द्वारा किया जाना चाहिए। 

6. नियोजन करते समय वर्त्तमान तथा भावी समस्याओं का ध्यान रखना चाहिए।


लघु उत्तरीय प्रश्न (SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS)


Q. 1. नियोजन से आप क्या समझते हैं ? (What do you mean by Planning ?) 

Ans. नियोजन का अर्थ (Meaning of Planning) — योजना से आशय भविष्य की क्रियाओं का वर्तमान में निर्धारण करने से है। निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए भविष्य में क्या करना है? कैसे करना है और किसके द्वारा किया जाना है, का पूर्व निर्धारण ही नियोजन है। इस दृष्टि से नियोजन एक बौद्धिक क्रिया है। जिसके लिए रचनात्मक विचार एवं कल्पना आवश्यक है। प्रवन्ध में नियोजन से अभिप्राय निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए उपलब्ध वैकल्पिक विधियों, नीतियों तथा कार्यक्रमों में सर्वश्रेष्ठ का चुनाव करने से है।

नियोजन (Planning) – 

1. भविष्य में क्या करना है ? (What to do in future ?) 2. कैसे करना है (How to do it ?) 3. कब करना है ? (When to do it ?) 4. किसके द्वारा किया जाना है ? (By whom to do it ?) 5. कौन उत्तरदायी होगा ? (Who will be responsible ?)

Q. 2. नियोजन की परिभाषा दीजिए। (Define Planning.) 

Ans. विभिन्न विद्वानों के द्वारा दी गई नियोजन की परिभाषाएँ निम्नलिखित है—

1. कुण्ट्ज एवं ओ’डोनेल के अनुसार, “क्या करना है, कैसे करना है, इसे कब करना है और इसे किसे करना है, का पूर्व निर्धारण नियोजन है।”

2. एलेन के अनुसार, “योजना भविष्य को पकड़ने के लिए बनाया गया पिंजरा है।”

3. जे. ओ. मेक किन्से के अनुसार, “नियोजन प्रबन्ध के चिन्तन का स्पष्ट प्रमाण है।” 

4. हेनरी फेयोल के अनुसार, “कार्य की योजना का अर्थ इन परिणामों से लगाया जाता है। जिनको हमें प्राप्त करना है, कार्य की उस रूप-रेखा से है जिसको हमें अपनाना है और उन विधियों से है जिनको हमें प्रयोग करना है।”

5. कास्ट तथा रोजेन्जवेग के अनुसार, “नियोजन पूर्व निर्धारित गतिविधियों का समूह है।”

Q. 3. नियोजन के मुख्य तत्त्व क्या हैं ? (What are the main elements of Planning.)

Ans. नियोजन के तत्त्वों को अनेक नामों से पुकारा जाता है जैसे नियोजन के संघटक (Components of Planning), नियोजन की विधि (Method of Planning), नियोजन का क्षेत्र (Scope of Planning) आदि नामों से जाना जाता है। व्यावसायिक नियोजन के प्रमुख तत्व निम्नलिखित हैं-

1 year (Forecasts), 2. (Policies), 3 points (Procedure), 4, (Objectives of targets), 5. नियम (Rules), (Budget, 7 कार्यक्रम (Programme), 8. मोर्चाबन्दी (Strategies) | 

Q.4. योजना प्रक्रिया के विभिन्न चरणों का वर्णन कीजिए। (Describe the steps of Planning

Or. नियोजन प्रक्रिया का वर्णन करें। (Descrbe the process of Planning.)

Ans. नियोजन प्रक्रिया में निम्नलिखित भूमिया होनी चाहिए-

1. समस्या का विश्लेषण (Analysis of Problem)

2. उद्देश्यों की स्पष्ट व्याख्या (Clear determination of objectives) 

3. आवश्यक सूचनाओं का एकीकरण (Collection of all necessary informations) 

4. एकत्रित सूचनाओं का विश्लेषण और वर्गीकरण (Analysis and classification of information) 5. नियोजन की आधारभूत धारणाएँ तथा सीमाएँ निश्चित करना ( Determining basic concepts and limitations of Planning) 

6. विभिन्न कार्यों तथा दशाओं का निर्णय (Considering various alternatives)

7. विभिन्न विकल्पों का मूल्यांकन (Evaluation of various alternatives)

8. नियोजन क्रम और समय निश्चित करना (Determining the order and time of proposed plan) 

9. सहायक योजनाओं का निर्माण (Making subsidiary plans)

10. नियोजन की उपलब्धियों का मूल्यांकन (Evaluation of the results of Planning)

11. नियोजन कार्य पर नियन्त्रण (Control over Planning) | 

Q.5. नियोजन की पाँच विशेषताओं को लिखिए । (Write any five characteristics of Planning.) 

Ans. अच्छी योजना की निम्नलिखित प्रमुख विशेषताएं है-

1. पूर्वानुमान (Forecasting) — नियोजन विश्वसनीय पूर्वानुमान पर आधारित होना चाहिए।

2. स्पष्ट निर्धारित उद्देश्य (Well defined Goal) एक प्रभावशाली नियोजन के लिए निश्चित उद्देश्यो का होना आवश्यक है।

3. नियोजन सरल हो (Planning should be simple)- प्रभावशाली नियोजन के लिए आवश्यक है कि यह इतना सरल हो कि संस्था का प्रत्येक कर्मचारी उसे सरलता से समझ सके।

4. लोच एवं निरन्तरता (Flexible and Continuity)-प्रभावशाली नियोजन के लिए यह आवश्यक है कि यह लोचपूर्ण एवं निरन्तर हो ।

5. नियोजन व्यावहारिक हो (Planning should be Practicable) प्रभावशाली नियोजन लिए यह आवश्यक है कि वह ऐसा हो जिसे क्रियान्वित किया जा सके।

Q.6. योजना के कोई चार उद्देश्य बताइए। (Explain any four objects of the Planning.)

Ans. योजना के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं-

1. भविष्य के लिए पूर्वानुमान करके परिणामों की कल्पना करना।

2. प्रवन्धकीय क्रियाओं में मितव्ययता लाना।

3. उपक्रम के लक्ष्यों की जानकारी देना और उन्हें प्राप्त करने का प्रयत्न

4. संस्था की जोखिमों एवं सम्भावनाओं का पूर्वानुमान लगाना।

5. उद्देश्यों, कार्यक्रमों, नीतियों तथा पद्धतियों के बीच संतुलन रखना।

6. निश्चित लक्ष्यों को स्थापित करना।

7. उपलब्ध साधनों का सर्वोत्तम उपयोग करना।

8. आर्थिक मितव्ययता प्राप्त करना।

Q.7. एक आदर्श योजना के चार गुण बताइए । (Write four characteristics of an ideal Planning.)

Ans. एक आदर्श योजना के प्रमुख चार गुण निम्नलिखित हैं-

1. स्पष्ट एवं परिभाषित उद्देश्य (Well defined objectives)— प्रत्येक योजना पूरी तरह निश्चित, संक्षिप्त, स्पष्ट एवं शुद्ध होनी चाहिए।

2. सरल होनी चाहिए (It should be simple) एक आदर्श योजना ऐसी होनी चाहिए जिते जन साधारण आसानी से समझ सके।

3. व्यावहारिक (Practicable) एक आदर्श योजना ऐसी होनी चाहिए जिसका क्रियान्वयन करना सम्भव हो।

4. संतुलित (Balanced ) एक आदर्श योजना लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए साधनों के प्रयोग मे सन्तुलित होनी चाहिए।

Q.8. नियोजन की उपयोगिता बताइए। (Describe the utility of Plamming.) Or, नियोजन का महत्त्व बताइए (Describe the importance of Planning.)

Ans. नियोजन प्रबन्ध का प्रमुख कार्य है इसलिए प्रबन्ध का आवश्यक घटक है। नियोजन के अभाव में संस्था के कार्यों को सफलतापूर्वक नहीं किया जा सकता। 

वर्तमान समय में बड़े पैमाने के उत्पादन तथा तकनीकी परिवर्तन व्यवसाय में बढ़ती जटिलताएँ, उपभोक्ता की रुचि में परिवर्तन, किस्म नियन्त्रण, आर्थिक सामाजिक तथा राजनीतिक परिवर्तन तथा न्यूनतम लागत पर अधिकतम उत्पादन की भावना आदि के कारण नियोजन की ओर भी अधिक आवश्यकता है। आज व्यवसाय को आरम्भ से अन्त तक नियोजन की सहायता लेनी पड़ती है। 

निर्धारित उद्देश्यों की पूर्ति के लिए नीतियों, कार्यविधियों तथा कार्यक्रमों में उचित समन्यय नियोजन के द्वारा ही सम्भय है।

Q.9. नीतियों से आपका क्या आशय है ? (What do you mean by Policies ? ) 

Ans. एक व्यावसायिक इकाई की नीतियों उसके निर्धारित उद्देश्यों को प्राप्त करने का साधन है। अतः उद्देश्य निर्धारण के पश्चात् नीतियों का निर्धारण आवश्यक है।

कुण्ट्ज और ओ डोनेल के अनुसार, “नीतियों उस क्षेत्र को सीमित कर देती है जिस पर निर्णय लेना है। साथ ही इस बात का भी निश्चय करती है कि निर्णय उद्देश्यों की पूर्ति में सहायक होगा।”

नीतियाँ हमें यह बताती है कि कोई विशेष कार्य हमें किस प्रकार करना है। नीतियाँ भी योजना का स्वरूप होती हैं नीतियाँ ही लक्ष्यों का मार्ग निर्धारित करती हैं। मार्ग निर्धारण से लक्ष्यों

को व्यावहारिक रूप मिलता है। व्यापार की सामान्य नीतियाँ स्पष्ट रूप से निर्धारित कर लेनी चाहिए। नीतियों हर कर्मचारी का मार्ग निर्देशन करती हैं।

Q. 10. नियोजन के पाँच लाभ बताइए। (Mention five advantages of Planning.) 

Ans. 

1. नियोजन पूर्व निर्धारित लक्ष्यों की ओर सभी का ध्यान केन्द्रित करता है।

2. इसके माध्यम से लागत व्यय में कमी आ जाती है।

3. यह उपक्रम के विकास में सहायक होता है।

4. यह संगठन को प्रभावी बनाता है।

5. इससे कर्मचारियों का मनोबल बढ़ता है।

Q. 11. नियोजन की पाँच सीमाएँ लिखिए। (Give five limitation of Planning.) Or, नियोजन की पाँच हानियाँ बताइए। (Give five disadvantages of Planning.)

Ans. 1. नियोजन पर किए गए व्यय से लागत व्ययों में वृद्धि होती है।

2. नियोजन में यदि परिवर्तन किया जाए तो बाधाएँ आती है।

3. नियोजन में पक्षपातपूर्ण निर्णय किए जाते हैं। 4. संकट काल में नियोजन करना सम्भव नहीं है।

5. नियोजन बहुत अधिक खर्चीली प्रक्रिया है। इसको तैयार करने में बहुत अधिक समय, श्रम तथा धन का अपव्यय होता है।

Q. 12. योजनाओं के प्रकार लिखिए। (Give the types of Planning.) 

Ans. 1. अवधि के आधार पर योजनाएँ (i) अल्पकालीन योजना (ii) दीर्घकालीन योजना

2. प्रबन्ध के स्तर पर योजनाएँ (1) उच्च स्तरीय योजनाएँ (ii) मध्य स्तरीय योजना (iii) निम्न स्तरीय योजनाएँ।

3. उपयोग के आधार पर योजनाएँ— (i) स्थायी या बार-बार उपयोग की योजनाएँ (ii) विशेष या एक बार उपयोग की योजनाएँ।

4. प्रकृति के आधार पर योजनाएँ (1) रणनीति या मोर्चाबन्दी योजनाएँ (ii) कार्य संचालन सम्बन्धी योजनाएँ।

5. व्यापकता के आधार पर योजनाएँ (1) कम्पनी स्तर की योजनाएँ (ii) विभागीय योजनाएँ।

Q. 13. उद्देश्य से आप क्या समझते हैं ? (What do you mean by Objectives }

Ans. हर व्यापारिक क्रिया का एक लक्ष्य होता है जहाँ तक पहुंचा ही उद्देश्य होता है। नियोजन द्वारा केवल व्यावसायिक लक्ष्यों तक ही नहीं पहुँचा जाता है वरन् व्यापारिक क्रियाओं का संगठन, समन्वय, नियन्त्रण आदि प्रदान किया जाता है। बिना लक्ष्य के उद्देश्यों की प्राप्ति नहीं हो सकते है। लक्ष्य भी वह रास्ता है जिससे गुजर कर अंतिम चरण पर पहुँचा जाता है। लक्ष्यों के द्वारा हमें क्या करना है, का ज्ञान होता है।

ऐलन के शब्दों में, ‘उद्देश्य कम्पनी और इसके संघटक कार्यों का मार्गदर्शन कराने वाले लक्ष्य होते है”

Q.14. उद्देश्यों की पाँच विशेषताएं बताइए । (Mention five characteristics of objectives.)

