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Ncert class 12 hindi Core important questions

Class12th 
Book NCERT
SubjectHindi Core
Medium Hindi
Study MaterialsImportant questions answers
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Ncert class 12 hindi Core important questions

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खण्ड-‘क’


Q. 1. निम्नलिखित काव्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए : 

चढ़ रही थी धूप गर्मियों के दिन

दिवा का तमतमाता रूप; उठी झुलसाती हुई लू रूई का ज्यों जलती हुई भू गर्द चिनगी छा गयी

प्रायः हुई दोपहर

यह तोड़ती पत्चर।

(क) कवि ने मजदूरनी के लिए ‘वह’ सर्वनाम का प्रयोग क्यों किया है ?

(ख) ‘दिवा का तमतमाता रूप’ का अभिप्राय क्या है ?

(ग) ‘रूई ज्यों जलती हुई भू’ का आशय स्पष्ट कीजिए ।

(घ) गर्द चिनगी छा गयी’ का क्या अर्थ है ?

(ङ) मजदूरनी क्या कार्य कर रही थी ?

Ans. (क) ‘मजदूरनी’ स्त्रीलिंग शब्द है, हिन्दी में पुल्लिंग और स्त्रीलिंग दोनों का सर्वनाम ‘वह’ ही होता है। इसलिए कवि ने मजदूरनी के लिए वह’ सर्वनाम का प्रयोग किया है।

(ख) ‘दिवा का तमतमाता रूप’ का अभिप्राय दिन का अत्यधिक गर्म होने से है। 

(ग) ‘रूई ज्यों जलती भू’ का आशय है कि जिस प्रकार कई क्षणभर में जल जाती है उसी प्रकार धरती भी जल रही है। यानि गर्म है।

(घ) ‘गर्द चिनगी छा गयी’ का अर्थ है कि हवा में उड़ने वाले गर्द भी ताप के कारण चिनगारी के समान लगते हैं।

(ङ) मजदूरनी धूप में पत्थर तोड़ रही थी। 

Q. 2. निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर नीचे पूछे गए प्रश्नों उत्तर लिखिए :

भारतेन्दु युग के उपरांत हिन्दी साहित्य के इतिहास में जो कालखंड आता है उसे द्विवेदी युग कहते हैं। उसका कारण यह है कि आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी इस युग के व्यवस्थापक साहित्यकार हैं। उन्होंने 1903 ई. में ‘सरस्वती’ के संपादन का कार्यभार संभाला। ‘सरस्वती’ के संपादन के माध्यम से उन्होंने खड़ीबोली काव्य-भाषा और साहित्य दोनों को व्यवस्थित करने का भारी उद्योग किया।

वे कवियों और गद्यकारों की भाषा में एकरूपता लाकर खड़ीबोली को व्यवस्थित भी कर रहे थे, साहित्यकारों को नए विषय भी सुझा रहे थे।

 उन्हें प्रोत्साहित कर रहे थे। उनकी आलोचना भी कर रहे थे। वे हिन्दी भाषा-भाषियों को अन्य भाषाओं के साहित्य की गरिमा से परिचित कर रहे थे और अपने देश की अन्य भाषाओं के साहित्य से हिन्दी साहित्य का तालमेल भी बैठा रहे थे। उन्होंने साहित्य को ‘ज्ञानराशि का संचित कोष’ कहा। द्विवेदी जी ने प्रधानतः ज्ञानार्जन की ही साधना की।

(क) द्विवेदी युग किसे कहा जाता है ?

(ख) ‘सरस्वती’ पत्रिका का संपादन किसने कब संभाला ? 

(ग) ‘सरस्वती’ पत्रिका की भूमिका का उल्लेख कीजिए ।

(घ) द्विवेदीजी के अनुसार साहित्य क्या है ? 

(ङ) द्विवेदीजी ने किस चीज की साधना की ?

Ans. (क) भारतेन्दु युग के वाद के हिन्दी साहित्य के इतिहास के कालखंड द्विवेदी युग कहा जाता है।

(ख) द्विवेदी युग के व्यवस्थापक साहित्यकार आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी 1903 ई. में ‘सरस्वती’ पत्रिका का संपादन संभाला।

(ग) ‘सरस्वती’ पत्रिका ने खड़ी बोली काव्य-भाषा और साहित्य दोनों को व्यवस्थित करने का भारी उद्योग किया।

(घ) द्विवेदीजी के अनुसार साहित्य ‘ज्ञानराशि का संचित कोष है।

(क) विवेधीजी ने मुख्यतः ज्ञानार्जन की ही साधना की।


खण्ड-‘ख’


Q.3. निम्नलिखित में से किसी एक विषय पर निबन्ध लिखिए, 

(क) सिनेमा और समाज

(ख) बेरोजगारी

(ग) आतंकवाद 

(घ) प्रदूषण की समस्या 

Ans

(घ) प्रदूषण की समस्या

भूमिका-वर्तमान विज्ञान-युग में मानव को जहाँ कुछ वरदान मिले हैं, वहाँ कुछ अभिशाप भी मिले है। प्रदूषण भी वैज्ञानिक सभ्यता का एक दुष्परिणाम है। इसे सहने के लिए अधिकांश जनता विवश है ।

प्रदूषण का अर्थ-प्रदूषण का अर्थ है-प्रकृति के संतुलन में दोष उत्पन्न होना । न शुद्ध वायु मिलना में शुद्ध जल मिलना, न शुद्ध खाद्य मिलना तया न शांत वातावरण मिलना। कुल मिलाकर पर्यावरण में अस्वास्थ्यकर तत्वों का मिल जाना प्रदूषण है।

प्रदूषण के प्रकार -प्रदूषण मुख्यतः चार प्रकार का है- 1. पर्यावरण-प्रदूषण, वायु-प्रदूषण, 3. जल-प्रदूषण, 4. ध्वनि प्रदूषण। इनके अतिरिक्त भू-प्रदूषण भी है। रूप 1. पर्यावरण प्रदूषण पर्यावरण प्रदूषण सबसे खतरनाक है। यह प्रकाट में दिखाई नहीं देता, लेकिन इसके परिणाम अत्यंत गंभीर होते हैं। उदाहरणतया, उन्नीसवीं शताब्दी से लेकर अब तक वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा में 16 प्रतिशत की वृद्धि हो चुकी है।

