NCERT Solutions for Class 12 Hindi Core Notes अपठित गद्यांश-बोध Easy Notes

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NCERT Solutions for Class 12 Hindi Core Notes– अपठित गद्यांश-बोध Easy Notes


जिसका पहले से अध्ययन न किया गया हो, उसे अपठित कहते हैं। परीक्षा में इसी तरह का काव्यांश देकर उसपर आधारित प्रश्न पूछे जाते हैं। उसे हल करते समय निम्नलिखित बिंदुओं का ध्यान रखना आवश्यक है- 

1. सबसे पहले गद्यांश को दो से तीन बार ध्यानपूर्वक पढ़ना चाहिए। इस प्रक्रिया से काव्यांश का मूल भाव समझ में आ जाएगा। 

2. फिर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर गद्यांश में रेखांकित करने चाहिए। 

3. अब उन प्रश्नों का उत्तर सरल व सहज भाषा में देना चाहिए।

4. प्रश्नों के उत्तर सिर्फ काव्यांश पर ही आधारित होने चाहिए।

 5. प्रश्नों के उत्तर सीधे, संक्षिप्त व सटीक होने चाहिए।


कक्षा | Class12th 
अध्याय का नाम | Chapter Nameअपठित गद्यांश-बोध
अध्याय प्रकार | Chapter typeहिंदी व्याकरण | Hindi grammar
किताब | Bookहिंदी कोर | HINDI CORE
बोर्ड | Boardसभी बोर्ड | All India Board
किताब | Book एनसीईआरटी | NCERT
विषय | Subjectहिंदी | HINDI

महत्त्वपूर्ण अपठित गद्यांश-बोध

निम्नलिखित गद्यांशों को ध्यान से पढ़िए और तत्संबंधी प्रश्नों के उत्तर दीजिए-


NCERT Solutions for Class 12 Hindi Core अपठित गद्यांश बोध Easy Notes
अपठित गद्यांश-बोध

1. अमेरिका के साथ हुए नाभिकीय समझौते को लेकर देश के शीर्ष परमाणु वैज्ञानिकों की चिंताओं को दूर करने की प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की कोशिश स्वागत योग्य है, क्योंकि इन ‘वैज्ञानिकों का एक समूह इस समझौते को लेकर आशंकित होने के साथ ही मुखर भी था। 

फिलहाल यह तय नहीं कि प्रधानमंत्री अपनी कोशिश में कितने कामयाब हुए, लेकिन कम-से-कम तब तक इस समझौते पर सवाल नहीं उठाए जाने चाहिए जब तक कि अमेरिका किन्हीं नई शर्तों के साथ सामने नहीं आता। 

इस संदर्भ में यह ध्यान रहे कि मनमोहन सिंह परमाणु समझौते को लेकर संसद में दो बार अपना स्पष्टीकरण दे चुके हैं। इसके अतिरिक्त वह परमाणु वैज्ञानिकों से भी मुलाकात कर चुके हैं। अब आवश्यकता इस बात की है कि अमेरिका को यह सीधा संदेश दिया जाए कि यदि उसने 18 जुलाई, 2005 को हुई बातचीत से अलग हटकर परमाणु समझौते को अंतिम रूप देने की कोशिश की तो भारत को यह स्वीकार नहीं होगा। 

ऐसा संदेश इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश की वचनबद्धता के बावजूद वहाँ के सांसदों का एक समूह भारत पर कुछ नई शर्ते थोपना चाहता है। दरअसल इसीलिए भारतीय परमाणु वैज्ञानिकों की चिंताएँ बढ़ी हैं। 

चूंकि इन चिंताओं को दूर करते हुए प्रधानमंत्री ने यह साफ कर दिया कि भारत परमाणु समझौते में ऐसी कोई नई शर्त स्वीकार नहीं करेगा जो राष्ट्रीय हितों को आघात पहुँचाती हो इसलिए इस मामले को विवाद का विषय बनाने से बचा जाना चाहिए। वैसे भी प्रधानमंत्री ने यह दोहरा दिया है कि देश के न्यूनतम प्रतिरोधी सैन्य परमाणु कार्यक्रम और शोध और अनुसंधान कार्य में कोई आँच नहीं आने दी जाएगी। 

प्रधानमंत्री के बार-बार इस स्पष्टीकरण पर अविश्वास जताने का कोई कारण नहीं। आखिर जब भारत मनमुताबिक समझौता न होने पाने की स्थिति में उसे खारिज करने के लिए स्वतंत्र है तब फिर इस तरह की बातों का क्या औचित्य कि इस समझीते से भारत की संप्रभुता खतरे में पड़ जाएगी अथवा परमाणु

कार्यक्रम को आगे ले जाने के मामले में हमारे हाथ बँध जाएँगे ? अमेरिका के साथ हुए परमाणु समझौते के संदर्भ में यह विस्मृत नहीं किया जाना चाहिए

कि भारत की ऊर्जा की सख्त जरूरत है और इसके अभाव में देश का विकास बाधित हो रहा है। निःसंदेह इससे बेहतर और कुछ नहीं हो सकता कि देश का परमाणु कार्यक्रम स्वदेशी तकनीक और कौशल से आगे बढ़े, लेकिन यथार्थ तो यह है कि विदेशी तकनीक के अभाव में परमाणु ऊर्जा से संबंधित हमारा कार्यक्रम पिछड़ गया है। 

परमाणु संपन्न देशों की तुलना में हम दशकों पीछे चल रहे हैं। परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम को आगे बढ़ाने में विदेशी तकनीक का सहयोग एक यथार्थ है और इसकी अनदेखी नहीं की जानी चाहिए। परमाणु समझौते के संदर्भ में ऐसी कोई दलील सही नहीं कि सब कुछ भारत के मन मुताबिक होना चाहिए। 

दो देशों के बीच होने वाले समझौते लेन-देन पर ही आधारित होते हैं। इस समझौते के संदर्भ में यह विस्मृत नहीं किया जाना चाहिए कि भारत को परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर किए बगैर वह सब कुछ मिलने जा रहा है जिससे वह एक लंबे अर्से से वंचित है। 

कुछ लोगों के लिए यह निराशा का कारण बन सकता है कि अमेरिका भारत को परमाणु संपन्न राष्ट्र का दर्जा देने के लिए तैयार नहीं, लेकिन यदि हम इस दर्जे को हासिल किए बगैर अपने सामरिक और आर्थिक हितों की रक्षा कर सकते हैं तो फिर समझदारी इसी में है कि जो कुछ उपलब्ध हो रहा है उसे प्राप्त किया जाए। 

प्रश्न-

(क) प्रधानमंत्री की कौन-सी कोशिश स्वागत योग्य है ? (ख) अमेरिका को क्या सीधा संदेश देना चाहिए ?

(ग) उपयुक्त शीर्षक दीजिए।

(घ) प्रधानमंत्री ने क्या आश्वासन दिया है ?

(ङ) परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम में हमारी क्या स्थिति है ?

उत्तर- 

(क) प्रधानमंत्री भारत के शीर्ष परमाणु वैज्ञानिकों की चिंताओं को दूर करने की कोशिश कर रहे हैं जो अमेरिका तथा भारत के बीच हुए सभी समझौते को लेकर पैदा हुई है। 

(ख) अमेरिका को सीधा संदेश यह देना चाहिए कि यदि उसने 18 जुलाई, 2005 को हुई बातचीत से अलग हटकर परमाणु समझौते को अंतिम रूप देने की कोशिश की तो भारत उसे स्वीकार नहीं करेगा।

(ग) शीर्षक- परमाणु समझौते पर उठे सवाल।

(घ) प्रधानमंत्री ने स्पष्ट किया है कि राष्ट्रीय हितों को आघात पहुँचाने वाली किसी भी शर्त को भारत स्वीकार नहीं करेगा। साथ ही देश के न्यूनतम प्रतिरोधी सैन्य परमाणु कार्यक्रम और शोच एवं अनुसंधान कार्य में कोई कमी नहीं आएगी। 

(ङ) परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम में हम विकसित देशों से काफी पीछे हैं। इस कार्यक्रम को आगे बढ़ाने के लिए विदेशी तकनीक का सहयोग लेना हमारी मजबूरी है।


2. ईश्वर सच्चिदानंद स्वरूप है तथा उसकी सर्वोत्कृष्ट रचना है-मानव कण-कण में व्याप्त होने के साथ ही वह सर्वाधिक निकट हमारे अंदर स्थित है, फिर भी मानव हताश, निराश, दुखी तथा अशांत है। कारण है ईश्वरीय ज्ञान का अभाव। प्रश्न है उसे कैसे जाना जाए ? 

