NCERT Class 12 Business Studies Chapter 8 Notes in Hindi नियंत्रण Pdf

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NCERT Class 12 Business Studies Chapter 8 Notes in Hindi नियंत्रण Pdf Download

कक्षा | Class12th 
अध्याय | Chapter08
अध्याय का नाम | Chapter Nameनियंत्रण | Controling
बोर्ड | Boardसभी हिंदी बोर्ड
किताब | Book एनसीईआरटी | NCERT
विषय | Subjectव्यवसाय अध्ययन | business studies
मध्यम | Medium हिंदी | HINDI
अध्ययन सामग्री | Study Materialsप्रश्न उत्तर | Question answer
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Class 12 Business Studies Chapter 8 Notes in Hindi नियंत्रण

पाठ की प्रमुख- विस्तृत अर्थ में, नियंत्रण से तात्पर्य इस बात का पता लगाने एवं देखने से है कि उपक्रम के समस्त कार्य प्रबंध द्वारा निर्धारित उद्देश्यों योजनाओं, कार्यक्रमों दिये गये निर्देशों एवं नियमों के अनुसार हो रहे हैं या नहीं। इसका उद्देश्य काम की दुर्बलताओं त्रुटियों और विचलनों को प्रकाश में लाना, उसके कारणों एवं भविष्य में उसकी पुनरावृत्ति रोकी जा सके। 

देखा जाये तो जहाँ भी संयुक्त एवं सुधारों एवं साधनों द्वारा समूहों के लक्ष्यों की प्राप्ति करनी है, वहाँ पर नियन्त्रण एक अनुपेक्षणीय अनिवार्यता है। ज्यों-ज्यों किसी उपक्रम का आकार बढ़ता जाता है, कर्मचारियों की संख्या बढ़ती जाती है तथा कार्य-पद्धतियाँ जटिल होती जाती है, त्यों-त्यों नियंत्रण की आवश्यकता एवं महत्त्व बढ़ता जाता है। नियंत्रण के बिना कोई भी प्रबंधक अपने कार्य को पूरा नहीं कर सकता।

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NCERT Class 12 Business Studies Chapter 8 Notes in Hindi नियंत्रण Pdf

नियोजक व नियंत्रण के मध्य पनिष्ठ अंतर-सम्बन्ध है। नियोजन व नियंत्रण दोनों एक-दूसरे के लिए आवश्यक कार्य है नियोजन प्रभावी नियंत्रण के लिए प्रारम्भिक राते अथवा तत्व है। बिना नियोजन के नियंत्रण करना सम्भव नहीं है। प्रत्येक प्रबंधक को नियंत्रण करने के लिए नियोजन का सहारा लेना पड़ता है। 

नियोजन तथा नियंत्रण दोनों ही प्रबंधकीय कार्य हैं और एक-दूसरे से सम्बद्ध है। दोनों ही एक-दूसरे पर निर्भर हैं। नियोजन के बिना नियंत्रण अर्थहीन है एवं नियंत्रण नियोजन के बिना नेत्रहीन नियंत्रण नियोजन को उद्देश्यपूर्ण बनाता है एवं नियोजन नियंत्रण को निर्देशन प्रदान करता है।

नियंत्रण प्रक्रिया सार्वभौमिक है। चाहे किस भी प्रकार का संगठन या कार्य हो, नियंत्रण करना आवश्यक तो होता है लेकिन यह कोई आसान कार्य भी नहीं होता । प्रभावी नियंत्रण हेतु एक निश्चित कदमों वाली प्रक्रिया का उपयोग करना आवश्यक होता है।


अति लघु उत्तरीय प्रश्न (Very Short Answer Type Questions)


Q. 1. नियंत्रण की एक उचित परिभाषा दीजिए। (Give an suitable definition controlling.)

Ans. नियंत्रण वास्तविक परिणामों तथा इच्छित परिणामों दोनों को निकटतम लाने की प्रक्रिया है। इसके अन्तर्गत वास्तविक प्रगति व निर्धारित प्रमापों के बीच विचलनों का पता लगाया जाता है। विचलनों के कारणों की खोज की जाती है और उन्हें दूर करने के लिए सुधारात्मक कदम उठाया जाता है।

Q. 2. व्यापार में नियंत्रण की क्या आवश्यकता है? (What is the need of control in business ? )

Ans. 

(i) व्यापार का बड़ा आकार (Broad size of Business) – आधुनिक युग में व्यापार का आकार बड़ा हो गया है। इसके बिना उसका संचालन नहीं है। 

(ii) व्यापार परिवर्तन (Change in Business) – समय-समय पर बदलती हुई सरकारों, नये नये परिवर्तन और औद्योगिक नीतियों को समझने के लिए नियंत्रण की आवश्यकता है। 

(iii) निर्णयों के लिये (Decision Making) – प्रबंध के नीचे से ऊपर तक अनेक निर्णय लिये जाते हैं। यह निर्णय नियंत्रण द्वारा ही सम्भव होते हैं।

Q. 3. प्रबन्ध के एक कार्य के रूप में नियंत्रण की विशेषतायें बताइये। (Enumerate the features of controlling as a function of Management.) 

Ans. 

1. नियंत्रण एक सतत् प्रक्रिया है और प्रबंध का अनिवार्य अंग है।

2. नियंत्रण प्रबंध का सर्वव्यापक कार्य है। इसका क्षेत्र व्यापक है और हर जगह पाया जाता है। है. यह संस्था में सुधारात्मक कार्य करवाता है। यह विचलनों का विश्लेषण करके उनके कार्यों का पता लगाता है। १४. यह भविष्यवादी दृष्टिकोण रखता है। यह पीछे की बजाये जाने देखता है।

Q. 4. नियंत्रण प्रक्रिया में निहित कदमों की गणना कीजिए। (Enumerate the steps in process of control.) 

Ans. नियंत्रण प्रक्रिया में निहित कदम निम्नलिखित हैं-

1. प्रमापों का निर्धारण करना।

2. वास्तविक निष्पादक का मापन करना।

3. वास्तविक निष्पादन की तुलना प्रमापों से करना और विचलनों का पता लगाना ।

4 आवश्यकतानुसार उचित सुधारात्मक कार्यवाही करना ।

Q.5. नियंत्रण का क्या कार्य क्षेत्र है? (What is the scope of control?)

