NCERT Class 12 Psychology Chapter 3 Notes In Hindi जीवन की चुनौतियों का सामना Easy Pdf

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NCERT Class 12 Psychology Chapter 3 Notes In Hindi जीवन की चुनौतियों का सामना Easy Pdf

Class12th 
Chapter Nameजीवन की चुनौतियों का सामना
Chapter numberChapter 3
Book NCERT
SubjectPsychology
Medium Hindi
Study MaterialsVery important question to answer
Download PDFआत्म एवं व्यक्तित्व जीवन की चुनौतियों का सामनाक्तित्व Pdf

पाठ-परिचय


दबाव विद्युत की भाँति ऊर्जा प्रदान कर सकता है अतः दबाव का वर्णन किसी जीव द्वारा उद्दीपक घटना के प्रति की जाने वाली अनुक्रियाओं के प्रतिरूप के रूप में किया जा सकता है जो उसकी साम्यावस्था में व्यवधान उत्पन्न करता है तथा उसके सामने करने की क्षमता से कहीं अधिक होता है। 

NCERT Class 12 Psychology Chapter 3 Notes In Hindi जीवन की चुनौतियों का सामना Easy Pdf

हर व्यक्ति की दबाव के प्रति अनुक्रिया उसके व्यक्तित्व पालन-पोषण तथा जीवन के अनुभवों के आधार पर भिन्न-भिन्न होती है। प्रत्येक व्यक्ति के दबाव अनुक्रियाओं के अलग-अलग प्रतिरूप होते हैं। मनोवैज्ञानिक दबाव के कुछ प्रमुख स्रोत कुंठा, द्वन्द्व, आंतरिक एवं सामाजिक दबाव इत्यादि हैं। जब कोई व्यक्ति या परिस्थिति हमारी आवश्यकताओं तथा अभिप्रेरकों को अवरुद्ध करती है, जो हमारे इष्ट लक्ष्य की प्राप्ति में बाधा डालती है तो कुंठा (frustration) उत्पन्न होती है। 

कुंठा के अनेक कारण हो सकते हैं, जैसे-सामाजिक भेदभाव, अंतर्वैयक्तिक क्षति, स्कूल में कम अंक प्राप्त करना इत्यादि दो या दो से अधिक असंगत आवश्यकताओं तथा अभिप्रेरकों में द्वन्द्व (conflict) हो सकता है। कई घटनाएँ चाहे वे योजनाबद्ध हो (जैसे- घर बदलकर नए घर में जाना), या पूर्वानुमानित न हो (जैसे- किसी दीर्घकालिक संबंध का टूट जाना) कम समय अवधि में घटित होती हैं, तो हमें उनका सामना करने में कठिनाई होती है तथा हम दबाव के लक्षणों के प्रति अधिक प्रवण होते हैं। 

सेल्ये ने पशुओं को विभिन्न दबावकारक जैसे—उच्च तापमान, एक्स-रे तथा इंसुलिन की सुई लगाकर प्रयोगशाला में लंबे समय तक रखा गया। उन्होंने विभिन्न चोटों तथा बीमारियों से पीड़ित रोगियों का अस्पतालों में जाकर प्रेक्षण भी किया। सेल्ये ने सभी में समान प्रतिरूप वाली शारीरिक अनुक्रियाएँ पाई। सेल्पे ने इस प्रतिरूप को सामान्य अनुकूलन संलक्षण या जी. ए. एस. (GAS) का नाम दिया। उनके अनुसार, जी. ए. एस. के अंतर्गत तीन चरण होते हैं— सचेत प्रतिक्रिया, प्रतिरोध तथा परिश्रांति ।

सच तो यह है कि दबाव के कारण प्रतिरक्षक तंत्र की कार्यप्रणाली दुर्बल हो जाती है जिसके | कारण बीमारी उत्पन्न हो सकती है। प्रतिरक्षक तंत्र शरीर के भीतर तथा बाहर से होने वाले हमलों से शरीर की रक्षा करता है। मनस्तंत्रिका प्रतिरक्षा विज्ञान मन, मस्तिष्क और प्रतिरक्षक तंत्र के बीच संबंधों पर ध्यान केंद्रित करता है। 

यह प्रतिरक्षक तंत्र पर दबाव के प्रभाव का अध्ययन करता है। प्रतिरक्षक तंत्र में श्वेत रक्त कोशिकाएँ या श्वेताणु (leucocyte) बाह्य तत्वों (एंटीजेन) जैसे वाइरस को पहचान कर नष्ट करता है। इनके द्वारा रोगप्रतिकारकों (anatibodies) का भी निर्माण भी होता है।

दबाव का सामना करना (coping) दबाव के प्रति एक गत्यात्मक स्थिति-विशिष्ट प्रतिक्रिया है। यह दवावपूर्ण स्थितियों या घटनाओं के प्रति कुछ निश्चित मूर्त अनुक्रियाओं का समुच्चय होता है, जिनका उद्देश्य समस्या का समाधान करना तथा दबाव को कम करना होता है। स्थिति स्थापन एक गत्यात्मक विकासात्मक प्रक्रिया है, जो चुनौतीपूर्ण जीवन-दशाओं में

हुए भी सकारात्मक समायोजन के अनुरक्षण को संदर्भित करता है। दबाव तथा विपत्ति के होते उछल कर पुनः अपने स्थान पर पहले के समान वापस आने को स्थिति स्थापन कहते हैं। 

स्थिति स्थापन का संकल्पना निर्धारण, आत्म-अर्थ तथा आत्म-विश्वास, आत्मायत्तता तथा आत्मनिर्भरता की भावनाओं को अभिव्यक्त करता है, अपने लिए सकारात्मक भूमिका प्रतिरूप ढूँढना, किसी अंतरंग मित्र को खोजना, ऐसे संज्ञानात्मक कौशल विकसित करना, जैसे- समस्या-समाधान, सर्जनात्मकता संसाधन-संपन्नता, तथा नम्यता और यह विश्वास कि मेरा जीवन अर्थपूर्ण है तथा उसका एक उद्देश्य है। 

स्थिति स्थापक व्यक्ति अभिघात के प्रभावों, दबाव तथा विपत्ति पर विजयी होने में सफल होते हैं, एवं मानसिक रूप से आत्मस्थ तथा अर्थपूर्ण जीवन व्यतीत करना सीख लेते हैं।

सकारात्मक स्वास्थ्य तथा कुशल क्षेम, संतुलित आहार, व्यायाम, सकारात्मक अभिवृत्ति सकारात्मक आशावादी चिंतन तथा सामाजिक अवलंब के द्वारा विकसित होते हैं। इसके साथ ही समाज में चतुर्दिक सामंजस्य या समरसता स्थापित करने की भी आवश्यकता है। हमारे लिए ऐसे अस्वास्थ्यकर पलायन वाले मार्गों, जैसे- धूम्रपान, मद्य, मादक द्रव्यों तथा अन्य हानिकर व्यवहारों का परिहार करना भी आवश्यक है।


