VVI Class 12 Sociology Chapter 3 Notes In Hindi सामाजिक संस्थाएँ : निरंतरता एवं परिवर्तन

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VVI Class 12 Sociology Chapter 3 Notes In Hindi सामाजिक संस्थाएँ : निरंतरता एवं परिवर्तन


Class12th 
Chapter Nameसामाजिक संस्थाएँ : निरंतरता एवं परिवर्तन
Chapter numberChapter 3
Book NCERT
SubjectSociology
Medium Hindi
Study MaterialsNotes & Questions answer
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सामाजिक संस्थाएँ : निरंतरता एवं परिवर्तन


व्यक्तियों के समूह को समाज कहा जाता है। एक समाज में विभिन्न प्रकार के लोग आपस में मिलकर रहते हैं और अपने-अपने कार्यों को करते हैं जिससे उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति होती है। समाज में जो लोग रहते हैं उनकी संख्या के सम्मिलित रूप को जनसंख्या कहा जाता है। विभिन्न वर्गों, जातियों, धर्मों और समुदायों के सम्मिलित जनसंख्या से समाज का निर्माण होता है।

समाज में विभिन्न सामाजिक संस्थाएं होती हैं जिनमें जाति एवं जाति-व्यवस्था, जनजातीय समुदाय, परिवार इत्यादि हैं। ये सभी समाज में मिलकर रहते हैं। सामाजिक संस्थाओं में निरंतरता और परिवर्तन सदा होते रहते हैं। प्राचीन समय से लेकर वर्तमान समय तक समाज का जो रूप सामने आया है । 

उससे यह स्पष्ट है कि सामाजिक संस्थाओं में परिवर्तन होते रहे हैं और समय के अनुसार निरंतर विकास होता रहा है। इसी के कारण प्राचीन सभ्यता और संस्कृति से समाज में नए-नए विकास होते रहे हैं। 

VVI Class 12 Sociology Chapter 3 Notes In Hindi सामाजिक संस्थाएँ निरंतरता एवं परिवर्तन

यही कारण है कि आज का समाज एक विकसित और सभ्य समाज बन चुका है। जाति एक प्राचीन सांस्कृतिक संस्थान है जो कि हजारों वर्षों से भारतीय इतिहास एवं संस्कृति का हिस्सा है। जाति भारतीय उपमहाद्वीप से जुड़ा अनूठा संस्थान है। जाति-व्यवस्था अपने आप में अपवाद है। यह हिंदू समाज की संस्थानात्मक विशेषता है पर इसका प्रचलन भारतीय उपमहाद्वीप के अन्य धार्मिक समुदायों में भी फैला है। 

(1) जाति की सदस्यता के साथ विवाह संबंधी कठोर नियम शामिल होते हैं अर्थात् विवाह समूह के सदस्यों में ही हो सकता है. 

(2) जातियों में हमेशा उप-जातियाँ होती हैं और कभी-कभी उप-जातियों में भी उप-उप जातियाँ होती हैं।

जब जाति जन्म द्वारा कठोरता से निर्धारित हो गई, उसके बाद किसी व्यक्ति के लिए सैद्धांतिक तौर पर कभी भी उसकी जीवन स्थिति बदलना असंभव था। उच्च जाति के लोगों

का स्तर हमेशा उच्च व निम्न जाति के लोगों का स्तर हमेशा निम्न ही रहता था ।

सैद्धांतिक तौर पर जाति व्यवस्था को सिद्धांतों के दो समुच्चयों के मिश्रण के रूप में समझा जा सकता है एक, भिन्नता और अलगाव पर आधारित है और दूसरा, सम्पूर्णता और अधिक्रम पर । 

प्रत्येक जाति के समाज में एक विशिष्ट स्थान के साथ-साथ एक क्रम श्रेणी भी होती है । धार्मिक या कर्मकाण्डीय दृष्टि से जाति की अधिक्रमित व्यवस्था ‘शुद्धता’ और ‘अशुद्धता’ के बीच के अंतर पर आधारित होती है। वह जातियाँ जिन्हें कर्मकांड की दृष्टि से शुद्ध माना जाता है, उनका स्थान उच्च होता है। 

अशुद्ध जातियों को निम्न स्थान दिया जाता है । इतिहासकारों के अनुसार युद्धों में पराजित हुई अक्सर जातियाँ निम्न जातियाँ थीं । प्रत्येक जाति का अपना स्थान तय है। वह स्थान किसी भी अन्य जाति को नहीं दिया जा सकता । सैद्धांतिक तौर पर यह किसी भी प्रकार की परिवर्तनशीलता की अनुमति नहीं देती है ।

