NCERT Class 12 Psychology Chapter 5 Notes In Hindi चिकित्सा उपागम Easy Pdf

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NCERT Class 12 Psychology Chapter 5 Notes In Hindi चिकित्सा उपागम Easy Pdf

Class12th 
Chapter Nameचिकित्सा उपागम
Chapter numberChapter 5
Book NCERT
SubjectPsychology
Medium Hindi
Study MaterialsImportant question to answer
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चिकित्सा उपागम पाठ-परिचय


सेवार्थी एवं चिकित्सक के बीच एक विशेष संबंध को चिकित्सात्मक संबंध या चिकित्सात्मक मैत्री कहा जाता है। यद्यपि सभी मनश्चिकित्साओं का उद्देश्य मानव कष्टों का निराकरण तथा प्रभावी व्यवहार को बढ़ावा देना होता है तथापि वे संप्रत्ययों, विधियों और तकनीक में एक-दूसरे से बहुत भिन्न होते हैं।

अपने अस्तित्व की व्यर्थता के बोध इत्यादि से जुड़ी वर्तमान भावनाएँ हैं जो मनोवैज्ञानिक समस्याओं का कारण है। 

मनोगतिक चिकित्सा संवेगात्मक अंतर्दृष्टि को महत्वपूर्ण लाभ मानती है जो सेवार्थी उपचार के द्वारा प्राप्त करता है। मनोगतिक चिकित्सा ने मानस की संरचना, मानस के विभिन्न घटकों के मध्य गतिकी और मनोवैज्ञानिक कष्ट के स्रोतों का संप्रत्ययीकरण किया है।

अविवेकी विश्वास पूर्ववर्ती घटनाओं और उनके परिणामों के बीच मध्यस्थता करते हैं। संवेग तर्क चिकित्सा में पहला चरण है पूर्ववर्ती विश्वास-परिणाम (पू.वि.प.) विश्लेषण । 

घटनाओं जिनसे मनोवैज्ञानिक कष्ट उत्पन्न हुआ, को लिख लिया जाता है जो उसकी वर्तमानकालिक वास्तविकता को विकृत कर रहे हैं।

मनोवैज्ञानिक कष्ट से पीड़ित वयस्कों के लिए मनश्चिकित्सा की प्रधान पद्धति व्यक्तिगत मनश्चिकित्सा है। मनश्चिकित्सा का अभ्यास करने से पहले चिकित्सक को व्यावसायिक प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है।


पाठ्य-पुस्तक के समीक्षात्मक प्रश्न और उनके उत्तर 


Q.1. मनोचिकित्सा की प्रकृति एवं विषय क्षेत्र का वर्णन कीजिए मनोचिकित्सा में चिकित्सात्मक संबंध के महत्व को उजागर कीजिए । 

Ans. प्रकृति—मनश्चिकित्सा मनोवैज्ञानिक कष्ट से निवारण के लिए एक प्रभावी उपचार है जो सेवार्थी तथा चिकित्सक के बीच में एक ऐच्छिक संबंध के द्वारा सम्पादित होता है।

मनश्चिकित्सा का उद्देश्य दुरनुकूलक व्यवहारों को बदलना, वैयक्तिक कष्ट की भावना को कम करना तथा रोगी को अपने पर्यावरण से बेहतर ढंग से अनुकूलन करने में मदद करना है।

विषय-क्षेत्र-चिकित्सात्मक प्रक्रिया में सेवार्थी और चिकित्सक का मानवीय संबंध चिकित्सा सम्बन्धी ध्यान का केन्द्र होता है जिनमें बीच की अंतःक्रिया के परिणामस्वरूप रोगियों के सुधार, चिंतन, संकल्प, जागरुकता आदि के वांछनीय सुधार लाता है। अर्थात् मनश्चिकित्सा का विषय-क्षेत्र निम्नलिखित होते हैं–

1. सेवार्थी के सुधार के संकल्प को प्रबलित करना। – 2. संवेगात्मक दबाव को कम करना।

3. सकारात्मक विकास के लिए संभाव्यताओं को प्रकट करना। 

4. आदतों में संशोधन करना।

5. चिंतन के प्रतिरूपों में परिवर्तन करना।

6. आत्म जागरूकता को बढ़ाना।

Q. 2. मनश्चिकित्सा के विभिन्न प्रकार कौन से हैं? किस आधार पर इनका ‘वर्गीकरण किया गया है ?

Ans. मनश्चिकित्सा का वर्गीकरण मनश्चिकित्सा को तीन व्यापक समूहों में वर्गीकृत किया जा सकता है, जैसे कि मनोगतिक, व्यवहार तथा अस्तित्वपरक मनश्चिकित्साएँ । कालानुक्रम रूप से मनोगतिक चिकित्सा का आविर्भाव पहले हुआ, तत्पश्चात व्यवहार चिकित्सा जबकि अस्तित्वपरक चिकित्साओं जिन्हें तीसरी शक्ति भी कहा जाता है का आविर्भाव सबसे अंत में हुआ।

मनश्चिकित्सा के वर्गीकरण का आधार – संप्रत्ययों, विधियों और तकनीक में भिन्नता प्रकट करने वाली मनोचिकित्सा का वर्गीकरण निम्न प्राचालों पर आधारित हैं-

(i) क्या कारण है, जिसने समस्या को उत्पन्न किया ?

(ii) कारण का प्रादुर्भाव कैसे हुआ ? 

(iii) उपचार की मुख्य विधि क्या है ?

(iv) सेवार्थी और चिकित्सक के बीच चिकित्सात्मक संबंध की प्रकृति क्या होती है ?

(v) सेवार्थी को मुख्य लाभ क्या है ? 

(vi) उपचार की अवधि क्या है ?

इस प्रकार विभिन्न प्रकार की मनश्चिकित्सा बहुविध प्राचलों पर भिन्न होती हैं। तथापि वे सभी मनोवैज्ञानिक कष्टों का उपचार मनोवैज्ञानिक उपायों से प्रदान करने की समान विधि अपनाती हैं। चिकित्सक, चिकित्सात्मक संबंध और चिकित्सा की प्रक्रिया सेवार्थी में परिवर्तन के कारक बन जाते हैं जिससे मनोवैज्ञानिक कष्ट का उपशमन होता है।

Q.3. एक चिकित्सक सेवार्थी से अपने सभी विचार यहाँ तक कि प्रारम्भिक बाल्यावस्था के अनुभवों को बताने को कहता है। इसमें उपयोग की गई तकनीक और चिकित्सा के प्रकार का वर्णन कीजिए ।

Ans. तकनीक—मनश्चिकित्सा का सबसे पुराना रूप मनोगतिक चिकित्सा का उपयोग मानस की संरचना, मानस के विभिन्न घटकों के मध्य गतिकी और मनोवैज्ञानिक कष्ट के स्रोतों का संप्रत्ययीकरण के लिए किया गया है।

चूँकि मनोगति॒क उपागम अ॑तः मनोद्वंद्व को मनोवैज्ञानिक विकारों का मुख्य कारण समझता है अतः उपचार में पहला चरण असी अंतःमनोद्वंद्व को बाहर निकालना है। 

मनोविश्लेषण ने अंतः मनोद्वंद्व को बाहर निकालने के लिए दो महत्वपूर्ण विधियों मुक्त साहचर्य (free associa- tion) विधि तथा स्वप्न व्याख्या (dream interpretation) विधि का आविष्कार किया। चिकित्सा के प्रकार दी गई स्थिति में अन्यारोपण से जुड़े तकनीक का प्रयोग किया जाता है।