इससे वायुमंडल का तापक्रम बढ़ गया है। यदि यह क्रम चलता रहा तो जीवनदायिनी ऑक्सीजन की मात्रा कम होती जाएगी, हिमखंड पिपल जाएँगे, गर्मी बढ़ेगी, लोग श्वास तथा नेत्र-रोग से ग्रस्त होंगे। ये सब दुष्परिणाम धीरे-धीरे दिखाई देने लगे है। प्रदूषण का यह पहला चरण है। गर्मी के कारण आकाश पर जमी ओजोन गैस की पर्व को भी क्षति पहुंची है । इससे वैज्ञानिक बहुत चिंचित हैं, क्योंक ओजोन मंडल के फटने से सूर्य की कुछ जहरीली किरणे सीधे धरती पर पहुँचकर मानव जीवन को नष्ट कर डालेंगी।

2. वायु-प्रदूषण-वायु-प्रदूषण पर्यावारण-प्रदूषण का ही एक अंग है। आजकल जैसे-जैसे शहरीकरण तथा औद्योगिकीकरण की प्रवृत्ति बढ़ती चली जा रही है, वैसे-वैसे शुद्ध बाबु मिलना भी दूभर होता जा रहा है। विभिन्न उद्योगों एवं कल-कारखानों से निकले जहरीले धुएँ तथा मोटरगाड़ियों के दूषित हुएँ के कारण वायु के निर्मल कोष में जहरीले तत्त्व मिल गए हैं। मुंबई, कोलकाता जैसे महानगरों में लोगों के लिए साँस लेना भी कठिन हो गया है। महिलाएँ बाहर कपड़े सुखाती हैं तो उन पर शुगर मिल का काला धुआँ जम जाता है। ये कम जव श्वास के साथ फेफड़ों में पहुँचते होंगे तो क्या न कर डालते होंगे ।

3. जल-प्रदूषण-जल-प्रदूषण का मुख्य कारण आयोगिकीकरण है । कल-कारखानों का दूषित जल एक ऐसी समस्या है, जिसका कोई समाधान नहीं हो सका । उसे धरती में विसर्जित करो तो धरती प्रदपित होती है। बाहर छोड़ दो तो नदी, तालाब, नहर तथा अन्य जल-स्रोत दूषित होते हैं। प्रायः फैक्टरियों के बाहर सड़ांध भरा जल फैला रहता है, जो वर्षा के समय शेष पानी में घुलकर लोगों के स्वास्थ्य पर हमला करता है। वर्तमान में गले, फेफड़े तथा कैंसर रोग के बढ़ने का कारण यही जल-प्रदूषण है।

4. ध्वनि प्रदूषण-मनुष्य को जीने के लिए शांत वातावरण चाहिए, लेकिन आजकल वातावरण में इतना अधिक शोर है कि बहरेपन और मानसिक तनाव के रोग बढ़ चले हैं। ध्वनि प्रदूषण को बढ़ाने में मुख्यतः कल-कारखाने, यातायात, भोंपू, लाउडस्पीकर आदि दोषी हैं।

5. भू-प्रदूषण-आजकल वैज्ञानिक संसाधनों का विकास हो गया है। खेती करने के लिए कई प्रकार के कीटनाशक छिड़काव किए जाते हैं। धरती में रासायनिक खादे डाली जाती है। उस पर गंदा धुओं, दूषित जल, रेडियोधर्मी तत्त्व, परमाणु भट्टियों से निकले घातक तत्त्व भी धरती में मिलते रहते हैं। इनके कारण भूमि की कोख प्रदूषित हो गई है। उसमें जो खाद्य सामग्री उगती है, यह स्वास्थ्य के लिए घातक होती है।

दुष्परिणाम-प्रदूषण के परिणाम बहुत भयंकर हैं। इसके कारण व्यक्ति का जीना कठिन हो गया है। नित्य नए रोग पैदा होने लगे हैं। मच्छर, कॉकोच और दूसरे कीड़ों की सेना ने नई-नई समस्याओं को जन्म दिया है। सर्दी-गर्मी और वर्षा का चफ टूट गया है। कभी बाढ़ तो कभी सूखा, कभी ओलावृष्टि तो कभी तूफान। वातावरण की अशुद्धता के कारण मानसिक तनाव में वृद्धि हुई है। कुछ वर्ष पहले भोपाल गैस कारखाने में से गैस रिस पड़ी थी, जिसके फलस्वरूप हजारों लोग मर गए, कितने ही अपंग हो गए ।

प्रदूषण के कारण-प्रदूषण पैदा होने का प्रमुख कारण है- अंधाधुंध वैज्ञानिक प्रगति। समृद्धि की होड़ में मानव ने देवता जैसे जंगलो को काट डाला। पहाड़ियाँ नगी-बूची हो गई । वातावरण में नमी तथा गर्मी की अधिकता हो गई। परिणामस्वरूप पहाड़ सरकना, भू-स्खलन, ओला-वृष्टि, मौसम चक्र में असंतुलन जैसे दोष पैदा हो गए। कल-कारखानों का अंधाधुंध विकास, नदी तथा आबादी के पास पैक्टरियाँ लगाना, कारखानों के प्रदूषित निक्षेप को समेटने की व्यवस्था न कर पाना, परमाणु-भट्ठियों से निकले जहरीले तत्त्वों को नष्ट न कर पाना आदि अन्य कारण हैं।

समाधान-सय तरह के प्रदूषण से बचने के लिए आवश्यक है कि सभी विकास-योजनाएँ सुविचारित तथा सुनियोजित हो। आवासीय बस्ती तया नगरों में घने पेड़ लगाए जाएँ। हरियाली को मात्रा बढ़ाई जाए । राष्ट्रीय वन-संपदा का तेजी से विकास किया जाए। कल-कारखाने आवादी से दूर हों। प्रदूषण को रोकने के लिए कठोर नियम बने। तभी यह धरती सुखमयी बन सकेगी। 

