Ncert Class 12 Business Studies Chapter 6 Notes in Hindi नियुक्तिकरण

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Class 12 Business Studies Chapter 6 Notes in Hindi Pdf download


कक्षा | Class12th 
अध्याय | Chapter06
अध्याय का नाम | Chapter Nameनियुक्तिकरण | STAFFING
बोर्ड | Boardसभी हिंदी बोर्ड
किताब | Book एनसीईआरटी | NCERT
विषय | Subjectव्यवसाय अध्ययन | business studies
मध्यम | Medium हिंदी | HINDI
अध्ययन सामग्री | Study Materialsप्रश्न उत्तर | Question answer
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नियुक्तिकरण सारांश | Staffing summary

पाठ की प्रमुख बातें-नियुक्तिकरण प्रबंध का प्रशासनिक कार्य है जिसका अर्थ है संगठन में स्थापित विभिन्न पदों पर पद के महत्त्व के अनुसार योग्य व्यक्तियों को नियुक्त करना। प्रबंधकीय भाषा में पद और व्यक्ति में सामंजस्य स्थापित करने की सभी क्रियाओं को नियुक्तिकरण कहते हैं। यह एक प्रक्रिया है जिसके अन्तर्गत सही व्यक्ति को सही पद पर नियुक्त किया जाता) नियुक्तिकरण एक व्यापक शब्द है जिसमें कर्मचारियों की भर्ती, चयन, विकास, प्रशिक्षण, पदोन्नति, पद-अवनयन, स्थानान्तरण, क्षतिपूर्ति आदि को सम्मिलित करते हैं।

“आज हमारा समूचा व्यावसायिक एवं औद्योगिक संगठन हड़तालों, तालाबंदियों, घेरावों, प्रदर्शनों, नारेबाजियों एवं हिंसात्मक उपद्रवों से बुरी तरह ग्रसित है। इससे मुक्ति दिलाने का हमारे सामने एकमात्र मार्ग संगठन में योग्य, सहयोगी, प्रशिक्षित, समर्पित एवं कुशल नियुक्तिकरण करना है। आधुनिक प्रबंध विद्वानों का यह मत है कि नियुक्तिकरण मानव संसाधन प्रबंध का ही एक भाग है। अतएव इसे संगठन का पृथक् कार्य नहीं माना जा सकता है। उनके अनुसार मानव संसाधन प्रबंध एक व्यापक शब्द है और नियुक्तिकरण केवल मात्र उसका एक भाग है।

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नियुक्तिकरण प्रक्रिया अथवा स्टाफिंग प्रक्रिया से आशय कदमों की ऐसी श्रृंखला से है जो कि किसी संगठन में सही समय पर, सही पदों पर तथा सही व्यक्तियों की निरंतर पूर्ति करने के लिये उठाये जाते हैं। भर्ती को एक ऐसी प्रक्रिया माना गया है जिसके द्वारा कार्य करने को तत्पर भावी कर्मचारियों का पता लगाया जाता है और उन्हें नौकरी के लिये आवेदन-पत्र देने को प्रोत्साहित किया जाता है। अतः भर्ती का कार्य संगठन में उपेक्षित मानव-शक्ति के पूर्वानुमान बनाये जाने के उपरान्त सम्पादित किया जाता है।

कर्मचारियों की भर्ती के लिये प्रत्येक संगठन में एक सर्वमान्य नीति का निर्धारण किया जाना चाहिये और उसी नीति के अनुसार ही कर्मचारियों की भर्ती की जानी चाहिये। चयन एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके माध्यम से संस्था में रिक्त पदों की पूर्ति की जाती है। संस्था में रिक्त स्थानों को भरने के लिये अनेक आवेदन पत्र प्राप्त की जाती है। संस्था में रिक्त स्थानों को भरने के लिये अनेक आवेदन-पत्र प्राप्त होते हैं। प्राप्त आवेदन-पत्रों में से जिस आवेदन की योग्यता, अनुभव आदि कार्य विशिष्टता के अनुरूप होते हैं, उनका चयन कर लिया जाता है।

प्रशिक्षण एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा किसी विशिष्ट कार्य को करने की किसी व्यक्ति की योग्यता, निपुणता तथा कुशलता में वृद्धि की जाती है। प्रशिक्षण के द्वारा कर्मचारी को न केवल कार्य के प्रति सामान्य ज्ञान प्राप्त होती है अपितु उसकी सौपे गये कार्य के प्रति रुचि उत्पन्न होती है। पहल करने की क्षमता, वर्त्तमान उत्पादन प्रणालियों में सुधार करने की दशा में मार्गदर्शन मिलता है। प्रशिक्षण एक श्रेष्ठ प्रबंध प्रणाली का मूल मंत्र है। 

यह समस्याओं के समाधान का साधन है। “जिस प्रकार स्वास्थ्य को बनाने के लिये विटामिन की गोलियाँ लाभदायक होती हैं, ठीक उसी प्रकार मानव-शक्ति समस्याओं के निष्करण के लिये प्रशिक्षण लाभदायक है।” विकास एक नियोजित एवं संगठित प्रक्रिया है जिसके द्वारा कर्मचारियों के ज्ञान, चातुर्य तथा

कौशल में वृद्धि की जाती है। विकास कार्यक्रमों को प्रभावी होने के लिये आवश्यक है कि वे इस प्रकार नियोजित, क्रियान्वित और अनुमानित किये जायें कि वे दैनिक क्रियाओं के विभिन्न अंग बन जायें। पारिश्रमिक से आशय कर्मचारियों को देय सभी मौद्रिक तथा अमौद्रिक भुगतानों से है जो के उनके द्वारा प्रदान की गई सेवाओं के प्रतिफल में दिये जाते हैं। 

प्रेरणा से आशय उस मनोवैज्ञानिक उत्तेजना से है जो व्यक्तियों को कार्यशील बनाती है तथा उन्हें अधिक कार्य करने के लिये प्रेरित करती है। वित्तीय प्रेरणाओं से आशय उन प्रेरणाओं से है जिनका माप मुद्रा में किया जा सकता है। 

अवित्तीय अथवा अमौद्रिक प्रेरणाओं से आशय उन प्रेरणाओं से है जिन्हें मुद्रा में मापा नहीं जा सकता है। मजदूरी भुगतान की दो प्रमुख प्रणालियाँ हैं जिन्हें समय के अनुसार मजदूरी तथा कार के अनुसार मजदूरी भुगतान प्रणाली कहा जाता है।


अति लघु उत्तरीय प्रश्न (VERY SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS)


Q.1. नियुक्तिकरण (स्टाफिंग क्या है? (What is Staffing ?)

Ans. नियुक्तिकरण का अर्थ संगठनों में स्थापित विभिन्न पदों पर पद के महत्त्व के अनुसार व्यक्तियों की नियुक्त करना है।

Q. 2. नियुक्तिकरण की एक उचित परिभाषा दीजिए। (Give a suitable definition of Staffing.)

Ans. नियुक्तिकरण प्रबंध का एक महत्त्वपूर्ण कार्य एवं उत्तरदायित्व है जो संस्था के कार्य संचालन हेतु पर्याप्त संख्या में प्रबंधकीय कर्मचारियों एवं अन्य कर्मचारियों को उपलब्ध करने, उनका विकास करने और उन्हें संस्था में बनाये रखने से संबंध रखते हैं।

Q.3. नियुक्तिकरण के महत्त्व को बताएँ। (Discuss the importance of Staffing.))

Ans. नियुक्तिकरण के महत्त्व या आवश्यकता निम्नलिखित है-

1. संसाधनों का अधिकतम एवं कुशलतम उपयोग करने के लिये। 

2. प्रबंध के अन्य कार्यों का कुशल एवं प्रभावी निष्पादन के लिये। 

3. उत्पादकता एवं उत्पादन दोनों में वृद्धि के लिये। 

4. योग्य कर्मचारियों की खोज में सहायक 15. कृत्य संतुष्टि के लिये 

6. कर्मचारियों की अधिकता अथवा कमी को रोकने के लिये। 

7. व्यावसायिक उपक्रम की समस्याओं का समाधान करने के लिये 

8. अधिक उत्तरदायित्वों को ग्रहण करने वाले व्यक्तियों का विकास करने के लिये। 

Q.4. साक्षात्कार किसे कहते हैं? (What is Intervieve )

Ans. साचात्कार भावी कर्मचारियों का मौखिक रूप आमने-सामने बैठकर व्यक्तित्व का मूल्यांकन है। इसमें भावी कर्मचारी के व्यक्तित्व, स्वभाव, बुद्धि तथा तर्क का परीक्षण होता है।

Q.5. एक अच्छी भर्ती नीति की चार विशेषताएं बताइए । (What are the main characteristics of recruitment policy ?)

Ans. विशेषताएँ-

1. भर्ती योग्यता और विना भेद-भाव होनी चाहिये।

2. भर्ती का काम योग्य, कुशल, अनुभवी अधिकारियों द्वारा किया जाना चाहिए। 

3. भर्ती से पूर्व कर्मचारियों की आवश्यकताओं का विश्लेषण करना चाहिये।

4. भर्ती करते समय आन्तरिक स्रोतों का भी ध्यान रखना चाहिये।

Q.6. मानव शक्ति नियोजन से क्या अभिप्राय है ? (What is manpower planning ?) 

Ans. इसका अर्थ है संस्था में सही समय पर सही कर्मचारियों को उपलब्ध कराने की ऐसी

योजना बनाना जिससे कि न तो संस्था में कर्मचारियों के अभाव में काम रुक सके और न ही अधिक कर्मचारी होने से लागत व्यय में वृद्धि हो सके। इसके अन्तर्गत मानव शक्ति के अनुसार भर्ती, चयन, विश्लेषण एवं विकास सम्मिलित है।

Q.7. नियुक्तियों के विभिन्न तत्त्वों की गणना कीजिए। (Enumerate the various elements of staffing.) 

Ans. नियुक्तियों के विभिन्न तत्त्व निम्नलिखित हैं-

1. मानव शक्ति नियोजन। 

2 भर्ती और चयन 

3. कार्य पर नियुक्ति 

4. प्रशिक्षण एवं मूल्यांकन 

5. पारिश्रमिक व अभिप्रेरण।

Q.8. व्यवसाय में नियुक्तिकरण की आवश्यकता क्यों पड़ती है ? (Why is there need of staffing is Business)

Ans. व्यवसाय में नियुक्तिकरण / स्टाफिंग की आवश्यकता इसलिए होती है कि कोई भी संगठन हो उसमें कार्य करने वाला मनुष्य ही होता है। मनुष्य के बिना न मशीन चलाई जा सकती है न सामग्रियों का कोई उपयोग हो सकता है। व्यवसाय में व्यवसाय की सभी क्रियाएँ, उत्पादन, वितरण, क्रय-विक्रय आदि सभी कार्य मनुष्य ही करता है। आधुनिक युग में मनुष्य का प्रयास ही प्रारंभिक एवं अंतिम बिंदु है। 

Q9. नियुक्तिकरण प्रक्रिया के कदमों के नाम बतलाइए। (Name the steps which involved in staffing process.) 

Ans. नियुक्तिकरण प्रक्रिया में अग्रलिखित कदम सम्मिलित हैं-

1. मानव शक्ति का नियोजन (Human Resource Planning)

2. इच्छुक प्रत्याशियों की भर्ती करना (Recruitment)

3. कर्मचारियों का चयन (Selection )

4. आगमन तथा अभिस्थापन (Induction and orientation ) — कर्मचारियों के चयन के बाद उनका परिचय तथा उन्हें संगठन के बारे में जानकारी कराना।

5. कर्मचारियों को प्रशिक्षण (Training)

6. मजदूरी का निर्धारण (Determination of wages) 

7. निष्पादन एवं मूल्यांकन ( Performance Appraisal)

8. पदोन्नति स्थानान्तरण एवं सेवा समाप्ति (Promotion Transfer and Termination) 

Q:10. नियुक्ति के दो लाभ बताइए। (Give any two advantages of staffing.)