पाठ्य-पुस्तक के समीक्षात्मक प्रश्न और उनके उत्तर


Q. 1. दबाव के संप्रत्यय की व्याख्या कीजिए। दैनिक जीवन से उदाहरण दीजिए। 

Ans. दबाव जीवन का एक अंग है दबाव न तो एक उद्दीपक है और न ही एक अनुक्रिया बल्कि व्यक्ति तथा पर्यावरण के मध्य एक सतत संव्यवहार प्रक्रिया है। अतः दबाव का वर्णन किसी जीव द्वारा उद्दीपक घटना के प्रति की जानेवाली अनुक्रियाओं के प्रतिरूप के रूप में किया जा सकता है जो उसकी साम्यावस्था में व्यवधान उत्पन्न करता है।

तथा उसके सामने करने की क्षमता से कहीं अधिक होता है। दबाव कारण तथा प्रभाव दोनों से संबद्ध हो गया है तथापि दवाद का यह दृष्टिकोण प्रांति उत्पन्न कर सकता है। हंस सेल्ये ( Sans Selye), जो आधुनिक दबाव शोध के जनक कहे जाते हैं, ने दबाव को इस प्रकार परिभाषित किया है कि यह “किसी भी माँग के प्रति शरीर की अविशिष्ट अनुक्रिया है।”

दबाव कोई ऐसा घटक नहीं है जो व्यक्ति के भीतर या पर्यावरण में पाया जाता है। इसके बजाय यह एक सतत चलने वाली प्रक्रिया में सन्निहित है जिसके अंतर्गत व्यक्ति अपने सामाजिक एवं सांस्कृतिक पर्यावरणों में कार्य संपादन करता है, इन संघर्षो का मूल्यांकन करता है तथा उनसे उत्पन्न होने वाली विभिन्न समस्याओं का सामना करने का प्रयास करता है। 

दबाव एक गत्यात्मक मानसिक/संज्ञानात्मक अवस्था है। वह समस्थिति हो विघटित करता है या एक ऐसा असंतुलन उत्पन्न करता है जिसके कारण उस असंतुलन के समाधान अथवा समस्थिति को पुनः स्थापित करने की आवश्यकता उत्पन्न होती है। दबाव का संप्रत्यय (Concept of Stress ) दबाव का तात्पर्य दबाव और बेचैनी का अनुभव

है। दबाव के कारण स्वयं आप, आपके चारों ओर विद्यमान लोग और वातावरण हो सकते हैं। उदाहरण (Example)—– आपको 8 बजे सुबह ट्रेन पकड़नी है पर आपका ऑटोरिक्शा ट्रैफिक जाम में फँस जाता है। आपको 5 किलोमीटर की दूरी बीस मिनट में पूरी करनी है। आपके हृदय की धड़कन तेज हो गयी है, पसीना आ रहा है, जबड़े भींच रहे हैं, अपनी घड़ी बार-बार देख रहे हैं, भीड़ को कोस रहे हैं और स्पष्ट रूप से नहीं सोच पा रहे हैं।

इस तरह की परिस्थिति एक दबावात्मक स्थिति है जिसमें अपने गंतव्य स्थान पर पहुँचने के लिए आपके ऊपर दबाव बना हुआ है। जिस क्षण आप स्टेशन पहुँच जाते हैं तो आप राहत की साँस लेते हैं। यह राहत आपको उस तनाव का अहसास कराती है जिससे आप गुजर रहे थे और जिससे दबाव पैदा होता है। आजकल जीवन तेज रफ्तार हो गया है और दबाव इतने हैं कि हम सब किसी-न-किसी तरह दबाव की दशा में जी रहे हैं। साथ ही सब लोग दबाव को अच्छी तरह

Q. 2. दवाब के लक्षणों तथा स्रोतों का वर्णन कीजिए। 

Ans. दबाव के लक्षण हर व्यक्ति की दबाव के प्रति अनुक्रिया उसके व्यक्तित्व पालन- पोषण तथा जीवन के अनुभवों के आधार पर भिन्न-भिन्न होती है। प्रत्येक व्यक्ति के दबाव अनुक्रियाओं के अलग-अलग प्रतिरूप होते हैं। दबाव के लक्षण शारीरिक, संवेगात्मक तथा व्यवहारात्मक होते है। कोई भी लक्षण दबाव की प्रबलता को ज्ञापित कर सकता है, जिसका यदि निराकरण न किया जाए तो उसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं।

अर्थात् दबाव या दबाव के कारण उत्पन्न लक्षणों को विभिन्न प्रतिक्रियाओं के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। दबाव के प्रति होने वाली प्रतिक्रियाओं को हम निम्नलिखित श्रेणियों में रखते हैं- 

(i) दैहिक प्रतिक्रियायें, (ii) भावात्मक प्रतिक्रियायें (iii) संज्ञानात्मक प्रतिक्रियायें, (iv) व्यवहारपरक प्रतिक्रियायें। 

Q.5. मनोवैज्ञानिक प्रकार्यों पर दबाव के प्रभाव की व्याख्या कीजिए। 

Ans. मनोवैज्ञानिक दबाव के कुछ प्रमुख स्रोत कुंठा, द्वन्द, आंतरिक एवं सामाजिक दबाव इत्यादि हैं। जब कोई व्यक्ति या परिस्थिति हमारी आवश्यकताओं तथा अभिप्रेरकों को अवरुद्ध करती है, जो हमारे इष्ट लक्ष्य की प्राप्ति में बाधा डालती है तो कुंटा (frustration) उत्पन्न होती है। 

कुंटा के अनेक कारण हो सकते हैं, जैसे- सामाजिक भेदभाव, अंतर्वैयक्तिक क्षति, स्कूल में कम अंक प्राप्त करना इत्यादि दो या दो से अधिक असंगत आवश्यकताओं तथा अभिप्रेरकों में दन्द्र (conflict) हो सकता है। व्यक्तियों के भीतर अन्य परिवर्तन भी होते हैं। दवावपूर्ण स्थिति के साथ चार प्रमुख दबाव के प्रभाव संबद्ध है- 

(i) संवेगात्मक प्रभाव ये व्यक्ति जो दबावग्रस्त होते हैं प्रायः आकस्मिक मनःस्थिति परिवर्तन का अनुभव करते हैं तथा सनकी की तरह व्यवहार करते हैं, जिसके कारण वे परिवार तथा मित्रों से विमुख हो जाते हैं।

(ii) शरीरक्रियात्मक प्रभाव जब मनोवैज्ञानिक दबाव मनुष्य के शरीर पर क्रियाशील होते। है तो शरीर में कुछ हार्मोन चयापचय क्रिया में विशिष्ट परिवर्तन कर देते हैं। 

(iii) संज्ञानात्मक प्रभाव यदि दबाव के कारण दाब निरंतर रूप से बना रहता है तो व्यक्ति मानसिक अतिभार से ग्रस्त हो जाता है।

(iv) व्यवहारात्मक प्रभाव — दबाव के प्रभाव में पड़कर व्यक्ति अपने व्यवहार में एकाग्रता की कमी महसूस करने लगता है। यह नशीले पदार्थों के सेवन करने में खुशी अनुभव करने लगता है। सोने तथा कार्य पूरा करने से यह दूर भागने लगता है।

Q.6. जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए जीवन कौशल कैसे उपयोगी हो सकते हैं, वर्णन कीजिए। 

