NCERT Class 12 Psychology Chapter 2 Notes In Hindi आत्म एवं व्यक्तित्व Easy Pdf

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NCERT Class 12 Psychology Chapter 2 Notes In Hindi आत्म एवं व्यक्तित्व Easy Pdf

Class12th 
Chapter Nameआत्म एवं व्यक्तित्व
Chapter numberChapter 2
Book NCERT
SubjectPsychology
Medium Hindi
Study MaterialsVery important question to answer
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पाठ-परिचय


आत्म एवं व्यक्तित्व का तात्पर्य उन विशिष्ट तरीकों से है जिनके आधार पर हम अपने अस्तित्व को परिभाषित करते हैं। ये ऐसे तरीकों को भी इंगित करते हैं जिसमें हमारे अनुभव संगठित एवं व्यवहार में अभिव्यक्त होते हैं। व्यक्तिगत आत्म (personal self) में एक ऐसा अभिविन्यास होता है जिसमें व्यक्ति मुख्य रूप से अपने बारे में ही संबद्ध होने का अनुभव करता है।

सामाजिक आत्म (social self) का प्रकटीकरण दूसरों के संबंध में होता है जिसमें सहयोग, एकता, संबंधन, त्याग, समर्थन अथवा भागीदारी जैसे जीवन के पक्षों पर बल दिया जाता है।

व्यक्ति के रूप में हम सदैव अपने मूल्य या मान और अपनी योग्यता के बारे में निर्णय या आकलन करते रहते हैं। व्यक्ति का अपने बारे में यह मूल्य-निर्णय ही आत्म-सम्मान (self- esteem) कहा जाता है। व्यक्तित्व का अध्ययन विभिन्न उपागमों द्वारा किया गया है। इनमें से सबसे अधिक प्रमुख उपागम प्रारूपिक, मनोगतिक, व्यवहारवादी, सांस्कृतिक और मानवतावादी उपागम है।

प्रारूपिक उपागम व्यक्तित्व का वर्णन कुछ प्रारूपों के आधार पर करने का प्रयास करता है, जिसमें विशेषकों के एक गुच्छ पर बल दिया जाता है। ऑलपोर्ट, कैटेल और आइजेंक ने व्यक्तित्व के प्ररूप उपागम का समर्थन किया जो किसी व्यक्ति का एक एकीकृत दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है।

फ्रायड ने मनोगतिक उपागम विकसित किया और इड, अहं और पराहं जैसी हमारी आंतरिक शक्तियों के बीच सतत द्वंद्वों के रूप में व्यक्तित्व का विवेचन किया है। फ्रायड के विचार से अचेतन द्वंद्व मनोलैंगिक विकास की प्रक्रिया में सन्निहित होता है जो मौखिक, गुदीय, लैंगिक, कामप्रसुप्ति में घटित होता है। 

पश्च- फ्रायडवादी सिद्धांतकारों ने अंतर्वैयक्तिक शक्तियों और व्यक्ति के जीवन की समकालीन परिस्थितियों पर बल दिया है। युंग, फॉम, एडलर, हार्नी और एरिक्सन ने व्यक्तित्व में अहं और सामाजिक शक्तियों की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया है।

व्यवहारवादी उपागम व्यक्तित्व को पर्यावरण के प्रति किसी व्यक्ति की अनुक्रिया के रूप में समझता है। व्यवहारवादी अनुक्रिया को व्यक्तित्व की एक संरचनात्मक इकाई के रूप में आत्मीकार करते हैं जो किसी विशिष्ट आवश्यकता की संतुष्टि के लिए प्रकट किया जाता है। 

सांस्कृतिक उपागम व्यक्तित्व को प्रचलित आर्थिक अनुरक्षण प्रणालियों और लोगों के एक समूह की परिणामी सांस्कृतिक विशेषताओं के प्रति व्यक्तियों के अनुकूलन के रूप में समझने का प्रयास करता है। मानवतावादी उपागम व्यक्तियों के आत्मनिष्ठ अनुभवों और उनके वरणों पर बल देता है। 

रोजर्स ने ‘वास्तविक आत्म’ और ‘आदर्श आत्म’ के मध्य संबंध पर बल दिया है। इन दोनों प्रकार के आत्म के बीच समरूपता होने पर व्यक्ति पूर्णतः प्रकार्यशील होता है। मैस्लो ने लोगों को अभिप्रेरित करने वाली आवश्यकताओं के पारस्परिक प्रभाव के रूप में व्यक्तित्व का विवेचन किया है। 

आवश्यकताओं को एक पदानुक्रम में निम्न कोटि (उत्तरजीविता संबंधी) आवश्यकताओं से उच्च-कोटि (विकास संबंधी) आवश्यकताओं तक व्यवस्थित किया जा सकता है। व्यक्तित्व मूल्यांकन से तात्पर्य उस प्रक्रिया से है जिसके द्वारा कुछ मनोवैज्ञानिक विशेषताओं के रूप में लोगों का विश्लेषण और मूल्यांकन किया जाता है। इसमें व्यक्ति के व्यवहार की उच्चस्तरीय परिशुद्धता के साथ भविष्यवाणी करना प्रमुख लक्ष्य होता है। 

किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व का मूल्यांकन प्रेक्षक के प्रतिवेदन प्रपी तकनीकों और आत्म-प्रतिवेदन किया जा सकता है। प्रेस के प्रतिवेदनों में साक्षात्कार, प्रेक्षण, निर्धारण, नाम-निर्देशन और स्थितिपटक परीक्षण आते हैं। 

रोश मलिक्ष्य या स्याही परवा परीक्षण और कथानक क्षण परीक्षण व्यक्तित्व की व्यापक रूप से प्रयुक्त की जाने वाली पी तकनीकें हैं। आत्म-प्रतिवेदन माप स्पष्ट रूप से संरचित परीक्षणों के उपयोग द्वारा व्यक्तित्व का मूल्याकन करने का प्रयास करते हैं। 

मनोगत्यात्मक दृष्टिकोण के मुख्य सचेतक क्रायड है जिन्होंने विश्लेषण के आधार पर अचेतन उपा की प्रवृतियों एवं मानसिक संपयों के आधार पर व्यक्तित्व के निर्माण एवं कार्यशैली का वर्णन प्रस्तुत किया है। 

उत्तर वादियों फ्रायड के कुछ विधारों के प्रति असहमति जताते हुए सांस्कृतिक एवं सामाजिक परिवेश के महत्व पर जोर दिया है। इसी तरह व्यक्तित्व की व्याख्या व्यवहारवादियों मानवतावादियों ने भी अपने-अपने सैद्धान्तिक दृष्टिकोणों के आधार पर प्रस्तुत की है।

भारतीय सोच की एक प्रमुख विचारपारा सांख्य योग है। इसके अनुसार समस्त संसार में प्रकृति के तीन गुण सत्व, रज और तमस प्रत्येक व्यक्ति में से तीनों गुण विभिन्न मात्राओं में पाये जाते हैं और किसी गुण विशेष की प्रधानता के अनुसार व्यक्तित्व का प्रभावशाली गुण मी निर्धारित होता है। एक अच्छे व्यक्तित्व में ये तीनों गुण रहता है। व्यक्तित्व के तीन शील गुण होते हैं जिन्हें A. B, C प्रकार के व्यक्तित्व में विभाजित किया गया है।

CLASS 12 NCERT SOLUTION IN ENGLISHCLASS12 NCERT SOLUTION IN HINDI
Historyइतिहास
Geography भूगोल
Political science राजनीति विज्ञान
English SubjectResult
Hindi SubjectHistory answer keys