Ans. 1. नियुक्तियाँ कुशल संगठन की संरचना कर मानवीय संसाधनों की सम्पत्ति का निर्माण करती हैं और व्यवसाय की समस्या का समाधान खोजती है।

2. नियुक्तियाँ एक पूर्णरूपेण मानव प्रधान कार्य हैं जो योजनाओं को कार्यरूप प्रदान करके प्रत्येक कार्य पर उपयुक्त कर्मचारी प्रदान कर नियोजन, संगठन, निर्देशन और नियंत्रण को प्रभावी बनाता है।

Q. 11. भर्ती का अर्थ स्पष्ट कीजिए। (Explain the meaning of Recruitment.)

Ans. भर्ती से आशय एक ऐसी प्रक्रिया से है जिसके द्वारा भावी कर्मचारियों की खोज की जाती है और उन्हें उपक्रम में कार्य करने के लिए आवेदन पत्र देने के लिए प्रेरित किया जाता है। एडवीन बी. फिलिप्पो के अनुसार, “भर्ती भावी कर्मचारियों की खोज करने और उन्हें रिक्त कार्यों के लिए आवेदन करने के लिए प्रेरणा देने व प्रोत्साहन करने की प्रक्रिया होती है।””

Q. 12. प्रशिक्षण का अर्थ स्पष्ट कीजिए। (Explain the meaning of Training.) 

Ans. प्रशिक्षण से आशय उस दीक्षा शिक्षा से होता है उसके द्वारा किसी विशेष कार्य को किरने के लिए कर्मचारियों की रुचि योग्यता और निपुणता में वृद्धि लाई जाती है जिससे उस कार्य का संपादन सरल शीघ्र एवं प्रभावी बन जाता है। प्रशिक्षण व्यावहारिक कुशलता बढ़ाती है। नृसियस के अनुसार, “प्रशिक्षण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा विशेष कार्य के संपादन हेतु कर्मचारियों की प्रवृत्तियों निपुणताओं एवं योग्यताओं में वृद्धि की जाती है। 

Q. 13. चयन का अर्थ स्पष्ट कीजिए। (Explain the meaning of Selection.)

Ans. चयन से आशय संस्था के लिए योग्य व कुशल कर्मचारियों का चुनाव करने से है। संस्था के रिक्त स्थानों के विषय में अनेक आवेदन-पत्र प्राप्त होते हैं। उनमें से जिस आवेदक की योग्यता, , अनुभव आदि कार्य विशिष्टता के अनुरूप होते हैं उन कुशल कर्मचारियों की नियुक्ति करना ही चयन कहलाता है। 

डेल योडर के अनुसार, “श्रमिकों के चुनाव का आशय उस क्रिया से है जिसमें नौकरी के लिए प्रार्थना को दो वर्गों में विभक्त कर दिया जाता है। एक वे जिन्हें नौकरी दी जाती है और दूसरे वे जिन्हें नौकरी नहीं दी जाती है।”

Q.14. भर्ती के आंतरिक स्रोत क्या हैं ? (What are the internal sources of Recruitment ?)

Ans. भर्ती के आंतरिक स्रोत निम्न हैं-

1. पदोन्नति, 2. स्थानान्तरण ।

Q.15. आंतरिक भर्ती से क्या लाभ है ? (What are the advantages of internal recruitment )

Ans. आंतरिक भर्ती के निम्न लाभ 

1. ऊँचा मनोबल होना। 

2. प्रशिक्षण-व्यव कमी। 

3. योग्यता का उचित मूल्यांकन। 

4. अधिक वफादार ।

Q. 16. चुनाव प्रशिक्षण कितने प्रकार का होता है ? (How many types of selection test are there )

Ans. चुनाव प्रशिक्षण निम्न प्रकार का होता है-

(i) बुद्धि प्रशिक्षण। 

(ii) योग्यता प्रशिक्षण । 

(iii) व्यक्तित्व प्रशिक्षण । 

(iv) प्रकृति प्रशिक्षण

(v) दक्षता प्रशिक्षण

(vi) अभिरुचि प्रशिक्षण।

Q.17. साक्षात्कार कितने प्रकार का होता है ? (How many types of interview are there ?)

Ans. साक्षात्कार के प्रकार निम्न हैं- 

(i) प्रतिरूपित साक्षात्कार। 

(ii) प्रतिबल साक्षात्कार

(iii) समूह साक्षात्कार। 

(iv) अनिर्देशक साक्षात्कार 

(v) मंडल साक्षात्कार ।

Q. 18. प्रशिक्षण कितने प्रकार का होता है ? (How many types of Training are there ?)

Ans. प्रशिक्षण निम्न प्रकार का होता है-

(i) नव शिक्षार्थी अथवा कुशल कारीगरों के लिए प्रशिक्षण 

(ii) शिल्पकारी प्रशिक्षण ।

(iii) प्रबन्धकीय प्रशिक्षण 

(iv) विशिष्ट प्रशिक्षण ।

Q. 19. प्रशिक्षण के लाभ बताइए (Write advantages of Training.) 

Ans. (i) उत्पादन में वृद्धि आती है। (ii) दुर्घटनाओं में कमी आती है। (iii) श्रमिकों के आत्म-विश्वास में वृद्धि होती है। (iv) कर्मचारियों के उच्च पदों पर नियुक्ति के अवसर बढ़ जाते हैं।

Q. 20. पदोन्नति के कौन-कौन से सिद्धांत हैं ? (What are the principles of Promotion ?)

Ans. किसी भी संख्या का कार्य सुचारू रूप से चलाने के लिए यह आवश्यक है कि संस्था पदोन्नति की एक निश्चित तथा निष्पक्ष नीति का निर्माण किया जाए। नीति निर्धारण करते हुए में विशेष बातों का ध्यान रखना आवश्यक है जो निम्न प्रकार से हैं-

(i) पदोन्नति में कर्मचारियों की वरिष्ठता का ध्यान रखना चाहिए। 

(ii) पदोन्नति पक्षपात रहित होनी चाहिए। 

(iii) पदोन्नति में व्यक्तिगत गुणों, शैक्षणिक योग्यता, कार्यकुशलता व अनुभव को ध्यान में रखना चाहिए। (iv) पदोन्नति कर्मचारियों की उपलब्धियों तथा कार्यकुशलता के आधार पर भी करनी चाहिए।

Q.21. समूह साक्षात्कार से आप क्या समझते हैं ? (What do you mean by Group Interview ? )

Ans. समूह साक्षात्कार (Group Interview ) – समूह साक्षात्कार में प्रार्थी अनेक होते हैं तथा साक्षात्कारकर्ता एक होता है। समूह साक्षात्कार में पाँच या छः प्रार्थियों को एक साथ एक कम में बिठाया जाता है। इसके पश्चात् साक्षात्कारकर्त्ता किसी भी विषय पर अथवा किसी भी समस्या पर अपने विचार प्रकट करता है जिससे वार्तालाप का आरम्भ हो सके। 

इसके बाद प्रार्थी उस विषय या समस्या पर अपने विचार मत एवं तर्क प्रकट करते हैं। इस प्रकार विचार अभिव्यक्ति के दौरान ही अच्छे व योग्य प्रार्थी का चुनाव कर लिया जाता है। इस प्रक्रिया को समूह चुनाव पद्धति भी कहा जाता है।

Q. 22. कर्मचारी भर्ती के बाह्य स्रोत क्या हैं? (What are the external sources of Recruitment of employees.)

Ans. कर्मचारी भर्ती के बाह्य स्रोत निम्न प्रकार से हैं-

(i) रोजगार कार्यालय।

(ii) शिक्षण संस्थाएँ। 

(iii) श्रम संघ। 

(iv) अन्य संस्थाओं के 

(v) संगठन के भूतपूर्व कर्मचारियों में से 

(vi) वर्तमान कर्मचारियों के संबंधियों में से।

Q.23. कार्य पर नियुक्ति को परिभाषित कीजिए। (Define the term Placement.)

Ans. चुना हुआ व्यक्ति जब नियुक्ति पत्र प्राप्त कर लेता है तो कार्यालय में यह रिपोर्ट करता है कि वह उस संस्था में नियुक्त पद पर करने को तैयार है। उस समय से वह संस्था का कर्मचारी माना जाने लगता है।

“डेल पोडर के अनुसार “चुने हुए प्रार्थियों को दिए जाने वाले कार्य का निरीक्षण कर उनहें कार्य सोपना, जिनके लिए उनका चुनाव किया जाता है, उनकी कार्य पर नियुक्ति कहलाती है।”

(Q. 24. प्रशिक्षण के उद्देश्यों के नाम लिखिए। (Name the objectives of training.)

Ans. प्रशिक्षण द्वारा किसी विशेष कार्य को करने के लिए कर्मचारियों के ज्ञान, योग्यता में वृद्धि की जाती है। इसके प्रमुख उद्देश्य निम्न है-

(i) कर्मचारियों के ज्ञान, योग्यता एवं निपुणता में वृद्धि करना। 

(ii) कर्मचारियों की कुशलता में वृद्धि करना। 

(iii) दुर्घटनाओं में कमी करना। 

(iv) संसाधनों का कुशलतम उपयोग करना।

(v) अधिकारियों की द्वितीय पंक्ति तैयार करना।

Q. 25. प्रेरणात्मक मजदूरी से क्या आशय है ? (What is mean by Incentive Wage Plan ?)

Ans. वह योजना जो श्रमिको को अधिक कार्य करने के लिए प्रोत्साहित करती है प्रेरणात्मक मजदूरी प्रणाली कहलाती है। इसमें सामान्य मजदूरी के अतिरिक्त बढ़ती दर पर लाभांश तथा बोनस श्री मिलता है।

Q.26. प्रेरणात्मक मजदूरी भुगतान के तीन प्रकार लिखिए। (Write three types of Incentive Plan of Wage Payment.)

Ans. प्रेरणात्मक मजदूरी भुगतान के प्रकार-

(i) हाल्से प्रिव्याज योजना। (ii) रॉवन योजना (iii) एमरसन की कुशलता योजना । 

Q.27. सामूहिक बोनस योजना क्या है ? (What is Group Bonus Plan ?)

Ans. सामूहिक बोनस योजना में बोनस की सम्पूर्ण राशि सभी श्रमिकों में विभक्त कर दी जाती है।

Q. 28. टेलर की विभेदात्मक कार्यानुसार भुगतान योजना क्या है ? (What is Taylor’s differential Piece Wage Plan ?)

Ans. इस योजना में प्रमापित कार्य प्रमापित समय में समाप्त करने पर मजदूरी बढ़ी हुई दर से मिलती है और यदि प्रमापित कार्य प्रमापित समय में नहीं करता है तो मजदूरी कम दर के आधार पर दी जाती है।

Q. 29. एक अच्छी प्रेरणात्मक प्रणाली की चार विशेषताएँ बताइए । (Give three characteristics of a good incentive plan.) 

Ans. एक अच्छी प्रेरणात्मक प्रणाली की निम्न प्रमुख विशेषताएँ हैं-

1. सरल (Simple ) — प्रणाली इतनी सरल होनी चाहिए जिससे श्रमिकों और प्रबंधकों दोनों को दी मजदूरी की गणना करने में कोई कठिनाई न हो।

2. न्यूनतम मजदूरी की गारंटी (Assurance of Minimum Wages ) — एक अच्छी प्रेरणात्मक प्रणाली में न्यूनतम मजदूरी की गारंटी होनी चाहिए जिससे श्रमिक असुरक्षित महसूस न करें। 

3. लोच (Flexible)—एक अच्छी प्रेरणात्मक प्रणाली में लोच होनी चाहिए अर्थात प्रणाली ऐसी होनी चाहिए जिसमें समय-समय पर परिवर्तन किया जा सके।

4. न्यायशील (Justifiable)—— एक अच्छी प्रेरणात्मक प्रणाली न्यायशील तथा सबके लिए समान होनी चाहिए।

Q.30. मानव संसाधन प्रबंध के कार्य के रूप में नियुक्तिकरण का क्या अर्थ है ? (What is the meaning of staffing as a part of Human Resource Management.) 