Ans. जीवन कौशल, अनुकूली तथा सकारात्मक व्यवहार की ये योग्यताएँ हैं जो व्यक्तियों को दैनिक जीवन की मांगों और चुनौतियों से प्रभावी तरीके से निपटने के लिए सक्षम बनाती हैं।- आग्रहिता, समय प्रबंधन, सविवेक चिंतन, संबंधों में सुधार, स्वयं की देखभाल के साथ-साथ ऐसी असहायक आदतों, जैसे- पूर्णतावादी होना, विलंबन या टालना इत्यादि से मुक्ति, कुछ ऐसे जीवन कौशल हैं जिनसे जीवन की धुनीतियों का सामना करने में मदद मिलेगी।

(i) आग्रहिता (assertiveness) आग्रहित एक ऐसा व्यवहार या कौशल है जो हमारी भावनाओं, आवश्यकताओं, इच्छाओं तथा विचारों के सुस्पष्ट तथा विश्वासपूर्ण संप्रेषण में सहायक होता है।

(ii) समय प्रबंधन समय का प्रबंधन तथा प्रत्यायोजित करना सीखने से, दबाव मुक्त होने में सहायता मिल सकती है। समय दबाव कम करने का एक प्रमुख तरीका, समय के प्रत्यक्षण में परिवर्तन लाना है।

(iii) सविवेक चिंतन दबाव संबंधी अनेक समस्याएँ विकृत चिंतन के परिणामस्वरूप उत्पन्न होती हैं। सविवेक चिंतन के कुछ नियम इस प्रकार हैं—अपने विकृत चिंतन तथा अविवेकी विश्वासों को चुनौती देना, संभावित अंतर्वेधी नकारात्मक दुश्चिंता उत्तेजक विचारों को मन से निकालना तथा सकारात्मक कथन करना।

(iv) संबंधों में सुधार संप्रेषण सुदृढ़ और स्थायी संबंधों की कुंजी है। हमें अनुचित ईर्ष्या और नाराजगीयुक्त व्यवहार से दूर रहने की जरूरत होती है।

(v) स्वयं की देखभाल-यदि हम स्वयं को आत्मस्थ, दुरुस्त तथा विश्रांत रखते हैं तो हम दैनिक जीवन के दबावों का सामना करने के लिए शारीरिक एवं सांवेगिक रूप से और अच्छी तरह तैयार रहते हैं।

(vi) असहायक आदतों पर विजयी होना असहायक आदतें जैसे- पूर्णतावाद, परिहार, विलंबन या टालना इत्यादि ऐसी युक्तियाँ हैं जो अल्पकाल तक तो सामना करने में सहायक हो सकती है।

CLASS 12 NCERT SOLUTION IN ENGLISHCLASS12 NCERT SOLUTION IN HINDI
Historyइतिहास
Geography भूगोल
Political science राजनीति विज्ञान
English SubjectResult
Hindi SubjectHistory answer keys

अति लघु उत्तरीय प्रश्न (VERY SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS) 


Q. 1. दवाव की अभियांत्रिकी अवधारणा क्या है ?

Ans. यह बल या शक्ति जिसके धाप या दबाव के कारण किसी भौतिक वस्तु में विकृति या विरूपण आता है उसको अभियांत्रिकी दृष्टिकोण से दबाव कहते हैं। 

Q. 2. डिस्ट्रेस और यूस्ट्रेस में अंतर स्पष्ट कीजिए। 

Ans. किसी दबाव के नकारात्मक या हानिकारक प्रभाव को डिस्ट्रेस कहते हैं और पनात्मक या सकारात्मक प्रभाव को यूस्ट्रेस कहते हैं।

Q. 3. प्राथमिक और द्वितीयक मूल्यांकन का क्या अर्थ है ?

Ans. कोई घटना दबाव युक्त है या नहीं अथवा यदि है तो वह किस हद तक हानिकारक हो सकती है इसका मूल्यांकन प्राथमिक मूल्यांकन कहलाता है। प्राथमिक मूल्यांकन के बाद दबाव का सामना करने हेतु संसाधनों की समीक्षा करना द्वितीयक मूल्यांकन कहा जाता है।

Q. 4. दबाव का सामना करने में दबाव के वैयक्तिक मूल्यांकन का क्या महत्त्व है ? 

Ans. यदि व्यक्ति किसी दबाव का मूल्यांकन दुर्बल रूप में करता है अथवा उससे निबटने में अपने को सक्षम समझता है तो समायोजन करना सहज होता है। ठीक इसके विपरीत मूल्यांकन करने पर समायोजन की समस्या उत्पन्न होती है। इस प्रकार के मूल्यांकन में वैयक्तिक विभिन्नता देखी जाती है।

Q.5. दबाव के मुख्य स्रोत कौन-कौन से हैं?

 Ans. दबाव के मुख्य स्रोत हैं मानसिक आघात से संबंधित पटनाएँ, जीवन की नई घटनाएँ, उलझनें ।

Q. 6. मनोवैज्ञानिक दबाव के स्रोत बताइए ।

Ans. मनोवैज्ञानिक दबाव के स्रोत आंतरिक और वैयक्तिक होते हैं। इनमें कुंठा, मानसिक द्वंद्व, दबाव, तनाव आदि सम्मिलित हैं।

Q.7. आत्मरक्षात्मक समाधान किसे कहते हैं ? 

Ans. दबाव के कारण उत्पन्न सांवेगिक क्षति या अवमूल्यन से बचने हेतु अचेतन स्तर पर कुछ युक्तियों का सहारा लिया जाता है। इसे ही आत्मरक्षात्मक समाधान कहते हैं। जैसे-दमन, क्तिकरण आदि।

Q.8. ‘बर्न आउट’ से क्या तात्पर्य है ?

Ans. दीर्घकालिक और निरंतर चलने वाली दबाव के प्रति प्रतिक्रिया करते रहने के फलस्वरूप व्यक्ति की ऊर्जा की क्षति होती है और वह परिश्रांति या निःशेष की अवस्था को प्राप्त करता है। अत्यधिक थकान और शारीरिक क्षीणता का अनुभव होता है। इसे ही तकनीकी भाषा में ‘बर्न आउट’ कहते हैं।

Q.9. जी. ए. एस. क्या है? यह संप्रत्यय किसका है ?

Ans. हंस सेली ने दबाव के शारीरिक परिणामों की व्याख्या के लिए जी.ए.एस. मॉडल प्रस्तावित किया है जिसे सामान्य अनुकूलन सिंड्रोम (General Adaptation Syndrome) कहते हैं। यह तीन चरणों का सिद्धांत है जिसमें क्रमश: संकेत, प्रतिरोध एवं परिश्रांति नामक चरण शामिल हैं।

Q. 10. प्रतिरक्षण प्रणाली किसे कहते हैं ?

Ans. प्रतिरक्षण प्रणाली किसी प्रकार के बाह्य या आंतरिक कारणों से दैहिक संतुलन पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों से रक्षा प्रदान करने वाली प्रणाली को कहते हैं जो बाह्य प्रतिजनों—बैक्टीरिया, वायरस, अन्यान्य सूक्ष्म जीव आदि से उत्पन्न संकटों से रक्षा करने हेतु तत्पर होते है । 

Q. 11. परिक्षांति की अवस्था की संक्षिप्त व्याख्या कीजिए । 

Ans. दबाव की वृद्धि अथवा प्रतिरोध की क्षमता की कमी के कारण शारीरिक रूप है रुग्णावस्था को ही परिश्रांति की अवस्था कहते हैं। इस अवस्था में कभी-कभी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है। 