पाठ्य पुस्तक के समीक्षात्मक प्रश्न और उनके उत्तर


Q. 1. आत्म क्या है ? आत्म को भारतीय अवधारणा पाश्चात्य अवधारणा से किस प्रकार भिन्न है ? 

Ans. आत्म— आत्म अथवा ‘आत्म’ स्वयं के सम्बन्ध में विश्वासों तथा अनुभूतियों का संयुक्त प्रदर्शन है। आम अथवा ‘आत्म’ मनोविज्ञान की दृष्टि से अस्तित्व एवं अनुभव पर आधारित एक भावनात्मक मानवीय दशा है। 

अतः आरम को स्वयं के अस्तित्व योग के अनुभवों पर आधारित एवं संगठित संज्ञानात्मक संरचना मानी जा सकती है। आत्म को आत्मगत एवं वस्तुगत दोनों रूपों में समझा जा सकता है। 

आत्म की भारतीय अवधारणा तथा पाश्चात्य अवधारणा में भिन्नता-आत्म की भारतीय अवधारणा मनुष्य को दैहिक, सामाजिक, मानसिक तथा आध्यात्मिक पक्षों को अपने में समाविष्ट करती हैं। 

अतः भारतीय सांस्कृतिक संदर्भ में आत्म का विश्लेषण अनेक महत्त्वपूर्ण पक्ष को स्पष्ट करता है जो पाश्चात्य सांस्कृतिक संदर्भ में पाए जाने वाले पक्षों से भिन्न होते हैं। 

भारतीय पाश्चात्य अवधारणाओं के मध्य एक महत्वपूर्ण अंतर इस तथ्य को लेकर है कि आत्म और दूसरे अन्य के बीच किस प्रकार सीमा रेखा निर्धारित की गई है। पाश्चात्य अवधारणा में यह सीमा रेखा अपेक्षाकृत स्थिर और दृढ़ प्रतीत होती है। 

दूसरी तरफ, भारतीय अवधारणा में आत्म और अन्य के मध्य सीमा रेखा स्थिर न होकर परिवर्तनीय प्रकृति की बताई गई है। इस प्रकार एक समय में व्यक्ति का आत्म अन्य सब कुछ को अपने में अंतर्निहित करता हुआ समूचे ब्रह्मांड में विलीन होता हुआ प्रतीत होता है। 

किंतु दूसरे समय में आत्म अन्य सबसे पूर्णतया विनिवर्तित होकर व्यक्तिगत आत्म (उदाहरणार्थ, हमारी व्यक्तिगत आवश्यकताएँ एवं लक्ष्य) पर केंद्रित होता हुआ प्रतीत होता है। पाश्चात्य अवधारणा आत्म और अन्य मनुष्य और प्रकृति तथा आत्मनिष्ठ और वस्तुनिष्ठ के मध्य स्पष्ट द्विभाजन करती हुई प्रतीत होती है। 

भारतीय अवधारणा इस प्रकार का कोई स्पष्ट द्विभाजन नहीं करती है। पाश्चात्य संस्कृति में आत्म और समूह को स्पष्ट रूप से परिभाषित सीमा रेखाओं के साथ दो भिन्न इकाइयों के रूप में आत्मीकार किया गया है। 

व्यक्ति समूह का सदस्य होते हुए भी अपनी वैयक्तिकता बनाए रखता है। भारतीय संस्कृति में आत्म को व्यक्ति के अपने समूह से पृथक नहीं किया जाता है, बल्कि दोनों सामंजस्यपूर्ण सहअस्तित्व के साथ बने रहते हैं। दूसरी तरफ, पाश्चात्य संस्कृति में दोनों के बीच एक दूरी बनी रहती है। 

यही कारण है कि अनेक पाश्चात्य संस्कृतियों का व्यक्तिवादी और अनेक एशियाई संस्कृतियों का सामूहिकतावादी संस्कृति के रूप में विशेषीकरण किया जाता है। 

Q. 2. परितोषण के विलंब से क्या तात्पर्य है ? इसे क्यों वयस्कों के विकास के लिए महत्वपूर्ण समझा जाता है ?

Ans. परितोषण के विलम्ब का सीधा संबंध आत्म-नियंत्रण से होता है। जीवन की कई स्थितियों में स्थितिपरक दबावों के प्रति प्रतिरोध और स्वयं पर नियंत्रण की आवश्यकता होती है। यह संभव होता है उस चीज के द्वारा जिसे हम सामान्यतया ‘संकल्प शक्ति’ के रूप में जानते हैं। 

मनुष्य रूप में हम जिस तरह भी चाहें अपने व्यवहार को नियंत्रित कर सकते हैं। हम प्रायः अपनी कुछ आवश्यकताओं की संतुष्टि को विलंबित अथवा आस्थगित कर देते हैं। आवश्यकताओं के परितोषण को विलंबित अथवा आस्थगित करने के व्यवहार को सीखना ही आत्म-नियंत्रण (self-control) कहा जाता है। 

दीर्घावधि लक्ष्यों की संप्राप्ति में आत्म-नियंत्रण एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। भारतीय सांस्कृतिक परंपराएँ हमें कुछ ऐसे प्रभावी उपाय प्रदान करती हैं जिससे आत्म नियंत्रण का विकास होता है (उदाहरणार्थ, व्रत अथवा रोजा में उपवास करना और सांसारिक वस्तुओं के प्रति अनासक्ति का भाव रखना) ।

आत्म-नियंत्रण के लिए अनेक मनोवैज्ञानिक तकनीकें सुझाई गई हैं। अपने व्यवहार का प्रेक्षण (observation of own behaviour) एक तकनीक है जिसके द्वारा आत्म के विभिन्न पक्षों को परिवर्तित, परिमार्जित अथवा सशक्त करने के लिए आवश्यक सूचनाएँ प्राप्त होती हैं। 

आत्म-अनुदेश (self-instruction) एक अन्य महत्वपूर्ण तकनीक है। हम प्रायः अपने आपको कुछ करने तथा मनोवांछित तरीके से व्यवहार करने के लिए अनुदेश देते हैं। ऐसे अनुदेश आत्म-नियमन में प्रभावी होते हैं। आत्म-प्रबलन (self-reinforcement) एक तीसरी तकनीक है। 

इसके अंतर्गत ऐसे व्यवहार पुरस्कृत होते हैं जिनके परिणाम सुखद होते हैं। उदाहरणार्थ, यदि आपने अपनी परीक्षा में अच्छा निष्पादन किया है तो आप अपने मित्रों के साथ फिल्म देखने जा सकते हैं। ये तकनीकें लोगों द्वारा उपयोग में लाई जाती हैं और आत्म-नियमन और आत्म-नियंत्रण के संदर्भ में अत्यंत प्रभावी पाई गई हैं।

मनोदैहिक तंत्रों का संगठन (Organization of psychophysical system ) —— इस परिभाषा का सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू यह है कि व्यक्तित्व एक ऐसा तंत्र होता है जिसमें मानसिक तथा शारीरिक दोनों तरह के गुणों या तंत्रों का संगठन पाया जाता है। अतः इस परिभाषा में मानसिक तथा शारीरिक दोनों तरह के गुणों के महत्त्व पर बल डाला गया है। 

Q. 3. व्यक्तित्व को आप किस प्रकार परिभाषित करते हैं ? व्यक्तित्व के अध्ययन के प्रमुख उपागम कौन से हैं ?

Ans. दैनिक जीवन में हम ‘व्यक्तित्व’ शब्द का उपयोग किसी परिस्थितिविशेष में मिलने वाले व्यक्ति के दैहिक या बाहरी रंग-रूप का उल्लेख करने के लिए करते हैं। अतः जब हम किसी से मिलते हैं और उसे ‘आकर्षक’ पाते हैं तब हम कहते हैं कि उस व्यक्ति का व्यक्तित्व मोहक और प्रभावशाली है। 