Q. 4. आतंकवादी गतिविधियों की आशंका की गुप्त सूचना पुलिस अधीक्षक को देते हुए पत्र लिखिए । 

Ans. सेवा में,

श्रीमान् पुलिस अधीक्षक, धनवाद विषय : गोपनीय सूचना

महाशय,

इगर सिन्दरी इलाके में कुछ नये-नये चेहरे नजर आ रहे हैं। कभी इन लोगों सिन्दरी फर्टिलाइजर प्लांट का फोटोग्राफी करते देखा गया है। ये लोग आम लोगों से बातें करने से कतराते हैं। ये लोग विशाल होटल में ठहरे हुए है। मुझे तो इन लोगों की गतिविधियों पर इनके आतंकवादी होने की आशंका है एतदर्थ में श्रीमान को सूचित कर रहा हूँ कि इनकी गतिविधियों पर कड़ी नजर रखी जाय ताकि निकट भविष्य में कोई अनहोनी घटना को ये लोग अंजाम न सकें। इस क्षेत्र के और लोग भी उन्हें इसी नजर से देखते हैं।

आपका विश्वासी

सजग नागरिक

Q.5. ‘विस्फोटों का सिलसिला’ विषय पर एक आलेख लिखिए ।

Ans. वाराणसी के संकटमोचन मंदिर में हुए धमाकों से लोग अभी उबर भी नहीं पाए थे कि आतंकियों ने दिल्ली की जामा मस्जिद को अपना निशाना बना लिया। यह हमला शुक्रवार को हुआ, जब नमाज के वास्ते मस्जिद में भारी संख्या में लोग जमा थे। 

हालाँकि यह भी सच है कि वहाँ जोदो विस्फोट हुए उनकी तीव्रता बहुत कम थी। फिर भी महिलाओं और बच्चों समेत 13 लोग घायल हुए। 

दिल्ली पुलिस-प्रशासन को पूरा यकीन है कि इन धमाकों के पीछे आतंकियों का ही हाथ है। दिल्ली पुलिस जामा मस्जिद धमाकों को उसी दिन जम्मू-कश्मीर में हुए आधा दर्जन बम धमाकों से जोड़ कर देख रही है। पुलिस इन को भी तलाश कर रही है कि दिल्ली और जम्मू-कश्मीर संयोग भर थे या किसी पूर्वनियोजित साजिश का हिस्सा था । संभावनाओं में धमाके महज एक

श्रीनगर में धमाके सुबह स्थानों पर होते रहे। इन 11 बजे शुरू हुए और शाम 5 बजे तक अलग-अलग विभिन्न हमलों मैं आतंकियों ने हथगोलों का इस्तेमाल किया, जो उन्होंने पुलिस और सुरक्षा बलों के वाहनों को निशाना बना कर फेंके थे । इन धमाकों में जो लोग मारे गए या घायल हुए वे निर्दोष महिला-पुरुष और बच्चे थे । इन धमाकों में कुछ सैन्य कर्मियों समेत पाँच लोग मारे गए और तीस के लगभग घायल हुए। 

माना जा रहा है कि इनका मकसद आम जन को जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव में शामिल होने से रोकने की चेतावनी देना था। दूसरे, वे शांति प्रक्रिया को भी इसके जरिए निशाना बनाना चाहते थे। श्रीनगर बम धमाकों की जिम्मेदारी पाकिस्तान आधारित या समर्थित आतंकी संगठनों ने ली है। इन धमाकों के संदर्भ में कथित तौर पर जैश-ए-मोहम्मद के कुछ आतंकी गिरफ्तार भी किए गए। 

इसके विपरीत दिल्ली की जामा मस्जिद बम धमाकों की किसी भी संगठन ने लिखित जिम्मेदारी नहीं ली है। पुलिस चार लोगों को हिरासत में ले कर उनसे पूछताछ कर रही है। बताते हैं कि पुलिस एक संदिग्ध महिला के बारे में भी जानकारियाँ जुटा रही है जो न सिर्फ रहस्यमय तरीके से घटनास्थल में गायव हो गई, बल्कि उसके अन्य क्रियाकलाप भी संदिग्ध प्रतीत होना रहे थे । 

जामा मस्जिद के साही इनाम सैयद अहमद बुखारी समेत तमाम अन्य लोगों का मानना है कि इन हमलों का मकसद मुख्य तौर पर दहशत पैदा करने के साथ साथ सम्प्रदायिक सौहार्म बिगाड़ कर देश को दंगों में झोंकना था । बाराणसी के संकटमोचन मंदिर में हुए बम धमाकों का मकसद भी सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ना ही था। उस वक्त भी हिंदू-मुस्लिम नेतृत्व ने दोनों बगों से शांति चनाए रखते हुए राहत कार्यों में मदद की अपील की थीं। इसमें वे सफल भी रहे थे। 

दोनों ही समुदायों ने राहत कार्यों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था। शाही इमाम ने भी इन धमाकों के बाद शांति बनाए रखने और महौल न बिगड़ने देने की अपील की। उन्होंने तो जामा मस्जिद धमाकों समेत संकटमोचन मंदिर हमले की सीबीआई जाँच की माँग तक कर डाली। हालांकि इस क्रम में असल प्रयास तो आम लोगों को ही करने होते हैं।

1990 के दशक के अंत में दिल्ली के आइटीओ क्षेत्र में पुलिस मुख्यालय के सामने हुई आतंकी वारदात में बड़ी संख्या में लोग हताहत हुए थे। इसके पहले ब्लू लाइन बस को आतंकियों ने अपने निशाना बनाया था। बस को निशाना बनाने से पूर्व आतंकी शांतिवन, कौड़िया पुल और किंग्सवे केप क्षेत्र में भी श्रृंखलावद्ध धमाके कर चुके थे। 