Q. 12. जीवनशैली स्वास्थ्य से किस प्रकार संबंधित है ? 

Ans. स्वास्थ्य अनुकूल जीवनशैली से व्यक्ति हर तरह से आत्मस्ति-बोध का अनुभव करता है। लेकिन जीवनशैली जब प्रदूषित रहती है तो आत्मस्तिबोध का अनुभव नहीं होता है। व्यक्ति के सकारात्मक स्वास्थ्य पर इसका बुरा प्रभाव पड़ता है। 

Q. 13. जीवनशैली में आहार का महत्त्व बताइए।

Ans. आत्मस्थ और सुखी जीवन में आहार का सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान है। इसके शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य, वैचारिक शुद्धता, सकारात्मक सोच, संज्ञानात्मक क्षमता एवं व्यवहार—सभी पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है। शाकाहारी भोजन सबसे सुरक्षित और स्वास्थ्यवर्धक माना जाता है। 

Q. 14. आत्मस्तिबोध किसे कहते हैं ?

Ans. आत्मस्तिबोध का अर्थ है— शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक एवं वैचारिक रूप से भला चंगा अनुभव करना । 

Q. 15. सकारात्मक स्वास्थ्य किसे कहते हैं ?

Ans. स्वास्थ्यपूर्ण शारीरिक, मानसिक, सामाजिक तथा आध्यात्मिक आत्मस्तिबोध के अवस्था को सकारात्मक स्वास्थ्य कहते हैं।

Q. 16. आत्मस्तिबोध को सुसाध्य बनाने वाले प्रमुख कारक कौन-कौन हैं

Ans. आत्मस्तिबोध को सुसाध्य बनाने वाले प्रमुख कारकों में आहार और व्यायाम का प्रमुख स्थान है।

Q. 17. समायोजन क्या है ?

Ans. भौतिक एवं पर्यावरणीय परिवेश में सामंजस्य बनाए रखने को समायोजन कहते हैं। 

Q. 18. समायोजित किसे कहते हैं ?

Ans. जब एक व्यक्ति का व्यवहार अथवा उसका प्रत्यक्ष निष्पादित उस समूह के सदस्यों की प्रत्याशाओं के अनुसार होता है, जिससे वह जुड़ा होता है, तब हम उस व्यक्ति को समायोजित कहते हैं।


लघु उत्तरीय प्रश्न (SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS)


Q. 1. समायोजन क्या है ?

Ans. मनुष्य एक सामाजिक और भौतिक परिवेश में जन्म लेता है और फलता-बढ़ता जीवन का संचालन पर्यावरण की अपेक्षाओं तथा उन अपेक्षाओं को पूरा करने के लिये मनुष्य प्रयासों के बीच संतुलन या सामंजस्य पर निर्भर करता है। 

परिवेश की अपेक्षाओं के कारण व्यक्ति मनोवैज्ञानिक द्वारा की गयी अनुकूलनपरक अनुक्रियाओं तथा इसके साथ सामंजस्य बनाये रखने को ही समायोजन कहा जाता है। उदाहरण के लिये, जैसे ही वायुमण्डलीय तापक्रम में परिवर्तन होता है तो संतुलन बिरंग जाता है और हमारी शारीरिक क्रियाएँ कुछ इस प्रकार की होने लगती है, जिनसे शारीरिक तापक्रम तथा वायुमंडलीय तापक्रम के बीच पुनः सामंजस्य स्थापित होने लगता है।

Q. 2. दबाव से आप क्या समझते हैं? एक उदाहरण दीजिए। 

Ans. दबाव का तात्पर्य दबाव और बेचैनी का अनुभव है। दबाव के कारण स्वयं आप, आपके चारों ओर विद्यमान लोग और वातावरण हो सकते हैं। यदि आपकी फसल पकी है, कटाई की तैयारी हो रही है और तभी भारी वर्षा हो जाती है। तो आप असहाय और चिंतित हो उठते हैं। यहाँ पर आपका मनोबल वातावरणजन्य होता है।

Q. 3. दबाव के प्रति होने वाली विभिन्न प्रतिक्रियाओं का उल्लेख कीजिए । 

Ans. दबाव के प्रति होने वाली प्रतिक्रियाओं को हम निम्नलिखित श्रेणियों में रखते हैं-

(i) दैहिक प्रतिक्रियायें, (ii) भावात्मक प्रतिक्रियायें, (iii) संज्ञानात्मक प्रतिक्रियायें, (iv) व्यवहारपरक प्रतिक्रियायें ।

(i) दैहिक प्रतिक्रियायें—इसके अंतर्गत थे दैहिक प्रकार्य आते हैं जो दबाव से प्रभावित होते हैं और सामान्य रूप से कार्य नहीं करते। दबाव के प्रति होने वाली व्यक्ति की सामान्यतः होने वाली प्रतिक्रियाओं में निम्नलिखित मुख्य है— 

(क) हृदय का तेजी से धड़कना, (ख) पेशियाँ तन जाना, (ग) गला और मुँह सूखना, (घ) पेट में बीमारी होने का अहसास होना, (ङ) थरथराहट आदि ।

(ii) भावात्मक प्रतिक्रियायें भावात्मक प्रतिक्रियाओं में चिंता, अवसाद, क्रोध, बेचैनी, संवेगों पर नियंत्रण की कमी आदि सम्मिलित होते हैं।

(iii) संज्ञानात्मक प्रतिक्रियायें – दबाव के प्रति संज्ञानात्मक प्रतिक्रियाओं में निम्नलिखित सम्मिलित होते हैं—

(क) ध्यान केन्द्रित करने में कठिनाई, 

(ख) किसी भी नई चीज को समान गति और क्षमता से सीखने में असमर्थता, 

(ग) विस्मरण, 

(घ) समय पर सही निर्णय लेने में कठिनाई, 

(ङ) संशय, 

(च) विचारों में उलझाव, 

(छ) ऋणात्मक या आत्मस्थ विचार। 

(iv) व्यवहारपरक प्रतिक्रियायें— 

(क) चिल्लाना, 

(ख) असम्बद्ध बातचीत, 

(ग) अप्रासंगिक बातें, 

(घ) चोट पहुँचाना, 

(ङ) तोड़-फोड़ करना आदि। 

Q.4. दबाव के स्रोतों का उल्लेख कीजिए।

Ans. दबाव के स्रोतों को चार श्रेणियों में रखा जा सकता है, जो इस प्रकार हैं- 

(i) परिवार –यदि परिवार के एक सदस्य की गंभीर बीमार के कारण आप दबाव का अनुभव करते हैं तो आपके दबाव का स्रोत परिवार है।

(ii) व्यावसायिक / शैक्षिक—एक छात्र के लिए दबाव परीक्षा या छात्रावास आदि हो सकता है। कम वेतन तथा अधिक काम लेने वाला अधिकारी, असहयोगी सहकर्मी और सहायक, खराब कार्य दिशा, कुछ व्यावसायिक दबाव हैं।