उपनिवेशवाद और जाति- एक सामाजिक संस्था के रूप में जाति के वर्तमान स्वरूप को औपनिवेशिक काल और साथ ही स्वतंत्र भारत में तीव्र गति से हुए परिवर्तनों द्वारा मजबूती से आंकार प्रदान हुआ । 

औपनिवेशिक काल के दौर में सभी प्रमुख सामाजिक संस्थाओं में विशेष रूप से जाति-व्यवस्था में प्रमुख परिवर्तन आए। जाति के विषय में सूचना एकत्र करने का अब तक का सबसे महत्त्वपूर्ण सरकारी प्रयत्न जनगणना के माध्यम से किया गया। 

जनगणना के कार्य को सर्वप्रथम 1860 के दशक में प्रारम्भ किया गया । 1901 में हरबर्ट रिसले के निर्देशन में कराई गई जनगणना विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण थी। क्योंकि इसमें किसी क्षेत्र में जाति को अन्य जातियों की तुलना में सामाजिक दृष्टि से कितना ऊँचा और नीचा स्थान प्राप्त है और तद्नुसार श्रेणीक्रम में प्रत्येक जाति की स्थिति निर्धारित कर दी गई। 

औपनिवेशिक काल के अंतिम दौर में प्रशासन ने पददलित जातियों, जिन्हें ‘दलित वर्ग’ कहा जाता था, के कल्याण में रुचि ली। इस प्रयत्न के अंतर्गत ही 1935 का भारत सरकार अधिनियम पारित किया गया जिसने राज्य द्वारा विशेष व्यवहार के लिए निर्धारित जातियों और जनजातियों की सूचियों या ‘अनुसूचियों’ को वैध मान्यता प्रदान कर दी।

इस प्रकार उपनिवेशवाद ने जाति संस्था में अनेक प्रमुख परिवर्तन किए । जाति का समकालीन रूप दलित वर्गों व अछूत समझी जाने वाली जातियों के संगठित करने के प्रयत्न राष्ट्रवादी आंदोलन प्रारम्भ होने से पहले ही 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में प्रारम्भ हो चुके थे । महात्मा गाँधी व बाबा साहब अम्बेडकर दोनों ने ही 1920 के दशक से छुआछूत के विरुद्ध आंदोलन शुरू किए। 

राष्ट्रवादी आंदोलन में मुखरित यह प्रबल दृष्टिकोण जाति को एक सामाजिक कुरीति और भारतीयों के बीच फूट डालने की एक युक्ति मानता था । लेकिन राष्ट्रवादी नेतागण जिनमें महात्मा गाँधी प्रमुख थे, सबसे नीची जातियों के उत्थान के पक्ष में समर्थन जुटाने के लिए प्रयत्नशील रहे । 

राज्य के विकास संबंधी कार्यकलाप और निजी उद्योग की संवृद्धि ने भी आर्थिक परिवर्तन में तीव्रता और गहनता लाकर अप्रत्यक्ष रूप से जाति संस्था को प्रभावित किया। अंतर्विवाह यानि अपनी जाति के भीतर विवाह करने की परिपाटी, आधुनिकीकरण और परिवर्तन से बड़े तौर पर अप्रभावित रही। 



आज भी अधिकांश विवाह जाति की परिसीमाओं के भीतर ही होते हैं। स्वतंत्र भारत में प्रारम्भ से ही लोकतांत्रिक राजनीतिक गहनता से जाति आधारित रही है ।1980 के दशकों से तो हमने स्पष्ट रूप से जाति आधारित राजनीतिक दलों को उभरते देखा है। ‘संस्कृतिकरण’ एक ऐसी प्रक्रिया का नाम है जिसके द्वारा जाति की धार्मिक क्रियाओं, घरेलू या सामाजिक परिपाटियों को अपनाकर अपनी सामाजिक प्रस्थिति को ऊँचा करने का प्रयत्न करते हैं । 