दिल्ली ही क्यों, देश के अन्य भागों में आतंकी हमलों की बाकायदा एक लंबी फेहरिस्त मौजूद है। प्रश्न यह उठता है कि इन इस्लामिक आतंकी संगठनों के पीछे कौन है ? साथी ही उनका मकसद क्या है ? उन्हें अपनी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए धन कहाँ से मुहैया हो रहा है ।

Or, अपने पडोस में छत गिरने से हुई दुर्घटना पर एक रिपॉट लिखिए। हिन्दपीढ़ी में छत गिरी राँची, 4 अप्रैल, 2010 (संवाददाता हि. स.) राँची के घनी आबादी वाले क्षेत्र

Ans हिन्दपीढ़ी में अचानक एक दोमजिले मकान की छत गिर गयी। घटना रात के करीब 7 बजे हुई। छत के नीचे बैठे एक-दो लोगों को सिर में हल्की चोट लगी। छत गिरने की आवाज सुनकर पड़ोस के लोग दौड़ पड़े। दो घायलों को पास के निजी नर्सिंग होम में ले जाया गया जहाँ उन्हें एक घंटे के इलाज के बाद छोड़ दिया गया। घटना के चारे में बताया जाता है कि छत के नीचे दो व्यक्ति बैठे गप-शप कर रहे थे कि अचानक छत के चरचराने की आवाज हुई और वे कुछ करते या कहते कि अचानक छत नीचे आ गिरी। 

जान-माल का कोई नुकसान नहीं हुआ। छत के गिरने का अनुमान छत की ढलाई में सिमेंट की कम मात्रा को लगाया जा रहा है। मकान मालिक ने मकान बनाने वाले ठीकेदार पर मुकदमा दर्ज कर दिया है। पुलिस जाँच-पड़ताल में जुट गयी है। तत्काल ठीकेदार को हिरासत में ले लिया गया है।

Q. 6. ‘बस्ते का बढ़ता बोझ’ विषय पर एक फीचर लिखिए। 

Ans.

संभाल पाने में अक्षम महसूस करते हैं। नर्सरी से लेकर दसवीं कक्षा तक किताबों का भारी बोझ बच्चों पर डाल दिया गया है। जो बच्चा अभी ठीक से चलना भी नहीं सीख पाया है उसे बस्तों को लेकर चलना पड़ता है। माता-पिता भले इसमें गर्व का अनुभव करते हैं। लेकिन बच्चों के दिल में झाँककर देखने का कप्ठ कोई माता-पिता नहीं करते। माता या पिता या घर का कोई और सदस्य बच्चों का बस्ता लिये बच्चे को स्कूल पहुँचाते हैं। तीसरा-चौथा तक जाते-जाते बस्ते का बोझ इतना बढ़ जाता है कि का अनुभव करते हैं। 

9 एवं खुद माता-पिता भी उस बस्ते को ले जाने में बोझ 10 तक पहुँचते-पहुँचते तो बोझ और भी बढ़ जाता है। सरकार का ध्यान अब जाकर खुला है कि बस्तों का बोझ कम किया जाय। लेकिन अभी परिणाम तो सामने नहीं आया है। नयी शिक्षा नीति बनायी जा रही है जिसमें बस्ते का बोझ कम करने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। देखिये कब तक परिणाम सामने आता है। अभी तो बोझ बढ़ा ही हुआ है। 

Or, ‘आधुनिक जीवन-शैली’ पर एक फीचर लिखिए ।

Ans. एक नव-विवाहित अध्यापिका इंटरव्यू देने पहुँची तो नियोक्ता ने पूछा- ‘यदि हम तुम्हें नीकरी पर रख लें तो तुम इसी वर्ष अपने परिवार में तो वृद्धि नहीं कर लोगी’ ? नौकरी की मारी अध्यापिका ने कहा-‘नहीं, बिल्कुल नहीं। अभी एक-डेढ़ साल तो हमारा ऐसा इरादा नहीं है ।

बाप रे ! उनका होने वाला बच्चा बिना संसार में आए ‘क्यू’ में खड़ा है। सामने बोर्ड टॅगा है-कृपया प्रतीक्षा कीजिए। यह बच्चा जब संसार में आएगा तो क्या शांत और सहज रह जाएगा? नहीं। वास्तव में उसे पालने के लिए किसी के पास खाली समय नहीं है। 

यह तो शुक्र मानिए, बच्चे की माँ उसे अपनी कोख में धारण कर लेगी, किराए की कोख नहीं लेगी। वरना यह भी तो हो सकता था। केसी तनाव-भरी जिंदगी है। माँ अपनी ममता बच्चे पर लुटाना चाहती है किंतु छुट्टियाँ सीमित हैं । बच्चा एक सुरक्षित गोद में लोटना चाहता है किंतु माँ

खिसक जाती है। पिता सुबह चले जाते हैं। रात में देर से आते हैं। बच्चे को न माँ की ममता मिली न पिता का प्यार। वह अभी चलना भी नहीं सीखा कि उसे तरह-तरह से पढ़ाया-सिखाया जाने लगा है। ढाई साल का होते-होते प्री-नर्सरी में डाल दिया जाता है। गले में बस्ता, हाथ में बोतल, तोतली बोली । 

प्राइमरी स्कूल में प्रवेश का मामला है और माता-पिता के चेहरे पर तनाव है। ये चाहते हैं कि बढ़िया स्कूल में प्रवेश हो जाए। इसलिए वे साय तनाब बच्चे पर डाल देते हैं ऐसे बोलना, वैसे न बोलना, शरारतें न करना आदि-आदि। जैसे-तैसे प्रवेश होता है, तो बच्चा मानो ठेल दिया जाता है पढ़ाई के रणक्षेत्र में। 

उसे प्रथम आना है। बीस में से चीस अंक लाने है। एक अंक भी कम आया तो दोहरी-झिड़कियाँ । इधर से अध्यापिका ‘युद्ध’ कहती है तो उपर से

माता-पिता । बच्चा बेचारा घनचक्कर बन जाता है। पाँचवीं-छठी तक आते-आते पढ़ाई के अतिरिक्त ट्यूशन रख दी जाती है। स्कूल से आए, प्राइवेट कोचिंग में पहुँचे। पर तो बस रेस्तरों है, जहाँ सुबह का नाश्ता, शाम की चाय और रात का मौजन मिल जाता है। 