Ans. नियुक्तिकरण को मानवीय संसाधन का ही एक रूप माना जाता है। आधुनिक प्रबंध विद्वानों का यह मत है कि नियुक्तिकरण मानव संसाधन प्रबंध का ही एक हिस्सा है। अनुसार मानव संसाधन प्रबंध एक व्यापक शब्द है|


लघु उत्तरीय प्रश्न (SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS)


Q. 1. स्टाफिंग का अर्थ बतलाइए। (Explain the meaning of Staffing.) 

Ans. स्टाफिंग का अर्थ (Meaning of Staffing) – स्टाफिंग से आशय प्रशासन निर्धारित नीतियों को लागू करने के लिए योग्य पदाधिकारियों की नियुक्ति, चुनाव, प्रशिक्षण, पदोन्न पदावनति, स्थानान्तरण, सेवा समाप्ति आदि से सम्बन्धित नियम, सिद्धान्त तथा समस्याओं से। 

पीटर ड्रकर (Peter Drucker) के अनुसार, प्रबन्ध के प्रमुख रूप से तीन उत्तरवादि (Responsibilities) हैं-

1. प्रवन्ध कार्य (Managing Work) 

2. श्रमिकों का प्रव (Managing Workers)

3. मैनेजर्स का प्रवन्ध (Managing Managers)

उपर्युक्त तीनों उत्तरदायित्वों में से केवल तीसरा कार्य-मैनेजर्स का प्रवन्ध स्टाफिंग के अन्तर्ग आता है जबकि थियो हमन (Theo Haimann) के अनुसार, “अधीनस्थ प्रयत्यको की भर्ती, चुनार विकास, प्रशिक्षण, क्षति पूर्ति आदि कार्य स्टाकिंग के अन्तर्गत आते हैं।” 

Q. 2. स्टाफिंग के महत्त्व बतलाइए। (Explain the importance of Staffing.)

Ans. स्टाफिंग का महत्त्व (Importance of Staffing ) – व्यावसायिक जटिलता परिणामस्वरूप ‘स्टाफिंग’ का महत्त्व बढ़ता जा रहा है। आधुनिक प्रबन्ध तभी सफल हो सकता है जबकि वह पहले की तुलना में कई गुना चतुर, चौकन्ना, विवेकशील तथा ज्ञानवान हो किन्तु वा भी मानव होने के नाते सर्वगुण सम्पन्न नहीं हो सकता है तथा इस तकनीकी युग में कुशलतापूर्व व्यवसाय को चलाना आसान कार्य नहीं है। 

फलस्वरूप, आज एक प्रबन्धक को अपने कार्य के लि अन्य कर्मचारियों से परामर्श करना पड़ता है तथा सहायता प्राप्त करनी पड़ती है। जिस प्रकार ए लकड़ी मनुष्य को चलने में सहारा देती है ठीक उसी प्रकार कुशल कर्मचारी भी अपने विशिष्ट एवं परामर्श से स्टाफिंग कार्यों में सहायता पहुंचाते हैं।

Q.3. प्रबन्ध अधिकारियों के नियोजन अथवा मानव शक्ति के नियोजन को स्प कीजिए। (Explain the meaning of Man-power Planning.)

Ans. प्रबन्य अधिकारियों का नियोजन (Man-power Planning)— अर्थ (Meaning)- प्रबन्धकीय नियोजन 20वीं शताब्दी की अनमोल देन है। आज

तकनीकी युग ने कई नई मनोवैज्ञानिक तथा व्यावहारिक समस्याओं को जन्म दिया है इसलिए योग प्रबन्ध अधिकारियों का महत्त्व और अधिक हो गया है। 

आज प्रबन्धकीय नियोजन का यह दायि है कि वह देखे की संस्था में जिन प्रबन्धकों की नियुक्ति की गई है, वे उन पदों के लिए पूर्णत योग्य है या नहीं। साथ ही पर्याप्त मात्रा में योग्य प्रबन्धकों को उपलब्ध कराना भी इसका कर्तव्य है आज योग्य, सजग तथा उत्साठी प्रवन्धकों की बहुत कमी है और यह कमी विकासशील देशों औद्योगीकरण के विकास के रास्ते में बहुत बड़ी रुकावट है। 

कुछ लोग प्रबन्धकीय नियोजन से आग कम यौम्स प्रबन्धकों की खोज तथा उनके सुधार से ही लगाते हैं, उनका यह विचार गलत है। वास्तविकता यह है कि प्रबन्ध अधिकारियों के चुनाव में विशेष सावधानी बरतने पर भी कभी-कभी प्रबन्धक कृत्य (Job) के लिए कम या कुछ अधिक योग्य पाए जाते है। इस विभिन्नता को दूर किया जाता है। कम योग्य को योग्य बनाया जाता है और अधिक योग्य को वरिष्ठ पद सोपा जाता है।

परिभाषाएँ (Definitions) Edwin B. Geislar के अनुसार, “प्रबन्धकीय नियोजन एक ऐसी प्रक्रिया है (जिसमे भविष्यवाणी, विकास, क्रियान्वयन एवं नियन्त्रण सम्मिलित है जिसके द्वारा एक संख्या यह निश्चित करती है कि उसके पास पर्याप्त मात्रा में योग्य व्यक्ति है जो उचित पद और समय पर इस प्रकार कार्य करते हैं जो आर्थिक दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ एवं मितव्ययतापूर्ण होता है।”

एडविन बी. फिलिप्पी (Edwin B. Flippo) के अनुसार, “एक कार्यकारी श्रम शक्ति नियोजन का कार्यक्रम संस्था के प्रबन्धकों की स्थायी रूप से योग्यता का मूल्यांकन करने के लिए तथा अनिवार्य आवश्यक प्रबन्धकीय कुशलता प्रदान करने के लिए मापदण्डों का निर्धारण करने के रूप में इसको परिभाषित किया जा सकता है।

Q.4. कार्य पर नियुक्ति का अर्थ बतलाइए। (Explain the meaning of Placement.) 

Ans. कार्य पर नियुक्ति (Placement )—किसी कर्मचारी को संस्था का अंग बनाना ही उसकी कार्य पर नियुक्ति करना कहलाता है। इसके अन्तर्गत दो कार्य आते हैं-

(1) नये कर्मचारी को एक निश्चित काम देना तथा 

(ii) उसे संस्था का अंग स्वीकार करना।

“चुने हुए प्रार्थियों को दिए जाने वाले कार्य का निरीक्षण कर उन्हें वह कार्य सौंपना जिसके लिए उसका चुनाव किया गया है, उसकी कार्य पर नियुक्ति कहलाती है।” विभागीय अधिकारी का यह कर्त्तव्य है कि नये कर्मचारी को काम सुपुर्द करते समय वह इस बात की जांच-पड़ताल करें कि कर्मचारी उस काम के योग्य है अथवा नहीं।

प्रवेशात्मक प्रशिक्षण (Induction Training) चयन प्रक्रिया का अन्तिम कदम है। यह नये कर्मचारी को नये वातावरण से परिचित कराता है। वह व्यवसाय के उद्देश्यों, नियमों, उपनियमों, वेतन, दिवस, कार्य के घण्टों आदि से भली-भांति परिचित होना चाहता है। इस प्रकार का प्रवेशात्मक प्रशिक्षण उन समस्याओं से सम्बन्धित होता है जो नये भर्ती हुए कर्मचारी को अपने कार्यदल, सुपरवाइजर तथा संगठन के प्रति परिचित कराता है। 

Q.5. कर्मचारियों की भर्ती से क्या आशय है ? (What do you mean by Recruitment of employees ? )

Ans. कर्मचारियों की भर्ती का अर्थ (Meaning of Recruitment of Personnel ) = संस्था की कर्मचारियों से सम्बन्धित आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर उसके लिए उचित कर्मचारियों को खोजना, उनको सूचित करना तथा उनके प्रार्थना पत्रों की जाँच-पड़ताल करके उनमें

से योग्य एवं अनुभवी उम्मीदवारों का चुनाव भर्ती कहलाता है। भर्ती की परिभाषाएँ (Difinitions of Recruitment) निम्न हैं-

1. फिलिप्पो के अनुसार, “भर्ती मावी कर्मचारियों की खोज करने तथा उन्हें रिक्त कृत्यों के लिए आवेदन करने के लिए प्रेरणा देने तथा प्रोत्साहित करने की प्रक्रिया होती है।” (“Recruitment is the process of searching for prospective employee and stimulating and encouraging them to apply for jobs in an organisation.”) – Edwin B. Flippo

2. डेल एस. बीच के अनुसार, “पर्याप्त मात्रा में मानव शक्ति स्रोतों को बनाए रखना तथा विकास करना भर्ती कहलाती है। भर्ती के अन्तर्गत उपलब्ध कर्मचारियों को एक मूल स्थापित करना होता है जिससे संगठन अतिरिक्त कर्मचारियों की आवश्यकता पड़ने पर वहाँ से उन्हें प्राप्त कर सकें।”

Q. 6. प्रशिक्षण के विभिन्न पहलुओं का वर्णन कीजिए।

Ans. प्रशिक्षण कार्य के निम्न पहलू हैं-

1. प्रशिक्षण की आवश्यकताओं का अनुमान लगाना ( Estimating Training Requirement)—प्रशिक्षण कार्य को आरम्भ करने से पूर्व यह निर्धारित किया जाता है कि किस कर्मचारी को प्रशिक्षण की किस स्तर पर आवश्यकता है और उसे प्रशिक्षण कैसे व कितने समय तक दिया जाना चाहिए।

2. प्रशिक्षण योजना बनाना (Making Training Plans) प्रशिक्षण का यह पहलू य बनाने से संबंध रखता है। इसके अन्तर्गत यह निश्चित होता है कि प्रशिक्षण प्रणाली, प्रशिक्षण ए प्रशिक्षण नीति किस प्रकार होनी चाहिए।

3. संगठन करना (Collective Necessary Resources ) — संगठन के साधनों, सुविधाओं के सर्वोत्तम उपयोग व प्रशिक्षण के उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए प्रशिक्षण दिया जाता है।

4. मूल्यांकन करना (Evaluation) – प्रशिक्षण कार्यक्रम कहाँ तक तथा किस सीमा वास्तविक सीमाओं के अनुरूप है। इसका मूल्यांकन किया जाता है और आवश्यकता पड़ने पर सुष के कदम उठाए जाते हैं। त

Q.7. पदोन्नति के कर्मचारियों तथा संस्था को क्या लाभ हैं ?

Ans. (क) कर्मचारियों को लाभ (Advantages to employees)—–पदोन्नति के कर्मचारियों को निम्न लाभ प्राप्त होते हैं- (i) पदोन्नति से कर्मचारियों को कार्य संतुष्टि मिलत है क्योंकि उनका सम्मान व स्तर ऊंचा उठता है। (ii) पदोन्नति से उनका मनोबल ऊँचा होत है जिससे कि कार्यक्षमता में वृद्धि होती है। (iii) पदोन्नति से कर्मचारियों के वेतन में वृद्धि होती है।

(ख) संस्था को लाभ (Advantages to organisation)—– पदोन्नति से संस्था को निम्न लाभ हैं— (i) पदोन्नति से कर्मचारी संतुष्ट रहते हैं, जिससे श्रम समस्याओं में कमी आती है। (ii) संस्था को अनुभवी तथा पुराने कर्मचारियों की सेवाएँ पूर्ववत् तथा सुधरी हुई दशा में प्राप्त होने लगती हैं। (ii) कर्मचारी संस्था में बने रहते हैं और इस प्रकार लेवर टर्न ओवर से होने वाली समस्याओं से मुक्ति मिल जाती है।

Q.8. सफल भर्ती नीति के मुख्य तत्त्वों का वर्णन कीजिए।

Ans. प्रत्येक संस्था के कर्मचारियों की भर्ती के लिए एक सुनिश्चित एवं स्पष्ट नीति किया जाता है। एक सफल भर्ती नीति में निम्न तत्त्वों का समावेश होना चाहिए- 

(i) भर्ती की नीति स्पष्ट व व्यापक होनी चाहिए। 

(ii) भर्ती की योजना मितव्ययी होनी चाहिए।

(iii) मर्ती संस्था की चालू आवश्यकताओं के अनुसार होनी चाहिए। 

(iv) भर्ती कर्मचारियों की योग्यतानुसार होनी चाहिए। (v) नए पदों की भर्ती से पूर्व उनकी स्वीकृति उत्तरदायी अधिकारी द्वारा प्रदान की जानी चाहिए। 

(vi) भर्ती करने से पूर्व कार्य-विश्लेषण कर लेना चाहिए। 

(vii) भर्ती करते समय सरकार द्वारा निर्धारित नियमों का पालन करना चाहिए। 

(viii) भर्ती के सभी साधनों का तुलनात्मक अध्ययन करके सर्वोत्तम के माध्यम से भर्ती की जानी चाहिए। 

Q.9. मजदूरी का क्या अर्थ है ? मजदूरी भुगतान की मूल प्रणालियों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।

Ans. श्रम को कार्यों के बदले जो प्रतिफल मिलता है, उसे मजदूरी कहते हैं। मजदूरी श्रमिक का धन है जो उसकी कार्यक्षमता को बहुत ही प्रभावित करती है।