Ans. (i) नीतियों पर नियंत्रण (Control of Policies) नीति निर्धारण, परिवर्तन पालन आदि नियंत्रण के क्षेत्र में आते हैं।

(ii) संगठन पर नियंत्रण (Control on organisation) संगठन से पूर्व निर्धारित उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिये समय-समय पर जाँच करता है।

(iii) कर्मचारियों, मजदूरों एवं वेतन पर नियंत्रण (Control on Employees and का मूल्यांकन करके उनकी मजदूरी एवं वेतन का निर्धारण करता है।

Salaries) संवर्गीय प्रबंध की सहायता से कर्मचारियों पर नियंत्रण करता है। कर्मचारियों के कार्य

Q. 6. नियंत्रण का क्या अर्थ है? (What is the meaning of Control?) 

Ans. नियंत्रण का अभिप्राय इस बात की जाँच करना है कि क्या सभी कार्य योजनानुसार निश्चित उद्देश्यों, निर्देशों और नियमों के अनुसार हो रहा है या नहीं। इसका उद्देश्य कार्य की कमियों का पता लगाना है जिसे समयानुसार सुधारा जा सके और भविष्य में उन्हें रोका जा सके।

Q. 7. नियंत्रण की दो अलग विद्वानों द्वारा दी गई परिभाषा दीजिए। (Give definitions of control given by two different scholars.)

Ans. 

(i) जोसेफ एल. मौसी के अनुसार नियंत्रण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा वर्तमान निष्पादन का मापन किया जाता है और कुछ पूर्व निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए इसका मार्गदर्शन करता है।

(ii) बिली ई. गोट्ज के अनुसार, “प्रबंधकीय नियंत्रण से आशय घटनाओं को योजना के अनुसार बनाए रखने से है। “

(iii) कोहलर के अनुसार, “नियंत्रण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा वास्तविक परिणामों की इच्छित परिणामों के पास लाने का प्रयास किए जाते हैं।”

10. 8. नियंत्रण के उद्देश्य बताइये। (Write the objectives of control.)

Ans. नियंत्रण के उद्देश्य निम्नलिखित हैं-

(i) उद्देश्यों की जानकारी करना ( Determining objectives) इस बात का पता लगाना कि क्या किया जाना है और किस समय किया जाना है।

(ii) साधनों की जानकारी करना ( Determining of Resources) किसी कार्य को करने के लिए कितनी पूँजी और मानवीय शक्ति की आवश्यकता है। 

(iii) विचलन का पता लगाना (Determining Deviation)- प्रतिमानों एवं निष्पादन में विचलन का पता लगाना और संशोधन करना।

Q. 9. प्रबंधकीय नियंत्रण की क्या प्रकृति है? (What is nature of Managerial Control?)

Ans. 

(i) नियोजन का आधार (Basis of Planning)- नियोजन के बिना निर्धारण संभव नहीं है।

(ii) यह भविष्य से संबंधित होता है (Future Oriented)- यह हमेशा भविष्य से संबंधित होता है। जो गलती एक बार हो गई दुबारा न हो यही नियंत्रण का आधार है।

(iii) यह प्रबंध का कार्य है (Important Function of Management) यह का है। इसके अलावा दूसरा नहीं कर सकता है।

Q. 10. “नियोजन नियंत्रण का आधार होता है। इस कथन को स्पष्ट कीजिए। (Explain “Planning is the basis of control.”)

Ans. नियोजन को नियंत्रित का आधार माना जाता है। नियोजन यह निश्चित कर देता है. कि किस विभाग ने और किन व्यक्तियों ने एक निर्धारित समय में क्या करना है। फलस्वरूप नियंत्र प्रभावी हो जाता है क्योंकि अब नियंत्रण करने वाले प्रबंधक को प्रत्येक सम्बंधित विभाग और व्यक्ति की वास्तविक प्रगति को नियोजित प्रगति से नापने का अवसर मिल जाता है।

Q.11. “नियंत्रण एक सतत् प्रक्रिया है”। समझाइये। (Control is a Continuous Process”. Define.)

Ans. नियंत्रण को कार्य सतत् चलता रहता है। कुण्ट्ज एवं ओ डोनेल के अनुसार, “जिस प्रकार नाविक निरंतर यह निश्चित करने के लिए अध्ययन करता रहता है कि यह निर्धारित मार्ग की ओर अग्रसर है, ठीक उसी प्रकार एक व्यावसायिक प्रबंधक भी निरंतर यह निश्चित करने के लिए अध्ययन करता है कि उसकी संस्था या विभाग सही मार्ग पर है।”

Q.12. प्रमाप कितने प्रकार के होते हैं ? (What are the rypes of standard.) 

Ans. प्रमाप कई प्रकार के होते हैं। भौतिक व मौद्रिक प्रमाप तथा मूर्त व अमूर्त 

Q.13. भौतिक व मौद्रिक प्रमाप की परिभाषा दीजिए। (Define plysical and monetary standards.)

Ans. भौतिक प्रमाप (Physical Standards) भौतिक प्रमाप वे हैं जिन्हें भौतिक इकाइयों में, जैसे इकाइयों की संख्या, श्रम घण्टे अथवा अन्य भौतिक इकाइयों में व्यक्त किया जाता है, जैसे- एक मोटरगाड़ी का एक लीटर पेट्रोल में 10 किमी. चलना भौतिक प्रमाप है।

मौद्रिक प्रमाप (Monetary Standards) मौद्रिक प्रमाप के हैं जिन्हें मुद्रा में व्यक्त किया। जाता है, जैसे—एक इकाई के उत्पादन में कच्चे माल की लागत कितनी होगी।

Q. 14. मूत तथा अमूर्त प्रमाप को समझाइए । (Define tangible and intangible standards.)

Ans. मूर्त प्रमाप (Tangible Standards) पूर्त प्रमापों का अभिप्राय ऐसे प्रमापों से है जिन्हें भौतिक या मौद्रिक निश्चित इकाइयों में व्यक्त किया जा सकता है। जैसे—प्रतिदिन की वि की मात्रा या प्रतिदिन उत्पादन की कुल लागत आदि ।

अमूर्त प्रमाप (Intangible Standards) – अमूर्त प्रमापों का अभिप्राय ऐसे प्रमापों से है. जिन्हें सुनिश्चित ढंग से इकाइयों में व्यक्त नहीं किया जा सकता, जैसे—फर्म की ख्याति, कर्मचारियों का मनोबल बढ़ाना, औद्योगिक शांति या अन्य मानवीय संबंधों के लक्ष्यों को निर्धारित करना कठिन कार्य है।

Q. 15. आयगत व पूँजीगत प्रमापों को परिभाषित कीजिये । (Define Revenue and Capital Standards.)

Ans. आयगत व पूँजीगत प्रमाप निम्नलिखित है-

आयगत प्रमाप (Revenue Standards) इसके अंतर्गत वे प्रमाप आते हैं जिन्हें बिक्री के मूल्य के रूप में व्यक्त किया जा सकता है। जैसे—दिल्ली में प्रतिव्यक्ति बिक्री का प्रमाप या प्रत्येक क्षेत्र में अलग-अलग प्रति सप्ताह बिक्री का प्रमाप आदि।