Ans. 1. प्राथमिकता के आधार पर उद्देश्यों का क्रम निश्चित करना।

2. उद्देश्य योजनाओं की नींव कहलाते हैं और उद्देश्य का निर्धारण नियोजन प्रक्रिया सबसे पहला कदम है।

3. उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए विभिन्न परिस्थितियों के अनुसार समय-समय पर अलग-अलग कार्य किए जाते हैं।

4. उद्देश्यों की महत्त्वत्ता (Importance) को ध्यान में रखकर उनको प्राप्त करने का क ध्यान में रखना चाहिए।

5. उद्देश्यों के निश्चित करने से सही स्थिति का अध्ययन होता रहता है और यदि जरूरी हो तो आवश्यक संशोधन भी किया जा सकता है।

Q. 15. एकल उपयोग वाली योजनाओं के नाम लिखिए । (Write down the names of single use plans.) 

Ans. एकल उपयोग वाली योजनाओं के अन्तर्गत उन योजनाओं को सम्मिलित किया जाता है जिनका निर्माण किसी विशेष परिस्थिति की आवश्यकतानुसार किया जाता है और उनका उपयोग उन्हीं विशेष परिस्थितियों में ही किया जाता है। इसलिए इसके तदर्थ विशेष उपयोग उन्हीं विशेष परिस्थितियों में ही किया जाता है। इसलिए इसको एकल उपयोग योजना कहा जाता है।

एकल उपयोग वाली योजनाएँ (Single use Plans) –

1. कार्यक्रम (Programme)

2. बजट (Budget) 3. परियोजनाएँ (Projects) 

Q. 16. निरन्तर उपयोग वाली योजनाओं के नाम लिखिए। (Write down the names of repeated use plans.)

Ans. ऐसी योजनाएँ जिन्हें बार-बार प्रयोग करने के लिए बनाया जाता है, उन्हें निरन्तर उपयोग वाली योजनाएँ कहते हैं। इन योजनाओं के बनाने का मुख्य उद्देश्य प्रबन्धक को इस यो बनाना है कि वह सभी दशाओं में सही निर्णय लेकर उचित कार्य कर सके।

निरन्तर उपयोग वाली योजनाएँ (Repeated use Plans ) —— 1. उद्देश्य (Objectives) 2. नीतियाँ (Policies), 3. कार्य विधियाँ (Procedures), 4. नियम (Rules), 5. कार्य-नीत (Surategy)।

Q. 17. एक उत्तम नीति की पाँच विशेषताएँ बताइए। (Point out five characteristics of Good Policy)

Ans. 1. स्पष्टता (Clearity ) —— नीतियाँ स्पष्ट व निश्चित होनी चाहिए जिससे ये सभी व्यक्तियों को आसानी से समझ में आ सके।

2. लोचदार (Flexible ) — प्रत्येक नीति स्थिर होते हुए भी लोचदार होनी चाहिए अर्थात समयानुसार एवं परिस्थितियों के अनुसार नीतियों में पर्याप्त संशोधन किया जाना चाहिए।

3. उद्देश्य पूर्ति (Contribution of Objectives) नीति बनाते समय उद्देश्य पर विशेष ध्यान देना चाहिए क्योंकि नीतियाँ उद्देश्यों को प्राप्त करने के साधन हैं। 4. सहमति (Consent) अच्छी नीति में यह गुण भी होना चाहिए कि वे प्रबन्धकों और कर्मचारियों के आपसी तर्क-वितर्क के बाद ही बनाई जाएँ। 

5. समीक्षा (Review ) जो भी नीतियाँ बनाई जाएँ उन्हें समय-समय पर जाँचते रहना। चाहिए और यदि आवश्यकता हो तो उनमें परिवर्तन भी कर लेना चाहिए।

Q. 18. नीतियों का वर्गीकरण कीजिए। (Classify the Policies.)

Ans. 1. लिखित अथवा मौखिक नीतियाँ (Written or Oral Policies)

2. प्रबन्धकीय नीतियाँ (Managerial Policies) 3. क्रियात्मक नीतियों (Functional Policies)

4. संगठन के स्तर पर आधारित नीतियाँ (Organisation based Policies)।

Q. 19. नीतियों के कोई चार लाभ लिखिए। ( Write any four advantages of Policies.)

Ans. 1. निर्णय सीमा निर्धारण नीतियाँ प्रत्येक अधिकारी द्वारा लिए जाने वाले निर्णयों की सीमा का निर्धारण करती हैं और उनको इस बात की चेतावनी देती हैं कि वे कोई ऐसा निर्णय न लें जो उसके अधिकार के परे हो।

2. समय एवं श्रम की बचत — जब नीतियों पूर्व निर्धारित होती हैं तो किसी भी कार्य को करने के लिए निर्णय लेने में अनावश्यक देरी नहीं होती है और इस प्रकार श्रम और समय की बचत होती है।

3. मार्ग दर्शन-नीतियों के निर्धारण के बाद निचले स्तर के प्रबन्धकों को उच्च स्तर के प्रबन्धकों द्वारा मार्गदर्शन मिलता रहता है। 

4. अधिकार सौंपने में सुविधा-नीतियों के निर्धारण के फलस्वरूप निम्न स्तर के कर्मचारियों को अधिकार सौंपना आसान हो जाता है और उच्च अधिकारी उन पर ज्यादा भरोसा कर सकते हैं। 

Q. 20. मोर्चाबन्दी को समझाइए। (Discuss Strategy. )

Ans. मोर्चाबन्दी का उद्देश्य प्रतिस्पर्धा वाले व्यवसायों को ध्यान में रखकर इस प्रकार की योजना तैयार करना होता है जिससे व्यापार को असुविधा का सामना न करना पड़े। इन्हें व्यावहारिक योजना भी कहा जाता है। यदि इस प्रकार के दाँव-पेचों की अवहेलना कर दें तो व्यापार में असुविधाओं का सामना करना पड़ता है। 

दाँव-पेंच योजना से बनी आपसी प्रतिस्पर्धा के कारण ही होता है। कभी-कभी आंतरिक दाँव-पेंच भी हो सकते हैं, जैसे-उपक्रम के उद्देश्यों के लिए कौन-कौन से तरीके सर्वश्रेष्ठ हैं। यह योजनाओं के द्वारा पूरा नहीं हो सकता है। इसके लिए कार्य नीति या दाँव-पेंच की आवश्यकता पड़ेगी। 

Q. 21. कार्य विधियाँ किसे कहते हैं ? (What are the Procedures ? )

Ans. नीतियों के अनुसार ही विधियाँ बनती हैं। इसके द्वारा ही कार्य प्रणाली व्यावहारिक ‘बनती है। संस्था की कार्य विधि निश्चित हो जाने के बाद नियंत्रण और निर्देशन की आवश्यकता कम हो जाती है। किसी संस्था की विधियों उसकी आवश्यकताओं एवं परिस्थितियों के अनुसार तय की जाती है। 

जैसे-जैसे परिस्थितियां बदलती है वैसे ही वैसे विधियों बदलनी चाहिए। इस प्रकार कार्य विधि का अर्थ नीति की व्याख्या से है। कार्य विधि में कार्य करने पर बल दिया जाता है। कार्य दिये के अन्तर्गत किए जाने कार्यों को तीन भागों में बाँटा जाता है।

1. कौन-कौन से विशेष किए जाने है?

2. किस समय किया जाना है?

3. कौन-सा कार्य किनद्वारा किया जाना है?

Q.22. उद्देश्य के निर्माण की महत्ता व आवश्यकता का वर्णन कीजिए। (Explain the importance and sneed for objective determination.)

Ans. उद्देश्य निर्धारण की आवश्यकता एवं महत्त्व (Importance and Need Objectives)

1. समन्वय सुविधा (Helpful in Coordination)—प्रत्येक उद्देश्य स्पष्ट एवं निर्म होने चाहिए ताकि सभी छोटी व दड़ी योजनाओं में आवश्यक समन्वय बनाया जा सके।

2. साधनों का सर्वोत्तम प्रयोग (Best Utilization of Resources) जिन व्यावस इकाइयों में कार्य निश्चित उद्देश्यों के अनुरुल है वहीं कम-से-कम लागत पर अधिकतम उत्पादन किया जा सकता है।

3. कुशलता में वृद्धि (Increase in Efficiency) अच्छे उद्देश्य निर्धारण से प्रवन्ध कुशलता में बढ़ोतरी होती है।

4. संगठन उद्देश्यों के अनुरूप (As per Organizational Objectives) संस्था संगठन उद्देश्य के अनुरूप बन जाता है। अगर संस्था के मुख्य तथा सहायक उद्देश्य अ अलग हैं।

5. कार्य प्रगति पर नियंत्रण (Control on Progress of Work )—प्रत्येक क्षेत्र में सब की गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए उद्देश्य निर्धारण आवश्यक है। 

Q.23. कार्यक्रम से आप क्या समझते हैं ? 

Ans. जो योजनाएं किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति हेतु बनाई जाती है उसे कार्यक्रम क हैं। जैसे यदि मारुति उद्योग लि. 4000 कारें प्रति मास से बढ़ा कर अपना लक्ष्य 16,000 प्रति मास कर देते है तो इसके लिए विशेष योजना बनानी होगी, जिसे कार्यक्रम कहेंगे। यह काफ इस लक्ष्य को प्राप्त करने के साथ ही समाप्त हो जाएगा।

कुण्टन तथा ओ’डोनेल के अनुसार, “कार्यक्रम कार्यविधियों, नीतियों, नियमों, सीपे गए क एवं क्रिया समूह के ठीक प्रकार से संचालन करने के लिए आवश्यक तत्त्वों का सम्मिश्रण है ि

सामान्य रूप से पूंजी तथा क्रियान्वित वजटों का समर्थन मिला होता है।” 

Q. 24. नियम से आप क्या समझते हैं ? (What do you mean by Rules ? )

Ans. नियम कार्य सम्पादन की स्थिति का वर्णन करते हैं। यहाँ तक स्पष्ट किया जाता है। विशिष्ट स्थिति में उस विशिष्ट कार्य को कैसे सम्पन्न किया जाए। नियम योजनाएँ हैं जो कि आव •क्रियाओं का मार्गदर्शन करते हैं और इनका चयन अन्य योजनाओं की तरह अन्य विकल्पों में चुनना होता है। नियम का अर्थ होता है एक निश्चित स्थिति में एक निश्चित कार्यवाही अवश्य। चाहिए। उदाहरण के लिए, हमें जिस दिन माल खरीदने का आदेश मिले उसी दिन उसकी स्वीक ग्राहक को भेजनी होगी, यह हमारी संस्था का नियम है। 

Q. 25. परियोजनाएँ किसे कहते हैं ? (What are the Projects ? ) 

Ans. हम एक कार्यक्रम को अलग-अलग विभागों में बाँट लेते हैं और उनका प्रत्येक अस्तित्व अलग-अलग होता है। कार्यक्रम के स्वतन्त्र विभाग को ही परियोजना कहते हैं। उदाह के लिए, बिक्री बढ़ाने (Sales Promotion) के लिए कार्यक्रम की पृथक् योजना बनायी ग इस परियोजना में बिक्री बढ़ाने के कार्यक्रम का पूर्ण विश्लेषण किया जाता है। 

Q. 26. पजट किसे कहते हैं ? (What is the Budget ? )

Ans, बजट भविष्य के लिए खचों के पूर्व अनुमान होते हैं। बजट बन जाने से खच् । !नियन्त्रित एवं नियमित किया जा सकता है। वजट भविष्य की आवश्यकताओं का अनुमान है। व्यक्तियों द्वारा लगाया जाता है और एक निश्चित समय में एक निश्चित उद्देश्य को प्राप्त करने 81 का स्पष्टीकरण देता है।

इस प्रकार बजट कार्यों की सीमा निश्चित करता है। बजट भविष्य की योजनाएँ होती हैं। बजट बन जाने के बाद विभिन्न विभागों के कार्य-कलापों की सीमा निश्चित हो जाती है। जैसे हय-विक्रय बजट, रोकड़ बजट, विज्ञान वजट आदि। 

Q. 27. पूर्वानुमान किसे कहते हैं ? (What is forecasting ?)

Ans. भविष्य के लिए पहले से अनुमान लगाना ही पूर्वानुमान कहलाता है। नियोजन भविष्य के लिए पूर्वानुमान है इसलिए नियोजन चाहे अल्पकालीन हो या दीर्घकालीन, पूर्वानुमान पर ही आधारित होता है। लेकिन पूर्वानुमान और नियोजन दोनों एक नहीं है। इन दोनों में पर्याप्त अन्तर । 

पूर्वानुमान में भविष्य का ध्यान रखना पड़ता है, जबकि नियोजन के अन्तर्गत भविष्य और र्त्तमान दोनों के बीच सन्तुलन रखते हुए भविष्य के लिए निर्णय लेना पड़ता है। यहाँ पर इस यात को भी ध्यान में रखना चाहिए कि नियोजन विश्वसनीय पूर्वानुमान पर आधारित होना चाहिए। 

Q. 28. निर्णयन किसे कहते हैं ? (What is decision making ?)

Ans. प्रबन्धकों को विभिन्न कार्य करने पड़ते हैं। इन विभिन्न कार्यों में से कौन-सा कार्य सर्वश्रेष्ठ होगा तथा उसके परिणाम सर्वोत्तम होंगे, इस बात का चुनाव ही निर्णयन कहलाता है। कोई भी प्रबन्धक विना निर्णय के एक सफल प्रबन्धक नहीं हो सकता है। 

टैरी ने तो यहाँ तक कह झाला है कि प्रबन्धकों का जीवन ही निर्णयन है। फिर आगे चलकर उसने कहा है कि यदि प्रबन्धकों की पहचान करनी है तो उनके निर्णय लेने की क्षमता पर ध्यान देना होगा, क्योंकि उनकी सार्वभौमिक हचान ही निर्णयन है।

Q. 29. बजट के लाभ बताइए। (Mention the advantages of Budget.) 

Ans. बजट बनाने के निम्नलिखित लाभ होते हैं-

1. बजट के द्वारा व्यवसाय की कार्य कुशलता बढ़ती है।

2. बजट के द्वारा व्यावसायिक इकाई के विभिन्न विभागों में समन्वय स्थापित किया जाता है। 

3. विभिन्न अधिकारियों तथा कर्मचारियों के दायित्व का निर्धारण बजट के द्वारा किया जाता है।

4. बजट द्वारा विभिन्न फालतू खर्चाों को रोका जाता है।

5. व्यावसायिक गतिविधियों के नियन्त्रण में बजट सहायक होता है जिससे संस्था का कार्य सुचारु रूप से होता है।

Q.30. बजट की विशेषताएं बताइए। (Mention the Characteristics of Budget.)

