NCERT Class 12 Business Studies Chapter 7 Notes in Hindi निर्देशन Pdf

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NCERT Class 12 Business Studies Chapter 7 Notes in Hindi निर्देशन Pdf


कक्षा | Class12th 
अध्याय | Chapter07
अध्याय का नाम | Chapter Nameनिर्देशन | DIRECTING
बोर्ड | Boardसभी हिंदी बोर्ड
किताब | Book एनसीईआरटी | NCERT
विषय | Subjectव्यवसाय अध्ययन | business studies
मध्यम | Medium हिंदी | HINDI
अध्ययन सामग्री | Study Materialsप्रश्न उत्तर | Question answer
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निर्देशन सारांश | Directing summary

पाठ की प्रमुख वाले निर्देशन का अर्थ संगठनात्मक अथवा उपक्रम के लक्ष्यों को करने के लिये मानवी प्रदर्शन करना है। वास्तव में, निर्देशन का कार्या कर्मचारियों का पथ-प्रदर्शन करना, उन्हें आवश्यक आदेश निर्देश देना, उनके कार्यों व कार्य का पर्यवेक्षण करना तथा निष्पादन अवधि में उठने वाली समस्याओं का निपटारा करना है, सा संगठनात्मक लक्ष्य एवं उद्देश्यों को प्राप्त किया जा सके।

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निर्देशन के विभिन्न महत्व हैं जैसे – 

1. कियाओं का प्रारंभ। 

2. प्रबन्ध के सभी स्तरों पर आपत्यक। 

3, समन्वय का आधार । 

4. अभिप्रेरण का साधन 

5. परिवर्तन की सुविधा। 

6. उपन को स्थापित्व।

निर्देशन के चार प्रमुख तत्व है-

1 अभिप्रेरण, 2, नेतृत्व, 3, संदेशवाहन, 4. पर्यवेक्षण।

पर्यवेक्षण से आशय कर्मचारियों को कार्य सीपने और यह देखने से है कि वे आदेशानुसार कार्य कर रहे हैं एवं उन पर नियंत्रण करने से है। पर्यवेक्षण का प्रबंध के क्षेत्र में विशेष महत्त्व है क्योंकि पर्यवेक्षण भौतिक संसाधनो का अच्छा उपयोग करता है तथा निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति के लिये मानवीय प्रयासों को निर्देशित करता है।

अभिप्रेरण का अर्थ उस प्रक्रिया से है जो किसी व्यक्ति में कार्य करने की उत्तेजना उत्पन्न करती है। अभिप्रेरण प्रबंध का मानवीय पहलू है। अभिप्रेरण प्रथय का एक महत्त्वपूर्ण कार्य है जो संस्था मे कार्यरत व्यक्तियों को निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति की और अभिप्रेरित करता है। इससे प्रबंध कार्य कुशलतापूर्वक होता है।

मैलो की आवश्यकता क्रमबद्धता की विचारधारा के अनुसार, “एक व्यक्ति की आवश्यकताएँ अनन्त होती है तथा उनमें क्रमबद्धता पाई जाती है। एक व्यक्ति में कार्य करने के प्रति रुचि एवं शक्ति उत्पन्न करने हेतु उनकी एक के बाद दूसरी आवश्यकताओं को क्रमबद्धता में संतुष्ट करना आवश्यक होता है। मनुष्य की प्रबल आवश्यकताओं की संतुष्टि कर अभिप्रेरित किया जा सकता है।” नेतृत्व से आशय किसी व्यक्ति के उस गुण से है जिसके आधार पर यह अनुयायियों के समूह

का मार्ग-प्रदर्शन करता है तथा नेता के रूप में उनकी क्रियाओं का संचालन करता है। प्रबंध के क्षेत्र में नेतृत्व की बड़ी महत्त्वपूर्ण भूमिका है। कोई भी संगठन चाहे वह कितना भी सुसज्जित क्यों नो नेतृत्व को आज तक प्रतिस्थापित नहीं कर सका। आज की परिवर्तित परिस्थितियों में चाहे संगठन आर्थिक हो, धार्मिक हो, सामाजिक हो, राजनीतिक हो अथवा आध्यात्मिक हो, सभी में नेतृत्व का सर्वाधिक महत्त्व है।

दो या दो से अधिक व्यक्तियों के मध्य विचारों तथ्यों, सम्मतियों अथवा भावनाओं का विनिमय संदेशवाहन कहलाता है। वास्तव में, संदेशवाहन एक सतत प्रक्रिया है जिसमें दो या दो से अधिक व्यक्ति अपने संदेशों, विचारों, भावनाओं, सम्मतियों तथा तकों आदि का पारस्परिक विनिमय करते है। संदेशवाहन आधुनिक व्यवसाय एवं प्रबंध की आधारशिला तथा जीवन-शक्ति है।


अति लघु उत्तरीय प्रश्न (VERY SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS)


Q.1. निर्देशन क्या है ? (What is Directing.) 

Ans. निर्देशन प्रबंधकीय कार्य है जो अधीनस्थों का पथ-प्रदर्शन करता है। इससे प्रबंध कार्य कुशलतापूर्वक होता है।

Q. 2. निर्देशन की परिभाषा दीजिए। (Define Direction.)

Ans. निर्देशन के अंतर्गत उन प्रक्रिया व तकनीकों का समावेश किया जाता है जिनका उपयोग आवेशों एवं निर्देशों को निर्गमित करने एवं यह देखने के लिए किया जाता है कि उपक्रम की सभी क्रियाएँ योजना अनुसार पूरी हो रही है या नहीं। 

निर्देशन का अर्थ (Meaning of Direction) अधीनस्थों को इस प्रकार प्रभावित अभिप्रेरित करना है कि वे संगठन के उद्देश्य की पूर्ति में स्वेच्छा से सम्पूर्ण योगदान दे।

Q.3. निर्देशन के मुख्य तत्त्व क्या हैं ? (What is the main elements of Direction ?)

Ans. निर्देशन के मुख्य तत्त्व निम्न हैं-

(i) पर्यवेक्षण (Supervision) 

(ii) अभिप्रेरण (Motivation) 

(iii) संदेशवाहन या संप्रेषण Communication) 

(iv) नेतृत्व (Leadership)

Q.4. निर्देशन के महत्त्व को बताएँ। (Explain the importance of Directing.)

Ans. निर्देशन के निम्नलिखित महत्त्व है—

1. नियोजन में आवश्यक,

2. क्रियाओं का प्रारंभ,

3. प्रबंध के सभी स्तरों पर आवश्यक,

4. समन्वय का आधार,

5. अभिप्रेरण का साधन,

6. परिवर्तन की सुविधा,

7. उपक्रम को स्थायित्व,

8. कर्मचारियों की कुशलता में वृद्धि।

Q.5. संदेशवाहन का प्रबंध में क्या महत्त्व है ? (What is the importance of communication in management ?

Ans. संदेशवाहन का प्रबंध में निम्नलिखित कारणों से बहुत महत्त्व है-

1. न्यूनतम व्यय पर अधिकतम उत्पादन के लिये स्वामी एवं प्रबंध और कर्मचारियों के बीच समय-समय पर पारस्परिक विचारों का आदान-प्रदान अनिवार्य है। 

2. शीघ्र से शीघ्र विचार-विमर्श करके निर्णय करने और उन्हें कार्यान्वित करने के लिये प्रभावी संदेशवाहन का होना आवश्यक है। 

3. विभागों के बीच समन्वय लाने के लिये संदेशवाहन आवश्यक है।

4. प्रभावपूर्ण नेतृत्व के लिये संदेशवाहन आवश्यक है। 

5. प्रभावपूर्ण संदेशवाहन के कारण प्रबंध में सहयोग एवं सहकारिता में वृद्धि होती है।

Q.6. संप्रेषण की परिभाषा दीजिए। (Define Communication.)

Ans. लूइस ऐलन के अनुसार, “संप्रेषण उन सभी तत्त्वों का योग है, जो एक व्यक्ति तब प्रयोग करता है जब वह दूसरे व्यक्ति के मस्तिष्क में समझ पैदा करना चाहता है। यह एक अर्थ का पुल है। इसमें करने, सुनने तथा समझने की व्यवस्थित तथा लगातार प्रक्रिया शामिल है।”

Q. 7. नेतृत्व की परिभाषा दीजिए। (Define Leadership.) 

Ans. कुण्ट्ज एवं ओ’डोनेल के शब्दों में, “नेतृत्व कला व्यक्तियों को प्रभावित करने की प्रक्रिया है जिससे वे स्वेच्छा तथा उत्साह से संगठनात्मक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करेंगे।”

Q. 8. नेतृत्व की विशेषताओं की गणना कीजिए (Enumerate the features of Leadership.)

Ans. (i) यह एक सतत प्रक्रिया है। 

(ii) इस गुण के द्वारा अधीनस्थों के एक समूह से वांछित कार्य स्वेच्छापूर्वक कराए जा सकते हैं।

(iii) यह परिस्थितियों और वातावरण पर निर्भर है। 

Q. 9. प्रबन्धक और नेता में अंतर बताइए।

Ans. प्रबंधक और नेता में अंतर- प्रथम प्रबंधक औपचारिक रूप से संगठन में होते हैं जबकि नेता संगठन के बाहर का भी हो सकता है। दूसरा प्रबंधकों का मुख्य ध्येय संगठन के उद्देश्य की प्रगति है जबकि नेता अपने अनुयायियों की अभावों एवं आकांक्षाओं से ही संबंध रखते हैं। 

तीसरा प्रबंधकों के पास बना हुआ अधिकार होता है जबकि नेता के पास अनुमोदित अधिकार होता है। अनुयायी उन्हें स्वतःपूर्वक निर्देशित एवं प्रशासित करने का अधिकार देते हैं। निश्चयपूर्वक जब प्रबंधक नेता के रूप में कार्य करते हैं तो उनके पास औपचारिक अधिकार प्राप्त होता है जो अधीनस्थ कर्मचारियों के विश्वास एवं आत्मविश्वास से निकलता है।

Q. 10. अभिप्रेरणा क्या है ? अभिप्रेरक कितने प्रकार के होते हैं ? ( What is Motivation ? How many types of incentives.)

Ans. “अभिप्रेरणा निश्चित कार्यों को प्राप्त करने हेतु स्वयं या किसी अन्य व्यक्तिको करने की किया है।”

अभिप्रेरक दो प्रकार के होते हैं— 

(i) मौद्रिक अभिप्रेरक (ii) अमौद्रिक अभिप्रेरक । 

Q. 11. मौद्रिक अभिप्रेरक क्या है ? (What is Financial incentives ? )

Ans. मौद्रिक अभिप्रेरक वे हैं जिनका मूल्यांकन प्रत्यक्ष रूप से मुद्रा से किया जा सकता है. ये प्रेरणाएँ कर्मचारियों की भौतिक एवं सामाजिक मान-सम्मान की आवश्यकताओं को पूरा करती है। इसके निम्न रूप हो सकते हैं— 

(i) वेतन व मजदूरी। 

(ii) बोनस । 

(iii) कमीशन। 

(iv) प्रीमिय

(v) वित्तीय लाभ-मुफ्त मकान, कान, नौकर आदि ।

Q. 12. अमौद्रिक अभिप्रेरणाएँ क्या होती हैं ? ( What is Non-financial Motivation ?)

Ans. इनका संबंध प्रत्यक्ष रूप से मुद्रा से नहीं होता है। मनुष्य की कई अवित्ती आवश्यकतायें होती हैं, जैसे—मानसिक शांति, सुरक्षा, पदोन्नति आदि। इन अभिप्रेरणाओं के निम रूप हैं— (i) स्पर्धा, (ii) सुरक्षा पद्धति, (iii) सराहना, (iv) विकास के अवसर, (v) कार्य के सुरक्षा, (vi) श्रम कल्याण की व्यवस्था ।

Q. 13. अभिप्रेरणा के तत्त्व बताइए। (Explain the factor of Motivation.) 

Ans. ये निम्नलिखित हैं— 

(i) सुरक्षा, 

(ii) प्रगति व उन्नति के अवसर, 

(iii) अपनत्व को भावना, 

(iv) मान्यता ।

Q. 14. अभिप्रेरणा देने के उपकरण बताइए। (Give the tools of Motivation.)

Ans. निम्न बातों से अभिप्रेरणा मिलती है— (i) वित्तीय अभिप्रेरणा, (ii) अवित्तीय अभिप्रेरणा। 

Q. 15. संगठनात्मक प्रबंध के आधार पर संप्रेषण के प्रकारों की गणना कीजिए। (Enumerate the type of communication on the basis of Organisation Relationship)

Ans. (i) औपचारिक संप्रेषण (ii) अनौपचारिक संप्रेषण।

Q. 16. संचार अथवा संप्रेषण की विशेषतायें बताइए । (Write the characteristics of Communication.)

Ans. संचार अथवा संप्रेषण की प्रमुख विशेषताएँ — 

(i) संचार व्यवस्था की रेखा यथासंभव प्रत्यक्ष और छोटी होनी चाहिए। 

(ii) इसका मार्ग निश्चित रूप से मालूम होना चाहिए। (iii) संप्रेषण की पूर्ण रेखा का प्रयोग किया जाए। 

(iv) संस्था के प्रत्येक कर्मचारी के लिए निश्चित औपचारिक संप्रेषण व्यवस्था होनी चाहिए। 

(v) संप्रेषण के प्रसारण केन्द्रों पर योग्य व्यक्ति हो ।

Q.17. सन्देशवाहन अथवा संप्रेषण की परिभाषा दीजिए। (Define Communication.) 

Ans. “संचार व्यवस्था शब्दों, पत्रों अथवा सूचना, विचारों तथा मतों का आदान-प्रदान करने का माध्यम है।”—फ्रेड जीमेयर

Q.18. एक प्रभावी संप्रेषण के मूलभूत तत्त्व बताइये (Write the factors of Effective Communication.)

Ans. तत्त्व निम्नलिखित हैं- (i) तत्त्व स्पष्ट, निश्चित व सरल होना चाहिये। (ii) जान-पहचान, यथोचित, विस्तृत संप्रेषण ढाँचा । (iii) अधिकारी व अधीनस्थों के बीच उच्चकोटि के संबंध। (iv) सप्रेषण के विभिन्न प्रकारों व तकनीकों का परिस्थिति के अनुसार प्रयोग (v) समय पर संप्रेषण प्रेरित करना।

Q. 19. निर्देशन की विशेषताओं की गणना कीजिए। (Enumerate the features of Supervision.)

Ans. 

(i) निर्देशन प्रबन्ध के प्रारंभिक कार्य तथा नियंत्रणात्मक कार्य के मध्य कड़ी का कार्य करता है। 

(ii) निर्देशन के उद्देश्य इसके स्वरूप के दर्शक है। 

(iii) यह एक सतत प्रक्रिया है।

(iv) इसका समय अधीनस्थों से होता है। 

(V) यह यह प्रक्रिया है जिसके चारों और समस्त निष्पादक धकर समाया है।

Q.20. निरीक्षण या पर्यवेक्षण का क्या अर्थ है ? ( What is the meaning of Supervision ?)

