VVI Class 12 Sociology Chapter 1 Notes In Hindi भारतीय समाज : एक परिचय

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Class 12 Sociology Chapter 1 Notes In Hindi


Class12th 
Chapter Nameभारतीय समाज : एक परिचय
Chapter numberChapter 1
Book NCERT
SubjectSociology
Medium Hindi
Study MaterialsNotes & Questions answer
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भारतीय समाज : एक परिचय


मनुष्य के सामूहिक रूप को समाज कहा जाता है। मनुष्य और समाज का घनिष्ठ संबंध है। दोनों एक-दूसरे पर आश्रित हैं। व्यक्ति समाज में ही रहकर अपना जीवन-यापन करता है। उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति समाज में ही होती है। 

समाज के सारे कार्यकलाप समाज के लोगों द्वारा पूरे किए जाते हैं। परिवार और समाज में रहकर ही लोग सभ्य बनते हैं और अपना विकास करते हैं। सामाजिक नियमों, सिद्धांतों और मूल्यों के आधार पर ही लोग अपने जीवन का सारा काम पूरा करते हैं। समाज के बारे में सारी बातों का ज्ञान जिस शास्त्र के द्वारा होता है। उसे समाजशास्त्र कहा जाता है।

VVI Class 12 Sociology Chapter 1 Notes In Hindi भारतीय समाज एक परिचय
भारतीय समाज : एक परिचय

समाजशास्त्र एक ऐसा विज्ञान है जिसमें समाज की घटनाओं, परिस्थितियों, सामाजिक स्वरूप तथा समाज की सभी बातों की जानकारी प्राप्त होती है। वास्तव में, समाजशास्त्र समाज के व्यवस्थित वैज्ञानिक अध्ययन पर आधारित होता है। 

व्यक्ति समाज में रहकर ही जब अपना जीवनयापन करता है, तो वह अपने समाज की सारी बातों को सीखता है और उसपर चलता है। एक महत्त्वपूर्ण अर्थ में समाजशास्त्र उन सभी विषयों से अलग है जिन्हें आपने पढ़ा हो ।

यह एक ऐसा विषय है जिसमें कोई भी शून्य से शुरुआत नहीं करता है। सभी को समाज के बारे में पहले से ही कुछ-न-कुछ पता होता है। 

अन्य विषयों को हम सिखाए जाने के कारण ही सीख पाते हैं, इनका ज्ञान हमें औपचारिक या अनौपचारिक तरह से विद्यालय, घर या अन्य संदर्भ में सिखाया पढ़ाया जाता है, परन्तु समाज के बारे में हमारा बहुत सारा ज्ञान सुस्पष्ट पढ़ाई के बगैर प्राप्त किया हुआ होता है। समाज के बारे में ज्ञान ‘स्वाभाविक’ या ‘अपने आप’ प्राप्त किया हुआ ही प्रतीत होता है, क्योंकि यह हमारे बड़े होने की प्रक्रिया का एक महत्त्वपूर्ण अभिन्न हिस्सा है। 

पहली कक्षा में प्रवेश कर रहे किसी बच्चे से हम यह अपेक्षा नहीं करते कि वह इतिहास, भूगोल, मनोविज्ञान या अर्थशास्त्र जैसे विषयों के बारे में पहले से ही कुछ जानता हो। लेकिन एक छह वर्षीय बच्चा भी समाज एवं सामाजिक संबंधों के बारे में कुछ न कुछ जरूर जानता है। 

जाहिर है कि अठारह साल के युवा वयस्क होने के नाते आप अपने समाज के बारे में बहुत कुछ जानते हैं इसलिए नहीं, कि आपने समाज का अध्ययन किया है, बल्कि महज इसीलिए, कि आप इस समाज में रहते हैं और इसमें पले-बढ़े हैं।

यह उस सामाजिक समूह और सामाजिक वातावरण का दृष्टिकोण होता है जिसमें हम समाजीकृत होते हैं। हमारे सामाजिक संदर्भ समाज एवं सामाजिक संबंधों के बारे में हमारे मतों, आस्थाओं एवं अपेक्षाओं को आकार देते हैं। 