अन्यारोपण (transference) तथा व्याख्या या निर्वाचन (interpretation) रोगी का उपचार करने के उपाय हैं। जैसे ही अचेतन शक्तियों उपरोक्त मुक्त साहचर्य एवं स्वप्न व्याख्या विधियों द्वारा सचेतन जगत में लाई जाती हैं, सेवार्थी चिकित्सक की अपने अतीत सामान्यतः बाल्यावस्था के आप्त व्यक्तियों के रूप में पहचान करने लगता है। 

चिकित्सक को दंड देने वाले पिता या उपेक्षा करने वाली माँ के रूप में देखा जा सकता है। चिकित्सक एक अनिर्णयात्मक तथापि अनुज्ञापक अभिवृत्ति बनाए रखता है और सेवार्थी को सांवेगिक पहचान स्थापित करने की इस प्रक्रिया को जारी रखने की अनुमति देता है। यही अन्यारोपण की प्रक्रिया है।

सेवार्थी अपनी कुंठा, क्रोध, भय और अवसाद, जो उसने अपने अतीत में उस व्यक्ति के प्रति अपने मन में रखी थी लेकिन उस समय उसकी अभिव्यक्ति नहीं कर पाया था, को चिकित्सक के प्रति व्यक्त करने लगता है। 

चिकित्सक वर्तमान में उस व्यक्ति का स्थानापन्न बन जाता है। इस अवस्था को अन्यारोपण तंत्रिकाताप (transference neurosis) कहते हैं। यह दो प्रकार की होती है- 

(i) सकारात्मक अन्यारोपण और 

(ii) नकारात्मक अन्यारोपण अन्यारोपण की प्रक्रिया में प्रतिरोध (resistance) भी होता है। चूँकि अन्यारोपण की प्रक्रिया अचेतन इच्छाओं और द्वंद्वों को अनावृत करती है, जिससे कष्ट का स्तर बढ़ जाता है इसलिए सेवार्थी अन्यारोपण का प्रतिरोध करता है।

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Historyइतिहास
Geography भूगोल
Political science राजनीति विज्ञान
English SubjectResult
Hindi SubjectHistory answer keys

निर्वचन मूल युक्ति है जिससे परिवर्तन को प्रभावित किया जाता है। प्रतिरोध (confron-tation) एवं स्पष्टीकरण (clarification) निर्वचन की दो विश्लेषणात्मक तकनीक हैं। 

प्रतिरोध में चिकित्सक सेवार्थी के किसी एक मानसिक पक्ष की ओर संकेत करता है जिसका सामना सेवार्थी को अवश्य करना चाहिए। 

स्पष्टीकरण एक प्रक्रिया है जिसके माध्यम से चिकित्सक किसी अस्पष्ट या भ्रामक घटना को केंद्रबिंदु में लाता है। उपचार की अवधि सप्ताह में चार-पाँच दिनों तक रोज एक घंटे के सत्र के साथ

मनोविश्लेषण कई वर्षों तक चल सकता है। यह एक गहन उपचार है। उपचार में तीन अवस्थाएँ (three stages) होती हैं-

(i) सेवार्थी नित्यकर्मों से परिचित हो जाता है। 

(ii) सेवार्थी की ओर से अन्यारोपण और प्रतिरोध तथा चिकित्सक के द्वारा प्रतिरोध एवं स्पष्टीकरण अर्थात समाकलन कार्य है। 

(iii) तीसरी अवस्था समाप्ति की अवस्था है।

Q.4. व्यवहार चिकित्सा में प्रयुक्त विभिन्न तकनीकों की चर्चा कीजिए । 

Ans. परिचय — व्यवहार चिकित्साओं का यह मानना है कि मनोवैज्ञानिक कष्ट दोषपूर्ण व्यवहार प्रतिरूपों या विचार प्रतिरूपों के कारण उत्पन्न होते हैं। 

अतः इनका केंद्रबिंदु सेवार्थी में विद्यमान व्यवहार और विचार होते हैं। व्यवहार चिकित्सा में विशिष्ट तकनीकों एवं सुधारोन्मुख हस्तक्षेपों का एक विशाल समुच्चय होता है। 

व्यवहार चिकित्सा का आधार दोषपूर्ण या अपक्रियात्मक व्यवहार को निरूपित करना, इस

व्यवहारों को प्रबलित तथा संपोषित करने वाले कारकों तथा उन विधियों को खोजना है जिनसे उन्हें परिवर्तित किया जा सके। 

उपचार की विधि जो सेवार्थी मनोवैज्ञानिक कष्ट या शारीरिक लक्षणों, जिन्हें शारीरिक बीमारी नहीं माना जा सकता, से ग्रस्त होते हैं, उनका साक्षात्कार इस दृष्टि से किया जाता है । 

जिससे कि उनके व्यवहार प्रतिरूपों का विश्लेषण किया जा सके। अपक्रियात्मक व्यवहार, दीपपूर्ण अधिगम के पूर्ववर्ती कारकों और दोषपूर्ण अधिगम को बनाए रखने वाले कारकों को ढूँढने के लिए व्यवहार विश्लेषण किया जाता है। 

अपक्रियात्मक व्यवहार वे व्यवहार होते हैं जो सेवार्थी को कर प्रदान करते हैं। पूर्ववर्ती कारक वे कारण होते हैं जो व्यक्ति को उस व्यवहार में मग्न हो जाने के लिए पहले ही से प्रवृत्त कर देते हैं। संपोषण कारक वे कारक होते हैं जो दोषपूर्ण व्यवहार के स्थायित्व को प्रेरित करते हैं।

चिकित्सक इसे पूर्ववर्ती संक्रिया (antecedent operations) तथा अनुवर्ती या परिणामी संक्रिया (consequent operations) स्थापित करके संपन्न करता है।

वांछनीय तकनीक—–व्यवहार को परिवर्तित करने की बहुत-सी तकनीकें उपलब्ध हैं। इन तकनीकों का सिद्धांत है सेवार्थी के भाव प्रबोधन स्तर को कम करना, प्राचीन अनुबंधन या क्रियाप्रसूत अनुबंधन द्वारा व्यवहार को बदलना जिसमें प्रबलन की भिन्न-भिन्न प्रासंगिकता हो । व्यवहार परिष्करण की दो मुख्य तकनीकें हैं-

निषेधात्मक प्रबलन तथा विमुखी अनुबंधन । निषेधात्मक प्रवलन का तात्पर्य अवांछित अनुक्रिया के साथ संलग्न एक ऐसे परिणाम से है। जो कष्टकर या पसंद न किया जाने वाला हो। विमुखी अनुबंधन का संबंध अवांछित अनुक्रिया के विमुखी परिणाम के साथ पुनरावृत्त साहचर्य से है। 

यदि कोई अनुकूली व्यवहार कभी-कभी ही घटित होता है तो इस न्यूनता को बढ़ाने के लिए सकारात्मक प्रबलन दिया जाता है। व्यवहारात्मक समस्याओं वाले लोगों को कोई वांछित व्यवहार करने पर हर बार पुरस्कार के रूप में एक टोकन दिया जा सकता है। इसे टोकन अर्थव्यवस्था (token economy) कहते हैं।