ईश्वर से मिलन का सीधा-सरल तरीका है-ध्यान ध्यान है देखना, पर इन बाहरी आँखों से नहीं अंतर्दृष्टि से देखना। ध्यान के द्वारा मन को एकाग्र कर प्राण में, आत्मा में स्थिर किया जाता है। जैसे सूर्य की बिखरी किरणों को खुर्दबीन द्वारा एक बिंदु पर केंद्रित करने से अग्नि उत्पन्न होती है,

 वैसे ही ध्यान द्वारा चित्त की वृत्तियों के घनीभूत होने पर चैतन्य पर शक्ति का दिव्य प्रकाश, अमृत रस तथा अनहद संगीत के रूप में प्रकटीकरण होता है जिसे आत्म-साक्षात्कार कहते हैं। ध्यान आत्मा का भोजन तथा मुक्ति का मार्ग है जिससे परम तत्व परमात्मा के रहस्यों का उद्घाटन अंतरात्मा में होता है।

ध्यान सभी धर्मों का सार तथा सभी संतों एवं महापुरुषों द्वारा अपनाया गया मार्ग है। ध्यान के महत्त्व को समझे तथा किए बिना कोई भी व्यक्ति धार्मिक तथा अध्यात्मवादी नहीं हो सकता, क्योंकि ध्यान से चित्त का रूपांतरण होता है। 

पारलौकिक के साथ-साथ लौकिक रूप से भी ध्यान मानवोपयोगी है, क्योंकि शारीरिक व्याधियों के मूल हैं-मन के विकार। इस साधना से श्वासों की गति नियमित होती है जिससे व्याधि कारक चंचल मन शांत होता है और अनेक प्रकार की व्यार्थियों का साथना से श्वासों की गति नियमित होती है जिससे व्याधि कारक चंचल मन शांत होता है और अनेक प्रकार की व्याधियों का शमन होता है। 

ध्यान से मस्तिष्क की क्रियाशीलता बढ़ती है, बुद्धि कुशाग्र होती है तथा समय-समय पर आने वाले प्रश्नों की समस्याओं का समाधान | आंतरिक शक्ति से होता है। सायना से निष्क्रिय दाया मस्तिष्क सक्रिय हो जाता है तथा मस्तिष्क की कार्यकुशलता और शक्ति दस गुना बढ़ जाती है।

ध्यान परमानंद का झरना है। इस प्रक्रिया में आनंद की रिमझिम वर्षा होती है क्योंकि साधक के ध्यानस्थ होने पर मस्तिष्क की तरंगे उत्पन्न होती हैं जो शांति तथा आनंद का कारण है, किंतु इस हेतु मन का शांत होना आवश्यक है। प्रसन्नता की प्राप्ति हेतु आनंद केंद्र पर ध्यान कर उसे जगाया जाता है, जिससे व्यक्ति कठिन से कठिन परिस्थिति में भी खिन्न व विचलित नहीं होता तथा सदैव प्रसन्न व तनाव मुक्त जीवन व्यतीत करता है। 

ध्यान की प्रक्रिया सरल है, किंतु आवश्यकता है इसे जानने की । तत्व दृष्टा सद्गुरु से जानकर इसका नित्य प्रति अभ्यास करना चाहिए। यह साधना शारीरिक, मानसिक एवं बौद्धिक विकारों को दूर कर सुख, समृद्धि, दीर्घायु तथा आनंदप्रदायक है। स्वयं के अलावा परिवार एवं विश्व में शांति व मंगल भावना हेतु भी साधना आवश्यक है।


प्रश्न – (क) गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक दीजिए।

(ख) मानव हताश क्यों है ? 

(ग) आत्म-साक्षात्कार किसे कहते हैं ?

(घ) ध्यान मानव के लिए उपयोगी क्यों है ?

(ङ) प्रसन्नता और ध्यान में क्या संबंध है ? 

उत्तर—(क) शीर्षक – ध्यान का महत्त्व ।

(ख) मानव ईश्वर की सर्वोत्कृष्ट रचना है और कण-कण में व्याप्त ईश्वर मानव मन के सर्वाधिक निकट है परंतु मानव को ईश्वर का ज्ञान नहीं है। इसी कारण वह हताश, निराश तथा अशांत है।

(ग) ध्यान द्वारा चित्त की वृत्तियों के घनीभूत होने पर चैतन्य शक्ति का दिव्य प्रकाश, अमृत रस तथा अनहद संगीत के रूप में प्रकटीकरण होता है। जिसे आत्म-साक्षात्कार कहते हैं। 

(घ) ध्यान से मनुष्य के चित्त का रूपांतरण होता है। इससे मनुष्य के मन के विकार समाप्त होते हैं और चरित्र मस्तिष्क की क्रियाशीलता बढ़ती है। इससे मनुष्य की आंतरिक शक्ति का विकास होता है।

(ङ) प्रसन्नता की प्राप्ति के लिए आनंद केंद्र पर ध्यान लगाया जाता है। इससे मनुष्य कठिन परिस्थितियों में भी विचलित नहीं होता। वह सदैव प्रसन्न तथा तनाव मुक्त जीवन व्यतीत करता है ? 


3. सामाजिक विसंगतियों, विकृतियों और स्वार्थों के चलते मानवीय संबंधों में कटुता बढ़ती जा रही है। जिंदगी को कमर से खींचकर लाने वाले व्यक्ति की कमर टूट रही है। शरीर बूढ़ा हो रहा है, लेकिन चेतना अभी जवान है, किंतु वह अपने ही लोगों से उपेक्षित है। यह समस्या आज सामान्य परिवारों में प्रायः देखी जा रही है। इसके लिए सामाजिक परिवेश के साथ ही हम भी कहीं-न-कहीं उत्तरदायी हैं। 

सर्वप्रथम परिवर्तन हमें अपने विचारों में लाना होगा। विचार ही परिवर्तन की पृष्ठभूमि निर्मित करते हैं। जीवन के सत्य को जानना है तो पहले स्वयं को जानना होगा, कि हमारे इस मानव शरीर की उपयोगिता क्या है और हम कहाँ तक इसमें खरे उतरे हैं ? 

मोहजनित संबंधों के चलते नैतिकता और मानवता का हास हो रहा है। हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि परमात्मा की इस सृष्टि में मानव ही उसकी सर्वोत्कृष्ट रचना है। अतः मानव से अपेक्षाएँ भी अधिक होना स्वाभाविक है। 

जहाँ कहीं भी नैतिकता, सिद्धांतों और आदर्शों की बात होगी साथ ही उनका अनुसरण किया जाएगा वहाँ प्रभु की कृपा से सुख, शांति, समृद्धि अवश्य मिलेगी। क्योंकि परमात्मा भी यही अपेक्षा करता है कि मानव मानव के साथ मानवता का व्यवहार करे। यह सबसे बड़ी पूजा है और पूजा से हमारी चेतना स्पंदित होती है जो अनैतिकता व अराजकता को देखते ही हमारे अंतःकरण को झकझोर देती है।

यहीं हमें सतर्कता बरतनी है। जीवन सतत गतिशील है, स्थिर रहना स्वाभाविक नहीं है। गति में ही जीवन है। परिवर्तन गति से ही होता है। हमें अपने विचारों और आचरण में आत्मीयता को विस्तार देना होगा। भाई-चारा, प्रेम-व्यवहार जीवन को सरस करता है। जीवन में अनुकूल और प्रतिकूल दोनों ही परिस्थितियाँ आती हैं, हमें इनका दृढतापूर्वक निर्वहन करना है, क्योंकि परिस्थितियाँ तो आकर चली जाती हैं और हमें इसी समाज में रहना है। 

अतः हम संबंधों में कटुता क्यों लाएँ। मानव हृदय प्रेम के लिए है, कटुता के लिए नहीं। स्वाभाविक रूप से मानव हृदय दुख में द्रवित और सुख में संतोष का अनुभव करता है। यही स्वभाव यदि हम दूसरों के लिए भी बनाए रखें तो निश्चित रूप से दूसरों का सहयोग और सहानुभूति हमें अवश्य मिलेगी, जो हमारी शाश्वत पूँजी होगी। सिद्धांत की बात है कि कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है। 

पात्रता अर्जित करने के लिए कुछ त्यागना पड़ता है। दूसरे के हृदय में स्थान पाना है तो अपने ही समान उसके साथ व्यवहार करना होगा। स्वस्थ सामाजिक ढाँचा तभी बरकरार रह सकता है जब हम दूसरों के सुख-दुख को अपना समझें। वास्तविक रूप में हम तभी सुखी रह सकते हैं जब पड़ोसी भी सुखी रहे। यह मानव प्रकृति है कि हम अन्य व्यक्ति को कष्ट में देखकर स्वयं कष्ट का अनुभव करते हैं।

CLASS 12 NCERT SOLUTION IN ENGLISHCLASS12 NCERT SOLUTION IN HINDI
Historyइतिहास
Geography भूगोल
Political science राजनीति विज्ञान
English SubjectResult
Hindi SubjectHistory answer keys

प्रश्न – (क) मानवीय संबंधों में कटुता क्यों आ रही है ? (ख) लेखक के अनुसार सुख व शांति कब मिल सकती है ?

(ग) परिस्थितियों तथा मानव जीवन का क्या संबंध है ?

(घ) मनुष्य को कैसा व्यवहार करना चाहिए ?