Ans. वजट की अग्रलिखित विशेषताएँ हैं-

1. लक्ष्यों एवं प्रयत्नों की गणनात्मक स्थापना (Quantitative Expression of Targets and Efforts) इसमें लक्ष्यों तथा इनकी प्राप्ति हेतु विभिन्न विभागों द्वारा किए जाने ले प्रयत्नों तथा व्ययों को निश्चित तथा अंकों की भाषा में प्रस्तुत करना।

2. नियोजन तथा नियन्त्रण का स्वर (Organ of Planning and Control) बजट यावसायिक इकाई की योजना का अंग ही नहीं है बल्कि प्रबन्धकीय नियन्त्रण का एक महत्त्वपूर्ण

धन भी है। क्योंकि प्रबन्धक वास्तविक प्रगति की बजट के साथ तुलना करके ही वास्तविक उत्तरदायित्व को निश्चित किया जाता है और उसके सुधार की योजनाएँ बनायी जाती है।

Q.31. बजट कितने प्रकार के होते हैं ? (What are the types of Budget ? )

Ans. सामान्यतः बजट दो प्रकार के होते हैं–

1. पूँजीगत बजट (Capital Budget), 

2. आयगत बजट ( Revenue Budget)। 

1. पूँजीगत बजट (Capital Budget) – यह एक दीर्घकालीन बजट है जिसमें उत्पादन क्रिया तथा उत्पादन क्षमता में सुधार की योजनाएँ बनायी जाती हैं।

2. आयगत बजट ( Revenue Budget) – यह एक अल्पकालीन योजना से सम्बन्धित जट होता है जिसमें आय और व्यय से सम्बन्धित अल्पकालीन योजनाएँ बनाई जाती हैं। जैसे नगले वर्ष की उत्पादन, विक्रय तथा विनियोगों से सम्बन्धित योजना ।

Q.32. कार्यक्रम की विशेषताएं बताइए । (Mention the Characteristics of Programme.)

Ans. एक आदर्श कार्यक्रम की निम्नलिखित विशेषताएं हैं-

1. विभिन्न कार्यक्रमों में समन्वय-यद्यपि सभी कार्यक्रमों का उद्देश्य पृथक-पृथक हो फिर भी उनकी सफलता के लिए विभिन्न विभागीय कार्यक्रमों में पारिश्रमिक समन्वय अवश्य होना 

2. निश्चित उद्देश्य – प्रत्येक कार्यक्रम का उद्देश्य पूर्व निश्चित होना चाहिए अर्थात कार्य केवल उस समय तक चालू रहता है जब तक निश्चित उद्देश्य की पूर्ति नहीं हो जाती है। 

3. कार्यक्रम ठोस होने चाहिए— कार्यक्रम किसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर बनाए है। अतः कार्यक्रम के द्वारा बनाई गई योजना ठोस एवं दृढ़ होनी चाहिए।

4. योजनाएं मूल नीति पर आधारित होनी चाहिए सभी कार्यक्रम व्यवसाय की नीतियों के अनुकूल होनी चाहिए ताकि सामान्य लक्ष्य को आसानी से प्राप्त किया जा सके।

Q.33. कार्यक्रम कितने प्रकार के होते हैं ? (What are the types of Programmes) 

Ans. कार्यक्रम निम्नलिखित प्रकार के हो सकते हैं-

1. अल्पकालीन कार्यक्रम (Short Term Programme ) —— इस प्रकार के कार्यक्रम कि सामाजिक (Periodical) उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए बनाए जाते हैं।

2. दीर्घकालीन कार्यक्रम (Long Term Programme ) — इस प्रकार के कार्यक्रम संस् के विस्तार के लिए बनाए जाते है। जैसे कोई उपक्रम अपना उत्पादन 1000 वार्षिक इकाई बढ़ाकर 10,000 वार्षिक इकाई बढ़ाना चाहता है और नया प्लाण्ट लगाकर इसे पूरा करना चाहता है 

3. सीमित कार्यक्रम (Limited Programme ) — यदि व्यवसाय के किसी विभाग में कोई सुधार आदि करना है तो उसके लिए एक सीमित कार्यक्रम योजना बनाई जा सकती है। 4. व्यापक कार्यक्रम (Wide Programme )–यदि कोई कार्यक्रम सम्पूर्ण व्यवसाय के आर्थिक स्थिति को सुधारने एवं संगठित करने के उद्देश्य से बनाया जाए तो इस प्रकार के कार्यक्रम को व्यापक कार्यक्रम कहा जाता है।

Q.34. नीतियों और विधियों में अन्तर बताइए । (Distinguish between Policies and Procedures.) 

Ans.

अन्तर का आधारनीतियाँकार्यविधि
1. कार्यक्षेत्रनीतियाँ संगठन के कार्यक्षेत्र की नीतियों पर आधारित निर्णयों क सीमा निर्धारित करती हैं। नीतियाँ कार्यान्वित करने की योजना है।
2. निर्धारण (Scope)नीतियाँ कार्यविधि पर आधारित नहीं होती। कार्यविधि नीतियों पर आधारित निर्धारित होती है।
3. सम्बन्धनीतियाँ प्रत्येक विभाग के लिए अलग-अलग बनाई जाती हैं। एक ही कार्यविधि विभिन्न विभागों के कार्य को प्रभावित करती है।
4. आवयश्कतानीतियाँ निर्णय लेने में सहायक होती हैं।कार्य विधि कार्य की गति में वृद्धि करने के लिए आवश्यक है।
5.प्रबन्ध स्तरइसका निर्धारण उच्च स्तरीय प्रबन्ध करता है।कार्यविधि मध्य एवं निम्न स्तर प्रबन्धकों द्वारा निर्धारित की जाय है ।
6. विज्ञान एवं कलानीति का निर्धारण विज्ञान अधिक और कला कम है।कार्यविधि के निर्माण का कार्य क अधिक और विज्ञान कम है।

Q.35, कार्यविधि की विशेषताएँ बताइए। Mention characteristics of Procedure.)

Ans. 1. कार्यविधि का बंटवारा (Division of Procedure)—–— कार्यविधि में यह स्पष्ट जाता है कि कोई विशिष्ट कार्यवाही किन-किन अवस्थाओं में बंटी होगी तथा दे अवस्थाएँ इस प्रकार, कब तथा किस व्यक्ति द्वारा पूरी की जाएंगी।

2. विभिन्न विभागों से सम्बन्धित (Relating to various Departments)—एक कार्यविधिका सम्बन्ध संस्था के उन सभी विभागों से होता है जिन विभागों पर किसी कार्य विशेष प्रभाव पड़ता है। उदाहरणार्थ, जय किसी ग्राहक से आदेश आता है तो उसका प्रभाव उत्पादन रिवहन, विक्री, वित्त, लेखा विभाग आदि पर पड़ता है।

3. कार्यविधि का क्षेत्र (Scope of Procedure ) —कार्यविधि का क्षेत्र व्यापक होता है क्योंकि सभी कर्मचारियों को अपने-अपने कार्यों में निर्धारित कार्यविधि का पालन करना पड़ता है।

4. क्रम (Sequence) कार्यविधि के अन्तर्गत किसी कार्य को करने का क्रम दिया रहता जिसका पालन करना अनिवार्य होता है।

Q.36. स्थायी और एकल योजनाओं में अन्तर बताइए । (Distinguish between Standing and Single Plan.)

Ans.

अन्तर का आधारस्थायी योजनाएँएकल योजना
1. समय (Time)ये योजनाएँ लम्बी विधि के लिए बनायी जाती हैं। ये साधारणतः माह तक की होती है। 5 वर्ष से अधिक की होती है।ये योजनाएँ एक माह से लेकर 12 माह तक की होती है।
2 उद्देश्य (Object)इसका उद्देश्य व्यापक होता है। और लम्बी अवधि तक चालू रहती है।ये योजनाएं एक निश्चित उद्देश्य के लिए होती हैं और उसके पूरा होने पर समाप्त हो जाती है।
3. आधार (Base)दीर्घकालीन योजनाओं का आधार संस्था के व्यापक उद्देश्य पर निर्भर करता है।एकल योजना स्थायी योजना पर ही आधारित होती है।
4. उपयोग (Use)इसका उपयोग अधिक लम्बे विशेष उपयोग योजनाओं का उपयोग कार्य विशेष के लिए किया जाता है और उसकी पूर्ति पर समाप्त हो जाता है।विशेष उपयोगी योजनाओं का उपयोग कार्य विशेष के लिए किया जाता है और इसकी पूर्ति पर समाप्त हो जाता है|

Q.37. बजट और कार्यक्रम में अन्तर बताइए ।

Ans.

अन्तर का आधारबजटकार्यक्रम
1. समय (Period)बजट का समय प्रायः एक वर्ष होता है।कार्यक्रम का समय उस समय तक होता है।
2. महत्व (Importance)बजट में अधिक महत्त्व वित्त को दिया जाता है।कार्यक्रम में वित्त के साथ-साथ कार्य-विधि को भी महत्व दिया जाता है।
3. कला एवं विज्ञान (Art and (Science)बजट संरया के सामान्य उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु एक गुणात्मक सारिणी है।कार्यक्रम किसी विशिष्ट उद्देश्य प्राप्ति हेतु क्रमबद्ध व समय सारिणी है|
4. आधार (Base)बजट प्राय: एक बड़ी योजना का वित्तीय आधार माना जाता है।प्रायः प्रत्येक कार्यक्रम का अपना अपना अलग बजट भी होता है।

Q. 38. उद्देश्य और नीतियों में अन्तर बताइए । (Distinguish between Objectives and Policies.)

Ans. उद्देश्य और नीतियों में अन्तर-

उद्देश्य (Objective)नीति (Policy)
1. इसमें विवेक का स्थान नहीं होता।1. इसमें विवेक का सर्वोच्च स्थान होता है।
2. यह उच्च प्रबन्ध के द्वारा निर्धारित किए जाते हैं।2. इसे प्रबन्ध के नीचे के कर्मचारी भी निर्धारित कर सकते हैं।
3. यह नियोजन की सीमा है।3. यह उद्देश्यो को प्राप्त करने का ढंग निश्चि करती है।
4. यह एक सीमा है जिसकी और संस्था की सभी क्रियाएँ निर्देशित होती है।4. यह एक पथ-प्रदर्शक है जो पूर्व निश्चि उद्देश्यों को प्राप्त करना सरल बनाता है।

Q.39. परियोजनाएँ और कार्यक्रम में अन्तर बताइए ।(Distinguish between Projects and Programmes.)