Ans. पर्यवेक्षण का अभिप्राय अपने अधीन कार्य करने वाले कर्मचारियों का काम को ढंग त करने के लिए प्रत्यक्ष तथा तुरंत मार्गदर्शन एवं नियंत्रण करना है। 


लघु उत्तरीय प्रश्न (SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS)


Q. 1. निर्देशन को परिभाषित कीजिए। (Define Directing.)

Ans. निर्देशन की प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित है- 1. थियो हैमेन (Theo Haimann ) — “निर्देशन के अन्तर्गत उस प्रक्रिया एवं तकनीकी को

सम्मिलित किया जाता है जिनका उपयोग आदेशों व निर्देशों को निर्गमित करने एवं यह देखने के लिए किया जाता है कि उपक्रम की समस्त क्रियाएँ योजनानुसार चल रही हैं अथवा नहीं। निर्देशन के चारों ओर समस्त निष्पादन घूमता है।”

2. डिमोक (Dimock) — “निर्देशन वास्तव में प्रशासन का हृदय है जिसके अन्तर्गत क्षेत्र का निर्धारण, आदेशों व निर्देशों को देना एवं गतिशील नेतृत्व प्रदान करना है।”

3. कूण्ट्ज एवं ओ’डोनेल (Koontz and O’Donnell) – “अधीनस्थों के मार्ग-दर्शन एवं पर्यवेक्षण का प्रवन्धकीय कार्य निर्देशन कहलाता है।”

Q2. निर्देशन के तत्त्व कौन-से हैं ? (What are the elements of Direction ?)

Ans. निर्देशन के चार तत्त्व निम्नलिखित हैं-

1. अभिप्रेरणा (Motivation ) व्यक्तियों को अच्छा, उत्साह तथा पहल भावना के साथ कार्य करने के लिये प्रोत्साहित करना।

2. नेतृत्व (Leadership )— प्रभावपूर्ण नेतृत्व व्यक्तियों में काम कराने के लिये जादुई असर करता है।

3. पर्यवेक्षण (Supervision ) — आशातीत परिणामों को प्राप्त करने तथा योजनानुसार तरीके से कार्य कराने की दिशा में सुपरवाइजर काम पर नजर रख कर प्रभावपूर्ण निष्पादन का रास्ता तैयार करता है। 

4. सन्देशवाहन (Communication)—– सन्देशवाहन निर्देशन का मूल बिन्दु है।

Q.3. निर्देशन के कार्य बतलाइए। (Explain the functions of Direction.) 

Ans. निर्देशन के कार्य (Functions of Direction ) — निर्देशन के प्रमुख कार्य निम्नलिखित

1. आदेश (Command)—— अधीनस्थ को आदेश देना निर्देशन का प्रमुख कार्य है। आदेश प्रायः नीचे से ऊपर की ओर सौपानिक श्रृंखला रूप (Scalar chain) में दिए जाते हैं।

2. पर्यवेक्षण (Supervision ) अधीनस्थ कर्मचारी आदेशानुसार कार्य कर रहे है या नहीं उसका सन्तोष प्राप्त करने के लिए, प्रबन्धक को उनके कार्यों का पर्यवेक्षण करना आवश्यक होता है।

3. मार्ग-दर्शन, व्याख्या एवं प्रशिक्षण (Guidance, Interpretation and Coaching आदेशों की समुचित व्यवस्था करना, नमूने के रूप में कार्य करके इसकी कार्य-विधि समझाना अधीनस्थों की त्रुटियों को उन्हीं के सामने ठीक करके उनका पथ-प्रदर्शन करना निर्देशक क होता है।

4. समन्वय (Co-ordination) एक औद्योगिक प्रतिष्ठान का प्रमुख उद्देश्य अधिकतम लाभ अर्जित करना है जबकि कर्मचारियों का उद्देश्य अधिकतम वेतन या अधिक लाभांश अर्थात बोनस प्राप्त करना तथा शीघ्रातिशीघ्र उच्च पदों को प्राप्त करना होता है। इस प्रकार के दोनो लक्ष्य परस्पर एक-दूसरे के विरोधी हैं। इसलिए निर्देशन की सफलता इन दोनों दृष्टिकोणों में पूर्ण रूप से सामंज स्थापित करने में ही निहित है।

Q.4. निर्देशन की प्रक्रिया को स्पष्ट कीजिए। (Clearify the process of Directing) 

Ans. निर्देशन एवं प्रक्रिया (Process of Directing)

1. लक्ष्य एवं उद्देश्यों की व्याख्या करना ( Defining the objectives) 

2. प्रयासों को संगठित करना (Organising the efforts)

3. कार्य का मापांकन (Measuring the work) 

4. व्यक्तियों को विकसित करना ( Developing the people) निर्देशन की प्रक्रिया को सुचारू बनाने के लिए कूण्ट्ज तथा ओ’डोनेल ने निर्देशन के कुछ

सिद्धान्तों को विकसित किया है जो इस प्रकार हैं-

1. लक्ष्यों के लिए व्यक्तिगत योगदान का सिद्धान्त-प्रबन्ध को इतना योग्य होना चाहिए कि वह श्रेष्ठ निष्पादन तक उनको अभिप्रेरित कर सके।

2. लक्ष्यों में सामंजस्य का सिद्धान्त-व्यक्तिगत लक्ष्यों को संगठन के उद्देश्यों में आत्मसात करना।

3. निर्देशन की कार्यक्षमता का सिद्धान्त-प्रभावी निर्देशन न्यूनतम लागत पर लक्ष्यों एवं उद्देश्यों की प्राप्ति की ओर अग्रसर करना।

4. आदेश की एकता का सिद्धान्त

5. प्रत्यक्ष अघीक्षण का सिद्धान्त – अधीक्षण तथा नियंत्रण की वस्तुनिष्ठ विधियों को प्रत्यक्ष व्यक्तिगत अधीक्षण के साथ मिलाकर चलाना । 

6. निर्देशन तकनीक के औचित्य का सिद्धान्त ।

7. प्रबन्धकीय सम्प्रेषण का सिद्धान्त ।

8. पूर्णता तथा व्यापकता का सिद्धान्त ।

9. सूचना का सिद्धान्त ।

10. अनौपचारिक संगठन के व्यूहात्मक प्रयोग का सिद्धान्त – प्रबन्धकों को अनौपचारिक संगठन की मान्यता देकर उसका अधिकतम रचनात्मक उपयोग करना चाहिए। 

11. नेतृत्व का सिद्धान्त ।

Q.5. निर्देशन के पाँच सिद्धान्त दीजिए। (Give five principles of Direction.)

Ans. निर्देशन के सिद्धान्त (Principles of Direction)— 

1. उद्देश्य की प्राप्ति में व्यक्तिगत सहयोग का सिद्धान्त (Principle of Individual Contribution to Objectives)—प्रबन्धकों को यह प्रयत्न करना चाहिए कि उनके अधीनस्य कर्मचारी सर्वोत्तम कुशलता से कार्य कर सकें।

2. उद्देश्य की मधुरता का सिद्धान्त (Principle of Harmony of Objective) प्रबन्धकों को प्रत्येक कर्मचारी के प्रति मधुर सम्बन्ध स्थापित करना चाहिए तथा संभावित संघर्ष को रोका जा सके।

3. निर्देशन का कुशलता का सिद्धान्त (Principle of Efficiency of Direction)- प्रभावशाली निर्देशन अपने उद्देश्य को न्यूनतम लागत पर प्राप्त कर सकता है।

4. आदेश की एकता का सिद्धान्त (Principle of Unity of Command) व्यावसायिक संगठन के अन्दर अधीनस्थ केवल एक ही स्रोत के प्रति उत्तरदायी हो और एक ही स्रोत से आदेश प्राप्त करे ताकि आदेशों में एकता हो सके ।

5. प्रत्यक्ष निरीक्षण का सिद्धान्त (Principle of Direct Supervision ) प्रवन्धकको जहाँ तक सम्भव हो स्वयं अधीनस्थों के कार्य का निरीक्षण करना चाहिए।

10. 6. पर्यवेक्षक के कार्यों का वर्णन कीजिए । (Explain the functions of Supervisor.)

Ans. पर्यवेक्षकों को कर्मचारियों से संबंधित कार्यों के बारे में स्वतन्त्र निर्णय लेने के अधिकार हते हैं। उसके प्रमुख कार्य निम्न हैं-

(क) कार्यों का नियोजन करना (Work Planning)- पर्यवेक्षक का प्रमुख कार्य नियोजन करना होता है, और वह विभिन्न कार्यों में प्राथमिक का क्रम निर्धारित करता है।

(ख) कार्य का बँटवारा (Partition of Work)—पर्यवेक्षक अपने अधीन कार्य करने वाले कर्मचारियों में काम का बँटवारा उनकी विशिष्टता और योग्यता के अनुसार करता है। इससे श्रमिकों की कार्यकुशलता में वृद्धि होती है।

(ग) प्रेरणा देना (Motivation)— अपने अधीन कर्मचारियों को अधिक रुचि एवं लगन से कार्य करने के लिए प्रोत्साहित करना और उनके मनोबल को बढ़ाना भी पर्यवेक्षक का प्रमुख कार्य है।

(घ) नियंत्रण करना (Controlling)– पर्यवेक्षक अपने विभाग की सभी क्रियाओं पर अपना पूरा नियंत्रण रखता है, जिससे निर्धारित उद्देश्य प्राप्त किए जा सकें।

(ङ) प्रशिक्षण तथा मार्गदर्शन (Training and Guidance) – पर्यवेक्षक अपने विभाग के सभी कर्मचारियों के लिए प्रशिक्षण की व्यवस्था करता है तथा उनकी कठिनाइयों और समस्याओं को दूर करने के लिए कर्मचारियों का मार्ग-दर्शन करता है। 

(च) उचित व्यवस्था करना (Proper Management )—– पर्यवेक्षक संस्था में सामग्री, मशीनों आदि की उचित व्यवस्था करता है तथा श्रमिकों को कार्य की समुचित सुविधाएँ उपलब्ध कराता है।

Q.7. अभिप्रेरणा के उपकरण क्या हैं ? (What are the tools of Motivation ?) 

Ans. अभिप्रेरणा देने के उपकरण (Tools of Motivation) मनुष्यों को अनेक बातों से अभिप्रेरणा मिलती है। इन्हें दो श्रेणियों में रखा जा सकता है- 1. वित्तीय तथा 2. अवित्तीय। 1. वित्तीय अभिप्रेरणा (Financial Motivation) मुद्रा का हमारे जीवन में बहुत महत्त्व है, यह सामाजिक स्तर का प्रतीक होती है। 

फेडरिक टेलर ने अभिप्रेरणा के लिए मौद्रिक प्रोत्साहन का वर्णन किया था। सामान्य उत्पादन से अधिक उत्पादन करने पर अतिरिक्त लाभ का कुछ भाग देने की विधि अपनायी गयी। इन प्रेरणाओं में कमीशन, बोनस, लाभ विभाजन, अंशस्वामित्व योजना आदि शामिल है।

यद्यपि यह सत्य है कि कर्मचारियों की आवश्यकताएँ मुद्रा के द्वारा पूर्ण की जाती हैं, परन्तु यह कहना कि यही मुख्य अभिप्रेरक शक्ति है, ठीक नहीं है। कई बार मुद्रा की अपेक्षा कर्मचारी अन्य बातों जैसे काम करने की दशा से भी प्रेरित होते हैं। भारतवर्ष में जहाँ बेरोजगारी और गरीबी बहुत है, अभी भी वित्तीय या मौद्रिक अभिप्रेरणा महत्त्वपूर्ण है।

2. अवित्तीय अभिप्रेरणाएँ (Non-Financial Motivation) ये वे प्रेरणाएँ हैं जिनका हैं जैसे -मानसिक शान्ति, सुरक्षा, पदोन्नति, कल्याण, सुविधाएँ, कार्य सन्तुष्टि, कार्य की प्रशंसा सम्बन्ध प्रत्यक्ष रूप से धन या मुद्रा से नहीं होता। मनुष्य की कई अवित्तीय आवश्यकताएँ होती आदि कार्यकाल या फैक्टरी की स्थिति भी प्रेरणा का कार्य करती है। 

यदि कार्यालय उपयुक्त स्थान पर है तथा इसकी साज-सज्जा आकर्षक है तो यह कर्मचारियों को प्रेरित करेगा। इसी प्रकार काम के दौरान भोजन या जल-पान का अवकाश देकर भी प्रेरित किया जा सकता है, 

विभिन्न कर्मचा के पदों का सम्मानजनक नाम देकर भी उन्हें उत्साहित किया जा सकता है। जैसे क्लक को ऑफ एसिन्टेन्ट का नाम देकर भी अभिप्रेरित किया जा सकता है।

अवित्तीय अभिप्रेरणाओं का सबसे बड़ा दोष यह है कि ये सदैव प्रभावशाली नहीं होती प्रत्येक कर्मचारी के लिए अवित्तीय अभिप्रेरणा चुनते समय बहुत सावधान रहना चाहिए।

Q.8. नेतृत्व की विशेषताएँ लिखिए । (Write down the characteristics of Leadership.)