यह आवश्यक नहीं है कि आस्थाएँ गलत ही हों, परन्तु यह गलत हो भी सकती है। कठिनाई यह है कि वे अक्सर अपूर्ण (संपूर्ण का विलोम ) एवं पूर्वाग्रहपूर्ण (निष्पक्ष का विलोम होती हैं। 



अतः हमारा ‘बिना सीखा गया’ ज्ञान या सहज सामान्य बोध अक्सर हमें सामाजिक वास्तविकता का केवल एक हिस्सा ही दिखलाता है। इसके अतिरिक्त यह सामान्यतः हमारे अपने सामाजिक समूह के हितों एवं मतों की तरफ झुका होता है।

समाजशास्त्र इस समस्या का समाधान एक ऐसे दृष्टिकोण के रूप में प्रस्तुत नहीं करता जिसके द्वारा संपूर्ण वास्तविकता को पूरी तरह निष्पक्ष तरीके से देखा जा सके। वास्तव में, समाजशास्त्रियों का विश्वास है कि ऐसा आदर्श परिप्रेक्ष्य या ‘प्रेक्षण स्थान’ होता ही नहीं है। 

हम हमेशा किसी निर्धारित स्थान पर खड़े होकर देख सकते हैं, और ऐसे प्रत्येक ‘स्थान’ से विश्व को केवल एक आशिक व ‘पक्षपाती’ दृष्टि से ही देखा जा सकता है। समाजशास्त्र हमें यह सीखने का निमंत्रण देता है कि संसार को केवल हमारे अपने दृष्टिकोण के अलावा हम से अलग लोगों के दृष्टिकोणों से कैसे देखा जाए। 

अलग-अलग अवस्थितियों से उत्पन्न विभिन्न प्रकार के पक्षपात व अयूरेपन से परिचित होकर हम एक महत्त्वपूर्ण सबक सीख सकते हैं।

सबसे सरल स्तर पर कहा जा सकता है कि भारतीय समाज और इसकी संरचना की समझ आपको एक सामाजिक नक्शा प्रदान करती है जिसमें आप अपने ठौर-ठिकाने, स्थान का पता लगा सकते हैं। 

भौगोलिक नक्शे की तरह, स्वयं का सामाजिक नक्शे में पता लगाना इस अर्थ में उपयोगी हो सकता है कि इससे आपको यह जानकारी मिलती है कि समाज में दूसरों से संबंध में आपकी स्थिति क्या है। उदाहरण के लिए मान लीजिए कि आप अरुणाचल प्रदेश में रहते हैं। 

अगर आप भारत के मौगोलिक नक्शे को देखेंगे तो आपको पता चलेगा कि आपका राज्य देश के उत्तर-पूर्वी कोने में स्थित है। आपको यह भी पता चलेगा कि आपका राज्य अनेक बड़े राज्यों, जैसे—उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र या राजस्थान की तुलना में छोटा है, परंतु यह अनेक अन्य राज्यों, जैसे- मणिपुर, गोवा, हरियाणा या पंजाब से बड़ा है। 

यदि आप प्राकृतिक विशेषताओं के नक्शे को देखेंगे तो आपको यह जानकारी मिल सकती है कि अन्य क्षेत्रों एवं राज्यों की तुलना में अरुणाचल का भू-भाग कैसा (पर्वतीय, वनों से भरपूर) है, यहाँ कौन से प्राकृतिक संसाधन भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं एवं इसी तरह की अन्य बातों के बारे में आप जान पाएँगे।

एक तुलनात्मक सामाजिक नक्शा आपको समाज में आपके निर्धारित स्थान के बारे में बता सकता है। उदाहरण के लिए, सत्रह या अठारह वर्ष की आयु में आप उस सामाजिक समूह के सदस्य हैं जिसे ‘युवा पीढ़ी’ कहा जाता है। 