पूँजीगत प्रमाप (Capital Standards) — पूँजीगत प्रमाप वे प्रमाप हैं जिन्हें पूँजीगत व्ययों अनुपात के रूप में व्यक्त किया जा सकता है, जैसे—ऋण और स्वामित्व पूँजी का अनुपात, कार्यशील अनुपात आदि।

Q. 16. निष्पादन की सीमा कैसे निर्धारित की जाती है ? (How level of achievement or performance established?)

Ans. निष्पादन स्तर ठीक उसी प्रकार निर्धारित किए जाते हैं जैसे कि प्रमापों का निर्धारण । ” का स्तर भी भौतिक स्तर या मौद्रिक स्तर के रूप में निर्धारित किया जा सकता है जैसे धन पण्टे, इकाइयों की संख्या, विक्री की मात्रा व मूल्य एवं व्यापों के स्तर। पादन

“अच्छा ये संतोषजनक स्तर वह होता है जो उचित स्तर हो और जिसे प्राप्त किया जा सके। स्तर कुछ लोचपूर्ण भी होना चाहिए और इस स्तर की कुछ अधिकतम व न्यूनतम सीमाएँ भी निर्धारित होनी चाहिए। 

Q.17. नियंत्रण प्रणाली कितने प्रकार की होती है ? (What are the types of control method?)

Ans. नियंत्रण की अधिकांश प्रणालियों को चार भागों में बाँटा जा सकता है अर्थात् नियंत्रण 4 प्रकार का है- 

(i) कार्यवाही से पूर्व का नियंत्रण,

(ii) नियंत्रण कार्यवाही करना,

(iii) जाँच नियंत्रण, तथा

(iv) कार्यवाही के पश्चात् का नियंत्रण।

उपरोक्त चारों प्रकार के नियंत्रण एक-दूसरे के पर्यायवाची नहीं, बल्कि पूरक होते हैं। फिर भी उपरोक्त में नियंत्रण कार्यवाही करना अति महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इनमें किसी कार्य के समाप्त होने से पूर्व ही नियंत्रण स्थापित किया जाता है।

Q. 18. ‘नियंत्रण भविष्यदर्शी होता है।’ इस कथन को लगभग संक्षेप में समझाइये । (‘Control is forward looking’. Define this sentence in brief.) 

Ans. नियंत्रण का उद्देश्य व्यवसाय के भावी लक्ष्यों की प्राप्ति है। यही कारण है कि सुधारक कार्यवाहियों इस प्रकार की जाती हैं कि भविष्य में उन कमियों और गलतियों को न दोहराया जाए जो कि वर्तमान में की गई है। इस प्रकार नियंत्रण प्रक्रिया कार्य की वास्तविक प्रगति की समीक्षा की नहीं वरन् भविष्य के उद्देश्यों और लक्ष्यों की प्राप्ति भी है।


लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Type Questions)


Q. 1. नियन्त्रण की परिभाषाएँ दीजिए। (Define the definitions of control.) 

Ans. नियंत्रण की परिभाषाएँ (Definitions of Control) नियंत्रण की परिभाष विभिन्न विद्वानों ने भिन्न-भिन्न ढंग से परिभाषित की हैं, उनमें से प्रमुख परिभाषाएं निम्नलिखित है- मेरी कुशिंग नाइल्स के अनुसार, “नियन्त्रण किसी निश्चित लक्ष्य या समूह की ओर निर्देशित क्रियाओं में सन्तुलन बनाए रखना है ।”

श्री हेनरी फेयोल (Henry Fayol) के अनुसार, “नियंत्रण से आशय यह जांच करने मे है कि क्या प्रत्येक कार्य स्वीकृत योजनाओं, दिए गए निदेशों तथा निर्धारित नियमों के हो रहा है या नहीं। 

इसका उद्देश्य कार्य की दुर्बलताओं और त्रुद्धियों का पता लगाना है, तुला यथा समय सुधारा जा सके और भविष्य में उसकी पुनरावृत्ति रोकी जा सके।” जॉर्ज आर. टेरी (George R. Terry) टेरी के शब्दों में “नियंत्रण का तात्पर्य करना है कि क्या किया जा रहा है। 

दूसरे शब्दों में, कार्यों का मूल्यांकन करना और आवश्यकता पड़ने पर संशोधनात्मक प्रयासों को काम में लेना है जिससे कि योजनाबद्ध निष्पादन हो सकता यह निश्चित

Q. 2. नियन्त्रण की प्रकृति एवं लक्षण बतलाइए। (Explain the Nature and Characteristics of Control.)

Ans. नियन्त्रण की प्रकृति एवं लक्षण (Nature and Characteristics of Control)-

नियंत्रण की प्रकृति एवं लक्षण निम्नलिखित हैं-

1. यह प्रबन्धक क कार्य है (Manager’s Function)- नियन्त्रण करना प्रबन्ध का करें है न कि संस्था के अध्यक्ष का। प्रबन्धक के इस कार्य को प्रबन्धक की ओर से कोई भी अम व्यक्ति पूरा नहीं कर सकता यानी स्वयं प्रबन्धक को ही यह कार्य करना पड़ता है।

2. यह चक्राकार प्रवाह है (It is a circular movement ) नियन्त्रण का प्रारम्भ उद्देश्ये। के निर्धारण से होता है। ये उद्देश्य ही वे प्रमाप होते हैं जिनसे संस्था के कर्मचारियों के कार्य का मूल्यांकन किया जाता है। मूल्यांकन के आधार पर ही प्रबन्धक आवश्यक सुधार करता है और नई योजनाएँ एवं प्रमाप निर्धारित करता है।

3. यह भविष्योन्मुख होता है (It is Forwards looking) नियन्त्रण हमेशा भविष्य से सम्बन्धित होता है। जो कुछ भूतकाल में हुआ उनका नियन्त्रण नहीं किया जाता बल्कि भूतक में किए गए कार्यों के आधार पर भविष्य में कार्यों का नियन्त्रण नहीं किया जाता है।

4. नियन्त्रण सभी स्तरों पर किया जाता है (It is Exercised at all Levels) – नियन्त्र की आवश्यकता प्रबन्ध के सभी स्तरों पर होती है तथा नियन्त्रण की समस्याएँ प्रबन्ध के प्रत्येक स्तर पर अलग-अलग होती है।