Ans. लक्षण (Characteristics) — नेतृत्व के प्रमुख लक्षण या विशेषताएँ निम्नलिखित हूँ

1. व्यक्तियों के द्वारा अनुसरण (Following by Others)—प्रभावी नेतृत्व के लिए आवश्यक है कि नेता के आदेशानुसार चलने वाले व्यक्तियों की संख्या पर्याप्त हो ।

2. नेतृत्व व्यक्तिगत गुण है (Leadership is Personal Quality) नेतृत्व किसी व्यक्ति विशेष में पाए जाने वाला वह गुण है जिसके द्वारा वह दूसरे व्यक्तियों को कार्य करने के लिए प्रेरित करता है।

3. आदर्श आचरण (Ideal Conduct )— एक नेता अपने आदर्श आचरण के द्वारा में अधीनस्थों के द्वारा ही अधीनस्थों के सामने कुशल नेतृत्व प्रदान कर सकता है यानी नेता को केवल भाषण देने वाला ही न होकर स्वयं संस्था के प्रति वफादार होना चाहिए।

4. नेतृत्व में चार तत्त्व – पथ-प्रदर्शन, संचालन, निर्देशन तथा पहल निहित है (Lead- ership includes guide, conducting, directing and preceding)—नेता अपनी संस्था के उद्देश्यों को पारिभाषित करता है, उनकी प्राप्ति के लिए अधीनस्थ का पथ प्रदर्शन करता है, संचालन विधि में सहायता करता है तथा उद्देश्यों को कुशलतापूर्वक तथा समन्वित रूप से पूरा करने के लिए आदेश तथा निर्देश समय-समय पर देता है।

5. नेतृत्व एक सतत प्रक्रिया है (Leadership is Continuous Process ) — नेतृत्व प्रक्रिया निरन्तर चलने वाली है। इस प्रकार जब तक संस्था रहती है तब तक नेतृत्व रहता है। 

6. सभी क्षेत्रों में नेतृत्व आवश्यक (Leadership is essential in all spheres)— नेतृत्व आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, औद्योगिक आदि सभी स्थानों पर आवश्यक होता है। 

7. नियोजित एवं स्पष्ट आदेश (Planned and clear order) नेतृत्व में सभी आदेश खूब सोच-विचार कर तथा स्पष्ट अर्थ वाले दिए जाते हैं। 

Q. 9. नेतृत्व की प्रकृति बतलाइए। (Explain the nature of Leadership.)

Ans. नेतृत्व की प्रकृति (Nature of Leadership ) नेतृत्व की सही प्रकृति निम्नलिखित से स्पष्ट होती है-

1. नेतृत्व प्रबन्ध की एक शाखा है (Leadership is a Branch of Management)- “एक अच्छा नेता एक अच्छा प्रबन्धक हो, यह जरूरी नहीं किन्तु एक अच्छे प्रबन्धक में एक ‘अच्छे नेता के अनेक गुण होना चाहिए।”

2. नेतृत्व इसलिए जिन्दा है क्योंकि कुछ व्यक्ति अनुसरण करने के आदी होते हैं (Leadership exists because some people are habitual to follow some one) कुछ व्यक्ति स्वावलम्बी नहीं होते। वे केवल व्यक्तियों के आदेश और निर्देशानुसार ही कार्य करते हैं। इसलिए नेतृत्व की आवयकता होती है।

3. नेतृत्व असम्भव को भी यथार्थ में परिवर्तित कर देता है (Leadership Trans- forms Impossible in reality ) कभी-कभी नेतृत्व चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों का सामना करता है और असम्भव लगने वाले कार्यों को भी सम्भव करके दिखा देता है। 

4. नेतृत्व एक गतिशील एवं विकासशील प्रक्रिया है (Leadership is a dynamic and developing process)—— नेतृत्व कभी न समाप्त होने वाली प्रक्रिया है तथा प्रबन्धक के लिए बदलती हुई परिस्थितियों के अनुरूप नित नये अवसर प्रदान करता है।

5. नेतृत्व प्रबन्धक और अधीनस्थों के बीच व्यक्तिगत सम्बन्ध (Leadership creates Individual relationship between manager and his subordinates ) नेतृत्व एक ऐसी है जो प्रबन्धकों और उनके साथ कार्य करने वाले अधीनस्थों के बीच आवश्यक सूचनाओ को देकर व्यक्तिगत सम्बन्ध स्थापित करता है। 

Q.10. पर्यवेक्षण की परिभाषा दीजिए (Define Supervision.)

Ans. प्रमुख परिभाषाएँ (Important Definitions) 1. बाला के अनुसार “वेशन से आशय किसी कार्य के निष्पादन में कार्य करने वाले कर्मचारियों को प्रत्यक्ष एवं तुरन्त परामर्श दिये जाने और उन पर नियन्त्रण स्थापित करने से है।” (According to Viteless, “Super- vision referes to the direct and immediate guidance and control of subordi- nates in the performance of their task.”)

2. आर. सी. डेविस के आधार पर, “पर्यवेक्षण क्रिया द्वारा यह विश्वास किया जाता है कि जो भी कार्य हो रहा है वह किसी योजना एवं निर्देश के आधार पर ही हो रहा है।” (“According assuring that the work is being done in accordance with the plan and instruc- tions.”)

3. एक अमरीकन श्रम अधिनियम के अनुसार, “पर्यवेक्षक वे व्यक्ति हैं जिन्हें कर्मचारियों के चुनाव करने, निकालने, अनुशासन, पारिश्रमिक और इनसे सम्वन्धित अन्य कार्यों के बारे में स्वतन्त्र निर्णय लेने का अधिकार है।” (On the Basis of an Americal Law, “Supervisors are those having authority to exercise independent judgement in hiring, discharging, disciplining, rewarding and taking others actions of a similar nature with respect to employees.”)

Q. 11. एक अच्छे पर्यवेक्षक के पाँच गुण बताइए। (List five qualities of a Good Supervisor.)

Ans. एक अच्छे पर्यवेक्षक के गुण (Qualities of a Good Supervisor)—

1. तकनीकी क्षमता (Technical Competence ) — अच्छे व निरन्तर उत्पादन के लिए। 

2. प्रशासनिक कुशलता (Administrative Skill ) – प्रशासन, प्रबन्ध एवं नियन्त्रण के लिए। 

3. व्यक्तिगत चरित्र (Personal Character) पर्यवेक्षक का चरित्रवान होना भी आवश्यक है। 

4. निर्णय लेने की शक्ति (Decision Making Power ) पर्यवेक्षक में निर्णय लेने की शक्ति का गुण होना चाहिए।

5. एक अच्छे नेतृत्व के गुण (Qualities of good Leadership) एक पर्यवेक्षक के अन्तर्गत एक अच्छे नेतृत्व के भी गुण होने चाहिए।

Q. 12. पर्यवेक्षण की प्रणालियों के नाम लिखिए। (Name the techniques of supervision.)

Ans. पर्यवेक्षण की प्रणालियाँ (Techniques of Supervision)- पदवत प्रणालियों से आशय उन नीतियों एवं व्यवस्थाओं से है जिन्हें एक पर्यवेक्षक अपने अधीन काम करने वाले कर्मचारियों का पर्यवेक्षण करने के लिए प्रयोग में लाता है।

इन प्रणालियों के निम्नलिखित प्रकार हैं-

1. निरंकुशात्मक प्रणाली या अधिकारात्मक पर्यवेक्षण (Autocratic Technique)

2. प्रजातान्त्रिक प्रणाली (Democratic Technique)

3. स्वतन्त्रता प्रणाली या खुली छूट प्रणाली (Free Rein Technique)। 

Q.13. पर्यवेक्षण का क्या महत्त्व है? (What is the importance of Supervission ?)

Ans. पर्यवेक्षण का महत्त्व (Importance of Supervision ) — वर्तमान युग में पर्यवेक्षकों प्रवन्य के क्षेत्र में महत्वपूर्ण स्थान है। यह वह अधिकारी है जिसका अकों से सीधा सम्बन्ध होता है। वह उन्हें आवश्यक निर्देश एवं आदेश प्रदान करता है, उनके फार्य की देखभाल करता है।

उन्हें प्रेरणा देता है और अपने से बड़े अधिकारियों के आदेशों को उन तक पहुँचाने है तथा उनके सुझाव एवं शिकायतों को बड़े अधिकारियों तक पहुंचाता है। अतः यह कहन अनुचित न होगा कि वे श्रमिको के मित्र, तत्त्व ज्ञानी तथा मार्गदर्शक (Friend, Philosophe and Guide) होते हैं। अतः श्रमिकों के अभिप्रेरण की कुंजी इन सुपरवाइजरों के हाथ में होती है। का कार्य कर

Q. 14. एक पर्यवेक्षक के क्या कार्य है ? (What are the functions of a Supervisor )

Ans. पर्यवेक्षक के कार्य (Functions of Supervisor) प्रदान करना। 

1. श्रमिकों को प्रभावी नेतृ एवं नियोजन करना। 

2. श्रमिकों के साथ मानवीय व्यवहार करना 

3. श्रमिकों में कार्य का उचित वितरण

4. अमिकों को प्रेरणा देना। 

5. श्रम शक्ति का उचित संगठन करना।

6. वैज्ञानिक जापार पर श्रमिकों के व्यक्तिगत गुणों का मापन करना । 

Q. 15. पर्यवेक्षकों के दायित्व लिखिए। (Write down the responsibilities of Supervisors.)

Ans. पर्यवेक्षक के दायित्व (Responsibilities of Supervisor) – पर्यवेक्षक के दायित्व निम्न हैं-

(a) उत्पादन सम्बन्धी दायित्व (Production related responsibilities)

1. कर्मचारियों का निर्देशन करना। 

2. कर्मचारियों को सुझाव और उनका नेतृत्व करना।

3. अधिक और अच्छे किस्म का उत्पादन करना। 

4. उत्पादन पर नियन्त्रण करना।

(b) कर्मचारियों के प्रति दायित्व (Responsibilities towards employees)-

1. कर्मचारियों के साथ मानवीय व्यवहार करना। 

2. कर्मचारियों की योग्यता का विकास करना। 

3. कर्मचारियों के साथ समायोजन करना। 

4. कार्य का सहयोगपूर्ण वातावरण तैयार करना।

Q. 16. अधिकारात्मक पर्यवेक्षण किसे कहते हैं ? (What is Autocratic Technique ?)

Ans. अधिकारात्मक पर्यवेक्षण (Autocratic Technique) इस तकनीक में अधिकार पर्यवेक्षक के पास केन्द्रित रहते हैं। सूक्ष्म तथा निश्चित निर्देशों से परिपूर्ण आदेशों पर अधिक निर्भर रहा जाता है तथा पर्यवेक्षक अधिक कठोर होता है। 

श्रमिकों की पूर्ण क्रिया पर नियन्त्रण होता है। जहां कर्मचारियों में अनुशासन नहीं होता है अथवा किसी कारणवश कर्मचारियों पर विश्वास नहीं किया जा सकता है। वहाँ यह अधिक उपयुक्त सिद्ध होती है। वर्तमान युग में ऐसी नीति का प्रयोग नहीं किया जा सकता है।

Q. 17. अधिकारात्मक पर्यवेक्षण के लाभ व दोष बताइए । (Mention the merits and demerits of autocratic technique.)

Ans. लाभ (Merits) इस प्रणाली के अग्रलिखित लाभ है-

1. शीघ्र निर्णय 

2. कड़ा अनुशासन 

3. उत्पादकता में वृद्धि 

4. काम की किस्म पर कठोर नियन्त्रण।

दोष (Demerits) — इस प्रणाली के निम्नलिखित दोष हैं—

1. अधीनस्थों में पहल करने की क्षमता में कमी। 

2. मानवीय सम्बन्धों में कमी। 

3. पर्यवेक्षकों की तानाशाही। 

4. नौकरी छोड़कर जाने (श्रम-परिवर्तन) की ऊँची दर। 5. द्विमार्गीय संदेशवाहन का अभाव।

Q. 18. परामर्शात्मक पर्यवेक्षण किसे कहते हैं ? (What is Consultative Technique ?) Or, प्रजातान्त्रिक पर्यवेक्षण कसे कहते हैं ? (What is Demoactic Technique ?)

Ans. परामर्शात्मक प्रणाली (Consultative Technique) या, प्रजातान्त्रिक प्रणाली (Democratic Technique)—इस तकनीक में जनतन्त्र के सिद्धान्तों का पूर्णरूपेण पालन किया जाता है। इसकी प्रमुख विशेषता यह है कि पर्यवेक्षक नीति निर्धारण में अपने अधीन कर्मचारियों से परामर्श लेता है। इसका उद्देश्य उन्हें सुझाव देने का अवसर प्रदान करना होता है। यदि कोई वास्तव में उपयोगी है तो गुणों के आधार पर उसे तुरन्त मान लिया जाता है। इस प्रणाली में कर्मचारी यह समझते है कि व्यवसाय में उनका भी कुछ महत्त्व है। इस विधि में कर्मचारियों से तीत करने के लिए औपचारिक विचार गोष्ठियों और सभाओं का आयोजन किया जाता है। 

Q.19. परामर्शात्मक पर्यवेक्षण के लाभ व दोष बतायें। (Mention the merits and demerits of consultative 

Ans. लाभ (Merits) – इसके निम्नलिखित लाभ हैं-

1. अधीनस्थों में पहल करने की क्षमता में वृद्धि। 

2. अधीनस्थों के मनोबल तथा उत्साह में विद्धि। 

3. मानवीय सम्बन्धों में सुधार। 

4. उत्पादन में वृद्धि। 

5. योग्य पर्यवेक्षकों का विकास।

दोष (Demerits ) —— इसके निम्नलिखित दोष भी हैं-

1. निर्णय लेने में देरी 

2. निर्णयों में समझौते की प्रवृत्ति । 

Q. 20. स्वतन्त्र पर्यवेक्षण किसे कहते हैं ? (What is independent supevision ?) Or, खुली छूट की तकनीक किसे कहते हैं ? (What is free rein technique ?)

Ans. स्वतन्त्र पर्यवेक्षण (Independent Supervision) अथवा खुली छूट की तकनीक (Free rein technique) – यह तकनीक बिल्कुल विपरीत मान्यताओं पर आधारित है। इसके अधीन पर्यवेक्षक कर्मचारियों को स्वतन्त्रतापूर्वक काम करने का अवसर देकर उनकी छुपी योग्यताओं को विकसित करने का प्रयत्न करता है। 

नीतियों, विधियों तथा कार्यक्रमों की सीमाएं स्पष्ट करने के पश्चात् वे कर्मचारियों को सम्पादन के लिए खुली छूट देकर स्वयं केवल सामान्य मार्गदर्शन का ही कार्य करते हैं। इस नीति की सफलता के लिए संदेशवाहन की पूर्ण स्वतन्त्रता एवं सुविधा खुला पर्यवेक्षण और स्वेच्छापूर्वक अधिकारों के प्रत्यायोजन का होना आवश्यक है।

Q. 21. खुली छूट की तकनीक के लाभ-दोष बताइए। (Mention the merits and demerits of free rein technique.)

Ans. लाभ (Merits) – इसके निम्नलिखित लाभ हैं-

1. कर्मचारियों में उत्तरदायित्व की भावना बढ़ती है। 

2. पर्यवेक्षक की उपस्थिति आवश्यक नहीं रहती। 

3. पर्यवेक्षक की क्षमता में वृद्धि होती है। 

4. अधीनस्थ कर्मचारियों का विकास होता है तथा उनमें पहल क्षमता तथा मनोबल में वृद्धि होती है।

दोष (Demerits) – इसके निम्नलिखित दोष भी हैं-

1. उत्पादकता में कमी।

 2. निर्णय लेने में देरी। 

3. उत्तरदायित्व से बचने की चेष्टा । 

Q. 22. पर्यवेक्षण के कार्य लिखिए। (Write down the functions of supervision.)

Ans. पर्यवेक्षण के कार्य (Functions of Supervision ) जैसा कि पीछे एक अमरीकी श्रम अधिनियम की परिभाषा में पर्यवेक्षक के कार्यों को स्पष्ट किया गया है कि पर्यवेक्षक वह व्यक्ति है जिसे कर्मचारियों का चुनाव करने, निकालने, अनुशासन, पारिश्रमिक और इनसे सम्बन्धित अन्य कार्यों के विषय में स्वतन्त्र निर्णय होने का अधिकार होता है। अतः एक पर्यवेक्षक के निम्नलिखित कार्य होते हैं-

1. संगठन तथा निर्देशन (Organisation and Direction), 

2. प्रशिक्षण व मार्गदर्शन (Training and Guiding), 3. अधीनस्थों का मूल्यांकन (Appraisal of Subordinates),

4. अधीनस्थों को प्रेरणा (Motivation of Subordinates), 

5. नियन्त्रण (Controlling) 