व्यक्तित्व का इस प्रकार का सामान्य दृष्टिकोण बाहरी छवि पर आधृत है तथा प्रायः भ्रामक सिद्ध होता है। यह बहुत ही रोचक तथ्य है कि व्यक्तित्व शब्द की उत्पत्ति रोमन शब्द परसोना (Persona) से हुई है जिसका अर्थ है रंगमंच में कलाकारों द्वारा साज शृंगार के लिए प्रयुक्त मुखौटा। 

उस परिवेश में मुखौटा के कारण दर्शक कोई विशेष भूमिका निमा रहे व्यक्ति से कुछ खास तरह के व्यवहारों की अपेक्षा करते हैं।

मनोविज्ञान में व्यक्तित्व का अर्थ व्यक्ति की विशिष्ट तथा अपेक्षाकृत स्थायी विशेषताओं से है जो विभिन्न परिस्थितियों में तथा एक समय अंतराल या काल अवधि में व्यवहार प्रतिरूपों को व्यक्त करती हैं। विभिन्न परिस्थितियों में तथा विभिन्न अवसरों पर लोग व्यवहार, विचार तथा संवे में प्रायः संगति प्रदर्शित करते हैं। 

उदाहरण के लिए, एक ईमानदार व्यक्ति काफी लंबे समय तक तथा विभिन्न परिस्थितियों में ईमानदार बना रहता है। व्यक्तियों के भीतर तथा विभिन्न व्यक्तियाँ के बीच विशिष्टता (अनोखेपन) तथा समानता को समझना मनोवैज्ञानिकों के लिए बड़ी चुनौती है। यह सामान्य रूप से देखा जाता है कि एक ही परिस्थिति में भिन्न-भिन्न व्यक्ति के व्यवहारों में परस्पर संबद्धता, क्रम तथा संगति भी मिलती है। 

‘व्यक्तित्व’ शब्द का उपयोग किसी व्यक्ति में इन पक्षों को व्यक्त करने के लिए किया जाता है। हमें व्यक्तित्व से संबंधित दूसरे शब्दों के बीच अंतर समझ लेना चाहिए जो प्रायः इसके स्थान पर या इसके पर्यायवाची के रूप में प्रयुक्त होते हैं। मनोवैज्ञानिक शब्दों में व्यक्तित्व से तात्पर्य उन विशिष्ट तरीकों से है जिनके द्वारा व्यक्तियों और स्थितियों के प्रति अनुक्रिया की जाती है।

संक्षेप में व्यक्तित्व को अपोलिखित विशेषताओं के द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है- 

1. इसके अंतर्गत शारीरिक एवं मनोवैज्ञानिक दोनों ही घटक होते हैं। 

2. किसी व्यक्ति विशेष में व्यवहार के रूप में इसकी अभिव्यक्ति पर्याप्त रूप से अनन्य होती है।

3. इसकी प्रमुख विशेषताएँ साधारणतया समय के साथ परिवर्तित नहीं होती हैं। 

4. यह इस अर्थ में गत्यात्मक होता है कि इसकी कुछ विशेषताएँ आंतरिक अथवा बाह्य स्थितिपरक माँगों के कारण परिवर्तित हो सकती हैं। इस प्रकार व्यक्तित्व स्थितियों के प्रति अनुकूलनशील होता है।

Q. 4. व्यक्तित्व का विशेषक उपागम क्या है ? यह कैसे प्ररूप उपागम से भिन्न है ? 

Ans. विशेषक उपागम (trait approach) — विशेषक उपागम विशिष्ट मनोवैज्ञानिक गुणों पर बल देता है जिसके आधार पर व्यक्ति संगत और स्थिर रूपों में भिन्न होते हैं।

विशेषक उपागम हमारे दैनिक जीवन के सामान्य अनुभव के बहुत समान है। उदाहरण के लिए जब हम यह जान लेते हैं कि कोई व्यक्ति सामाजिक है तो वह व्यक्ति न केवल सहयोग, मित्रता और सहायता करने वाला होगा बल्कि वह अन्य सामाजिक घटकों से युक्त व्यवहार प्रदर्शित करने में भी प्रवृत्त होगा। 

इस प्रकार, विशेषक उपागम लोगों की प्राथमिक विशेषताओं की पहचान करने का प्रयास करता है। एक विशेषक अपेक्षाकृत एक स्थिर और स्थायी गुण माना जाता है जिस पर एक व्यक्ति दूसरों से भिन्न होता है ।

सारांश रूप में कहा जा सकता है कि — 

(i) विशेषक समय की विमा पर अपेक्षाकृत स्थिर होते हैं, 

(ii) विभिन्न स्थितियों में उनमें सामान्यतया संगति होती है। 

(iii) उनकी शक्ति और उनका संयोजन एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में भिन्न पाया जाता है जिसके कारण व्यक्तित्व में व्यक्तिगत भिन्नताएँ पाई जाती हैं। 

विशेषक उपागम और प्ररूप उपागम के भिन्नताएँ— मनोवैज्ञानिकों ने प्ररूप और विशेषक ( शीलगुण) उपागमों के मध्य विभेद किया है। प्ररूप उपागम (type approach) व्यक्ति के प्रेक्षित। व्यवहारपरक विशेषताओं के कुछ व्यापक फलस्वरूपों का परीक्षण कर मानव व्यक्तित्व को समझने का प्रयास करता है। 

प्रत्येक व्यवहारपरक फलस्वरूप व्यक्तित्व के किसी एक प्रकार को इंगित करता है जिसके अंतर्गत उस फलस्वरूप की व्यवहारपरक विशेषता की समानता के आधार पर व्यक्तियों को रखा जाता है। इसके विपरीत, विशेषक उपागम (trait approach) विशिष्ट मनोवैज्ञानिक गुणों पर बल देता है जिसके आधार पर व्यक्ति संगत और स्थिर रूपों में भिन्न होते. हैं। 

Q. 5. फ्रायड ने व्यक्तित्व की संरचना की व्याख्या कैसे की है ? 

Ans. फ्रायड के सिद्धांत के अनुसार व्यक्तित्व के प्राथमिक संरचनात्मक तत्व तीन हैं—इदम् या इड (id), अहं (ego) और पराहम् (superego)। ये तत्व अचेतन में ऊर्जा के रूप में होते हैं और इनके बारे में लोगों के द्वारा किए गए व्यवहार के तरीकों से अनुमान लगाया जा सकता है। स्मरणीय है कि इड, अहं और पराहम् संप्रत्यय हैं न कि वास्तविक मीतिक संरचनाएँ।

(क) इड – यह व्यक्ति की मूलप्रवृत्तिक ऊर्जा का स्रोत होता है। इसका संबंध व्यक्ति की आदिम आवश्यकताओं, कामेच्छाओं और आक्रामक आवेगों की तात्कालिक तुष्टि से होता है। यह सुखेप्सा-सिद्धांत (pleasure principle) पर कार्य करता है जिसका यह अभिग्रह होता है कि लोग सुख की तलाश करते हैं और कष्ट का परिहार करते हैं। 

(ख) अहं – इसका विकास इड से होता है और यह व्यक्ति की मूलप्रवृत्तिक आवश्यकताओं की संतुष्टि वास्तविकता के धरातल पर करता है। व्यक्तित्व की यह संरचना वास्तविकता सिद्धांत (reality principle) से संचालित होती है।

(ग) पराहम् — पराहम् को मानसिक प्रकार्यों की नैतिक शाखा के रूप में जाना जाए। पराहम् इड और अहं को बताता है कि किसी विशिष्ट अवसर पर इच्छा विशेष की संतुष्टि नैतिक है अथवा नहीं। 

Q.6. हार्नी की अवसाद की व्याख्या अल्फ्रेड एडलर की व्याख्या से किस प्रकार भिन्न है ? 