‘प्रबल जाति’ शब्द का प्रयोग ऐसी जातियों का उल्लेख करने के लिए किया जाता है, जिनकी जनसंख्या काफी बड़ी होती थी और जिन्हें स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद किए गए आंशिक भूमि सुधारों द्वारा भूमि के अधिकार प्रदान किए गए थे । इन भूमि-सुधारों ने पहले के दावेदारों से अधिकार छीन लिए थे। ये दावेदार ऊँची जातियों के ऐसे सदस्य होते थे जो इस अर्थ में ‘अनुपस्थिति यानि दूरवासी जमींदार’ थे कि वे अपना लगान वसूल करने के अलावा कृषक अर्थव्यवस्था में कोई भूमिका अदा नहीं करते थे ।

समकालीन दौर में जाति-व्यवस्था में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण फिर भी विरोधात्मक परिवर्तनों में से एक परिवर्तन यह है कि अब जाति व्यवस्था उच्च जातियों के लिए अदृश्य होती जा रही है । ‘जनजातीय’ एक आधुनिक शब्द है जो ऐसे समुदायों के लिए प्रयुक्त होता है जो बहुत पुराने हैं और उपमहाद्वीपों के सबसे पुरानी अधिवासी हैं। जहाँ तक सकारात्मक विशिष्टताओं का संबंध है, जनजातियों को उनके ‘स्थायी’ तथा ‘अर्जित’ विशेषकों के अनुसार विभाजित किया गया है । 

भाषा की दृष्टि से जनजातियों को चार श्रेणियों में बाँटा गया है । इनमें से दो श्रेणियों अर्थात् भारतीय आर्य व द्रविड़ परिवार की भाषाएँ शेष जनसंख्या द्वारा भी बोली जाती हैं। 1960 के दशकों में विद्वानों के बीच इस प्रश्न को लेकर वाद-विवाद होता रहा कि क्या जनजातियों को जाति आधारित कृषक समाज के एक सिरे का विस्तार माना जाए । 

जो विद्वान विस्तार के पक्ष में थे, उनका कहना था कि जनजातियाँ जाति आधारित कृषक समाज से मौलिक रूप से भिन्न नहीं हैं, लेकिन उनमें संस्तरीकरण बहुत कम हुआ और संसाधनों के स्वामित्व के मामले में वे समुदाय आधारित अधिक और व्यक्ति आधारित कम हैं । 

1970 के दशक तक आते-आते जनजाति की सभी प्रमुख परिभाषाएं दोषपूर्ण दिखाई देने लगी। कुछ विद्वानों का मानना है कि जनजातियों को ऐसे ‘आदिम’ अर्थात् मौलिक अथवा विशुद्ध समाज जो सभ्यता से आते रहे हैं, मानने का कोई सुसंगत आधार नहीं है। 

इसके स्थान पर उनका यह प्रस्ताव है कि जनजातियों को ऐद्वितीयक घटना माना जाए जो पहले से विद्यमान राज्यों के बीच शोषणात्मक और उपनिवेशवादी संपर्क के परिणामस्वरूप अस्तित्व में आया । 18वीं तथा 19वीं शताब्दियों में जनजातीय इलाकों में अनेक विद्रोह हो जाने के बाद औपनिवेशिक सरकार ने ‘अपयर्जित’ और आंशिक रूप से ‘अपवर्जित’ इलाके घोषित किए, जहाँ गैर जनजातीय लोगों का प्रवेश पूरी तरह निषिद्ध सा विनियमित था। 

1940 के दशक में ‘पृथक्करण बनाम एकीकरण’ विषय पर जो प्रसिद्ध वाद-विवाद चला, वह जनजातीय समाजों की पृथस्कृत संपूर्ण अस्तित्व की मानक तस्वीर पर ही आधारित था । इस पक्ष का कहना था कि जनजातीय लोगों को व्यापारियों, साहूकारों तथा हिन्दू धर्म प्रचारकों से बचाए रखने की आवश्यकता है । 

क्योंकि ये सभी लोग जनजातियों का अलग अस्तित्व मिटाकर उन्हें भूमिहीन श्रमिक बनाना चाहते हैं । दूसरी ओर एकीकरण पक्ष का कहना था कि जनजातीय लोग पिछड़े हुए हिंदू ही है और उनकी समस्याओं का समाधान उसी परिधि की रूपरेखा के भीतर खोजा जाए जो अन्य पिछड़े वर्गों के मामले में निर्धारित की गई थी ।

परिवार की संरचना का अध्ययन इसके एक सामाजिक संस्था के रूप में और समाज की अन्य सामाजिक संस्थाओं के साथ उसके संबंधों के बारे में दोनों ही रूपों में किया जा सकता है। 