प्रो. मार्शल के अनुसार, “मानव श्रम के बदले दिए जाने वाला कोई भी पुरस्कार मजदूरी कहलाता है। मजदूरी भुगतान की मूल प्रणालियाँ — मजदूरी भुगतान की मुख्य रूप में दो प्रणालियाँ प्रचलित हैं-

1. समयानुसार मजदूरी भुगतान प्रणाली (Time based wage payment) —— मजदूरी भुगतान की यह प्रणाली चि-प्रचलित प्रणाली है। इस प्रणाली में श्रमिक को समय के हिसाब से मजदूरी का भुगतान किया जाता है। मजदूरी की गणना प्रति घंटा, प्रतिदिन, प्रति सप्ताह, प्रति माह अथवा प्रति वर्ष के आधार पर की जाती है। इस प्रणाली में श्रमिक ने कितना कार्य किया है का कोई महत्त्व नहीं होता। इसकी गणना इस प्रकार की जाती है- मजदूरी = उत्पादन में लगा समय x मजदूरी दर

2. कार्यानुसार मजदूरी भुगतान प्रणाली (Piece rated wage payment) – इस प्रणाली में श्रमिक को कार्य के हिसाब से मजदूरी दी जाती है। मजदूरी की गणना प्रति इकाई के आधार

दूर की जाती है। इस प्रणाली में उत्पादन कार्य में लगे समय का कोई महत्व नहीं होता। मजदूरी निम्न प्रकार की जाती है- 

मजदूरी = उत्पादित इकाइयाँ x प्रति इकाई दर 

Q. 10. समय आधारित मजदूरी भुगतान के कौन-कौन-से लाभ हैं ? (What are the advantage of time rate of wage payment.) 

Ans. समयानुसार मजदूरी प्रणाली के गुण-दोषों का वर्णन निम्न प्रकार है–

गुण (Merits)

1. श्रनेकों द्वारा कच्चे माल व यन्त्रों का उपयोग सावधानीपूर्वक किया जाता है क्योंकि श्रमिकों को कार्य करने की कोई जल्दी नहीं होती।

2. इस प्रणाली में कार्य सोच-विचार कर अच्छे ढंग से किया जाता है जिससे अच्छी किस्म के माल का उत्पादन होता है।

3.यह मजदूरी प्रणाली अधिक लोकप्रिय है।

4.इससे श्रमिकों में एकता की भावना बढ़ जाती है, जिससे श्रम संघों को प्रोत्साहन मिलता है।

5.श्रमिकों को निश्चित मजदूरी की गारन्टी होती है।

दोष (Demerits)

1. इस प्रणाली में श्रमिक समय नष्ट करने का प्रयत्न करते हैं जिससे अधिक निरीक्षण की आवश्यकता होती है।

2. समान मजदूरी मिलने के कारण कुशल श्रमिकों के मनोबल पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

3. इस प्रणाली में समय का दुरूपयोग होता है।

4. श्रम लागत का सही अनुमान लगाना कठिन होता है।

5. इस प्रणाली में श्रमिकों के संगठित होने के कारण औद्योगिक संपयों की संभावना अधिक बड़ जाती है।

6. समान मजदूरी मिलने के कारण कुशल श्रमिक भी अकुशल बन जाते हैं।

Q. 11. कार्यानुसार मजदूरी प्रणाली के गुण-दोषों का वर्णन कीजिए। 

Ans. कार्यानुसार मजदूरी प्रणाली के गुण तथा दोप इस प्रकार है–

गुण (Merits)

1. इस प्रणाली में श्रमिकों को अधिक कार्य I इस प्रणाली में श्रमिकों की एकता समाप्त करने की प्रेरणा मिलती है।

2.श्रमिकों को अधिक कार्य करने पर अधिक वेतन मिलता है जिससे उत्पादन की मात्रा बढ़ जाती है।

3.उत्पादन मात्रा में वृद्धि के कारण प्रति इकाई उत्पादन व्यय में कमी आती है।

4. श्रमिक अपने समय का पूर्ण सदुपयोग करते थे।

5.इस प्रणाली में न्यूनतम निरीक्षण से ही काम चल जाता है।

6. योग्य व प्रशिक्षित श्रमिकों को अधिक वेतन दिया जाता है तथा अकुशल श्रमिकों को कम वेतन दिया जाता है।

दोष (Demerits).

1.हो जाती है क्योंकि श्रमिक विभिन्न वर्गों में विभक्त हो जाते हैं।

2. अधिक धन कमाने की लालसा में अपनी

शक्ति से अधिक कार्य करते हैं, जिससे उनके स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

3. इस प्रणाली में उत्पादन की किस्म में गिरावट आती है। 

4. इस प्रणाली का श्रम संघों द्वारा विरोध किया जाता है। 

5. अधिक उत्पादन करने के लिए मशीनों का अनुचित उपयोग किया जाता है। इस प्रणाली में उत्पादन बढ़ने के कारण जो

6. अधिक लाभ होता है, उसके अनुपात में श्रमिकों को कम मजदूरी दी जाती है।

Q.12. टेलर की विभेदात्मक कार्यानुसार प्रणाली को समझाए । (Explain Taylor’s differentiated wage payment method.) 

Ans. इस प्रणाली के अन्तर्गत यहाँ अच्छे श्रमिकों को प्रोत्साहित किया जाता है, वहीं श्रमिकों को दण्डित किया जाता है। इस प्रणाली के अन्तर्गत प्रत्येक कार्य के लिए प्रमापित सम निर्धारित कर दिया जाता है तथा कार्यानुसार मजदूरी की दो दरें निर्धारित कर दी जाती हैं। यदि कोई श्रमिक निर्धारित कार्य को प्रभापित समय में पूरा कर लेता है तो उसे अधिक दूर से और यदि कोई श्रमिक उस समय में कार्य पूरा न कर सके तो उसे कम दर से मजदूरी दी जाती है

इन दोनों दरों में काफी अंतर होता है। 

गुण (Merit)— 

(i) यह प्रणाली सरल है, श्रमिक आसानी से मजदूरी की गणना कर सकते  

(ii) कुशल श्रमिकों को पर्याप्त प्रोत्साहन मिलता है। (iii) अकुशल श्रमिकों को दण्डित किया जाता है। 

दोष (Demerit) 

(i) इसमें न्यूनतम मजदूरी की गारंटी नहीं होती। 

(ii) श्रम संघ इसका विरोध करते हैं। 

(iii) कम कुशल श्रमिकों को बहुत हानि उठानी पड़ती है। 

(iv) दोनों दरों में अधिक अन्तर होने के कारण झगड़े होने का भय रहता है।

Q. 13. भर्ती एवं चयन में अन्तर बताइए। (What is the difference between recruitment and selection?)

Ans. भर्ती एवं चयन में निम्न अन्तर है-

भर्ती (Recruitment))चयन (Selection)
1. भर्ती एक सकारात्मक प्रक्रिया है। 1. चयन एक नकारात्मक प्रक्रिया है।
2.भर्ती के अन्तर्गत निम्न क्रियाएँ होती है-

(i) कर्मचारी से आवेदन पत्र मँगवाना।।
(ii) आवेदन पत्र की जाँच करना।
(iii) कर्मचारियों की नियुक्ति के लिए पहले कर्मचारियों की भर्ती की जाती है |
(iv) कर्मचारियों की भर्ती द्वारा भविष्य के लिए कर्मचारियों की खोज की जाती है तथा उन्हें रिक्त स्थानों के लिए आवेदन प्रार्थना पत्र देने के लिए अभिप्रेरित किया जाता है।
2 चयन प्रक्रिया के अन्तर्गत निम्नलिखित प्रक्रियाएँ शामिल हैं-

(i) प्रार्थनापत्रों को छाँटना।
(ii) प्रार्थना पत्रों को अपनी आवश्यकता के अनुसार चुनना।
(iii)कर्मचारियों के चयन का कार्य कर्मचारियों की भर्ती के बाद याद किया जाता है।
(iv) चयन में नौकरी के उम्मीदवारों को दो वर्गों में विभाजित किया जाता है—
(क) एक वे जिन्हें नौकरी दी जानी है,
(ख) दूसरे वे जिन्हें नौकरी नहीं दी जाती।

Q.14. एक अच्छी प्रेरणा पद्धति की कोई चार विशेषताओं की गणना कीजिए ।

(Give four characteristics of good wage payment method.)

Ans. अच्छी प्रेरणा पद्धति की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं-

1. कर्मचारियों द्वारा कार्य निष्पादन को सरल बनाने वाली होनी चाहिए।

2. कर्मचारियों को अभिप्रेरित व प्रोत्साहित करने वाली होनी चाहिए। 13. उत्पादन, समय की बचत तथा लागत में कमी को प्रेरित करने वाली होनी चाहिए।

4. प्रतिभावान कर्मचारियों को आगे बढ़ने के पर्याप्त अवसर प्रदान करने वाली होनी चाहिए। जिससे वे शीघ्र कम खर्चीली तथा श्रेष्ठ प्रदर्शन में वृद्धि कर सके।

Q. 15. कर्मचारियों की भर्ती के आन्तरिक स्रोतों के लाभ-हानियों की संक्षिप्त व्याख्या कीजिए। (Explain in brief the merits and demerits of internal sources of Re cruitment.)

Ans. लाभ (Merits) आन्तरिक स्रोत के द्वारा भर्ती के अपनाये जाने से निम्नलिखित लाभ होते हैं–

लाभ (Merits)

1. पदोन्नति का अवसर प्रदान करने से कर्मचारी संगठन के प्रति वफादार बनते हैं, अनुशासन में रहते हैं तथा कठोर परिश्रम करते हैं। इसके साथ-साथ वे कार्य सम्पादन में भी अधिक रुचि व कार्यक्षमता दिखाते हैं।

2. कर्मचारियों की योग्यता व क्षमता का उचित एवं सामाजिक मूल्यांकन होता रहता है। प्रबन्धकों को कर्मचारियों के संगठन में कार्यरत होने के कारण उनकी कार्य रुचि, कार्य व्यवहार, वफादारी के बारे में सही-सही पता रहता है।

3. कर्मचारियों का मनोबल ऊँचा रहता है क्योंकि यह विधि उनको पदोन्नति व सुरक्षा का अवसर प्रदान करती है।

4. आन्तरिक स्रोत द्वारा भर्ती न केवल वर्तमान कर्मचारियों पर अच्छा प्रभाव डालती है, वरन् संगठन की यह ख्याति भविष्य में कुशल एवं परिश्रमी व्यक्तियों को नौकरी के लिए आकर्षित ही नहीं बल्कि विवश करती है।

5. कर्मचारियों पर होने वाले प्रशिक्षण व्यय में कमी आती है क्योंकि संगठन में पहले से ही कार्य कर रहे व्यक्ति अनेक कार्य संचालन विधियों से पूर्व परिचित हो जाते हैं। 

दोष (Demerits ) 

1. कर्मचारियों की योग्यताओं व क्षमताओं के सामयिक मूल्यांकन का कार्य प्रवन्धकों पर एक अतिरिक्त भार व दुःखान्त जिम्मेदारी डालता है।

2. भूतकाल में प्रदर्शित की गई वफादारी इस बात का कोई आश्वासन नहीं होती है कि कर्मचारी उतना ही वफादार भविष्य में ही रहेगा।

3. वरिष्ठता (Seniority) के आधार पर की गई पदोन्नति में यह खतरा हो सकता है कि पदोन्नति व्यक्ति में आवश्यक शारीरिक व मानसिक योग्यता तथा क्षमता का अभाव हो।

4. नये रिक्त स्थानों के लिए उपलब्ध कर्मचारियों में पर्याप्त संख्या में कर्मचारी मिल जाएँगे, कोई गारण्टी नहीं होती है।

Q. 16. भर्ती के विभिन्न बाह्य स्रोतों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए। (Briefly describe the different external sources of Recruitment.)

Or, भर्ती के पाँच बाह्य स्रोत बताइए । (Give five external sources of Recruitment.)