विभेदक प्रचलन द्वारा एक साथ अवांछित व्यवहार को घटाया जा सकता है तथा वांछित व्यवहार को बढ़ावा दिया जा सकता है तथा व्यवहार के लिए सकारात्मक प्रबल तथा अवांछित व्यवहार के लिए निषेधात्मक प्रवलन के साथ-साथ उपयोग एक विधि हो सकती है। दूसरी विधि वांछित व्यवहार को सकारात्मक रूप से प्रबलन देना तथा अवांछित व्यवहार की उपेक्षा करना है।

दूसरी विधि कम कष्टकर तथा समान रूप से प्रभावी है। दुर्मीति या अविवेकी भय के उपचार के लिए वोल्प (Wolpe) द्वारा प्रतिपादित क्रमिक विसंवेदनीकरण एक तकनीक है। चिकित्सक सेवार्थी को विश्रांत करता है और सबसे कम दुश्चिता

उत्पन्न करने वाली स्थिति के बारे में सोचने को कहता है। अन्योन्य प्रावरोध का सिद्धांत के अनुसार दो परस्पर विरोधी शक्तियों की एक ही समय में,

उपस्थिति कमजोर शक्ति को अवरुद्ध करती है। मॉडलिंग या प्रतिरूपण की प्रक्रिया विशेष प्रकार से व्यवहार करना सीखता है।

Q.5. उदाहरण सहित व्याख्या कीजिए कि संज्ञानात्मक विकृति किस प्रकार घटित होती है ?

Ans. परिचय—संज्ञानात्मक विकृतियाँ चिंतन के ऐसे तरीके हैं जो सामान्य प्रकृति के होते हैं किन्तु वे वास्तविकता को नकारात्मक तरीके से विकृत करते हैं। असक्रियात्मक संज्ञानात्मक संरचना के अन्तर्गत सामाजिक यथार्थ के बारे में संज्ञानात्मक त्रुटियाँ देखी जाती हैं। नकारात्मक आत्मचालित विचारों के रूप में संज्ञानात्मक विकृतियाँ प्रदर्शित की जाती हैं।

(i) दुश्चिता या अवसाद द्वारा अभिलक्षित मनोवैज्ञानिक कष्ट संबंधी उनके सिद्धांत अनुसार मूल अन्विति योजना या मूल स्कीमा (core schema) या तंत्र के रूप में विकसित हो जाते हैं, जिनमें व्यक्ति के विश्वास और क्रिया के प्रतिरूप सम्मिलित होते हैं। 

इस प्रकार एक सेवार्थी जो बाल्यावस्था में अपने माता-पिता द्वारा उपेक्षित था एक ऐसा मूल स्कीमा विकसित कर लेता है कि “मैं वांछित नहीं हूँ”। जीवनकाल के दौरान कोई निर्णायक घटना उसके जीवन में -घटित होती है। विद्यालय में सबसे सामने अध्यापक के द्वारा उसकी हँसी उड़ाई जाती है। 

यह निर्णायक घटना उसके मूल स्कीमा “मैं वांछित नहीं हूँ” को क्रियाशील कर देती है जो नकारात्मक विचार सतत अविवेकी विचार होते हैं, जैसे- ‘कोई मुझे प्यार नहीं करता’, ‘मैं कुरूप हूँ’, ‘मैं मूर्ख हूँ’, ‘मैं सफल नहीं हो सकता/सकती’ इत्यादि। 

इन नकारात्मक आत्मचालित विचारों में संज्ञानात्मक विकृतियाँ भी होती हैं। संज्ञानात्मक विकृतियाँ चिंतन के ऐसे तरीके हैं जो सामान्य प्रकृति के होते हैं किंतु वे वास्तविकता को नकारात्मक तरीके से विकृत करते हैं। विचारों के इन प्रतिरूपों को अपक्रियात्मक संज्ञानात्मक संरचना कहते हैं। सामाजिक यथार्थ के बारे में ये संज्ञानात्मक त्रुटियाँ उत्पन्न करती हैं। 


अति लघु उत्तरीय प्रश्न (VERY SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS) 


Q. 1. ‘चिकित्सा’ शब्द का अर्थ स्पष्ट करें । 

Ans. ‘चिकित्सा’ एक व्यापक तकनीकी शब्द है जो एक रोगी की सहायता करने या व्यवहार की कठिनाइयों को दूर करने के लिये एक मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ द्वारा किये प्रयास से संबंधित रखता है। 

Q.2. मनोचिकित्सा में मनोवैज्ञानिक का क्या मूल उद्देश्य रहता है ?

Ans. मनोचिकित्सा में मनोवैज्ञानिक का मूल उद्देश्य कुसमायोजित व्यवहार के वर्तमान लक्षणों को दूर करना, कम करना या परिमार्जित करना होता है और बदले में अपनी समस्या के बारे में अन्तर्दृष्टि प्राप्त करने में व्यक्ति की सहायता करना है।

Q.3. मनोचिकित्सा किसे कहते हैं ? 

Ans. मानसिक रोगियों के समायोजित व्यवहारों के लक्षणों को पहचान कर उसे कम दूर कर पुनर्समायोजन के योग्य बनाने हेतु प्रयुक्त विधि को मनोचिकित्सा कहते हैं।

Q. 4. मनोचिकित्सा में रोगी और चिकित्सक के बीच के संबंध का फलस्वरूप कैसा रहता है ?

Ans. मनोचिकित्सा में रोगी और चिकित्सक के बीच व्यावसायिक मैत्रीपूर्ण संबंध की स्थापन होती है। 

Q.5. मनोचिकित्सा के कितने चरण होते हैं ?

Ans. मनोचिकित्सा के तीन चरण- प्राथमिक, मध्य एवं समापन की अवस्थाओं के चरण होते हैं।

Q.6. चिकित्सात्मक समझौता का क्या अर्थ है ?

Ans. रोगी और चिकित्सक के बीच पारस्परिक समझ एवं आभार के अनुबंध को चिकित्सात्मक समझीता कहते हैं।

Q.7. जैव औषधीय चिकित्सा के मुख्य प्रकार कौन-कौन से हैं?

Ans. जैव औषधीय चिकित्सा के मुख्य तीन प्रकार होते हैं—

(i) इन्सुलिन कोमा प्रविधि, 

(ii) औषधिक चिकित्साएँ एवं 

(iii) मनोशल्य क्रिया । 

Q.8. मनोगत्यात्मक चिकित्सा का आधारभूत सिद्धांत क्या है ? 

Ans. मनोगत्यात्मक चिकित्सा फ्रायड के मनोविश्लेषणात्मक सिद्धांत पर आधारित है।

Q. 9. आत्मतंत्र या मुक्त साहचर्य क्या है ?

Ans. बिना हिचकिचाहट के मन में जो भी विचार आये, उन्हें बेहिचक चाहे वे व्यर्थ ही क्यों न हो मुक्त ढंग से प्रकट करना मुक्त साहचर्य कहलाता है।

Q. 10. बायोफीडबैक क्या है ?

Ans. रोगी के निजी शारीरिक क्रिया तंत्र को प्रभावित करने के प्रशिक्षणों को बायोफीडबैक कहते हैं।

Q. 11. RET क्या है?

Ans. Rational Emotive Therapy को RET कहते हैं जो संज्ञानात्मक उपचार की एक प्रविधि है।

Q. 12. अष्टांग मार्ग का क्या तात्पर्य है ? 

Ans. पतंजलि ने योग के आठ मार्गों का उल्लेख किया है जिसे अष्टांग मार्ग कहते हैं। ये क्रमशः यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारण, ध्यान और समाधि हैं।

Q. 13. चिकित्सा सत्र की समाप्ति कब होनी चाहिए ?

Ans. प्रायः जब रोगी पुनर्समायोजन करने में सक्षम प्रतीत होता है तब चिकित्सा सत्र समाप्त कर दिया जाता है। लेकिन आवश्यकतानुसार यह बीच में भी समाप्त किया जा सकता है यदि चिकित्सा-सत्र चलाना व्यर्थ प्रतीत होता है अथवा रोगी का सहयोग मिलना मुश्किल होता हो।

Q. 14. मनोशल्य क्रिया किसकी देन है ? 

Ans. ‘मोनिज’ की।

Q.15. मानसिक विकारों की चिकित्सा के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार किसे और कब मिला था ? 