CLASS 12 NCERT SOLUTION IN ENGLISHCLASS12 NCERT SOLUTION IN HINDI
Historyइतिहास
Geography भूगोल
Political science राजनीति विज्ञान
English SubjectResult
Hindi SubjectHistory answer keys

परिवार का मुखिया एक स्त्री या पुरुष भी हो सकते हैं। यह हमारे जीवन का एक अभिन्न अंग है । हमारे लिए इसका अस्तित्व स्वीकृत है। परियारों की संरचनाएँ भिन्न-भिन्न होती हैं । यह परिवर्तन कभी-कभी तो आकस्मिक तौर पर होते रहते हैं, जब कोई लड़ाई छिड़ जाती है अथवा लोग काम की तालाश में अन्यत्र जा बसते हैं। 

आवास के नियम के अनुसार कुछ समाज विवाह और पारिवारिक प्रथाओं के मामले में पत्नी स्थानिक और कुछ पति स्थानिक होते हैं। उत्तराधिकार के नियमानुसार, मातृवंशीय समाज में जायदाद माँ से बेटी को मिलती है और पितृवंशीय समाज में पिता से पुत्र को। 

हालांकि मातृवंशीय समाज अवश्य पाए जाते हैं अर्थात् समाज जहाँ स्त्रियाँ अपनी माताओं से उत्तराधिकार के रूप में जायदाद पाती हैं, परन्तु उस पर उनका अधिकार नहीं होता और न ही सार्वजनिक क्षेत्र में उन्हें निर्णय लेने का कोई अधिकार होता है । अतः परिवार की संरचना में जो बदलाव आता है, उसके साथ ही सांस्कृतिक विचार मानकों और मूल्यों में भी परिवर्तन हो जाते हैं ।


sociology class 12 chapter 3 questions and answers in hindi


1. जाति व्यवस्था में पृथक्करण (Separation) और अधिक्रम (Hierarchy) की क्या भूमिका है ?

Ans. जाति व्यवस्था अपने आप में ही अपवाद का विषय है। इसका प्रचलन अन्य पार्मिक समुदायों-ईसाइयों, मुसलमानों, सिखों में भी फैला हुआ है। जाति एक व्यापक शब्द है। जो किसी भी चीज के प्रकार या वंश श्रेणी को संबोधित करने के लिए प्रयोग किया जा सकता है। इसमें अचेतन वस्तुओं से लेकर पेड़-पौधों, जीव-जन्तु व मनुष्य भी शामिल होते हैं ।

जाति शब्द का प्रयोग किसी भी वस्तु की अधिकता व उसकी पहचान के लिए किया जाता है। भारतीय भाषाओं में जाति शब्द का प्रयोग सामान्यतः जाति संस्थान के संदर्भ में ही किया जाता है। जाति क्षेत्रीय या स्थानीय उपवर्गीकरण का रूप है जिसमें हजारों जातियों एवं उप-जातियों से बनी अत्यधिक व्यवस्था शामिल होती है

जाति व्यवस्था की उत्पत्ति के सुनिश्चित काल पर विद्वानों में मतभेद जारी है। इस बात पर अभी तक विचार किया जाता है। सामान्यतः यह माना जाता है कि चार वर्णों का वर्गीकरण (लगभग तीन हजार साल पुराना है । विभिन्न कालों में जाति व्यवस्था के विभिन्न स्वरूप रहे हैं।

2. वे कौन से नियम हैं जिनका पालन करने के लिए जाति व्यवस्था बाध्य करती है ? कुछ के बारे में बताइए । 

Ans. प्रत्येक जाति व्यवस्था के अपने निर्धारित नियम होते हैं जिन्हें जाति के लोगों को अपनाना पड़ता है। किसी एक जाति व्यवस्था के नियमों का उल्लेख इस प्रकार है-

(1) जाति जन्म से ही निर्धारित होती है। माता-पिता की जाति को ही बच्चे को अपनाना पड़ता है। जाति चुनाव का विषय नहीं होती और न ही इसे कभी बदला जा सकता है । जाति के चुनाव का अधिकार भी हमारे पास नहीं होता । अतः शुरू से निर्धारित जाति को आने वाली पीढ़ियों को अपनाना पड़ता है । 