Ans. परियोजनाएं और कार्यक्रम में अन्तर-

परियोजना (Projects)कार्यक्रम (Programme)
1.परियोजना किसी विशिष्ट उद्देश्य को पूरा लिए बनाए जाते हैं।1. कार्यक्रम सामान्य उद्देश्यों को पूरा करने के करने के लिए बनाई जाती है।
2. परियोजना का बजट अलग से तैयार होता हैं।2. कार्यक्रम के अन्तर्गत सम्पूर्ण विभागों के अलग-अलग बजटों का समन्वय कर एक मास्टर बजट तैयार किया जाता है।
3. परियोजना का संचालन एक अलग प्रबन्धक द्वारा होता है।3. कार्यक्रम का संचालन सभी विभागीय प्रबन्ध उच्च प्रबन्धकों की देख-रेख में करते हैं।
4. परियोजना में तकनीकी व्यक्ति की सहायता आवश्यक होती है।4. यह सामान्य कारोबार की एक विस्तृत योजन है।
5.परियोजना का समय एक निश्चित और विशिष्ट योजना के लिए निश्चित किया जाता है।5. कार्यक्रम का समय संस्था की सामान्य योजन के लिए तय किया जाता है।

Q. 40. नियम एवं कार्यविधि में अन्तर कीजिए । (Difference between Rules and Procedure.)

Ans. नियम एवं कार्यविधि में अन्तर-

नियम (Rule)कार्यविधि (Procedure)
1.नियम एक पूर्व निर्णय है जिसका प्रयोग विशेष परिस्थितियों में किया जाता है।1. जबकि कार्यविधि एक साधारण प्रक्रिया है।
2.नियमों की कोई कार्यविधि नहीं होती है।2. जबकि सभी कार्यविधियों से सम्बन्धित अपने नियम होते हैं।
3.नियम का पालन न करने पर दण्ड की व्यवस्था होती है।3. जबकि कार्यविधि में केवल कार्य करने का ही ढंग बताया जाता है।

Q. 41. नीति और नियम में अन्तर बतलाइए। (Difference between Policy and Rule.)

Ans. नीति और नियम में अन्तर-

नीति (Policy)नियम (Rule)
1. यह एक विशिष्ट विवरण है जो व्यक्तियों को यह बताते हैं कि यह करना चाहिए, और यह नहीं करना चाहिए।1. यह निर्णय लेने में सहायता देते हैं।
2.यह बहु-उपयोगी योजना बनाने में सहायता करती है।2. यह बहु-उपयोगी योजना बनाने में सहायता नहीं देता है।
3. नीति कठोर होती है।यह कम कठोर होते हैं।
4.इसमें विवेक का कोई स्थान नहीं है।4. इसमें कुछ विवेक का स्थान है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (LONG ANSWER TYPE QUESTIONS)


Q. 1. नियोजन किसे कहते हैं ? नियोजन के आधारभूत लक्षण क्या है ? (What is Planning ? What are the basic features or Planning ?) Or, नियोजन की परिभाषा दीजिए। नियोजन के प्रभावी लक्षणों का वर्णन कीजिए। (Give the definition of Planning. Discuss the effective features of Planning.) 

Ans. नियोजन का अर्थ (Meaning of Planning) योजना का आशय भविष्य की याओं का वर्तमान में निर्धारण करने से है। निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए, भविष्य क्या करना है, कैसे करना है और किसके द्वारा किया जाना है, का पूर्व निर्धारण ही नियोजन इस दृष्टि से नियोजन एक बौद्धिक क्रिया है जिसके लिए रचनात्मक विचार एवं कल्पना आवश्यक है। प्रबन्ध में नियोजन से अभिप्राय निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए उपलब्ध वैकल्पिक दियों, नीतियों तथा कार्यक्रमों में सर्वश्रेष्ठ का चुनाव करने से है।

नियोजन (Planning)- 

1. भविष्य में क्या करना है? (What to do in future ?)

2. कैसे करना है ? (How to do it ?) 3. कब करना है? (When to do it ?)

4. किसके द्वारा किया जाना है ? (By whom to do it ?)

5. कौन उत्तरदायी होगा ? (Who will be responsible ? )

नियोजन की परिभाषाएँ (Definitions of Planning) – विभिन्न विद्वानों द्वारा दी गई परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं—

1. कुण्ट्ज एवं जो डोनेल के अनुसार, “क्या करना है, कैसे करना है, इसे कब करना है।

और इसे किसे करना है का पूर्व निर्धारण ही नियोजन है।” Planning is deciding in advance what to do, how to do it, when to do it and who is to do it.” – Koontz and O’Donnell)

2. एलेन के अनुसार, “योजना भविष्य को पकड़ने के लिए बनाया गया पिंजरा है ।” (“A plan is trap to capture the future.”-Allen)

3. जे. ओ. मैक किल्से के अनुसार, “नियोजन प्रबन्ध के चिन्तन का स्पष्ट प्रमाण (“Planning is the tangible evidence of the thinking of the managemen J.0. Mc Kinsey)

4. हेनरी फेयोल के अनुसार, “कार्य की योजना का अर्थ उन परिणामों से लगाया जाता जिनको हमें प्राप्त करना है, कार्य की उस रूप-रेखा से है जिनको हमें अपनाना है और विधियों से है जिनका हमें प्रयोग करना है।” (“Planning is deciding the best alternati among other to perform different managerial operations in order to achie the predetermined goals.”-Henery Fayol) 

5. फास्ट तथा रोजेन्द्रवेग के अनुसार, “नियोजन पूर्व निर्धारित गतिविधियों का समूह है (“A plan is determined course of action.”-Kast and Resenzweig) प्रभावशाली नियोजन के लक्षण या विशेषताएँ (Characteristics of Effectin Planning)- प्रभावशाली नियोजन के प्रमुख लक्षण या विशेषताएँ निम्नलिखित है-

1. पूर्वानुमान (Forecasting) पूर्वानुमान योजना बनाने की दिशा में प्रथम कदम है। पूर्वानुम का अर्थ है भविष्य में घटने वाली घटनाओं तथा जोखिमों का पता लगाना जो हमारी संस्था को प्रभाि करते हैं। पूर्वानुमान सही तथ्यों पर आधारित होते हैं और इन्हीं के आधार पर व्यावसायिक अवस का पता लगाकर योजना बनाई जाती है। वास्तव में अनिश्चित भविष्य के साथ बुद्धिमानी से सहव करना ही नियोजन कहलाता है।

2. स्पष्ट निर्धारित उद्देश्य (Well defined Goal) एक प्रभावशाली नियोजन के लि निश्चित उद्देश्यों का होना आवश्यक है। ये उद्देश्य पूरी तरह स्पष्ट एवं समन्वित हों।

3. नियोजन सरल हो (Planning should be Simple ) प्रभावशाली नियोजन के लि आवश्यक है कि यह इतना सरल हो कि संस्था का प्रत्येक कर्मचारी उसे सरलता से समझ सके इसी संदर्भ में डेविस ने कहा है कि, “मानवीय क्षेत्र के सभी कार्यों में व्यापक, संगठित क्रिया की आवश्यकता होती है, वहीं पर नियोजन सरलता एक गुण माना जाता है।” इसलिए आद नियोजन के लिए सरलता का गुण होना आवश्यक है।

4. नियोजन व्यावहारिक हो (Planning should be Practicable) के लिए यह आवश्यक है कि वह ऐसा हो जिसे क्रियान्वित किया जा सके। प्रभावशाली नियोज

5. चयन (Choice) नियोजन का एक लक्षण यह भी है कि इसमें वैकल्पिक क्रियाओं से सर्वोत्तम क्रियाओं का चुनाव सम्मिलित होता है।

6. सन्तुलित होना (It should be Balanced ) प्रभावशाली नियोजन को सन्तुलित होन चाहिए। प्रत्येक लक्ष्य की प्राप्ति के लिए साधनों को प्रयोग में पूरी तरह सन्तुलन होना चाहिए। इसके अलावा अल्पकालीन और दीर्घकालीन नियोजन के बीच भी सन्तुलन आवश्यक है।

7. मितव्ययी (Economical) — नियोजन की प्रमुख विशेषता यह भी है कि वह न्यूनतम लाग पर पूर्वानुमान लक्ष्यों की पूर्ति कर सके।

8. नियोजन में समय तत्त्व (Time Element in Planning ) — नियोजन करते समय समय के निर्धारण का पूरा ध्यान रखना चाहिए तथा इस निर्धारित समय के अन्तर्गत ही नियोजन पूरा करना चाहिए। 

9. सर्वव्यापकता (Pervasiveness) – सर्वव्यापकता की आवश्यकता जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में होती है। इसलिए नियोजन में सर्वव्यापकता का होना आवश्यक है। नियोजन उच्च अधिकार से लेकर प्रत्येक स्तर के अधिकारी के लक्ष्यों की पूर्ति के लिए किया जाता है।

10. लोच एवं निरन्तरता (Flexible and Coutinuity) प्रभावशाली नियोजन के लिए आवश्यक है कि वह लोचपूर्ण एवं निरन्तर हो। नियोजन में अनुमानित घटनाएँ घटित नहीं हो तो परिवर्तित घटनाओं के अनुसार न्यूनतम लागत पर नियोजन में परिवर्तित कर लेना चाहिए।

Q. 2. एक अच्छी योजना के गुणों की व्याख्या कीजिए। (Enumerate the qualities of a good plan.) Or, एक श्रेष्ठ योजना की क्या विशेषताएँ हैं ? (What are the features of a good plan ?)

Ans. एक अच्छी और प्रभावपूर्ण योजना में निम्नलिखित गुण होने चाहिए-

1. सरलता (Simplicity ) —— योजना सरल होनी चाहिए जिसे कर्मचारी आसानी से समझ सकें। योजना को सफलतापूर्वक तभी कार्यरूप दिया जा सकता है जबकि सम्बन्धित अधिकारी एवं कर्मचारी उसको ठीक प्रकार से समझें।

2. मितव्ययी (Economy ) योजना संस्था की आर्थिक दशा के अनुसार होनी चाहिए। कुण्ट्रन और ओ’डोनेल के अनुसार योजना पर किया गया व्यय कभी भी योजना से मिलने वाले लाभ के अधिक नहीं होना चाहिए।

3. व्यापकता (Comprehensiveness ) – संस्था के सभी पहलुओं और स्तर के लिए योजना बनानी चाहिए ताकि विभिन्न विभागों के साथ चल रहे कार्य का सन्तुलन, विकास एवं सामूहिक प्रयासों का समन्वय हो सके।

4. स्थायित्व (Stability) एक योजना स्थायित्व स्थापित करने वाली होनी चाहिए। यदि योजना में समय-समय पर परिवर्तन किए जाएँगे तो पूर्व निर्धारित उद्देश्य की प्राप्ति कठिन हो जाएगी।

5. व्यावहारिक (Practicable) एक आदर्श योजना ऐसी होनी चाहिए जिसका क्रियान्वयन करना सम्भव हो।

6. सन्तुलित (Balanced ) – एक आदर्श योजना लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए साधनों के प्रयोग में सन्तुलित होनी चाहिए।

7. स्पष्ट परिभाषित उद्देश्य (Well defined Objectives)—प्रत्येक योजना पूरी तरह निश्चित, संक्षिप्त, स्पष्ट एवं शुद्ध होनी चाहिए। 

8. लोचशील (Elastics) एक प्रभावशील या आदर्श योजना लोचपूर्ण होनी चाहिए ताकि आवश्यकता पड़ने पर योजना में आधारभूत परिवर्तन सरलता से किए जा सके।

9. समन्वय एवं सन्तुलन (Co-ordinative and Balancing ) योजना की कुशलता इस बात पर निर्भर है कि वह संस्था के भौतिक एवं मानवीय साधनों को सामूहिक उद्देश्य प्राप्ति के लिए समन्वित करे और साथ ही साथ विभिन्न विभागों का सन्तुलित विकास करे।

*10. नियमित समीक्षा (Regular Feed back) प्रभावपूर्ण नियोजन के अन्तर्गत आवश्यकता इस बात की है कि योजना कि चालू प्रगति की नियमित समीक्षा की जाए। विचलनों को मालूम किया जाए एवं सुधारात्मक कार्यवाही की जाए।

Q. 3. नियोजन की प्रकृति का वर्णन कीजिए। (Discuss the Nature of Planning.)

Ans. नियोजन की प्रकृति के अन्तर्गत निम्नलिखित तत्त्वों का अध्ययन होता है। 

1. एक सतत् प्रक्रिया (A continuous Process)—नियोजन एक ऐसी प्रक्रिया है जो व्यवसाय के शुरू से आखिर तक निरन्तर जारी रहती है। इसमें एक योजना के बाद दूसरी योजना फिर तीसरी योजना के बाद चौथी योजना आदि का क्रम चलता ही रहता है।

2. नियोजन एक बौद्धिक क्रिया है (Planning is an intellectual Process)—- नियोजन एक बौद्धिक प्रक्रिया है क्योंकि इसमें बहुत सोच-विचार करके श्रेष्ठ कार्य-पद्धतियों का चयन किया जाता है जिससे न्यूनतम लागत पर अधिकतम उत्पादन सम्भव हो सके। यहाँ पर यह भी ध्यान रखना होगा कि बौद्धिक कार्य के लिए पर्याप्त ज्ञान, अनुभव, प्रशिक्षण एवं दूरदर्शिता का होना

आवश्यक है। हेयंस तथा मेसी (Heyenes and Massie) ने कहा है, “नियोजन एक बौद्धिक किया है जिसके लिए इसलिए सृजनात्मक (Creative) चिंतन और कल्पना जरूरी है।”