(iii) व्यक्तिगत दबाव व्यक्तिगत दबाव कई होते हैं। व्यक्तिगत दबाव के आधार पर अनुपयुक्तता, हीनता और असुरक्षा हैं। जैसे— “मेरी स्मृति कमजोर है”, “में काला हूँ”, “मैं मोटा हूँ”, “मैं गरीब हूँ”, “मैं बुद्धमान नहीं हूँ” आदि। इनके कारण व्यक्ति स्वयं को अनुपयुक्त या असुरक्षित महसूस करता है।

(iv) पर्यावरणागत–अप्रत्याशित प्राकृतिक आपदायें जैसे—अकाल, भूकंप, बाढ़ आदि पर्यावरणीय दबाव होते हैं। 

Q.5. समाधान युक्ति क्या है ? विभिन्न युक्तियों को समझाइये। 

Ans. व्यक्ति जब दबाव का अनुभव करते हैं तो वे प्रायः कार्य में परिवर्तन करते हैं चाहे वे दफ्तर में हैं या कहीं अन्य जगह हैं। जैसे बाहर जाकर चाय पीना, सिगरेट पीना, गपशप करना आदि। इससे समस्या कम हो जाती है। लेकिन हर प्रकार के दबाव में यही युक्तियाँ काम ना

आती हैं। 

आत्मस्थ या धनात्मक समाधान युक्तियाँ वे हैं जो दबाव को कम करने में सहायक होत हैं। कुछ आत्मस्थ घनात्मक समाधान युक्तियाँ इस प्रकार हैं—तार्किक चिंतन, विवेचन, उदात्तीकरण 

(i) तार्किक चिंतन मान लीजिए एक दुर्घटना में आपको कुछ चोट लग जाती है आपको चिंतित या भयभीत होने के बदले आपको यह सोचना चाहिए कि भगवान की कृपा

कि मेरे हाथ-पैर नहीं टूटे, सही सलामत रहे हैं और आगे भविष्य में में सावधान रहूंगा।

(ii) विवेचन – आप अपने और आपके मित्र के बीच उत्पन्न गलतफहमी को किसी तीसरे मित्र की सहायता से बातचीत करके सुलह कर सकते हैं।

(iii) उदात्तीकरण — एक दम्पत्ति जिसने अपना अकेला बच्चा खो दिया था, ने एक अनाथालय चलाना शुरू कर दिया। वे अपने कष्ट को रचनात्मक ढंग से उदात्त बनाकर ऐसे बच्चों की सेवा कर रहे हैं जिनके अभिभावक नहीं हैं।

Q.6. दबावक और दबाव प्रतिक्रियाओं को उचित उदाहरण द्वारा परिभाषित कीजिए। 

Ans. दबावक वे घटनायें होती हैं अथवा वे दशायें होती हैं जिनके प्रति लोगों की प्रतिक्रिया करना आवश्यक होता है। जैसे बस की सवारी करना या कोई साक्षात्कार। अर्थात् दबाव किसी दशा या सांवेगिक स्थिति के फलस्वरूप पैदा होता है। 

दबाव घटक ही दबावक कहलाते हैं। सामान्यतः दबाव प्रतिक्रियायें इस प्रकार से होती हैं-ऊबना, कुंठा, द्वंद्व कार्यों को पूरा करने का दबाव, समय सीमा का समाप्त होना, बढ़े हुए दायित्व, तलाक, कर्ज का भार ।

Q. 7. दबाव से आप क्या समझते हैं ? प्रतिक्रियायें तथा समाधान के उपाय बताइये।

Ans. दबाव का संप्रत्यय (Concept of Stress ) दबाव का तात्पर्य दबाव और बेचैनी का अनुभव है। दबाव के कारण स्वयं आप, आपके चारों ओर विद्यमान लोग और वातावरण हो सकते हैं। उदाहरण (Example) आपको 8 बजे सुबह ट्रेन पकड़नी है पर आपका ऑटोरिक्शा ट्रैफिक जाम में फँस जाता है। 

आपको 5 किलोमीटर की दूरी बीस मिनट में पूरी करनी है। आपके हृदय की धड़कन तेज हो गयी है, पसीना आ रहा है, जबड़े भींच रहे हैं, अपनी घड़ी बार-बार देख रहे हैं, भीड़ को कोस रहे हैं और स्पष्ट रूप से नहीं सोच पा रहे हैं। इस तरह की परिस्थिति एक दबावात्मक स्थिति है जिसमें अपने गंतव्य स्थान पर पहुँचने के लिए आपके ऊपर दबाव बना हुआ है। 

जिस क्षण आप स्टेशन पहुँच जाते हैं तो आप राहत की साँस लेते हैं। यह राहत आपको उस तनाव का अहसास कराती है जिससे आप गुजर रहे थे और जिससे दबाव पैदा होता है। आजकल जीवन तेज रफ्तार हो गया है और दबाव इतने हैं कि हम सब किसी-न-किसी तरह दबाव की दशा में जी रहे हैं। 

साथ ही सब लोग दबाव को अच्छी तरह व्यवस्थित या नियंत्रित नहीं कर पाते हैं। इसलिये यह जानना चाहिये कि दबाव के स्रोत कौन से हैं और उनसे कैसे निपटा जाये।

Q. 8. दबाव के फलस्वरूप पैदा होने वाले स्वास्थ्य संबंधी विकृतियों (शारीरिक व मानसिक) का उल्लेख कीजिए ।

Ans. दबाव के कारण उत्पन्न अनेक शारीरिक विकृतियाँ इस प्रकार हैं-वाणी की समस्या जैसे हकलाना, योनगत समस्या जैसे नपुंसकता, ठंडापन, हृदय रोग, सिरदर्द, मितली आना, चक्कर आना, पसीना आना, उच्च रक्तचाप आदि । मानसिक विकृतियाँ हैं— सरल दुर्भीति, सामाजिक दुर्भाति मंच का भय, अवसाद, तनाव, सिरदर्द, हिस्टीरिया, अल्पनिद्रा, क्रोध बढ़ जाना, घृणा, ईर्ष्या बढ़ जाना आदि । 

Q.9. दैनिक जीवन में दबाव की समस्या से कैसे निपटा जा सकता है ?

Ans. हम दैनिक जीवन में दबाव की समस्या से राहत पा सकते हैं यदि नियमित प्रातः शारीरिक व्यायाम किया जाए, मॉर्निंग वाक किया जाए, क्रमिक विश्राम किया जाए, ध्यान योग अपनाया जाए, सकारात्मक ढंग से सोचा जाए, सामाजिक कार्य किये जाएँ आदि। इनके अतिरिक्त भी उपाय हैं, जैसे—समय प्रबंध, प्रतिफल न्यूनीकरण कार्यक्रम |

Q. 10. त्रासदी के पश्चात् वाली दवाव विकृति क्या है ? 

Ans. यह एक कम मात्रा में पायी जाने वाली विकृति है। यह विकृति भयंकर त्रासदी के गुजरने के बाद होने वाली दबाद विकृति है। इसके लक्षण है— चिंता, सन्देह, लंबित तनाव, निद्रा की विकृतियाँ, दुःस्वप्न तथा अपने को अलग करने का व्यवहार करना आदि। 

यह अक्सर तब होती है जब कोई किसी त्रासदी जैसे सड़क या अन्य गंभीर दुर्घटना, शारीरिक या मानसिक रूप से शिकार होने जैसे बलात्कार या यौन शोषण या प्रियजन की मृत्यु आदि घटित हो ।