Ans. भर्ती के बाह्य स्रोत (External sources of Recruitment) भर्ती के वाह्य स्रोत निम्न हैं-

1. विज्ञापन (Advertisment ) – अखवार व पत्रिकाओं में विज्ञापन के माध्यम से दूर-दूर से एवं सभी प्रकार के विशेषकर कुशल एवं शिक्षित व्यक्तियों को आकर्षित किया जा सकता है। इस विधि से भर्ती में पक्षपात के अवसर कम हो जाते हैं। मगर बहुत अधिक आवेदन-पत्रों की प्राप्ति व्यवस्थापकों के लिए एक सिरदर्द बन जाती है। 

2. रोजगार कार्यालय (Employment Exchange ) — जो श्रमिक कार्य की तलाश में रहते हैं वे अपने नाम रोजगार कार्यालय में लिखा देते हैं। कम्पनी इन रोजगार कार्यालयों से सम्पर्क स्थापित करके अपने लिए श्रमिकों की पूर्ति कर सकती है। 

3. शिक्षण संस्थाएँ (Educational Institutions ) — विद्यालयों और डिग्री कॉलेजों सम्पर्क स्थापित करके कम्पनी अपने यहाँ के खाली स्थानों की पूर्ति कर सकती है।

4. वर्तमान कर्मचारियों की सिफारिश (Approach of Present Employees) – कभी-कभी वर्तमान कर्मचारियों की सिफारिश पर कर्मचारियों को नियुक्त किया जा सकता है। 

5. श्रम संघ (Trade Unions)—– श्रम संघों के द्वारा श्रमिकों की भर्ती की जा सकती है। श्रम संघ बेरोजगार श्रमिकों का लेखा अपने यहाँ रखते हैं और किसी भी संस्था से रिक्त स्थान की सूचना मिलते ही श्रमिकों को वहाँ भेज देते हैं।

6. अन्य कम्पनियों से परस्पर सम्पर्क द्वारा भर्ती (Recruitment throughm contact)—कभी-कभी अन्य कम्पनियों से सम्पर्क करके यहाँ से कर्मचारियों की भर्ती की है। इसके लिए आवश्यक है कि दोनों कम्पनियों के कर्मचारी विभागों के बीच सहयोग 

7. विशिष्ट संस्थाएं (Special Institutions)— कुछ व्यावसायिक संस्थाएं अपने का, जिन्हें नौकरी की आवश्यकता है अपने यहाँ रजिस्टर्ड रखते हैं। उनको सूचित करके आयोग्यता तथा अनुभव के कर्मचारी उपलब्ध हो सकते हैं। 

8. वर्तमान कर्मचारियों के मित्रगण एवं रिश्तेदार (Friends and Relatives Present Employees ) वर्तमान कर्मचारियों के मित्र एवं परिवार के सदस्य में से यदि ५ आवश्यक योग्यता रखते हो तो श्रम शक्ति की पूर्ति की जा सकती है।

9. अनियमित आवेदन पत्र (Irregular Applications) अनेक स्थानीय एवं प्रतिभा व्यक्ति स्वयं औद्योगिक संस्थाओं से सम्पर्क करते हैं। अपने बारे में लिखित और साक्षात्कार क मौखिक जानकारी देते हैं। यदि संस्था को इनकी कभी आवश्यकता पड़ती है तो इनसे स स्थापित करके इनको भर्ती कर लेते हैं।

10. प्रत्यक्ष भर्ती या कारखाने के दरवाजे पर भर्ती (Direct Recruitment of Recruitment at Factory gate ) —यह भर्ती सामान्यतः श्रम अधिकारियों द्वारा की जाती। किसी सूचना द्वारा मजदूरों को कारखाने के दरवाजे पर बुला लिया जाता है या दैनिक प्रथा पर मजदूर स्वयं कारखाने के दरवाजे पर एकत्रित हो जाते हैं। यह भर्ती प्रार्थना-पत्र के आफ पर साक्षात्कार (Interview) द्वारा लिखित परीक्षा के आधार पर की जा सकती है। 

Q. 17. चुनाव व भर्ती में अन्तर स्पष्ट कीजिए । (Distinguish between Selection and Recruitment.) 

Ans. चुनाव व भर्ती में अन्तर चुनाव एवं भर्ती में निम्नलिखित अंतर-

चुनाव (Selection)भर्ती (Recruitment)
1. चुनाव का कार्य बाद में किया जाता है।1. भर्ती का कार्य पहले किया जाता है।
2.भर्ती का उद्देश्य चुनाव करना होता है।2. भर्ती चुनाव में सहायक होती है।
3. आवेदन-पत्रों को छाटना, उनमे से आवश्यकता के अनुसार कर्मचारियों का चयन चुनाव के अन्तर्गत आता है।3. आवेदन-पत्र माँगना, प्राप्त करना भर्ती के अधीन होता है।
4. चुनाव का आशय इस किया से है जिसमें नौकरी के लिए प्रार्थियों को दो वर्गों में बाँटा जाता है—एक वे जिन्हें नौकरी दी जानी है।4. कर्मचारियों की भर्ती से आशय भविष्य के लिए कर्मचारियों की खोज करने और उन्हें रिक्त स्थानों के लिए आवेदन-पत्र देने के जिन्हें नौकरी नहीं दी जानी है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (LONG ANSWER TYPE QUESTIONS)


Q. 1. स्टाफिंग से आप क्या समझते हैं? इसकी प्रकृति की विवेचना कीजिए (What do you understand by staffing ? Explain its nature.)

Ans. स्टाफिंग का अर्थ (Meaning of Staffing) स्टाफिंग से आशय प्रशासन द्वारा निर्धारित नीतियों को लागू करने के लिए योग्य पदाधिकारियों की नियुक्ति, चुनाव, प्रशिक्षण पदोन्नति, पदावनति, स्थानांतरण सेवा समाप्ति आदि से सम्बन्धित नियम, सिद्धान्त तथा समस्याओं से है। स्टाफिंग की परिभाषा ( Definition of Staffing) –

1. पीटर ड्रकर (Peter Drucker) के अनुसार प्रबन्धक के प्रमुख रूप से तीन उत्तरदायित (Responsibilities) –

(i) प्रबन्ध कार्य (Managing Work), 

(ii) श्रमिकों का प्रबन्ध (Managing Workers), 

(iii) प्रायन्धिक प्रवन्ध (Managing Managers)

2. थियो हैमन (Theo Haimann) के अनुसार, “अधीनस्थ प्रबन्धकों की भर्ती, चुनाव, विकास, प्रशिक्षण, क्षतिपूर्ति आदि कार्य स्टाफिंग के अन्तर्गत आते हैं।”

3. कुण्ट्ज एवं ओ डोनेल (Koontz and O’Donnell) के अनुसार, “नियुक्ति के अन्तर्गत उपयुक्त तथा प्रभावी चुनाव, मूल्यांकन के द्वारा जनसंयोजन तथा व्यक्तियों का विकास करना है.

जिससे संगठन संरचना में नियोजित पदों को भरा जा सके 

4. बेंजामिन (Benjamin) के अनुसार, “नियुक्ति एक प्रक्रिया है जिसमें कार्य पर व्यक्ति का परिचय, नियुक्ति, मूल्यांकन तथा विकास सम्मिलित है।”

5. थियो हेमन (Theo Haimann) के अनुसार, “कर्मचारी नियुक्ति का कार्य प्रबन्धकों की भर्ती, चयन, विकास, प्रशिक्षण एवं क्षतिपूर्ति से सम्बन्ध रखता है।

6. बेहरीच एवं कुण्ट्ज (Weihrich and Koontz) के अनुसार, “प्रबन्धकीय कार्य में ‘नियुक्तियों’ के अन्तर्गत संगठनात्मक ढाँचे में विभिन्न पदों को भरना और उन्हें भरे रहने देना सम्मिलित है।”

प्रबन्ध पदाधिकारियों के विभिन्न रूप (Different Types of Management (Officers)—समस्त प्रबन्ध पदाधिकारियों को अधिकार या स्तर की दृष्टि से तीन भागों में बाँटा जा सकता है- 

1. वरिष्ठ प्रबन्ध अधिकारी (Senior Management Officers), 

2. कनिष्ठ प्रबन्ध अधिकारी (Junior Management Officers), 

3. फोरमैन स्तरीय अधिकारी (Foreman) उपर्युक्त वरिष्ठ अधिकारी से लेकर फोरमैन तक से सम्बन्धित समस्त क्रियाओं (नियुक्ति से लेकर सेवा समाप्ति तक) का अध्ययन स्टाफिंग के अन्तर्गत किया जाता है।

स्टाफिंग का महत्त्व (Importance of Staffing) — व्यावसायिक जटिलता के परिणामस्वरूप ‘स्टाफिंग’ का महत्त्व बढ़ता जा रहा है। आधुनिक प्रबन्धक तभी सफल हो सकता है जब वह पहले की तुलना में कई गुना चतुर, चौकन्ना, विवेकशील तथा ज्ञानवान हो किन्तु वह भी मानव होने के नाते सर्वगुण सम्पन्न नहीं हो सकता है तथा इस तकनीकी युग में कुशलतापूर्वक व्यवसाय को चलाना आसान कार्य नहीं है। फलस्वरूप आज एक प्रवन्धक को अपने कार्य के लिए अन्य कर्मचारियों से परामर्श लेना पड़ता है तथा सहायता प्राप्त करनी पड़ती है। जिस प्रकार एक लकड़ी मनुष्य को

चलने में सहारा देती है। ठीक उसी प्रकार कुशल कर्मचारी भी अपने विशिष्ट ज्ञान एवं परामर्श से स्टाफिंग कार्यों में सहायता पहुँचाते हैं।

स्टाफिंग का उत्तरदायित्व (Responsibility of Staffing )– स्टाफिंग के कार्य का कुशलतापूर्वक कार्यान्वयन (Execution) करने का उत्तरदायित्व प्रत्येक स्तर पर प्रत्येक प्रबन्धक पर होता है। संचालक मण्डल उच्च प्रबन्धक के चुनाव, विकास और मूल्यांकन करके स्टाफिंग कार्य को करता है। इसके बाद उच्च प्रबन्धक स्टाफिंग कार्यों को सम्पन्न करने के लिए विभागीय और

अन्य प्रबन्धकों की नियुक्ति करता है। एक प्रबन्धक अपने विभाग में स्टाफिंग प्रक्रिया में विशेष रुचि दो कारणों से लेता है-

1. प्रबन्धक का यह प्रयत्न होता है कि वह अपने विभाग का कार्य अपने अधीनस्थों की सहायता से कुशलतापूर्वक कर सके ।

2. भिन्न-भिन्न स्तर पर कार्य करने वाले प्रबन्ध अधिकारी अपने कार्य के साथ-साथ अपने उच्च अधिकारी के कार्यों को भी सीख लें, जिसमें इन उच्च अधिकारियों की पदोन्नति या रिटायर हो जाने पर वह उन कार्यों को कुशलतापूर्वक कर सकें।

स्टाफिंग कार्य छोटी संस्थाओं में बड़ी संस्थाओं की तुलना में सरल होता है तथा एक प्रबन्धक ही स्टाफिंग के समस्त कार्यों को पूरा कर लेता है। इसके विपरीत, बड़ी संस्थाओं में जहाँ भारी संख्या में कर्मचारी प्रत्येक वर्ष नियुक्त होते हैं, वहाँ स्टाफिंग कार्य अधिक जटिल होता है।

“उच्च प्रबन्धकों ने स्टाफिंग के कुछ कार्यों को अपने कर्तव्य की अवहेलना करते हुए कर्मचा प्रबन्ध (Personnel Management) को सीप दिए लेकिन न तो कर्मचारी प्रबन्ध और न अन् सेवा विभाग (Service Department) स्टाफिंग कार्यों का उत्तरदायित्व निभाने के लिए उचित स्थान | वर्तमान व्यावसायिक जटिलताओं के कारण स्टाफिंग कार्य का महत्व बढ़ गया है। इसलिए उ प्रबन्ध इन उत्तरदायित्वों को निभाने के लिये सजग हो गया है और स्टाफिंग कार्य के लिये अन्य कर्मचारियों से परामर्श तथा सहायता प्राप्त करता है।

नियुक्ति कार्य की प्रकृति (Nature of Staffing Function) अथवा नियुक्ति कार्य या स्टाफिंग की विशेषताएँ (Characteristics of Staffing ) नियुक्ति कार्य की प्रकृति एवं विशेषताएं निम्नलिखित हैं– 

1. स्टाफिंग / नियुक्ति एक अलग प्रबन्धकीय कार्य (Staffing is a Separate Mana gerial Function)—प्राचीन समय में स्टाफिंग को संगठन का ही एक अंग मानते थे, लेकिन आधुनिक समय में स्टाफिंग अलग से महत्त्वपूर्ण प्रबन्धकीय कार्य माना जाता है। स्टाफिंग के अन्तर्गत कर्मचारियों की नियुक्ति के लिए उन तरीकों तथा ज्ञान का प्रयोग होता है जिसको संगठन कार्य मैं लगे प्रयन्धकों द्वारा प्रयोग करना कठिन होगा। इसके अतिरिक्त स्टाफिंग के क्षेत्र में उपलब्ध ज्ञान एवं अभ्यास का पर्याप्त स्तर पर विकास हो गया है।