Ans. सन् 1949 में मोनिज को मनोरोगियों के उपचार के लिए प्रीफंटल लोबोटोमी नामक शल्यक्रिया के लिए नोबेल पुरस्कार मिला था।

Q. 16. व्यवहार चिकित्सा को व्यवहार परिमार्जन क्यों कहा जाता है ? 

Ans. व्यवहार चिकित्सा में त्रुटिपूर्ण अर्जित या सीखे गए व्यवहारों को परिमार्जित कर समायोजी व्यवहार के अर्जन पर जोर दिया जाता है इसलिए इसे व्यवहार परिमार्जन कहते हैं। 

लघु उत्तरीय प्रश्न (SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS)


Q.1. मनोचिकित्सा से आप क्या समझते हैं ? 

Ans. मनोवैज्ञानिक प्रविविधों या साधनों का उपयोग कर व्यक्तित्व की असामान्यता को दूर करने की विधि को मनोचिकित्सा कहते हैं। दूसरे शब्दों में, हम ऐसा भी कह सकते हैं कि जिन मनोवैज्ञानिक तरीकों से व्यक्तित्व संबंधी उलझनों अथवा गुत्थियों को सुलझाया जाता है 

अथवा कुसमायोजित व्यवहारों को समायोजी व्यवहारों में परिणत किया जाता है, उन्हें ही ‘मनोचिकित्सा’ कहते हैं। पेज (Page) ने इसे परिभाषित करते हुये कहा है- ‘मनोवैज्ञानिक प्रविधियों द्वारा व्यक्तित्व संबंधी विकृतियों की चिकित्सा को मनोचिकित्सा की संज्ञा दी जा सकती है। 

Q. 2. मनोचिकित्सा का उद्देश्य स्पष्ट करें।

Ans. सभी प्रकार की मनोचिकित्सा का उद्देश्य निम्नलिखित लक्ष्यों में से कुछ या सम्पूर्ण प्राप्त करना होता है- 

(i) रोग में सुधार के लिए रोगी के संकल्प को प्रोत्साहित करना।

(ii) सांवेगिक दबाव को कम करना ।

(iii) सकारात्मक उन्नति के लिए आन्तरिक क्षमताओं को प्रकट करना। 

(iv) आदतों को बेहतर बनाना।

(v) चिन्तन के तीर-तरीके में परिवर्तन लाना।

(vi) जागरुकता का संवर्धन करना। 

(vii) पारस्परिक संबंधों एवं संचार में सुधार।

(viii) निर्णय लेने की प्रक्रिया को आसान बनाना।

(ix) जीवन में व्यक्ति की वरीयता से अवगत होना।

(x) अधिक सृजनात्मक एवं आत्मजागरूक ढंग से व्यक्ति के सामाजिक परिवेश के साथ जुड़ना। सभी तरह के मनोचिकित्सा का लक्ष्य मानवीय पीड़ा को दूर करना एवं अधिक प्रभावपूर्ण ढंग से पोषण करना है परन्तु इन संप्रत्ययों, विधियों एवं तकनीकों में अधिक भिन्नता पायी जाती हैं। 

Q.3. ‘रेकी’ पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें ।

Ans. ‘रेकी’ जापानी भाषा का एक शब्द है। इसका सम्बन्ध एक सरल ‘हाथ ऊपर करने को ‘ आरोग्य तकनीक से है और यह एक प्रकार की ऊर्जा औषधि है। आरोग्य के सम्बन्ध में यह एक रोचक विकास है। 

सार्वभौमिक जीवन शक्ति या ऊर्जा मन एवं शरीर को शान्त करती है। शरीर पर कुछ निश्चित स्थानों पर हाथ फेरने के द्वारा ऊर्जा प्रवाहित की जाती है। ऊर्जा का प्रवाह आरोग्य प्रक्रिया को तेज करता है। जिस तरह ऊर्जा ब्रह्माण्ड की मूल प्रकृति है उसी तरह रेकी अस्तित्व की मूल प्रकृति है। 

हमारे विचार एवं संवेग सभी विभिन्न आवृत्तियों वाली ऊर्जा को मिलाकर बनाते हैं। शरीर एवं मन को सार्वभौमिक ऊर्जा के सम्पर्क में लाकर रेकी व्यक्ति को बंधन से युक्त कर सकता है और उसे स्वास्थ्य एवं आत्मतंत्रता का अनुभव कराती है।

रेकी शरीर में जीवन की ऊर्जा को जाग्रत करती है। इसके अनुसार शरीर वास्तव में एक निश्चित आवृत्ति पर ऊर्जा का कंपन है। नकारात्मक विचारों का अनुभव असूद अनुभवों के रूप में होता है। 

ऐसे विचार सिरदर्द, अल्सर या क्रोष का रूप ले सकता है। रेकी ऐसे विचारों को सार्वभौमिक जीवन शक्ति ऊर्जा की और उच्चतर कंपन वाली आवृत्तियों के समक्ष लाती है जो फिर अन्दर जाकर किसी अवरोध को नष्ट कर देती है।

Q.4. प्राणिक उपचार क्या है ? 

Ans. प्राणिक उपचार का मंतव्य औषधि उपचार में आपूर्ति नहीं बल्कि उसका पूरक होना है। प्राणिक उपचार अत्यन्त सूक्ष्म ऊर्जा का एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में अंतरण है। प्राणिक उपचार स्पर्श या औपयियों का उपयोग किए बिना भौतिक, मानसिक, सांवेगिक एवं आध्यात्मिक विकृतियों को सुलझाना है। 

इसमें मानसिक क्रियाओं के अनुसार हमारा शरीर वस्तुतः दो भागों से मिलकर बना है-दिखाई पड़ने वाला भौतिक शरीर और अदृश्य ऊर्जा शरीर जिसे बायोप्लाज्म या ‘औरा’ कहते हैं। 

दिखाई पड़नेवाला भौतिक शरीर मानव शरीर का वह भाग है जो हम देखते हैं। स्पर्श करते हैं और जिससे सर्वाधिक परिचित हैं। हमारी ‘औरा’ वह प्रकाशमय ऊर्जा शरीर है जो दिखनेवाले भीतिक शरीर में प्रवेश करती है और उसके पार तक फैल जाती है।

प्राणिक उपचार एक परम्परागत विज्ञान और उपचार की कला है, जो विकृति ऊर्जा स्तरों के के लिए प्राण या जीवन ऊर्जा और चक्रों या ऊर्जा केन्द्रों का उपयोग करती थी। प्राण के इलाज तीन प्राथमिक स्रोत हैं-सौर प्राण, वायु प्राण और भूमि प्राण सौर प्राण सूर्य की रोशनी से प्राप्त प्राण है। 