(2) जातीय सदस्यता में खाने-पीने व बाँटने के बारे में नियम शामिल होते हैं। खाना कैसा खाया जाए, कैसा नहीं व किससे बाँट के खाया जाए, किससे नहीं आदि नियम भी जाति व्यवस्था में शामिल होते हैं ।

(3) प्रत्येक जाति व्यवस्था में विवाह सम्बन्धी कठोर नियम भी शामिल होते हैं। जाति व्यवस्था के नियमानुसार विवाह समूह के सदस्यों में ही हो सकते हैं। एक जाति के सदस्य को किसी दूसरी जाति के सदस्य से विवाह करने की अनुमति नहीं होती ।

(4) जाति के श्रेणी एवं प्रस्थिति के एक अधिक्रम में संयोजित अनेक जातियों की एक व्यवस्था शामिल होती है । प्रत्येक व्यक्ति की एक जाति निर्धारित होती है व उस जाति में उसका स्थान भी निर्धारित होता है। जहाँ अनेक जातियों की अधिक्रमित स्थिति, विशेषकर मध्यक्रम की श्रेणीयों में, एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में बदल सकती है, पर अधिक्रम हमेशा पाया जाता है । 

(5) पारंपरिक तौर पर जातियाँ व्यवसाय से जुड़ी होती थीं। एक जाति में जन्म लेने वाला व्यक्ति उस जाति से जुड़े व्यवसाय को ही अपना सकता था। अतः वे व्यवसाय वंशानुगत थे । वे व्यवसाय पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होते थे। 

3. उपनिवेशवाद के कारण जाति व्यवस्था में क्या-क्या परिवर्तन आए ? 

Ans. विद्वत्जन मानते हैं कि औपनिवेशिक काल के दौर में सभी प्रमुख सामाजिक संस्थाओं में और विशेष रूप से जाति व्यवस्था में प्रमुख परिवर्तन आए । एक सामाजिक संस्था के रूप में जाति के वर्तमान स्वरूप को औपनिवेशिक काल में हुए परिवर्तनों द्वारा मजबूति से आकार प्रदान किया गया। 

ब्रिटिश प्रशासकों ने देश पर कुशलतापूर्वक शासन करना सीखने के उद्देश्य से जाति व्यवस्थाओं की, जटिलताओं को समझने का प्रयत्न किया व विभिन्न जनजातियों तथा जातियों की ‘प्रथाओं और तीर-तरीकों’ के सर्वेक्षण किए गए। ब्रिटिश भारतीय सरकार

ने इस दिशा में कठोर कदम उठाए । औपनिवेशिक शासन द्वारा किए किए अन्य हस्तक्षेपों ने भी इस संस्था में अपना प्रभाव दिखाया। इनके द्वारा जाति व्यवस्था में किए गए परिवर्तन इस प्रकार हैं– 

(I) पंजाब की भाँति अन्य क्षेत्रों में सिंचाई की व्यवस्था की गई व कई योजनाएँ प्रारंभ की गई । विभिन्न जाति के लोगों को वहाँ बसाने के प्रयत्न किए गए। इन सभी प्रयत्नों का एक जातीय आयाम था ।

(2) भू-राजस्व व्यवस्थाओं और तत्संबंधी प्रबंधों तथा कानूनों ने उच्च जातियों के रूढिगत अनेकार्य किया। जमीनों को सामंतों के हाथों से निकालकर विभिन्न जातियों को सौंप दिया गया। ये जातियाँ अब जमीन की मालिक बन गई थी और जमीन की उपज व अन्य कई प्रकार के जनों पर उनका दावा स्थापित हो गया था। 

(3) औपनिवेशिक काल के अंतिम दौर में प्रशासन ने दलित वर्ग कही जाने वाली जातियों के कल्याण में रुचि ली। 

(4) विभिन्न जातियों के कल्याण के अंतर्गत 1935 का भारत सरकार अधिनियम पारित किया गया, जिसमें राज्य द्वरा विशेष व्यवहार के लिए निर्धारित जातियों तथा जनजातियों की ‘यो’ या ‘अनुसूचियों को मान्यता प्रदान कर दी गई । 

(5) वे जातियाँ जो बससे नीचे थीं य जिनके साथ सबसे अधिक भेदभाव बरता जाता था तथा जिनमें ‘अछूत’ कही जाने वाली अस्पृश्य जातियाँ थीं उन्हें अनुसूचित जातियों की श्रेणी में शामिल किया गया।

4. किन अर्थों में नगरीय उच्च जातियों के लिए जाति अपेक्षाकृत अदृश्य हो गई है ?