भारत की लगभग 40% जनसंख्या आपकी या आपसे छोटे उम्र के लोगों की है। आप किसी विशेष क्षेत्रीय या भाषायी समुदाय (जैसे-गुजरात से गुजराती भाषी, आंध्र प्रदेश से तेलुगु भाषी) से संबंधित होंगे। आपके माता-पिता के व्यवसाय एवं आपके परिवार की आय के मुताबिक आप एक आर्थिक वर्ग (जैसे- निम्न, मध्यम वर्ग या उच्च वर्ग) के सदस्य भी अवश्य होंगे। 

आप एक विशेष धार्मिक समुदाय, एक जाति या जनजाति, या ऐसे ही किसी अन्य सामाजिक समूह के सदस्य भी हो सकते हैं। ऐसी प्रत्येक पहचान सामाजिक नक्शे में एवं सामाजिक संबंधों के ताने-बाने में आपका स्थान निर्धारित करती है। समाजशास्त्र आपकी समाज में पाए जाने वाले विभिन्न प्रकार के समूहों, उनके संबंधों एवं आपके अपने जीवन में उनके महत्त्वों के बारे में बतलाता है।

सामाजिक समूहों तथ्य सामाजिक संस्थाओं का अध्ययन करके मनुष्य समाज के सही चित्र को ग्रहण करता है। सामाजिक मान्यताओं, प्रयाओं, रीति-रिवाज का कुशल संचालन सामाजिक संस्थाओं द्वारा होता है। 

लोग समाज में ही रहकर सामाजिक संस्थाओं और सामाजिक समूहों, समुदाय तथा अन्य बातों का ज्ञान प्राप्त करते हैं। वास्तव में, समाजशास्त्र समाज के लोगों को ज्ञान की बातें उपलब्ध कराता है। अच्छे लोग अच्छे ज्ञान को प्राप्त करते हैं जबकि अज्ञानी लोग अपनी राय से भटक जाते हैं और अपने जीवन को सार्थक नहीं बना पाते हैं।

समाजशास्त्र में ज्ञान की जो बातें अच्छी रहती हैं, यदि मनुष्य इन बातों को ग्रहण करता है तो मनुष्य अपने लक्ष्य को प्राप्त करता है और जीवन में सफल होता है। समाजशास्त्र केवल आपका या अन्य लोगों का स्थान निर्धारित करने में मदद करने एवं विभिन्न सामाजिक समूहों के स्थानों का वर्णन करने के अलावा और भी बहुत कुछ सिखा सकता है। जैसा कि एक प्रसिद्ध

अमेरिकी समाजशास्त्री सी. राईट मिल्स ने लिखा है-समाजशास्त्र आपकी व्यक्तिगत परेशानियों एवं सामाजिक मुद्दों के बीच की कड़ियों एवं संबंधों को उजागर करने में मदद कर सकता है। व्यक्तिगत परेशानियों से मिल्स का तात्पर्य है विभिन्न प्रकार की व्यक्तिगत चिंताएँ, समस्याएँ या सरोकार जो सबके होते हैं।

इस तरह के सामाजिक नक्शे का एक स्वरूप हमें बचपन में ही समाजीकरण की प्रक्रिया प्राप्त होती है। वह सब तौर-तरीके जिनके द्वारा हमें अपने आसपास की दुनिया को समझना सिखाया जाता है, वह सब इस नक्शे को बनाने में शामिल है। यह सहजयोग का नक्शा है परन्तु जैसा कि पहले बताया जा चुका है। 

इस तरह के नक्शे सहज बोध के आंशिक व पक्षपातपूर्ण छोने के कारण भ्रमित कर सकते हैं या विकृत भी हो सकते हैं। हमारे सामान्य बोध के नक् के अलावा हमारे पास कोई अन्य तैयार नक्शा नहीं होता है, 

क्योंकि हम बहुत सारे या सभी सामाजिक समूहों में नहीं बल्कि केवल एक ही में समाजीकृत होते हैं। अगर हम अन्य प्रकार के नक्शे चाहते हैं तो हमें उन्हें बनाना सीखना होगा। एक समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य आपको विभिन्न प्रकार के सामाजिक नक्शों को बनाना सिखाता है।