बाकी समय पढ़ी-पड़ो और आगे बढ़ो का भूत! पूछो उनसे खेलेगा कौन ? बात यहीं तक होती तो गनीमत थी। इंजीनियरिंग में प्रवेश मिला तो अब फिर

से अच्छे अंकों का तनाव। अंक आ जाए तो नौकरी मिलने के लिए संघर्ष। नौकरी भी मिल गई पचास हजार रुपए वाली। परंतु सुबह सात बजे घर से निकले, रात को नी बजे पर पहुंचे। जाकर थककर सो गए। कल सुबह फिर से जल्दी जो जाना है। 

जवानी नौकरी में तबाह हुई। बचपन पढ़ाई में चला गया। शेष रहा बुढ़ापा-अकेला; इका-हारा। उसमें भी तनाव कि कोई अपना बंधु पास नहीं। बच्चे उसी तरह नौकर है। काम करते हैं, खटते हैं और तनाव पीते हैं।

Q. 7. दीजिए: निम्नलिखित काव्यांश को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर 

हौले-हौले जाती मुझे बाँध निज माया से। उसे कोई तनिक रोक रक्खो।

वह तो चुराए लिए जाती वे मेरी आँखें।

नभ में पाती-बँधी बगुलों की पाँखें।

(क) उपर्युक्त काव्यांश में किसके सौन्दर्य का वर्णन किया गया है ? 

(ख) ‘हॉले-हौले जाती मुझे बाँध निज माया से’ का आशय स्पष्ट कीजिए ।

(ग) ‘चुराए लिए जाती वे मेरी आँखें’ में कवि का क्या अभिप्राय है?

(घ) काँव किसकी माया से स्वयं को बचाने की गुहार लगाता है और क्यों ?

Ans. (क) प्रदत्त काव्यांश में संध्या समय बादलों के गन पर सीटते श्वेत की पंक्तिबद्ध उड़ान के सौंदर्य का वर्णन है।

(ख) ‘हौले-हौले जाती मुझे वाँच निज माया से’ का आशय है कि बगुलों की पंक्तिबद्ध उड़ान का दृश्य कवि को धीरे-धीरे उजले आकर्षण में बांध लेती है । 

(ग) इससे कवि का अभिप्राय है कि कवि उन बक-पक्तियों से अपनी दृष्टि हटा नहीं पा रहा है। पंक्ति आगे बढ़ती है और कवि की दृष्टि उसी ओर चली जाती है। 

(घ) कवि वक-पंक्तियों के आकर्षण की माया से अपने को बचाने की गुहार तगा रहा है।

Or, ये कीमत भी अदा करे हैं हम बदुरूस्ती से होशो-हवास तेरा सौदा करनेवाले दीवाना भी तो हो ले हैं तेरे गम का पासे अदब है कुछ दुनिया का खयाल भी है सबसे छिपा के दर्द के मारे चुपके-चुपके रो ले हैं। 

(क) शायर किसकी कीमत अदा करने की बात कर रहा है ?

(ख) शायर की दृष्टि में दीवाना कौन और कैसे हो लेता है ? 

(ग) शायर ने दुनिया के किस दस्तूर का वर्णन किया है ?

(घ) किस बात को खयाल करके शायर चुपके-चुपके से लेता है ? 

Ans. (क) शायर मासूका के प्रेम की कीमत अदा करने की बात कर रहा है। 

(ख) शायर की दृष्टि में आशिक दीवाना है और माशूका का प्यार पाने का करने के लिए दिवाना बनने को भी तैयार रहते हैं।

(ग) शायर ने दुनिया के उस दस्तूर का वर्णन किया है कि कुछ पाने के लिए कुछ कीमत चुकानी पड़ती है।

(घ) शायर अपने प्रेम चुपके-चुपके से लेता है। को दुनिया का ख्याल करते सबसे छिपाते हुए

Q. 8. निम्नलिखित काव्यांश को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तरदीजिए:

तुम्हें मूल जाने की

दक्षिणी ध्युवी अंधकार-अमावस्या शरीर पर, चेहरे पर, अंतर में पालूँ मैं’ झेलूँ मैं, उसी में नहा लूँ मैं

आध्येही परिवेषि

इसलिए कि तुमसे ही परिवेष्टित आच्छादित रहने का रमणीय उजेला अब

सहा नहीं जाता है। 

(क) काव्यांश का भाव-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।

(ख) काव्यांश के शिल्प-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए ।

Ans. (क) प्रिय के भूल जाने की प्रार्थना नवीन कल्पना है। कवि प्रेम की अतिशयता से बाहर आना चाहता है। भूलना भी जीवन के लिए बरदान है। 

(ख) इसकी भाषा संस्कृतिनिष्ठ है। देशज और तद्भव शब्दों का भी प्रयोग है । कवि अपने स्व की जगाना चाहता है। उजले से अंधकार की कामना करना नयी सोच है। 

Q. 9. निम्नलिखित प्रश्नों में से किन्हीं दो के उत्तर दीजिए:

(क) शीतल वाणी में आग के होने का क्या अभिप्राय है ?

(ख) ‘सबसे तेज बौछारे गयीं, भादो गया’ के बाद प्रकृति में जो परिवर्तन कवि ने दिखाया है, उसका वर्णन अपने शब्दों में कीजिए ।

(ग) ‘भाषा को सहूलियत से बरतने’ का क्या अभिप्राय है ? 