Q. 11. योग और ध्यान से व्यक्ति किस प्रकार के लाभ प्राप्त करता है ? 

Ans. योग और ध्यान शरीर के लगभग सभी क्रिया-कलापों, जैसे साँस लेना, नाड़ी की गति, रक्त चाप, हार्मोन का स्राव, मल उत्पादों का विकास आदि को नियमित करते हैं। ये ऋणात्मक संवेगों जैसे क्रोध, चिंता, अवसाद तथा ईर्ष्या आदि से उबरने में व्यक्तियों की सहायता करते हैं। योग तथा ध्यान सकारात्मक सोच, विचारों में स्पष्टता, सीखने की गति तथा अवधान के स्तर को बढ़ाते हैं। 

Q. 12. समय प्रबंध की पद्धति का वर्णन कीजिए।

Ans. समय प्रबंध की तकनीकों में मुख्यतः तीन सम्मिलित हैं-

1. क्षमता, 

2. नियोजन तथा 

3. वरीयता का निर्धारण क्षमता को साधारण नोट, कार्य सूची, आदि की सहायता से बढ़ाया जाता है। नियोजन के अंतर्गत तैयारी, लक्ष्य निर्धारण, भविष्य की घटनाओं और क्रियाकलापों का क्रम निर्धारण आदि आते हैं। आवश्यकता के अनुरूप नियोजन एवं वरीयता निर्धारण, दबाव को कम करता है। यदि निश्चित किये गये कार्यों को अ, ब, स द श्रेणियों में वर्गीकृत करना हो, यदि कार्यों को यथार्थ और उचित समय बजट के अनुसार करना हो तो समय अत्यंत प्रभावी हो जाता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (LONG ANSWER TYPE QUESTIONS)

Q. 1. दबाव के प्रति प्रतिक्रियाएँ तथा समाधान के उपाय बताइए।

Ans. दबाव के प्रति प्रतिक्रियायें (Reaction to Stress ) दबाव की प्रतिक्रियाओं को निम्नांकित श्रेणियों में रखा जा सकता है- 

(i) दैहिक प्रतिक्रियायें (Physical Reactions) इसके अंतर्गत वे दैहिक प्रकार्य आते हैं जो दबाव से प्रभावित होते हैं और सामान्य रूप से कार्य नहीं करते। 

दबाव से प्रभावित होने वाली व्यक्ति की सामान्यतः होने वाली प्रतिक्रियाओं में निम्नांकित प्रमुख हैं- 

(क) हृदय का तेजी से धड़कना, 

(ख) पेशियाँ तन जाना, 

(ग) गला और मुँह का सूखना, 

(घ) पेट में बीमारी होने पर अहसास (टेट भाषा में कहें तो पेट में तितलियों का होना जैसे), 

(ङ) थरथराहट इत्यादि ।

आमतौर पर शरीर व्यवस्था सबसे कमजोर और संवेदनशील भाग दबाव द्वारा सबसे पहले प्रभावित होता है। इसलिये जो लक्षण दिखते हैं उन्हें मनोदैहिक प्रतिक्रियायें कहते हैं। जैसे—यदि श्वसन व्यवस्था दुर्बल है तो दबाव इस पर आक्रमण करता है और अस्थमा इसका परिणाम हो सकता है। ऐसे ही यदि पाचनतंत्र दुर्बल है तो वह दबाव के आक्रमण का लक्ष्य हो सकता है। इसके फलस्वरूप अल्सर हो सकता है। इस तरह हर व्यवस्था दबाव का प्रभाव दिखा सकती है और विभिन्न प्रकार के लक्षण जैसे रक्तचाप, थरथराहट, उदर पीड़ा, सिर दर्द, जोड़ों में दर्द तथा तुतलाना आदि पैदा होते हैं।

(ii) भावात्मक प्रतिक्रियायें (Emotional Reactions ) — भावात्मक प्रतिक्रियाओं में चिंता, अवसाद, क्रोय, बेचैनी, संवेगों पर नियंत्रण की कमी आदि सम्मिलित होता है। 

(iii) संज्ञानात्मक प्रतिक्रियायें (Cognitive Reactions ) दबाव के प्रति संज्ञानात्मक प्रतिक्रियाओं में निम्नलिखित सम्मिलित हैं—

(क) ध्यान केन्द्रित करने में कठिनाई, 

(ख) किसी भी चीज को समान गति और क्षमता से सीखने में समर्थता, 

(ग) विस्तरण, 

(घ) सही निर्णय लेने में, वह भी समय पर कठिनाई।

व्यवहारपरक प्रतिक्रिया हेतु (For Behavioural Reactions) – जब आप किसी व्यक्ति

पर क्रुद्ध हों तो वह स्थान छोड़ दीजिये। दो गिलास ठंडा पानी पीजिये। पढ़ने, टहलने या संगीत सुनने आदि के द्वारा अपना ध्यान वाँटिये।

Q. 2. दबाव का स्वास्थ्य पर प्रभाव तथा उससे राहत के उपाय बताइये । 

Ans. दबावक एवं दबाव प्रतिक्रियाएँ (Stressers and Stress reactions) दबावक ये घटनाएँ हैं और दशायें हैं (जैसे बस की सवारी या साक्षात्कार) जिनके प्रति लोगों को प्रतिक्रिया करना आवश्यक होता है।

दबाव प्रतिक्रियायें वे शारीरिक, मानसिक और व्यवहारपरक अनुक्रियायें (जैसे उबकाई, घबराहट तथा थकान ) हैं जिन्हें व्यक्ति दबाव के स्रोतों की उपस्थिति में दिखाता है। उदाहरण- सुनीता को दो घंटे भीड़ भरी बस में रोज यात्रा करनी पड़ती है। बाहर में मौसम गर्म और सूखा है। जल्दीबाजी में वह अपना लंच रखना भूल गयी है। बस के अंदर कंडक्टर के साथ किसी छोटी-सी बात पर झगड़ा कर बैठती है। 

बस अपने निश्चित समय से पीछे चल रही है। जब तक सुनीता अपने गंतव्य तक पहुँचती है वह थकी, बेचैन, अवसादग्रस्त, निढाल सी हो चुकी है। अब यह बात अच्छी तरह स्पष्ट रूप से सबको ज्ञात है कि आधुनिक युग में लोग प्रचुर मात्रा में दबाव के रोगों से ग्रस्त हैं। दबाव जीवन का आधारभूत हिस्सा बन गया है।

दबाव तथा स्वास्थ्य पर इसका प्रभाव (Effect of Stress on Health) ऐसे संकेत मिले हैं कि मानव रोगों में से 7.5% दबाव के कारण हैं। दबाव की अवधि में चिंता और बेचैनी सामान्य लक्षण मिलते हैं। जब ये तीव्र और आदत बन जाते हैं तब दुर्भीति बन जाते हैं। दुर्भीति किसी वस्तु, व्यक्ति, पशु या किसी परिस्थिति का तर्कहीन भय होता है। 

व्यक्ति जब दुर्भीति की स्थिति के निकट आता है तो अनावश्यक रूप से चिंतित महसूस करता है और इसलिये उससे हमेशा बचना चाहता है। आमतौर पर पाई जाने वाली कुछ दुर्भातियाँ है