(ङ) उपयुक्त शीर्षक दीजिए। 

उत्तर— (क) आज मानव स्वार्थी हो गया है। समाज की विसंगतियों तथा विकृतियों के कारण मानवीय संबंधों में कटुता आ गई है।

(ख) लेखक के अनुसार, सुख-शांति तभी मिल सकती है जब हम नैतिकता, सिद्धांतों तथा आदर्शों का व्यवहार में प्रयोग करेंगे। मानव-मानव के साथ अच्छा व्यवहार करे। 

(ग) मानव जीवन में अनुकूल तथा प्रतिकूल परिस्थितियाँ आती रहती हैं। इन दोनों दशाओं को अपना व्यवहार सामान्य रखना चाहिए तथा भाई-चारे व प्रेम-व्यवहार को बनाए में मनुष्य रखना चाहिए।

(घ) मनुष्य दुख में द्रवित तथा सुख में संतोष का अनुभव करता है। यही स्वभाव उसे दूसरे के साथ भी बनाए रखना चाहिए। स्वस्थ सामाजिक ढाँचे के लिए दूसरों के सुख-दुख को अपना समझना अत्यंत आवश्यक है। 

(ङ) शीर्षक समाज और मानवीय व्यवहार |


4. मूलतः दो ही मार्ग हैं-ज्ञान मार्ग और भक्ति मार्ग। पहला शुष्क मार्ग है। दूसरे में, सापक मीरा की तरह तड़पता है। अगर मन में समर्पण का भाव न हो तो दोनों से पार नहीं पहुँचा जा सकता। श्रद्धा या समर्पण दोनों मार्गो पर उत्प्रेरक का कार्य करते हैं। भक्त के लिए श्रद्धा या समर्पण पहला सोपान है तो ज्ञानी का भी इनके बिना काम नहीं चल सकता। 

उसे इतना तो मानना ही पड़ेगा कि यह ब्रह्मांड अलौकिक है, अद्भुत है। मेरा अस्तित्व इस विशाल समुद्र में एक तिनके से बढ़कर नहीं है। तब ज्ञानी का तुरंत अज्ञात के प्रति अहोभाव जागेगा। द्रौपदी को देखिए। बीच दरबार में सताई गई। 

अपनों परायों से मदद की गुहार लगाती रही। सभी नतमस्तक बैठे रहे। एक तरफ साड़ी संभालती रही दूसरी तरफ कृष्ण को पुकारती रही। भरोसा आधा-अधूरा था, जब जब उसने बचाव के सभी प्रयत्न छोड़ दिए तभी प्रभु प्रकट हुए।

आदमी का चित्त डाँवाडोल है। विश्वास पग-पग पर डगमगाता है। विवेकानंद जैसे मजबूत व्यक्ति का भी डगमगा गया था। विवेकानंद चरित में विवरण है: स्वामी विवेकानंद वृंदावन विचरते थे। एक बार उन्होंने अपने एक मात्र वस्त्र कौपीन को धोकर सूखने के लिए डाल दिया और राधाकुंड में स्नान हेतु उतर गए। 

तभी एक बंदर कौपीन उठाकर वृक्ष पर चढ़ गया। स्वामीजी ने जल में खड़े-खड़े बंदर को कौपीन लौटाने के लिए काफी इशारे किए, बंदर तो बंदर, नहीं पसीजा। नग्न अवस्था में कैसे नगर भ्रमण को जाऊँगा, यह सोचकर स्वामीजी व्याकुल हो और समीप के जंगल की राह पकड़ी। मन में विक्षोभजनित अभिमान जगा कि जब तक तन ढॉपने हेतु वस्त्र नहीं मिलेगा, जंगल में रहकर अन्न-जल का त्याग करूंगा। 

आगे जैसी ईश्वर की मर्जी। इतना सोचना था कि श्रद्धा और समर्पण फिर लौट आया। वे मुड़े और देखा कि एक व्यक्ति उनकी तरफ दौड़ा चला आ रहा। उनके कौतूहल का ठिकाना नहीं रहा जब उन्होंने पाया कि उनके हाथों में फल-मिष्ठान्न और एक गेरुआ लिवास था। उस व्यक्ति के अनुरोध पर स्वामीजी ने उन उपहारों को स्वीकार किया । 

तत्क्षण वह आदमी जंगल में विलुप्त हो गया। स्वामी जी राधाकुंड की तरफ लौट आए। बंदर द्वारा उठाया गया कौपीन उसी जगह सही सलामत मिल गया। इस घटना से अभिभूत उस ज्ञानयोगी ने देर तक राधाकुंड के तट पर राधा-कृष्ण का गुणगान किया। कहते हैं अहंकार व्यक्ति को धरती पर ही नरक दिखा देता है। 

परमात्मा का प्रेमी स्वयं से और कालांतर में परिवेश से प्रेम करना सीखता है। भस्मासुर केवल पौराणिक कथा का एक पात्र नहीं जिसकी दुर्गति पर हम हँसते हैं। हम सबके चित्त में एक भस्मासुर छिपकर बैठा है। क्रोध, लोभ, ईर्ष्या इत्यादि की अग्नि में हमें कोई दूसरा नहीं जलाता, हम स्वयं ही स्वयं को जलाते हैं। 

प्रश्न – (क) उपरोक्त गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक दीजिए। गए

(ख) लेखक ने कौन-से मार्ग बताएँ हैं ? उत्प्रेरक का काम कौन करता है ? 

(ग) द्रौपदी ने अपने सम्मान की रक्षा कैसे की ? 

(घ) विवेकानंद का विश्वास क्यों डगमगाया ?

(ङ) भस्मासुर कहाँ है ? हम किससे जलते हैं ?

उत्तर- 

(क) शीर्षक ईश्वर और आस्था ।

(ख) लेखक ने दो मार्ग बताए हैं-ज्ञान मार्ग तथा भक्ति मार्ग। पहला मार्ग शुष्क है तथा दूसरे में साधक मीरा की तरह तड़पता है। श्रद्धा उत्प्रेरक का काम करती है।

(ग) द्रौपदी को दरबार में सताया जा रहा था। उसने अपने-परायों से मदद की गुहार लगाई, परंतु सब व्यर्थ रहा। जब वह सारे प्रयत्नों को छोड़कर प्रभु श्रीकृष्ण को समर्पण भाव से पुकारती है तो प्रभु प्रकट होते हैं और उसकी रक्षा करते हैं। इस प्रकार ईश्वर में आस्था रखकर उसने अपने सम्मान की रक्षा की।

(घ) विवेकानंद मजबूत व्यक्ति थे। एक बार वे नहा रहे थे। उन्होंने एकमात्र कौपीन को धोकर सूखने के लिए डाल दिया। तभी एक बंदर उसे उठा ले गया। स्वामी जी ने इशारों से उससे कौपीन को लौटाने को कहा, परंतु बंदर ने नहीं दिया। नग्न अवस्था में नगर भ्रमण की कल्पना से उनका विश्वास डगमगा गया। 

(ङ) भस्मासुर हमारे चित्त में बैठा है। हमें क्रोध, लोभ, ईर्ष्या आदि जलाते हैं। हम स्वयं ही अपनी आज में जलते हैं।


5. विद्या वह है जिसे प्राप्त करने पर मुक्ति मिल जाए, जो हमें मुक्त कर दे । प्रत्येक व्यक्ति दुख, हानि, बुढ़ापा, बीमारी, मृत्यु, पराजय, अपमान आदि से मुक्ति प्राप्त करना चाहता है और उसके लिए निरंतर प्रयास भी करता है। सुख, समृद्धि, यश, उन्नति, स्वास्थ्य, विजय आदि प्राप्त करने के लिए तरह-तरह की विद्याओं का अध्ययन और शोध करके ज्ञानार्जन करता है। 

वह भाषा, गणित, भूगोल, इतिहास, विज्ञान, साहित्य, वाणिज्य, खगोलशास्त्र, ज्योतिष, नीतिशास्त्र, विधिशास्त्र, सदृश असंख्य विद्याओं का गहन अध्ययन करता है, किंतु क्या इन विद्याओं को प्राप्त कर लेने पर उसे सुख-दुख, जन्म-मृत्यु आदि सांसारिक द्वंद्वों से मुक्ति मिल जाती है ? उत्तर नकारात्मक ही है। तो वह विद्या कौन-सी है जिससे मुक्ति मिलती है ?

