Class 12 Hindi Chapter 1 Question Answer Harivansh Rai Bachchan, Aatm Parichay, Din Jaldi Jaldi Dhalta Hai Easy Summary

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मैं खुद class 12 का टॉपर रह चुका हूं और साथ ही साथ वर्तमान में मैं एक शिक्षक भी हूं। वर्तमान मे, मेरे पास कक्षा 12वीं के काफी विद्यार्थी हैं । जिनको मैं  बारहवीं की तैयारी करवाता हूं । यह पोस्ट को मैं अपने अनुभव से लिख रहा हूं । इस लेख को मैंने CBSE, NIOS, CISCE, ICSE और अन्य राज्य के board  को ध्यान में रखते हुए तैयार किया। 

Class 12 Hindi Chapter 1 Question Answer हरिवंश राय बच्चन, आत्म परिचय, दिन जल्दी जल्दी ढलता है Summary

कक्षा | Class12th 
अध्याय का नाम | Chapter Nameहरिवंश राय बच्चन, आत्म परिचय, दिन जल्दी जल्दी ढलता है | Harivansh Rai Bachchan, Aatm Parichay, Din Jaldi Jaldi Dhalta Hai
अध्याय का नाम | Chapter Name01
कवि | Poetहरिवंश राय बच्चन | Harivansh Rai Bachchan
अध्याय प्रकार | Chapter typeकविता | POEM
किताब | Bookहिंदी कोर | HINDI CORE
बोर्ड | Boardसभी बोर्ड | All India Board
किताब | Book एनसीईआरटी | NCERT
विषय | Subjectहिंदी | HINDI
अध्ययन सामग्री | Study Materialsप्रश्न उत्तर | Question Answer


हरिवंश राय बच्चन का जीवन परिचय | Biography of Harivansh Rai Bachchan

हरिवंश राय बच्चन हालावाद के एक प्रमुख कवि हैं। ये आधुनिक युग के लोकप्रिय गीतकार हैं। इनका जन्म प्रयाग के 27 नवंबर, 1907 ई. में हुआ था। इन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में एम. ए. की उपाधि प्राप्त की थी। कुछ समय तक अध्यापन-कार्य गी किया। 1952 ई. में इंगलैंड गए।

Class 12 Hindi Chapter 1 Question Answer Harivansh Rai Bachchan
image credit: Azad website

उन्होंने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से पी-एच. डी. की उपाधि प्राप्त की। कुछ समय तक आकाशवाणी में भी कार्य किया । 1953 ई. में इनकी नियुक्ति भारत सरकार के विदेश मंत्रालय में हिंदी विशेषज्ञ के पद पर हुई। 1966 ई. में ये राज्य सभा के सदस्य मनोनीत हुए। उन्हें ‘पद्मभूषण’ सम्मान से भारत सरकार ने सम्मानित किया था। इन्हें साहित्य तथा भी मिला था। 

19 जनवरी, 2003 ई. को इनका देहावसान हो गया। हरिवंश राय बच्चन के काव्य में एक अनवरत अनुसंधान की धारा प्रवाहित होती थी। जीवन के सत्य को कविता में आरोपित करने की कला आधुनिक हिन्दी साहित्य के लिए नया प्रयोग बनकर विकसित हुई जो नए रचनाकारों का पथ-प्रदर्शन करती है। इन्हें ‘राष्ट्र-कवि’ का गौरव प्राप्त हुआ। 

काव्य-रचनाएँ कवि हरिवंश राय बच्चन की कई प्रमुख काव्य रचनाएँ हैं जो निम्नलिखित हैं-

(क) काव्य-संग्रह—–मधुशाला, मधुबाला, मधुकलश, सतरंगिनी, निशा- नियंत्रण, नए-पुराने झरोखे, टूटी-फूटी कड़ियाँ, आरती और अंगारे, एकान्त संगीत, मिलन यामिनी, आकुल अन्तर आदि । 

(ख) आत्मकथा ( चार खण्ड ) – क्या भूलूँ क्या याद करूँ, नीड़ का निर्माण फिर, बसेरे से दूरे, दशद्वार से सोपान तक । 

(ग) अनुवाद-हैमलेट, जनगीता, मैकबोघ।

(घ) डायरी – प्रवास की डायरी। उनका समस्त साहित्य ‘बच्चन ग्रंथावली’ के नाम से कई खण्डों में प्रकाशित किया गया है।

साहित्यिक विशेषताएँ- हरिवंशराय बच्चन की साहित्यिक विशेषताएँ अनमोल हैं। जी की कविता में मस्ती का आलम है। अपनी कविताओं में जीवन-संबंधी विविध अनुभूतियों के चित्रण में इन्हें विशेष सफलता प्राप्त हुई है। इनकी विशेषताओं में जीवन का जो संघर्ष व्यक्त हुआ है, वह परिस्थितियों के भँवर में फँसे मानव को जीवन-पथ पर बढ़ने की प्रेरणा देता है। 