Ans. (क) वाणी तो भावों की अभिव्यक्ति का माध्यम है। भावों का आवास हृदय में है। भाव कोमल व कठोर दोनों प्रकार के हो सकते हैं। शीतल बाणी से दोनों प्रकार के भावों की अभिव्यक्ति हो सकती है। कवि कहना यह चाहता है कि में उन भावों को जिनमें आकोश है, क्रोध है, नाराजगी है, को भी शीतल वाणी से अर्थात् धीरे से, कोमल कंठ से कहने का अभ्यासी हूँ। 

(ख) भादो के बाद शरद ऋतु का आगमन ऐसा प्रतीत होता है, मानो रात्रि के बाद प्रातःकाल हुआ हो। इस ऋतु का प्रकाश लालिमापूर्ण होता है जो खरगोश की आँखों की समानता करता-सा लगता है। शरद के आने पर बालक अपनी साइकिलों को लेकर निकल पड़ते हैं। अब उनको वर्षा का भय नहीं है। 

अतः पुलों को पार करते हुए अपनी चमकीली साइकिलों को तेज चलाते हुए जोर-जोर से पंटी बजाते हुए दौड़ते हैं। पतंग उड़ाने वाले बच्चों को साइकिल वाले बालक संकेतों से बुला रहे है। बालक की शारीरिक कोमलता आकाश को कोमल बना रही है। पतंग उड़ाते समय ये बच्चे आनंदमग्न होकर सीटियाँ बजाते है, किलकारी

मारते हैं। लगता है तितलियों का कोमल समूह हो। ‘भाषा को सहूलियत’ से बरतने से अभिप्राय भाषा का अक्षरानुकूल प्रयोग है । किसी भी समय भाषा के प्रयोग से पहले हमे सोच-विचार कर लेना चाहिए। जहाँ प्यार की भाषा की आवश्यकता हो, वहाँ प्यार की भाषा ही प्रयोग करनी चाहिए तथा दुष्ट व्यक्ति के समक्ष क्रोध की भाषा का प्रयोग ही उचित माना जाता है ।

Q. 10. निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर उस पर आधारित प्रश्नों के उत्तर लिखिए :

पर उस जादू की जकड़ से बचने का एक सीधा-सा उपाय है। वह यह कि बाजार जाओ तो खाली मन न हो। मन खाली हो, तब बाजार न जाओ। कहते

है तू में जाना हो तो पानी पीकर जाना चाहिए। पानी भीतर हो, तो तू का लूपन व्यर्थ हो जाता है। मन लक्ष्य से भरा हो तो बाजार भी फैला का फैला ही रह जाएगा। तब वह घाव विल्कुल नहीं दे सकेगा, बल्कि कुछ आनंद ही देगा। तब बाजार तुमसे कृतार्थ होगा, क्योंकि तुम कुछ-न-कुछ सच्या लाभ उसे दोगे। बाजार की असली कृतार्थता है आवश्यकता के समय काम आना। 

(क) लेखक किसके जादू की बात कर रहा है और क्यों ?

(ख) भरा बाजार कब असफल हो जाएगा ? 

(ग) लेखक ने किस जादू से बचने का क्या उपाय बताया है ?

(घ) बाजार की असली कृतार्थता क्या है ?

Ans. (क) लेखक बाजार की चकाचौंध के जादू की बात कर रहा है क्योंकि बाजार अपनी चकाचौंध में व्यक्ति को फैसा लेता है। वह मन पर प्रभाव नहीं डाल सकेगा ।

(ख) यदि हमारा मन लक्ष्य से भरा हो तब भरा बाजार असफल हो जायगा।

(ग) लेखक ने बाजार की चकाचौंध से बचने का उपाय बताया है कि बाजार खाली मन लेकर नहीं जाना चाहिए। जैसे ग्रीष्म में बाहर निकलने पर पानी से पेट भरा रहने पर तू का प्रभाव नहीं होता, ठीक उसी प्रकार मन भरा रहने पर बाजार के जादू का प्रभाव नहीं होता।

(घ) बाजार की असली कृतार्थता आवश्यकता के समय काम आने में है।

Or 

पानी की आशर पर जैरी सारा जीनत आफर टिक गया हो। यस एक तरी समक्ष में नहीं आती थी कि जब चारो और पानी की इरानी कभी है तो लोग घर में इतनी करिखा हुआ पानी चास्टी भर-भर कर इन पर कोंकते हैं। जैसी निर्धन बरबादी के पानी की। देश की किरानी क्षति होती है इस तरह के अंधविश्वासेना है कि इन्हें इन्द्र की सेना । 

अगर पुन्न महाराज से में पानी दिला सकते है तो पुद अपने लिए पानी क्यों नहीं भीग सेते? पथी गुल्यो भर पर पानी नष्ट करवाते घूमते हैं, नहीं यह सब पावंड है। अंधविश्वास है। ऐसे ही अधविश्वासों के कारण हम अंग्रेजों से पिछड़

(क) ‘पानी की आशा पर जैसे सारा जीवन आकर टिक गया लेखक क्या स्पष्ट करना चाहता है ? हो’ से

(ख) लेखक ने किसे पानी की निर्मम बरबादी कहा है ?

(ग) इन्द्र-सेना के संबंध में लेखक की क्या धारणा है ?

(घ) लेखक ने भारत की गुलामी का क्या कारण बताया है ?

Ans. (क) लेखक स्पष्ट करना चाहता है कि पानी के लिए लोग प्राहि-प्राहि गधा रहे हैं। पानी की आशा में जीवन के सारे क्रियाकलाप जैसे रुक गये हैं। सभी

लोग इन्द्र को प्रसन्न करने को सोच रहे हैं।

(७) एक तरफ पानी का घोर अभाव, दूसरी ओर बाल्टी भर-भर पानी पफेंकना, लेखक ने इस फेंके जाने वाले पानी को निर्मम बरवादी कहा है। 

(ग) इंदर सेना के बारे में लेखक सोचता है, ये अंधविश्वासी हैं। ये पानी को नष्ट कर रहे हैं। यदि ये इंदर के सैनिक हैं तो इंदर से ही अपने लिए भी पानी माँग लें। ये मुहल्ले भर के पानी को नष्ट करवाते घूमते हैं अंधविश्वास व पाखंड है। । यह इनका

(घ) लेखक मानता है अंग्रेजों से पिछड़ गए कि ऐसे अंधविश्वासों और पाखंडों के और गुलाम बन गए । 

Q. 11. निम्नलिखित में से किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर दीजिए:

(क) कहानी के किस-किस मोड़ पर लुट्टन के जीवन में क्या-क्या परिवर्तन आए ? 