5. यह एक सतत चलने वाली प्रक्रिया है (It is a Continuous Process) नियन्त्र प्रक्रिया लगातार चलती रहती है जो कभी भी समाप्त नहीं होती। प्रबन्ध हमेशा अपने उपक्रम है।

उद्देश्यों एवं कार्यों के बीच सन्तुलन बनाए रखने का प्रयास करता है। 

6. नियन्त्रण हस्तक्षेप से भिन्न है (Control is different from Interference)-नकारात्मक होता है। यह कार्य की गति अवरुद्ध करता है जबकि नियन्त्रण धनात्मक (Positive) होता है।

7. नियन्त्रण की प्रकृति निश्चयात्मक और नकारात्मक दोनों है (Nature of Control Positive and Negative both ) नियन्त्रण स्वीकार योग्य कार्यों एवं क्रियाओं को प्रोत्साहन है तथा अस्वीकर योग्य कार्यों एवं क्रियाओं को प्रतिबन्धित (Restricted) या नकारात्मक (Negative) करता है।

‘8. नियन्त्रण व्यक्तियों पर नहीं है (No Control on Personnel)–प्रबन्धकीय नियन्त्रण द्वितीय उत्पादन के साधनों से सम्बन्धित है। जैसे-सामग्री, मशीन तथा उत्पादन के अन्य निर्जीव साधन । 

Q.3. एक आदर्श / अच्छी / प्रभावशाली नियंत्रण प्रणाली के तत्व या आवश्यकताएँ या लक्षण क्या होते हैं? (What are the essential elements for a good control system.)

Ans. 

(i) संस्था की आवश्यकताओं के अनुरूप हो। 

(ii) नियंत्रण प्रणाली लोचशील होनी चाहिए।

(ii) नियंत्रण प्रणाली मितव्ययी होनी चाहिए।

(iv) यह संस्था के उद्देश्यों को प्राप्त करने वाली हो।

(v) उत्तरदायी केन्द्रों का निर्माण होना चाहिए जिससे कि दायित्वों का निर्धारण किया जा सके।

(vi) वास्तविक निष्पादन का रिकॉर्ड रखना चाहिए।

(vii) प्रत्यक्ष रूप से नियंत्रण होना चाहिए।

(viii) यह अग्रगामी होना चाहिए।

(ix) सुधारात्मक कार्यवाही सुझाने की व्यवस्था हो।”

Q. 4. सुधारक कार्यवाही के रूप में कौन-कौन से कार्य किए जा सकते हैं? (What are the main types of Corrective Actions?)

Ans. सुधारक कार्यवाही के रूप में निम्नलिखित कार्यों में से कोई भी कार्य किया जा सकता है-

1. भौतिक परिस्थितियों में सुधार (Improvement in Standard of Living of Employees) कर्मचारियों के लिए कार्य पर तथा यथासमय उचित कच्चे माल, मशीन व उपकरण की व्यवस्था करना।

2. कर्मचारियों के निर्देशन व प्रशिक्षण की व्यवस्था (Facilities Direction and Training)- यदि कार्य में कमी और त्रुटि का कारण कर्मचारियों का अप्रशिक्षित होना या निर्देश का अभाव है तो उनके प्रशिक्षण और समुचित मार्गदर्शन की व्यवस्था करनी चाहिए। 

3. व्यावसायिक योजनाओं में संशोधन (Rectification in Policies) – यदि विचलन का कारण व्यावसायिक परिस्थितियों के परिवर्तन स्वरूप योजनाओं का अवास्तविक हो जाना है तो आवश्यकता इस बात की है वास्तविक परिस्थितियों के अनुरूप स्पष्ट, निश्चित और वास्तविक सेनाएं बनाई जाएँ। 

4. कर्मचारियों की उचित अभिप्रेरणा (Proper Motivation) यदि कार्य में त्रुटि या कमी कर्मचारियों के कार्य के प्रति उदासीनता के कारण हैं तो कर्मचारियों को समुचित अभिप्रेरणा करना चाहिए ताकि कर्मचारी उत्साह एवं लगन से कार्य करें।

Q.5. नियंत्रण प्रणाली कितने प्रकार की होती है? समझाइये। (What are the types of Control Method ? Explain.)

Ans. नियंत्रण प्रणाली चार प्रकार की होती है जो इस प्रकार है-

1. कार्यवाही से पूर्व का नियंत्रण (Controlling Before Action)- इस प्रणाली में कार्यवाही करने से पूर्व यह देखा जाता है कि कार्यवाही के लिए आवश्यक साधन उपलब्ध हैं या नहीं।

2. नियंत्रण कार्यवाही करना (Initiate Controlling Procedure)- इसमें या प्रक्रिया के पूर्ण होने से पहले ही उसमे प्रमापों से विचलन किया जाता है और उस विचलन को दूर करने के लिए नियंत्रण कार्यवाही की जाती है। 

3. कार्यवाही के पश्चात् का नियंत्रण (Controlling after the Completion of Activities) कोई कार्य पूरा हो जाता है तो वास्तविक निष्पादन की तुलना प्रमाप निष्पादन से करके निजाते हैं और उन विचलनों के कारणों का पता लगाया जाता है। 

4. जाँच नियन्त्रण (Checking) यदि किसी किया में बहुत अधिक व्यय होना हो या बी जोखिम अधिक हो तो वहाँ उस कार्यवाही से पूर्व उस कार्यवाही के महत्त्वपूर्ण पहलुओं की जांच करके विपतन द्वारा किए जाते हैं और उन विचलनों के कारणों का पता लगाया जाता है,

Q.6. नियन्त्रण के महत्त्व को स्पष्ट कीजिए। (Discuss the importance of control.)

Ans. नियंत्रण के महत्व अथवा लाभ (Importance or Advantages Control) नियन्त्रण प्रबन्ध का महत्त्वपूर्ण कार्य है क्योंकि यह कार्य को मापने और उसका मूल्यांकन करने की सर्वश्रेष्ठ विधि है। यही कारण है कि प्रबन्ध क्षेत्र में नियन्त्रण की विभिन्न तकनीकी का महत्व दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। अतः प्रबन्ध के क्षेत्र में निम्नलिखित कारणों से नियन्त्रण का विशेष महत्व है-

1. नियन्त्रण, प्रत्यायोजन की प्रक्रिया में सहायता (Control is helpful in Delega tion)—–प्रबन्ध का कार्य अन्य व्यक्तियों से काम लेना होता है जिसके लिए उन्हें अधिकार एवं दायित्व सीपता है। बिना उचित नियंत्रण के यह ज्ञात नहीं किया जा सकता है कि अधिकारों का उपयोग ठीक हो रहा है तथा दायित्यों का ठीक प्रकार निर्वाह किया जा रहा है अथवा नहीं।