भारतीय समाज एक प्राचीन समाज है। इसमें परम्परागत मूल्यों, नियमों और सिद्धांतों की प्रधानता है। हमारे देश के समाज में सभ्यता और संस्कृति का आदर्श मूल्य पाया जाता है। लेकिन समय के परिवर्तन के साथ-साथ भारतीय समाज में भी परिवर्तन आया है। 

वर्तमान समय में भारतीय समाज में प्राचीन नैतिक मूल्यों, परम्पराओं आडम्बरों, रीति-रिवाजों के साथ-साथ आधुनिक और आधुनिकता का सामंजस्य है। फिर भी यूरोपीय समाज की अपेक्षा भारतीय समाज में नैतिक आदर्श और संस्कृति की विशेषता वर्तमान है।


अति लघु उत्तरीय प्रश्न (VERY SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS)


1. समाजशास्त्र से आप क्या समझते हैं ?

Ans. समाजशास्त्र एक ऐसा शास्त्र है जिसमें समाज की घटनाओं, परिस्थिति और उसके स्वरूप तथा समाज के संबंध में संपूर्ण जानकारी की बातें की जाती हैं।

2. भारतीय समाज कैसा है ?

Ans. भारतीय समाज एक प्राचीन और परम्परागत समाज है जिसमें सभ्यता और संस्कृति, नैतिक मूल्य और उच्च आदर्श की बातें पायी जाती हैं। 

3. सहज-बोध से आप क्या समझते हैं ?

Ans. समाज के बारे में या अन्य किसी विषय वस्तु के बारे में जो ज्ञान कोई बच्चा, युवक या व्यक्ति अपने परिवार या समाज में रहकर प्राप्त करता है, उसे सहज-बोध कहा जाता है। सहज बोथ एक ऐसा ज्ञान है जो मनुष्य को सीखना नहीं पड़ता है, बल्कि समाज में रहकर वह अपने आप सीख लेता है।

4. स्ववाचक क्या है ?

Ans. समाजशास्त्र यह सीखा सकता है कि आप स्वयं को बाहर से कैसे देख सकते हैं। इसे ही स्ववाचक कहा जाता है। इसे आत्मवाचक भी कहते हैं। यह अपने बारे में सोचने, अपने दृष्टिकोण को लगातार अपनी ओर घुमाने की क्षमता है। 

5. पीढ़ी अन्तराल क्या है ?

Ans. युवा वर्ग और बुजुर्ग वर्ग के बीच का पीढ़ी अन्तराल एक सामाजिक प्रघटना है, जो अनेक समाजों और अनेक कालों में सामान्य रूप से पाया जाता है।


लघु उत्तरीय प्रश्न (SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS)


1. समाजशास्त्र को परिभाषित कीजिए। सहज-बोध ज्ञान क्या है ? 

Ans. समाजशास्त्र —– समाज की घटनाओं, परिस्थिति व उसके स्वरूप के बारे में जानकारी प्राप्त करना समाजशास्त्र कहलाता है। समाजशास्त्र समाज के व्यविस्थत वैज्ञानिक अध्ययन पर आधारित होता है।

सहज बोध—समाज के बारे में किसी अन्य विषय के बारे में जो ज्ञान कोई व्यक्ति या बच्चा अपने समाज या परिवार में रहकर लेता है उसे सहज बोध अर्थात् Common Sense कहते हैं। इस ज्ञान के लिए व्यक्ति को पुस्तकें इत्यादि पढ़ने की कोई आवश्यकता नहीं होती। उसे यह ज्ञान अपने आस-पास के वातावरण से ही सरलता से मिल जाता है। 

2. क्या कारण है कि समाजशास्त्र को पढ़ने या सीखने के लिए हमारा सहज अक्सर हमें छोड़ना पड़ता है ?  Or, ‘सहज-सामान्य-बोध’ हमें अक्सर समाज का एक ही हिस्सा दिखलाता है। इस तर्क को स्पष्ट कीजिए । 