3. नियोजन प्रबन्धकीय कार्यकुशलता का आधार (Planning is Basis of Managerial Efficiency)—–— नियोजन प्रबन्धकों की कार्यकुशलता मापने का एक अच्छा आधार है। यदि योजना न्यूनतम लागत पर अधिकतम उत्पादन को सम्भव बनाती है तो वह अधिक श्रेष्ठ मानी जाती है।

4. निजकीय कार्यों की धुरी है (Planning is Basis of Managerial Functions)— नियोजन प्रबन्ध के सभी कन्द्रबिन्दु है। इसके अभाव में प्रबन्धकको कार्य न तो आरम्भ ही हो सकता है और न पूरे ही किए जा सकते है।

5. सार्वव्यापकता (Pervasiveness) एक संगठन में, चाहे यह छोटा हो या बड़ा, प्रत्येक स्तर पर जन की आवश्यकता होती है।

6. नियोजन लक्ष्य पूर्ति में योगदान देता है (Planning Contributes to objectives) प्रभावशाली नियोजन निर्धारित उद्देश्यों या तथ्यों को पूरा करने के लिए न केवल पद्धतियों, नीतियों कार्य की स्थापना करता है बल्कि इनको लागू करने का पूरा-पूरा प्रयास करता है। दिल्ली ई. गीज (Billy E Goctz) ने कहा है, “केवल योजनाएँ ही संख्या को सफल नहीं बनाती अपितु योजनाएं उद्देश्य की ओर ध्यान केन्द्रित कर सकती है। संस्था की सफलता के लिए क्रियाएँ बहुत आवश्यक है जिन्हें प्रत्येक संस्था को अवश्य ही करना चाहिए लेकिन बिना योजनाओं के क्रियाएँ अनुपयोगी होती है

Q.4. प्रवन्ध नियोजन क्यों करता है ? (Wiry management plans )

Or. व्यापार के लिए नियोजन की क्या आवश्यकता है ? (Why is planning necessary for Business ? )

Or, नियोजन प्रबन्ध को आवश्यक कार्य क्यों समझा जाता है ? (Why planning is considered necessary function of Management ?)

Or, प्रवन्ध में नियोजन के महत्व की विवेचना कीजिए। (Discuss importance of Planning in Management.)

Or नियोजन के महत्त्व पर प्रकाश डालें ।(Throw light on the importance of Planning)

Ans. नियोजन की आवश्यकता, महत्त्व एवं लाभ (Need, Importance and Advantages of Planning ) — नियोजन प्रबन्ध का प्रमुख कार्य है इसलिए प्रबन्ध का आवश्यक घटक है। नियोजन के अभाव में संस्था के कार्यों को सफलतापूर्वक नहीं किया जा सकता। वर्त्तमान समय में बड़े पैमाने के उत्पादन तथा तकनीकी परिवर्तन, व्यवसाय में बढ़ती जटिलताएँ, उपभोक्ताओ की रुचि में परिवर्तन, किस्म नियन्त्रण आर्थिक, सामाजिक तथा राजनीतिक परिवर्तन तथा न्यूनतम लागत पर अधिक उत्पादन की भावना आदि के कारण नियोजन की और भी अधिक आवश्यकता है।

आज व्यवसायी को आरम्भ से अन्त तक नियोजन की सहायता लेनी पड़ती है। निर्धारित उद्देश्यो की पूर्ति के लिए नीतियों कार्यविधियों तथा कार्यक्रमों में उचित समन्वय नियोजन के द्वारा ही सम्भव है। मिलर (Miller) कहते हैं कि, “नियोजन के बिना कोई भी कार्य केवल अटकलबाजी के समान होगा तथा उससे केवल मात्र सन्देह ही उत्पन्न होगा ।” नियोजन एक ऐसा हथियार है जिसके द्वारा

कोई भी व्यवसायी भविष्य की सुन्दरतम मूर्ति का आकार दे सकता है। जी. डी. एच. कोल (G.D.H. Cole) ने कहा है, “बिना योजना के कोई भी कार्य तीर और तुक्के के समान होगा जिससे कि सन्देह, भ्रम एवं अव्यवस्था की उत्पत्ति होगी।”

टेरी (Terry) के अनुसार, “नियोजन की प्राप्ति के सफल कार्यों की आधारशिला है।” नियोजन समस्त प्रबन्ध्यकीय क्रियाओं का आदि एवं अन्त है (Planning is beginning and end of all managerial activities) नियोजन सभी प्रवन्धकीय क्रियाओं में विद्यमान है

और संस्था के अधिकतम लक्ष्य की प्राप्ति कुशल नियोजन पर आधारित है। नियोजन का महत्त्व प्रबन्ध निम्नलिखित कारणों से है-

1. व्यावसायिक लक्ष्य की प्राप्ति में सहायक (Helpful in attaining business objectives)निय व्यावसायिक उद्देश्यों को ध्यान में रखकर किया जाता है। इस प्रकार कुशल नियोजन संस्था के लक्ष्यों की शीघ्र एवं सफल प्राप्ति में सहायक होता है। 2. नियोजन भवि की अनिश्चितताओं का सामना करने योग्य बनाता है (Planning)

nables to face funaire uncertaintics) नियोजन भविष्य की किसी अनिश्चितताओं का  पूर्वानुमान लगाता है। उससे सतर्क करता है तथा उसका सामना करना चाहिए बल्कि कमियों को दूर करने का प्रयत्न करना चाहिए इसके कुछ उपाय निम्नलिखित

1. नियोजन पूर्णतया सन्तुलित एवं लोचपूर्ण होना चाहिए (Planning aust be well balanced and Flexible) नियोजन का उद्देश्य भविष्य के जोखिमों को कम करना होता है। अतः नियोजन सन्तुलित एवं लोचपूर्ण होना चाहिए जिससे आवश्यकतानुसार उसे कभी भी परिवर्तन किया जा सके।

2. नियोजन का आरम्भ उच्चतर से होना चाहिए (Planning must start at the top ) आधारभूत उद्देश्य, जिसने अन्य उद्देश्यों की उत्पत्ति होती है पूर्णतया स्पष्ट होने चाहिए और इसका निर्धारण उच्चस्तरीय प्रबन्धकों द्वारा किया जाना चाहिए। उच्च प्रबन्धकों के द्वारा अधीनस्थों की कार्यवाही या कार्यविधियों का अवलोकन किया जाता है तो वे कार्य लगन एवं उत्साह के साथ करते हैं।

3. नियोजन को सम्भावनाओं पर नहीं छोड़ना चाहिए (Planning must not be left 10 chance ) — नियोजन करते समय वर्तमान समस्याओं के साथ-साथ भावी समस्याओं का भी ध्यान रखना चाहिए। नियोजक के द्वारा कार्य का उचित वातावरण उत्पन्न किया जाना चाहिए जिससे कर्मचारी अधिक कुशलता एवं सम्पन्नता से कार्य कर सकें। 

4. नियोजन सरल होना चाहिए (Planning should be simple)—नियोजन आसान या सरल होना चाहिए ताकि एक साधारण कर्मचारी भी इसे समझ इसके और उसे किसी प्रकार की कठिनाई का सामना न करना पड़े।

5. रूढ़िवादिता का ध्यान न रखना (No consideration of conservation) नियोजन में परम्परागत रूढ़िवादिता की विचारधारा नहीं होनी चाहिए वरन् नये-नये विचारों का समावेश होना चाहिए।

6. आवश्यकता के अनुसार ( According to Need) नियोजन उन व्यक्तियों की आवश्यकता के अनुरूप होना चाहिए जिन व्यक्तियों को इसे पूरा करने का उत्तरदायित्व दिया जाना है। 

7. सहयोग एवं समन्वय (Co-operation and Co-ordination)— नियोजन को सफल बनाने के लिए सभी विभागों के कर्मचारियों का सहयोग प्राप्त करना चाहिए तथा नियोजन सभी विभागों में समन्वय करने वाला होना चाहिए।

8. अन्य सुझाव (Other suggestions) नियोजन विश्वसनीय सूचनाओं के आधार पर तैयार किया जाना चाहिए। नियोजन में मोर्चावन्दी पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए तथा नियोजन की जानकारी सभी सम्बन्धित व्यक्तियों को दी जानी चाहिए जिससे सम्बन्धित व्यक्ति सही ढंग से कार्य कर सके। 

Q.5. योजना प्रक्रिया के विभिन्न चरण लिखें। (Write the various steps of Planning Procedures.) Or, नियोजन प्रक्रिया या तकनीक की व्याख्या कीजिए। (Explain the process or technique of Planning in Management.) 

Ans. नियोजन में निहित आवश्यक कदम (Steps involved in Planning)

नियोजन प्रक्रिया के लिए विभिन्न विद्वानों जैसे मेरी कुशिंग नाइलस (Mary Cushing Niles), जॉर्ज आर. टेरी (George R. Terry ), रिचार्ड टी. केस (Rechard T. Case) तथा कुण्ट्ज एवं ओ ‘डोनेल (Koontz and O’Donnell) ने अलग-अलग बातों को सम्मिलित किया है। इसमें से प्रमुख इस प्रकार हैं-

1. उद्देश्यों का निर्धारण (Establishment of Objectives) सर्वप्रथम नियोजन प्रक्रिया का प्रारम्भ उद्देश्य निर्धारण करके किया जाता है। उसके बाद विभागों एवं उपविभागों के उद्देश्यों को निर्धारित करना चाहिए। उद्देश्यों के निर्धारण से प्रबन्ध को ज्ञात हो जाता है कि उद्देश्य की पूर्ति के लिए नवीन नियोजन की आवश्यकता तो नहीं है और यदि है तो पुरानी योजना में कितना सुधार करना होगा।

2. सूचनाओं का वर्गीकरण तथा विश्लेषण (Analysis and Classification of Informations) प्राप्त सूचनाओं का वर्गीकरण तथा विश्लेषण करके यह मालूम करना चाहिए कि इन नियोजन से कितना सम्बन्ध है या कितना नहीं।

3. सम्बन्धित क्रियाओं के विषय में पूरी जानकारी (Obtaining Complete Information about the activities Involved) उद्देश्यों को निश्चित करने के पश्चात् नियोजन से सम्बन्धित धियाओं (activities) के विषय में भी आवश्यक पूरी जानकारी प्राप्त कर लेनी चाहिए। पूरी जानकारी प्राप्त करने में प्रतियोगी संस्थाओं के कार्यकलापों का ज्ञान, पुराने रिकॉर्ड तथा अनुसंधान आदि सहायक हो सकते है।

4. नियोजन के आधार पर निर्माण (Determination of Planning Base) नियोजन का आधार भविष्य की अनिश्चित परिस्थितियों से सम्बन्धित होता है जिनका अनुमान लगाना नियोजन की सफलता के लिए परमावश्यक होता है। जैसे भविष्य में वस्तु की माँग कितनी होगी, बाजार की स्थिति कैसे होगी, कीमतों की प्रकृति कैसी होगी, पूँजी बाजार की दशा, करों की क्या दर होगी तथा सरकारी नीति और कर नीति कैसी होगी।

5. वैकल्पिक कार्यविधि का निर्धारण (Determining Alternative Procedures) – किसी भी कार्य को पूरा करने के लिए एक विधि नहीं होती अपितु अनेक विधियों होती है। इसलिए सर्वोत्तम विधि की खोज करके उसका निर्धारण करना चाहिए।

6. वैकल्पिक कार्य विधियों का मूल्यांकन (Evaluation of Alternative Procedures)—वैकल्पिक कार्यविधि के निर्धारण के बाद मूल्यांकन करना चाहिए। मूल्यांकन करते समय पर्याप्त सावधानी तथा कई बातों को ध्यान में रखना चाहिए। प्रत्येक कार्य विधि किसी दृष्टि से संस्था को लाभदायक होती है। एक कार्य-विधि बहुत अधिक संस्था को लाभप्रद है। लेकिन उसको लागू करने के लिए बड़ी मात्रा में पूंजी एवं जोखिम उठानी झेलनी पड़ सकती है जबकि कोई कार्य विधि कम लाभप्रद है। उसके लिए कम पूंजी कम जोखिम की आवश्यकता है। इस प्रकार संस्था के हित को ध्यान में रखकर मूल्यांकन करना चाहिए।

7. श्रेष्ठ कार्य विधि का चुनाव (Selection of the best Procedures) नियोजन के लिए वैकल्पिक कार्य-विधियों में से श्रेष्ठ कार्य विधि वही होती है जो कि न्यूनतम लागत पर अधिकतम लाभ संख्या को प्राप्त कराती है। कभी-कभी नियोजन के लिए एक कार्य-विधि उपयोगी न होकर कई विधियों का मिश्रण का चुनाव किया जाता है तो ऐसी दशा में किसी एक कार्य विधि का चुनाव न करके पई कार्य विधियों का चुनाव करना होता है।

8. सहायक योजनाओं का निर्माण (Formulation of derivative Plans) एक मुख्य योजना के निर्माण के बाद उसे ठीक प्रकार से लागू करने के लिए कई सहायक योजनाओं के बनाने की आवश्यकता होती है। ये सहायक योजनाएँ मूल योजना का ही अंग होती हैं ताकि मूल योजना सरलता से पूरी की जा सके।

9. योजना पूरी करने में सहयोग लेना (Testing co-operation in execution of (Plan) पूर्व निर्धारित उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए नियोजन के क्रियान्वयन (Execution) में उस समय के प्रत्येक व्यक्ति से सहयोग प्राप्त करना चाहिए। इसके लिए सम्बन्धित प्रत्येक व्यक्ति को नियोजन की जानकारी देनी चाहिए, उसकी राय ली जानी चाहिए। इस प्रकार सभी कर्मचारियों का सहयोग प्राप्त करके नियोजन का कियान्वयन करना चाहिए।

10. नियोजन का अनुवर्तन (Follow up the Plan) नियोजन प्रक्रिया में वांछित परिणामों को मालूम करते रहना चाहिए। पूर्व-निर्धारित उद्देश्यों की प्राप्ति नहीं हो पाती तो इसके कारणों को मालूम करके नियोजन में आवश्यकतानुसार सुधार करना चाहिए।

Q.6. उद्देश्यों से आप क्या समझते हैं? इनका क्या महत्त्व है ? (What are objectives? What are its importance?)