Q. 23. पर्यवेक्षण और निर्देशन में अन्तर बताइए । (Distinguish between Supervision and Direction.)

Ans. पर्यवेक्षण और निर्देशन में अन्तर (Distinction between Supervision and Direction)——प्रायः पर्यवेक्षण और निर्देशन शब्दों को समान अर्थ में समझा जाता है क्योंकि इन दोनों शब्दों में काफी समानता दिखलाई देती है। लेकिन इन दोनों शब्दों में बहुत अन्तर है- 1. निर्देशन – संस्था में प्रबन्गक अपने अधीनस्थों से काम लेने की प्रक्रिया को निर्देशन या नेतृत्व के नाम से पुकारते हैं।

1.पर्यवेक्षण – जय निम्नस्तरीय प्रबन्धक (फोरमैन, चार्जमैन या ओवरसीयर) के द्वारा अपने अधीनस्थों के कार्य की देखभाल की जाती है तो इसे पर्यवेक्षण कहते हैं।

2. निर्देशन कार्य में प्रायः तीन प्रकार के कार्य-नेतृत्व, अभिप्रेरण (Motivation), स (Communication) सम्मिलित किये जाते हैं।

3. पर्यवेक्षण (Supervision ) – प्रबन्ध के निर्देशन की एक शाखा (Branch) है प्रबन्ध संस्था की योजनाओं को ध्यान में रखकर समय-समय पर विभिन्न निर्देश (Directions) देता है और पर्यवेक्षक (Supervisor) उन निर्देशों का पालन करता है।

Q. 24. ‘पर्यवेक्षण की क्षमता’ से आप क्या समझते हैं ? (What do you mean by span of supervision ?)

Ans. पर्यवेक्षण की क्षमता का अर्थ (Meaning of Span of Supervision) पर्यवेक्षण, नियन्त्रण या प्रबन्ध की क्षमता से अभिप्राय एक पर्यवेक्षक के अधीन काम करने वाले कर्मचारियों की उस अधिकतम संख्या से है जिनके काम पर वह आसानी से पूर्ण कुशलता के साथ निगरानी रख सके।

कोई भी व्यक्ति कितना भी कुशल एवं चतुर क्यों न हो उसकी कार्य करने की क्षमता सीमित होती है। वह एक सीमा तक ही कार्य कर सकता है। पर्यवेक्षक के महत्त्व को देखते हुए यहाँ पर पर्यवेक्षक की क्षमता से हमारा तात्पर्य एक पर्यवेक्षक के अधीन कर्मचारियों की उस संख्या से है जिनके काम पर वह आसानी से तथा प्रभावपूर्ण ढंग से निरीक्षण कर सके। इसके नियन्त्रण करने का विस्तार (Span of Control) भी कहते हैं। 

प्रत्येक पर्यवेक्षक की निरीक्षण करने की क्षमता सीमित होती है। इसलिए पर्यवेक्षक के अधीन उतने ही कर्मचारी होने चाहिए जिनका कार्य वह आसानी से देख सके। मेकफारलेण्ड के अनुसार, “नियन्त्रण का विस्तार अधीनस्थों की वह संख्या होती है जिसका कोई प्रबन्धक पर्यवेक्षण करता है।” प्रायः इसी को पर्यवेक्षण के विस्तार के नाम से भी जाना जाता है।

Q. 25. पर्यवेक्षण की क्षमता को प्रभावित करने वाले चार घटकों को बताइए (Give four factors which affect the span of Supervision.)

Ans. पर्यवेक्षण की क्षमता को प्रभावित करने वाले घटक (Factors affecting Span of Supervision)

1. पर्यवेक्षक की स्वयं की योग्यता (Competence of the Supervisor) – प्रत्येक व्यक्ति का नेतृत्व, संवाद प्रेषण तथा अभिप्रेरण सम्बन्धी योग्यताएँ एवं क्षमताएँ अलग-अलग होती हैं। इसी प्रकार पर्यवेक्षकों की अपनी स्वयं की योग्यताएँ भी अलग-अलग होती हैं। अधिक कुशल, योग्य एवं अनुभवो पर्यवेक्षक एक सामान्य पर्यवेक्षक की अपेक्षा कम समय में अधिक व्यक्तियों का पर्यवेक्षण कर सकता है।

2. पर्यवेक्षण के लिए उपलब्ध समय (Time available for Supervision ) पर्यवेक्षण का विस्तार इस बात पर भी निर्भर करेगा कि पर्यवेक्षक के पास पर्यवेक्षण हेतु अपना समय है। तब वे अधिक व्यक्तियों का पर्यवेक्षण कर सकते हैं अन्यथा वे कम व्यक्तियों का पर्यवेक्षण कर सकेंगे। 

3. विशेषज्ञों की सुविधा (Facility of Specialists) — जहाँ विशेषज्ञों एवं निर्देशों का प्रयोग होता है, उनमें पर्यवेक्षक अपेक्षाकृत अधिक व्यक्तियों के कार्यों पर दृष्टि रख सकते हैं। लेकिन जहाँ अस्थायी योजनाएँ होती हैं जो बार-बार बदलती रहती हैं वहाँ एक समय में कम व्यक्तियों के कार्यों का पर्यवेक्षण हो पाता है।

Q.26. पर्यवेक्षण की क्षमता का क्या महत्त्व है ? (What is the importance of span of supervision ?)

Ans. पर्यवेक्षण की क्षमता का महत्व (Importance of Span of Supervision)- पर्यवेक्षक की शक्ति सामर्थ्य और कुशलता सभी मनुष्यों की तरह सीमित है। इसी प्रकार उसके संस्था करने के समय भी सीमित है। फलस्वरूप वह सामर्थ्य और समय की सीमितता के कारण सीमित कर्मचारियों के कार्यों का ही कुशल निरीक्षण, निर्देशन एवं नेतृत्व कर सकता है। 

यदि उसके अधीन आवश्यकता से अधिक कर्मचारी होंगे तो वह न तो उचित प्रकार से उनके कार्य की देखरेख कर सकेगा और न ही सही समय पर सही परामर्श दे सकेगा जिसके कारण संस्था का ढीला पड़ जाएगा और कर्मचारी लापरवाह हो जाएँगे। 

दूसरी ओर यदि पर्यवेक्षक के अधीन श्यकता से कम कर्मचारी होंगे तो वे भी सुस्त हो जाएंगे बिना किसी उचित कारण के अधीनस्थों से उलझेगा। इस खाली दिमाग शैतान का घर’ (An empty mind is devils workshop) बाली कहावत के अनुरूप हो जाएगा। दूसरी ओर प्रबन्ध के स्तरों में वृद्धि होगी जिसके कारण सम्प्रेषण, और नियन्त्रण की अकुशलताएँ जन्म लेंगी। इस प्रकार अधीनस्थों की संख्या न तो आवश्यकता में अधिक होनी चाहिए और न कम । 

कर्मचारियों की संख्या उतनी ही होनी चाहिए जिनके कार्यों की कुशलतापूर्वक देख-रेख की जा सके। इसलिए यह आवश्यक है कि संस्था के उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए पर्यवेक्षक के अधीनस्थों की संख्या तथ्यों के आधार पर पूर्व निश्चित हो। 

Q.27. संकुचित बनाम विस्तृत पर्यवेक्षण पर एक नोट लिखिये ।

(Write a note on Narrow Versus Wide Span of Supervision.) Ans. संकुचित बनाम विस्तृत पर्यवेक्षण क्षमता (Narrow versus Wide Span of Supervision)—प्रायः प्रश्न यह उठता है कि एक पर्यवेक्षण द्वारा देख-रेख बहुत कर्मचारियों की जानी चाहिए या कम कर्मचारियों की जब एक पर्यवेक्षक बहुत सारे कर्मचारियों के कार्यों की देख-रेख

करता है तो उसे पर्यवेक्षण की विस्तृत क्षमता कहते हैं। परन्तु जब एक पर्यवेक्षक बहुत कम कर्मचारियों की देख-रेख करता है तो उसे संकुचित क्षमता वाला पर्यवेक्षक कहते हैं और जिस संगठन में ऐसी क्षमता वाला पर्यवेक्षक पाया जाता है तो उसे लम्बवत संगठन (Vertical Organisation) कहते हैं।

दोनों ही प्रकार की पर्यवेक्षण क्षमता की अपनी-अपनी कुछ विशेषताएँ हैं। 

Q. 28. संकुचित पर्यवेक्षक की क्षमता के लाभ व दोष बताइए । (Mention the merits and demerits of Narrow Span of Supervision.)

Ans. लाभ (Merits) इसके निम्न लाभ हैं-

1. सीमित क्षमता वाले उद्योगों में यह और भी अधिक उपयुक्त रहता है। 

2. इसमें पर्यवेक्षक अधिक कुशल व प्रशिक्षित न हों तो भी वे कार्य को सम्भाल लेते हैं क्योंकि उनको कम कर्मचारियों पर नियन्त्रण रखना पड़ता है। 

3. इसमें पर्यवेक्षक के नीचे कर्मचारियों की संख्या कम होने के कारण उनके कार्य का अधिक निकटतम पर्यवेक्षण किया जा सकता है जिससे कर्मचारियों पर उचित प्रभावपूर्ण नियन्त्रण रखा जा सकता है। 

4. पर्यवेक्षक व कर्मचारियों में व्यक्तिगत सम्बन्ध स्थापित हो जाते हैं क्योंकि पर्यवेक्षक के पास प्रत्येक कर्मचारी की समस्याएँ सुनने व सुलझाने का पर्याप्त समय होता है।

दोष (Demerits) — इसके निम्न दोष हैं—

1. निरीक्षक अधिक होने के कारण प्रबन्धकीय स्तरों की संख्या में वृद्धि होती है जिसके कारण सन्देशवाहन व समन्वय की समस्याएँ उत्पन्न हो जाती हैं। 

2. इसमें पर्यवेक्षकों की संख्या अधिक रखनी पड़ती है जिससे लागत बढ़ जाती है। 

Q. 29. विस्तृत पर्यवेक्षक क्षमता के लाभ व दोष बताइए । (Mention the merits and demerits of wide span of Supervision.) 

Ans. लाभ (Merits)— इसके लाभ इस प्रकार हैं

1. निरीक्षकों की संख्या कम होने के कारण प्रबन्ध स्तरों की संख्या कम होती है जिसके फलस्वरूप सन्देशवाहन व समन्वय की अच्छी व्यवस्था रहती है। 

2. यह प्रणाली प्रबन्धकों के लिए लाभदायक सिद्ध होती है क्योंकि वे पर्यवेक्षकों से अनेक कार्य करवाते हैं जिससे उनकी कार्यक्षमता बढ़ जाती है जो कि नीतियों का निर्धारण करने में सहायक होती है। 

3. इसमें अन्य प्रणालियों की अपेक्षा निरीक्षण व्यय कम होता है क्योंकि एक ही पर्यवेक्षक काफी कर्मचारियों के कार्य का निरीक्षण कर लेता है। अतः पर्यवेक्षक कम रखने पड़ते है।

दोष (Demerits)—- इसके दोष इस प्रकार हैं-

1. इसमें पर्यवेक्षक के नीचे कर्मचारियों की संख्या अधिक होने के कारण व्यक्तिगत सम्ब का अभाव रहता है जिसकी वजह से मधुर मानवीय सम्बन्धों की स्थापना नहीं हो पाती 

2. सीमित पर्यवेक्षण क्षमता वाले उद्योगों में यह प्रणाली उपयुक्त सिद्ध नहीं होती। 

3. इस प्रणाली में पर्यवेक अधिक कुशल एवं प्रशिक्षित होना चाहिए जिनका मिलना कई बार मुश्किल हो जाता है। पर्यवेक्षक के अधिक वेतन माँगने पर आर्थिक बोझ भी पड़ता है। 

Q.30. एक पर्यवेक्षक के कर्मचारियों के प्रति क्या दायित्व हैं ? (What are the responsibilities of a Supervisor towards workers ?) 

Ans. एक पर्यवेक्षक के कर्मचारियों के प्रति प्रमुख रूप से निम्नलिखित उत्तरदायित्व होते हैं

1. कर्मचारियों को प्रभावी नेतृत्व प्रदान करना।

2. कर्मचारियों के साथ मानवीय व्यवहार करना।

3. अपने अधीन कर्मचारियों का विश्वास जीतना और उनमें सहयोग एवं टीम भावना जाग्रत करना। 

4. अपने कर्मचारियों की शिकायतों को सुनना, समझना और समाधान करना। उनके सुझावों को बड़े अधिकारियों तक पहुँचाना।

5. वैज्ञानिक आधार पर कर्मचारियों का व्यक्तिगत गुण मापन करना।

6. कर्मचारियों को संस्था की नीतियों से अवगत कराना और उनका मनोबल ऊँचा करना। 

7. कर्मचारियों को प्रेरणा देना तथा उनके कार्यों की प्रशंसा करना। 

8. परिस्थितियों के साथ समायोजन करने में कर्मचारियों को सहायता देना।

Q.31. एक पर्यवेक्षक के कार्य के प्रति क्या दायित्व हैं ? (What are the responsibilities of a Supervisor towards work ?)

Ans. 

1. श्रमिकों में कार्य का उचित वितरण एवं नियोजन करना ।

2. श्रम शक्ति का उचित संगठन करना।

3. कार्य के नये तरीके एवं नये विचारों की जानकारी देते रहना और उन्हें परिस्थितियों के अनुकूल बनाकर लागू करना।

4. उत्पादन की मात्रा और किस्म पर नियन्त्रण रखना ।

5. श्रमिकों के मध्य अनुशासन बनाए रखना।

6. वे सभी आवश्यक कार्य करना जो आज के युग में उत्पादन वृद्धि के लिए आवश्यक हैं।

7. बड़े अधिकारियों द्वारा निर्धारित नीतियों एवं निर्देशों को लागू करना ।

Q.32. एक पर्यवेक्षण के प्रबन्ध के प्रति क्या दायित्व हैं ? (What are the responsibilities of a supervisor towards Management ?)

Ans. 

1. कार्य प्रगति से अवगत कराना।

2. अधिकारियों के कार्यों में सहयोग करना।

3. कर्मचारियों से सम्बन्धित बातें, जैसे- वेतन, पदोन्नति, स्थानान्तरण, कठिनाइयों और दूर किए जाने से सम्बन्धित आवश्यक सुझावों को अधिकारियों के समक्ष रखना। उनके कार्य करना या कराना।

4. अधिकारियों के दृष्टिकोण को समझना और उनके दृष्टिकोण एवं विचारों के अनुसार

5. अधिकारियों के सुझावों तथा आलोचनाओं को धैर्य के साथ सुनना और उन पर विचार करना । 

Q.33. एक पर्यवेक्षक के अपने सहयोगियों के प्रति क्या दायित्व हैं ? (What are the responsibilities of a supervisor towards his associates ?)

Ans. 