2. स्टाफिंग मानवीय व्यवहार से सम्बन्धित (Staffing Related to Human Behav. lour)—स्टाफिंग कार्य के अन्तर्गत मनुष्य (Human beings) आते है। इसकी विशेष जटिलताएँ हैं इसलिए प्रबन्धक स्टाफिंग के कार्यों में पूरी तरह सफल नहीं हो सकते। स्टाफिंग कार्य को तो स्टाफिंग विशेषज्ञ ही कर सकता है।

3. स्टाफिंग सभी स्तरों पर आवश्यक ( Staffing is essential at all Levels)— स्टाफिंग का कार्य प्रबन्ध संचालक (Managing Director) से प्रारम्भ होकर नीचे के स्तर तक यानी श्रमिकों की नियुक्ति तक जाता है।

4. सामाजिक दायित्व (Social Responsibility)—– स्टाफिंग कार्य में सामाजिक पहलू बहुत अधिक महत्त्वपूर्ण है। इस पहलू के अन्तर्गत भर्ती, प्रशिक्षण, विकास, वेतन, पदोन्नति, अभिप्रेरणा तथा बोनस आदि आते हैं। इसलिये स्टाफिंग प्रबन्धक का यह कर्त्तव्य है कि वह निष्पक्ष होकर यह सब कार्य करें।

5. मूल्यांकन (Appraisal)—– स्टाफिंगकर्त्ता को समय-समय पर कर्मचारियों का मूल्यांकन करते रहना चाहिये तथा यह कार्य भी निष्पक्षता से करना चाहिये।

Q. 2. नियुक्तिकरण प्रक्रिया का वर्णन कीजिए। (Discuss the process of Staffing.) 

Ans. नियुक्ति या स्टाफिंग पद्धति में निम्नलिखित प्रक्रिया अपनाई जाती है-

1. प्रबन्ध अधिकारियों की माँग का निर्धारण (Determination of Managerial Needs),

2. प्रबन्ध अधिकारियों की विशेषताओं का अनुमान (Presumption of Characteristics of Man-power),

3. पूर्ति का स्रोत (Sources of Supply )—

(i) आंतरिक (Internal), (ii) बाहरी (External)

4. साक्षात्कार, चुनाव और प्रशिक्षण (Interview, Selection and Training),

5. पारिश्रमिक तथा अभिप्रेरणा (Remuneration and Motivation),

6. प्रबन्धकीय अधिकारियों का मूल्यांकन तथा विकास (Appraisal and Development of Man-power)

1. प्रबन्ध अधिकारियों की मांग का निर्धारण (Determination of Managerial Needs)—– स्टाफिंग के लिए सर्वप्रथम कार्य यह है कि संस्था को भिन्न-भिन्न पदों के लिए कितने प्रबन्ध अधिकारी चाहिए और कब-कब चाहिए ? इसके लिए प्रबन्ध अधिकारियों की माँग की एक सूची (Inventory) तैयार की जाती है तथा भर्ती के लिए एक कार्यक्रम बनाया जाता है। 

प्रबन्ध अधिकारियों की माँग की सूची (Demand Schedule) बनाते समय संस्था की नियंत्रण क्षमता,

केन्द्रीकरण की नीति अधिकारियों की पदोन्नति तथा रिटायर होने वाले अधिकरियों की संख्या को श्री ध्यान में रखा जाता है।

2. प्रबन्ध अधिकारियों की विशेषताओं का अनुमान (Presumption of Characte ristics of Man-Power) स्टाफिंग के लिए दूसरा महत्त्वपूर्ण कार्य यह मालूम करने का है कि को किस प्रकार के प्रबन्धकों की आवश्यकता है ? संस्था में उपलब्ध प्रबन्ध पदों की क्या विशेषताएँ है तथा इन पर चुने जाने वाले व्यक्तियों में क्या-क्या विशेषताएँ होनी चाहिए। इसके उपक्रम लिए आवश्यक योग्यताओं एवं अनुभव की सूची (Schedule) तैयार की जाती है। 

3. पूर्ति के स्रोत (Sources of Supply ) – प्रबन्ध पदाधिकारियों की मांग को पूरा करने के मुख्यतः दो स्रोत हैं- 

1. आंतरिक 

2. बाह्य जब एक संस्था शुरू होती है तब समस्त प्रबन्धक स्रोतों से प्राप्त करने होते हैं।

4. साक्षात्कार, चुनाव और प्रशिक्षण (Interview, Selection and Training of Man-power)—साक्षात्कार एवं चुनाव का कार्य कार्मिक प्रबन्ध (Personnel Management) की सहायता से किया जा सकता है। प्रबन्ध अधिकारियों के साक्षात्कार तथा चुनाव की विधि भी लगभग वैसी ही होती है जैसी सामान्य कर्मचारियों के साक्षात्कार तथा चुनाव की कार्यविधि होती है।  

प्रशिक्षण की आवश्यकता प्रबन्धकीय-प्रशिक्षण का मुख्य उद्देश्य संस्था में विद्यमान प्रबन्ध अधिकारियों को इस योग्य केवल नये प्रबन्ध अधिकारियों के लिए ही नहीं है अपितु पुराने-

1. फोरमैन 2. सहायक प्रबन्धको 1 तथा 3. उच्च प्रबन्धकों के लिए भी जरूरी है। 

1. कुशल प्रबन्धकों की कमी है। 

2. कुछ प्रबन्धकों को सैद्धान्तिक ज्ञान तो काफी होता । किन्तु व्यावहारिक ज्ञान की कमी होती है। 

3. संस्था की गतिविधियों का सामना करने के 

4. गलाकाट प्रतियोगिता का सामना करने के लिए। 

5. संस्था के संगठनात्मक कलेवर में परि लाने के लिए। 6. प्रबन्ध क्षमता में वृद्धि करने के लिए। 

7. प्रबन्धकीय नियन्त्रण की नई विधि का ज्ञान कराने के लिए। 

8. नई-नई मंडियों की खोज के लिए।

प्रबन्ध अधिकारियों को प्रशिक्षित करने के प्रमुख रूप से दो तरीके हैं-

(i) अनुभव द्वारा प्रशिक्षण, तथा (ii) औपचारिक प्रशिक्षण।

(i) अनुभव द्वारा प्रशिक्षण के अन्तर्गत प्रशिक्षणार्थी को कार्यभार सौंपकर प्र करना, सहायक अधिकारियों को वरिष्ठ अधिकारियों के साथ नियोजित करके उनके साथ विद्यार विमर्श कराके प्रशिक्षण प्रदान किया जाता है। (ii) औपचारिक प्रशिक्षण — विशिष्ट अध्ययन पाठ्यक्रमों की व्यवस्था करके, सहायक को बनाकर, विचार गोष्ठियों के द्वारा तथा संस्था के अन्दर ही कक्षायें खोलकर प्रशिक्षण दिय जाता है।

Q. 3. कर्मचारियों की भर्ती से आप क्या समझते हैं ? इसकी प्रक्रिया की विवेचना कीजिए। (What do you understand by Employees Recruitment ? Ex- plain its process.)

Ans. श्रमिकों का महत्त्व (Importance of Workers ) — उर्विक (Urwick) के शब्दों में—”दीर्घकाल में व्यवसाय बाजार या पूँजी पेटेन्ट या साज-सामान द्वारा बनाये-बिगाड़े नहीं जाते बल्कि मनुष्य द्वारा बनाये या बिगाड़े जाते हैं।”

इसी प्रकार एक विद्वान ने कहा है कि कम्पनी का भविष्य, आदमी व औरतों, जो संगठन बनाते हैं, पर आधारित होता है। इसलिये हम उनको उचित चुनाव, प्रशिक्षण तथा पदोन्नति पर पर्याप्त ध्यान देते हैं। यह बात सत्य है क्योंकि श्रेष्ठ मानवीय साधन एक व्यसावसायिक संस्था के लिए अमूल्य सम्पत्ति होती है तथा इन्हें कोई भी अन्य वस्तु स्थानापन्न नहीं कर सकती है। 

इसलिए यह कहन गलत नहीं होगा कि प्रत्येक व्यावसायिक संस्था में कोई भी अन्य कार्य इतना महत्त्वपूर्ण नहीं होता जितना कि मानवीय साधनों का चुनाव व प्रशिक्षण। वर्तमान समय में यह तथ्य स्पष्ट हो पु है तथा व्यावसायिक संस्थानों ने इन कार्यों की ओर पर्याप्त ध्यान देना शुरू कर दिया है। 

भर्ती का अर्थ (Meaning of Recruitment) भर्ती से अभिप्राय, संगठन में स्थापित विभिन्न पदों के मरने के लिए कर्मचारियों को उपलब्ध कराना है। संस्था की कर्मचारियों से सम्बन्धित आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर उसके लिए उचित कर्मचारियों को खोजना, उनको सूचित करना तथा उनके प्रार्थना पत्रों की जाँच-पड़ताल करके उनमें से योग्य एवं अनुभवी उम्मीदवारों का चुनाव मता कहलाता है।

भर्ती की परिभाषाएं (Definitions of Recruitment)-

1. फिलिप्पों के अनुसार, “भर्ती का अर्थ भावी कर्मचारियों को खोजने एवं उन्हें संगठन में रिक्त पदों के लिए आवेदन करने हेतु प्रोत्साहित करने की प्रक्रिया से है।” (Recruitment is the process of searching for prospective employees and stimulating them to apply for jobs in organisation.)

2. डेल्टन ई. मैक्फारलैंड के अनुसार, “यह संभावित कर्मचारियों को कम्पनी की ओर आकर्षित करने की प्रक्रिया है।” (It is the process of attracting potential employees to the company.)

3. डेल एस. बीच (Dale S. Beach) के अनुसार, “पर्याप्त मात्रा में मानव शक्ति स्रोतों को बनाये रखना तथा विकास करना भर्ती कहलाती है। भर्ती के अन्तर्गत उपलब्ध कर्मचारियों का एक पुल स्थापित करना होता है जिससे संगठन अतिरिक्त कर्मचारियों को आवश्यकता पड़ने पर यहाँ से उन्हें प्राप्त कर सके।”

भर्ती एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा भावी कर्मचारियों की खोज की जाती है और उन्हें संगठन में आवेदन करने के लिए प्रोत्साहन किया जाता है। यह आवश्यक है कि प्रत्येक संस्था को प्रगति के लिए पर्याप्त संख्या में आवश्यक योग्यता वाले कर्मचारी हो।

भर्ती की नीति (Recruitment Policy) एक उत्तम भर्ती नीति निम्नलिखित बातों पर आधारित होती है-

1. कर्मचारियों की भर्ती संस्था के एक केन्द्रीय स्थान पर की जानी चाहिए।

2.भर्ती की नीति स्पष्ट एवं व्यापक होनी चाहिए। 

3. भर्ती नीति लोचदार होनी चाहिए। 

4.भर्ती, संगठन की चालू आवश्यकताओं के अनुसार हो।

5. किसी नये पद के नियुक्ति हेतु किसी उत्तरदायी अधिकारी की स्वीकृति होनी चाहिए। 

6. मर्ती के समय संस्था की ओर से किसी प्रकार का कोई आश्वासन लिखित या मौखिक नहीं दिया जाना चाहिए।

7. भर्ती योग्यता के आधार पर की जानी चाहिए।

8. भर्ती से पूर्व कार्य-विश्लेषण कर लेना चाहिए।

9. भर्ती से स्रोतों को ध्यान में रख कर उनका पूरी तरह सदुपयोग किया जाना चाहिए।

कर्मचारी भर्ती प्रक्रिया (Process of Recruitment of Employees ) – प्राचीन समय में प्रायः श्रमिकों के चुनाव के लिए कोई व्यवस्थित पद्धति प्रयोग नहीं की जाती थी। श्रमिकों व अन्य कर्मचारियों को शारीरिक व मानसिक रूप से ही ठीक देखकर उनका चुनाव कर लिया जाता था। आधुनिक समय में, जैसा कि श्रमिकों व कर्मचारियों के उचित चुनाव व प्रशिक्षण का महत्त्व स्पष्ट हो चुका है, उनके चुनाव के लिए एक व्यवस्थित तथा विस्तृत विधि का प्रयोग किया जाता है।