यह पूरे शरीर को अनुप्राणित करता है तथा स्वास्थ्य का संवर्द्धन करता है। हवा में संचित प्राण को वायु प्राण कहते हैं। यह श्वसन क्रिया के माध्यम से फेफड़ों द्वारा ग्रहण किया जाता है। और बायोप्लाजमिक शरीर के ऊर्जा केन्द्रों द्वारा प्रत्यक्ष रूप से भी आत्मसात् किया जाता है। ये ऊर्जा केन्द्र चक्र कहलाते हैं। 

भूमि में स्थित प्राण भूमि प्राण कहलाता है। यह पैर के तलवों द्वारा ग्रहण किया जाता है। नंगे पाँव चलने से शरीर द्वारा ग्रहण किए गए भूमि प्राण की मात्रा बढ़ती है। प्राणिक उपचार में एक निश्चित स्तर तक की दक्षता पाने के लिए अत्यधिक अभ्यास एवं समय की जरूरत होती है। 

Q. 5. मनोचिकित्सा विधियों की सीमाएँ क्या हैं ?

Ans. मनोचिकित्सा कितनी सफल है ? इसका मूल्यांकन करना अत्यंत कठिन है। फिर भी, विभिन्न शोधकर्त्ताओं के सामान्य निष्कर्षो से स्पष्ट ज्ञात होता है कि विभिन्न चिकित्सात्मक दृष्टिकोण अलग-अलग स्तर तक प्रभावकारी हैं। क्या मनोचिकित्सा यथास्थिति को बनाए रखने को प्रोत्साहित करती है ? क्या इसे ऐसा करना चाहिए ? यह एक कठिन प्रश्न है जिसमें नैतिक • एवं सामाजिक मुद्दे भी सम्मिलित हैं और इनका कोई निश्चित उत्तर भी नहीं है। 

किस तरह के रोगी के साथ किस तरह की समस्या में कौन-सी चिकित्सा अधिक लाभदायक होगी, यह एक और अधिक कठिन प्रश्न है। अनुभव से यह स्पष्ट है कि विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों की अपनी सीमाएँ हैं और यही बात रोगियों और उनकी समस्याओं पर भी लागू होती है। मनोगत्यात्मक चिकित्सा सामान्यतः विचारशील व्यक्तियों पर प्रभावकारी है। किन्तु दूसरों के लिए इसकी सीमित उपयोगिता है। 

इसमें चिकित्सा पाने वाले व्यक्तियों की दृष्टि से अधिक समय, धन एवं प्रयास की जरूरत पड़ती है। व्यवहार चिकित्सा बच्चों के साथ और आदत सम्बन्धी विकृतियों में सबसे अधिक प्रभावकारी है। यद्यपि यह सरल एवं कम खर्च वाली है, परन्तु यह यांत्रिक एवं कुछ हद तक अपचयवादी भी है। संज्ञानात्मक चिकित्सा की क्षमता अवसाद एवं दुश्चिता विकृतियों के उपचार में प्रमाणित होती है। मानवतावादी चिकित्सा ऐसे व्यक्तियों के लिए उपयोगी है, जिनमें संभावनाएं रहती हैं, किन्तु वे अस्तित्व सम्बन्धी समस्याओं से इन्हें अवरुद्ध अनुभव करते हैं। 

Q.6. किन मानसिक विकृतियों के लिए औषधि चिकित्सा का उपयोग किया गया है ? 

Ans. मुख्यतः चार प्रकार की विकृतियों के लिए औषधि चिकित्सा का उपयोग किया गया है-मनोविदलता, उन्माद, अवसाद एवं दुश्चिता। ये द्रव्य साइकोट्रॉफिक द्रव्य कहलाते हैं क्योंकि इनका असर रोगियों के मनोवैज्ञानिक व्यवहार पर होता है। इन द्रव्यों को मनोविकृति औषधि भी कहा जाता है। 

यद्यपि इनका उपयोग मनोविदलता जैसे प्रमुख मनोविकृतियों के लिए होता है। ये रोगियों में शान्ति की दशा उत्पन्न करते हैं तथा संभ्रम या विभ्रम जैसे विकारी लक्षणों की तीव्रता को कम करते हैं। इनके उपयोग से समाज से कटे हुए रोगी पर्यावरण के प्रति अनुक्रिया करने लगते हैं। 

फिर भी इनका लम्बे समय तक अधिक मात्रा में सेवन अन्य अवांछित दुष्प्रभाव भी उत्पन्न करता है। यद्यपि मनोविदलता के उपचार में औषधि चिकित्सा अभी पूर्णतः सफल नहीं है। उन्माद विरोधी औषधियों का उपयोग ऐसे रोगियों के उपचार के लिए होता है जो अत्यधिक आंदोलित, उत्तेजित और कभी-कभी न संभालने योग्य होते हैं। 

जो रोगी अवसाद ग्रस्त होते हैं उनके लिए अवसाद विरोधी औषधियों का उपयोग किया जाता है। दुश्चिता विरोधी औषधियों को मध्यम स्तर का शान्तिदायक कहा जाता है।

Q.7. मनोशल्य क्रिया (Psycosurgery) क्या है ? 

Ans. मनोविकृति या मनोविक्षिप्ति (psychotic) के उपचार के लिये ‘मनोशल्य चिकित्सा प्रविधि’ का भी उपयोग किया जाता है। सन् 1935 में मोनिज (Moniz) ने ऐसे रोगियों के लिये प्रीफ्रंटल लोबोटोमी (Prefrontal lobotomy) प्रस्तावित किया था जिसके लिये उसे 1949 में नोबल पुरस्कार से सम्मानित भी किया गया था। 

हालांकि बाद में देखा गया कि शल्य क्रिया के कुछ दुष्परिणाम (side effects) भी होते हैं जो विनाशकारी होते हैं। अतः इन दिनों इस प्रविधि का उपयोग शायद ही किया जाता है। इस प्रविधि का उपयोग अंतिम उपाय के रूप में किया जाता है।

Q.8. योग (Yoga) से आप क्या समझते हैं ? 

Ans. ‘योग’ भारत की एक प्राचीन क्रियात्मक विचारधारा है जिसका उपयोग शारीरिक और मानसिक रोगों के निवारण हेतु किया जाता है। ‘योग’ को सही अर्थ में स्वास्थ्य एवं कल्याण की ‘पोषक’ (nurturant) एवं बढ़ावा देने (promoter) वाली किया कहा जाता है। 

पतंजलि के अनुसार- ‘योग’ चित्र और मन की वृत्तियों को ‘निरुद्ध’ (restrain) करता है अथवा इसका लक्ष्य मानसिक वृत्तियों को प्रतिबंधित करना होता है। 

संस्कृत में ‘योग’ का अर्थ मानसिक वृत्तियों को इस प्रकार बाँधना होता है जैसे कोई दम्पत्ति प्रणय सूत्र में एक-दूसरे से वैध जाते हैं अर्थात मानसिक विचारों, वृत्तियों आदि को प्रतिबंधित और नियंत्रित कर व्यक्तिगत आत्म (individual self) को सार्वभौम या ईश्वर से मिलाने के साधन को योग कहते हैं।


दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (LONG ANSWER TYPE QUESTIONS)


Q. 1. सभी मनोचिकित्सात्मक दृष्टिकोणों में समान लक्षण कौन-सी हैं ? 

Ans. सांवेगिक रूप से विक्षुब्ध व्यक्ति के लिए दैनिक जीवन में कई तरह की मनोवैज्ञानिक सहायता एक साथ उपलब्ध रहती है। इसके अंतर्गत एक शिक्षक या प्रबुद्ध व्यक्ति की सरल सलाह, एक मित्र, माता-पिता या संबंधी की सांत्वना से प्रारंभ करके एक संत, धर्मगुरु या पुरोहित द्वारा किए गए प्रवचन तक आ सकते हैं। 

ये सभी सांवेगिक घाव भरने (healing) की दिशा में कुछ अंश तक कारगर होते हैं। हमारे आस-पास के लोगों की इन क्रियाओं में मानसिक उपचार के कुछ तत्त्व मौजूद हैं, फिर भी इन क्रियाओं और मनोचिकित्सा के वास्तविक अर्थ में महत्त्वपूर्ण भिन्नता है। 

मनोचिकित्सा में मनोवैज्ञानिक साधनों का उपयोग करके किसी व्यक्ति का उपचार करने का क्रमबद्ध प्रयास किया जाता है। यह कार्य एक ऐसे प्रशिक्षित व्यक्ति द्वारा किया जा सकता है जो आत्मेच्छा से (सोच-समझकर ) सांवेगिक समस्या वाले किसी रोगी से व्यावसायिक संबंध बनाता है। 

इसका उद्देश्य कुसमायोजित व्यवहार के वर्तमान लक्षणों को दूर करना, कम करना या परिमार्जित करना होता है, और बदले में अपनी समस्या के बारे में अंतर्दृष्टि प्राप्त करने में व्यक्ति की सहायता करना है।

मनोचिकित्सा अधिक समायोजित एवं समाधानपरक-उन्मुख व्यवहारों को चुनने में व्यक्ति की मदद करती है, जिसके द्वारा व्यक्तिगत वृद्धि (Personal growth) एवं ‘आत्म’ का सामंजस्य पैदा होता है। हालांकि, रोगी के जीवन में उपचारात्मक परिवर्तन बिना मनोचिकित्सा के भी घटित हो सकते हैं, 

जैसा कि आत्मतः होने वाले सुधारों और या कभी-कभी ‘प्लेसीबो’ (Pla cebo), जैसे सुझावात्मक उपायों के उपयोग के कारण। आरंभ में मनोचिकित्सा सांवेगिक

कठिनाइयों को दूर करने में प्रयुक्त वाचिक और अवाचिक उपचार के तरीकों तक सीमित समझी जाती थी। हाल ही में, संज्ञान के क्षेत्र में हुए विकास के साथ, चिकित्सात्मक स्थितियों में, संचार के संज्ञानात्मक पहलुओं को भी सम्मिलित किया जाने लगा है। 

हालाँकि, संपूर्ण रूप से, मनोचिकित्सा का केन्द्रीय विन्दु मनोचिकित्सक एवं रोगी के बीच का अनूठा संबंध है। यह प्रक्रिया वाचिक एवं अवाचिक दोनों तरह के संचार को महत्त्व देती है जिससे व्यक्ति तनावों से छुटकारा पा सकता है और पुनः सीखने तथा व्यक्तिगत वृद्धि एवं उन्नति की दशाएँ स्थापित कर सकता है।

मनोचिकित्सा के सभी दृष्टिकोणों में अधोलिखित विशेषताएँ मिलती हैं- 

(i) इसमें चिकित्सा के विभिन्न सिद्धान्तों में निहित नियमों का क्रम उपयोग किया जाता है, 

(ii) जो लोग वास्तविक प्रशिक्षण प्राप्त किए हुए हैं, वही मनोचिकित्सा कर सकते हैं, क्योंकि एक अप्रशिक्षित व्यक्ति अनजाने में भलाई की अपेक्षा और हानि कर सकता है। 

(iii) उपचार की स्थिति में एक चिकित्सक तथा एक रोगी, जो अपनी समस्याओं का समाधान चाहता और प्राप्त करता है, सम्मिलित होते हैं, यह व्यक्ति चिकित्सा प्रक्रिया का केन्द्र होता है, तथा

(iv) उक्त दोनों व्यक्तियों-चिकित्सक एवं रोगी की पारस्परिक क्रिया चिकित्सात्मक संबंधों का निर्माण करती है एवं उन्हें दृढ़ करती है। यह एक गोपनीय, अंतर्वैयक्तिक एवं गत्यात्मक संबंध है। यह मानवीय संबंध किसी भी तरह की मनोचिकित्सा का केन्द्रविन्दु होता है और परिवर्तन का साधन है। 

मनोचिकित्सा का उद्देश्य कुसमायोजनात्मक व्यवहारों को परिवर्तित करके व्यक्तिगत मानसिक दबाव को कम करने तथा रोगी को अपने परिवेश के साथ अच्छे ढंग से समायोजन करने में सहायता देना है। अन्य कुछ अवसरों पर, अनुपयुक्त वैवाहिक, व्यावसायिक एवं सामाजिक समायोजन में भी यह आवश्यक होता है कि व्यक्ति के निजी परिवेश में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन किए जाएँ।

Q. 2. अचेतन सामग्री को चेतना के स्तर पर लाने वाली कौन-सी तकनीकें हैं ?

Ans. मनोगत्यात्मक चिकित्सा मनोविश्लेषणात्मक दृष्टिकोण पर आधारित है। इस चिकित्सा में यह अभिग्रह निहित है कि मानसिक समस्याओं की उत्पत्ति बाल्यकालीन अनुभवों से होती है। प्रायः बच्चा किसी मानसिक आघात का सामना करता है या अआत्मीकार्य आवेगों के उद्दीप्त करने वाली स्थितियों में पड़ सकता है। ये आवेग अचेतन में दमित कर दिए जाते हैं। 

अचेतन में इस तरह रहते हुए भी इनके चेतना में आने का भय बना रहता है। रोगी व्यक्तियों की अधिकतम मानसिक शक्ति आवेगों को दमित रखने में व्यय हो जाती है और उनके पास अधिक प्रभावपूर्ण जीवन व्यतीत करने के लिए अत्यंत कम ऊर्जा रह जाती है। 

ऐसा विश्वास किया जाता है कि ऐसी दमित सामग्री के बारे में अंतर्दृष्टि प्राप्त कर लेने पर व्यक्ति इससे जुड़े हुए कष्ट एवं शर्म से मुक्त हो जाता है। मनोविश्लेषण के दृष्टिकोण की और उन्मुख चिकित्सकों द्वारा अपनाई जाने वाली विभिन्न तकनीकें निम्नलिखित हैं-

(i) मुक्त साहचर्य — इसमें रोगी से केवल इतना कहा जाता है कि उनके मन में जो भी विचार अपने आप आता है, उसमें बिना काट-छाँट के या इस बात का ध्यान रखें कि वह कितना व्यक्तिगत, कष्टदायी, लज्जाजनक या असंगत है, उसे कहता रहे। रोगी व्यक्ति को आराम करने की मुद्रा में रहकर अपने विचारों और भावनाओं का सहज / आत्माभाविक रूप से कहने को कहा जाता है। 