Ans. यह तर्क उचित है कि समाजशास्त्र को सीखने से पूर्व सहज-बोध भूलने की प्रक्रियाएँ शामिल होती हैं। मुलाने से तात्पर्य यह है कि हमारा सहज बोध जो हमें हमारे आस-पास के समाज से मिला होता है, समाजशास्त्र में उपयोगी सिद्ध नहीं होता। यह एक विशिष्ट दृष्टिकोण से प्राप्त किया होता है। 

यह उस सामाजिक समूह और सामाजिक वातावरण का दृष्टिकोण होता है जिसमे हम समाजीकृत होते हैं, वह समाज जिसमें हम अपने सामाजिक संदर्भ समाज एवं सामाजिक संबंधों के बारे में अपने मतों, आस्थाओं एवं अपेक्षाओं को आकार देते हैं। अतः यह आस्थाएँ गलत भी हो सकती हैं यानी ये आस्थाएं समाजशास्त्र का पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने में सहयोगी सिद्ध न हों।

अतः हमारा ‘बिना सीखा गया’ या सहज-सामान्य बोध हमें सामाजिक वास्तविकता का केवल एक ही हिस्सा दिखाता है। इस सहज सामान्य-बोध के द्वारा हम समाज के दूसरे रूपों को नहीं देख पाते, जबकि समाज एक बहुत ही विशाल स्वरूप है जिसे जानने के लिए हमें अपने अधूरे सामान्य-बोध को भुलाना ही पड़ता है।


दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (LONG ANSWER TYPE QUESTIONS)


1. समाजशास्त्र से हमें क्या सीखने को मिलता है ?

Ans. समाजशास्त्र के माध्यम से ही हम यह सीख सकते हैं कि संसार को केवल अपने दृष्टिकोण के अलावा हमने से अलग लोगों के दृष्टिकोण से कैसे देखा जाए। इसमें अलग-अलग पक्षपात व अधूरेपन से हम एक महत्त्वपूर्ण सबक सीख सकते हैं। 

मानव समाज में सत्य की ओर बढ़ना हो तो सर्वप्रथम हमें यह स्वीकारना होगा कि सत्य एक नहीं, अनेक हैं और प्रत्येक सत्य अपने में अपूर्ण हैं। अर्थात् एक ही विषय के कई दृष्टिकोण हो सकते हैं और सभी दृष्टिकोण सही भी हो सकते हैं। समाजशास्त्र के क्षेत्र में सत्य की बहुलता एक समस्या है तो इसका समाधान है – तुलना । विभिन्न लोगों के अलग-अलग नजरियों को आमने-सामने रखना।

समाजशास्त्र की स्वाभाविक मुद्रा तुलनात्मक होती है। यह हमें सिखाता है कि हम दूसरों को किस प्रकार देख सकते हैं। भारतीय समाज व इसकी संरचना की समझ हमें एक सामाजिक नक्शा प्रदान करती है जिसमें हम स्वयं के स्थान या स्थिति का पता लगा सकते हैं।

इससे हमें यह जानकारी मिलती है कि समाज में दूसरों के संबंध में हमारी क्या स्थिति है। सामाजिक नक्शे में हम यह जानकारी प्राप्त करते हैं कि हम किस क्षेत्र विशेष या भाषायी समुदाय से संबंधित हैं। हमारे माता-पिता के व्यवसाय व आर्थिक वर्ग की जानकारी भी हमें सामाजिक नक्शे से प्राप्त हो सकती है। अतः समाजशास्त्र हमें समाज में पाए जाने वाले विभिन्न प्रकार के समूहों, उनके संबंधों के महत्त्व के बारे में बतलाता है। 


CLASS 12 NCERT SOLUTION IN ENGLISHCLASS12 NCERT SOLUTION IN HINDI
Historyइतिहास
Geography भूगोल
Political science राजनीति विज्ञान
English SubjectResult
Hindi SubjectHistory answer keys