2. समन्वय में सहायक (Helpful in Coordination ) — नियन्त्रक द्वारा उपक्रम की विविध क्रियाओं को एक सून में बाँधा जा सकता है। अच्छा नियन्त्रक उपक्रम के विभिन्न विभाग एवं सारों पर होने वाली अव्यवस्थाओं को रोकने में सहायक होता है। अतः नियन्त्रण एक ऐसा ऐसा साधन है जिसके व्यवसाय में श्रम और माल के दुरूपयोग को रोका जा सकता है। नियन्त्रण उत्पत्ति के सभी साधनों को समन्वित करके अपने उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए अग्रसर करता है

3. कार्य का मूल्यांकन (Evaluating of the Performance ) — नियन्त्रण द्वारा व्यावसायिक उपक्रम के कार्य की प्रगति का मूल्यांकन किया जा सकता है। इसके आधार पर यह देखा जाता है कि संस्था के पूर्व निर्धारित उद्देश्यों को प्राप्त करने में कहाँ तक सफलता मिली है तथा इस सम्बन्ध में कौन-सी बाधाएँ और कठिनाइयों आई है तथा भविष्य में उन्हें कैसे रोका जा सकेगा।

4. अभिप्रेरणा का साधन (Source of Motivation) – यदि समुचित नियन्त्रण न से तो इस बात का पता नहीं चल सकेगा कि कौन-सा कर्मचारी अधिक और अच्छा काम करता है तथा कौन-सा व्यक्ति अकुशल अथवा कमजोर है। काम की मात्रा तथा किस्म के मापदण्ड स्थापित कर नियन्त्रण कर्मचारियों को यथाशक्ति अच्छा और अधिक काम करने की प्रेरणा देता है।


दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (LONG ANSWER TYPE QUESTIONS)


Q.1. प्रभावी प्रबन्धकीय नियन्त्रण प्रणाली के तत्वों का वर्णन कीजिए। (Explain the main elements of a sound control system.)

Ans. अच्छे नियन्त्रण के लिए आवश्यक बातें (Essential for a Good Control System) – एक प्रभावशाली नियन्त्रण प्रक्रिया में निम्नलिखित तत्व होने चाहिए-

1. उद्देश्यों का स्पष्टीकरण (Clarification of Objectives) एक प्रभावशाली नियन्त्रण व्यवस्था के निर्माण से पहले सबसे बड़ी आवश्यकता यह है कि संस्था के उद्देश्यों को अच्छी तरह स्पष्ट कर लेना चाहिए।

2. महत्त्वपूर्ण बिन्दुओं का निर्धारण (Critical points should be established)- महत्त्वपूर्ण बिन्दुओं प्रणाली ऐसी होनी चाहिए जो नियन्त्रण का ध्यान सामरिक महत्त्व के स्थानों की ओर कर सके। यहाँ पर महत्त्वपूर्ण बिन्दुओं से अभिप्राय उन स्थानों से है जहाँ पर गलतियाँ की अधिक सम्भावना रहती है। इसलिए इन स्थानों पर नियन्त्रण अपेक्षाकृत प्रभावशाली होना

3. प्रमापों का निर्धारण (Setting of Standard) नियन्त्रण प्रक्रिया में प्रत्यक्ष (मौद्रिक भौतिक तथा अप्रत्यक्ष (अमूर्त, Intangible) दोनो प्रमाप निश्चित करना चाहिए क्योंकि माप देखे तथा चखे जा सकते हैं। जैसे एक कार एक लीटर पेट्रोल में 10 किलोमीटर है जबकि अप्रत्यक्ष प्रमाप कर्मचारियों से सम्बन्धित होते हैं। जैसे—कर्मचारियों की लगन, सोबत आदि।

4. संगठन के संरचना के अनुरूप (Follow Organisational Pattern)— नियन्त्रण पहिला संगठन संरचना के अनुरूप होनी चाहिए। इस संबंध में निम्न परिभाषाएँ दी गयी हैं- पीटर एफ. ड्रकर (Peter F. Drucker) के अनुसार, प्रत्येक व्यक्ति के लिए लक्ष्य निर्धारित किया जाना चाहिए और उसी व्यक्ति पर नियन्त्रण का दायित्व भी डाल दिया जाना चाहिए जिसे ड्रकर ३ स्वयं नियन्त्रण’ के नाम से पुकारा है। नियन्त्रण उच्च पदाधिकारियों द्वारा निम्न स्तर के कर्मचारी पर लागू की गई कोई प्रविधि नहीं है।

5. जाँच विधि की स्थापना (Establishment of Procedure for Checking) संस्था की क्रियाओं के प्रत्येक स्तर पर जाँच व्यवस्था की स्थापना की जानी चाहिए जिससे प्रभावी नियन्त्रण सम्भव हो सके।

6. नियन्त्रण एक निरन्तर प्रक्रिया है (Control is a Continuous Process) – नियन्त्रण की प्रक्रिया लगातार चलती रहती है। प्रबन्ध सदैव अपनी संस्था के उद्देश्य एवं कार्यों में सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास करता रहता है। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जो कभी समाप्त नहीं होती है।

7. समय नियन्त्रण (Time Control) –प्रबन्धक की क्रियाओं के पूरा करने में समय का ध्यान रखना चाहिए। यदि आवश्यक सूचनाएँ उचित समय पर उचित मात्रा में, उचित व्यक्ति को, उचित स्थान पर उपलब्ध कराई जाएँ तो पूर्व निर्धारित उद्देश्यों की पूर्ति सम्भव है।

8. सोचपूर्ण (Flexibility) नियन्त्रण प्रक्रिया पर्याप्त तोचपूर्ण होनी चाहिए जिससे समय पर आवश्यकतानुसार परिवर्तन किया जा सके।

9. सुधारात्मक कार्य करना (Assure Corrective Action)— नियन्त्रण व्यवस्था केवल विचलनों एवं उनके कारणों को ही मालूम नहीं करती अपितु उनमें सुधार का कार्य भी करती है। अतः नियन्त्रण प्रक्रिया में यह स्पष्ट करना चाहिए कि विचलनों के लिए कौन कर्मचारी दोषी है,

11. सरल एवं स्पष्ट (Simple and Clear) – नियन्त्रण प्रक्रिया सरल तथा स्पष्ट होनी चाहिए। प्रत्येक प्रबन्धक और कर्मचारी को ज्ञान होना चाहिए कि नियन्त्रण व्यवस्था का किस प्रकार प्रयोग किया जाएगा।