नियुक्ति प्रक्रिया को निम्न रूप में स्पष्ट किया जा सकता है-

I. माँग के स्रोत (Sources of Demand )—सर्वप्रथम प्रबन्धकों को यह निश्चित करना होता है कि संस्था के लिए कैसे तथा कितने कर्मचारियों की आवश्यकता है? इसके लिए जब एक संस्था आरम्भ होती है तब कार्यभार तथा कार्य दल विश्लेषण (Work load work force analysis) किया जाता है। 

माँग को पूरा करने के लिए मुख्यतः दो स्रोत है— (i) आन्तरिक (Internal), (ii) बाह्य (External) जब एक संस्था शुरू होती है तब समस्त कर्मचारी बाह्य स्रोतों से प्राप्त करने होते हैं। इ रोजगार कार्यालय, श्रम संप, शिक्षा संप, शिक्षा संस्थायें, अन्य संस्थाओं के कर्मचारी आदि आते हैं। जब संस्था शुरू हो जाती है तब किसी कार्य के लिए संस्था के वर्तमान कर्मचारियों में से ही किन एक की पदोन्नति की जा सकती है या उच्च पद दिया जा सकता है। लगभग सभी संस्थायें दोन ही स्रोतों से चुनाव का प्रयोग करती हैं।

अधिकतर यह निश्चित कर लिया जाता है कि सभी रिक स्थानों का एक निश्चित प्रतिशत आवश्यक रूप से आन्तरिक स्रोतों से पूरा किया जायेगा। कुछ संस्थाये तो यह निश्चित कर लेती हैं कि जब जानतरिक स्रोतों से योग्य व्यक्ति प्राप्त हो, या स्रोतों की ओर ध्यान ही नहीं दिया जायेगा। दोनों ही तरह के स्रोतों से उचित कर्मचारियों क चुनाव करना होता है। आन्तरिक स्रोतों में से चुनाव के लिए योग्यता अंकन (Merit Rating

की सहायता ली जाती है जबकि बाह्य स्रोतों से चुनाव के लिए विस्तृत विधि प्रयोग की जाती है। बाह्य (External) श्रम शक्ति की पूर्ति के स्रोत निम्नलिखित है-

1. रोजगार कार्यालय – जो श्रमिक काम की तलाश में रहते हैं, वे अपना नाम रोजगा कार्यालयों में लिखा देते हैं। कम्पनी इन रोजगार कार्यालयों से सम्पर्क स्थापित करके अपने श्रमिकों की पूर्ति कर सकती है।

2. शिक्षण संस्थायें विद्यालयों और डिग्री कॉलेजों से सम्पर्क स्थापित करके कम्पनी अपने है। यहाँ के खाली स्थानों की पूर्ति कर सकती

3. वर्तमान कर्मचारी की सिफारिश—कभी-कभी वर्तमान कर्मचारियों की सिफारिश कर्मचारियों को नियुक्त किया जा सकता है।

4. अमसंघ श्रमसंघों के द्वारा श्रमिकों की भर्ती की जा सकती है। श्रम संघ बेरोजगार का लेखा अपने यहाँ रखते हैं और किसी भी संस्था से रिक्त स्थान की सूचना मिलते ही श्रमिकों को यहाँ भेज देते हैं।

5. अन्य संस्थाओं के कर्मचारी—कभी-कभी अन्य संस्थानों से सम्पर्क करके वहाँ से कर्मचारियों की भर्ती की जाती है। इसके लिए यह आवश्यक है कि दोनों कम्पनियों के कर्मचारी विभागों के बीच सहयोग हो ।

6. विशिष्ट संस्थायें— कुछ व्यावसायिक संस्थायें अपने सदस्यों का (जिन्हें नौकरी की आवश्यकता है अपने यहाँ रजिस्टर्ड रखते हैं उन्हें सूचित करके साक्षात्कार में बुलाकर आवश्यक यता तथा अनुभव के कर्मचारी उपलब्ध हो सकते हैं।

7. संगठन में से ही पदोन्नति करके —यदि संस्था में योग्य कर्मचारी उपलब्ध हो तो उनकी करके उन्हें नये पद पर नियुक्त किया जा सकता है। इससे कर्मचारियों का मनोबल ऊँचा रहता है।

8. स्थानान्तरण करके कम्पनी के कई विभाग होते हैं यदि उनमें से किसी विभाग में कर्मचारियों का अधिकतम (Surplus) हो तो उनकी यहाँ से आवश्यकता के स्थान पर स्थानान्तरित किया जा सकता है।

9. भूतपूर्व कर्मचारी – यदि कोई भूतपूर्व, परन्तु आवश्यक योग्यता रखने वाले कर्मचारी की किसी कारण से छँटनी कर दी गई थी, लेकिन वह काम पर वापस आना चाहता है तो उसकी की नियुक्ति की जा सकती है। 

10. वर्तमान कर्मचारियों के मित्रगण एवं रिश्तेदार वर्तमान कर्मचारियों के मित्र एवं परिवार

Q. 4. कर्मचारियों के चयन में आप किस कार्यविधि को अपनाएंगे ? प्रत्येक चरण का संक्षेप में विवेचन कीजिए। (What Steps are involved in the selection procedure of employees? Ex- plain them breifly.)

Or, एक अच्छी चुनाव नीति की क्या विशेषताएँ हैं ? कर्मचारियों की भर्ती एवं चयन में क्या अन्तर है ?

(What are the characteristics of a sound selection distinctions between selection and recruitment ?)

policy? What are the Or, भर्ती एवं चयन में अन्तर स्पष्ट करें। चयन प्रक्रिया के विभिन्न चरणों का वर्णन कीजिए (Difference between recruitment and selection. Describe the steps involved in the selection process.)

Ans. चुनाव प्रक्रिया (Selection Process) – एक देश में जहां कर्मचारियों की मांग की अपेक्षाकृत कर्मचारी बाजार में कम प्राप्त होते हैं वहाँ चुनाव की समस्या नहीं उठती क्योंकि जो भी

आयेगा सभी का चुनाव कर लिया जायेगा, परन्तु जहाँ एक रिक्त स्थान के लिए हजार प्रार्थना-पत्र जाते हैं वहाँ अधिकतम कार्यकुशल कर्मचारी का चुनाव करने की समस्या होती है। चुनाव करते समय संस्था की रोजगार नीति (Employment Policy) को अच्छी समझना अनिवार्य है। 

कर्मचारी चुनाव का कार्य बहुत महत्त्व रखता है क्योंकि प्रबन्ध के द्वारा श्रमिकों से सम्बन्धित जिन समस्याओं का सामना करना पड़ता है उनमें से अधिकतर समस्यायें श्रमिकों के गलत चुनाव के कारण पैदा होती है। चुनाव का अर्थ केवल यह नहीं है कि एक विशेष कार्य (Job) के लिए निर्धारित योग्यता

त्याला व्यक्ति चुनकर नियुक्त कर दिया जाये। आदर्श चुनाव विधि का प्रभाव संस्था की अल्पकालिक और दीर्घकालिक समस्याओं पर पड़ता है। नया कर्मचारी न केवल वर्तमान संस्था में स्थान ग्रहण

करने के योग्य हो अपितु संस्था की प्रगति में चार चाँद भी लगा सकता हो । चयन का अर्थ (Meaning of Selection ) चयन से आशय, आवेदकों की बड़ी संख्या में से विभिन्न परीक्षणों द्वारा योग्य प्रार्थियों को पूर्व-निर्धारित संख्या में चुने जाने से है।

चवन की परिभाषाएँ (Definitions of Selection)-

1. डेल पोडर के अनुसार, “चयन वह प्रक्रिया है जिसमें नौकरी के प्रार्थियों को दो वोट दिया जाता है-वे जिन्हें नौकरी दी जानी है और वे जिन्हें नहीं दी जानी है।” (Selecía is the process in which candidates for employment are divided in two classe those who to be offered employment and those who are not.) 

2. वेठरीच एवं कुण्ट्ज़ के अनुसार, “प्रबन्धकीय चयन, विभिन्न प्रार्थियों में से उस प्रार्थ चयन करना है जो पद के लिए आवश्यक योग्यताओं के आधार पर सर्वाधिक उपयुक्त हो (Selecting manager is choosing from among the candidates the one who be meets the position requirements.)

चयन प्रक्रिया के विभिन्न चरण (Steps involved in the Selection Process) सभी संस्थाओं में अलग-अलग चयन प्रक्रिया होती है। छोटी संस्थाओं में चयन प्रक्रिया संहि होती है जबकि बड़ी संस्थाओं में यह विस्तृत होती है। बड़ी संस्थाओं द्वारा अपनाई जाने चयन प्रक्रिया के मुख्य चरण निम्नलिखित है—

1. प्रारम्भिक साक्षात्कार (Initial Interview), 

2 रिक्ति का प्रार्थना-पत्र (Applicatio Blank), 

3. सन्दर्भ की जाँच (Reference Checking), 

4. मनोवैज्ञानिक परीक्षण (Psycho logical Test), 5. अन्तिम साक्षात्कार (Final Interview), 

6. सर्वेक्षक (अनुभाग अधिकार की स्वीकृति (Approval by Immediate Boss), 

7. डॉक्टरी जाँच (Medical Examinstion), 

8. अनुगमन (Induction)। 

आधुनिक समय में कर्मचारियों के चुनाव के लिए निम्नलिखित कार्य किये जाते हैं- 

1. कार्य विश्लेषण (Job Analysis) सर्वप्रथम विज्ञापन देने, प्रार्थना-पत्र तथा साक्षात्का तथा परीक्षण के लिए आवश्यक तथ्य एकत्र करने के लिए कार्य-विश्लेषण किया जाता है तथा का सम्बन्धी कार्य प्रमाप तथा कार्य विवरण एकत्र किये जाते है। कार्य विवरण में कार्य, कार्य में प्रयोग से जाने वाली सामग्री तथा यन्त्रों का विस्तृत विवरण होता है तथा कार्य प्रमाप इन कार्यों को करने से लिए आवश्यक योग्यताओं की सूची होती है। इन दोनों की चुनाव पद्धति में आवश्यकता पड़ती है

2. विज्ञापन (Advertisement) कार्य-विश्लेषण के आधार पर विज्ञापन तैयार किए जाता है जिसमें आवश्यक योग्यताओं, वेतन आदि का उल्लेख होता है। 

3. प्रारम्भिक साक्षात्कार (Preliminary Interview) हमारे देश में बहुत कम संस्थ मैं इसका प्रयोग करती हैं। विज्ञापन को देखने के बाद प्रार्थना पत्र फानों की माँग की जाती है ज अधिकांशतः डाक द्वारा भेज दिये जाते हैं। कुछ संस्थायें डाक द्वारा फार्म न भेजकर कार्यालय ने फार्म व्यक्तिगत रूप में देने की व्यवस्था करती है तथा फार्म देते समय फार्म लेने वाले व्यक्ति की प्रारम्भिक जाँच करती है। 

4. प्रार्थना पत्र ब्लॅक (Application Blank )—प्रत्येक संस्था ऐसे प्रार्थना पत्रों के प्रयोग करती है जो प्रार्थना-पत्र भेजने वाले को अनिवार्य रूप से प्रयोग करना पड़ता है। ऐन इसलिए किया जाता है कि प्रार्थी से सम्बन्धित प्रत्येक आवश्यक जानकारी व्यवस्थित रूप से प्र हो सके। 

5. संदर्भ (References)—अधिकांशतः प्रार्थना-पत्रों में दो या दो से अधिक उत्तरद व्यक्तियों के परी माँगे जाते हैं जो प्रार्थी को जानते हों। ये उसके पुराने प्रबन्धक हो सकते हैं , 

6. मनोवैज्ञानिक परीक्षा (Psychological Test) प्रार्थना-पत्रों में पाये गये उपयुक्त व्यक्तियों की जांच हेतु बुलाया जाता है तथा लिखित परीक्षा ली जाती है | 

7. चयन साक्षात्कार (Selection Interview ) – शायद ही कोई कम्पनी या संस्था ऐसी हो जो कर्मचारियों के चुनाव में साक्षात्कार का प्रयोग न करती हो। यह चुनाव की सबसे प्राचीन विधि होने के साथ-साथ सर्वमान्य है। एक व्यक्ति या कुछ व्यक्तियों का बोर्ड बनाया जाता है जो साक्षात्कार लेता है। अधिकांशतः बोर्ड द्वारा ही ऐसा साक्षात्कार लिया जाता है क्योंकि इसी से अलग-अलग क्षेत्रों के विशेषज्ञों के साथ उस पद के उच्चाधिकारी भी सम्मिलित रहते हैं।