2. समाजशास्त्र की परिभाषा दीजिए तथा इसकी विषय-वस्तु का वर्णन कीजिए ।

Ans. यों तो समाजशास्त्र के विषय का अध्ययन अन्य सामाजिक विज्ञान के साथ बहुत पहले से हो रहा था। लेकिन समाजशास्त्र का एक विज्ञान के रूप में विकास 10वीं शताब्दी में हुआ है। समाजशास्त्र शब्द का प्रयोग सबसे पहले फ्रांसीसी विद्वान अगस्त कॉम्ट (Auguste Comte) ने 1838 में किया था। 

इसके पहले अरस्तू और प्लेटो ने भी इस संबंध में अपने-अपने विचार दिये थे। लेकिन इन लोगों के विचार में स्थिरता नहीं आ पायी, क्योंकि इनलोगों ने राज्य और समाज के बीच के अन्तर को स्पष्ट नहीं किया था। अगस्त कॉम्ट ने केवल Sociology शब्द का ही प्रयोग नहीं किया है, बल्कि इसकी परिभाषा भी “Sociology of Human Society” के रूप में दी है। 

इन्होंने इसके क्षेत्र की सीमा को भी निर्धारित किया है। अगस्त कॉम्ट के पहले समाज विज्ञान के क्षेत्र में किसी भी विज्ञान का स्वतंत्र अस्तित्व नहीं था। सभी विज्ञान आपस में इस ढंग से मिले-जुले थे कि उन्हें न तो शुद्ध रूप से सामाजिक कहा जा सकता था और न राजनीतिक। लेकिन अगस्त कॉम्ट ही प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने सामाजिक चिन्तन को अलग करके इसे स्वतंत्र अस्तित्व प्रदान किया। 

इतना ही नहीं समाजशास्त्र को एक वैज्ञानिक रूप देने के लिए एक वैज्ञानिक अध्ययन पद्धति की रचना की ताकि समाज या सामाजिक घटनाओं का अध्ययन वैज्ञानिक ढंग से किया जा सके। अगस्त कॉम्ट की ये सारी देन समाजशास्त्र में होने के कारण ये ‘समाजशास्त्र के जनक’ (Father of Sociology) के नाम से पुकारे जाते हैं।

समाजशास्त्र के अर्थ की व्याख्या विद्वानों ने विभिन्न तरीके से की है। इनमें कुछ वैज्ञानिक हैं और कुछ अवैज्ञानिक हैं ये निम्नलिखित रूप में हैं- 

(1) साधारण अर्थ- प्रायः सभी लोगों में ऐसी धारणा प्रचलित है कि समाजशास्त्र दूसरे सामाजिक विज्ञानों का मिश्रण है। सभी सामाजिक विज्ञानों से थोड़े-थोड़े अंशों को लेकर समाजशास्त्र का निर्माण हुआ है। 

(2) शाब्दिक अर्थ समाजशास्त्र अंग्रेजी भाषा के Sociology का हिन्दी रूपान्तर है। यह दो शब्दों के मेल से बना है। इसक पहला शब्द “Socius” है जिसे लेटिन भाषा से लिया गया। है। दूसरा शब्द “Logas” है जिसे ग्रीक भाषा से लिया गया है। 

(3) वैज्ञानिक अर्थ कुछ ने समाजशास्त्र की व्याख्या शाब्दिक अर्थ के आधार पर की है। इस दृष्टिकोण से ही कहा जा सकता है कि सामाजिक संबंधों का व्यवस्थित और क्रमबद्ध अध्ययन करनेवाला शास्त्र ही समाजशास्त्र है।

उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर यह कहा जा सकता है कि समाजशास्त्र समाज का विज्ञान है जो समाज का, सामाजिक संबंधों का, सामाजिक जीवन का, सामाजिक कार्यों का, जीवन में मानव व्यवहार का सामाजिक व्यवस्था आदि का वैज्ञानिक अध्ययन करता है।