इनके काव्य में प्रेम, सौंदर्य, मस्ती, निराशा आदि सभी अनुभूतियों की मार्मिक अभिव्यक्ति हुई है। उनके चिंतन की धारा मानवता के स्रोत से बहते हुए सामाजिक व्यवधानों पर ठहरे बिना नैसर्गिक मूल्यों की ओर प्रवाहित होती रही। इसीलिए उनका काव्य कला भेद से हटकर सत्य का अनुशीलन करत है। 

कवि हरिवंश राय बच्चन की रसिकता के पूर्ण दर्शन ‘मधुशाला’ में होते हैं। इस रचना में मात्र मस्ती का ही वर्णन नहीं, अपितु क्रांति और विद्रोह का स्वर भी है। इनकी कविता के गाँधीवाद का भी प्रभाव लक्षित होता है। ऊपर

भाषा-शैली—बच्चन जी को गीत लिखने में विशेष सफलता प्राप्त हुई है। गीतों में संक्षिप्तता, लयात्मकता तथा संगीतात्मकता का सुन्दर समन्वय है। इनकी भाषा सरल और प्रसाद गुण संपन्न है। 

भाषा पर उर्दू और फारसी के प्रचलित शब्दों का भी प्रभाव हैं। उन्होंने व्यक्तिगत जीवन में घटी घटनाओं की सहज अनुभूति की ईमानदार अभिव्यक्ति को कविता के रूप में प्रकट कर दिया। उनकी इसी विशेषता ने उन्हें हिंदी काव्य संसार में विलक्षण और लोकप्रिय बना दिया।

कविता का सारांश | Harivansh rai bachchan poems in hindi


आत्म-परिचय Summary | Aatm Parichay Summary


प्रस्तुत कविता के माध्यम से कवि अपना परिचय देना चाहता है। यह परिचय भावनाओं और * विचारों का है। कवि ने अपना संबंध समाज के साथ जोड़ने का प्रयत्न किया है। कवि को संसार की चिंता है। समस्त संसार का दायित्व अपने ऊपर लेकर वह सभी के लिए प्यार देना चाहत है। वह प्रेम के बदले में कोई आकांक्षा नहीं रखता। वह तो अपने भावों को संसार के मनुष्यों तक पहुँचाना चाहता है। 

यही संसार के लिए उसका उपहार है। उसे यह संसार अधूरा लगता है। अतः एक संसार उसके कल्पना-लोक में है। वह सुख-दुख में समभाव रखते हुए संसार के कल्याण के लिए कोई भी जोखिम उठाने के लिए तैयार है। वह उन्माद व अवसाद जैसे विरोधी भावों को एक साथ लेकर हँसता- रोता हुआ भी किसी की याद को धरोहर की तरह संजोकर रखता है।

उनका कहना है कि संसार में सत्य को जानने के प्रयत्न हुए हैं परंतु जान कोई नहीं पाया। यहाँ ज्ञान व अज्ञानी दोनों ही रहते हैं। कवि मानता है कि मैं तो सीखे हुए ज्ञान को भुलाना सीख रहा हूँ। मैं संसार से कोई संबंध जोड़ने का इच्छुक नहीं हूँ क्योंकि मेरा सांसारिकता के प्रति कोई लगाव नहीं है। 

मैं करुणा में स्नेह और शांति में तेज का वाहक हूँ। मेरी निर्धनता राजाओं के लिए भी स्पृहणीय है। मैं संसार के प्रति लापरवाही का भाव रखता हूँ क्योंकि संसार भी मेरे रोने को गाना समझता है और मेरे आक्रोश को कवि कर्म बताता है। मैं ऐसी मस्ती का संदेश देता हूँ जिसे सुनकर सांसारिक व्यक्ति झूम उठते हैं, आनंदित हो जाते हैं।


दिन जल्दी-जल्दी ढलता है ! Din Jaldi Jaldi Dhalta Hai


इस गीत में समय के बीतते जाने की अनुभूति के साथ लक्ष्य तक पहुँचने के लिए कुछ कर गुजरने की भावना का वर्णन किया गया है। कवि कहता है कि सूर्य रूपी पथिक बड़ी तेजी से दौड़ रहा है। भले ही उसका लक्ष्य बहुत दूर नहीं है, फिर भी वह इस आशंका से जल्दी-जल्दी दौड़ता है कि कहीं मार्ग में ही रात न आ जाए।

चिड़ियाँ भी घर की ओर दौड़ रही हैं। उनके बच्चे अपने घोंसलों से इस आश में झाँक रहे होंगे कि उनके लिए माता-पिता कुछ खाने को ला रहे होंगे। इस ध्यान के आते ही चिड़ियों की गति में तेजी आ जाती है। किंतु कवि को कहीं जाने की जल्दी नहीं है क्योंकि कोई उसकी प्रतीक्षा करने वाला ही नहीं है। इस भाव का स्मरण आते, उसके पैरों में आ जाती है और व्याकुल हो उठता है। वह अकेला अपने-आपको करता है।


काव्यांशों की सप्रसंग व्याख्या एवं शब्दार्थ


1. आत्म-परिचय काव्यांशों

आत्म-परिचय

मैं जग-जीवन का भार लिए फिरता है, फिर भी जीवन में प्यार लिए फिरता हूँ;

कर दिया किसी ने जिनको कर

छूकर मैं साँसों के दो तार लिए फिरता हूँ।

मैं स्नेह-सुरा का पान किया करता हैं, मैं कभी न जग का ध्यान किया करता हूँ, जग पूछ रहा उनको, जो जग की गाते,

मैं अपने मन का गान किया करता हूँ! 