संसार में ‘वेद’ ही एकमात्र वह विद्या है जिसे प्राप्त कर लेने पर मुक्ति मिल जाती है। वेद अपौरुषेय हैं। ये पुस्तक नहीं हैं, ये विद्या हैं। जिस प्रकार पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति अपौरुषेय है, उसे किसी ने बनाया नहीं है। वह न्यूटन के पहले भी थी बाद में भी है। न्यूटन न केवल उसको जान लिया था, उसका साक्षात्कार कर लिया था। उसे बनाया नहीं था। 

इसी प्रकार सहस्रों वर्ष पूर्व से ऋषि वेद को जानने का प्रयास करते रहे। पंचमहाभूतों से निर्मित इस संसार के तरह-तरह के बंधनों से मुक्ति दिलाने वाली विद्या का साक्षात्कार करके वे अपने शिष्यों को मीखिक रूप से उसे हस्तांतरित कर देते थे, लेकिन वे स्पष्ट रूप से यह भी बतला देते थे कि जो कुछ तुमने हमसे सुना है वह ‘इति’ अर्थात् ‘अंतिम’ नहीं है। 

वेद अनंत हैं, अतः तुम स्वयं अपने ढंग से उसका साक्षात्कार करो। सुन-सुन कर वेद अगली पीढ़ियों को प्राप्त हो रहा था, इसलिए वेद को ‘श्रुति’ भी कहते हैं। अनेक ऋषियों ने सहस्रों वर्षों तक इसी प्रकार मुक्ति प्रदान करने वाली विद्या अर्थात् वेद को स्वयं प्राप्त किया और मौखिक रूप में आगे बढ़ाया। फिर एक द्वीप में कृष्ण नामक ऋषि का जन्म हुआ। 

द्वीप में पैदा होने के कारण उन्हें कृष्ण द्वैपायन कहते है। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती ऋषियों के द्वारा प्राप्त किये गए वेद के ज्ञान को व्यास रूप में अर्थात विस्तार से चार भागों में संहिताबद्ध किया। वेद के इन चार भागों के नाम हैं-ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। पूर्ववर्ती ऋषियों द्वारा प्रदत्त वेद के ज्ञान को व्यासरूप में संहिताबद्ध करने के कारण ही श्रीकृष्ण द्वैपायन महर्षि वेदव्यांस के नाम से प्रतिष्ठित हुए। 

इन्हीं महर्षि वेदव्यास ने वेद को जन-जन तक पहुँचाने के लिए न केवल पंचम वेद के नाम से विख्यात महाभारत की रचना की, वरन् ‘श्रीमद्भागवत’ समेत अठारह ‘पुराण’ भी सरल संस्कृत भाषा में लिखे। यद्यपि हमारे पास ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद के रूप में चार महान ग्रंथ उपलब्ध हैं, किंतु इन चारों की विषयवस्तु केवल मुक्तिदायिनी विद्या ही है ।।

प्रश्न- (क) उपयुक्त शीर्षक दीजिए।

(ख) मनुष्य विद्या क्यों प्राप्त करना चाहता है ? (ग) मनुष्य को मुक्ति किससे मिल सकती है ?

(घ) ऋषि अपने शिष्यों को वेदों की शिक्षा कैसे देते थे ?

(ङ) महर्षि वेदव्यास के योगदान को बताइए ?

उत्तर- (क) शीर्षक–वेद – मुक्तिदाता विद्या। 

(ख) मनुष्य सुख, समृद्धि, यश, उन्नति, स्वास्थ्य, विजय आदि प्राप्त करने के लिए तरह-तरह की विद्याओं का अध्ययन और शोध करके ज्ञानार्जन करता है। 

(ग) मनुष्य को मुक्ति केवल ‘वेद’ से मिल सकती है। ये पुस्तक नहीं, विद्या हैं। (घ) ऋषि तरह-तरह के ज्ञान से सांसारिक बंधनों से मुक्ति दिलाने वाली विद्या अपने छात्रों को मौखिक रूप में देते थे। वे यह भी कहते थे कि जो कुछ तुमने सुना है, वह अंत नहीं है। वेद अनंत है। अतः तुम स्वयं अपने ढंग से उसका साक्षात्कार करो। 

(ङ) महर्षि वेदव्यास ने वेद को जन-जन तक पहुँचाने के लिए पंचम वेद के रूप में महाभारत की रचना की। उन्होंने ‘श्रीमद्भागवत’ समेत अठारह ‘पुराण’ सरल संस्कृत भाषा में लिखे ।


6. राधाकृष्णन् दर्शन-शास्त्र के प्रकांड विद्वान थे। जब वे मैसूर से कोलकाता विश्वविद्यालय जाने लगे तो उनके शिष्य बहुत दुखी हुए। डॉ. राधाकृष्णन् से पढ़ने में छात्रों को जो आनंद मिलता था उसमें व्यवधान आसन्न था, बाघा आ गई थी। उन्होंने गुरुजी से आग्रह किया कि आप मतः जाइए, तार्किक गुरु ने उनको समझा दिया कि ज्ञानगंगा के प्रवाह से ही लाभ है, पढ़ने का अवसर और लाभ सबकके मिलना चाहिए। बेचारे विद्यार्थी तर्क से परास्त होकर, उनकी बात मान गए। 

कठिनाई से बनी रहने वाली सहजता के लिए वे प्रयत्नशील हो गए। वह दिन आया, जब मैसूर से कोलकाता के लिए डॉ. राधाकृष्णन को जाना था। शिष्यों ने विदाई के लिए रथ सजाया और उसमें बैठने का आग्रह गुरु जी से किया। बारी-बारी से शिष्य, घोड़ों के स्थान पर जुत गए। 

मैसूर रेलवे स्टेशन पर लाकर उन्होंने डॉ. राधाकृष्णन को रेल में बिठाया। जब रेल चली तो स्नेहातिरेक में वे फूट-फूट कर रोने लगे। शिष्य और गुरु जी की विदाई का यह दृश्य अत्यंत ही हृदयविदारक और अभूतपूर्व था। डॉ. राधाकृष्णन् कोलकाता आए। 

यहाँ से उनके अध्यापन की कीर्ति इंग्लैण्ड पहुँची और पराधीन भारत में उन्हें यह गौरव दिया गया कि वे ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में भी जाकर पढ़ाएँ। डॉ. राधाकृष्णन् ने कोलकाता विश्वविद्यालय से बाचतीच की। इसके लिए कुछ शर्तें उन्होंने रखीं, उन्होंने अनुबंध स्वीकार किए। वे सहमत हो गए। इस प्रकार एक ही प्राध्यापक देश-विदेश के दो विश्वविद्यालयों में जाकर पढ़ाने लगा। डॉ. राधाकृष्णन् विदेशों में भी भारत की पोशाक पहनने में गर्व और गौरव का अनुभव करते थे। 

सिर पर साफा, धोती और बंद गले का कोट पहने जब उन्होंने प्रारंभिक दिनों में धराप्रवाह पढ़ाना शुरू कि तो उनकी अंग्रेजी वाचन की शुद्धता और स्पष्टता ने लोगों को आकर्षित और ज्ञान की गंभीरता ने प्रभावित किया। कक्षा में लंबी संख्या के छात्रों को याद रखने का कठिन काम भी उनके लिए बहुत सरल था। 

डॉ. राधाकृष्णन् अपनी विलक्षण मेघाशक्ति से, पूर्व शांति व्यवस्था बनाए रखते थे। कोई विद्यार्थी अनुपस्थिति दर्ज कर उनके अध्यापन के लाभ से स्वयं को वंचित नहीं करना चाहता था। वे खिसकने वालों के प्रयास विफल कर देते थे। 

पूर्व स्मृति से वे अपने विद्यार्थियों को पूरी तरह पहचान लेते थे और उनके संस्मरण वर्षों बाद भी इस तरह सुनाते थे जैसे कल की बात दुहरा रहे हों अथवा आँखो देखा विवरण सुना रहे हो। पुस्तक लेकर पढ़ाने की प्रवृत्ति भी उनमें नहीं थी। उन्हें पंक्ति पंक्ति कंठस्थ रहती थी। उनके दिए गए संदर्भ कभी गलत नहीं हुए।

प्रश्न- (क) उपयुक्त शीर्षक दीजिए ।

(ख) राधाकृष्णन् के किस तर्क से विद्यार्थी परास्त हो (ग) राधाकृष्णन् की विदाई का वर्णन कीजिए । 

(घ) राधाकृष्णन् ने विदेशों में क्या किया ? 

(ङ) कक्षा से भागने वालों के साथ राधाकृष्णन् कैसा व्यवहार करते थे ?

उत्तर—

(क) शीर्षक— अद्भुत व्यक्तित्व- राधाकृष्णन्। 

(ख) विद्यार्थी राधाकृष्णन को कोलकाता नहीं जाने देना चाहते थे। उस समय उन्होंने कहा कि ज्ञानगंगा के प्रवाह से ही लाभ है। पढ़ने का अवसर और लाभ सबको मिलना चाहिए। उनके इस तर्क से विद्यार्थी परास्त हो गए। 

(ग) राधाकृष्णन की विदाई के लिए शिष्यों ने रथ सजाया तथा घोड़ों के स्थान पर स्वयं जुत गए। रेलवे स्टेशन पर उन्हें रेल में बैठाकर स्नेहातिरेक से फूट-फूटकर रोने लगे ।

(घ) राधाकृष्णन ने विदेशों में भारतीय पोशाक पहनकर भारत का गौरव बढ़ाया। वे सिर पर साफा, धोती तथा बंद गले का कोट पहनकर शुद्ध अंग्रेजी वाचन करते थे । 

(ङ) कक्षा से भागने वालों को वे पहचान लेते थे तथा उनके संस्मरण वर्षों बाद भी इस तरह सुनाते मानो आँखों देखा वर्णन हो। इस प्रकार वे कक्षा से खिसकने वालों के प्रयास विफल कर देते थे। 


7. पढ़ना बहुत खतरनाक चीज है क्योंकि इससे आदमी को सोचने, समझने और कुछ कर गुजरने की बीमारी लगती है। दुनिया के सारे अनपढ़ तानाशाहों ने सबसे पहले पुस्तकालय जलाए हैं। जिन्हें हमने साक्षर या शिक्षित किया है, उनकी पहुँच में पढ़ने की सामग्री क्या है, क्या किसी ने देखने की कोशिश की है? 