1. सभी के साथ मिल-जुलकर कार्य करना । 

2. अपने सहयोगी विभागों एवं कर्मचारियों को आवश्यक सहयोग देना।

3. उनकी योजनाएँ तथा कार्यों को सफल बनाने में सहायता करना एवं अपने उचित सुझाव देना। 

4. अपने सहयोगियों तथा दूसरे विभागों के द्वारा माँगी गई सूचना सही तथा उचित समय पर देना।

Q.34. संकुचित तथा विस्तृत पर्यवेक्षण क्षमता में अन्तर बताइये। (Give distinction between Narrow and Wide Span of Supervision.)

Ans. संकुचित तथा विस्तृत पर्यवेक्षण क्षमता में अन्तर (Distinction between Grand Wide Span of Supervision) संकुचित क्षमता

संकुचित क्षमताविस्तृत पर्यवेक्षण क्षमता
। इसमें प्रबन्ध या पर्यवेक्षक के कई स्तर होते है।इसमें पर्यवेक्षक के स्तर कम होते हैं
2.पर्यवेक्षक के द्वारा गिने-चुने व्यक्तियों की देख-रेख की जाती है।इसमें केवल अधीनस्थों को के कार्यों की देखरेख की जाती है
3.सीमित क्षमता वाले उद्योग में अधिक पर्यवेक्षक रखे जाते हैं।विस्तृत पर्यवेक्षण क्षमता में प्रवचन की संख्या कम होती है
4. जिन संगठनों में पर्यवेक्षक की सीमित क्षमता पाई जाती है उनको लम्बवत् संगठन कहते है।इसके विपरीत जिन संगठनों में विस्तृत पर्यवेक्षक क्षमता पाई जाती है उसे चपटा संगठन कहते हैं
5.संकुचित संगठन के निर्देश देने वालों की संख्या अधिक होने के कारण समन्वय की समस्या वड़ी होती है।विस्तृत संगठन में सामान्य की समस्या कम होती है और संप्रेक्षण व्यवस्था भी छुट्टी होती है

Q.35. सन्देशवाहन का क्या अर्थ है ? (What is meant by Communication ?)

विस्तृत क्षमता (Wide Span] of Supervision)

1. इसमें पर्यवेक्षण के स्तर कम होते हैं।

2. इसमें केवल अधीनस्थों के कार्यों की देख-रेख की जाती है।

3. विस्तृत पर्यवेक्षण क्षमता में पर्यवेक्षण की संख्या कम होती है।

4. इसके विपरीत जिन संगठनों में विस्तृत पर्यवेक्षण क्षमता पाई जाती है, उसे चपटा संगठन कहते हैं।

5. विस्तृत संगठन में समन्वय की समस्या कम होती है और सम्प्रेषण व्यवस्था भी छोटी होती है।

Communication शब्द लेटिन भाषा के Communis शब्द से लिया गया है जिसका Common यानी हम किसी विचार या तथ्य को कुछ व्यक्तियों से सामान्य (Common) देते हैं अर्थात उनमें उस विचार के प्रति सामान्य समझदारी की हालत बना देते हैं।

संचार व्यवस्था से आशय दो या दो से अधिक व्यक्तियों को विभिन्न जानकारी करा के, स्टन के व्यक्तियों को सक्रिय बनाना है। संगठन की सफलता के लिए यह आवश्यक है कि उसमें 51 त संचार व्यवस्था के अभाव में संगठन, नियोजन, निर्देशन आदि कार्य नहीं किया जा सकता। का मुख्य उद्देश्य विचारों का प्रचारण है। संचार कार्य संकेतों, शब्दों तथा चिन्हों के द्वारा किया हता है। जैसे—कॉलेज में घण्टी बजने पर कक्षाएँ प्रारम्भ और समाप्त होती है, गार्ड की हरी और झंडी के संकेत पर रेलगाड़ी का आवागमन शुरू होता है आदि ।

संचार व्यवस्था प्रबन्ध का प्रमुख अंग होता है। प्रबन्ध के समस्त कार्य नियोजन, निर्देशन, नियंत्रण संगठन आदि संचार व्यवस्था पर आधारित होते हैं। इसके अभाव में इनका सम्पादन असम्भव है।

Q.36. संदेश वाहन (सम्प्रेषण) की पाँच विशेषताएँ बताइए। (Describe five characteristics of Communication.)

Ans. संदेश वाहन की विशेषताएँ (Characteristics of Communication)— 

1. विचारों का आदान-प्रदान (Exchange of Ideas ) — सन्देशवाहन या सम्प्रेषण का सन्देश इस प्रकार के होते हैं कि आसानी से एक-दूसरे के विचार समझ सके। गर्व है दो या दो से अधिक व्यक्तियों के बीच विचारों, सूचनाओं या सन्देशों का विनिमय करना में लिखा हुआ या कति हो सकता से छुट्टी के लिए घंटी बजाना। 

2. शब्दों व संकेतों का प्रयोग (Use of Words as well as Symbols) सन्देशवाहन व्यक्तियों का होना अनावश्यक है क्योंकि कोई भी अकेला क्ति अपने स्वयं के साथ सन्देशवाहन। 

3. कम-से-कम दो व्यक्ति (At least two Parsons) संदेशवाहन के लिए कम-से-कम नहीं कर सकता।

4. आपसी समझ (Mutual Understanding ) संदेशवाहन तभी पूरा होता है, दूसरा व्यक्ति सन्देश को सही समझ लें। यदि दूसरे व्यक्ति के दिमाग में कही गई बात की सही पैदा नहीं होती है तो संदेशवाहन अधूरा माना जाएगा।

5. प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संदेशवाहन (Direct and Indirect Communication) के बीच विचारों व सन्देशों का सीधा लेन-देन होता है जबकि प्रत्यक्ष संदेशवाहन का अ लोगों के माध्यम से एक-दूसरे को सूचना देना है।

Q.37. औपचारिक व अनौपचारिक संदेशवाहन / सम्प्रेषण में अन्तर बताइए । (Differentiate between Formal and Informal Communication.)

Ans.

अनौपचारिक संदेशवाहन (Informal Communication)औपचारिक संदेशवाहन (Formal Communication)
1. यह संदेशवाहन अधिकतर लिखित होते हैं।1. यह संदेशवाहन अधिकतर मौखिक मैत्रीपूर्ण होते हैं।
2. औपचारिक संदेशवाहन के पीछे सत्ता का भय रहता है।2. अनौपचारिक संदेशवाहन में भय नहीं ब आत्मीयता होती है।
3. इसका मार्ग पहले से तय होता है। इसके आदि और अन्त को मालूम किया जा सकता है।3. यह टेढ़े-मेढ़े मार्गों से गुजरता है। इस आदि और अन्त को ढूँढना मुश्किल है।
4. औपचारिक संदेशवाहन का प्रमाण रखा जाता है।4. इसका कोई प्रमाण नहीं होता है।
5. संस्था द्वारा दिए गए अधिकार एवं दायित्व का परिणाम है।5. अधिकारियों के बीच मैत्रीपूर्ण व्यवहार परिणाम है।
6. यह संदेशवाहन अधिकृत कार्यों से सम्बन्धित6. यह संदेशवाहन अधिकृत एवं अनाधिकृत दोनों कार्यों से सम्बन्धित होता है।

Q.38. मौखिक एवं लिखित संदेशवाहन में अन्तर बताइए । (Distinguish between verbal and written Communication.)

Ans.

मौखिक संदेशवाहनलिखित संदेशवाहन
1. यह मौखिक होता है।1. यह लिखित होता है।
2. इसे गोपनीय रखा जा सकता है।2. इसमें गोपनीयता का अभाव पाया जाता है।
3. मौखिक सम्प्रेषण में धन तथा समय की बचत होती है।3. इसमें संदेश लिखने के लिए स्याही, कागज आदि पर काफी खर्च आता है।
4. इसमें सन्देश प्राप्त करने वाला अपना भ्रम दूर कर सकता है।4.इसमें भ्रम दूर करने के लिए समय लग है।
5. इसमें व्यक्तिगत सम्पर्क के कारण सहयोग की भावना बनी रहती है।5. इसमें व्यक्तिगत सम्पर्क का अभाव रहत है।
6. यह अधिक प्रभावशाली है क्योंकि इसमें चेहरे के हाव-भाव द्वारा इसे रुचिपूर्ण बनाया जा सकता है।6. यह कम प्रभावशाली होता है।
7. इसमें संदेश प्राप्त करने वाले पर सन्देह की प्रतिक्रिया तुरन्त जानी जा सकती है।7. इसमें ऐसी कोई बात नहीं है।

Q.39. सन्देशवाहन के विभिन्न प्रकार बताइए। (Give the different types of Communication.)

Ans.

(A) दिशा के आधार पर (On the Basis of Direction) – 1. नीचे की ओर संदेशवाहन (Downward Communication),

2. ऊपर की ओर संदेशवाहन (Upward Communication), 3. समतल संदेशवाहन (Horizontal Communication)।

(B) संगठनात्मक सम्बन्धों के आधार पर (On the Basis of Organisational Relationship)

1. औपचारिक संदेशवाहन (Formal Communication), 2. अनौपचारिक संदेशवाहन (Informal Communication)।

(C) व्याख्या के आधार पर ( On the Basos of Expression)— 1. मौखिक संदेशवाहन (Verbal/Oral Communication),

2. लिखित संदेशवाहन (Written Communication)।

Q. 40. सम्प्रेषण या संचार व्यवस्था की पाँच बाधाओं का वर्णन कीजिये । (Explain five barriers of Communication.)

Ans. संचार व्यवस्था या सम्प्रेषण की बाधाएँ (Barriers of Communication)— इतकी बाधाएँ निम्न हैं—

1. भाषा की समस्या ( Problem of Language) यदि संदेश भेजने वाला और संदेश पाने वाला विभिन्न भाषाओं के जानने वाले हैं या सन्देश पाने वाला अनपढ़ हो या संदेश अस्पष्ट या में हो तो सम्प्रेषण का महत्त्व कम हो जाता है और अप्रभावी हो जाता है।

 2. अयोग्य प्रबन्धक (Inefficient Manager ) यदि संदेशवाहन (सम्प्रेषण) भेजने वाला

मृत अधिकारी ही अयोग्य और अकुशल हो, उसे तथ्यों या वास्तविक परिस्थितियों का ज्ञान न हो उसे सम्प्रेषण की कला का ज्ञान न हो तो संदेशवाहन का उद्देश्य पूरा नहीं हो पाता। 

3. पारस्परिक दूरी (Mutual distance)— संदेश भेजने वाले और पाने के बीच की दूरी की होने के कारण संदेश से सम्बन्धित तुरन्त तुष्टिकरण प्राप्त नहीं हो पाता। फलस्वरूप संदेश के विभिन्न अर्थ निकाले जाते हैं और जो जैसे समझता है उसे वैसे ही स्वीकार कर लेता है। 

4. यान्त्रिक बाधाएँ (Mechanical barriers ) — सम्प्रेषण के लिए जिन यन्त्रों का उपयोग में लाया जाता है उनमें से किसी प्रकार की खरावी हो जाने से संदेश अस्पष्ट और विरूपित हो जाता है। कभी-कभी तो भेजने में काफी देरी होती है और संदेश प्राप्ति का उपयुक्त समय भी चुका होता है। 5. निर्णय में जल्दबाजी (Haste in decision)— कभी-कभी सन्देश प्राप्त करने वाले कर्मचारी सन्देश पूर्णरूप से सुनने के पहले ही निष्कर्ष निकाल लेता है और अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने लगता है। फलस्वरूप सम्प्रेषण असफल हो जाता है। 

Q. 41. सम्प्रेषण की बाधाओं को दूर करने के उपाय बताइए । (State the measures to overcome the obstackles of Communication.)

 Ans. बाधाओं को दूर करने के उपाय (Suggestions to overcome the Barriers

of Communication)—– निम्न उपायों द्वारा बाधाओं को दूर किया जा सकता है-

1. सम्प्रेषण को भाषा सरल एवं स्पष्ट होनी चाहिए।

2. यह प्रयत्न करना चाहिए कि सन्देश प्रेषक एवं सन्देश प्राप्तकर्ता के बीच प्रत्यक्ष सम्बन्ध स्थापित किया जाए।

3. संस्था में मधुर मानवीय सम्बन्धों की स्थापना की जाए।

4. सन्देश की भाषा सरल एवं स्पष्ट होनी चाहिए।

5. संस्था में आपसी सद्भाव एवं विश्वास की भावना को उत्पन्न करना चाहिए।

6. औपचारिकता संचार व्यवस्था के साथ-साथ अनौपचारिक संचार व्यवस्था का भी प्रयोग करना चाहिए।

7. सन्देश के लिए पर्याप्त समय होना चाहिए।

Q.42. संचार व्यवस्था की बाधाओं का वर्णन कीजिए। (Describe the Problems of Communication.)

Ans. सन्देश वाहत या संचार व्यवस्था में रुकावटें (Barriers of Communication) यद्यपि आज सन्देशवाहन के आधुनिकतम साधन प्रयोग किए जा रहे हैं फिर भी कुशल सन्देशवाहन में अनेक रुकावटें आ जाती है जो निम्नलिखित प्रकार हैं-

1. लाइन व स्टाफ (Line and Staff Relationship) खराब होना।

2. संगठन के स्तर (Organisation Level) का अधिक होना।

3. अरुचिकर भाषा (Poor Language) का प्रयोग।

4. उच्चाधिकारियों द्वारा अपनी कमजोरी छिपाना (Hinding Weakness by Superior)))

5. सन्देशवाहन न करना (Failure to Communicate)। 6. भय से प्रबन्ध को सूचित करना (Fear to Communicate) ।

7. गलत अनुमान (Unclarified Assumption) । 8. बुरा वातावरण (Bad Surrounding)।

9. अशुद्ध शब्दों का प्रयोग (Use of Wrong Words)

10. अपर्याप्त समय (Inefficient Adjustment Period) ।

11. अविश्वास (Distrust) i

Q. 43. औपचारिक सम्प्रेषण की हानियाँ बताइए।(Describe Demerits of Formal Communication.)

Ans. औपचारिक सम्प्रेषण की हानियों (Demerits of Formal Communica

tion)- इसकी हानियाँ निम्न हैं— 1. उच्च अधिकारियों के कार्यभार में वृद्धि (Increase in the Work Load) हो जाती है।

2. सूचनाओं का निरूपण (Distortion of Informations), औपचारिक सन्देशवाहन का एक दोष है। सूचना एवं संदेश का निश्चित मार्ग से तथा अनेक हाथों से गुजरने के कारण उनका स्वरूप ही बदल जाता है।

3. औपचारिक सन्देशवाहनों में अधिकारीगण भी पूरा उत्साह तथा रुचि लेकर कार्यवाही नहीं करते बल्कि इनकी भी औपचारिक कार्यवाही (Formal Action) ही होती है। 

4. औपचारिक सन्देशवाहन में सूचनाओं के पहुँचने में देरी (Delay in Information) लग जाती है। फलस्वरूप उस पर तुरन्त कार्यवाही नहीं की जा सकती। 5. श्रम, समय एवं धन का अपव्यय होता है।

Q.44. मौखिक सन्देशवाहन के पाँच लाभ बताइए। (Mention five Advantages of Verbal Communication.)