Ans. अल्फ्रेड एडलर : जीवन शैली तथा सामाजिक रुचि व्यक्तिवादी मनोविज्ञान (Individual Psychology) के नाम से प्रचलित सिद्धांत में एडलर ने माना कि व्यवहार उद्देश्यपूर्ण तथा लक्ष्य निर्देशित होते हैं। इनका विचार था कि हम सभी चयन तथा सृजन करने की क्षमता रखते हैं। 

हमारे लक्ष्य प्रेरणा के स्रोत होते हैं। ये लक्ष्य जो सुरक्षा प्रदान करते हैं तथा हीन भावना को दूर करने में सहायक होते हैं, बहुत ही महत्त्वपूर्ण होते हैं। इनकी सोच थी कि हर व्यक्ति एक हीनता ग्रंथि (Inferiority Complex) या अपर्याप्तता के अनुभव, जो बाल्यावस्था में उत्पन्न होते हैं, से ग्रस्त होता है।

कारेन हानी : व्यक्तित्व का आधार कारेन हानी ने कहा कि महिलाओं एवं पुरुषों में अंतर अधिकांशतः सामाजिक कारकों का परिणाम होता है न कि महिलाओं में स्थित किसी तरह की जन्मजात हीनता के कारण। इसके अनुसार प्रत्येक लिंग के व्यक्ति में ऐसे गुण होते हैं जिनकी प्रशंसा दूसरे लिंग के व्यक्ति द्वारा की जाती है तथा इनमें से किसी को भी श्रेष्ठ या हीन व्यक्ति के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। 

मानसिक विकृतियाँ मानसिक ऊर्जा के अवरुद्ध हो जाने के कारण नहीं बल्कि बाल्यावस्था में संबंधों के बिगड़ जाने के कारण होती है। जब बच्चे के प्रति माता- पिता का व्यवहार उदासीन, अपमानजनक तथा अनिश्चित होता है तो बच्चा असुरक्षित महसूस करता है, एक अनुभूति जिसे हार्नी आधारभूत चिंता (Basic anxiety) कहती हैं। 

Q.7. व्यक्तित्व के मानवतावादी उपागम की प्रमुख प्रतिज्ञप्ति क्या है ? आत्मसिद्धि से मैस्लो का क्या तात्पर्य था ?

Ans. मानवतावादी सिद्धांत मुख्यतः फ्रायड के सिद्धांत के प्रत्युत्तर में विकसित हुए। व्यक्तित्व के संदर्भ में मानवतावादी परिप्रेक्ष्य के विकास में कार्ल रोजर्स (Carl Rogers) और अब्राहम मैस्लो (Abraham Maslow) ने विशेष रूप से योगदान किया है। रोजर्स द्वारा प्रस्तावित सर्वाधिक महत्वपूर्ण विचार एक पूर्णतः प्रकार्यशील व्यक्ति (fully functioning person) का है। उनका विश्वास है कि व्यक्तित्व के विकास के लिए संतुष्टि अभिप्रेरक शक्ति है। लोग अपनी क्षमताओं, संभाव्यताओं और प्रतिभाओं को संभव सर्वोकृष्ट तरीके से अभिव्यक्त करने का प्रयास करते हैं। 

ऐसे बच्चे आत्मार्थी तथा परावलंबी हो जाते हैं। उसी तरह, यदि बच्चे माता-पिता से हमेशा डॉट-फटकार सुनते हैं तो उनमें निराशा तथा आक्रामक प्रवृत्तियों का विकास हो जाता है। 


अति लघु उत्तरीय प्रश्न (VERY SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS)


Q. 1. वृहत् पाँच प्रकारों के प्रत्येक कारक के लाभ बतायें।

Ans. 

(i) अनुभवों के लिए खुलापन 

(ii) बहिर्मुखता 

(iii) सहमतिशीलता 

(iv) तंत्रिकाताप

(v) अंतर्विवेकशीलता।

Q.2. आत्म को किन दो रूपों में समझा जा सकता है ? 

Ans. (क) आत्मगत और (ख) वस्तुगत।

Q.3. आत्म-नियमन का तात्पर्य क्या है ?

Ans. आत्म-नियमन (self-regulation) का तात्पर्य हमारे अपने व्यवहार को संगठित और परिवीक्षण या मॉनीटर करने की योग्यता से है। जिन लोगों में बाह्य पर्यावरण की माँगों के अनुसार अपने व्यवहार को परिवर्तित करने की क्षमता होती है, वे आत्म-परिवीक्षण में उच्च होते हैं। 

Q. 4. शेल्डन ने किस आधार पर व्यक्तित्व के प्ररूप प्रस्तावित किया है ?

Ans. शारीरिक बनावट और आत्मभाव को आधार बनाते हुए शेल्डन ने गोलाकृतिक (endomorphic), आयताकृतिक (mesomorphic) और लंबाकृतिक (ectomorphic) जैसे व्यक्तित्व के प्ररूप को प्रस्तावित किया है। 

Q.5. आत्म क्या है ?

Ans. आत्म मनोविज्ञान एवं दैनिक जीवन में प्रचुर मात्रा में उपयोग होने वाले संप्रत्ययों में से एक है। आत्म को हम अपने अस्तित्व बोध के अनुभवों पर आधारित एवं संगठित संज्ञानात्मक संरचना के रूप में देख सकते हैं। 

Q. 6. बच्चों को आत्म का प्रारंभिक ज्ञान किसे कहते हैं ?

Ans. बच्चों को आत्म का प्रारंभिक ज्ञान अपने माता-पिता, मित्रों, अध्यापकों तथा अन्य महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों से होता है।

Q.7. आत्म के कितने पक्ष होते हैं। 

Ans. आत्म के दो पक्ष होते हैं— (i) ज्ञाता देखने या सुनने वाला तथा (ii) होय के में (देखी या जानी जाती है।) 

Q.8. आत्म गौरव किसे कहते हैं ? 

Ans. स्वयं के महत्त्व के विषय में जो हमारी अवधारणा है उसे आत्म गौरव कहते हैं।


लघु उत्तरीय प्रश्न (SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS)


Q. 1. आत्म तथा व्यक्तित्व की अवधारणा की संक्षेप में व्याख्या करें। 

Ans. आत्म तथा व्यक्तित्व का अध्ययन मनुष्यों के आकलन का प्रयास है। मनुष्य महत्त्वपूर्ण लोगों से अन्तःक्रिया के दौरान आत्म की अवधारणा को अर्जित करता है और अपने व्यक्तित्व को संभारता है। एक संरचना के रूप में आत्म अपने बारे में विश्वासों तथा अनुभूतियों का एक संगठित संग्रह या एक मानसिक चित्र को विकसित करता है। 

एक प्रक्रिया के रूप में यह आत्म के ज्ञाता ‘मैं’ तथा ज्ञेय ‘मेरा’ के बीच एक बार्तालाप है। हम सब अपने-अपने आत्म के विषय में सोच-विचार करने में काफी समय बिताते हैं। हम अपने आत्म से जुड़ी अनुभूतियों, प्रत्यक्षों तथा वास्तविक या कल्पित विचारों में तल्लीन रहते हैं। आत्म वस्तुतः सभी मानवीय क्रियाओं का केन्द्र है। 

Q.2. मनोगतिकी उपागम क्या है ?