(ख) जीवन की जद्दोजहद ने चार्ली के व्यक्तित्व को कैसे सम्पन्न बनाया?

(ग) नमक की पुड़िया ले जाने के संबंध में सफिया के मन में क्या द्वन्द्व था ?

(घ) द्विवेदी जी ने शिरीष के माध्यम से कोलाहल व संघष से भरी जीवन-स्थितियों में अविचल रहकर जिजीविषु बने रहने की सीख दी है। स्पष्ट कीजिए ।

(ङ) जाति प्रथा को श्रम-विभाजन का ही एक रूप न मानने के पीछे अंबेडकर के क्या तर्क हैं ? 

Ans. (क) कहानी के निम्नलिखित मोड़ो पर लुट्टन के जीवन में परिवर्तन आए- 

(1) बचपन में लुटूटन के माता-पिता उसे नी वर्ष की उम्र में ही अनाथ बनाकर चल बसे थे। किंतु अल्पायु में ही उसकी शादी कर दी थी। फलस्वरूप उसका पालन-पोषण उसकी विधवा सास ने ही किया।

(ii) शादी के बाद माता-पिता की मृत्यु के बाद वह अपनी ससुराल में ही रहन लगा। यहाँ गाँव के लोग उसकी सास को तरह-तरह की तकलीफ दिया करते थे। लोगों से बदला लेने की पुन के कारण ही उसने कसरत करनी शुरू की। 

(iii) राज-पहलवान की उपाधि-लुटूटन सिंह के जीवन में ये खुशी के क्षण थे। श्यामनगर के राजा ने उसे राज-पहलवान घोषित कर दिया और उसका और उसके दोनों लड़कों के खाने-पीने का खर्च स्वयं वहन किया। 

(iv) पत्नी की मृत्यु लुटन सिंह की पत्नी दो पुत्रों को जन्म देने के बाद स्वर्ग सिधार गई। इससे उसके ऊपर उन दोनों लड़कों की चिंता और सवार हो गई।

(V) राज-पहलवान से हटना-श्यामनगर के राजा की मृत्यु के बाद राजकुमार के शासन ग्रहण करने के बाद उसे राज-पहलवान के पद से हटा दिया गया फलस्वरूप वह गाँव में रहकर किसान और खेतिहर मजदूरों के बच्चों को कुश्ती सिखाने लगा।

(vi) पुत्रों की मृत्यु-गाँव में अनावृष्टि, अन्न की कमी, मलेरिया और हेजे के कारण अन्य लोगों के साथ उसके दोनों पुन्न भी काल के ग्रास बन गए। फिर भी उसने हिम्मत नहीं हारी। अंत में वह स्वयं भी इसी में मारा गया।

(ख) चार्ली को जीवन के प्रांरभ में अनेक परेशानियों का सामना करना पड़ा। वह तलाकशुदा और दूसरे दर्जे की अभिनेत्री का पुत्र था। उसे अपने जीवन में निर्धनता और माँ के पागलपन से संघर्ष करना पड़ा। उसे साम्राज्य, औद्योगिक क्रांति, पूँजीवादी तथा सामंतशाही व घमंडी समाज से तिरस्कृत होना पड़ा।

कि वह उसे किस प्रकार लखनऊ ले जाकर सिब बीबी को दे। वह उसे छिपा कर कि वह उसे किस प्रकार पर तैनात कस्टम अधिकारियों को दिखाकर ले जाए। जाइसके फिर ही यह सोचने लगी कि यदि कस्टम अधिकारी उसे वह नमक नहीं ले जाने देंगे तो उसने अपनी माँ से जो वायदा किया था उसका क्या होगा? लेकिन उसने सोचा कि वह जान देकर भी अपने किए गए वायदे को निभाएगी।

(प) शिरीष का वृक्ष एक अवधूत की भांति होता है। यह दुख और तपन में हार नहीं भीमा रिही ग्रीष्म ऋतु ने जब असहनीय गर्मी पड़ती रहती है, धरती और

आसमान जलते रहते हैं, तब भी यह वायुमंडल से रस खींचकर हरा-भरा बना रहता है। यह मस्त, बेपरवाह, सरस और मादक बना रह कर कोलाहल व संघर्ष से भरी जीवन-स्थितियों में अविचल रहकर जिजीविषु बने रहने की सीख देता है। 

(ङ) जाति प्रथा को श्रम विभाजन का ही एक रूप न मानने की पीछे अंबेडकर के तर्क अग्रलिखित हैं-

(i) भारतीय हिंदू समाज में जाति प्रथा श्रम विभाजन के साथ-साथ श्रमिक विभाजन का भी रूप लिए हुए है। यह श्रम के आधार पर विभाजित विभिन्न वगों को एक-दूसरे की अपेक्षा ऊँच-नीच भी करार देती है, जो कि विश्व के किसी भी समाज में नहीं पाया जाता है। 

(ii) जाति प्रथा का दूषित सिद्धांत स्वाभाविक विभाजन नहीं है। यह व्यक्ति की निजी क्षमता की अपेक्षा माता-पिता के सामाजिक स्तर के अनुसार पहले से ही अर्थात् गर्भचारण के समय से ही मनुष्य का पेशा निर्धारित कर देता है। 

(iii) जाति प्रथा मनुष्य मनुष्य को जीवन-भर के लिए एक पेशा में ही बाँध देती है, चाहे उसे पेशे से उसके उसके भूखों भूखों मरने की स्थिति ही क्यों न उत्पन्न हो जाए। इस प्रकार जाति प्रथा प्रतिकूल परिस्थितियों में भी मनुष्य को अपना पेशा बदलने की स्वतंत्रता प्रदान नहीं करती है।

Q. 12. निम्नलिखित में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर दीजिए:

(क) यशोधर बाबू से उनके अधीनस्थ कर्मचारी क्यों परेशान थे ? 

(ख) सिंधु-सभ्यता साधन-सम्पन्न थी, पर उसमें भव्यता का आडंबर नहीं था। कैसे ?