12. उपयुक्तता (Suitability)- नियंत्रण प्रक्रिया कार्यों के नियंत्रण के लिए उपयुक्त चाहिए। संगठन के प्रत्येक स्तर पर नियंत्रण की अलग-अलग नियंत्रण विधियों होनी चाहिए।

13. विचलनों का शीघ्र प्रतिवेदन (Reporting Deviation Quickly ) एक प्रभाव नियंत्रण प्रक्रिया यह होती है जिसके द्वारा विचलन एवं उनके कारकों का पता लगाकर शीघ्रातिशीघ्र कारणों को समाप्त करना होता है।

14. अपवाद सिद्धान्त Principle)-प्रबन्धों को उन कार्यो पर अपने को व्यय नहीं करना चाहिए जो कुशलता एवं दक्षता से हो रहे हो बल्कि उन कार्यो पर विशेष समय ध्यान देना चाहिए जो पूर्व निर्धारित प्रमाप के अनुसार नहीं हो।

15. पर्याप्तता (Sufficient Control) नियंत्रण प्रक्रिया पर्याप्त होनी चाहिए जिससे समय पर सुधार किया जा सके।

16. कुशल व्यक्ति (Effcient Officer) प्रभावशाली नियन्त्रण व्यवस्था के लिए कुराल व्यक्ति होना चाहिए।

Q2. नियन्त्रण प्रक्रिया के विभिन्न चरणों का वर्णन कीजिए। (Explain the various steps in the process of control.)

Ans. नियन्त्रण प्रक्रिया (Process of Control) – नियन्त्रण प्रक्रिया के अनेक विद्वानों अलग-अलग स्तर (Stages) बतलाए हैं। Jurin (जुरन) ने सात, Jacquith (जैक्विथ) ने तथा James L. Peirce (जेम्स एल, पीयर्स) ने तीन स्तर बतलाए हैं। 

इन सबको ध्यान में ने चार रखकर एक अच्छी नियन्त्रण प्रक्रिया में मुख्यतः चार निम्नांकित कदम (Steps) या (Stages) होनी चाहिए- 

1. लक्ष्यों एवं प्रमापों का निर्धारण करना, 

2. कार्यों का मूल्यांकन करना, 

3. विचलन का कारण मालूम करना, 

4. सुधारात्मक कार्य करना।

1. लक्ष्यों एवं प्रमापों का निर्धारण (Setting of Goals and Standards) नियन्त्रण प्रक्रिया का प्रथम स्तर लक्ष्यों और प्रमापों की स्थापना करना होता है जिससे कर्मचारियों के व्यवहार को नियमित किया जा सके। प्रमाप निर्धारित करते समय ध्यान रखना चाहिए कि प्रमाप और लक्ष्य बहुत ऊँचे या नीचे न रखे जाएँ यानी यथार्थ से बहुत टक्कर नहीं होने चाहिए। 

2. कार्यों का मूल्यांकन करना (Appraisal Performance) नियन्त्रण का दूसरा स्तर वास्तविक कार्यों और प्रमापों से तुलना करना है। वास्तविक कार्यों का ज्ञान उपक्रम के द्वारा एकत्रित विभिन्न सूनाओं के आधार पर किया जाता है। 

3. विचलन के कारण ज्ञात करना ( Determing the Reasons for Deviation) – नियन्त्रण प्रक्रिया का अगला तीसरा स्तर प्रमाप और वास्तविक हुए कार्यों के बीच आने वाले अन्तर के कारणों का मालूम करना है। इससे यह तथ्य मालूम करने का प्रयत्न किया जाता है। कि जो अन्तर आया है वह गलत योजना बनाने के कारण आया है या योजना ठीक तरह से लागू करने के कारण आया है।

4. सुधारात्मक कार्य करना (Corrective Action) नियन्त्रण प्रक्रिया का चौथा अन्तिम स्तर विलचनों का संशोधन करना है यानी उन कारणों को समाप्त करना जिनके कारण वास्तविक कार्य तथा प्रमापों में अंतर आता है। वास्तव में सुधारात्मक कार्य नियन्त्रण की आधारशिला है। सुधार कार्य न केवल गलती के लिए सुधार के लिए ही है अपितु भविष्य में होने वाली गलतियों को रोकने के लिए भी होने चाहिए।

Q. 3. नियन्त्रण के विस्तार या क्षेत्रों की व्याख्या कीजिए। (Discuss the various areas of span of Control.)

Ans. नियंत्रण का उद्देश्य व्यवसाय का लक्ष्य प्राप्ति है इसलिए यह आवश्यक है कि उपक्रम के सभी साधनों का नियमित, व्यवस्थित और कुशल निर्देशन नेतृत्व और नियन्त्रण किया जाए। इस सम्बन्ध में होल्डेन, फिश तथा स्मिथ (Holden, Fish and Smith) ने प्रबन्ध के प्रमुख क्षेत्रों अ उल्लेख किया है, जो निम्नलिखित है-

1. नीति नियन्त्रण (Policy Control) – व्यवसाय की नीतियों पर नियन्त्रण नीतियों में स्थायित्व पैदा करता है और उनमें से किसी प्रकार के विचलन को रोककर व्यवसाय के योजनाबद्ध विकास में सहायक होता है।

2. संगठन पर नियंत्रण (Control over organisation) संगठन व्यवस्था का मूल्यांकन करके एक कुशल संगठन संरचना बनाई जाती है और उसको बनाए रखा जाता है।

3. प्रक्रिया एवं पद्धतियों पर नियन्त्रण (Control over Process and Procedure)- कार्यकुशलता में वृद्धि के लिए प्रक्रिया एवं पद्धतियों का सरलीकरण और प्रमापीकरण आवश्यक होता है इसलिए समय-समय पर इन दोनों की जाँच करना आवश्यक है।

4. कर्मचारियों का नियन्त्रण (Control on Personnel ) – प्रबन्ध सेवावर्गीय प्रबन्ध (Personnel Management) की सहायता लेकर कर्मचारियों पर नियन्त्रण की जिम्मेदारी को निभाता है। 5. मजदूरी तथा वेतन पर नियन्त्रण (Control on wages and salary) – प्रबन्ध कार्य मूल्यांकन (Work study) के द्वारा श्रमिकों को दी जाने वाली मजदूरी और वेतन का निर्धारण करता है।

6. सामाजिक सुरक्षा (Social Security ) श्रमिकों की सुरक्षा तथा कल्याणकारी योजनाओं की समय-समय पर जाँच की जाती है। 

7. पूँजी पर नियन्त्रण (Control over capital) अंशधारियों से प्राप्त पूँजी के समुचित