शब्दार्थ 

जग-जीवन – सांसारिक जीवन की समस्याएँ । झंकृत झंकार की ध्वनि । स्नेह-सुरा — प्रेम की मदिरा पान – पीना। जग की गाते-सांसारिक विषय-वासनाओं में लिप्त । 

प्रसंग 

यह पद्यांश ‘आत्मपरिचय’ नामक कविता से लिया गया है। इसके लेखक हरिवंश राय बच्चन हैं। कवि अपना परिचय देते हुए कहता है कि मेरी स्थिति इस प्रकार है। 

व्याख्या

मैं संसार की जिम्मेदारियों को अनुभव करता हूँ। उन समस्याओं के निराकरण की सोचता रहता हूँ। मेरे मन में संसार के सभी प्राणियों के लिए स्नेह है। अतः यह अनुभव करता हूँ कि संसार की समस्याओं के निराकरण का दायित्व मेरा है। मानो सारे संसार का भार मेरे कंधों पर है। मैं दूसरे के कष्टों को अनुभूत करता हूँ। जिस प्रकार वीणा के तारों को स्पर्श करने से झंकार की आवाज होती है, उसी प्रकार मैं अपनी साँसों से ही दूसरे के दुःख की अभिव्यक्ति क देता हूँ।

जिस प्रकार मदिरापेयी मदिरा का पान करने के बाद संसार की समस्याओं को भूल जाता है, उसी प्रकार मैं प्रेम-रूपी मंदिरा का पान करने के बाद अपनी सांसारिक चिंताओं को भुला देता हूँ, अर्थात् संसार से प्रेम के कारण मैं स्वयं को भूल जाता हूँ। संसार की यह रीति है कि जो सांसारिकता में डूबे रहते हैं, संसार उनको ही महत्त्व देता है किंतु मैं अपने मन की बात कहता हूँ। उसके अनुसार ही अपने कर्तव्य का निर्धारण करता हूँ। अपने मन की अभिव्यक्ति ही मेरे गान हैं। सौंदर्य बोध—संस्कृतनिष्ठ भाषा में सरलता व प्रवाह है । कवि ने कविता के माध्यम से

अपना वैचारिक व भावनात्मक परिचय दिया है। कवि संसार से अपना संबंध द्विधात्मक व द्वंद्वात्मक रूप में देखता है। कवि जग का भार भी ढोता है’ और ‘जग का ध्यान भी नहीं करता’

यह विरोधाभासी स्थिति है। ‘जग-जीवन’, ‘जो जग’ में अनुप्रास अलंकार है तथा ‘स्नेह-सुरा’ में रूपक अलंकार है। साँसों के तारों से झंकार निकालने में प्रतीक योजना है तथा पूरे छंद में सुंदर बिंव विधान है। आत्मपरक शैली में अपनी बात की गई है। यहाँ कवि के व्यक्तित्व के एक रूप का साक्षात्कार होता है।



2.आत्म-परिचय काव्यांशों

मैं निज उर के उद्गार लिए फिरता हूँ, मैं निज उर के उपहार लिए फिरता है:

है यह अपूर्ण संसार न मुझको भाता

मैं स्वप्नों का संसार लिए फिरता हूँ! मैं जला हृदय में अग्नि, दहा करता हूँ,

सुख-दुख दोनों में मग्न रहा करता है जग भव-सागर तरने को नाव बनाए,

मैं भव मौजों पर मस्त बहा करता हूँ !

शब्दार्थ 

निज अपना उर- हृदय उद्गार भावों की अभिव्यक्ति उपहार भेंट। अपूर्ण—अभावमय । दहा——जलाना । मग्न– प्रसन्न । भव—संसार। तरना — उद्धार करना। मौजों लहरों। 

प्रसंग

यह पद्यांश ‘आत्मपरिचय’ नामक कविता से उद्धृत है। इसके लेखक हरिवंश राय बच्चन हैं। इस अंश में कवि अपने हृदय के भावों का वर्णन करते हुए कहता है।

व्याख्या

मैं कविता के माध्यम से अपने हृदय के भावों को अभिव्यक्त करता फिरता हूँ। मैं जो कुछ कह रहा हूँ, इसे संसार के प्रति मेरी हार्दिक भेंट समझना चाहिए। संसार अभावों से ग्रस्त है। यहाँ सब पाने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं। सभी अपूर्णता का अनुभव करते हैं। ऐसा संसार मुझको अच्छा नहीं लगता है। अतः काव्य-जगत् में मेरा अपना कल्पनालोक है जिसमें मानव के स्वप्नों को साकार रूप में प्रस्तुत किया है।