Ans. मौखिक संदेश वाहन के लाभ (Advantages of Verbal Communica tion) – इसके लाभ इस प्रकार हैं-

1. धन की बचत (Economical) इसमें धन की बचत होती है क्योंकि कागज, स्याही तथा न ही लिखने वाले कर्मचारी की आवश्यकता होती है।

2. समय की बचत (Time Saving) — संदेश लिखने में लगने वाला समय बच जाता है। जिससे यह शीघ्र कर्मचारियों तक पहुंचाया जा सकता है।

3. प्रभावशाली (Effective ) — सुनने वालों पर बहुत प्रभाव पड़ता है क्योंकि इसके द्वारा पूछ कर दूर कर प्रबन्धक चेहरे के हाव-भाव तथा इशारों द्वारा इसे रुचिपूर्ण बना सकता है।

4. स्पष्टता (Clarity)—इसके अन्तर्गत सुनने वाले अपने भ्रम को प्रश्न सकते हैं। इस कारण मौखिक संदेशवाहन में अधिक स्पष्टता होती है।

5. सहयोगपूर्ण वातावरण (Faster Friendly Spirit ) मौखिक संदेशवाहन की सहायता से प्रबन्धक तथा कर्मचारियों में व्यक्तिगत सम्पर्क बढ़ता है जिससे उनमें सहयोग की भावना

Q.45. संदेशवाहन अन्तराल’ का अर्थ बताइए । बढ़ती है। (Write down the meaning of ‘Communication Gap’.)

Ans. सन्देशवाहन अन्तराल (Communication Gap ) — संस्था की प्रगति एवं कुशल संचालन के लिए आवश्यक है कि संस्था में द्विमार्गीय (Two way) सन्देशवाहन व्यवस्था हो जिससे कसे कर्मचारियों तथा कर्मचारियों से प्रबन्धकों तक समस्त प्रकार की सूचनाओं, निर्देशों, सुझावों, शिकायतों के आदान-प्रदान का कार्यक्रम निरन्तर चलता रहे। मगर प्रत्येक संदेश के पहुँचने में कुछ लगता है। 

इस समय को संदेशवाहन अन्तराल कहते हैं। यह अन्तराल या गैप जितना बढ़ता उएगा उतना ही संदेशवाहन कम-प्रभावी होता जाता है। अन्तराल को कम-से-कम करने के लिए अनौपचारिक संदेशवाहन आवश्यक हो गया है। लेकिन औपचारिक संदेशवाहन के लिए आवश्यक कि इसके प्रयोग में सावधानी बरती जाए। आज लगभग बड़ी-बड़ी संस्थाओं में इण्टर स्यूनिकेशन प्रणाली अन्तराल को कम करती है।

Q.46. सम्प्रेषण के पाँच उद्देश्य बताइए। (Describe five objectives of Communication.)

Ans. सम्प्रेषण के उद्देश्य (Objects of Communication)—सम्प्रेषण के उद्देश्य इस कार हैं-

1. उपक्रम के विभिन्न अंगों के मध्य समन्वय उत्पन्न करना। 

2. संस्था की कार्यविधि में परिवर्तन की जानकारी को कर्मचारियों तक पहुँचाना। 

3. कर्मचारियों के काम छोड़ कर जाने (श्रम मित्रसी) (Labour Turnover) को कम करना। 

4. कर्मचारियों तथा मालिकों में समन्वय यापेत करना। 

5. कर्मचारियों के मनोवल को ऊंचा करना जिससे उनकी कार्यक्षमता में वृद्धि हो

Q. 47. औपचारिक सम्प्रेषण की विशेषताएँ बतलाइए । (Describe characteristics for Formal Communication.)

Ans. औपचारिक सम्प्रेषण की विशेषताएँ (Characteristics of Formal Communication)—इसकी विशेषताएँ इस प्रकार हैं—

1. औपचारिक सम्प्रेषण प्रायः लिखित होता है।

2. सूचनाओं का आदान-प्रदान खड़ी सीढ़ी के अनुसार होता है। औपचारिक सम्प्रेषण तीन तरफ गतिशील होता है।

3. (i) नीचे की ओर (Downward) आदेश, निर्देश के लिए,

(ii) ऊपर की ओर (Upward ) — सुझाव, शिकायत तथा रिपोर्ट के लिए।

(iii) समतल (Horizontal) विभिन्न विभागों में समन्वय के लिए।

4. औपचारिक सम्प्रेषण में केवल अधिकृत तथा सोची-समझी सूचनाओं का ही आदान-प्रदान होता है।

5. औपचारिक सम्प्रेषण की पद्धति, श्रृंखला तथा सामधिकता पूर्व निर्धारित होती है।

Q.48. अनौपचारिक सम्प्रेषण की विशेषताएँ बतलाइए । (Describe characteristics of Informal Communication.)

Ans. अनौपचारिक सम्प्रेषण की विशेषताएँ (Characteristics of Inform [Com. mitunication)—

1. अनौपचारिक सम्प्रेषण मौखिक होता है।

2. यह प्रत्यक्ष संकेतों के आधार पर होता है। 

3. अनौपचारिक सम्प्रेषण अधिकृत एवं अनाधिकृत दोनों

4. अनौपचारिक सम्प्रेषण का कोई प्रमाण नहीं होता

है। कार्यों से सम्बन्धित होता है।

5. अनौपचारिक सम्प्रेषण अधिकारियों के बीच मैत्रीपूर्ण व्यवहार का परिणाम है।

Q.49. औपचारिक सम्प्रेषण के पाँच लाभ बताइए । (Mention five advantages of Formal Communication.)

Ans औपचारिक सम्प्रेषण के लाभ (Advantages of Formal Communica tion)- 

1. औपचारिक सम्प्रेषण में लिखित सम्प्रेषण के लगभग सभी लाभ प्राप्त होते है।

2. औपचारिक सम्प्रेषण में अदेश की एकता रहती है जिससे अधिकारी अपने अधीनस्थ पर पूरा नियन्त्रणख सकते हैं।

3 औपचारिक सम्प्रेषण उचित एवं प्रभावी होता है जिससे संगठन मजबूत होता है। 

4. औपचारिक सम्प्रेषण लिखित होता है जिसे भविष्य के सन्दर्भ के लिए सुरक्षित रखा सकता है।

5. सम्प्रेषण की प्रक्रिया में निश्चित तथा पूर्व नियोजित मार्ग का अनुसरण करने में संस्था के लक्ष्यों को प्राप्त करने में मदद मिलती है।

Q.50. अनौपचारिक सम्प्रेषण के पाँच लाभ बताइए । (Mention five advantages of Informal Communication.)

Ans. अनौपचारिक सम्प्रेषण के लाभ (Advantages of Informal Communica tion)—

1. अनौपचारिक सम्प्रेषण बहुत प्रभावशाली होता है।

2. अनौपचारिक सम्प्रेषण अधिकतर मौखिक होता है। अतः इसमें खर्च बहुत कम होता है। 

3. आमने-सामने बैठकर अनौपचारिक रूप से बातें करने से पारस्परिक सहयोग तथा सद्भाव (Mutual Co-operation and Goodwill) का विकास होता है।

4. अनौपचारिक सन्देशवाहन में बाते बहुत शीघ्र ही सभी सम्बन्धित लोगों को पता चल जाती। है। यह सन्देशवाहन का तेज, प्रभावपूर्ण तथा लचीला (Fast, Effective and Flexible means) है।

5. अनौपचारिक सम्प्रेषण के द्वारा किसी भी संगठन में काम करने वाले लोगों की सही राय का पता चल जाता है जिससे नीतियों के निर्धारण में सहायता मिलती है।

Q.51. अनौपचारिक सम्प्रेषण के दोष बताइए । (Mention Disadvantages of Informal Communication.) 

Ans. अनौपचारिक सम्प्रेषण के दोष (Disadvantages of Informal Communic

cation) – 

1. अनौपचारिक सम्प्रेषण मौखिक होने के कारण प्रमाण के रूप में प्रयोग में नहीं लाया जा सकता। 

2. अनौपचारिक सम्प्रेषण के कारण अफवाहें और गलतफहमियों का विकास होता है। 

3. अनौपचारिक सम्प्रेषण का न कोई आदि होता है और न ही कोई अन्त। अतः इनका नियन्त्रण बहुत मुश्किल से होता है। 

4. अनौपचारिक सम्प्रेषण को जब तक नियन्त्रण में लाए यह संगठन का अहित कर चुका होता है। 

5. अनौपचारिक सम्प्रेषण जिस व्यक्ति के लिए किया जाता है, कई यार सन्देश वहाँ तक नहीं पहुँचता ।

Q.52. मौखिक सन्देशवाहन के पाँच दोष बताइए (Mention five disadvantages of Verbal Communication.) 

Ans. मौखिक संदेशवाहन के दोष (Disadvantages of Verbal Communication)-

1. भविष्य के सन्दर्भ के लिए प्राप्ति नहीं (No Availability of Future Reference)- भविष्य में झगड़ा खड़ा हो जाने पर मौखिक सन्देशवाहन में कोई रिकॉर्ड न होने के कारण यह भी जाना जा सकता कि वासतव में क्या सन्देश कर्मचारियों को दिया गया था। साथ ही कचहरी आदि चलने की हालत में उसका कोई प्रमाण नहीं होता। 

2. अपूर्ण (Incomplete )— मौखिक संदेशवाहन के समय सन्देशवाहनकर्त्ता सभी बातों का संदेशवाहन नहीं कर पाता तथा कुछ महत्त्वपूर्ण तथ्य छूट जाते हैं। 

3. तैयारी की आवश्यकता (Requires Preparation)— कई बार जब सन्देश काफी व्यक्तियों तक पहुँचाना होता है तब सन्देशवाहनकर्त्ता को उसके लिए काफी तैयारी करनी पड़ती है जिससे मूल्यवान समय नष्ट होता है।

4. सन्देश प्राप्तकर्त्ता की उपस्थिति (Requires Receiver ) मौखिक संदेश के लिए आवश्यक है कि वह व्यक्ति जिसे संदेशवाहन करना है, उपलब्ध नहीं है। यदि वह उपलब्ध नहीं। मौखिक सन्देशवाहन सम्भव नहीं है। 

5. खतरनाक (Dangerous ) मौखिक संदेशवाहन में सन्देशवाहनकर्ता कोई गलत बात है तब कर सकता है या ऐसी बात कह सकता है जो नहीं कही जानी चाहिए। सार्वजनिक सभा में नेताओं के साथ प्रायः ऐसा देखा जाता है कि जोश में आकर कुछ गलत बातें बोल देते हैं जिसका सुनने बातों पर विपरीत प्रभाव पड़ता है।

Q.53. सम्प्रेषण प्रक्रिया के चरणों के नाम लिखिए। (Write down the name of steps of Communications Process.)

Ans. सम्प्रेषण प्रक्रिया (Communication Process)—

1. संदेश या संवाद (Message ) — संवाद जिसे प्रेषक सन्देश प्राप्तकर्ता को देना चाहता हूँ। यह सन्देश जिसे प्रेषित किया जाना है आदेश, निर्देश, रिपोर्ट या प्रार्थना आदि के रूप में हो सकता है।

2. संवाद का सन्देश (Communicant )— सन्देशवाहन प्रक्रिया में संदेश प्रेषक ही होता है।

इसके द्वारा संदेश मौखिक या लिखित रूप में नीचे या ऊपर के अधिकारियों को दिए जाते हैं। 

3. संदेश का माध्यम (Medium of Communication)—संदेश के माध्यम अनेक होते – लिखित या मौखिक अथवा सांकेतिक सन्देश प्रेषक को यह निर्णय लेना पड़ता है कि कौन-सा माध्यम विभिन्न परिस्थितियों से सर्व उपयुक्त होता है।

4. सन्देश प्राप्तकर्त्ता (Audience)– सन्देश प्राप्तकर्त्ता वह व्यक्ति या व्यक्तियों का समूह होता है जिनके पास प्रेषक अपना संदेश पहुँचाना चाहता है।

5. प्रतिक्रिया (Reaction ) – सन्देश प्रेषक के द्वारा प्रेषित किए गए सन्देश की सन्देश प्राप्तकर्त्ता पर क्या प्रतिक्रिया हुई यह जानना बड़ा जरूरी होता है अर्थात प्रेषक जिस अर्थ में अपना सन्देश प्राप्तकर्त्ता को देना चाहता था। प्राप्तकर्त्ता ने उसे उसी अर्थ में स्वीकार किया है या नहीं। यदि प्राप्तकर्त्ता ने सही अर्थ में संदेश को समझा है तो संदेशवाहन सफल माना जाता है। 

Q.54. एक श्रेष्ठ सन्देशवाहन में क्या गुण होने चाहिए ?

(What characteristics should be possessed by a good Communication?) Ans. श्रेष्ठ सन्देशवाहन के गुण (Characteristics of a good Communication)— 

1. वह संक्षिप्त हो । 

2. वह पूर्ण स्पष्ट तथा सरल हो। 

3. वह प्रभावशाली भाषा तथा विषय सामग्री का मिश्रण हो। 

4. वह उद्देश्यपूरक एवं सार्थक हो। 

5. उसमें प्रश्न-उत्तर की व्यवस्था हो।

6. उसमें यथासम्भव अनौपचारिकता का समावेश हो। 7. उसका प्रकटीकरण ऐसा हो जो मानवीय सम्बन्धों का विकसित करे। 

8. उसमें कोई ऐसी बात न हो, जिससे सन्देश प्राप्तकर्त्ता के आत्म सम्मान को ठेस पहुँचे। 

9. वह यह निश्चित करता हो कि सन्देश प्राप्तकर्ता से किस प्रकार की कार्यवाही इच्छित है। 

Q.55. लिखित सम्प्रेषण की पाँच विशेषताएँ लिखिए। (State five characteristics of written Communication.) 

Ans. लिखित सम्प्रेषण की विशेषताएँ (Characteristics of Written Communi-

[cation)—

1. लिखित सम्प्रेषण लिखित होता है। 

2. यदि सन्देश भेजने वाले और पाने वाले के बीच काफी दूरी हो तो इस पद्धति पर बहुत कम खर्च होता है। 

3. सन्देश पूर्णतया स्पष्ट लिखित रूप में होता है। अतः समझने में कोई कठिनाई नहीं होती। 

4. सन्देश लिखित होने के कारण सन्दर्भ के रूप में कभी भी प्रयोग किया जा सकता है। 

5. सन्देश भेजने वाले और सन्देश पाने वाले के बीच प्रत्यक्ष व्यक्तिगत सम्पर्क की कोई आवश्यकता नहीं पड़ती।

Q.56. “सूचना पुनर्निवेशन प्रणाली” क्या है ? (What is Feedback ?)