Ans. मनोगतिकी व्यक्तित्व के सबसे लोकप्रिय दृष्टिकोणों में से एक है। यह व्यक्ति के जीवन में होने वाले परिवर्तन, विकास तथा अन्तर्द्वन्द्वों पर प्रकाश डालता है। 

यह दृष्टिकोण सिगमंड फायड के योगदान पर आधारित है। फ्रायड एक चिकित्सक थे तथा उन्होंने अपने चिकित्सकीय कार्यों के क्रम में इस सिद्धांत का विकास किया। 

फ्रायड मन की आन्तरिक कार्यप्रणाली को जानने के लिए मुक्त साहचर्य स्वप्न, विश्लेषण तथा गलतियों के विश्लेषण के अभिनव उपयोग के लिए प्रसिद्ध है। यह सिद्धांत मानव मन को चेतना के विभिन्न स्तरों के रूप में देखता है। हममें चेतना पाए जाने वाले वर्तमान विचारों की जानकारी रहती है। 

चेतन पश्चात् अर्द्धचेतन आता है जो तत्काल उपलब्ध नहीं होता किन्तु प्रयास द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। अर्धचेतना के बाद अचेतन होता है जिसके विषय में हमें ज्ञान नहीं रहता है। इसमें दमित इच्छाएँ तथा आवेग वर्तमान रहते हैं। फ्रायड का मानना था कि अचेतन मूल प्रवृत्ति वाले प्रेरकों का भंडार होता है। 

साथ ही यह उन विचारों तथा इच्छाओं का भी संग्रह करता है जो चेतन अनुभूति के लिए अदृश्य होती है क्योंकि इससे मानसिक अन्तर्द्वन्द्व उत्पन्न होते हैं। हम सतत् इस अचेतन आवेगों को व्यक्त करने के लिए उपयुक्त और मान्य तरीके खोजने में या इन आवेगों को व्यक्त होने से रोकने के प्रयास में लगे रहते हैं। 

अतः भुलक्कड़पन, गलत उच्चारण, हँसी-मजाक, स्वप्न आदि अचेतन तक पहुँचने का मार्ग प्रदान करते हैं। मनोविश्लेषण सिद्धांत का उद्देश्य दमित अचेतन सामग्री को चेतन में लाना तथा इसके द्वारा हमें अपने जीवन को अधिक सतर्क तथा संगठित तरीके से जीने में सहायता प्रदान करना है।

Q. 3. व्यक्तित्व के मेसोमार्फिक प्रकार से आप क्या समझते हैं ? 

Ans. मेसोमार्फी (Mesomorphy ) —— इस तरह के व्यक्तित्व के शरीर की हड़ियाँ मजबूत तथा मांसपेशियाँ काफी गठीली होती हैं। इनका शारीरिक गठन सुडौल होता है। ऐसे लोग जोखिम एवं बहादुरी का कार्य करने में काफी साहस दिखाते हैं। इनमें आक्रामकता तथा दृढकथन ( assertive- ness) का भी गुण होता है। इनकी चित्तप्रकृति को सोमैटोटोनिया (somatotonia) कहा गया है। 

Q. 4. व्यक्तित्व के एण्डोमार्फिक प्रकार से आप क्या समझते हैं ?

Ans. एण्डोमार्फी (Endomorphy) — इस प्रकार का व्यक्तित्व क्रेश्मर द्वारा बताए गए पिकनिक प्रकार के समान होता है। इस प्रकार के व्यक्तित्व मोटे एवं नाटे कद के होते हैं। इनके पेट में चर्बी अधिक होती है। इनका शारीरिक गठन गोलाकार दिखता है। आत्मभाव या चित्तप्रकृति (tem- perament) से ऐसे व्यक्ति आरामपसंद, खुशमिजाज, सामाजिक एवं खाने-पीने की चीजों में अधिक अभिरुचि दिखानेवाले होते हैं। ऐसे लोग सोने में बहादुर होते हैं। इस तरह की चित्तप्रकृति को विसरोटोनिया (viscerotonia) कहा जाता है।

Q.5. व्यक्तित्व के एक्टोमार्फिक प्रकार से आप क्या समझते हैं ? 

Ans. एक्टोमार्फी (Ectomorphy) — इस तरह के व्यक्ति का शारीरिक गठन इकहरा होता है। वे लंबे तथा दुबले-पतले कद के होते हैं। इनके शरीर की मांसपेशियों का विकास पूरा नहीं होता। ऐसे व्यक्ति आत्मभाव या चित्तप्रकृति से अधिक लजालु, संकोचशील, सामाजिक मेल- जोल से दूर रहनेवाले होते हैं। इस तरह के व्यक्ति काफी संवेदनशील होते हैं तथा उनमें नींद की शिकायत होती है। ऐसे व्यक्ति की चित्तप्रकृति को सेरीबोटानिया (cerebrotania) कहा जाता है। 

Q. 6. व्यक्तित्व का अर्थ बतावें ।

Ans. व्यक्तित्व को कुछ लोगों ने बाहरी दिखावा तथा बेश-भूषा के आधार पर परिभाषित किया था। परंतु इसे तुरंत अवैज्ञानिक दृष्टिकोण घोषित कर दिया गया। आधुनिक मनोवैज्ञानिकों के बीच इस बात की आम सहमति है कि व्यक्तित्व व्यक्ति के भीतर मनोशारीरिक तंत्रों (psycho- physical systems) का एक गत्यात्मक संगटन (dynamic organization) है । 

जो बातावरण में व्यक्ति को अपूर्व समायोजन (adjustment) करने में मदद करता है। मनोशारीरिक तंत्र से तात्पर्य यह होता है कि व्यक्तित्व में मानसिक या मनोवैज्ञानिक पक्ष तथा शारीरिक पक्ष दोनों का समावेश होता है। व्यक्तित्व का शीलगुण मनोवैज्ञानिक पक्ष तथा ग्रन्थीय प्रक्रियाएँ शारीरिक पक्ष के उदाहरण हैं। 

व्यक्तित्व को इन दोनों तरह के तंत्रों का गत्यात्मक संगठन (dynamic organization) इसलिए कहा जाता है, क्योंकि उसमें परिस्थिति तथा समय के अनुरूप परिवर्तन भी आता है। शायद यही कारण है कि कोई व्यक्ति अमुक परिस्थिति में अधिक ईमानदार और समयनिष्ठ (Punctual) होता है तो दूसरी परिस्थिति में वही व्यक्ति बेईमानी तथा लापरवाही दिखाता है। 

Q. 7. व्यक्तित्व के शीलगुण से आप क्या समझते हैं ?

Ans. शीलगुण व्यक्तित्व की एक मौलिक इकाई (fundamental unit) है। व्यक्तित्व के शीलगुण से तात्पर्य वैसे प्रवृत्ति से होता है जिसके कारण वह विभिन्न परिस्थितियों में लगभग एकसमान व्यवहार करता है। दूसरे शब्दों में, शीलगुण से तात्पर्य वैसी प्रवृत्ति से होता है जिसके कारण व्यक्ति विभिन्न परिस्थितियों से संगत ढंग से (consistently) व्यवहार करता है। 