Ans. उद्देश्य की परिभाषा ( Definition of Objectives) – हर व्यापारिक क्रिया एक लक्ष्य होता है जिस तक पहुँचना ही उद्देश्य होता है। एलेन के अनुसार, “उद्देश्य वे लक्ष्य हैं जो कम्पनी और उसके विभिन्न विभागों को एक दिशा में ले जाने के लिए निर्धारित किये जाते हैं।”

(Objectives are goals established to guide the efforts of the company and each of its components.”-Allen)

उद्देश्य संस्था की योजना के लक्ष्य बिन्दु होते हैं। इन्हें योजना का भाग इसलिए माना जाता है कि इनके निर्धारित करने में भी योजना की समस्त प्रक्रिया अपनाई जाती है। उदाहरण के लिए यदि कोई संस्था अपना विक्रय 25% बढ़ाने का उद्देश्य बताती है तो उसे नियोजन के लिए उपयुक्त सूचनाओं का एकत्रीकरण, विश्लेषण और सर्वश्रेष्ठ विकल्प का निर्धारण करना पड़ता है।

उद्देश्य की विशेषतायें (Characteristics of objectives) किसी व्यावसायिक इकाई के उद्देश्यों की निम्नलिखित विशेषताएँ होनी चाहिए- 

1. प्राथमिकता के आधार पर उद्देश्यों का क्रम निश्चित करना।

2. व्यावसायिक इकाई के अनेक उद्देश्य होते हैं। अतः उन विभिन्न उद्देश्यों की महत्ता (importance) को ध्यान में रखना चाहिए। अतः मुख्य उद्देश्य को पहले प्राप्त करना चाहिए और बाद में सहायक उद्देश्य को प्राप्त करना चाहिए।

3. उद्देश्य की विविधता (Variety of objectives) एक व्यावसायिक इकाई के अनेक उद्देश्य होते हैं जिन्हें प्राप्त करने के लिए विभिन्न परिस्थितियों के अनुसार समय-समय पर अलग-अलग कार्य किये जाते हैं। अर्थात् प्रत्येक क्षेत्र के उद्देश्य विभिन्न होते हैं जिन्हें प्राप्त करने के लिए आवश्यकतानुसार उचित कार्य करना चाहिए।

4. उद्देश्य का निर्धारण (Determination of Objectives) किसी भी योजना का प्रथम लक्ष्य उस कार्य का उद्देश्य निश्चित करना होता है, जिसकी योजना बनाई जा रही है क्योंकि बिना उद्देश्य की कार्यविधि, नियम एवं व्यावसायिक रीतियों का निर्धारण असम्भव है।

5. उद्देश्य समीक्षा (Evaluation of objectives)— ऐसा करने से प्रबन्धकों को कार्य की प्रगति के विषय में सही स्थिति की जानकारी होती रहेगी और यदि जरूरी हो तो आवश्यक संशोधन भी किया जा सकेगा।

6. उद्देश्य का विश्लेषण (Objective Analysis) उद्देश्य चाहे अल्पकालीन हो या दीर्घकालीन, एक ही समय पर निश्चित किए जाने चाहिए। संस्था के प्रत्येक विभाग के अलग-

अलग उद्देश्य होते हैं फिर भी ये उद्देश्य संस्था के पूरक, सहायक अथवा उसके आवश्यक अंग है। उद्देश्यों के निर्धारण की महत्ता एवं आवश्यकता

(Importance and need of objectives determination) निम्नलिखित अध्ययन से उद्देश्य निर्धारण की महत्ता पर प्रकाश इस प्रकार डाला जा सकता है—

1. समन्वय सुविधा (Facility of co-ordination ) व्यावसायिक इकाई के उद्देश्य स्पष्ट एवं निश्चित होने चाहिए जिससे छोटी एवं बड़ी सभी योजनाओं में आवश्यक समन्वय बनाया जा सके।

2. कुशलता वृद्धि (Addition in Efficiency) अच्छे उद्देश्य इस निर्धारण से प्रबन्ध में कुशलता का विकास होता है।

3. संगठन उद्देश्यों के अनुरूप (Organisation According to Objectives)— जिन संस्थाओं में मुख्य एवं सहायक उद्देश्य अलग-अलग बनते हैं उस संस्था का संगठन अपने आप ही इन उद्देश्यों के अनुरूप हो जाते हैं।

4. कार्य प्रगति पर नियन्त्रण (Check on work in progress) उद्देश्य निर्धारण प्रत्येक क्षेत्र में संस्था की गतिविधियों पर अंकुश लगाने में सहायक होते हैं।

5. साधनों का सर्वोत्तम उपयोग (Best use of Resources) -जिन संस्थाओं में कार्य निश्चित उद्देश्य से होता है वहाँ कम-से-कम लागत पर अधिकतम उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। 

Q.7. योजनाओं के विभिन्न भेद बताइए। व्यवसाय के उद्देश्यों का निर्धारण आवश्यक क्यों है ? (Mention the types of Plans. Why is necessary to determine the objectives of business ? )

Ans. योजनाएँ निम्नलिखित प्रकार की हो सकती हैं-

1. अवधि के आधार पर (On the basis of time)

2. अवन्ध के स्तर पर (On the basis of Level)

3. उपयोग के आधार पर (On the basis of use)

4. प्रकृति के आधार पर (On the basis of nature)

5. व्यापकता के आधार पर (On the basis of Comprehensiveness) 

1. अवधि के आधार पर योजनाएँ (Planning According to period)- योजना समयको ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं। ये योजनाएँ भी दो प्रकार की होती है- (a) अल्पकालीन योजना (Short Period Plan ) ऐसी योजना एक दिन, एक साप्ताहिक पार्किक (15 days), मासिक, त्रैमासिक, अर्धवार्षिक योजना। यहाँ तत्कालीन समस्याओं पर अधि ध्यान दिया जाता है।

(b) दीर्घकालीन योजना (Long Period Plan ) यहाँ योजनाओं की लम्बी अवधि होत है जैसे 5 वर्ष, 10 वर्ष के लिए योजना बनाना। पाँच वर्ष या इससे अधिक अवधि के लिए योजन को ही दीर्घकालीन योजना कहा जाता है।

2. प्रबन्ध के स्तर पर योजनाएँ (Planning on the basis of the level of Manage (ment) ये योजनाएँ भी कई प्रकार की होती है- (a) उच्च स्तरीय योजना (Top Management Plan ) — यह योजनाएँ उच्च स्तर के अधिकारियों द्वारा बनाई जाती है जैसे मैनेजर या प्रबन्धक संचालक, इसमें संस्था के उद्देश्य, नीति, बजट आदि तैयार करने होते हैं।

(b) मध्य स्तरीय योजनाएँ (Middle level Management Plan) – यह योजना भी प्रबन्धकों द्वारा बनाई जाती हैं, इसके द्वारा संस्था के उद्देश्य एवं लक्ष्यों की पूर्ति सम्भव होती है।

(c) निम्न स्तरीय योजनाएँ (Lower level Management Plan)- यह योजनाएं पर्यवेक्षक (Supervision) द्वारा बनाई जाती है, इनका मुख्य उद्देश्य संस्था के कर्मचारियों द्वारा किए जाने या कार्यों से होता है।

3. उपभोग के आधार पर योजनाएँ (Plans on the basis of Use) ये योजनाएँ भी दो प्रकार की होती हैं—

(a) स्थायी या निरन्तर उपयोग की योजनाएँ (Standing or Repeated Use Plans)- इस प्रकार की योजनाओं की विशेष बात यह होती है कि इसमें उन बातों को सम्मिलित किया जाता

है जिनका उपयोग बार-बार होता है जैसे उद्देश्य, नीतियों, कार्यविधियों, नियम तथा मोर्चाबन्दी (b) विशेष उपयोग की योजनाएँ (Special or Single Use Plans) ये योजनाएं

विशेष परिस्थिति के समाधान के लिए बनाई जाती हैं जैसे ही वह परिस्थिति समाप्त है, योजना भी समाप्त हो जाती है। वास्तव में ऐसी योजनाएं किसी बड़ी योजना की सहायक योजना होती हैं। एक बार उपयोग हो जाने के बाद उसका कोई महत्व नहीं रह जाता है, जैसे—कार्यक्रम, बजट तथा परियोजनाएँ। 

4. प्रकृति के आधार पर योजनाएँ (Plans on the Basis of Nature) योजना के

प्रकृति के आधार पर भी दो भागों में विभाजित किया जा सकता है। (a) रणनीति या मोर्चावन्दी योजनाएँ (Strategic Plans)— ये योजनाएँ संस्था के महत्त्वपूर्ण पहलुओं को प्रभावित करती है तथा संस्था की व्याकरण नीति से सम्बन्धित होती है। (b) कार्य संचालन सम्वन्धी योजनाएँ (Operational Plans)—ये योजनाएँ संस्था की रणनीति सम्बन्धी योजनाओं को लागू करने के लिए बनाई जाती हैं।

5. व्यापकता के आधार पर योजनाएँ (Plans on the basis of Comprehensive ness) व्यापकता के आधार पर भी योजनाएँ दो प्रकार की होती हैं— (a) कम्पनी की स्तर योजनाएँ (Corporate Plans) कम्पनी के विकास एवं विस्तार के ये दीर्घकालीन योजनाएँ होती है।

(b) विभागीय योजनाएँ (Departmental Plans)—अलग-अलग विभागों के द्वारा अपनी फालीन आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये अल्पकालीन योजनाएँ बनाई जाती है।

“उद्देश्यों के निर्धारण की आवश्यकता (Need of determine the Objectives)— किसी भी व्यावसायिक संस्था के लक्ष्य निश्चित एवं स्पष्ट रूप से परिभाषित होने चाहिए क्योंकि व्यवसाय की नीतियों, कार्याविधियों एवं नियम सभी व्यवसाय के लक्ष्यों पर ही निर्भर करते हैं। वास्तव में, उद्देश्यों लक्ष्यों की स्पष्ट व्याख्या करना प्रवन्ध की सबसे बड़ी सफलता है। इसलिए कहा जाता है कि, “प्रभावपूर्ण का अर्थ ही उद्देश्यों द्वारा प्रबन्ध (Management by objectives Or MBO) है. किसी भी संस्था के लिए चाहे वह व्यावसायिक हो या गैर व्यापारिक उद्देश्यों का निर्धारण अनलिखित कारणों से आवश्यक होता है-

1. समन्वय सुविधा (Facility of Co-ordination ) – व्यावसायिक इकाई के उद्देश्य स्पष्ट एवं निश्चित होनी चाहिए जिससे छोटी एवं बड़ी सभी योजनाओं में आवश्यक समन्वय बनाया जा सके। 

2. कुशलता वृद्धि (Addition in Efficiency)—अच्छे उद्देश्य निर्धारण से प्रबन्ध में कुशलता का विकास होता है।

3. संगठन उद्देश्यों के अनुरूप (Organisation according to Objectives)— जिन संस्थाओं में मुख्य एवं सहायक उद्देश्य अलग-अलग बनते हैं। उस संस्था का संगठन अपने-आप होइन उद्देश्यों के अनुरूप बन जाते हैं।

4. कार्य प्रगति पर नियन्त्रण (Check on Work-in-Progress) उद्देश्य निर्धारण प्रत्येक क्षेत्र में संख्या की गतिविधियों पर अंकुश लगाने में सहायक होते हैं।

5. साधनों का सर्वोत्तम उपयोग (Best Use of Resources) जिन संस्थाओं में कार्य निश्चित उद्देश्यों से होता है, वहाँ कम से कम लागत पर अधिकतम उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। 