भेजने वाला सन्देश भेजने के पश्चात् यह जानना चाहता है कि सन्देश प्राप्त करने वाले की कैसे Ans. सूचना पुननिवेशन प्रणाली’ संदेश वाहन की एक नवीनतम विचारधारा है। सन्देश प्रतिक्रिया रही। उसने सन्देश को किस सीमा तक समझा है तथा क्या वह इससे सहमत है या नहीं। इसका ज्ञान सन्देशदाता को अन्य किसी प्रकार से न होकर केवल ‘प्रतिपुष्टि’ या ‘सूचना पुनर्निवेशः ।।

 यो माध्यम से ही हो सकता है सारांश में, यह एक ऐसा निश्चयात्मक सूचक है जो यह है कि सन्देश प्राप्तकर्ता वास्तव में किस सीमा तक समझा है, स्वीकार किया है। डॉ. घोपाल में अनुसार, “पुनर्निवेशन का कार्य यह निश्चित करना होता है कि मूल रूप से जो सन्देश संवा हुआ है उसे प्राप्तकर्ता द्वारा उचित रूप में समझा दिया गया है।”

प्रतिपुष्टि प्रभावी नियन्त्रण के लिए आवश्यक है क्योंकि इसके आधार पर ही वह आगे खु कार्यवाही पर विचार करता है प्रतिपुष्टि के लिए द्विमार्गी सन्देशवाहन का होना आवश्यक है क्योंकि एक मागी सन्देशवाहन की प्रतिपुष्टि शून्य होती है।

Q.57. एक प्रभावी सूचना पुनर्निवेशन प्रणाली के क्या लाभ हैं ? (What are the merits of an effective Feed back system ? ) 

Ans. पुनर्निवेशन प्रणाली के लाभ (Merits of Feed back System) – प्रभावपूर्ण संप्रेषण के लिए, संदेश भेजने वाले को इसे पुष्टिकरण की कार्यवाही भी करनी चाहिए जिससे इसका विश्वास किया जा सके कि संदेश प्राप्तकर्त्ता संदेश को सही ढंग से समझ रहे हैं, उन्हें उस पर कार्यवाही करने में किसी प्रकार की कठिनाई या शिकायत तो नहीं है और उनके द्वारा की जाने वाली कार्यवाही सही तो है। 

यदि संदेश प्राप्त करने वाले को किसी बात की पूरी समझ न हो या उन्हें किसी बात पर शक हो तो संदेश-प्रेपक अपने संदेश को दोहरा सकता है, शंकाओं या गलतफहमियों को दूर करने के लिए स्पष्टीकरण दे सकता है और इस प्रकार उन्हें सही करने के लिए प्रेरित कर सकता है।

Q.58. सम्प्रेषण के आधारभूत तत्त्व बताइए । (Mention the basic elements of Communication.) 

Ans. सम्प्रेषण के तत्त्व (Elements of Communication) 

1. सूचना या सन्देश (Information or message ) – इससे सूचना, आदेश, निर्देश (Direction), शिकायत (Com- plaint) आदि जो कुछ भी हो, एक वर्ग से दूसरे वर्ग तक पहुँचाना पड़ता है।

2. सन्देश भेजने वाला (Sender) – यह वह व्यक्ति है जो अपने विचार, सूचना या संदेश भेजने के लिए दूसरे व्यक्ति से सम्पर्क बनाता है।

3. सन्देश प्राप्तकर्त्ता (Receiver)- जिस व्यक्ति के लिए सन्देश होता है उसे सन्देश कहते हैं। यह पाठक, श्रोता अथवा दर्शक होता है।

4. संवाद पद (Communication Channel) यह वह साधन है जिसके माध्यम से सन्देश का आदान-प्रदान होता है। यह लिखित, मौखिक, औपचारिक, अनौपचारिक आदि हो सकता है। 

5. चिन्ह (Symbols)— कई बार सन्देश को शब्दों में व्यक्त न करके चिन्ह द्वारा व्यक्त किया जाता है। जैसे-चित्र, संकेत, हाव-भाव आदि।


दीर्घ उत्तरीय प्रश्न [(LONG ANSWER TYPE QUESTIONS)


Q. 1. निर्देशन का अर्थ एवं परिभाषा दीजिए। इसके तत्त्व बतलाइए। (Discuss meaning and definition of direction. Explain the elements direction.)

Ans. निर्देशन का अर्थ (Meaning of Direction ) – आधुनिक विद्वान निर्देशन शब्द का व्यापक अर्थ में प्रयोग करते हैं। आज निर्देशन का अर्थ कर्मचारियों को केवल निर्देशन देकर उनके काम लेना नहीं है अपितु उत्पादन के लिए ऐसा वातावरण तैयार करने से है कि कर्मचारी स्वेच्छा से पूर्ण उत्साह के साथ एकजुट होकर योग्यतानुसार कार्य करें। इस प्रकार आज की बदलती हुई परिस्थितियों में निर्देशन के कार्य में मानवीय तत्त्व (Human Element) को अधिक महत्त्व दिया गया है।

परिभाषाएँ (Definitions) निर्देशन की प्रमुख परिभाषाएँ निम्नि

1. कून्ट्ज तथा ओ’डोनेल (Koontz and O’Donnell) के अनुसार, “निर्देशन तथा नेतृत्व करना प्रबन्ध कार्य में आन्तरिक व्यक्तिगत पहलू (Inter-personal Aspect) है जिसके माध्यम से अधीनस्थों को संस्था के उद्देश्यों की प्राप्ति की दशा में प्रभावपूर्ण योगदान करने के लिए सहमत तथा प्रेरित किया जाता है।” 

2. कुन्दुज तथा ओ’डोनेल के द्वारा दूसरी परिभाषा इस प्रकार दी गई है—“अधीनस्थों का प्रभावपूर्ण निर्देशन करने के लिए प्रबन्धक को अभिप्रेरण (Motivation), संप्रेषण (Communication) तथा नेतृत्व करना पड़ता है।”

3. थियो हैमन (Theo Haimann) के अनुसार, “निर्देशन के अन्तर्गत आदेश जारी करने की तकनीकी प्रक्रिया आती है और वह निश्चित करता है कि मूल रूप से निश्चित योजना के अनुसार कार्य किये जा रहे हैं या नहीं।” निर्देशन के तत्त्व (Elements of Direction ) — निर्देशन के प्रमुख चार तत्त्व निम्नलिखित

1. नेतृत्व (Leadership), 

2. अभिप्रेरण (Motivation), 

3. संचार व्यवस्था (communication), 

4. संचार व्यवस्था (Supervision)

1. नेतृत्व (Leadership ) — नेतृत्व अन्य व्यक्तियों में किसी सामान्य उद्देश्य को पालन करने की इच्छा को जागृत करने की योग्यता है। इस प्रकार नेतृत्व से आशय किसी व्यक्ति विशेष के उस गुण से है जिसके द्वारा वह दूसरे व्यक्तियों को मार्ग-दर्शन करता है तथा नेता के रूप में उनके कार्यों का निर्देशन करता है।

2. अभिप्रेरणा (Motivation)—अभिप्रेरणा प्रबन्ध कार्यों का हृदय माना जाता है। इसके अन्तर्गत कोई भी ऐसी भावना या इच्छा सम्मिलित होती है जो किसी व्यक्ति की इच्छा को इस प्रकार बना देती कि वह कार्य करने को प्रेरित हो जाए। इस प्रकार अभिप्रेरणा से आशय उस मनोवैज्ञानिक उत्तेजना से है जो व्यक्तियों को कार्य के प्रति प्रोत्साहित करती है और अधिकतम सन्तुष्टि प्रदान करती है।

3. संचार व्यवस्था (Communication)—– संचार व्यवस्था से आशय दो या दो से अधिक व्यक्तियों को विभिन्न जानकारी कराके, संगठन के व्यक्तियों को सक्रिय बनाना है। संगठन की सफलता के लिए यह आवश्यक है कि उसमें उचित संचार व्यवस्था हो। संचार व्यवस्था के अभाव में संगठन, नियोजन, निर्देशन आदि कार्य नहीं किया जा सकता है। इसका मुख्य उद्देश्य विचारों का प्रसारण है। संचार कार्य संकेतों, शब्दों तथा चिन्हों के द्वारा किया जाता है। जैसे कॉलेज में घण्टी के बजने पर कक्षाएँ प्रारम्भ और समाप्त होती हैं, गार्ड की हरी और लाल झण्डी के संकेत पर रेलगाड़ी का आवागमन शुरू होता है आदि । 

4. निरीक्षण या पर्यवेक्षण (Supervision) पर्यवेक्षण, निरीक्षण मा प्रबन्ध से अभिश अधीनस्थ कर्मचारियों से सही ढंग से कार्य करवाने तथा उनका निरीक्षण या मार्ग-दर्शन से है। पर्यवेक्षण शब्द तीन तत्त्वों से मिलकर बना है- (i) निर्देश देना, (ii) पथ-प्रदर्शन करना त (ii) नियन्त्रण करना। जब ये तीनों तत्त्व एक स्थान पर एकत्रित हो जाते हैं तो ‘पर्यवेक्षण’ शब्द की उत्पत्ति होती है। इस प्रकार पर्यवेक्षण में ये तीनो तत्त्व शामिल होते हैं।

Q.2. निर्देशन की विशेषताएँ क्या है ? निर्देशन के महत्त्व का वर्णन कीजिये। (What are the characteristics of Direction ? Discuss its importance.) 

Ans. निर्देशन की विशेषताएँ या प्रकृति (Characteristics or Nature of Dired. tion)— निर्देशन की निम्नलिखित विशेषताएँ निर्देशन कार्य की प्रकृति को स्पष्ट करती हैं-

1. निर्देशन प्रबन्धकीय कार्यों में महत्त्वपूर्ण है (Direction is important Manage. rial Function)—-निर्देशन संगठित प्रयत्नों को प्रारम्भ करता है। नियोजन संगठन, नियुक्ति, नीतियाँ तथा कार्य की पृष्ठभूमि को तैयार करते हैं, किन्तु निर्देशन वास्तव में कार्य सम्भव बनाता है। 

2. निर्देशन एक निरन्तर प्रक्रिया है (Direction is a Continuous Process)— प्रबन्धकों को अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को निरन्तर तथा नियमित रूप से निर्देशन, परामर्श तथा प्रशिक्षण देना पड़ता है। इस प्रकार यह एक निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है। 3. निर्देशन सर्वव्यापी कार्य है (Direction is a Pervasive Function)—- प्रत्येक प्रचन्यक को अपने अधीनस्थ कर्मचारियों का प्रत्येक स्तर पर निर्देशन करना पड़ता है। निर्देशन के अभाव में प्रबन्ध कार्य में समन्वय, एकता तथा कुशलता नहीं आ सकती।

4. निर्देशन के दोहरे उद्देश्य है (Direction has Dual Objectives) निर्देशन प्रमुख रूप से दो उद्देश्य होते हैं-

(i) कर्मचारियों को अधिक जिम्मेदारी निभाने के लिए तैयार करना, तथा

(i) कर्मचारियों से पूर्व निश्चित योजना के अनुसार कार्य कराना।

5. निर्देशन व्यवहार कुशलता से सम्बन्धित है (Direction is related to Behav ioural Efficiency)—निर्देशन का कार्य प्रबन्ध की सामान्य बुद्धि और कुशलता से घनिष्ठ सम्बन्ध रखना है क्योंकि प्रवन्धक अपने व्यवहार के द्वारा अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को प्रेरित तथा प्रोत्साहित करता है।

निर्देशन का महत्त्व (Importance of Direction)—— निर्देशन के महत्त्व के विषय में जो भी कहा जाए कम होगा। जिस प्रकार बिना पतवार के नाव आगे नहीं बढ़ सकती ठीक उसी प्रकार कोई भी संस्था निर्देशन के बिना सफलतापूर्वक अपनी व्यावसायिक क्रियाओं को पूरा नहीं कर सकती। “निर्देशन व्यवसाय या प्रबन्ध का हृदय होता है, इसी के द्वारा आदेश प्रदान किए जाते हैं। 

Q. 3. निर्देशन के सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए। (Explain the principles of Direction.) 

Ans. निर्देशन के सिद्धान्त (Principles of Direction)—–कुन्ट्ज एवं ओ डोनेल (Koontz and O’Donnell) के अनुसार, प्रभावी निर्देशन के निम्नलिखित 11 सिद्धान्त – 

1. उद्देश्यों की प्राप्ति में व्यक्तिगत सहयोग का सिद्धान्त-प्रबन्धकों को यह प्रयत्न करना चाहिए कि उनके अधीनस्थ कर्मचारी सर्वोत्तम कुशलता से कार्य कर सके।

2. उद्देश्य की मधुरता का सिद्धान्त-— प्रबन्धकों को प्रत्येक कर्मचारी के प्रति मधुर सम्बन्ध स्थापित करना चाहिए ताकि संभावित संघर्ष को रोका जा सके।

3. निर्देशन की कुशलता का सिद्धान्त प्रभावशाली निर्देशन अपने उद्देश्य को न्यूनतम गत पर प्राप्त कर सकता है।

4. आदेश की एकता का सिद्धान्त-व्यावसायिक संगठन के अन्दर अधीनस्थ केवल एक ही त के प्रति उत्तरदायी हो और एक ही स्रोत से आदेश प्राप्त करे ताकि आदेशों में एकता हो सके।

5. प्रत्यक्ष निरीक्षण का सिद्धान्त – प्रबन्धकों को जहाँ तक सम्भव हो, स्वयं अधीनस्थों के कार्य का निरीक्षण करना चाहिए।

6. उचित निर्देशन विधि के चुनने का सिद्धान्त – निर्देश देने की विधि अधीनस्थ कर्मचारियों की आवश्यकतानुसार तथा काम की प्रकृति के अनुसार होनी चाहिए।

7. प्रबन्धकीय संचार व्यवस्था का सिद्धान्त-प्रत्येक संस्था में प्रबन्धक ही मुख्य रूप से संचार व्यवस्था होना चाहिए।

8. सन्देश ज्ञान का सिद्धान्त – यदि दिये गये सन्देश को अधीनस्थ कर्मचारी समझ ही न सके तो अपनाई गई संचार व्यवस्था बेकार सिद्ध होगी। इसलिए कुशल निर्देशन के लिए उपयुक्त संचार व्यवस्था होनी चाहिए।

9. सूचना का सिद्धान्त प्रभावी संचार व्यवस्था के लिए यह आवश्यक है कि आवश्यक सूचनाओं का प्रत्यक्ष तथा लगातार आदान-प्रदान होना चाहिए ताकि निर्देशन कार्य सफलतापूर्वक किया जा सके। 

10. नेतृत्व का सिद्धान्त प्रभावी निर्देशन कार्य के लिए प्रबन्धक में नेतृत्व करने का गुण होना चाहिए।

11. अनौपचारिक संगठन के उपयोग का सिद्धान्त-प्रबन्धक को कुशल निर्देशन के लिए आवश्यक हो तो कर्मचारियों से अनौपचारिक सम्बन्ध भी बनाने चाहिए।

Q. 4. भैसलो के आवश्यकता श्रृंखला की व्याख्या कीजिए और इसका अभिप्रेरक प्रक्रिया में महत्त्व बताइए। (Explain Maslow’s hirarchy of needs and its impor tance in the motivation process.) 