(ii) स्वप्नों का विश्लेषण फ्रायड ने कहा था कि स्वप्न अचेतन तक पहुँचने के राजमार्ग हैं। निद्रावस्था में अहं का नियंत्रण प्रायः कम सतर्क रहता है और दमित विचारों को जागृत अवस्था में व्यक्त होते हैं। स्वप्न देखने वाले को स्वप्न में जो दिखाई पड़ता है, वही उस स्वप्न की की अपेक्षा स्वप्नों में अचेतन से बाहर आने की अधिक संभावना रहती है तथा वे प्रतीकों के रूप प्रकट विषयवस्तु है। यह वर्तमान एवं विगतकाल की इच्छाओं का एक मिश्रण होता है, जो एक अकेली घटना में सूक्ष्म रूप में रहता है। 

(iii) प्रतिरोध का विश्लेषण मुक्त साहचर्य, स्वप्न विश्लेषण या चिकित्सा के दौरान व्यक्ति प्रतिरोध प्रदर्शित कर सकता है। यह कई रूपों में प्रकट हो सकता है; जैसे- नियत अवसरों पर दिलद से आना, बीमारी या स्वास्थ्य का बहाना करना, कुछ चीजों / प्रकरणों पर बात करने की अनि दिखाना, आकस्मिक चुप्पी (अवरोध), विस्मरण इत्यादि रोगी के साथ इन्हें इंगित कर इनकी विवेचना की जाती है, जिससे ऐसे प्रतिरोधों के अचेतन कारणों की उसे बेहतर समझ हो सके। 

(iv) अंतरण विश्लेषण (Transference analysis ) — जिस तरह बचपन में कुछ महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों के साथ, प्रायः माता या पिता के साथ व्यक्ति प्रतिक्रियाशील होते रहे हैं, उसी तरह वर्तमान में रोगी के रूप में वे व्यक्ति चिकित्सक के साथ भी उसी तरह क्रियाशील होते हैं। यह प्रतिक्रिया विद्रोह, निर्भरता या चिकित्सक के लिए अतिशय प्रेम के रूप में हो सकती है। अबाधित प्रारंभिक संबंधों के दुष्प्रभावों को चिकित्सात्मक परिवेश में दूर करने की कोशिश की जाती है। प्रभावी मनोगत्यात्मक उपचार में अंतरण को सुलझाना भी एक आवश्यक तत्त्व होता है।

इस तरह, मनोगत्यात्मक चिकित्सा अचेतन सामग्री में लाने एवं चिकित्सा प्रक्रिया की अवधि में विगत को फिर से अनुभव कर कठिन सांवेगिक प्रतिरूपों की उत्पत्ति के बारे में अंतर्दृष्टि विकसित करने में रोगियों की सहायता करने का प्रयास करती है। मनोगत्यात्मक चिकित्सा के कई प्रकार हैं, जैसे- मनोविश्लेषण-उन्मुख मनोचिकित्सा, अंतर्वैयक्तिक चिकित्सा या जुंग की गहनता उन्मुख मनोचिकित्सा। मनोविश्लेषण-उन्मुख मनोचिकित्सा, उनलोगों की पसंद की चिकित्सा रहती है, जो स्वयं अपने बारे में व्यापक आत्मानुशीलन या अंतर्दृष्टि पाना चाहते हैं।

Q.3. क्रमिक विसंवेदीकरण तकनीक में निहित चरण कौन से हैं? 

Ans. यह व्यवहार चिकित्सा की सबसे अधिक प्रसिद्ध एवं व्यापक रूप से प्रयुक्त तकनीक है, जिसका उपयोग दुर्भाति एवं दुश्चिता से जुड़े अन्य विकारों के उपचार में किया जाता है। दुल (Wolpe) द्वारा विकसित यह तकनीक इस अभिग्रह पर आधारित है कि कोई व्यक्ति एक ही समय में विश्रांत (Relaxed) एवं चिंतित (Anxious) दोनों नहीं हो सकता। इसलिए, जब रोगी पूर्ण विश्रांति की दशा में हो, तो उस समय यदि क्रमशः बढ़ती हुई चिन्ता उत्पन्न करने वाले उद्दीपक प्रस्तुत किए जाएँ तो, विश्राम दशा चिंता की दशा पर विजय प्राप्त कर लेती है और रोगी चिन्ता पैदा करने वाले उद्दीपकों के प्रति असंवेदीकृत (Desensitised) हो जाता है। क्रमबद्ध

असंवेदीकर कार्यविधि के अंग के रूप में अधोलिखित चार चरणों का अनुसरण किया जाता है। 

(i) क्षात्कार—कुछ प्रारंभिक साक्षात्कार किए जाते हैं। इसके बाद व्यक्ति की चिन्ता के प्रमुख स्रोतों का पता लगाने के लिए उसे कुछ व्यक्तित्व प्रश्नावलियाँ दी जाती है। 

(ii) विश्राम के लिए प्रशिक्षण आरंभ के कुछ सत्रों में रोगी को विश्राम कैसे किया जाता है, इसके लिए विभिन्न विश्राम तकनीकें प्रयुक्त होती हैं।

(iii) चिन्ता पदानुक्रमों की संरचना- प्रारंभिक साक्षात्कारों के आधार पर, अति साधारण से अत्यंत उच्च स्तर की चिन्ता करने वाली स्थितियों का एक पदानुक्रम (Hierarchy) तैयार किया जाता है। 

(iv) विसंवेदीकरण सत्र- इन सत्रों में, जब रोगी विश्राम की दशा में रहता है, तो उससे न्यूनतन चिन्ता उत्पादक दशा के दृश्य की कल्पना करने के लिए कहा जाता है या उक्त दशा का चित्र उसके सामने प्रस्तुत किया जाता है। कुछ समय बाद चिकित्सक पदानुक्रम में अपेक्षाकृत थोड़ा अधिक चिन्ता पैदा करने वाली दशा को प्रस्तुत करता है और पुनः क्रमिक ढंग से ऊपर दशाओं की ओर आगे बढ़ता है, जब तक कि चिन्ता उत्पादक उद्दीपक उच्चतम स्तर तक न पहुँच की जाए। 

Q.4. संज्ञानात्मक चिकित्सा में केन्द्रीय बिन्दु क्या है ?

Ans. अपनी सामर्थ्य और विशेष रूप से अवसाद एवं दुश्चिता के उपचार के कारण संज्ञानात्मक चिकित्सा के उपयोग में पिछले दो दशकों में पर्याप्त वृद्धि हुई है। संज्ञानात्मक चिकित्सा के उपयोग में मार्गदर्शक अल्बर्ट एलिस (Albert Elis) एवं आरन बेक (Aaron Beck) थे। ‘संज्ञानात्मक’ (Cognitive) शब्द अपने अनुभव के संसार को समझने में प्रयुक्त ध्यान, निर्णय, सीखना, चिंतन, स्मृति तथा चेतना जैसे प्रकार्यों से संबंधित है। 

संज्ञानात्मक चिकित्सक ऋणात्मक प्रक्रियाएँ एवं संरचनाएँ व्यवहार पर सार्थक प्रभाव डालती है। अपने आत्म, संसार और भविष्य के प्रति निषेधात्मक या आत्म-पराजय संबंधी विषयवस्तु का योजनात्मक विचार, जिन्हें तथाकथित संज्ञानात्मक त्रयी (Triad) कहते हैं, ‘आत्म’ को दयनीय, पर्यावरण को धमकी भरा एवं भविष्य को डरावना बना देते हैं। 