(i) सामाजिक दुर्भीति—–— जन समुदाय को संबोधित करने की दुर्मीति (मंच का भय ) ।

(ii) बंद स्थान दुर्भीति — इसमें बंद जगह का भय होता है। चिंता भविष्य में आने वाले खतरों और भय की अप्रिय और अस्पष्ट अनुभूति है। कई तरह की चिंताओं वाला व्यक्ति सदैव अस्पष्ट, चिंतन करने में संशयग्रस्त और निर्णय से वाणी दोष जैसे तुतलाना और रुक-रुक कर बोलना, पेशाब की समस्यायें जैसे बिस्तर पर पेशाब कर देना बच्चों में पाई जाती है।

Q. 3. दबाव के विभिन्न प्रकारों का वर्णन करें।

Ans. ‘दबाव’ का क्षेत्र व्यापक है। व्यक्ति को जीवनकाल में अनेक प्रकार के दबावों का सामना करना पड़ता है। दूसरे, क्षेत्र की व्यापकता के आलोक में दबावों को प्रकारों में बाँटना अत्यंत ही दुरुहपूर्ण कार्य है। फिर भी, मोटे तौर पर इसे तीन मुख्य प्रकारों में बाँटकर समझने का प्रयास किया जा सकता है। इन तीनों प्रकारों का वर्णन यहाँ किया जा रहा है— 

1. वातावरणीय पर्यावरणीय) दबाव (Environmental Stress ) व्यक्ति जिस वातावरण में रहता है, उसमें अप्रत्याशित रूप से कुछ इस प्रकार का बिसंतुलन (disequilibrium) उत्पन्न होता है जो प्रलयंकारी या विध्वंसक फलस्वरूप का (Catastrophic nature) का होता है, 

जैसे- भूचाल, बाढ़, आग, भूस्खलन, चक्रवात, बवंडर, वज्रपात आदि वातावरण में होनेवाले ये परिवर्तन अत्यधिक तीव्र और अप्रत्याशित अथवा आकस्मिक फलस्वरूप के होते हैं। इन घटनाओं का

प्रभाव भी व्यापक होता है, क्योंकि एक साथ अनेक लोग प्रभावित होते हैं। 

2. सामाजिक दबाव (Social Stress ) कुछ सामाजिक घटनाएँ, जैसे—परिवार में किसी की मृत्यु, बीमारी, विवाह विच्छेद, तनावपूर्ण संबंध, अलगाव, प्रतिकूल पड़ोसी आदि ‘सामाजिक दबाव’ के उदाहरण है। इनमें से अधिकतर ‘जीवन के प्रमुख दबाद’ होते हैं, जो व्यक्ति को जीवन के विभिन्न अवसरों पर प्रभावित करते हैं। 

इस प्रकार के दबावों के अनुभव में वैयक्तिक विभिन्नता पाई जाती है। कुछ लोग गंभीर बीमारी की समस्या से बुरी तरह प्रभावित होते हैं जिन्हें दीर्घकालिक समायोजन के लिए सोचना पड़ता है, जबकि कुछ लोग ऐसी घटनाओं को सामयिक मानते हैं। इस वर्ग में कुछ घटनाएँ दैनिक उलझन फलस्वरूप की होती है जिनके कारण खीझ या चिड़चिड़ापन उत्पन्न होता है। इन घटनाओं को दबाव के रूप में केवल वे लोग अनुभव करते हैं जिनके साथ ये घटनाएँ घटित होती हैं। 

जैसे—रोज-रोज का पति-पत्नी में मनमुटाव, बच्चों की शरारत से उत्पन्न चिढ़, बच्चों के साथ दुर्व्यवहार, संपत्ति के लिए भाई-भाई के झगड़े, पड़ोसियों से मन मनुटाव आदि। कुछ लंबे समय तक निरंतर रूप से यदि इस तरह की घटनाएँ होती रहती हैं तो इन घटनाओं का दबावात्मक प्रभाव तीव्र फलस्वरूप ग्रहण कर लेता है जिसका ऋणात्मक प्रभाव भी गंभीर ढंग का होता है, जैसे—परिवार या समाज का परित्याग, आत्महत्या, हिंसात्मक झगड़े आदि । कभी-कभी इन घटनाओं का बुरा असर मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर भी पड़ता है, जैसे— रक्तचाप की बीमारी, हृदयाघात, मानसिक अवसाद आदि ।

3. मनोवैज्ञानिक दबाव (Psychological Stress) — इस तरह के दबाव का अनुभव केवल व्यक्ति विशेष को ही होता है। इसलिए यह वैयक्तिक (personal) होता है। इस प्रकार के दबाव का मुख्य स्रोत भी आंतरिक होता है। ये आंतरिक स्रोत प्रायः कुंठा या निराशा, मानसिक संघर्ष या द्वंद्व, तनाव आदि होते हैं। मनोवैज्ञानिक दबाव को समझने के लिए मानसिक दबावकों, यथा— निम्नलिखित पर विचार करना चाहिए।

(i) कुंठा (Frustration ) किसी आवश्यकता या प्रेरणा के बाधित होने पर अथवा संतुष्ट नहीं होने पर कुंठा या निराशा उत्पन्न होती है। प्रेरणा की संतुष्टि के मार्ग में उत्पन्न अवरोध के अतिरिक्त वांछित लक्ष्य (desired goal) की अनुपस्थिति भी निराशा उत्पन्न करती है। 

उदाहरण के लिए, मान ले कोई छात्र स्कूल द्वारा आयोजित पिकनिक पर जाना चाहता है लेकिन माता-पिता के कठोर अनुशासनात्मक बंधन के कारण उसकी यह ‘चाह’ (desire) बाचित (obstruct) होती है जिसके फलस्वरूप वह छात्र पिकनिक का आनन्द उठाने से वंचित (deprived ) होता है। यह स्थिति उस छात्र के लिए निराशाजनक (frustrating) होगा। 

Q.5. जीवन-शैली और स्वास्थ्य पर प्रकाश डालें। 

Ans. ‘दबाव’ (stress) का व्यक्ति के सामान्य स्वास्थ्य पर सीधा प्रभाव पड़ता है। अध्ययनों से इस बात के यथेष्ट प्रमाण मिले हैं कि दबाव और स्वास्थ्य में गहरा संबंध है। आधुनिक समय में हृदय संबंधी रोग, उच्च रक्त चाप, मधुमेह आदि खतरनाक रोगों के अन्यान्य कारणों के अतिरिक्त ‘दबाव’ को एक सर्वथा महत्त्वपूर्ण कारण माना जाता है। दबाव के कारण इन बीमारियों के बढ़ने की संभावना बहुत अधिक रहती है। 

आधुनिक समय की भागदौड़, बढ़ती हुई प्रतिस्पर्धाएँ, जीवन शैली में बदलाव, समस्याओं और चुनौतियों के अंबार आदि के परिप्रेक्ष्य में यह आश्चर्य की बात है कि कैसे कुछ लोग 100 वर्षों से भी अधिक समय तक जीवित रहते हैं। यह मानी हुई बात है कि स्वास्थ्यवर्धक आहार (healthy diet). 