Ans. प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक ABRAHAM H.MASLAW ने मानवीय आवश्यकताओं को समझने के लिए आधारयुक्त ढाँचे का विकास किया है। Maslaw ने दो चीजों को प्रस्तावित किया- 

1. प्रत्येक आदमी की आवश्यकता उसके पास पहले से क्या है पर निर्भर करती है। केवल असंतुष्ट आवश्यकताएँ व्यवहार को प्रभावित कर सकती हैं—पूर्ण रूप से संतुष्ट की गई आवश्यकता व्यवहार को प्रभावित नहीं कर सकती।

2. आवश्यकताएँ महत्त्व के आधार पर श्रेणीबद्ध की जाती हैं।

1. मनोवैज्ञानिक आवश्यकताएं (Physiological Needs) इनमें से वे आवश्यकता आती हैं जिनसे मनुष्य के जीवन को बचाये एवं बनाये रखा जा सके। उदाहरण के लिए खाना, कपड़ा, आश्रय, पानी और जीवन की अन्य आवश्यकताएँ। इन चीजों की आवश्यकता स्वतः के लिए ही नहीं बल्कि परिवार के लिए भी होती है।

2. सुरक्षा संबंधी आवश्यकता (Security Needs) – एक बार जब मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं की संतुष्टि हो जाती है तो लोग चाहते हैं कि भविष्य में बिना किसी बाधा के इन इच्छाओं की संतुष्टि होती रहे। इससे व्यक्ति में एक प्रकार की सुरक्षा की भावना आती है। उदाहरण के लिए यदि किसी व्यक्ति को खाना मिल गया हो अथवा आश्रय मिल गया हो तो वह चाहेगा कि ये चीजें उसे भविष्य में भी मिलती रहे। 

3. सामाजिक आवश्यकता (Social Needs) सामाजिक सुरक्षा के अंतर्गत सामाि प्रकृति एवं साथी की आवश्यकता आती है इसके अंतर्गत प्यार की आवश्यकता और अपने सम लोगों की सहानुभूति है। ये आवश्यकताएँ नौकरी में मित्रगणों से तथा नौकरी के बाहर परिवार समुदाय से प्राप्त होती है। 

4. सम्मान की आवश्यकता (Ego Needs) — इस प्रकार की आवश्यकताएँ आत्म-सम्मान संतुष्टि की आवश्यकता होती है। इन आवश्यकताओं को अच्छे कार्य की मान्यता, चुनौती भरे कार्यों को निश्चित करना और कर्मचारियों को ऐसा अवसर प्रदान करना कि वे अच्छे काम की प्राप्ति में लगे रहे, उन्हें अच्छा कार्यालय मिले, अतिरिक्त अधिकार मिले आदि द्वारा प्राप्त किंवा जा सकता है।

5. सतत यथार्थीकरण की आवश्यकता (Self actualisation Needs) मेसलो के अनुसार स्थतः यथार्थीकरण की आवश्यकता का अर्थ है “एक व्यक्ति को अपनी क्षमतानुसार सब कुछ बनने की इच्छा”। आवश्यकताओं की पूर्ति व्यक्ति की अंतरात्मा से होती है।

1. अधिकतर व्यक्तियों के लिए इस श्रृंखला का पालन करना आवश्यक नहीं होता।

2. प्रत्येक व्यक्ति सदैव असंतुष्ट नहीं होता।

3. प्रत्येक व्यक्ति एक समय में कई आवश्यकताएँ पूरी करने की कोशिश करता है। इस कमियों के होने के बावजूद भी मैसलो की आवश्यकता श्रृंखला अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है तथा अभिप्रेरण संबंधी, सिद्धांतों में इसका महत्त्वपूर्ण स्थान है। क्योंकि ये मैसलो ही थे जिन्होंने सर्वप्रथम अभिप्रेषण के अर्थ, महत्त्व इत्यादि को समझा और संगठनात्मक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिये प्रतिपादित किया। 

Q.5. अभिप्रेरण को परिभाषित कीजिए। प्रबन्धक में इसका क्या महत्त्व है ? (Define Motivation. What is its importance in the management ? ) 

Ans. अभिप्रेरणा का अर्थ (Meaning of Motivation)— अभिप्रेरणा का शब्दकोशीय अर्थ इस प्रकार है, “मनुष्य के भीतर का वह तत्त्व जो उसे कार्य करने के लिए उत्साहित करता है।” अभिप्रेरणा का साधारण अर्थ किसी व्यक्ति में निश्चित कार्य करने की तत्परता जाग्रत करना है। अभिप्रेरणा में उन समस्त क्रियाओं का समावेश किया जाता है जिनके द्वारा श्रमिकों एवं कर्मचारियों को उपक्रम के उद्देश्य की पूर्ति में अधिकतम एवं श्रेष्ठतम कार्य करने हेतु प्रेरित किया। जाता है। यह प्रबन्ध का ऐसा महत्त्वपूर्ण कार्य है जिसमें कर्मचारियों को उत्पादन का एक साधन मात्र न समझ कर पनुष्य के रूप में देखकर मानव के अनुरूप ही व्यवहार किया जाता है।

परिभाषाएँ (Definitions) कुछ प्रख्यात विद्वानों ने अभिप्रेरणा को निम्नलिखित प्रकार से है—

1.विद्यमान है तो वह ऐसे कार्यों व साधनों की खोज कर सकता है जो उसे सहायता एवं प्रोत्साहन था. एम. डी. जुसियस के अनुसार, “अभिप्रेरणा निश्चित कार्यों को प्राप्त करने हेतु स्वयं या किसी अन्य व्यक्ति को प्रेरित करने की क्रिया है।” अभिप्रेरणा का सम्बन्ध कार्य करने की इच्छा से है। यदि कर्मचारी में कार्य करने की इच्छा

धन करते हैं। 

2. मैक्फारलेण्ड के अनुसार, “अभिप्रेरणा का अभिप्राय उस विधि से है जिसमे संवेगों, गों, इच्छाओं, आकांक्षाओं, प्रयासों या आवश्यकताओं को मानक आचरण के निर्देशन, नियन्त्रण स्पष्टीकरण के लिए प्रयोग किया जाता है।”

3. ब्रेच के अनुसार, “अभिप्रेरणा की समस्या व्यावहारिक प्रबन्ध की एक कुंजी है तथा निष्यादित रूप में यह प्रमुख प्रवन्ध अधिकारी का मुख्य कार्य है।” अतः निश्चित रूप से यह कहा सकता है कि संगठन की भावना उच्च स्तर में अभिप्रेरणा का प्रतिबिम्ब है।

उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि अभिप्रेरणा का अभिप्राय वांछनीय गतिविधियाँ अपनाने के लिए उत्सुकता, तनाव या उत्तेजना से है। यह उत्तेजना स्वयं प्रबन्धक में हो सकती है या स्वयं अधीनों में हो सकती है। अभिप्रेरणा का महत्त्व (Significance of Motivation)- रेन्सिस लिकर्ट ने अभिप्रेरणा

को प्रबन्ध का मूल आधार माना है। अभिप्रेरणा कार्य समूह को प्रोत्साहित करने के लिए प्रबन्ध च एक प्रभावशाली यन्त्र है। यह प्रबन्ध का एक ऐसा महत्त्वपूर्ण कार्य है जिसमें श्रमिकों व कर्मचारियों को उत्पादन का साधन मात्र न समझकर मनुष्य के रूप में देखकर मानव के अनुरूप व्यवहार किया जाता है। यह प्रत्येक प्रबन्धक का उत्तरदायित्व है कि यह अपने अधीनस्थों को प्रोत्साहित करे, उनमें कार्यशीलता की भावना को जागृत करे कि वे संस्था के उद्देश्यों की पूर्ति में अधिकतम योगदान कर सके। 

Q.6. अभिप्रेरणा की प्रकृति को समझाइए। (Explain the Nature of Motivation.)

Ans. अभिप्रेरणा की प्रकृति (Nature of Motivation ) अभिप्रेरणा में मनुष्य के व्यवहार की अनेक महत्त्वपूर्ण बातों को शामिल किया जाता है। जैसे—– इच्छाएँ, नियन्त्रण, आवश्यकताएँ राधा लक्ष्य इत्यादि मनुष्य के सभी आवरण प्रेरणात्मक होते हैं क्योंकि ये उसकी शारीरिक, मानसि सामाजिक तथा मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं को सन्तुष्ट करने के उद्देश्य से किए जाते है। में कुछ ऐसे तत्व पाए जाते हैं जो व्यक्ति के रहन-सहन के स्तर में वृद्धि करने हेतु मान विधान उत्पन्न करते हैं। अभिप्रेरणा द्वारा इस मानसिक खिंचाव को दूर करने के प्रयास किए हैं। अन्य शब्दों में अभिप्रेरणा द्वारा मानव व्यवहार को नियन्त्रित किया जाता है। समा

अभिप्रेरणा की प्रक्रिया चक्रिय प्रक्रिया की होती है। यह तनाव तथा उद्वेग से प्रारम्भ है जिसमें व्यक्ति को अपूर्ण इच्छा का तीव्र थोप होता है। 

तत्पश्चात् एक बेचैनी का जन्म है है तथा उस इच्छा को सन्तुष्ट करने के साधनों की खोज की जाती है। अन्त में वह इच्छा क सीमा तक पूर्ण की जाती है या लक्ष्य में संशोधन किया जाता है, जब व्यक्ति उस प्राप्त सन्त का मूल्यांकन करता है तथा अपने भावी आचरण के विषय में निर्णय लेता है तो अभिप्रेरणा च चक्र पूरा हो जाता है।

Q.7. अभिप्रेरणा के सिद्धान्त बताइए। (Explain the principles of Motivation.) 

Ans. अभिप्रेरणा के सिद्धान्त (Theories of Motivation ) व्यक्तियों के अभिप्रेरणा

के सम्बन्ध में बहुत कुछ लिखा गया है; भिन्न-भिन्न विद्वानों ने अपने अनुभव और अध्ययन के आधार पर अभिप्रेरणा के सिद्धान्त प्रतिपादित किये हैं। परन्तु अब्राहम मासलो, फ्रेड्रिक हर्जवरम तथा मैकग्रेगर श्री एफ. एम. स्टॉगिल, रेन्ससलिकर्ट का योगदान प्रमुख है। अभिप्रेरणा के सिद्धान्तों को निम्नलिखित प्रकार वर्णित किया जा सकता है-

1. मासलो का आवश्यकताओं की प्राथमिकता का सिद्धान्त (Maslow’s Need Priority Theory )—यह उत्प्रेरणा सम्बन्धी अधिक ठोस सिद्धान्त है। यह इस मान्यता पर आधारित है कि मनुष्य केवल एक ही प्रकार की आवश्यकता की पूर्ति के लिए कार्य नहीं करता, अपितु अनेक प्रकार की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु कार्य करता है। मासलो ने अपने सिद्धान्त का प्रतिपादन

करते समय मनुष्य की आवश्यकताओं को पाँच भागों में वर्गीकृत किया है— 

(i) शारीरिक आवश्यकताएँ (Physiological Needs) – इसके अन्तर्गत मनुष्य की आधारभूत आवश्यकताएँ – भोजन, वस्त्र तथा निवास शामिल हैं। 

(ii) सुरक्षा की आवश्यकता (Safety Needs) — प्रत्येक व्यक्ति के लिए यह अत्यन्त आवश्यक है कि उसके जीवन के कल्याणार्थ रोजगार एवं आर्थिक सुरक्षा बनी रहे। 

(iii) सामाजिक आवश्यकताएँ (Social Needs) अर्थात समाज की एक इकाई के रूप में समाज से सम्बन्ध बनाए रखने के लिए आवश्यकताएँ।

(iv) आत्म-सम्मान की आवश्यकता (Ego Needs) — संसार में इस प्रकार की स्थिति ग्रा करने हेतु आवश्यकताएँ जिससे मनुष्य को उचित सम्मान प्राप्त होता रहे।

(v) आत्मसन्तुष्टि की आवश्यकता (Self Fulfilment Needs) — ऐसा पेशा प्राप्त करने की आवश्यकता, जिससे व्यक्ति को अपने कौशल के प्रयोग का अवसर प्राप्त हो सके तथा उसकी क्षमताओं का पूर्ण विकास हो सके।

मासलो ने उपरोक्त आवश्यकताओं को अहंगत आवश्यकताओं का नाम दिया है। दूसरो पर अपना प्रभाव जमाने की इच्छा को अहंगत आवश्यकता कहते हैं। परन्तु एक आवश्यकता दूसरी आवश्यकता पर अहंगल नहीं होती जब तक कि उससे पहले वाली आवश्यकता की सामान्य रूप से तुष्टि न हो जाए। 

2. उपलब्धि सम्भाव्य सिद्धान्त (Achievement Expectation Theory)—अभिप्रेरण

का यह सिद्धान्त श्री एफ. एम. स्टागिल द्वारा प्रतिपादित किया गया जिसमें पारस्परिक क्रियाएँ, उपलब्धि एवं आशाएँ तीनों तत्त्वों को महत्त्व प्रदान किया गया। प्रत्येक व्यक्ति प्रायः दैनिक जीवन में कुछ उपलब्धि प्राप्त करना चाहता है। 

सिद्धान्त x यह धारणा मानकर चलता है कि व्यक्तियों में स्वाभाविक रूप से- 

(i) ईमानदारी तथा सत्यता की कमी होती है। 

(ii) मूल रूप से सुस्त होते हैं और उनमें कार्य करने की कम इच्छा होती है। 

(iii) कार्य के उत्तरदायित्व से बचना चाहते हैं। 

(iv) सफलता में रुचि नहीं रखते। 

(v) संगठन की आवश्यकताओं के प्रति उदासीन होते हैं। 

(vi) दूसरों द्वारा निर्देशित होने की प्रवृत्ति रखते हैं। 

(vii) चतुर एवं होशियार नहीं होते।

FAQs

Q.1. अभिप्रेरणा का क्या अर्थ है ? (What is the meaning of Motivation) 

Ans. मैक फारलेण्ड के अनुसार, अभिप्रेरणा का अर्थ उस विधि से है जिसमें संवेगों, इच्छाओं अथवा आवश्यकताओं को मानकर आचरण के निर्देशन, नियंत्रण तथा स्पष्टीकरण के लिए उपयोग किया जाता है। 

Q.2. एक सफल नेता के गुण बतलाइये । (Explain the qualities of a good leader)

Ans. ऑर्डवे टीड ने सफल नेता के निम्नलिखित 10 गुण बतलाये हैं- 1. शारीरिक तथा स्नायु शक्ति 2. उद्देश्य एवं दिशा का ज्ञान, 3. उत्साह, 4. मित्रता एवं सहृदयता, 5. निष्ठा, 6. तकनीकी निपुणता, 7. निर्णय सामर्थ्य, 8. बुद्धिमता, 9. तकनीकी चातुर्य, 10. विश्वास।

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