संसार के अभाव, पीड़ा, लालसा आदि भावों को देखकर मेरे हृदय की आग मुझे जलाती रहती है किंतु मैंने अपने को सुख-दुख से ऊपर कर लिया है। ये भाव मुझे कष्ट नहीं दे पाते क्योंकि मैंने अनुकूल-प्रतिकूल दोनों ही स्थितियों में आनंदित होना सीखा लिया है। मैं संसार रूपी सागर को पार करने के लिए संसार के कष्टों में भी आनंद का अनुभव करता हूँ। मेरी स्थिति उस नौका के समान है जो सागर की लहरों के ऊपर झूलती हुई भी मस्ती से तैरती हुई किनारे तक ले जाती है।

सौंदर्य बोध

संस्कृतनिष्ठ भाषा में प्रसाद गुण है। कवि अपने हृदय के भावों को वाणी दे रहा है। साथ ही, वह संसार के अभाव से चितिंत कवि उसे पूर्णता प्रदान करना चाहता है। वह हृदय में अग्नि लेकर जहाँ जलता है, वहाँ सुख-दुख में मग्न रहना भी जानता है। ‘भव-सागर’ व ‘भव मौजों’ में रूपक अलंकार है तथा ‘भव मौजों में प्रतीक है। यहाँ पर बिंद का सुन्दर प्रयोग हुआ है। कवि हृदय की व्यापकता का मनोरम वर्णन है। वस्तुतः कविता कवि द्वारा संसार का दिया गया उपहार ही है।

3. आत्म-परिचय काव्यांशों

मैं यौवन का उन्माद लिए फिरता हूँ, 

उन्मादों में अवसाद लिए फिरता हूँ, 

जो मुझको बाहर हँसा, रुलाती भीतर,

मैं, हाय, किसी की याद लिए फिरता हूँ, 

कर यत्न मिटे सब, सत्य किसी ने जाना? 

फिर मूढ़ न क्या जग, जो इस पर भी सीखे ?

नादान वही है, हाय, जहाँ पर दाना!

मैं सीख रहा हूँ, सीखा ज्ञान भुलाना ! 

शब्दार्थ

यौवन-जवानी। उन्माद – अत्यधिक प्रेम की सनक अवसाद- दुःख उदासी और शिथिलता। याद – स्मृति। यत्न-प्रयास। नादान-अज्ञानी। दाना-ज्ञानवान। मूढ़– मूर्ख । 

प्रसंग 

यह पद्यांश ‘आत्मपरिचय’ नामक कविता से लिया गया है। इसके कवि हरिवंश राय बच्चन हैं। इस अंश में कवि अपने हृदय के द्वंद्व का वर्णन करता हुआ, संसार को मूर्खता पर करारा प्रहार करता है।

व्याख्या 

कवि के हृदय में जवानी का जोश है। अतः वह समस्त संसार की अपने प्रेम का उपहार देना चाहता है। अत्यधिक प्रेम की सनक में वह मार्ग में आए कष्टों की भी चिंता नहीं करता। यही कारण है कि प्रेम की सनक दुख से उत्पन्न उदासी और शिथिलता भी अपने साथ लेकर आती है। 

इस विरोधाभासी दशा में में बाहर से भले ही हँसता रहता हूँ किंतु मेरा हृदय रोता है। अत्यधिक वेदना की स्थिति है क्योंकि में किसी की स्मृति को संजोए हुए फिर रहा हूँ। संसार के सभी मनुष्य सत्य की खोज में लगे हैं किंतु वह सत्य अभी तक सभी के द्वारा अविदित है। कवि को दुख है कि जो अपने को ज्ञानवान समझे बैठे हैं, वे ही अज्ञानी हैं। जब

सत्य को जान ही नहीं पाए, जब ज्ञानी ही अज्ञानग्रस्त हैं, तब भी सीखने का प्रयास कवि को मूर्खतापूर्ण प्रयत्न प्रतीत होता है। अतः वह तो सीखे हुए को भूलने की विद्या को सीख रहा है। 

सौंदर्य बोध

संस्कृतनिष्ठ शब्दावली से युक्त भाषा का प्रयोग है। यहाँ पर कवि के हृदय के द्वंद्व का सुंदर वर्णन है। कवि के हृदय में विरोधों का सामंजस्य दीखता है तथा कवि जाने हुए को जानना चाहता है। 

‘उन्मादों में अवसाद में विरोधाभास है। इसमें मैं सीख रहा हूँ, सीखा ज्ञान ‘भुलाना’ कबीर की उलटबांसियों का स्मरण करा रही है। अज्ञान की अनुभूति ज्ञानी को ही होती भुलाकर अपने को है, यह कटु सत्य है। बाहर से हँसते हुए और भीतर से रोते की कल्पना एक लोकोक्ति पर आधारित है। यहाँ ‘मैं, हाय, किसी की याद लिए फिरता हूँ’ में कवि के हृदय की अपार वेदना को अभिव्यक्ति मिली है।

4. आत्म-परिचय काव्यांशों

मैं और, और जग और, कहाँ का नाता,

मैं बना-बना कितने जग रोज मिटाता;

जग जिस पृथ्वी पर जोड़ा करता वैभव, 

मैं प्रति पग से उस पृथ्वी को ठुकराता ! 