जैसे—यदि कोई व्यक्ति विभिन्न परिस्थितियों में ईमानदारी की प्रवृत्ति दिखाता है तो यह कहा जाएगा कि उसमें ईमानदारी का शीलगुण है। उसी तरह, यदि कोई व्यक्ति अधिकतर परिस्थितियों में दूसरों पर आधिपत्य दिखाने की प्रवृत्ति रखता है तो यह कहा जाएगा कि उसमें प्रभुत्व या आधिपत्य (dominance) का शीलगुण है।

Q.8. अंतर्मुखी व्यक्तित्व तथा बहिर्मुखी व्यक्तित्व में अंतर बतावें । 

Ans. युग (Jung) ने व्यक्तित्व के दो प्रकार बताए हैं—अंतर्मुखी (introvert) तथा बहिर्मुखी (extrovert)। अंतर्मुखी व्यक्तित्व वैसे व्यक्तित्व को कहा जाता है जिसमें व्यक्ति का आत्मभाव एकांतप्रिय हो जाता है तथा वह लजालु आत्मभाव का होता है। वह सामाजिक कार्यों से दूर भागता है तथा उसमें सामाजिक उत्तरदायित्वहीनता पाई जाती है। 

लोग रूढ़िवादी प्रकृति के होते हैं तथा पुराने रीति-रिवाजों या नियमों को माननेवाले होते हैं। ऐसे व्यक्ति एक सफल कवि, दार्शनिक एवं साहित्यकार होते हैं। बहिर्मुखी व्यक्तित्ववाले व्यक्ति में सामाजिकता का गुण अधिक पाया जाता है। 

इनकी अभिरुचि सामाजिक कार्यों की ओर विशेष रूप से होती है। ये प्रायः खुशमिजाज़ होते हैं। तथा लोगों से मिलना-जुलना इन्हें अधिक पसंद है।


दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (LONG ANSWER TYPE QUESTIONS)


Q. 1. व्यक्तित्व किसे कहते हैं? व्यक्तित्व के प्रमुख शीलगुणों का वर्णन करें। Or, व्यक्तित्व की परिभाषा दीजिए। व्यक्तित्व के शील गुणों का वर्णन कीजिए। 

Ans. व्यक्तित्व का अँगरेजी रूपांतर ‘personality’ है जो लैटिन शब्द ‘परसोना’ (persona) से बना है। ‘परसोना’ का अर्थ नकाब होता है जिसे नायक या नायिका नाटक करते समय मुँह पर लगा लेते हैं। 

इस शाब्दिक अर्थ को ध्यान में रखते हुए व्यक्तित्व को बाहरी वेश-भूषा या दिखावा के आधार पर परिभाषित किया गया। जिन लोगों का बाहरी वेश-भूषा या दिखावा उत्तम होता है, उनका व्यक्तित्व भी अच्छा समझा जाता है। परंतु, इसे तुरंत ही अवैज्ञानिक परिभाषा घोषित कर

दिया गया। बाद में व्यक्तित्व की कई परिभाषाएं सामने आई। 

कुछ मनोवैज्ञानिकों ने व्यक्तित्व को । शारीरिक गुणों का योग तो कुछ ने मानसिक गुणों का योग बताया। परंतु, ये सारी परिभाषाएँ बहुत अधिक लोकप्रिय नहीं हो पाई, क्योंकि इनमें वैज्ञानिकता तथा वस्तुनिष्ठता का अभाव था। आगे चलकर जी. डब्ल्यू. आलपोर्ट (G. W. Allport) ने व्यक्तित्व की एक परिभाषा दी जो काफी विस्तृत होने के साथ-ही-साथ अधिकतर मनोवैज्ञानिकों को मान्य भी रही। उनके द्वारा दी गई परिभाषा इस प्रकार है—“व्यक्तित्व व्यक्ति के भीतर उन मनोशारीरिक तंत्रों का गत्यात्मक संगठन है जो वातावरण में उसके अपूर्व समायोजन को निर्धारित करते हैं।”

यदि हम इस सर्वमान्य परिभाषा का विश्लेषण करें तो निम्नांकित तीन बातें सामने आती हैं- 

(i) मनोदैहिक तंत्रों का संगठन (Organization of psychophysical system) – इस परिभाषा का सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू यह है कि व्यक्तित्व एक ऐसा तंत्र होता है जिसमें मानसिक तथा शारीरिक दोनों तरह के गुणों या तंत्रों का संगठन पाया जाता है। अतः इस परिभाषा में मानसिक तथा शारीरिक दोनों तरह के गुणों के महत्त्व पर बल डाला गया है।

(ii) गत्यात्मक संगठन (Dynamic organization)— गुणों का संगठन स्थिर न होकर गत्यात्मक होता है। दूसरे शब्दों में, व्यक्तित्व के शारीरिक एवं मानसिक गुणों के संगठन में समय एवं परिस्थिति के अनुसार परिवर्तन होते रहते हैं। यही कारण है कि कोई व्यक्ति कोई पद प्राप्त। करने के पहले समयनिष्ठ तथा ईमानदार होता है। परंतु, पद पर आने के कुछ ही महीने बाद उसमें बेईमानी, हठधर्मी आदि का गुण विकसित हो जाता है।

(iii) वातावरण से अपूर्व समायोजन (Unique adjustment to environment) इस परिभाषा में वातावरण में सफलतापूर्वक समायोजन के महत्त्व पर भी प्रकाश डाला गया है। प्रत्येक व्यक्ति वातावरण में सफल समायोजन के लिए व्यवहार करता है, लेकिन सफल समायोजन के लिए उन सबका व्यवहार अलग-अलग ढंग से या अपूर्व होता है। 

Q. 2. व्यक्तित्व के कुछ प्रमुख जैविक निर्धारकों की विवेचना करें।

Ans. जैविक निर्धारकों का तात्पर्य उन कारकों से है, जो आनुवंशिक होते हैं। ऐसे कारकोंका निर्धारण बातावरण से नहीं, आनुवंशिकता से होता है। इनका प्रभाव व्यक्तित्व विकास पर अप्रत्यक्ष रूप से पढ़ता है। इनके निम्नांकित प्रकार हैं- 

(i) शारीरिक संरचना – शारीरिक संरचना का अर्थ शारीरिक गठन, लंबाई, ढाँचा, आकर्षण आदि है। ये सभी शारीरिक शीलगुण वंशागत होते हैं। मनुष्य के बच्चे मनुष्य, पशु के बच्चे तथा पक्षी के बच्चे पक्षी होते हैं, चाहे वातावरण जैसा भी हो। लम्बे माता-पिता का बच्चा प्रायः लम्बे होते हैं और नाटे माता-पिता के बच्चे नाटे । गोरे माता-पिता के बच्चे प्रायः गोरे तथा काले माता-पिता के बच्चे काले होते हैं। 

(ii) बुद्धि बुद्धि एक जैविक कारक है, जिसका प्रभाव व्यक्तित्व विकास पर अप्रत्यक्ष रूप से पड़ता है। बुद्धिमान माता-पिता के बच्चे प्रायः बुद्धिमान होते हैं और मंद बुद्धि के माता-पिता के बच्चे मन्द बुद्धि के। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि बच्चे अपने माता-पिता के पूर्वजों से बौद्धिक योग्यता प्राप्त कर लेते हैं। जिसके कारण उनकी बुद्धि उनके माता-पिता की बुद्धि से कम या अधिक हो जाती है, जुड़वाँ बच्चों पर किये गये अध्ययनों से इस बात की पुष्टि होती है। 