समाजशास्त्र की विभिन्न परिभाषाओं के गहन अवलोकन के आधार पर प्रमुख रूप से दो वर्ग स्पष्ट होते हैं-प्रथम वर्ग में वे आते हैं जो कि समाजशास्त्र को सामाजिक संबंधों का अध्ययन करनेवाला शास्त्र मानते हैं तथा दूसरे वर्ग में उन्हें रखा जाता है जो इसे संपूर्ण समाज का अध्ययन करनेवाला विज्ञान मानते हैं। 

समाजशास्त्र की विषय-वस्तु — समाजशास्त्र एक नवीन विज्ञान है। अतएव इसकी – विषय-वस्तु अनिश्चित है। यह बात सच है कि विज्ञान अपनी प्रगति कर रहा है उसकी विषय-वस्तु का अध्ययन करना अवश्य ही एक दुष्कर कार्य है, क्योंकि आज हम इसकी विषय-वस्तु निश्चित कर लें तो ऐसा संभव है कि कुछ समय बाद इस विषय-वस्तु में परिवर्तन करना पड़ेगा। इन सारी परेशानियों के बाद भी कुछ विद्वानों ने समाजशास्त्र की विषय-वस्तु की चर्चा की है। प्रसिद्ध फ्रांसीसी विद्वान दुखम ने समाजशास्त्र की विषय-वस्तु को तीन भागों में बाँटा है-

(1) सामाजिक स्वरूपशास्त्र (Social Morphology) — इसके अन्दर जनसंख्या, भौगोलिक स्थिति तथा समाज पर पड़नेवाले अनेक प्रभावों का अध्ययन किया जाता है। 

(2) सामाजिक शरीरशास्त्र (Social Physiology) — समाज के अस्तित्व बनाये रखने वाले विभिन्न कारकों का इसके अन्दर अध्ययन होता है। इसे दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि जिन तत्वों द्वारा समाज का निर्माण होता है उनका अध्ययन इसी श्रेणी में किया जाता है। 

(3) सामान्य समाजशास्त्र (General Sociology) – इसके अन्दर समाज का सामान्य अध्ययन तथा उन विषयों का अध्ययन किया जाता है जो दूसरे सामाजिक विज्ञानों से छूट जाता है। 

जिन्सबर्ग (Ginsberg) ने समाजशास्त्र की विषय-वस्तु को निम्नलिखित चार श्रेणियों में बाँटा है- 

(1) सामाजिक स्वरूपशास्त्र (Social Morphology) सामाजिक स्वरूप शास्त्र के अन्दर संघर्ष, प्रतिद्वन्द्विता आदि सामाजिक प्रक्रियाओं का अध्ययन किया जाता है। 

(2) सामाजिक प्रक्रियाएँ (Social Processes) – इसके अन्दर संघर्ष, प्रतिद्वन्द्विता आदि सामाजिक प्रक्रियाओं का अध्ययन किया जाता है।

(3) सामाजिक नियंत्रण (Social Pathology) — समाज में व्यक्तित्व के व्यवहार को नियंत्रित करने वाले तत्वों, नैतिकता, रीति-रिवाज, धर्म परम्परा इत्यादि का अध्ययन किया जाता है। 

(4) सामाजिक व्याधिकी (Social Pathology)- समाजशास्त्र सिर्फ संगठित समाज या व्यवहार का ही अध्ययन नहीं करता, बल्कि असंगठित तथा विघटित समाज व्यवहार का भी अध्ययन करता है।

इस प्रकार मैकाइवर और पेज ने भी माना है कि समाजशास्त्र की विषय-वस्तु सामाजिक संबंध या समाज है। उनके शब्दों में, “Sociology is about social relationship, a net work of human relationship we call society.”