मैं निज रोदन में राग लिए फिरता हूँ,

शीतल वाणी में आग लिए फिरता हूँ,

हों जिस पर भूपों के प्रासाद निछावर,

मैं वह खंडहर का भाग लिए फिरता हूँ।

शब्दार्थ : 

और—दूसरा । और—तथा । नाता — संबंध । बना-बना- निर्माण करना। रोज- प्रतिदिन। वैभव – धन-दौलत, ऐश्वर्य । प्रति पग—दोनों पैरों से । ठुकराना — उपेक्षा करना, अनादर प्रकट कराना। निज-अपना रोदन रुदन राग-गीत, गाना। आग तेज, प्रभाव। भूप राजा। प्रासाद—महल। भाग—अंश, हिस्सा।

प्रसंग 

यह पद्यांश ‘आत्मपरिचय’ नामक कविता से लिया गया है। इसके कवि हरिवंश राय बच्चन है। और इस अंश में कवि अपने हृदय के द्वंद का वर्णन करता हुआ, संसार की मूर्खता पर करारा प्रहार करता है।

व्याख्या 

कवि अपने परिचय में बताता है कि मेरा और जगत का कोई संबंध नहीं है। जग आसक्ति है और में आसक्ति रहित हूँ । अतः जगत से मेरा क्या संबंध? मैं अपनी कल्पना से नित्य नए संसार बनाता-बिगाड़ता रहता हूँ। संसार के व्यक्तियों को पृथ्वी से बहुत लगाव रहता है। राजा से लेकर रंक तक सभी पृथ्वी का एक अंश चाहते हैं, किंतु कवि को पृथ्वी के प्रति कोई आकर्षण नहीं है। वह अनासक्त भाव से रहता हुआ पृथ्वी की उपेक्षा करता है, सांसारिकता की उपेक्षा करता है।

कवि कहता है कि यदि मैं रोता भी हूँ तो उसमें भी गीत के आनंद की अनुभूति करता हूँ। मैं भले ही मधुर वाणी से अपनी बात कहूँ किंतु उसमें मेरे हृदय की आग छिपी रहती है। मैं संसार के दुख-दर्द का गायक हूँ। मेरी रागनी में भी दर्द है । मेरा रोना संसार के लिए है। अतः उसमें संसार की कल्याण-कामना के स्वर है। 

सांसारिक आकर्षण मुझे अपनी ओर आकर्षित नहीं कर पाते। मेरे पास तो वह अवशेष हैं जिस पर राजाओं के बड़े-बड़े महल भी न्यौछावर किए जा सकते हैं। 

सौंदर्य बोध

 ‘भाषा में संस्कृत की तत्सम शब्दावली की बहुलता है। कवि की संसार के प्रति अनासक्ति का सुंदर एवं प्रभावशाली वर्णन है। ‘रोदन’ और ‘राग’ तथा ‘शीतलवाणी में आग’ की एक साथ उपस्थिति में विरोधाभास है। 

में ‘मैं और, और जग और’ में यमक अलंकार है तथा ‘कहाँ का’, ‘जग जिस’, ‘रोदन में राग’ अनुप्रास अलंकार है साथ ही ‘विना-वना’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है । कवि की अपनी सृष्टि होती है अतः उसे भी विधाता कहते है।

CLASS 12 NCERT SOLUTION IN ENGLISHCLASS12 NCERT SOLUTION IN HINDI
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Geography भूगोल
Political science राजनीति विज्ञान
English SubjectResult
Hindi SubjectHistory answer keys

5.आत्म-परिचय काव्यांशों

मैं रोया, इसको तुम कहते हो गाना, 

मैं फूट पड़ा, तुम कहते, छंद बनाना; 

क्यों कवि कहकर संसार मुझे अपनाए, 

मैं दुनिया का हूँ एक नया दीवाना ! 

मैं दीवानों का वेश लिए फिरता हूँ, 

मैं मादकता निःशेष लिए फिरता हूँ;

जिसको सुनकर जग झूम, झुके, लहराए, 

मैं मस्ती का संदेश लिए फिरता हूँ!

शब्दार्थ 

फूट पड़ा—प्रबल भावाभिव्यक्ति छंद बनाना — कविता रचना दीवाना – मस्त, बेपरवाह। वेश पहनावा मादकता-मस्ती। निःशेष- संपूर्ण ।

प्रसंग 

यह पद्यांश ‘आत्मपरिचय’ नामक कविता से लिया गया है। इसके कवि हरिवंश राय बच्चन हैं। इस अंश में कवि अपने स्वरूप पर संसार की प्रतिक्रिया का वर्णन कर रहा है। 

व्याख्या

कवि कहता है कि जब कविता के माध्यम से मैं अपने हृदय से दुख को व्यक्त करता हूँ तब संसार उसे मेरा गान समझता है। दुख की अधिकता में जब भावाभिव्यक्ति अनायास हो उठती है, उसे यह संसार छंद रचना समझता है। संसार मुझे कवि मान रहा है, वह मुझे कवि के रूप में अपना रहा है। किंतु मैं अपने इस स्वरूप को सही नहीं मानता। एक ऐसा दीवाना हूँ जिसे अपनी परवाह नहीं है, किंतु संसार की पीड़ा को काव्यवज्र कर रहा हूँ। 

सौंदर्य बोध 

संस्कृत के तत्सम शब्दों से युक्त होने के बाद भी भाषा में सरलता एवं प्रवाह है। कवि सांसारिक व्यक्तियों की नासमझी पर उलाहना देता है। कवि अपने को कवि नहीं अपितु मरती का संदेशवाहक मानता है। यहाँ पर दुख की अधिकता में छंद स्वतः फूट पड़ता है। आदि- कवि वाल्मीकि ने भी क्रौंची के विलाप से प्रभावित होकर जो कहा था, वह छंय बन गया था। ‘क्यों कवि कहकर’, ‘झम, झुके’ में अनुप्रास अलंकार है। वास्तव में, गीत, छंद, कविता का जन्म पीड़ा में ही होता है।


2. दिन जल्दी-जल्दी ढलता है !