उपभोग की योजना बनाई जाती है और यह नियन्त्रण का प्रमुख कार्य है कि वह अपने को सन्तुष्ट करे कि पूँजी का उपयोग वास्तव में उन्हीं उद्देश्यों के लिए हो रहा है। यदि नहीं, तो क्यों और क्या सुधार किये जायें।

8. उत्पादन पर नियन्त्रण (Control over production) माल की माँग के अनुसार ही विभिन्न सामान का उत्पादन किया जाए। बाजार की आवश्यकता के अनुसार ही माल कम या अधिक उत्पादित जाए। जिस समय जिस समान की आवश्यकता है वह उसी मात्रा में बनाया जाए अन्यथा साधनों का अपव्यय होगा।

9. लागत नियन्त्रण (Cost Control)- उत्पादन के विभिन्न साधनों के कुशलतम उपयोग द्वारा माल की लागत को नियन्त्रित करके प्रतियोगी बनाए रखा जाता है।

10. सामग्री नियन्त्रण (Materials Control)-उत्पादन में प्रमुख कच्चे माल की समुचित व्यवस्था बनाए रखी जाए। उनके क्रय संग्रह और उपयोग की व्यवस्था की जाँच करके आवश्यक सुधार किए जाने चाहिए।

11. सेवा कार्यों पर नियन्त्रण (Control over services) व्यवसाय में कर्मचारियों की संख्या को उचित और उपयुक्त कर्मचारी के सुपुर्द किया जाता है।

12. शोध कार्यों पर नियन्त्रण (Control over researches) – शोध कार्यों द्वारा व्यसाय के साधनों का कुशलतम उपयोग एवं उनका न्यूनतम अपव्यय होता है। नवीनतम पद्धतियों को अपनाया जा सकता है, किन्तु शोध कार्यों पर व्यय नियन्त्रित रखा जाए ताकि उपक्रम को उससे प्राप्त लाभ से अधिक व्यय न करना पड़े।

13. व्यापक नियंत्रण (Wide Control) इसके अन्तर्गत सभी योजनाओं पर सामूहिक रूप से रखा जाता है।

Q.4. नियंत्रण की परिभाषा दीजिए और इसके विभिन्न सिद्धान्तों को संक्षेप में लिखिए। (Define control and mention its important principles.) 

Ans. नियन्त्रण की परिभाषाएं (Definitions of Control) नियन्त्रण की परिभाषाएँ विभिन्न विद्वानों ने भिन्न-भिन्न ढंग से परिभाषित की है, उनमें से प्रमुख परिभाषाएं निम्नलिखित है बिली ई. गोज (Billy E. Goctesz) के अनुसार, प्रबंधकीय नियोजन से आशय कार्यक्रम को सुसंगत, एकीकृत और सन्तुष्ट बनाने से जबकि नियन्त्रण घटनाओं को योजनाओं के अनुरूप बनाने का प्रयास करता है।

” जॉर्ज आर. टैरी (George R. Terry) के शब्दों में, नियन्त्रण का तात्पर्य यह निश्चित करना है कि मया किया जा रहा है। दूसरे शब्दों में, कार्यों का मूल्यांकन करना और आवश्यकता पड़ने पर संशोधनात्मक प्रयास को काम में लाना है जिससे कि योजनाबद्ध निष्पादन हो सके श्री हेनरी फेमोल (Henary Fayol) के अनुसार, ‘नियन्त्रण से आशय यह जाँच करने से है कि क्या प्रत्येक कार्य स्वीकृत योजनाओं, दिए गए निर्देशों तथा निर्धारित नियमों के अनुसार हो रहा है या नहीं। इसका उद्देश्य कार्य की दुर्बलताओं व त्रुटियों का पता लगाना है, जिन्हें यथासमय सुधारा जा सके और भविष्य में उसको पुनरावृत्ति रोकी जा सके।”

नियन्त्रण के सिद्धान्त (Principle of Control)- कून्टज और ओ’डोनेल (Koonte and O’Dannel) ने नियंत्रण के चीदह सिद्धांतों का वर्णन किया है, जो इस प्रकार है–

1. उद्देश्यों की सुरक्षा का सिद्धान्त (Principles of Assurance of Objectives) नियन्त्रण प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए कि जो योजनाओं और वास्तविक कार्यों के विचलनों का अन्तर मालूम करके उन विचलनों को समाप्त कर दे।

2. नियंत्रण की कार्यकुशलता का सिद्धान्त (Principle of Efficiency of Control) नियन्त्रण की व्यवस्था अधिक खर्चीली नहीं होनी चाहिए। मितव्ययता के अतिरिक्त नियन्त्रण प्रणाली, अधीनस्थ कर्मचारियों की पहल शक्ति, सत्ता के प्रत्यायोजन एवं मनोबल पर भी बुरा प्रभाव न डाले।

3. नियंत्रण दायित्व का सिद्धान्त (Principle of Control Responsibility)— नियन्त्रण करने का दायित्व प्रबन्धकों का होता है। यह दायित्व सोपा नहीं जा सकता।

4. प्रत्यक्ष नियन्त्रण का सिद्धान्त (Principle of Direct Control ) — नियन्त्रण अप्रत्य रूप से किया जाना चाहिए। त्रुटियों का पता लगाने के स्थान पर त्रुटियों को होने से रोकने पर बल दिया जाए।

5. योजनाओं के प्रतिबिम्ब का सिद्धान्त (Principle of Reflection of Plan ) — नियन्त्रण का प्रयोजन योनाओं के विचलनों का पता लगाकर उनके अनुसार कार्य करना होता है। नियन्त्रण अवस्था में योजनाएँ प्रतिबिम्बित हो।

6. संगठनात्मक उपयुक्तता का सिद्धान्त (Principle of Organisational Suitability) नियन्त्रण की व्यवस्था इस प्रकार से की जानी चाहिए कि वह संगठन के ढाँचे के अनुकूल समायोजित की जा सके।

7. नियन्त्रण के अतिरिक्त का सिद्धान्त (Principle of Individuallity of Controls) – नियन्त्रण प्रबन्धक की वैयक्तिक आवश्यकताओं की पूर्ति के उद्देश्य से स्थापित किए जाते हैं।

8. प्रमापों का सिद्धान्त (Principle of Standards) प्रमाप उद्देश्यात्मक शुद्ध एवं उपयुक्त होना चाहिए। अतः उक्त गुणों से युक्त प्रमाप एवं न्यायपूर्ण होने के कारण अधीनस्थों द्वारा स्वीकार कर लिए जाएंगे।

9. क्रान्तिक बिन्दु नियन्त्रण का सिद्धान्त (Principle of Critical Point Control)- प्रणाली ऐसी होनी चाहिए जो नियन्त्रण का ध्यान महत्त्वपूर्ण स्थलों की ओर आकर्षित कर सके। 237