जैविक प्रभाव (biological effects), पारिवारिक स्थायित्व (stability of family) एवं व्यक्तित्व की विशेषताओं की मानव जीवन के विस्तार एवं अच्छे स्वास्थ्य को बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका रहती है। इसलिए ‘जीवन कला’ (Art of Living—AOL) में इस बात पर विशेष जोर दिया जाता है कि संतुलनकारी जीवन- शैली अपना कर व्यक्ति न केवल दीर्घायु (long life) बल्कि मानसिक और शारीरिक रूप से अत्मस्थ जीवन को बरकरार रख सकता है। यह संतुलन कम चर्बीयुक्त आहार, नियमित परिश्रम, ए अग्रता का अभ्यास तथा जीवन के बाद के वर्षों में अनवरत क्रियाशीलता की सम्मिलित कर प्राप्त किया जा सकता है।

व्यक्तियों में वैयक्तिक विभिन्नता का होना एक चिरंतन सत्य है। यह विभिन्नता केवल उनके जैविक, सामाजिक एवं वैयक्तिक विशेषताओं या गुणों में ही नहीं अपितु जीवन शैली ( life style) में भी देखी जाती है। कुछ लोग या कहें, अधिकतर लोग अपनी जीवन शैली में कुछ ऐसी आदतों (habits) को सम्मिलित कर लेते हैं जिसका उसके आत्मस्थ जीवन के लिए हानिकारक होती है। इस तरह मनुष्य स्वयं अपना शत्रु होता है तथा ऐसी जीवन शैली अपना लेता है जिसका उसके स्वास्थ्य पर बहुत ही बुरा असर पड़ता है और शीघ्र ही खतरे की घंटी बजने लगती है। 

उदाहरणार्थ, सिगरेट का सेवन (smoking), मादक द्रव्यों का सेवन (drug addictions), शराब पीने की लत ( alcoholism), अआत्मस्थकर आहार (unhygenic food habits), सांवेगिक अपरिपक्वता (emotional immaturity), दिनचर्या की अनियमितता (irregularity in daily routine), आदि आधुनिक जीवन शैली के अभिन्न अंग बन गए हैं। 

Q. 6. दबाव प्रबंधन की कुछ प्रमुख विधियों का विवेचन करें।

Ans. दबाव (stress) को ‘प्रच्छन्नहंता’ (silent killer) कहा जाता है जो मौन रूप से (चुपचाप) धीरे-धीरे व्यक्ति को मारता है। चिकित्सा जगत में उपलब्ध आँकड़े यह बताते हैं कि 50-70% घातक बीमारियाँ दबाव के कारण होती हैं और लगभग 40% मृत्यु दबाव के फलस्वरूप होती हैं। घातक बीमारियों में हृदय रोग, उच्च रक्तचाप, मधुमेह, गुर्दा संबंधी रोग, आँत की बीमारियाँ आदि प्रमुख हैं। 

दबाव के बढ़ते ऋणात्मक प्रभावों को देखते हुए आजकल ‘दबाव प्रबंधन’ (stress management) संबंधी प्रशिक्षण पर विशेष बल दिया जाने लगा है। विद्यालयों, कार्यालयों तथा विभिन्न समूहों के लोगों में दबाव प्रबंध की विविध विधियों के प्रति रुझान बढ़ा है। इन विधियों को आधुनिक समय में ‘जीने की कला’ (Art of Living-AOL) की संज्ञा दी जाती है जिसकी कई तकनीकें हैं। इनमें से कुछ तकनीकें नीचे दी जा रही हैं-

1. संज्ञानात्मक व्यवहारपरक (Cognitive Behavioural) प्रविधि – इन विधियों द्वारा लोगों को दबाव का विरोध करने हेतु मानसिक रूप से तत्पर होने का अभ्यास कराया जाता है। इसमें दबाव के फलस्वरूप, इनके प्रभावों आदि की सम्यक् जानकारी के माध्यम से ‘संज्ञानात्मक दोष’ को विकसित करने तथा दबाव का सामना करने हेतु उपयुक्त विधियों का प्रशिक्षण दिया जाता है। इस प्रविधि के तीन चरण होते हैं— ‘शिक्षण’, ‘प्रशिक्षण’ एवं ‘अभ्यास’ शिक्षण की अवस्था में प्रयोज्य (subject) को दबाव के फलस्वरूप और उसके प्रभावों की जानकारी दी जाती है। इससे दबाव के लक्षणों की जानकारी में मदद मिलती है ताकि दबाव का संज्ञानात्मक बोध विकसित हो सके।

2. बायोफीडबैक (Biofeedback ) – यह दबाव के दैहिक पक्षों को नियंत्रित करने की प्रक्रिया में शरीर की क्रियाशीलता की सम्यक् जानकारी तथा उसे नियंत्रित करने का प्रशिक्षण दिया जाता है। योगाभ्यास एवं सहयोग जैसी प्रविधियाँ इसके उदाहरण हैं जिनकी सहायता से दबाव के प्रति की जाने वाली प्रतिक्रियाएँ सुसंगठित होती हैं जो दबाव के प्रभावों को कम करने में सहायक होती हैं।

3. शिथिलीकरण (Relaxation)— दबाव के विपरीत की स्थिति को शिथिलीकरण कहते हैं। इसमें पेशीय तनाव को कम कर दवाव तथा उससे उत्पन्न तनाव को कम किया जाता है। सामान्यतया शरीर के नीचे के हिस्से से प्रारंभ कर ऊपर के हिस्से को शिथिल किया जाता है। कभी-कभी घंटों निश्चित होकर शयन करने के अभ्यास द्वारा भी शिथिलीकरण किया जाता है। गहरी साँस लेना और छोड़ना भी श्वसन क्रिया पर नियंत्रण करने तथा उसे शिथिल (सहज) करने की एक विधि है। प्राणायाम इसी प्रविधि का एक रूप है।

4. अभ्यास (Exercise) — एरोबिक अभ्यास, तैरना, सैर करना, आसन, नृत्य, रस्सी कूदना, ब्रह्म बेला में टहलना, खुली जगहों में सैर-सपाटा करना आदि दबाव के प्रभाव को कम करने में सहायक होते हैं। इस प्रकार के अभ्यासों का उपयोग नियमित रूप से करना काफी लाभप्रद होता है। लेकिन, यदि समयाभाव हो तो सप्ताह में कम-से-कम तीन दिन, तीन-तीन बार (प्रत्येक बार कम-से-कम 15 मिनट) अवश्य करना चाहिए। प्रत्येक सत्र में आरंभिक स्फूर्ति ( warming up), अभ्यास तथा विश्राम (cool down) के चरण होने चाहिए। इससे सहनशीलता, लचीलापन, हृदय- तथा रक्तवाही धमनियों की क्षमता तथा दबाव को बर्दाश्त करने की क्षमता में वृद्धि होती है।


FAQs


Q. दबाव क्यों उत्पन्न होता है ? 

Ans. रुचि और प्रेरणा के बीच द्वन्द्व के कारण दबाव उत्पन्न होता है।

Q. दबाव क्या है ?

Ans. दबाव वे घटनाएँ होती है अथवा वे दशाएँ होती हैं जिनके प्रति लोगों की प्रतिक्रिय करना आवश्यक होता है। जैसे बस की सवारी करना ।


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