अर्थात् समाजशास्त्र की विषय-वस्तु सामाजिक संबंध का ही अध्ययन करती है। इसी तरह उनका कहना है कि सभी संबंधों को हम सामाजिक नहीं कह सकते हैं। जैसे-टेबुल पर रखी पुस्तक और टेबुल का जो संबंध है उसे सामाजिक संबंध नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि दे एक-दूसरे को प्रभावित नहीं करते हैं और न एक-दूसरे के अस्तित्व से परिचित हैं। 

सामाजिक संबंधों की स्थापना तभी हो सकती है जब दो या दो से अधिक मनुष्य आपस में इस तरह से संबंधित हो कि एक-दूसरे को प्रभावित करते हो और उन्हें एक-दूसरे के अस्तित्व का ज्ञान हो। ऐसे संबंधों का ही अध्ययन समाजशास्त्र की विषय-वस्तु है। 

इस तरह अध्ययन के उपरांत यह कहा जा सकता है कि साधारण तौर पर समाजशास्त्र की विषय-वस्तु के अन्दर निम्नलिखित तत्त्वों का अध्ययन होता है-

(i) समाज और प्रकृति का अध्ययन, 

(ii) समाज और संस्कृति का अध्ययन, 

(iii) सभ्यता, सामाजिक संहिता और नियमों का अध्ययन,

(iv) विभिन्न सामाजिक संबंधों का अध्ययन,

(v) संगठित समाज के साथ-साथ असंगठित समाज और समस्याओं का अध्ययन ।


FAQs


Q. उपनिवेशवाद से आप क्या समझते हैं ?

Ans. जब कोई शासक या प्रशासक तंत्र अपने साम्राज्य का विकास करना चाहता है, तब वह उपनिवेशवाद को अपनाता है। सशक्त शासक जब दूसरे शासक को पराजित करके अपने साम्राज्य के तहत विभिन्न उपनिवेश स्थापित करता है, तो ऐसी क्रिया को ही उपनिवेशवाद कहा जाता है। 

Q. राष्ट्रवाद क्या है ?

Ans. जब उपनिवेशवाद के शासक अपने उपनिवेश के लोगों पर अत्याचार करने लगते हैं, तो राष्ट्रवाद का जन्म होता है। राष्ट्रवाद एक ऐसी चीज है जिसमें लोग शोषणमुक्त होना चाहते हैं। इसके लिए राष्ट्रवादी आंदोलन चलाकर लोग देश को स्वतंत्र करना चाहते हैं। 

Q. भारतीय समाज की क्या विशेषताएँ हैं ?

Ans. भारतीय समाज की प्रमुख विशेषताएं इस प्रकार हैं- (i) भारतीय सभ्यता और संस्कृति, (i) वर्ण-व्यवस्था, (ii) जाति व्यवस्था, (iv) परंपरागत एवं रूढ़िवादी व्यवस्था, (v) जाति व्यवस्था, (vi) संयुक्त परिवार, (vii) अनेकता में एकता, (viii) ग्रामीण समुदाय, (ix) अन्ध-विश्वास की प्रवृत्ति, (x) ग्रामीण समुदाय।

NOTES & QUESTIONS ANSWER


  1. Introducing Indian Society
  2. The Demographic Structure of the Indian Society
  3. Social Institutions: Continuity and Change
  4. The Market as a Social Institution
  5. Patterns of Social Inequality and Exclusion
  6. The Challenges of Cultural Diversity
  7. suggestions for projects work
  1. Structural Change
  2. Cultural Change
  3. The Story of Indian Democracy
  4. Change and Development in Rural Society
  5. Change and Development in Industrial Society
  6. Globalisation and Social Change
  7. Mass Media and Communications
  8. Social Movements

MCQS IN ENGLISH


  1. Introducing Indian Society
  2. The Demographic Structure of the Indian Society
  3. Social Institutions: Continuity and Change
  4. The Market as a Social Institution
  5. Patterns of Social Inequality and Exclusion
  6. The Challenges of Cultural Diversity
  1. Structural Change
  2. Cultural Change
  3. The Story of Indian Democracy
  4. Change and Development in Rural Society
  5. Change and Development in Industrial Society
  6. Globalisation and Social Change
  7. Mass Media and Communications
  8. Social Movements

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