उनके सामने फुटपाथ पर बिछी हैं चिकनी पत्रिकाएँ और पॉकेटबुक्स जिनमें हत्या, बलात्कार, सांप्रदायिकता का जहर है। हम या तो इसे निगल रहे हैं या देख रहे हैं दूरदर्शनी सपने, अश्लील और पलायनवादी फिल्में या प्रायोजित भूल-भुलैया । 

नयी पीढ़ी के सामने अच्छी पुस्तक पढ़कर जीवन के प्रति रचनात्मक और सकारात्मक दृष्टि, अपनाने का अवसर ही नहीं है। इनके नायक हैं भ्रष्ट नेता, माफिया सरगना या असंभव को संभव बनाने वाले सुपरमैन-स्पाइडरमैन । 

हम स्पंदनहीन हो गए हैं। अपहरण, बलात्कार, बहू-हत्याएँ, सांप्रदायिक दंगे, नरसंहार हमारे लिए बस ठंडी खबरें हैं। हम मान बैठे हैं कि इनसे हमें क्या लेना देना ! इनके बारे में सोचना किसी और का काम है। सोचना सिखाती हैं किताबें, इसलिए किताबें- अच्छी किताबें पहुँच से दूर ही रहें तो अच्छा है।

प्रश्न – 

(क) तानाशाहों द्वारा पुस्तकालयों को जलाने का क्या कारण हो सकता है ? 

(ख) ‘हम स्पंदनहीन हो गए हैं’- इस कथन का क्या आशय है ?

(ग) अच्छी पुस्तकें पढ़ना क्यों जरूरी है ? (घ) फुटपाथी साहित्य क्यों हानिकारक है ?

(ङ) क्या आप मानते हैं कि पढ़ना खतरनाक चीज है ? क्यों ? 

उत्तर- 

(क) तानाशाहों ने पुस्तकालय जलाए क्योंकि पुस्तकालय में लोग पढ़ते हैं तथा उनमें सोचने समझने व कुछ कर गुजरने की क्षमता आती है। वे पढ़ने को खतरनाक चीज मानते थे। 

(ख) इस कथन का आशय है कि आज हम अत्याचार व अन्य समाजविरोधी घटनाओं के प्रति संवेदनहीन हो गए हैं, क्योंकि हम ये रोज देखते तथा पढ़ते हैं। हमारे मन में ऐसी घटनाओं के प्रति रोष उत्पन्न नहीं होता। 

(ग) अच्छी पुस्तकें जीवन के प्रति रचनात्मक व सकारात्मक सोच सिखाती हैं, अतः अच्छी पुस्तकें पढ़ना जरूरी है। 

(घ) फुटपाथी साहित्य में सपने, पलायनवादी जीवनदृष्टि, अनैतिकता, हिंसा आदि खबरें होती हैं। इनसे मनुष्य सकारात्मक सोच खो बैठता है। अतः ऐसे साहित्य को पढ़ना हानिकारक है। 

(ङ) हाँ, पढ़ना खतरनाक चीज है क्योंकि यह आदमी को विचार शक्ति देती है। इससे व्यक्ति कुछ कर गुजरता है।


8. हमें अंग्रेजी से कोई गिला शिकवा नहीं है, अंग्रेजी की प्रभुता से है। प्रभुता हम हिंदी को भी नहीं देना चाहते। उसे एक विशेष प्रयोजन के लिए संपर्क भाषा के रूप में स्वीकार करते हैं, पर किसी दूसरी भारतीय भाषा को कुचलकर, दबाकर या उसके हितों की अनदेखी कर नहीं।” राज्य – विशेष में उसके दैनिक व्यवहार के लिए उसी की भाषा उत्तम है। 

वहाँ हिंदी को दखल नहीं देना चाहिए। देश के स्वभाव और आवश्यकता के लिए हिंदी अपरिहार्य है; आज से नहीं, लगभग एक हजार वर्षों से दो भिन्न भाषा-भाषी परस्पर संवाद के लिए हिंदी का ही सहारा लेते हैं। कुछ अंग्रेजी पढ़े लोग अब अंग्रेजी का प्रयोग करने लगे हैं पर आम जन से बात करने में उनकी अंग्रेजी व्यर्थ हो जाती है और वे पुनः हिंदी का सहारा लेते हैं। भारत के स्वभाव में द्विभाषिकता है। 

आज यातायात और दूरसंचार के माध्यमों के विकास से हिंदी संपर्क भाषा की भूमिका बढ़ रही है, पर ऐसा नहीं है कि राज्य विशेष में उस राज्य की भाषा उपेक्षित हो रही है। सभी भारतीय भाषाओं की उपेक्षा का कारण अंग्रेजी को अनावश्यक महत्त्व देना है।

प्रश्न – 

(क) ‘अंग्रेजी की प्रभुता’ का क्या आशय है ? 

(ख) दो भिन्न भाषा-भाषी परस्पर व्यवहार के लिए किस भाषा का प्रयोग करते हैं और क्यों ? 

(ग) संपर्क भाषा के रूप में हिंदी की क्या भूमिका है ?

(घ) अंग्रेजीदां लोगों को भी हिंदी का सहारा कब लेना पड़ता है ? 

(ङ) भारतीय भाषाओं की उपेक्षा का कारण आपके मत में क्या है ?

उत्तर- 

(क) ‘अंग्रेजी की प्रभुता’ से आशय है-अंग्रेजी को अन्य भाषाओं से अधिक महत्त्व देना । इससे हमारी भाषाएँ अविकसित तथा उपेक्षित हो गई हैं। 

(ख) दो भिन्न भाषा-भाषी परस्पर व्यवहार के लिए हिंदी का सहारा लेते हैं क्योंकि यह संपर्क भाषा है। देश के स्वभाव व विकास के कारण हिंदी भाषा अपरिहार्य है।

(ग) हिंदी दो भिन्न भाषा-भाषी लोगों के बीच संवाद का माध्यम बन रही है। संपर्क भाषा- के रूप में हिंदी की भूमिका यातायात व दूरसंचार के माध्यम से बढ़ रही है।

(घ) अंग्रेजीदां लोगों को भी हिंदी का सहारा तब लेना पड़ता है जब वे आम जन से करते हैं। इसका कारण यह है कि आम जन अंग्रेजी नहीं जानते। 

(ङ) भारतीय भाषाओं की उपेक्षा का कारण अंग्रेजी को अनावश्यक महत्त्व देना है। हम अंग्रेजी की प्रभुता स्वीकार करते हैं।


9. आकाश की सभी गतिविधियों का प्रतिफल पृथ्वी पर ही प्रकट होता है। आकाश की चाँदनी धरती पर फैलकर ही सुंदर बनती है। आकाश की नस नस को अपनी गर्जना से तड़ देने वाले बादल धरती पर बरसकर ही जीवन रस बनते हैं। पृथ्वी माता है और आकाश पिता आकाश में ही फैली हैं पृथ्वी की जड़। 

पृथ्वी की नस-नस में व्याप्त जल ही उसका प्राण है। यही फूल है, यही गंथ है, यही फल है और यही फल का रस जल में जीवन का उद्भव हुआ। जल ही जीवन का पोषण करता है और रक्षा भी। ठंडा होने पर सारे द्रव तलहटी से जमना प्रारंभ करते हैं और धीरे-धीरे ऊपर सतह की ओर जमते आते है। 

जल एकमात्र ऐसा द्रव है जो ऊपर की सतह से जमना शुरू करता है। सतह बर्फ बन जाती है और नीचे पानी और पान में जीवन। यह है पानी की दयालुता, जलन की करुणा ! मंगल ग्रह पर जल की इसी का का अनुभव वैज्ञानिक को वहाँ जीवन होने के संकेत दे रहा है। वहाँ बर्फ हो सकती है तो बर्फ से पानी हो सकता है पानी में कोई जीवन चाहे बैक्टीरिया ही क्यों न हो।

प्रश्न—

(क) आकाश की गतिविधियाँ पृथ्वी पर किस रूप में फलित होती हैं? 

(ख) जल को जीवन क्यों कहा जाता है ?

(ग) जल की किस विशेषता के कारण मंगल में जीवन की संभावना व्यक्त की जा रही है ?

(घ) आकाश को पिता क्यों कहा गया है ? 

(ङ) क्या बाढ़ को भी जल की दयालुता ही कहेंगे ? क्यों ?