Q. 3. व्यक्तित्व के शीलगुण से आप क्या समझते हैं ? अंतर्मुखी व्यक्तित्व तथा बहिर्मुखी व्यक्तित्व में अंतर बतावें । 

Ans. शीलगुण (trait) व्यक्तित्व की एक मौलिक इकाई (fundamental unit) होता है। व्यक्तित्व के शीलगुण से तात्पर्य एक बेसी प्रवृत्ति (tendency) से होता है जिसके कारण व्यक्ति विभिन्न परिस्थितियों में सतत् ढंग से (consistently) या समान ढंग से व्यवहार करता है। जैसे- कोई व्यक्ति यदि भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में ईमानदारी से कोई कार्य करता है तो यह कहा जा सकता है कि व्यक्ति में ईमानदारी का शीलगुण है। अतः शीलगुण से यह पता चलता है कि व्यक्ति वातावरण में उपस्थित विभिन्न उद्दीपनों के प्रति संगत तथा सराहनीय (enduring) ढंग से व्यवहार करता है।

आलपोर्ट (Allport) के अनुसार शीलगुण की कुछ प्रमुख विशेषताएँ निम्नांकित है- 

(i) शीलगुण काल्पनिक नहीं होकर वास्तविक होते हैं और व्यक्ति के भीतर पाए जाते हैं। 

(ii) शीलगुण व्यक्ति के व्यवहार को निर्देशित करता है। 

(iii) शीलगुण को देखा तो नहीं जा सकता है, परंतु उसके अस्तित्व को जाँचा या मापा जा सकता है। 

(iv) एक ही व्यक्ति के भीतर कई शीलगुण होते हैं जो एक-दूसरे से पूर्णतः अलग नहीं होते हैं बल्कि ये परस्परव्यापी (overlap) होते हैं। जैसे-आक्रामकता तथा विद्वेषिता (hostility) दो अलग-अलग शीलगुण हैं, परंतु वे सभी एक-दूसरे से काफी संबंधित एवं परस्परव्यापी है। 

(v) शीलगुण स्थिर नहीं होते हैं। बल्कि परिस्थिति के साथ परिवर्तित (vary) होते हैं।

अंतर्मुखी तथा बहिर्मुखी व्यक्तित्व में अंतर (Difference between introvert and extrovert personality) युंग ने व्यक्तित्व के दो प्रकार बताए हैं- अंतर्मुखी (introvert) तथा बहिर्मुखी (extrovert) अंतर्मुखी व्यक्तित्ववाले व्यक्ति एकांतप्रिय, संकोचशील, सामाजिक क्रियाकलाप से दूर रहनेवाले, चिंतनशील, आलोचनाओं के प्रति काफी संवेदनशील आदि गुणों से युक्त होते हैं। ऐसे व्यक्ति एक सफल कवि, दार्शनिक आदि होते हैं। बहिर्मुखी व्यक्तित्ववाले व्यक्ति सामाजिक, हँसोड़, चिंतामुक्त, आक्रामक, जोश एवं जोखिम भरा कार्य करनेवाले होते हैं। ऐसे व्यक्ति एक सफल नेता,

समाजसुधारक आदि होते हैं।

Q. 4. व्यक्तित्व के सामाजिक-सांस्कृतिक निर्धारकों का वर्णन करें।

Ans. सामाजिक वातावरण या सामाजिक निर्धारक (Social environment or social determinants) – प्रत्येक व्यक्ति का जन्म किसी-न-किसी समाज में होता है। 

सच पूछा जाए तो जन्म के समय बच्चा न तो सामाजिक रहता है और न ही असामाजिक। वह जन्म से मृत्यु तक समाज में रहता है तथा समाज के नियमों, आदशों, परंपराओं एवं मापदंडों के अनुकूल व्यवहार करना या सीखने की कोशिश करता है। 

इस तरह इन सामाजिक नियमों, आदर्शों, परंपराओं एवं मानदंडों का प्रभाव व्यक्तित्व के विकास पर पड़ता है। यहाँ हम कुछ ऐसे सामाजिक कारकों का वर्णन करेंगे जिनसे व्यक्तित्व का विकास प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होता है—

(i) परिवार (Family) परिवार व्यक्ति के लिए एक छोटा-सा समाज के समान होता है। परिवार में ही रहकर बच्चों को समाज का बोध होता है। वे परिवार के तौर-तरीके, रहन-सहन, आदर्श आदि को परिवार में ही सीखते हैं। शायद यही कारण है कि परिवार को प्रथम पाठशाला कहा जाता है। ऐसे शिक्षक का प्रभाव व्यक्तित्व विकास पर काफी पड़ता है। परिवार में निम्नांकित तीन तरह के संबंधों का प्रभाव व्यक्तित्व विकास पर अधिक पड़ता है-

(a) माता-पिता का संबंध (Relation between parents ) माता-पिता के संबंध का प्रभाव बच्चों के व्यक्तित्व विकास पर सीधा पड़ता है। यदि माता-पिता का आपस में संबंध मधुर है तो इससे बच्चों के व्यक्तित्व विकास पर काफी अनुकूल प्रभाव पड़ता है। इससे बच्चे भी उत्तरदायी, शांतिप्रिय, आज्ञाकारी और अनुशासित हो जाते हैं। दूसरी ओर, जब माता-पिता का आपस में संबंध कटु होता है तथा वे आपस में लड़ते-झगड़ते रहते हैं तब उसका प्रभाव बच्चों पर प्रतिकूल पड़ता है। वे कलहपूर्ण व्यवहार को करना सीख लेते हैं। वे झगड़ालू तथा आक्रामक (aggressive) प्रकृति के हो जाते हैं। ऐसे बच्चों में बाल अपराध की प्रवृत्ति तीव्र हो जाती है।

(b) माता-पिता का बच्चों के साथ संबंध (Relation between children and parents)- यदि माता-पिता को उचित प्यार स्नेह तथा मान्यता देते हैं तो बच्चों का व्यक्तित्व निर्माण तथा विकास भी समुचित ढंग से होता है। उनके व्यक्तित्व में उत्तम सामाजिक शीलगुण विकसित हो जाते हैं। कोई-कोई माता-पिता अपने बच्चों को जरूरत से ज्यादा सुरक्षा तथा दुलार प्यार देते ऐसे बच्चे आत्मार्थी तथा परावलंबी हो जाते हैं। उसी तरह, यदि बच्चे माता-पिता से हमेशा डाँट- फटकार सुनते हैं तो उनमें निराशा तथा आक्रामक प्रवृत्तियों का विकास हो जाता है।

(c) बच्चों का आपसी संबंध (Sibling relationship) — परिवार में बच्चों का आपसी संबंध कैसा है, इसका भी प्रभाव उनके व्यक्तित्व विकास पर पड़ता है। यदि भाई-बहन, बहन- बहन, तथा भाई-भाई का संबंध आपस में मधुर है तथा वे एक-दूसरे के साथ सहयोग दिखते हैं तो उनमें सामाजिकता, सहयोग तथा परोपकारिता आदि का शीलगुण विकसित हो जाता है। दूसरी तरफ, यदि बच्चे आपस में लड़ते-झगड़ते रहते हैं तो उसका प्रभाव व्यक्तित्व विकास पर अच्छा नहीं पड़ता है। लड़ने-झगड़ने के पारण उनके बीच मनमुटाव हो जाता है तथा ये एक-दूसरे के प्रो है। ये एक-दूसरे से डाह करने लगते है। ये झगड़ालू एवं आक्रामक प्रवृत्ति के हो जाते हैं। 

(ii) जन्मक्रम तथा एकलौता बच्चा (Birth order and only child ) एडलर (Adler) ने अपने अध्ययन के आधार पर यह बताया है कि बच्चों के जन्मक्रम का भी प्रभाव उनके व्यक्तित्व