Q.8. स्थायी योजनाएँ किसे कहते हैं ? यह एकल उपयोगी योजनाओं से किस प्रकार भिन्न ? (What is meant by Standing Plan ? How it is differ from Single Use Plan ?) हैं

Ans. स्थायी योजनाएँ (Standing Plans)—ऐसी योजनाएँ जो किसी व्यावसायिक संस्था में स्थायी रूप से बनाई जाती है। यह ऐसी योजनाएं जिन्हें बार-बार उपयोग करने के लिए बनाया जाता है उन्हें योजनाएँ कहते हैं। इन योजनाओं को बनाने का मुख्य उद्देश्य प्रबन्धक को इस योग्य बनाना है कि सभी दिशाओं में सही निर्णय लेकर उचित कार्य कर सके। उदाहरण के तौर पर वे योजनाएँ, जिनमें संस्था के उद्देश्य (Objects), नीतियाँ ( Policies), कार्यविधि (Procedure),

नियम (Rules) और कार्य नीति अथवा व्यूह-रचना (Strategy) आदि बातें झलकती हों, स्थायी बारम्बार उपयोगी योजनाओं की ओर संकेत करती है।

1. उद्देश्य (Objectives)— हर व्यापारिक क्रिया का एक लक्ष्य होता है जिस तक पहुँचना ही उद्देश्य होता है, नियोजन द्वारा केवल व्यावसायिक लक्ष्यों तक ही नहीं पहुँचा जाता है। वरन् व्यापारिक क्रियाओं का संगठन, समन्वय, नियन्त्रण आदि प्रदान किया जाता है। बिना लक्ष्य के उद्देश्यों की प्राप्ति नहीं हो सकती।

2. नीतियाँ (Policies) नीतियाँ हमें यह बताती है कि कोई विशेष कार्य हमें किस प्रकार करनी है नीतियाँ भी योजना के स्वरूप होती हैं नीतियों ही लक्ष्यों का मार्ग निर्धारित करती हैं। मार्ग निर्धारण से लक्ष्यों को व्यावहारिक रूप मिलता है।

3. कार्यविधि (Procedures) नीतियों के अनुसार ही विधियाँ बनती हैं। इसके द्वारा ही कार्य प्रणाली व्यावहारिक बनती है। संस्था की कार्यविधि निश्चित हो जाने के बाद नियन्त्रण और निर्देशन की आवश्यकता कम हो जाती है। किसी संस्था की कार्यविधियों उसकी आवश्यकताओं एवं परिस्थितियों के अनुसार तय की जाती हैं।

4. कार्य प्रणाली (Methods)—–— कार्य प्रणाली प्रस्तुत कार्य के उद्देश्यों, उपलब्ध सुविधाओं तथा समय, धन और प्रयत्नों के कुल योग को ध्यान में रखते हुए, सम्पन्न करने का एक पूर्व निर्धारित तरीका है।

5. नियम (Rules) नियम कार्य सम्पादन की स्थिति का वर्णन करते हैं। यहाँ तक स्पष् किया जाता है कि विशिष्ट स्थिति में उस विशिष्ट कार्य को कैसे सम्पन्न किया जाये। नियम योजनाएं हैं, जो कि आवश्यक कियाओं का मार्गदर्शन करते हैं।

एकल उपयोग वाली योजनाएँ ( Single use Plan)—–— जैसा कि इसके नाम से ही विदित है— इसके अन्तर्गत उन योजनाओं को सम्मिलित किया जाता है जिनका निर्माण किसी विशेष परिस्थिति की आवश्यकतानुसार किया जाता है और उनका उपयोग उन्हीं विशेष परिस्थितियों में हैं किया जाता है इसलिए इसको विशेष उपयोग अथवा एकल उपयोगी योजना कहा जाता है। साधारणतया

ये योजनाएँ एक बार उपयोग के लिए बनाई जाती है। एकल उपयोगी योजनाओं के प्रमुख रूप हैं- 1. कार्यक्रम (Programme ) — जो योजनाएं किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति हेतु बनाई जाती हैं, उसे कार्यक्रम कहते हैं।

2. बजट (Budget)—बजट भविष्य के लिए खर्चों के पूर्व अनुमान होते हैं। वजट बन जाने से खर्चों को नियन्त्रित एवं नियमित किया जा सकता है। बजट भविष्य की आवश्यकताओं का अनुमान है।

3. परियोजनाएं (Projects ) —— हम एक कार्यक्रम को अलग-अलग विभागों में बाँट लेते हैं और उनका प्रत्येक का अस्तित्व अलग-अलग होता है। कार्यक्रम के स्वतन्त्र विभाग को ही परियोजना कहते हैं। 

स्थायी और एकल योजनाओं में अन्तर

(Difference between Standing and Single Plan)

स्थायी योजनाएँ (Standing Plan)

एकल योजनाएं (Single Plan)

ये योजनाएँ लम्बी अवधि के लिए बनाई

1. ये योजनाएँ एक माह से लेकर 12 माह तक ही होती है।

जाती हैं।

यह योजना बार-बार प्रयोग में लाई जाती है।

2. यह योजना विशेष परिस्थिति में ही प्रयोग में

लाई जाती है।

दीर्घकालीन योजनाओं का आधार संस्था के

3. एकल योजना स्थायी योजना पर ही आधारित

व्यापक उद्देश्य पर निर्भर करता है।

होती है। 4. ये योजनाएँ एक निश्चित उद्देश्य के लिए

इनका उद्देश्य व्यापक होता है और लम्बी

होती है और उसके बाद समाप्त हो जाती है।

अवधि तक चालू रहती है।

Q.10. नीतियाँ किसे कहते हैं ? नीतियों के लक्षण, लाभ व सीमाएँ बताइए । (What are Policies? Mention the characteristics, merits and limitations of policies.) Or, नीतियों पर टिप्पणी लिखिए। (Write a short note on polictes.)

Ans. नीतियाँ ( Policies) एक व्यावसायिक इकाई की नीतियाँ उसके निर्धारित उद्देश्यों को प्राप्त करने का साधन है। अतः उद्देश्य निर्धारण के पश्चात् नीतियों का निर्धारण आवश्यक है। कुण्ट्ज और ओ’डोनेल के अनुसार, “नीतियाँ उस क्षेत्र को सीमित कर देती हैं जिस पर निर्णय लेना है साथ ही इस बात का भी निश्चय करती हैं कि निर्णय उद्देश्यों की पूर्ति में सहायक होगा।” (“Policies delimit area within which a decision into be made and assure that decision will be consist and contributive to objectives.”) नीतियाँ हमें यह बताती हैं कि अमुक कार्य हमें कैसा करना है। नीतियाँ भी योजना के अनुरूप होती हैं। जैसे पूर्व समझाया भी है कि नीतियाँ ही लक्ष्यों का मार्ग निर्धारित करती है।

मार्ग निर्धारण से लक्ष्यों को व्यावहारिक रूप मिलता है। व्यापार को सामान्य नीतियाँ स्पष्ट रूप से निर्धारित कर लेनी चाहिए। नीतियाँ हर कर्मचारी का मार्ग निर्देशन करती हैं।

नीतियों के उदाहरण इस प्रकार है-

1. माल का विक्रय केवल नकद ।

2. कच्चा माल स्थानीय ही खरीदना।।

3. माल की नकद बिक्री पर बट्टा 20% ही दिया जाये।

4. उच्च पदों को वर्तमान कर्मचारियों से ही भरा आदि।

नीतियों के लक्षण (Characteristics of Policies) एक आदर्श व्यावसायिक नीति में निम्नलिखित लक्षण पाए जाते हैं-

1. नीतियाँ निर्णय सीमा निर्धारित करती हैं—नीतियों के द्वारा विभिन्न अधीनस्थ अधिकारियों के अधिकारों की वह सीमा निर्धारित की जाती है जिसके द्वारा वे निर्णय लेते हैं।

2. नीतियाँ सदैव चालू रहने वाले निर्णय व निर्देश हैं— विभिन्न एक जैसी परिस्थितियों में नीतियों सदैव एक जैसा ही निर्णय-निर्देश देती हैं। अतः एक बार नीति निर्धारित करने के बाद नीतियाँ सदैव चालू रहने वाली निर्देश है।

3. नीति एवं नियम में अन्तर—नीति एवं नियम में अन्तर इस प्रकार है-नीति एवं निर्णय निर्देश है जो किसी निश्चित सिद्धान्त के आधार पर बनती है। इसके द्वारा प्रबन्धकों का कार्य क्षेत्र सीमित हो जाता है। किन्तु नियम एक कानूनी आदेश है जिसे एक निश्चित परिस्थिति में अवश्य लागू करना चाहिए। इसको लागू न करने से सम्बन्धित अधिकारी को दण्ड भी दिया जा सकता है।

4. नीतियों एवं उद्देश्य में अन्तर हालांकि नीति एवं उद्देश्य एक ही अर्थ में प्रयोग होते हैं, परन्तु तकनीकी दृष्टि से इनमें काफी अन्तर है। उद्देश्य का अर्थ संस्था के वास्तविक लक्ष्यों तक पहुँचना है और नीतियाँ वह साधन हैं जिनके द्वारा हम अपनी मंजिल तक पहुँच सकते हैं। 

नीतियों के लाभ (Merits of Policies) नीति निर्धारण के निम्नलिखित लाभ है-

1. समय एवं श्रम की बचत —जब नीतियों पूर्व निर्धारित होती हैं तो किसी भी कार्य को करने के लिए निर्णय लेने में अनावश्यक देर नहीं होती है और इस प्रकार श्रम और समय की बचत होती है।

2. अधीनस्थ कर्मचारियों का नियम- प्रत्येक विभाग में अधीनस्थ अधिकारी उस विभाग की निर्धारित नीतियों के आधार पर कार्य करते हैं। इस प्रकार ये नीतियों उनके दैनिक कार्य में मार्ग-दर्शन का कार्य करती हैं।

3. निर्णय सीमा निर्धारण नीतियों प्रत्येक अधिकारी द्वारा लिए जाने वाले निर्णय सीमा का निर्धारण करती हैं और उनको इस बात को चेतावनी देती हैं कि वह कोई ऐसा निर्णय न ले जो उसके अधिकारों से परे हो।

4. अधिकार सौंपने में सुविधा — नीतियों का निर्धारण होने के बाद बड़े अधिकारियों के सौंपने का कार्य सरल हो जाता है क्योंकि निर्धारित नीतियाँ प्रत्येक अधिकारी के कार्य क्षेत्र को सीमित कर देती हैं।

नीतियों की सीमाएँ (Limitations of Policies) — नीतियों की कुछ सीमाएँ हैं—

1. समस्या का तुरन्त समाधान न होना— प्रत्येक कार्य को करने के लिए पृथक-पृथक नीतियाँ होती हैं, किन्तु कई बार कुछ ऐसी समस्याएँ प्रकट होती हैं जो निर्धारित नीतियों के द्वारा सुलझ नहीं पाती।

2. नीतियाँ सभी समस्याओं का समाधान नहीं हैं—नीतियों प्रारम्भ में ही बना ली जाती हैं जबकि उन पर अमल भविष्य में किया जाता है। समय के साथ-साथ राजनीतिक सरकारी नीति में परिवर्तन करने के कारण ये नीतियों विभिन्न समस्याओं को सुलझाने में असमर्थ होली हैं। इस प्रकार कोई भी नीति चाहे कितनी भी बुद्धिमानी से क्यों न बनाई गई हो वह प्रत्येक समस्या का समाधान नहीं है।

3. नीतियाँ मानवीय निर्णय का स्थानापन्न (Substitute) नहीं हो सकती-नीतियाँ यद्यपि प्रबन्धकों का मार्ग दर्शन करती हैं, किन्तु इन्हें मानवीय निर्णय का स्थानापन्न कभी नहीं माना जा सकता।

Q. 10. कार्यविधि से आप क्या समझते हैं ? इसकी क्या विशेषताएं है? (What do you mean by Procedure ? What are its characteristics ?)