हो जाए न पथ में रात कहीं, 

मंजिल भी तो है दूर नहीं-

यह सोच थका दिन का पंथी भी जल्दी-जल्दी चलता है!

दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!

बच्चे प्रत्याशा में होंगे, 

नीड़ों से झाँक रहे होंगे-

यह ध्यान परों में चिड़ियों के भरता कितनी चंचलता है। दिन जल्दी-जल्दी डलता है!

मुझसे मिलने को कौन विकल?

मैं होऊ किसके हित चंचल ? यह प्रश्न शिथिल करता पद को, भरता उर में विह्वलता है! 

दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!

शब्दार्थ

पथ– मार्ग। मंजिल – लक्ष्य। पंथी- पथिक। प्रत्याशा पाने की इच्छा। नीड़ों- घोंसला । परों—पंख । चंचलता— तेजी। विकल-व्याकुल, चंचल व्यग्र, उत्कंठित। शिथिल- उदासीन बिछलता-व्याकुलता ।

प्रसंग 

यह पद्यांश ‘दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!’ नामक गीत से लिया गया है। इस कविता के लेखक हरिवंश राय बच्चन हैं। इस कविता में जहाँ एक ओर यह अनुभूति है कि समय बीत रहा है, वहाँ दूसरी और लक्ष्य को पाने की शीघ्रता का वर्णन है। 

व्याख्या 

समय तेजी से व्यतीत होता है। समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता। व्यक्ति एक लक्ष्य को लेकर सदा प्रयत्नशील रहता है और उसे भय सताता रहता है कि लक्ष्य तक पहुँचने से पहले ही कहीं समय न बीत जाए। सूर्य भी एक पथिक है। 

उसे बहुत लंबी दूरी तय करनी होती है। इस दूरी को पार करने में भले ही उसे थकान हो रही हो, फिर भी वह इस कारण तेजी से चल रहा है कि कहीं लक्ष्य से पहले ही रात न आ जाए। मनुष्य की आयु भी तो बहुत सीमित है और करणीय कर्तव्य बहुत अधिक हैं। अतः उसे भी जीवन भर दौड़ना पड़ता है कि कहीं लक्ष्य से पूर्व ही मृत्यु- रूपी रात न आ जाए। सामान्य पक्षियों में ऐसी ही शीघ्रता देखी जा सकती है। 

प्रातःकालीन भोजन की खोज में निकला पक्षी समूह संध्या को बहुत तेजी से अपने घोंसलों की ओर लौटता है। उनको इस बात का अहसास है कि घोंसले में बैठे-बैठे उनके शावक भोजन की आशा में चोंच बाहर निकालकर माता-पिता की प्रतीक्षा कर रहे होंगे। इसका ध्यान आते ही चिड़ियों के पंखों में चंचलता और बढ़ जाती है। अर्थात् उनकी गति और तीव्र हो जाती है।

कवि सोचता है कि मुझसे मिलने के लिए तो पक्षियों के बच्चों के समान कोई आतुर नहीं है। अतः मैं किससे मिलने के लिए चंचल बनूँ। यह बात जब ध्यान में आती है कि मेरी प्रतीक्षा करने वाला कोई नहीं है, तब मेरी गति धीमी पड़ जाती है। मेरे पैर शिथिल हो जाते हैं। मेरा मन अपनी एकाकी दशा पर व्याकुल हो उठता है । सोचता हूँ भले ही दिन जल्दी-जल्दी बीत रहा है किंतु मुझे कहीं जाने की उत्सुकता नहीं है।

सौंदर्य बोध 

भाषा संस्कृत की तत्सम शब्दावली से युक्त है। समय की गतिशीलता व लक्ष्य की दूरी का सामंजस्य बैठाना सचमुच में बहुत कठिन है। यहाँ पर एकाकी जीवन की नीरसता का स्वाभाविक वर्णन है। ‘जल्दी-जल्दी’ में पुनरुक्ति अलंकार है और दिन का पंथी में रूपक अलंकार है ।


पाठ्य पुस्तक के प्रश्नोत्तर | कविता के साथ


प्रश्न 1. कविता एक ओर जग-जीवन का भार लिए घूमने की बात करती है और दूसरी ओर मैं कभी न जंग का ध्यान किया करता हूँ—विपरीत से लगते इन कथनों का क्या आशय है ?