10. अपवाद का सिद्धान्त (Exception Principle ) यद्यपि नियन्त्रण कार्य सम्बन्धित अधिकारी को ही क्रियान्वित करना चाहिए किन्तु परिस्थितियों में वरिष्ठ अधिकारी को भी मह अधिकार होना चाहिए। 

11. लोच का सिद्धान्त (Flexibility of Control ) — नियन्त्रण प्रक्रिया में पर्याप्त लोच होनी चाहिए ताकि योजनाओं के असफल होने पर नियन्त्रण आसानी से हो सके। 

12. भावी नियन्त्रण का सिद्धान्त (Principle of Direct Control) — भावी नियन्त्रण त्यापित करने के लिए प्रत्यक्ष नियन्त्रण की विधि को अपनाना चाहिए। 

13. पुनरावलोकन का सिद्धान्त (Principles of Review ) – प्रभावी नियन्त्रण के लिए समय-समय पर नियन्त्रण प्रक्रिया का पुनरावलोकन करके बदली हुई परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तन कर लेना चाहिए। 

14. कार्य का सिद्धान्त (Principle of Action)—जब तक विचलनों के लिए प्रभावी उपाय नहीं किए जाएँगे, नियन्त्रण कार्य पूरा नहीं होगा।

Q.5. नियोजन और नियंत्रण के सम्बन्ध की व्याख्या कीजिए । (Explain the relationship between Planning and Control.) 

Ans. नियोजन और नियंत्रण दोनों एक-दूसरे के पूरक और सहायक है। एक ओर जहाँ नियोजन नियंत्रण क्रिया निर्धारित करता है वहीं दूसरी ओर नियंत्रण नियोजन के आधार के रूप में कार्य करता है। इस प्रकार नियोजन में नियंत्रण और नियंत्रण में नियोजन व्याप्त है। 

इस संबंध में विली ई. गोरटज के अनुसार, “प्रबंधकीय नियंत्रण का अभिप्राय व्यावसायिक घटनाओं को नियोजन के अनुरूप बनाना है।” नियोजन और नियंत्रण के सम्बन्धों की विवेचना करते हुए ‘मेरी कुशिंग’ ने सही कहा है कि, “नियंत्रण नियोजन का एक पक्ष और प्रतिरूप है। 

जहां योजनाएँ मार्ग निर्धारित करती हैं वहाँ नियंत्रण की दृष्टि उस मार्ग के विचलनों पर होती है जिससे हम मार्ग में विचलित न हो जायें अर्थात नियंत्रण योजनाओं के क्रियान्वित करने में हमारा मार्गदर्शन करता है।” नियोजन और नियंत्रण दोनों एक-दूसरे से प्रभावित होते हैं। 

योजनाओं को कुशलतापूर्वक कार्यान्वित करने के लिए नियंत्रण प्रणाली में अवश्य सुधार किया जाता है और नियंत्रण कार्य को सफलतापूर्वक चलाने के लिए योजनाओं में आवश्यक संशोधन किया जाता है। नियोजन और नियंत्रण दोनों व्यवसाय के भविष्य को ध्यान में रखकर बनाए जाते हैं। 

दोनों का उद्देश्य व्यवसाय के लक्ष्य को कुशलतापूर्वक प्राप्त करना है। इस संबंध में कुण्ट्ज तथा ओ डोनल ने सच ही कहा है कि “नियोजन की तरह नियंत्रण भी भविष्यदर्शी होता है। एक श्रेष्ठ नियंत्रण योजनाओं से विचलनों को उनके घटने से पूर्व ठीक करता है। “

इस प्रकार हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि नियोजन और नियंत्रण दोनों व्यवसाय के लक्ष्य को कुशलतापूर्वक प्राप्त करने की दिशा में प्रयास हैं। दोनों लक्ष्य एक होने के कारण दोनों के प्रयास कभी अलग और कभी सम्मिलित रूप से एक ही दिशा में किये जाते हैं। 

नियोजन और नियंत्रण का पारस्परिक सहयोग, समन्वय, सामंजस्य और समायोजन संस्था के अधिकतम उद्देश्यों की प्राप्ति, न्यूनतम प्रयासों पर उपलब्ध कराता है। अतः नियोजन तथा नियंत्रण एक-दूसरे के लिए सहायक तथा परस्पर संबंधित हैं।

FAQs

Q:’नियंत्रण समन्वय में सहायक होता है।’ इस कथन को स्पष्ट कीजिए 

Ans. एक प्रभावी नियंत्रण सभी व्यावसायिक क्रियाओं को निर्दिष्ट लक्ष्य की ओर निर्देशित व समन्वित करता है क्योंकि यदि सभी विभागों का संतुलित विकास न होगा तो व्यावसायिक क्रियाएँ अव्यवस्थित हो जाएँगी। कर्मचारियों की व्यक्तिगत, सामूहिक और संस्थागत प्रगति की प्रमापित से समीक्षा और आवश्यक सुधार व्यावसायिक क्रियाओं को समन्वित करता है ।

Q.नियोजन एवं नियन्त्रण के बीच क्या सम्बन्ध है 

Ans. नियोजन और नियन्त्रण में सम्बन्ध (Relation between planning and | controlling)—यह दोनों ही प्रबंध के अंग हैं। प्रबंध कार्य नियोजन शुरू होकर नियन्त्रण पर समाप्त होता है। विली ई. गोज (Belly E. Goetz) ने नियोजन और नियन्त्रण के सम्बन्धों को पष्ट करते हुए लिखा है, “प्रबन्धकीय नियोजन से आशय कार्यक्रम को सुसंगत, एकीकृत और सुस्पष्ट इसने से है, जबकि नियन्त्रण घटनाओं को योजनाओं के अनुरूप बनाने का प्रयास करता है।” प्रकार नियोजन और नियन्त्रण के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध है। यदि स्थापित उद्देश्यों और प्राप्ति के बीच किसी प्रकार का कोई अन्तर दिखलाई देता है, प्रबन्धक तुरन्त नियन्त्रण या सुधारात्मक वाही करता है।

Q. बजट नियन्त्रण का अर्थ बतलाइए। 

Ans. बजट नियन्त्रण का अर्थ (Meaning of Budgetary Control ) – साधारण की तुलना करके नियन्त्रण किया जाता है, बजट द्वारा नियन्त्रण कहते है। बजट नियन्त्र 230 प्रमुख उद्देश्य बजट के अनुमानों और वास्तविक प्रगति के बीच हुए विलोचन का ज्ञान करना यह देखना है कि भविष्य में उनकी पुनरावृति न हो।

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