उत्तर- 

(क) आकाश की चाँदनी धरती पर फैलकर ही सुंदर बनती है। आकाश को तड़का देने वाले बादल धरती पर बरसकर जीवनरस बनते हैं। 

(ख) जल जीवन का पोषण व रक्षा करता है। पृथ्वी की नस नस में व्याप्त जल ही उसका प्राण है। अतः जल ही जीवन है।

(ग) जल सतह से जमना शुरू करता है तथा उसके नीचे जीवन होता है। इसी विशेषता के कारण मंगल में जीवन की संभावना व्यक्त की जा रही है।

(घ) आकाश की सारी गतिविधियों का प्रतिफल पृथ्वी पर ही प्रकट होता है। वह पिता के समान होता है, अतः आकाश को पिता कहा गया है। 

(ङ) हाँ बाढ़ को भी जल की दयालुता ही कहेंगे। बाढ़ के कारण क्षेत्र में जल की कमी पूरी हो जाती है। वह धरती की उपजाऊ शक्ति को भी बढ़ाता है।


10. शरीर के लिए श्रम आवश्यक है। इसलिए आवश्यक नहीं शरीर स्वस्थ रहे बल्कि इसलिए कि वह जीवित रहे। शरीर को गतिशील बनाए रखने के लिए अपने श्रम से हमें कई चीजें पैदा करनी होंगी। 

हमारे लिए दूसरे ने जो परिश्रम किया है अब मात्र उसके सहारे जीवित रहने का अधिकार नया समाज स्वीकार नहीं करेगा बाप-दादों के पुश्तैनी पैसों से जीवित रहने की बुरी आदत हमने वर्षों से पाल रखी है। उसने न केवल हमारे शरीर को निकम्मा बनाया है, बल्कि हमें लालची भी बना दिया है। 

किसी भलेमानस के लिए यह लज्जा की बात होनी चाहिए कि वह उससे अपना पेट भरे जिसके लिए उसने स्वयं परिश्रम नहीं किया। श्रम के आवश्यक नियमों के अभाव में हम मजदूर मालिक, अमीर-गरीब, सेठ-असामी के चुभते भेदों के शिकार हो गए हैं। इनसे अपना पिंड छुड़ाना मुश्किल पड़ रहा है।

श्रम की नींव बनने वाला जीवन भीतर से संतोष देता है। आर्थिक बँटवारे को न्यायपूर्ण बनाता है। ईर्ष्या, लोभ, बेईमानी आदि बुराइयों से लोगों को बचाता है।

प्रश्न – 

(क) श्रम के नियमों के अभाव में समाज की क्या स्थिति हुई ? 

(ख) शरीर के लिए श्रम क्यों आवश्यक कहा गया है ?

(ग) पुश्तैनी संपत्ति के भरोसे पर जीवन यापन करने को लेखक ने बुरा क्यों कहा है ?

(घ) श्रम की नींव पर बनने वाला जीवन उत्तम क्यों बताया गया है ? 

(ङ) प्रस्तुत गद्यांश के लिए एक उपयुक्त शीर्षक दीजिए।

उत्तर- (क) श्रम के नियमों के अभाव में समाज मजदूर मालिक, अमीर-गरीब, सेठ-असामी के चुमते हुए भेदों का शिकार हो गया।

(ख) शरीर को जीवित रखने के लिए श्रम करना आवश्यक है। 

(ग) पुश्तैनी संपत्ति के भरोसे जीवन-यापन करना इसलिए बुरा है क्योंकि इससे मनुष्य निकम्मा, आलसी तथा लालची बनता है।

(घ) श्रम की नींव पर बनने वाला जीवन सबसे उत्तम इसलिए कहा गया है क्योंकि यह मनुष्य को भीतरी संतोष देता है। यह आर्थिक बंटवारे को न्यायपूर्ण बनाता है तथा लोगों को लालच, ईर्ष्या, लोभ आदि बुराइयों से बचाता है।

(ङ) शीर्षक श्रम का महत्त्व। 


11. मैं जिस समाज की कल्पना करता हूँ, उसमें गृहस्थ संन्यासी और संन्यासी गृहस्थ होंगे अर्थात् संन्यास और गृहस्थ के बीच वह दूरी नहीं रहेगी जो परंपरा से चलती आ रही है। संन्यासी उत्तम कोटि का मनुष्य होता है, क्योंकि उसमें संचय की वृत्ति नहीं होती, लोभ और स्वार्थ नहीं होता। यही गुण गृहस्थ में भी होना चाहिए। 

संन्यासी भी वही श्रेष्ठ है जो समाज के लिए कुछ काम करे। ज्ञान और कर्म को भिन्न करोगे तो समाज में विषमता उत्पन्न होगी ही। मुख में कविता और करघे पर हाथ, यह आदर्श मुझे पसंद था। इसी की शिक्षा में दूसरों को भी देता हूँ और तुमने सुना है या नहीं कि नानक ने एक अमीर लड़के के हाथ से पानी पीना अस्वीकार कर दिया था। लोगों ने कहा, “गुरुजी यह लड़का तो अत्यंत संम्रात वंश का है, इसके हाथ का पानी पीने में क्या दोष है” ? 

नानक बोले, “तलहत्थी में मेहनत मजदूरी के निशान नहीं हैं। जिसके हाथ में मेहनत के ठेले नहीं होते, उसके हाथ का पानी पीने में में दोष मानता हूँ।” नानक ठीक थे। श्रेष्ठ समाज वह है, जिसके सदस्य जी खोलकर श्रम करते हैं और तब भी जरूरत से अधिक धन पर अधिकार जमाने की उनकी इच्छा नहीं होती।

प्रश्न – 

(क) ‘गृहस्थ संन्यासी और संन्यासी गृहस्थ होंगे’ से लेखक का क्या आशय है ? 

(ख) संन्यासी उत्तम कोटि का मनुष्य क्यों माना गया है ?

(ग) समाज में विषमता कब उत्पन्न होती है ?

(घ) श्रेष्ठ समाज कौन-सा है ?

(ङ) ‘विषमता’ शब्द का विलोम लिखकर इसमें प्रयुक्त प्रत्यय अलग कीजिए। 

(च) इसका उचित शीर्षक दीजिए।

उत्तर—

(क) ‘गृहस्थ संन्यासी’ का अर्थ है-ऐसा संन्यासी जिसे समाज कल्याण की चिंता होती है। ‘संन्यासी गृहस्थ’ का तात्पर्य है ऐसा गृहस्थ, जो लोभ और स्वार्थ से ऊपर हो। 

(ख) संन्यासी उत्तम कोटि का मनुष्य इसलिए माना जाता है क्योंकि उसमें लोभ, स्वार्थ- और संचय की प्रवृत्ति नहीं होती ।

(ग) समाज में विषमता तब उत्पन्न होती है, जब ज्ञानी लोग कर्म नहीं करते और कर्मट लोग ज्ञान से दूर रहते हैं। अर्थात् ज्ञान और कर्म की दूरी विषमता उत्पन करती है। 

(घ) श्रेष्ठ समाज वह है जिसके सदस्य दिल खोलकर परिश्रम करते हैं, फिर भी आवश्यकता से अधिक धन संग्रह नहीं करते। 

(ङ) समता ‘ता’ प्रत्यय।

(च) शीर्षक-गृहस्थ और संन्यास का मेल ।


12. प्रकृति और व्यक्ति के संबंधों में विकार आ रहा है। व्यक्ति प्रकृति से दूर हो गया है। जनसंख्या विस्फोट से, प्रदूषण के कुप्रभाव से प्रकृति की शोभा पर संकट के बादल मंडराने लगे. हैं। ऐसी विपरीत स्थिति में भी प्रकृति का सौंदर्य वसंत के आगमन पर खिल उठता है। विस्मय होता है कि आजकल लोगों को वसंत के आगमन का भी आभास नहीं होता। 

पुष्प वाटिकाओं में रंग-बिरंगे फूलों को चटख और महक से वासंती पवन झूम उठता है। पुष्प पंखुडिया पर तितलियों के नृत्य मन मोह लेते हैं। भ्रमरों का मधुर गुंजन आनंद की वृष्टि करता है। ऋतुराज के स्वागत में आम की डाल पर कोकिला भी मधुर तानें छेड़ती हैं। मोरनियों के झुंड से घिरा मोर मस्ती में नाचता है।

प्रकृति की यह छटा लोगों को नसीब नहीं होती क्योंकि उनके मन में प्रकृति-प्रेम शेष नहीं रहा। व्यक्ति प्रकृति-प्रेम के अभाव में मानसिक दबावों में जी रहा है। अतः वसंत के आगमन पर प्रत्येक व्यक्ति के मन में उसका स्वागत करने की भावना जागनी चाहिए। 

प्रश्न – 

(क) प्रकृति की शोभा श्री पर संकट के बादल क्यों मंडरा रहे हैं ?

(ख) विपरीत परिस्थिति में भी प्रकृति की विशेषता क्या है ?

(ग) लेखक को विस्मय क्यों होता है ? (घ) प्रकृति की कौन-सी छटा लोगों को नसीब नहीं होती ?

(ङ) मानसिक दबावों से छुटकारा पाने की दवा क्या है ?