उत्तर—कवि आत्मपरिचय की प्रथम पंक्ति में कहता है- ‘मैं जग-जीवन का भार लिए फिरता हूँ’ और आगे चलकर कहता है में कभी ने जग का ध्यान किया करता हूँ दोनों कथनों में विपरीतता नहीं अपितु विरोधाभास है। कवि संसार के दुख दर्द की अनुभूति करता है। संसार को उससे मुक्त कराने के लिए प्रयत्नशील है। अतः अपने हृदय में सबके लिए प्यार सँजोए है। इसके बाद भी उसे संसार से कोई लगाव नहीं है। जग की ओर आसक्ति का अभाव और जगत के निवासियों के प्रति प्यार यह इन पंक्तियों का आशय है। 

प्रश्न 2. जहाँ पर दाना रहते हैं, वहीं नादान भी होते हैं—कवि ने ऐसा क्यों कहा होगा? 

उत्तर—संसार में ज्ञानी अज्ञानी सभी रहते हैं। सबका अपना-अपना चिंतन होता है। दाना व नादान की स्थिति तुलना में होती है। अतः सापेक्ष अवस्था में ही ज्ञानी व अज्ञानी का निर्धारण होता है। न कोई ज्ञानी है और न कोई अज्ञानी। ज्ञानी के पास भी अज्ञान है। अतः वे सदैव ज्ञान की खोज में प्रयत्नशील रहता है। दूसरे अज्ञानी के पास भी अनेक क्षेत्रों की ज्ञानराशि रहती है। अतः कवि ने यह इसलिए कहा होगा कि दोनों की बस्ती कोई अलग-अलग तो नहीं है। 

प्रश्न 3. मैं और, और जग और कहाँ का नाता पंक्ति में और शब्द की विशेषता बताइए।

उत्तर और शब्द के माध्यम से कवि ने एक तो यमक अलंकार का चमत्कार प्रदर्शित किया है और दूसरे कवि के आश्चर्य को व्यक्त किया है कि में संसार से आसक्ति की बात तो सोच भी नहीं सकता। कवि कहता है कि में कुछ और हू और संसार कुछ और है। मैं इस संसार से आसक्ति का संबंध नहीं रखता। 

प्रश्न 4. शीतल वाणी में आग के होने का क्या अभिप्राय है? 

उत्तर—-वाणी तो भावों की अभिव्यक्ति का माध्यम है। भावों का आवास हृदय में है। भाव कोमल व कठोर दोनों प्रकार के हो सकते हैं। शातल वाणी से दोनों प्रकार के भावों की अभिव्यक्ति हो सकती है। कवि कहना यह चाहता है कि मैं उन भावों को जिनमें आक्रोश है, क्रोध है, नाराजगी है, को भी शीतल वाणी से अर्थात् धीरे से, कोमल कंठ से कहने का अभ्यासी हूँ।

प्रश्न 5. बच्चे किस बात की आशा में नीड़ों से झाँक रहे होंगे? 

उत्तर- पक्षी प्रातःकाल के समय झुंड बनाकर अपने भोजन की खोज में निकलते हैं और संध्या के समय तेजी से दौड़ता है। अतः बच्चे इस आशा में झाँक रहे हैं कि उनके माता-पिता। आने वाले हैं और हमारे लिए खाना लाएँगे। 


दीर्घ उत्तरीय प्रश्न


प्रश्न 1. जग-जीवन का भार लिए फिरने का क्या आशय है?

उत्तर-चिंतनशील व्यक्ति अपने तक ही सीमित नहीं रहता। कवि तो स्वतंत्रचेता व्यक्ति होता है। वह संसार की सोचता है। संसार में अभाव है, कष्ट है, छल-कपट है। नित्य नूतन समस्याएँ हैं। कविगण उनके कारण व निदान के विषय में चितंन करते रहते हैं। 

सब समस्याओं का निबटारा करना तो उनके वश में नहीं होता। अतः वे अपने साहित्य में कोई समस्या उठाते हैं और फिर उसका निराकरण कर संसार को एक रास्ता दिखाते हैं। इसी कारण कवि यह कहता है कि मैं संसार का भार अपने कंधों पर लिए फिरता हूँ।

प्रश्न 2. स्नेह-सुरा के पान से क्या आशय है? 

उत्तर—कवि के हृदय में सदैव कोमल भावों का निवास रहता है। वह प्रेम, करुणा, उदारता, सहृदयता और क्षमाशीलता की गाथा गाता है। घृणा, वैमनस्य, द्वेष और क्रोध से उसका नाता नहीं रहता। आशय यह है कि वह प्रेम बाँटता है, प्रेम का व्यापारी है।

प्रश्न 3. स्वप्नों के संसार से क्या आशय है? 

उत्तर—वास्तविक जीवन में अनेक समस्याएँ हैं। सभी व्यक्ति किसी न किसी अभाव से पीड़ित है। प्रत्येक मनुष्य की कुछ न कुछ अभिलाषाएँ होती है। किंतु कवि की रचनाओं में ऐसा काल्पनिक संसार निर्मित करना सरल है, जहाँ अभावों व कष्टों से संबंध ही नहीं रहता। प्रसाद जी लिखते हैं- आह! कल्पना का वह सुंदर मधुर जगत कितना होता। यही स्वप्नों का संसार है।

प्रश्न 4. कवि को यह संदेह क्यों है कि प्रयत्न के बाद भी सत्य को कोई नहीं जान पाया?