Ans. नगरीकरण और शहरों में सामूहिक रहन-सहन की परिस्थितियों ने सामाजिक अंतः किया में जाति पृथक्कृत स्वरूपों का अधिक समय तक चलना मुश्किल कर दिया है । आधुनिक शिक्षा प्राप्त भारतीय व्यक्तिवाद और योग्यता तंत्र अर्थात् योग्यता को महत्त्व देने के उदार विचारों से आकर्षित हुए और उन्होंने अधिक अतिवादी जातीय व्यवहारों को छोड़ना प्रारम्भ कर दिया । 

समकालीन दौर में जाति व्यवस्था में कई विरोधाभासी महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए। सबसे प्रमुख परिवर्तन यह है कि जाति व्यवस्था उच्च जातियों, नगरीय मध्यम व उच्च वर्गों के लिए ‘अदृश्य’ होती जा रही है। इन समूहों के लिए, जातीयता का महत्त्व सचमुच कम हो गया है। क्योंकि अब इसका कार्य भली-भांति सम्पन्न हो चुका है। उच्च जातियों के लिए जाति अपेक्षाकृत अदृश्य ठो गई है। इसके कई कारण हो सकते हैं।

1. अवसरों का लाभ इन समूहों को तीव्र विकास द्वारा अवसरों का पूरा-पूरा लाभ उठाने के लिए आवश्यक आर्थिक तथा शैक्षिक संसाधन उपलब्ध करवाए गए । 

2. विभिन्न क्षेत्रों में सहायता ऊँची जातियों के संभ्रांत लोग आर्थिक सहायता प्राप्त सार्वजनिक शिक्षा, विशेष रूप से विज्ञान, प्रौद्योगिकी, आयुर्विज्ञान तथा प्रबन्धन में व्यावसायिक शिक्षा से लाभान्वित होने में सफल हुए। 

3. नौकरियों में विस्तारों को लाभ-इन समूहों ने स्वतंत्रता प्राप्ति के प्रारम्भिक दशकों में राजकीय क्षेत्र की नौकरियों में हुए विस्तारों का भी लाभ उठाया।

5. भारत में जनजातियों का वर्गीकरण किस प्रकार किया गया है ? 

Ans. जनजातियों को उनके ‘स्थायी’ तथा ‘अर्जित’ विशेषकों के अनुसार विभाजित किया गया है । इनका वर्गीकरण इस प्रकार है- 

1. स्थायी विशेषक— इसमें भाषा, शारीरिक विशिष्टताएँ और पारिस्थितिक आवास शामिल हैं । भारत के कुछ राज्यों में आबादी अधिक हैं तो कुछ में कम । इन राज्यों में जनजातियाँ- भी बसी हुई हैं। देश के कुछ भागों में जनजातियों को चार श्रेणियों में विभाजित किया गया है। 

भारतीय आर्य व द्रविड़ परिवार की भाषाएँ भारत की अधिकतर जनसंख्या द्वारा बोली जाती हैं जहाँ 1% जनजातियों के लोग भारतीय आर्य परिवार की भाषाएँ हैं- आस्ट्रिक और तिब्बती-बर्मी । तिब्बती-बर्मी परिवार की भाषाएँ 80% जनसंख्या द्वारा बोली जाती हैं। आस्ट्रिक व तिब्बती-बर्मी परिवार की भाषाएँ मुख्य रूप से जनजातियों द्वारा ही बोली जाती हैं।

भारत में अनेक प्रकार की जनजातियाँ पाई जाती हैं। जैसे बड़ी जनजातियाँ, छोटी जनजातियाँ। सबसे बड़ी जनजातियाँ जिनमें गोंड, भील, संथाल, मीना और मुंडा इत्यादि शामिल है, की संख्या 70 लाख है, जबकि छोटी जनजाति यानि अंडमान द्वीपवासियों की जनसंख्या 100 व्यक्तियों से भी कम है। जनजातियों की कुल जनसंख्या 2001 की जनगणना के अनुसार 8.4 करोड़ है ।

2. अर्जित विशेषक— अर्जित विशेषकों पर आधारित वर्गीकरण दो मुख्य कसीटियों के सम्मिश्रण पर आधारित है—