एलिस की तर्काश्रित भावात्मक चिकित्सा (Rational Emotive Theraphy-RET)— यह अत्यंत लोकप्रिय चिकित्सा पद्धतियों में से एक है, जो रोगी की आधारभूत कुसमायोजनात्मक विचार प्रक्रियाओं को बदलने का प्रयास करती है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से आत्मस्थ व्यक्ति वह है, जो सम्यक् विचार कर पाता है तथा वास्तविकता के अनुरूप व्यवहार करता है। बहुत-से लोग अवास्तविक विश्वास एवं पूर्णतावादी मूल्यों के पोषक होते हैं। वे उसी के अनुरूप कार्य करते हैं, 

Q. 6. मनोगत्यात्मक चिकित्सा (Psychodynamic Therapy) विधि का वर्णन कीजिए । 

Ans. मनोगत्यात्मक चिकित्सा विधि मनोरोगियों की चिकित्सा की आधुनिक मनोचिकित्सा प्रणाली है। इस प्रणाली का प्रारंभ 1880 ई. में सिगमंड फ्रायड के अध्ययनों से हुआ है। इन्होंने मनोरोगियों की चिकित्सा के लिए ‘मनोविश्लेषणात्मक प्रविधि’ (psychoanalytic technique) प्रस्तावित की है जो वस्तुतः एक विस्तृत, क्रांतिकारी और व्यवस्थित सिद्धान्त भी है। बाद में फ्रायड के शिष्यों एवं कुछ अन्य लोगों ने भी इस परंपरा को आगे बढ़ाया है। 

मनोगत्यात्मक चिकित्स प्रविधि फ्रायड के मनोविश्लेषण सिद्धान्त पर ही आधारित हैं। इसलिए चिकित्सा की इस प्रविधि के जनक के रूप में फ्रायड का नाम लिया जाता है।

मनोगत्यात्मक (मनोविश्लेषणात्मक) चिकित्सा प्रविधि इस मान्यता पर आधारित है कि मानसिक समस्याओं की उत्पत्ति के पीछे बाल्यावस्था के अनुभवों का मुख्य हाथ रहता है। विकासशील बालक को जब किसी मानसिक आघातों अथवा अवांछित आवेगों (undesirable impulses) को उद्दीप्त (stimulate) करने वाली परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है तो ये आघातपूर्ण अनुभव और आवेग अचेतन में दमित कर दिए जाते हैं। 

लेकिन इन दमित आवेगों के चेतन अभिव्यक्ति की संभावना बनी रहती है। रोगी व्यक्तियों की मानसिक शक्तियों या ऊर्जा (energy) की अधिकतम मात्रा इस प्रकार के आवेगों को दमित करने में ही खपत होती है। 

फलतः विशाल और जटिल वातावरण की वास्तविकताओं के साथ प्रभावी ढंग से समायोजन करने हेतु बहुत ही कम मात्रा में ऊर्जा उपलब्ध होती है जिसके परिणामस्वरूप व्यक्ति कुसमायोजन का शिकार होता है। अतः यदि रोगी को ऐसे दमित विचारों, प्रवाहों तथा आवेगों के बारे में अंतर्दृष्टि प्राप्त हो तो वह इनसे जुड़े कष्टों से मुक्त हो सकता है। 

मनोगत्यात्मक चिकित्सा विधि इसी विश्वास पर आधारित है। मनोविश्लेषण चिकित्सा की विधि वस्तुतः कोई एकल विधि नहीं है, अपितु इसमें कई प्रविधियों सम्मिलित हैं। ये प्रविधियाँ अग्रलिखित है–

आत्मतंत्र (मुक्त) साहचर्य ( Free Association)—— रोगी को आरामदायक स्थिति और मंद प्रकाश के कमरे में रखकर यह निर्देश दिया जाता है कि उसके मन में जो कुछ आता जाए उसे वह बिना संकोच और हिचकिचाहट के कहता जाए, चाहे ये विचार या बातें सार्थक हों या निरर्थक, नैतिक हो या अनैतिक, सामाजिक हो या असामाजिक, वास्तविक हों या अवास्तविक रोगी चिकित्सक के निर्देशानुसार अपने भावों, विचारों को सहज यानी आत्माभाविक रूप से प्रकट करता है और चिकित्सक उसके द्वारा प्रकट किए गए विचारों को सार्थक ढंग से व्यवस्थित करता है। 

इस तरह रोगी अपने अचेतन में दमित विचारों को प्रकट करने में समर्थ होता है और चिकित्सक रोगी को अचेतन के दमित विचारों के बारे में ‘सूझ’ (insight) विकसित करने में सहायता प्रदान करता है। चिकित्सक रोगी की अचेतन और वर्तमान क्लेश के साथ के संबंधों से रोगी को अवगत कराने में मदद करता है जिससे रोगी में ‘अंतर्दृष्टि’ यानी ‘सूझ’ का विकास होता है। स्वप्नों का विश्लेषण (Dream Analysis) मुक्त साहचर्य के क्रम में रोगी कुछ स्वप्नों की भी चर्चा करता है। फ्रायड का मानना है कि स्वप्न अचेतन में जाने का राजमार्ग है। स्वप्न में रोगी जो कुछ कहता है, ये स्वप्नों के व्यक्त विषय होते हैं जो अचेतन अनुभवों के प्रतीक के रूप प्रकट होते हैं। 

अतः स्वप्नों के व्यक्त विषयों का विश्लेषण कर गुप्त या अव्यक्त विषयों को जानने पर अचेतन के भावों को जाना और समझा जा सकता है। अतएव स्वप्नों के व्यक्त विषयों (जो ‘स्वप्न कार्य’ द्वारा छद्म वेष धारण किए रहते हैं) का विश्लेषण कर अचेतन के दमित भावों और वर्तमान क्लेश के साथ के संबंधों के बारे में सूझ को विकसित करने में रोगी की मदद की जा सकती है। 

प्रतिरोध का विश्लेषण (Resistance Analysis) आत्मतंत्र या मुक्त साहचर्य, स्वप्न विश्लेषण या चिकित्सा के दरम्यान रोगी विविध प्रकार से प्रतिरोध का प्रदर्शन करता है, जैसे- चिकित्सा सत्र में नियत समय पर नहीं पहुँचना, बहाना बनाकर अनुपस्थित रह जाना, विचारों को व्यक्त करने में अनिच्छा दिखाना, अचानक चुप्पी साथ लेना आदि प्रतिरोध के विविध रूप हो सकते हैं।


FAQs

Q. संज्ञान चिकित्सा किस प्रकार के रोगियों के लिए ज्यादा लाभकारी है ? 

Ans. संज्ञान चिकित्सा अवसाद एवं चिंता से ग्रस्त रोगियों पर काफी लाभप्रद सिद्ध हुई है।

Q. पुनर्वास चिकित्सा में क्या होता है ?

Ans. पुनर्वास चिकित्सा में चिकित्सा से मुक्त रोगियों को पश्चात् देखभाल की सुविधा प्रदान की जाती है। 

Q. आश्रयदायी कारखाना का क्या अर्थ है ?

Ans. आश्रयदायी कारखाना में मानसिक रोगियों के कौशलों को सीखने, उपयोग करने एवं रोजगार प्राप्त करने का अवसर मिलता है।



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