(ग) ‘डायरी के पन्ने’ पाठ के आधार पर बताइए कि अब महिलाओं की स्थिति में बदलाव क्यों आ रहे हैं। 

Ans. (क) यशोधर बाबू एक कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति थे। वे कभी भी दफ्तर में समय से पहले कुर्सी नहीं छोड़ते थे और कभी-कभी तो समय के बाद भी वे काम-निपटाते रहते थे। इस कारण उनके अधीनस्थ कर्मचारियों को भी रूकना पड़ता था, इसलिए उनके अधीनस्थ कर्मचारी उनसे परेशान रहते थे।

(ख) सम्पन्न सिंधु सभ्यता-मुअनजोदड़ो और हड़प्पा दोनों प्राचीन सिंधु सभ्यता के अवशेष है। मुअनजोदड़ो वर्तमान पाकिस्तान के सिन्ध प्रांत में है और हड़प्पा पंजाब प्रांत में है। मुअनजोदड़ो विश्व का सबसे प्राचीन नियोजित शहर था। यह दो सौ हेक्टेयर क्षेत्र में फैला था। सम्पूर्ण शहर वास्तुकला की दृष्टि से पूर्ण नियोजित था। वहाँ भवनों, बन्द नालियों, विभिन्न वस्तुओं, मकानों के जो अवशेष मिले हैं, वे उस काल की अत्यन्त विकसित व सम्पन्न सभ्यता को प्रदर्शित करते हैं।

आडम्बर का अभाव विकसित व सम्पन्न सभ्यता होने पर भी यहाँ के महलों व धर्म-तंत्र के प्रतीक मंदिरों, मूर्तियों आदि में कोई दिखावा नहीं है। जबकि यहाँ पर राज व्यवस्था भी थी और धार्मिक अनुष्ठान भी होते थे, लेकिन उनमें आडम्बरों का पूर्ण अभाव था। 

(ग) 13 जून, 1944 की डायरी में ऐन ने विश्वास व्यक्त किया है कि भविष्य में औरतें ज्यादा सम्मान की हकदार बनेंगी। अब स्त्रियों ने अपने अस्तित्व को समझा है । अब वे अन्याय सहन नहीं करती है। अव जागरूक हो गयी है। 

Q. 13. निम्नलिखित में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर दीजिए

(क) ऐन ने अपने अज्ञातवास के दिनों का वर्णन किस प्रकार किया है?

(ख) ताम्रकाल के दो सबसे बड़े नियोजित शहर किन्हें माना जाता है और क्यों ? 

(ग) ‘सिल्वर वैडिंग’ कहानी में ‘शायनल बुढ़िया’ किसे और क्यों कहा गया है ?

Ans. (क) शनिवार, 28 नवम्बर, 1942 के पत्र में ऐन इन दिनों अधिक बिजली खर्च कर रहे थे, जो राशन से अधिक हो गया था। लिखती है कि हम इसीलिए एक पखवाड़े तक विना बिजली के काटते रहे। हमारे साथ एक मिस्टर डसेल हैं, जो अधिकांश बच्चों के साथ बैठना पसन्द करते हैं। में उन्हें पसन्द नहीं करती। वे बहुत पुराने जमाने की बात करते हैं। हमें अकल देने के लिए लम्बा अनुशासनप्रद भाषण झाड़ते हैं।

(ख) ताम्रकाल के दो सबसे वड़े नियोजित शहर मुअनजोदड़ो और हड़प्पा को माना जाता है, क्योंकि ये शहर खुदाई से प्राप्त हुए हैं। ये पाँच हजार वर्ष पुराने शहर थे। ये दुनिया के सबसे पुराने शहर थे। ये नगर नगरयोजना की अनोखी मिसाल है।

(ग) ‘शायनल बुढ़िया यशोधरा बाबू की पत्नी को कहा गया है, क्योंकि वह भी इस उम्र में आधुनिकता में बहना चाहती है। आधुनिक वेशभूषा अपनाना चाहती है।

Q. 14. निम्नलिखित प्रश्नों में से किसी एक का उत्तर दीजिये: 

(क) ‘जूझ’ कहानी के उद्देश्य पर प्रकाश डालिए । 

(ख) सिंधु घाटी की सभ्यता को ‘लो प्रोफाइल’ सभ्यता क्यों कहा गया है ?

Ans. (क) ‘जूझ’ आनन्द यादव द्वारा लिखित आत्मकथात्मक उपन्यास है। मूल उपन्यास मराठी भाषा में है। उसका एक अंश का हिन्दी अनुवाद यहाँ प्रस्तुत

है। लेखक का उद्देश्य, अपनी बाल्यावस्था का वर्णन, ग्रामीण जीवन का यथार्थ चित्रण करना है। ग्रामीण परिवेश में पढ़ने वाले छात्रों, वहाँ के विद्यालयों; अध्यापकों तथा अभिभावकों की शिक्षा के प्रति विचार का वर्णन करना है। लेखक पढ़ना चाहता है, किन्तु उसके दादा (पिता) उसे पढ़ाना नहीं चाहते। अध्यापक उसे प्रोत्साहित करते हैं। लेखक कहता है, खेती के काम की चक्की से मास्टर की • छड़ी अच्छी लगती है।

(ख) सिन्धु घाटी की सभ्यता को लो प्रोफाइल सभ्यता कहा जाता है। इसके कई कारण हैं। सभ्यता का पता खुदाई के बाद लगा। इसके पहले रोम, चीन, यूनान, मिस्र आदि की सभ्यता को ही सबसे पुरानी सभ्यता कही जाती थीं। किन्तु खुदाई में जो सभ्यता के चिह्न प्राप्त हुए हैं उससे ज्ञात होता है कि यह सभ्यता विश्व की अन्य सभी पुरानी सभ्यताओं से भी अधिक पुरानी है यह लगभग पाँच हजार वर्ष पुरानी सभ्यता है जबकि अन्य सभ्यताएँ लगभग साढ़े तीन हजार वर्ष के आस-पास की हैं। यहाँ के नगरों का निर्माण नगरयोजना के तहत हुआ था जिसे देखकर आज के इंजीनियर भी दाँतों तले ऊँगली दबाते हैं।




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