(च) उचित शीर्षक दीजिए ।

उत्तर—

(क) जनसंख्या-विस्फोट और प्रदूषण के कुप्रभाव के कारण प्रकृति की शोभा पर संकट के बादल मँडरा रहे हैं। है।

(ख) विपरीत परिस्थिति में भी वसंत के आने पर प्रकृति का सौंदर्य खिल उठा, 

(ग) लेखक को यह जानकर विस्मय होता है कि आजकल लोगों को वसंत के आने का भी आभास नहीं हो पाता। 

(घ) बगीचों में खिले फूलों की चटख और महक, तितलियों का नृत्य, भँवरों की गुंजन, कोयलों की मधुरतान और मोरनियों के मस्त नृत्य के बीच घिरे मोर की छटा लोगों को अब नसीब नहीं होती।

(ङ) कवि के अनुसार वसंत के आगमन पर उसका स्वागत करने की चाह का जागना मानसिक दबावों से मुक्त होने का एक उपाय है।

(च) शीर्षक प्रकृति-प्रेम का अभाव। 


13. प्रत्येक क्रियाशीलता आचरण नहीं कहलाती। उठना, बैठना, भोजन करना आदि क्रियाएँ आचरण नहीं है। वास्तव में वह क्रियाशीलता आचरण कहलाती है जिसका संबंध दूसरे व्यक्ति से होता है। यदि किसी क्रिया से दूसरा व्यक्ति अनुकूल या प्रतिकूल रूप से प्रभावित होता है तो वह क्रिया आचरण बन जाएगी। 

जैसे किसी व्यक्ति की दुखद अवस्था पर यदि कोई हँसता है तो वह हँसना आचरण बन जाएगा। वैसे सामान्य रूप से हँसना केवल एक क्रिया है। यदि समस्त क्रियाओं को आचरण माना जाए तो पशु और प्रकृति के कार्यों को भी आचरण का विषय मानना होगा और इस प्रकार एक अव्यवस्था हो जाएगी। इसलिए आचरण का संबंध मूलतः मनुष्य से ही है; क्योंकि वह आत्मचेतन होकर कार्य करता है। 

प्रश्न – (क) उपर्युक्त गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक दीजिए।

(ख) आचरण किस क्रिया को कहते हैं ? (ग) समस्त क्रियाओं को आचरण क्यों नहीं कहा जा सकता ?

(घ) आचरण का संबंध मनुष्य से ही क्यों है ? 

(ङ) उचित शीर्षक दीजिए।

उत्तर- (क) शीर्षक – आचरण का तात्पर्य । (ख) आचरण मनुष्य की उस क्रिया को कहते हैं जिससे अन्य लोग प्रभावित होते हैं।

(ग) समस्त क्रियाओं को आचरण इसलिए नहीं कहा जा सकता क्योंकि वे क्रियाएँ निरुद्देश्य होती हैं और उनका अन्य किसी से कोई संबंध नहीं होता। (घ) आचरण का संबंध मनुष्य से इसलिए है क्योंकि वह आत्मचेतन अर्थात् सजग होकर कार्य करता है।

(ङ) शीर्षक क्रियाशीलता और आचरण ।


14. महानगरों में जो सभ्यता फैली है, वह छिछली और हृदयहीन है। लोगों के पारस्परिक मिलन के अवसर तो बहुत हो गए हैं, मगर इस मिलन में हार्दिकता नहीं होती, मानवीय संबंधों में घनिष्ठता नहीं आ पाती। 

दफ्तरों, ट्राम, बस, रेलों, सिनेमाघरों, सभाओं और कारखानों में आदमी हर समय भीड़ में रहता है, मगर इस भीड़ के बीच वह अकेला होता है। 

मनुष्य के लिए मनुष्यत्व के भीतर पहले जो माया, ममता और सहानुभूति के भाव थे, वे अब लापता होते जा रहे हैं। देशों की पारस्परिक दूरी घट गई है, लेकिन आदमी और आदमी के बीच की दूरी बढ़ती जा रही है।

प्रश्न – 

(क) उपर्युक्त गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक दीजिए । (ख) महानगरों की सभ्यता को हृदयहीन क्यों कहा गया है ?

(ग) महानगरों की भीड़ में मानव अकेला क्यों है ?

(घ) “देशों की आपसी दूरी जितनी घट रही है, आदमी और आदमी की दूरी उतनी ही बढ़ रही है” इस दूरी की वृद्धि के कारणों का उल्लेख कीजिए।

(ङ) हार्दिकता होने का क्या आशय है ? 

उत्तर- (क) महानगरों में फैलता अलगाव

(ख) महानगरों की सभ्यता को हृदयहीन इसलिए कहा गया है क्योंकि आज यहाँ के लोगों में आपसी घनिष्ठता नहीं रही। 

(ग) महानगरों की भीड़ में मानव अकेला इसलिए है क्योंकि उसके जीवन में आपसी आत्मीयता, ममता और सहानुभूति नहीं रही। 

(घ) इस दूरी की वृद्धि का कारण है-मानव की हृदयहीनता और आत्मसीमितता । 

(ङ) हार्दिकता होने का आशय है-संबंधों में नजदीकी, किसी को दिल से चाहना ।


15. वृद्धावस्या का सच्चा आनंद है, आत्मसंतोष। जिन्हें भविष्य की चिंता है वे वृद्ध नहीं हैं, वे तरुण ही हैं; क्योंकि उन्हें कर्म की चिंता रहती है। जो कर्मशील होते हैं उन्हें सदा आत्मसंतोष के तरुण नेता थे। उनमें अदम्य साहस, स्फूर्ति एवं उत्साह था। वृद्धावस्था उनके शरीर को जीर्ण कर सकती थी-मन को नहीं; पर जो लोग एकमात्र शरीर-सुख को ही अपना लक्ष्य मानते हैं उनके जीवन में शारीरिक शक्ति की क्षीणता के साथ-साथ वृद्धावस्था आ जाती है। इस प्रकार के लोग वृद्धावस्था से असंतुष्ट होकर आत्मसंतोष से भी हाथ धो बैठते हैं।

प्रश्न – 

(क) प्रस्तुत गद्यांश के लिए उपयुक्त शीर्षक दीजिए।

(ख) बुढ़ापे का वास्तविक आनंद क्या है ? 

(ग) वास्तविक आनंद किसको किस रूप में प्राप्त होता है ?

(घ) वे कौन लोग होते हैं, जो इस आनंद से वंचित रहते हैं ? 

(ङ) गाँधी और नेहरू को तरुण नेता क्यों कहा गया है ?

उत्तर—

(क) आत्मसंतोष का रहस्य-कर्म

(ख) ‘आत्मसंतोष’ बुढ़ापे का वास्तविक आनंद है।

(ग) वास्तविक आनंद कर्मशील लोगों को कर्म करते हुए प्राप्त होता है। 

(घ) जो लोग जीवन-भर शरीर सुख की साधना में लगे रहते हैं, कोई स्फूर्तिदायक कर्म नहीं

करते, वे बुढ़ापे में आत्मसंतोष से वंचित रहते हैं।

(ङ) गाँधी और नेहरू को तरुण नेता कहा गया है क्योंकि वे अपना काम निपटाकर ही सुख अनुभव करते थे। 


16. हमारी बहुत-सी समस्याएं बिना विचारे कार्य करने का परिणाम होती हैं। बिना विचारे। कार्य करने से हम सदा चिंतित एवं अवसन्न होकर अकथनीय कष्टों से अपने जीवन को अभिपूरित कर लेते हैं। अविचारित कार्य करके हम मन ही मन पछताते रहते हैं, किंतु उसका कोई लाभ नहीं होता। 

कभी-कभी अविचारित कार्यों के दुष्परिणामों का दुष्प्रभाव बहुत भयानक होता है। किंतु दुख इस बात का है कि ऐसे कार्यों को करने से पहले मानव कभी यह अनुभव ही नहीं करता कि अविचारित कार्य का दुष्परिणाम उसके लिए विनाशक हो सकता है। विचारपूर्वक कार्य करने वाला ही यह जान सकता है कि कर्तव्य क्या है और अकर्तव्य क्या है?

 कर्तव्य-अकर्तव्य का विवेक रहने से ही मानव कर्म के साथ ज्ञान या बुद्धि का मेल बैठाता है। और परिणामस्वरूप अविचारित कर्म के विनाशक परिणामों से बच जाता है। इसलिए सुविचारित कर्म करना ही मानव का सर्वोत्कृष्ट कर्तव्य है। इसी के आधार पर जीवन को संपूर्ण, सबल और प्रभावशाली बनाया जा सकता है।

प्रश्न – 

(क) उपर्युक्त गद्यांश के लिए उपयुक्त शीर्षक दीजिए । (ख) अविचारित कार्य करने के क्या परिणाम होते हैं ?

(ग) सुविचारित कार्य करने के क्या लाभ हैं ?

(घ) अविचारित कर्म के दुष्परिणामों से कैसे बचा जा सकता है ?

(ङ) कर्तव्य और कर्तव्य का बोध किसे बना रहता है ?