‘विकास पर पड़ता है। इनके अध्ययन के अनुसार प्रथम जन्मकमवाले बच्चे अर्थात् सबसे बड़े बच्चे अधिक साह प्यार तथा स्नेह के कारण अधिकारमय, आत्मार्थी तथा ईष्यालु प्रकृति के हो जाते हैं। अन्तिम जन्मका बच्चे अर्थात् सबसे छोटे बच्चों में हीनता का भाव अधिक विकसित हो जाता है। वह अपने को कमजोर एवं दूसरों पर आश्रित रहनेवाले व्यक्ति समझता है। 

फलतः इनके व्यक्तित्व का विकास समुचित ढंग से नहीं होता है। मध्य जन्मक्रमवाले बच्चे अर्थात् मांझिल बच्चों में प्रतियोगिता तथा प्रतिस्पद्धों की भावना अधिक होती है। ऐसे बच्चे प्रगतिवादी तथा प्रयोगवादी विचार के होते हैं। उनमें लोकप्रिय व्यक्तित्व का विकास होता है (पाठक यहाँ यह न भूलें कि स्वयं एडलर का जन्मक्रम भी मध्य का ही था।) एकलौते बच्चे को परिवार में अधिक लाड़-प्यार, सुरक्षा, सुविधाएँ आदि दी जाती है क्योंकि इनमें आराम और अधिकार में हिस्सा बँटानेवाला कोई नहीं होता है। 

ऐसे बच्चे एकाधिपत्य (authoritarian) तथा परावलंबी आत्मभाव के हो जाते हैं। वे अत्यधिक शौख, जिद्दी और संकुचित विचार के हो जाते हैं। अंततोगत्वा वे परिवार का एक समस्या बालक बन जाते हैं। फलतः, बच्चों के व्यक्तित्व का विकास समुचित ढंग से नहीं हो पाता है।

(iii) पास-पड़ोस (Neighbourhood ) व्यक्तित्व विकास पर पास-पड़ोस के लोगों का भी प्रभाव पड़ता है। यदि पास-पड़ोस के लोग सज्जन, मृदुभाषी, सहयोगी एवं परोपकारी होते हैं तो बच्चों में भी ऐसे शीलगुण विकसित से जाते हैं। दूसरी तरफ, यदि पास-पड़ोस के लोग बेईमान, पोखेबाज, जुआरी, शरादी आदि होते हैं तो बच्चे भी ऐसे व्यवहारों को सीख लेते हैं। उनमें भी ऐसे आचरणों का विकास हो जाता है और इस तरह वे समाजविरोधी व्यक्तित्व के हो जाते हैं। 

(iv) स्कूल (School) व्यक्तित्व विकास पर स्कूल का भी प्रभाव पड़ता है। स्कूल का प्रशासन,शिक्षकों का व्यक्तित्व एवं मनोवृत्ति तथा सहपाठियों का आचरण (behaviour of classmates) का सीधा प्रभाव व्यक्तित्व विकास पर पड़ता है। 

Q.5. व्यक्तित्व आकलन के प्रमुख अवलोकनात्मक तरीके कौन-से हैं ?

Ans. लोगों को जानना तथा समझना एवं उनका वर्णन करना एक ऐसा कार्य है जिसमे सभी लोग रुचि लेते हैं। आप सहमत होंगे कि लोगों के साथ सार्थक रूप से अंतः क्रिया करने के लिए हमें उनको समझने तथा वे क्या करेंगे इसका पूर्वानुमान करने की आवश्यकता होती है। हम अपने व्यक्तिगत जीवन से पूर्व अनुभवों, प्रेक्षणों, बातचीत तथा दूसरों से प्राप्त सुनाओं का उपयोग करते हैं, हालांकि, ये अनुश्रुतियों, रूढ़ियों, मनोदशा, आवश्यकताओं तथा व्यक्तिगत अभिनीतियों से प्रभावित होती हैं। 

व्यक्तित्व के औपचारिक विश्लेषण तथा मापन के प्रयास को व्यक्तित्व मूल्यांकन कहा जाता है। कुछ विशेषताओं के आधार पर लोगों का आकलन करना तथा उनके भेद करने की प्रक्रिया को मूल्यांकन कहते हैं। न्यूनतम त्रुटि तथा अधिकतम परिशुद्धता के साथ पूर्वानुमान करना मूल्यांकन का लक्ष्य होता है। 

यह विभिन्न प्रकार के उद्देश्यों हेतु किया जाता है। यह लोगों में विविधता का अध्ययन करने, परिवत्यों के बीच संबंध जानने, विकासात्मक परिवर्तनों का अध्ययन करने, निदान, स्थापना तथा परामर्श इत्यादि में इसका उपयोग किया जाता है। मनोवैज्ञानिकों ने व्यक्तित्व का मापन अनेक विधियों से किया है। 

ये विधियाँ हैं पर्यवेक्षक प्रतिवेदन, प्रक्षेपी तकनीकें तथा आत्म प्रतिवेदन के मापक। यह ध्यान रखना चाहिए कि मूल्यांकन के ये दृष्टिकोण व्यक्तित्व के कई पहलुओं पर प्रकाश डालते हैं क्योंकि ये विभिन्न सैद्धांतिक भूमिकाओं पर आधारित हैं। हमें इनके बारे में जानकारी हासिल करने का प्रयत्न करना चाहिए।

प्रेक्षक प्रतिवेदन – विविध प्रकार के परिवेशों में व्यक्तित्व निर्धारण करने हेतु व्यवहारों का प्रेक्षण सहायक होता है। साक्षात्कार, प्रेक्षण, मूल्य-निर्धारण ( Rating ) तथा नामांकन कुछ प्रचलित तकनीकें हैं जो व्यक्तित्व मूल्यांकन के लिए प्रेक्षणात्मक आँकड़ों का उपयोग करती हैं। आइए, इनके बारे में कुछ विस्तार से पढ़ें।

साक्षात्कार एक व्यक्ति के व्यक्तित्व को जानने के लिए प्रायः साक्षात्कार तथा प्रेक्षण का उपयोग किया जाता है। हम सभी प्रायः एक-दूसरे से बातचीत करते हैं तथा व्यक्ति के व्यवहार का प्रेक्षण करते हैं। जैसा कि आप कक्षा 11 की पाठ्यपुस्तक में पढ़ चुके हैं, साक्षात्कार संरचित तथा असंरचित हो सकते हैं। अपने लोगों को नौकरी, विद्यालय में प्रवेश या समस्या का हल करने हेतु साक्षात्कार देते हुए अवश्य देखा होगा। 


FAQs


Q.अस्मिताबोध से क्या तात्पर्य है ? 

Ans. अस्मिताबोध का अर्थ है अपने स्वयं को दूसरे लोगों या दूसरी चीजों से अपने आत्म से सम्बद्धता या असम्बद्धता के आधार पर भिन्न रूप में देखना।

Q. आत्म दक्षता क्या है ?

Ans. आत्म दक्षता आत्मसंप्रत्यय से जुड़ा हुआ एक पक्ष है। यह एक व्यक्ति को अपनी क्रियाओं के द्वारा वांछित प्रभाव उत्पन्न करने की योग्यता से सम्बन्धित आत्म मूल्यांकन है। 

Q. आत्म के ज्ञाता और पक्षों को एक उदाहरण द्वारा स्पष्ट कीजिए। 

Ans. ‘मैं अपने बारे में सोच रहा था यह आत्म का ज्ञाता पक्ष है जबकि ‘मैं अपने को देख रहा था यह आत्म का ज्ञेय पक्ष है।


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