उत्तर— ‘सत्य एक है’ यह उक्ति अत्यधिक प्रसिद्ध है, किंतु व्यवहार में ऐसा देखा नहीं जाता। सभी मनुष्य सत्य को अपने-अपने ढंग से देखते व परखते हैं। ‘सत्यं वद’ हजारों वर्षों से पढ़ रहे हैं, कह रहे हैं किंतु क्या जीवन में सत्य आया? क्या किसी ने यह स्वीकार किया कि मैं असत्यवादी हूँ। सत्य की खोज जारी है किंतु अभी तक उस सत्य को नहीं खोज पाए जो सर्वस्वीकृत हो। ऐसी स्थिति जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में है?


लघु उत्तरीय प्रश्न


प्रश्न 1. मुझसे मिलने को कौन विकल में क्या कथ्य है? 

उत्तर—यह पंक्ति कवि के एकाकीपन के भाव को प्रकट कर रही है। वह यह अनुभूत करता है कि मेरी प्रतीक्षा करने वाला कोई नहीं है। जीवन में प्रायः ऐसे क्षण आते रहते हैं, जब सद ओर से घिरा हुआ मनुष्य भी यह सोचने लगता है कि मैं अकेला हूँ। मुझे चाहने वाला कोई नहीं है। यह भयंकर पीड़ा का अवसर होता है।

प्रश्न 2. यदि मंजिल दूर हो, तो लोगों की वहाँ तक पहुँचने की मानसिकता कैसी होती है? 

उत्तर—यदि मंजिल दूर है तो लोगों में शीघ्रता, चंचलता, आशंका की मानसिकता होती हैं, अर्थात् शीघ्र ही लक्ष्य तक पहुँच जाएँ। लक्ष्य को पाने के लिए गति बढ़ाएँ और पहुँचने से पहले रात अर्थात् व्यवधान न आ जाएँ।

प्रश्न 3. ‘आत्म-परिचय’ कविता द्वारा कवि क्या सिद्ध करना चाहता है? 

उत्तर- आत्म-परिचय कवि द्वारा कवि यह सिद्ध करना चाहता है कि प्रत्येक व्यक्ति की अस्मिता, अपनी पहचान का उत्स उसका परिवेश ही उसके दुनिया है। अतः व्यक्ति को स्वयं ही अपने पक्ष पर अग्रसर रहने और हंसी-खुशी से जीवन-यापन करने का प्रयत्न करना चाहिए। 

प्रश्न 4. कवि ने अपनी साँसों को दो तार क्यों कहा है?

उत्तर- जिस प्रकार तारों को स्पर्श करने से वे अंकृत होने लगते हैं, उस प्रकार हृदय पर प्रभाव डालने वाले प्रसंग भी व्यक्ति के जीवन पर असर डाला हैं। अतः कवि ने अपनी साँसों को दो तार कहा है।

प्रश्न 5. कवि के सदन को संसार ने क्या माना? 

उत्तर – कवि के रूदन को संसार ने गाना माना हीद छंद के रूप में बनाने के लिए कहा। जबकि वस्तुतः कवि का रुदन आत्मिक है।


FAQs


प्रश्न 1.दिन जल्दी-जल्दी ढलता है की आवृत्ति से कविता की किस विशेषता का पता चलता है? 

उत्तर- दिन जल्दी-जल्दी ढलता है की आवृत्ति के द्वारा कविता में समय की अबाध गति का संकेत दिया है अर्थात् समय तेजी से दौड़ता है। अतः हर प्रकर के पथिक को लक्ष्य तक पहुँचने के लिए गति में तीव्रता लानी होती है। कविता यह बताती है कि समय का ध्यान रखकर तो पक्ष भी अपनी गति तेज कर देते हैं।

प्रश्न 2 – संसार में कष्टों को सहते हुए भी खुशी और मस्ती का माहौल कैसे पैदा किया जा सकता है?

उत्तर—सुख और दुख अनुभूति के विषय हैं। वैसे वस्तु में सुख या दुख नहीं रहता। अनुकूल अनुभूति सुख है और प्रतिकूल अनुभूति दुख है। अतः सुख-दुख अनुभूति के विषय हैं। अतः यदि व्यक्ति कष्टों को प्रतिकूल अनुभूति करना बंद कर दे तो फिर वह कष्टों में भी खुशी मना सकता। है, मस्ती का माहौल पैदा कर सकता है।


Conclusion


नमस्कार Students,  मैंने इस पोस्ट को CBSE, NIOS,  CISCE, ICSE और अन्य राज्य के board के मुताबिक इस पोस्ट को तैयार किया है, तथा भविष्य में जो भी लेटेस्ट अपडेट आएंगी उसके अनुसार यह पोस्ट अपडेट भी होता रहेगा । इसलिए मुझे यह आशा है कि यह पोस्ट आपके लिए काफी जानकारी पूर्ण होगा और आपके परीक्षा के लिए काफी सहायता प्रदान करेगा । तो मेरा आपसे यही आग्रह है कि आप इस लेख को पूरा अवश्य पढ़ें । 



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