उत्तर- (क) शीर्षक—सुविचारित कर्म ।

(ख) अविचारित कार्य करने वाले लोग सदा समस्याग्रस्त, चिंतित और उदास रहते हैं। (ग) सुविचारित कार्य करने वाला व्यक्ति कर्तव्य और कर्तव्य के बीच अंतर करके अविचारित कर्मों के दोषों से बच जाता है। दुष्परिणामों

(घ) किसी भी कार्य को करने से पहले ठोस विचार कर लेने से विचारित कर्म के से बचा जा सकता है।

(ङ) कर्तव्य और कर्तव्य का बोध उसी को बना रहता है जो हर कार्य विचारपूर्वक करता है। 


17. मनुष्य अपने नैतिक गुणों से ही जीवधारियों में श्रेष्ठतम माना जाता है। हर व्यक्ति जीवन पर्यंत सुख की खोज में रहता है। तन के सुख मनुष्य और पशु-पक्षी सभी को समान रूप से चाहिए, किंतु मन और आत्मा के सुख केवल मनुष्यों के लिए हैं। 

मन के जितने भी सुख हैं, उनमें सबसे बड़ा है परोपकार का सुख किसी अंधे को सड़क पार कराने, किसी भूखे को रोटी खिलाने, किसी प्यासे की प्यास बुझाने, किसी निराश हताश को आशान्वित करने अथवा किसी लाचार, गरीब और जरूरतमंद के काम आने में जो सुख मिलता है, उसकी किसी भी सुख या आनंद से तुलना नहीं की जा सकती। 

अपने लिए तो दुनिया में सभी प्राणी जीते हैं, पर जब • हम अपने जीवन को दूसरों के लिए अर्पित कर देते हैं तो हमारा जीवन धन्य हो जाता है। 

प्रश्न – (क) अपनी किस विशेषता के कारण मनुष्य सभी प्राणियों में श्रेष्ठ माना जाता है ?

(ख) मनुष्य और पशु के सुखों में क्या भिन्नता है ?

(ग) जीवन की धन्यता कब अनुभव होती है ? 

(घ) परोपकार के कुछ उदाहरण प्रस्तुत कीजिए ।

(ङ) उपर्युक्त गद्यांश के लिए एक उपयुक्त शीर्षक दीजिए । 

उत्तर- 

(क) अपने नैतिक गुणों के कारण मनुष्य जीवधारियों में श्रेष्ठतम माना जाता है। 

(ख) पशु को केवल तन का सुख चाहिए, जबकि मनुष्य तन, मन और आत्मा तीनों का सुख चाहता है।

(ग) जीवन की धन्यता तब अनुभव होती है जबकि मनुष्य अपने जीवन को दूसरों के लिए अर्पित कर देता है। 

(घ) परोपकार के कुछ काम हैं-किसी अंधे को सड़क पार कराना, भूखे-प्यासे को तृप्त कराना, किसी निराश हताश को उत्साह देना, किसी जरूरतमंद गरीब के काम आना।

(ङ) शीर्षक— पशु और मनुष्य 


18. हम जीवन में सुख-समृद्धि चाहते हैं, ज्ञान, शांति और कीर्ति चाहते हैं; किंतु ये चीजें सुख। तभी मिल पाती हैं जब हम इनको पाने के लिए निरंतर प्रयत्नशील बने रहे। हम अपने समय के एक-एक क्षण को बहुमूल्य मानकर उसका सदुपयोग करें तथा निरंतर परिश्रम करते रहें। 

यह तभी संभव होगा, जब हम अपने समय का सही विभाजन और नियोजन कर लें; क्योंकि समय सीमित है और करने के लिए काम अनंत हैं। जो काम आवश्यकता और महत्त्व की दृष्टि से पहले पूरे करने के हैं, उन्हें प्राथमिकता देनी चाहिए। 

ध्यान रहे कि सभी कामों को सफलतापूर्वक पूरा करने के लिए अच्छा स्वास्थ्य और प्रबल इच्छाशक्ति होनी चाहिए। अतएव जहाँ एक ओर हमें अपने स्वास्थ्य के प्रति सजगता बरतनी चाहिए, वहीं अपना संकल्प भी ऊँचा बनाए रखना चाहिए। 

प्रश्न- 

(क) जीवन में सुख-समृद्धि कैसे प्राप्त की जा सकती है ?

(ख) समय का विभाजन और नियोजन करना क्यों आवश्यक है ? 

(ग) उपर्युक्त गद्यांश के लिए एक उपयुक्त शीर्षक दीजिए ।

(घ) कामों को सफलतापूर्वक पूरा करने के लिए किन बातों के प्रति सावधानी बरतनी चाहिए ?

(ङ) काम अधिक होने पर हमें क्या करना चाहिए ?

उत्तर — (क) जीवन में सुख-समृद्धि निरंतर परिश्रमशील तथा सुनियोजित होने से पाई जाते नियोजन आवश्यक है।

(ख) ढेर सारे कार्यों को सफलता और सुविधापूर्वक करने के लिए समय का विभाजन और सकती है।

(ग) शीर्षक-सुख-समृद्धि के सूत्र । 

(घ) काम को सफलतापूर्वक करने के लिए निरंतर परिश्रमी, सुनियोजित होने के साथ-साथ अपने स्वास्थ्य तथा इच्छा-शक्ति को भी बढ़ाना चाहिए। 

(ङ) काम अधिक होने की स्थिति में हमें उनका सही नियोजन करना चाहिए। आवश्यक और महत्त्वपूर्ण कार्यों को प्राथमिकता के आधार पर पहले निपटाना चाहिए।


19. विगत एक-दो दशकों में युवावर्ग में अपव्यय की प्रवृत्ति बढ़ रही है। भोगवाद की ओर युवक अधिक प्रवृत्त हो रहे हैं। वे सुख-सुविधा की प्रत्येक वस्तु पा लेना चाहते हैं और अपनी आय और व्यय में तालमेल बिठाने की उन्हें चिंता नहीं है। धन-संग्रह न सही, कठिन समय के लिए कुछ बचाकर रखना भी वे नहीं चाहते। 

उन्हें लुभावने विज्ञापनों के माध्यम से लुभाकर. उत्पादक व्यवसायी भरमाते हैं। परिणामस्वरूप आज का युवक मात्र उपभोक्ता बनकर रह गया है। उनके कंपनियाँ और बैंक क्रेडिट कार्ड देकर उनकी खरीद-शक्ति को बढ़ाने का दावा करते हैं और बाद में निर्ममता से वसूलते हैं।

प्रश्न – 

(क) उपर्युक्त गद्यांश के लिए उपयुक्त शीर्षक दीजिए (ख) युवावर्ग में कौन-सी प्रवृत्ति दिखाई पड़ रही है ?

(ग) उत्पादक उपभोक्ता को कैसे भरमाते हैं ? 

(घ) बचत करना क्यों जरूरी है ?

(ङ) मनुष्य के उपभोक्ता बनने से क्या आशय है ? 

उत्तर—(क) शीर्षक— बढ़ता भोगवाद ।

(ख) युवा वर्ग में भोगवाद के लिए अपव्यय करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है।

(ग) उत्पादक उपभोक्ताओं को लुभावने विज्ञापनों द्वारा भरमाते हैं। 

(घ) कठिन समय के लिए बचत करना बहुत जरूरी है। मनुष्य के उपभोक्ता बनने से आशय यह है कि वह लुभावने व्यवसायियों का माल खरीदने और भोगने वाला जीव बनकर रह गया है। मराठी,


20. भारतीय साहित्य के इतिहास में संत कवियों का महत्वपूर्ण स्थान है। 

हिंदी, तमिल, बंगला आदि अनेक भाषाओं में संत कवियों का साहित्य आज की सामाजिक परिस्थितियों में भी प्रासंगिक है। बाहरी आडंबर, अंधविश्वास, दिखावा आदि का सभी संत कवियों ने विरोध किया। 

वे मनुष्य-मनुष्य के बीच मानवीय संबंधों के पक्षधर थे। उनके मतानुसार ईश्वर के नामों में भेद है, परंतु ईश्वर एक ही है। 

राम रहीम, अल्लाह, गोविंद एक ही शक्ति के नाम हैं। इसी प्रकार ब्राह्मण-क्षत्री, काले-गोरे, गरीब-अमीर एक ही मिट्टी के बरतन हैं जिन्हें ईश्वर ने बनाया है। इसलिए विविधता को नहीं, एकता को महत्व दिया जाना चाहिए।

प्रश्न – (क) उपर्युक्त गद्यांश के लिए उपयुक्त शीर्षक दीजिए।

(ख) संत साहित्य मुख्यतः किन भाषाओं में प्राप्त होता है।

(ग) संत-साहित्य आज भी प्रासंगिक कैसे हैं ? दो कारण बताइए ।

(घ) ईश्वर के बारे में संत कवियों के क्या विचार हैं ?

(ङ) संत कवियों ने किस-किस बुराई का विरोध किया ?

उत्तर- (क) भारत के संत कवियों का योगदान।

(ख) संत-साहित्य मुख्यतः हिंदी, मराठी, तमिल, बंगला आदि भाषाओं में प्राप्त होता है।

(ग) संत साहित्य आज भी प्रासंगिक है, क्योंकि-

(i) आज भी बाहरी आडंबर बने हुए हैं ।

(ii) आज भी धर्म के क्षेत्र में अंधविश्वासों का बोलबाला है।

(घ) संत कवियों के अनुसार, ईश्वर एक है। उसे अनेक नामों से जाना जाता है। 

(ङ) संत कवियों ने बाहरी आडंबर, अंधविश्वास, दिखावा तथा मानव-मानव के भेद का विरोध किया।



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