8. अनुभाग अधिकारी की स्वीकृति (Approved by Supervisor ) —— प्रत्येक अवस्था में अनुभाग अधिकारी की इच्छा को चुनाव करते समय ध्यान में रखा जाना चाहिए क्योंकि उसी ने उस कर्मचारी से काम लेना होता है। यदि बोर्ड में अनुभाव अधिकारी को बैठाया गया है तब अन्तिम फैसला करने का अधिकार उसका होना चाहिए। यदि बोर्ड में उसे नहीं लिया गया है तो साक्षात्कार के बाद भी अन्तिम फैसला करने का उसे अधिकार होना चाहिए।

9. डॉक्टरी परीक्षा (Medical Examination)- अनुभाग अधिकारी की सलाह प्राप्त होने के पश्चात् कर्मचारियों की योग्यता डॉक्टरों से जाँच करवाई जाती है या उन्हें योग्य डॉक्टर का प्रमाण-पत्र लाने को कहा जाता है। ऐसा इसलिए किया जाता है कि संस्था में कमजोर तथा बीमार रहने वाले व्यक्तियों की अपेक्षा स्वस्थ कर्मचारी आयें।’ 

10. अनुगमन (Induction) डॉक्टरी जाँच के पश्चात् प्रार्थी को उसके पद पर लगाया जाता है। जब वह अपनी जगह पर आता है तो नये-नये साथी एवं प्रबन्धक मिलते हैं। उसे नये कार्य एवं अवस्थाओं का सामना करना पड़ता है। 

Q.5. कर्मचारियों की नियुक्ति से क्या तात्पर्य है ? इसके कार्यों को स्पष्ट कीजिये (What is appointment of employees ? Explain its functions.)

Ans. कर्मचारियों की नियुक्ति (Appointment or Recruitment of Employ- ets)—– नियुक्ति वह प्रक्रिया है जिसके अंतर्गत कोई प्रबंधक संस्था के अंदर विभिन्न पदों का उत्तरदायित्व संभालने के लिए व्यक्तियों का चुनाव करता है तथा आवश्यकतानुसार प्रशिक्षण आदि ही व्यवस्था करता है। 

नियुक्ति का कार्य बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। नियुक्तियों में कर्मचारियों का सही तथा प्रभावपूर्ण चुनाव करना, मूल्यांकन करना तथा विकास करना शामिल है। नियुक्ति का उद्देश्य कार्य की व्यक्ति से अनुरूपता बनाए रखना है क्योंकि इसके अभाव में किसी संगठन के उद्देश्य की पूर्ति नहीं हो सकती। कर्मचारी नियुक्ति की कुछ परिभाषाएँ आगे दी गई हैं- परिभाषा – “कर्मचारी नियुक्ति कार्य संतोष एवं संतुष्ट मानव शक्ति को प्राप्त करना एवं उसे बनाए रखने से संबंधित है।

“कर्मचारी नियुक्ति के अंतर्गत उपयुक्त एवं प्रभावी चयन एवं अंकन प्रक्रिया द्वारा जनसंयोजन करना तथा व्यक्तियों का विकास करना आता है, जिससे वह संगठन संरचना में अभिकल्पित भूमिका का निर्वाह कर सके।”

कर्मचारी नियुक्ति के कार्य (Functions of Appointment/Recruitment Policy)—

कर्मचारी नियुक्ति के प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं— (क) मानव शक्ति का निर्धारण (Determining Man power Recruitment )-

कर्मचारी नियुक्ति का सबसे पहला काम संगठन के ढांचे को ध्यान में रखते हुए मानव-शक्ति की आवश्यकताओं का निर्धारण करना है। प्रत्येक कार्य का विश्लेषण करके यह निश्चित किया जाता है कि किस पद के लिए किस योग्यता वाले नियुक्ति किए जाएँ।

(ख) मानव शक्ति का नियोजन (Planning Man power requirement ) — आवश्यकता निर्धारण करने के बाद इस बात का भी ध्यान रखा जाता है कि कितने और कब, कर्मचारी नियुक्त करने हैं। इसके लिए निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए- 

(i) वर्तमान कर्मचारियों की संख्या ।

(ii) वर्तमान कर्मचारियों में से साल रिटायर होने वाले कर्मचारियों की संख्या।

(ग) भर्ती और चुनाव (Requirement and Selection ) — मानव शक्ति का नियोजः। करने के पश्चात् उनका भर्ती के स्रोतों पर विचार किया जाता है। कर्मचारियों की भर्ती के दो स्रोत- 

(i) आन्तरिक स्रोत तथा (ii) बाह्य स्रोत ।

आंतरिक स्रोत से अभिप्राय संस्था में कार्य करने वाले कर्मचारियों में से कुछ कर्मचारियों के पदोन्नति देकर निम्न स्थानों को भरना है। आन्तरिक स्रोत से अभिप्राय संस्था में कार्य करने वाले कर्मचारियों में से कुछ कर्मचारियों को पदोन्नति देकर निम्न स्थानों को भरना है। 

आन्तरिक स्रोत से भर्ती करने के काम करने वाले कर्मचारियों के मनोबल में वृद्धि होती है तथा छोटे पदों के लिए अधिक योग्यता प्राप्त व्यक्ति उपलब्ध हो जाते हैं; परन्तु आन्तरिक स्रोतों का उपयोग सावधानी से करना चाहिए अन्यथा भाई-भतीजावाद पनप सकता है जिससे कर्मचारियों में असंतोष फैलता है। 

इसके विपरीत बाह्य स्रोत से अभिप्राय रिक्त स्थानों की पूर्ति के लिए संस्था के बाहर लोगों को आमंत्रित करना। भर्ती के स्रोत को निश्चित करने के बाद व्यक्तियों को चुनने का कार्य किया जाता है। इसके लिए लिखित साक्षात्कार आदि दिया जाता है। इस प्रकार से व्यक्तियों को चुनकर उनकी योग्यतानुसार उन्हें काम सौंप दिया जाता है। बहुत

(घ) प्रशिक्षण (Training) — कर्मचारियों की नियुक्ति के बाद उनके प्रशिक्षण का कार्य किया जाता है। प्रशिक्षण व्यवस्था करना कर्मचारी नियुक्ति का महत्त्वपूर्ण कार्य है। प्रशिक्षण के द्वारा कर्मचारियों के ज्ञान व कौशल में वृद्धि होती है। प्रशिक्षण कई प्रकार का होता है।

(ङ) मूल्यांकन (Evaluation)— कर्मचारी नियुक्तियों का एक अन्य कार्य कर्मचारियों का समय-समय मूल्यांकन करना है। मूल्यांकन करने से कर्मचारी सजग रहते हैं। मूल्यांकन से उनकी कुशलता को आँका जाता है। योग्य व्यक्तियों को उन्नति के अवसर दिए जा सकते हैं।

(च) वेतन का अन्य अनुलाभ (Salary and other Perks) कर्मचारी, नियुक्ति, कर्मचारियों का वेतन तथा अन्य अनुलाभों का निर्धारण उनकी योग्यता तथा पद के दायित्व के अनुसार करता है। वेतन तथा मजदूरी का दो विधियों से भुगतान किया जा सकता है।

(i) समयानुसार, (ii) कार्यानुसार ।

कर्मचारियों को पारिश्रमिक, वेतन तथा मजदूरी के तिरिक्त कर्मचारियों को अन्य सुविधाएँ आदि दी जानी चाहिए। जैसे—आवास सुविधा, रियायती मूल्य पर राशन, यात्रा पर किया जाने वाला खर्च आदि। इससे कर्मचारी संतुष्ट रहते हैं तथा उनका मनोबल बढ़ता है।

Q.6. कर्मचारियों को प्रशिक्षण देने का क्या महत्त्व है ? (What is the importance of training ?)

Or, प्रशिक्षण से आप क्या समझते हैं ? प्रशिक्षण देने का क्या महत्त्व है ? (What is the meaning of training ? Give its importance.)

Ans. प्रशिक्षण का अर्थ (Meaning of Training) कर्मचारी प्रशिक्षण से अभिप्राय है कर्मचारियों को काम करने के बारे में जानकारी देकर उसे अधिक कुशल बनाना। फिलिप्पो के शब्दों में “एक विशेष कार्य को करने के लिए कर्मचारी के ज्ञान व कुशलता में वृद्धि करने के कार्य को प्रशिक्षण कहते हैं।” डेल मोडर के शब्दों में, “प्रशिक्षण वह विधि है जिसके द्वारा श्रम शक्ति के द्वारा किए जाने वाले कार्य के योग्य बनाया जाता है।” प्रशिक्षण एक निरन्तर प्रक्रिया है। प्रशिक्षण न केवल नए कर्मचारियों को दिया जाता है, परन्तु पुराने तथा अनुभवी सफल कर्मचारियों को भी प्रशिक्षण दिया जाता है ताकि वे नई जिम्मेदारियों को सफलतापूर्वक निभा सकें।

प्रशिक्षण का महत्त्व (Importance of Training ) – प्रशिक्षण प्रबंध का एक महत्त्वपूर्ण आवश्यक कार्य है। इसका महत्त्व दिन-प्रतिदिन बढ़ रहा है। इसका कारण यह है कि दिन-प्रतिदिन उत्पादन विधि जटिल होती जा रही है। उत्पादन के नए-नए क्षेत्रों का आविष्कार हो रहा है तथा श्रमिकों के द्वारा की जाने वाली क्रियाएँ अधिक यांत्रिक होती जा रही हैं। प्रशिक्षण का महत्त्व अग्रलिखित तथ्यों से पता चलता है-

(क) उत्पादन में वृद्धि (Increase in production ) – प्रशिक्षण प्राप्त श्रमिक अपने काम के बारे में पूरी जानकारी प्राप्त कर लेता है तथा उसमें कार्य कुशलता बढ़ जाती है, जिसके फलस्वरूप उत्पादन में वृद्धि होती है तथा उत्पादन का स्तर ऊँचा हो जाता है।

(ख) माल तथा मशीनों का सही प्रयोग (Full Use of Men and machines ) – प्रशिक्षण प्राप्त कर्मचारी माल तथा मशीनों का सही प्रयोग करना सीख जाता है। जिससे मशीनों की टूट-फूट कम होती है तथा माल की चरबादी बहुत ही कम हो जाती है। 

(ग) कम देख-रेख की आवश्यकता (Less Supervision is required) प्रशिक्षण कर्मचारी अपने काम में प्रवीणता पर लेते हैं। अतः उनकी देख-रेख करने की आवश्यकता कम हो जाती है।

(घ) दुर्घटनाओं में कमी (Reductions in Accident) प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद कर्मचारी मशीनों के सही उपयोग के विषय में जानकारी प्राप्त कर लेते हैं जिसके फलस्वरूप दुर्घटनाओं की संभावना कम हो जाती है।

(ङ) उच्च मनोबल (High Moral) – प्रशिक्षण प्राप्त कर्मचारी का ज्ञान तथा अनुभव बढ़ता है तथा वह अच्छे ढंग से कार्य करता है। अच्छे ढंग से काम करने पर उसमें संतोष की भावना आती है, जिसके फलस्वरूप उसके मनोबल में बढ़ोतरी होती है।

(च) ग्रहणशीलता में वृद्धि ( Easy to adopt ) – प्रशिक्षित कर्मचारी करने के नए तथा आधुनिक तरीकों को आसानी से सीख लेता है। 

FAQs

Q.1. विकास का क्या तात्पर्य है ? 

Ans. विकास एक ऐसी नियोजित एवं संगठित प्रक्रिया है जिसके माध्यम से कर्मचारी संस्था का कार्य सुचारू रूप में पलाने के लिए पर्याप्त ज्ञान और कौशल अर्जित करते हैं। 

Q.2. समयानुसार मजदूरी प्रणाली क्या है ? (What is time rate wages.)

Ans. इस प्रणाली के अनुसार मजदूरों को निश्चित समय के अनुसार एक निश्चित द मगदूरी दी जाती है। अधिकार ठेका पर काम करने वाले मजदूरों को इस प्रकार की मजदूरी। जाती है, जो मजदूर जितना और जैसा कार्य करता है उसी के आधार पर उसे मजदूरी दी जाये।


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