Ans. कार्यविधि (Procedur) धर्मविधि से आशय ऐसी प्रणाली से है जिसके द्वारा निश्चित कार्य को एक निश्चित क्रम में लिया जाता है। कार्यविधि में कार्य की रूपरेखा मार्गदर्शन के उद्देश्य से की जाती है। कार्यविधि को नियोजन का आवश्यक अंग माना जाता है। किसी भी व्यावसायिक संस्था में कार्यविधियों उसकी परिस्थितियों के अनुसार तय की जाती है। कार्यविधियों तक्ष्य तक पहुँचने में मार्गदर्शन करती है।

कार्यविधि की विशेषताएँ (Characteristics of Procedure)-

1. पद्धति (Method)कार्यविधि में इस बात पर जोर दिया जाता है कि किन-किन विभिन्न स्तरों पर किस विधि द्वारा कार्य किया जाएगा। कार्यविधि प्रबन्धकों के अधिकारों पर अंकुश लगाती हैं क्योंकि कार्य को करने की विधि पहले से ही निर्धारित होती है। 2. विभागीय सम्बन्ध (Departmental Relations) कार्यविधि का संबंध संस्था के

विभिन्न विभागों से होता है। एक ही कार्याविधि का प्रभाव अनेक विभागों पर पड़ेगा और ये सभी विभाग अपनी निश्चित कार्यविधि द्वारा कार्य को सम्पन्न करेंगे।

3. लोचदार (Flexible )- प्रारम्भ में एक स्थायी कार्यविधि का निर्माण कर लेना चाहिए। जिससे उसमें समय-समय पर परिवर्तन न करना पड़े, परन्तु कार्यविधि में लोध का गुण होना चाहिए जिससे उसमें परिस्थितियों के अनुसार यथासंभव संशोधन किया जा सके।

4. पुनरावलोकन तथा नवीनीकरण (Modernization)- आज के इस युग में दिन-प्रतिदिन नए-नए आविष्कार किए जाते हैं जिसमें पुरानी कार्यविधि अप्रचलित हो सकती है। बाजार में अपनी स्थिरता कायम रखने के लिए तथा प्रतियोगिताओं का सामना करने के लिए नई-नई

कार्यविधियों का प्रयोग आवश्यक हो, अतः समय-समय पर कार्यविधि का पुनरावलोकन करना आवश्यक है और आवश्यकता पड़ने पर उसका नवीनीकरण कर देना चाहिए। 

5. उद्देश्य प्राप्ति (Helpful in Accomplishment of Objectives) कार्यविधि का निर्धारण करते समय इस बात का पूरा ध्यान रखना चाहिए कि कार्यविधि ऐसी हो जिससे संस्था के विभिन्न उद्देश्यों की प्राप्ति शीघ्र से शीघ्र हो सके।

Q. 11. नियोजन के महत्त्व का वर्णन कीजिए । (Discuss the importance of Planing.)

Ans. नियोजन प्रबन्ध का प्रथम एवं सबसे अधिक महत्वपूर्ण कार्य है। इसकी आवश्यकता प्रत्येक प्रबन्धकीय स्तर पर होती है। नियोजन के अभाव में किसी भी व्यावसायिक संस्था की सभी

क्रियाएँ अर्थहीन हो जाएगी संस्थाओं के आकार एवं जटिलताओं में वृद्धि होने के कारण नियोजन का महत्व और भी बढ़ गया है। नियोजन इसलिए भी एक महत्वपूर्ण कार्य बन गया है, क्योंकि आज व्यवसाय को एक ऐसे वातावरण में जीवित रहना पड़ता है जो अनिश्चित तथा निरंतर परिवर्तनशील है। नियोजन के अभाव में, भविष्य की अनिश्चित घटनाओं का अनुमान लगाना

“नहीं, तो कठिन अवश्य है। एक व्यावसायिक संस्था में नियोजन का महत्व अथवा लाभ निम्नलिखित तथ्यों से स्पष्ट होता है-

1. नियोजन दिशा प्रदान करता है (Planing Provides Direction) नियोजन प्रक्रिया संस्था के उद्देश्यों को सरल एवं स्पष्ट शब्दों में परिभाषित किया जाता है। इसका परिणाम के सभी कर्मचारियों को एक ऐसी दिशा मिल जाती है जिसकी ओर सभी के प्रयास काम । एवं जाते हैं। इस प्रकार संस्था के मुख्य उद्देश्यों को प्राप्त करने में नियोजन का महत्वपूर्ण योगदान रहता है।

उदाहरण के लिए माना एक कम्पनी नियोजन के अंतर्गत अपना बिक्री लक्ष्य (Sales Target) निर्धारित करती है। अब सभी अन्य विभाग, जैसे- कय, उत्पादन, सेविवर्गीय, वित्त आदि बिक्री लक्ष्य के संदर्भ में ही अपने-अपने उद्देश्य निर्धारित करेंगे। 

इस प्रकार सभी प्रबंधकों का ध्यान अपने-अपने उद्देश्यों की पूर्ति की ओर केंद्रित हो जाएगा। जब सब अपने-अपने उद्देश्यों को पूर कर लेंगे तो बिक्री लक्ष्य को प्राप्त करना निश्चित हो जाएगा। अतः उद्देश्यों के अभाव में संगठन अपंग हो जाता है और उद्देश्य का निर्धारण नियोजन के अंतर्गत ही किया जाता है।

2. नियोजन अनिश्चितता का जोखिम कम करता है (Planning reduces Risks of Uncertainty)—नियोजन सदैव भविष्य के बारे में किया जाता है और भविष्य अनिश्चित होता है। कोई भी यह स्पष्टतः नहीं बता सकता कि आगे क्या होने वाला है। व्यावसायिक वातावरण लगातार बदलता रहता है। कभी उपभोक्ताओं की रुचि में परिवर्तन होने लगता है तो कभी उत्पादन की विधियों में नियोजन द्वारा भविष्य में संभावित परिवर्तनों का पूर्वानुमान लगाकर विभित्र क्रियाओं को अच्छे-से-अच्छे ढंग से नियोजित करने का प्रयास किया जाता है। इस प्रकार नियोजन द्वारा भावी अनिश्चितताओं से होने वाले जोखिम को कम किया जाता है।

उदाहरण के लिए, विक्री लक्ष्य निर्धारित करने से पहले बाजार सर्वेक्षण करके यह पता लगाया जा सकता है कि कितनी नई कम्पनियाँ प्रतियोगिता में उतरने वाली है। इस तथ्य को ध्यान में रखकर भावी क्रियाओं को नियोजित करके संभावित संकट से छुटकारा पाया जा सकता है। 

3. नियोजन आवश्यक क्रियाओं के छूटने व अपव्ययी क्रियाओं के होने को कम करता है (Planning reduces Overlapping and Wasteful Activities) नियोजन के अंतर्गत उद्देश्य प्राप्ति के लिए भावी क्रियाओं का निर्धारण किया जाता है। फलस्वरूप, यह निश्चित हो जाता है कि कब, कहाँ, क्या व क्यों चाहिए। इससे अव्यवस्था व भ्रम की स्थिति समाप्त हो जाती है। 

ऐसी स्थिति में विभिन्न क्रियाओं व विभागों में समन्वय स्थापित होता है जिससे यह संभावना खत्म हो जाती है कि किसी आवश्यक क्रिया को पूरा न किया जाए और अपव्ययी (Wasteful) क्रियाऐं होती रहें। परिणामतः अपव्यय शून्य की ओर चलता है, कुशलता बढ़ती है और लागते

अपने न्यूनतम स्तर पर आ जाती हैं। उदाहरण के लिए, यदि यह निश्चित हो जाए कि किसी विशेष महीने में इतनी धनराशि की जरूरत होगी तो वित्त प्रबन्धक समय पर व्यवस्था कर लेगा। इस जानकारी के अभाव में उस महीनें धनराशि आवश्यकता से कम या अधिक हो सकती है। दोनों ही स्थितियों अवांछनीय है। कम होने पर काम पूरा नहीं हो सकेगा और अधिक होने पर अनावश्यक रूप से नगदी पड़ी रहेगी और ब्याज की हानि होगी।

4. नियोजन नवीनतम विचार विकसित करता है (Planning Promotes Innovative Ideas ) —— जैसा कि स्पष्ट है कि नियोजन में विभिन्न विकल्पों में से सर्वश्रेष्ठ का चयन किया जाता है। किसी कार्य को करने के लिए विभिन्न विकल्प स्वयं ही प्रबन्धक के पास नहीं आ जाते बल्कि उनकी खोज करनी पड़ती है। इस प्रयास में नए-नए विचार सामने आते हैं तथा उनमें और अधिक निखार लाने के लिए उनका गहराई से अध्ययन किया जाता है। इस प्रकार नियोजन से प्रबन्धकों में सोच-विचार करने की शक्ति का संचार होता है और अंततः नवप्रवर्तन एवं सृजनशीलता को बढ़ावा मिलता है।

उदाहरण के लिए, एक कम्पनी अपने व्यवसाय का विस्तार करना चाहती है। यह विचार आते ही संबंधित प्रबंधक के मस्तिष्क में नियोजन की काप्रवाही शुरू हो जाएगी। वह कुछ इस प्रकार सोचेगा-

(i) क्या पहले वाले उत्पाद की ही कुछ और किस्में तैयार की जाएँ ?

(ii) क्या थोक बिक्री के साथ-साथ फुटकर विक्री भी की जाए ?

(iii) क्या अपने पुराने उत्पाद के लिए ही अन्य स्थानों पर ब्रांच खोली जाए 

(iv) क्या किसी नए उत्पाद को बाजार में लाया जाए ?

इस प्रकार एक के बाद अनेक विचार सामने आएंगे ? ऐसा करने पर यह प्रबन्धक की आदत बन जाएगी और वह हर समय कुछ नया व रचनात्मक करने की सोचेगा। कम्पनी के लिए यह एक सुखद स्थिति है जो नियोजन के माध्यम से पैदा होती है।

5. नियोजन निर्णयन में सहायक है (Planning Facilitates Decision Making)- निर्णयन का अर्थ निर्णय लेने की प्रक्रिया से है। इसके अंतर्गत विकल्पों की खोज की जाती है तथा बेहतर विकल्प का चयन किया जाता है। लेकिन विकल्पों की खोज से पहले उद्देश्य निर्धारित करने आवश्यक होते हैं। उद्देश्यों का निर्धारण नियोजन के अंतर्गत किया जाता है। इसीलिए कहा जा सकता है नियोजन निर्वाचन में सहायक है। अन्य शब्दों में, नियोजन के अभाव में निर्णयन संभव नहीं है।

6. नियोजन नियंत्रण के लिए प्रमाप निश्चित करता है (Planning establishes Standards for Controlling)—नियोजन प्रवन्ध के नियंत्रण कार्य को सुगम मनाता है इसीलिए इसको नियंत्रण का आधार माना जाता है। नियोजन द्वारा संस्था के उद्देश्यों को निर्धारित करके संख्या में कार्यरत सभी विभागों एवं व्यक्तियों को बता दिया जाता है कि उन्हें क और किस प्रकार करना है। उनके कार्य, समय, लागत आदि के बारे में प्रमाप (Standards) निश्चित कर दिए जाते हैं। नियंत्रण में कार्य पूरा होने पर वास्तविक कार्य की तुलना प्रमाणित कार्य के साथ करके विधानों (Deviations) का पता लगाया जाता है। प्राणात्मक विचलन आने पर

अर्थात् कार्य इच्छानुसार पूरा न होने पर संबंधित व्यक्ति को उत्तरदायी ठहराया जाता है। उदाहरण के लिए, एक श्रमिक के लिए एक दिन में 10 इकाई काम करना निश्चित किया जाता है (नियोजन की बात है)। वह वास्तव में 8 इकाई काम करता है। इस प्रकार 2 इकाई का ऋणात्मक विचलन आता है। इसके लिए उसे उत्तरदायी ठहराया जाएगा। (वास्तविक कार्य का गाए, विचलन को जानकारी व श्रमिक को उत्तरदायी ठहराना निमंत्रण के अंतर्गत आता है)। इस प्रकार नियोजन के अभाव में नियंत्रण संभव नहीं है। 

FAQs

Q. 1. नियोजन की सर्वव्यापकता को स्पष्ट कीजिए । (Explain the Universality of Planning.)

Ans. नियोजन का क्षेत्र व्यापक है। प्रत्येक कार्य में नियोजन की आवश्यकता होती है। चाहे वह कुश्ती का अखाड़ा हो या खेल का मैदान, अस्पताल हो या केमिस्ट की दुकान, छोटा व्यापार हो या मिलाई का कारखाना, शिक्षा का क्षेत्र हो या भगवान का मन्दिर, सभी स्थानों पर नियोजन की आवश्यकता होती है।

Q.2. नियोजन एक प्राथमिक कार्य है, स्पष्ट कीजिए । (Planning is a primary and basic function. Explain.)

Ans. प्राथमिक एवं आधारभूत कार्य (Primary and basic Function ) — नियोजन की विशेषता यह है कि यह प्रबन्ध का एक प्राथमिक कार्य है जो प्रबन्ध सम्बन्धी अन्य कार्यों के पहले ही किया जाता है। इस कार्य के हो जाने के बाद ही प्रबन्ध के अन्य कार्य (संगठन, निर्देशन, नियन्त्रण, समन्वय आदि) शुरू होते हैं। प्रबन्ध के अन्य कार्यों की उपयोगिता नियोजन पर हो निर्भर होती है।

Q. 3. नियोजन प्रवन्ध का मुख्य कार्य है। स्पष्ट कीजिए। (Planning is a primary function of Management.) 

Ans. नियोजन प्रवन्ध का मुख्य कार्य है (Planning is a primary function of management) नियोजन को सभी प्रबन्धकीय कार्यों में प्राथमिक स्थान दिया जाता है। यद्यपि प्रबन्ध के सभी कार्य अपने-अपने स्थान पर महत्त्वपूर्ण है और इनमें छोटा-बड़ा करना कठिन है। लेकिन फिर भी इनमें नियोजन को अधिक महत्त्वपूर्ण माना जाता है। 

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