(क) आजीविका के साधन

(ख) हिन्दू समाज में उनके समावेश की सीमा ।

आजीविका के आधार पर जनजातियों को मछुआ, शिकारी, झूम खेती करने वाले कृषक और बागान तथा औद्योगिक कामगारों की श्रेणियों में बाँटा जा सकता है। जनजातियों के दृष्टिकोण से जनजातियों की अभिवृतियों के बीच काफी अन्तर होता है। 

उदाहरणतया कुछ जनजातियों का हिंदुत्व की ओर सकारात्मक झुकाव होता है तो कुछ जनजातियों का नकारात्मक । कुछ जनजातियाँ इसका प्रतिरोध करती हैं। जनजातियों को हिन्दू समाज में भी स्थान मिलता है जिनमें कुछ को तो ऊँचा स्थान दिया गया है और कुछ को नीचा स्थान दिया गया है। 

6. “ जनजातियाँ आदिम समुदाय हैं जो सभ्यता से अछूते रहकर अपना अलग-थलग जीवन व्यतीत करते हैं।” इस दृष्टिकोण के विपक्ष में आप क्या साक्ष्य प्रस्तुत करना चाहेंगे ?

Ans. जनजातियों को ‘आदिम’ अर्थात् विशुद्ध समाज, जो असभ्यता से अछूते रहे हों, मानने का कोई संगत आधार नहीं है। इसके विपरीत, जनजातियों को ऐसी ‘द्वितीयक’ प्रघटना माना जाए जो पहले से विद्यमान राज्यों और जनजातियों, जैसे- राज्येतर समूहों के बीच शोषणात्मक और उपनिवेशवादी संपर्क के परिणामस्वरूप आया जनजातीय समुदाय संग्राहक समाजों के समान है जो सामयिक परिवर्तनों से भी अछूते रहते हैं । 

उदाहरणतया आदिवासी लोग आज सभ्यता से अछूते रहकर अपना जीवन अलग व्यतीत कर रहे हैं। उनकी यह स्थिति पहले। न थी । मध्यवर्ती तथा पश्चिमी भारत के तथाकथित राजपूत राज्यों में से अनेक राजवाड़े स्वयं ही आदिवासी समुदायों के माध्यम से उत्पन्न हुए। आदिवासी लोग अक्सर अपनी आक्रामक क्षमता व स्थानीय सैन्य दलों में अपनी सेवाओं के माध्यम से मैदानी इलाकों के लोगों पर अपने प्रभुत्व का प्रयोग करते हैं। वे कुछ विशेष प्रकार की वस्तुएँ, जैसे-नमक, हाथी, वन्य उत्पादों का व्यापार भी करते हैं।

इस प्रकार जनजातियाँ दूसरे समुदायों पर निर्भर न रहकर अपना जीवन व्यतीत करती हैं। वे अपने भरण-पोषण के लिए भोजन का प्रबन्ध कुछ व्यापार करके या खेती करके कर लेते हैं । अतः यह कहा जा सकता है कि जनजातियाँ आदिम समुदाय हैं जो सभ्यता से अछूते रहकर अपना अलग जीवन व्यतीत करते हैं।

7. आज जनजातीय पहचानों के लिए जो दावा किया जा रहा है, उसके पीछे क्या कारण हैं ? 

Ans. जनजातीय पहचान को सुरक्षित रखने का आग्रह दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। इसका कारण यह हो सकता है कि जनजातीय समाज के भीतर भी एक मध्यम वर्ग का प्रादुर्भाव हो चला है । 

इस वर्ग के प्रादुर्भाव के साथ ही संस्कृति, परंपरा तथा संसाधनों पर नियंत्रण और आधुनिकताओं की परियोजनाओं के लाभों में हिस्सों की माँगें भी, आजीविका यहाँ तक कि भूमि भी जनजातियों का अपनी पहचान को सुरक्षित रखने के आग्रह का अभिन्न अंग बन गई है अब इन जनजातियों में उनके मध्य वर्गों से एक नई जागरूकता की लहर आई है । 

ये स्वयं भी आधुनिक व्यवसायों के परिणाम हैं जिन्हें सरकार की आरक्षण नीतियों से बल मिला है। 

8. परिवार के विभिन्न रूप क्या हो सकते हैं ?

Ans. परिवार की संरचना का अध्ययन इसके एक सामाजिक संस्था के रूप में और समाज की अन्य सामाजिक संस्थाओं के साथ उसके संबंधों के बारे में दोनों ही रूपों में किया जा सकता है । 

मूल परिवार अथवा विस्तृत परिवार का मुखिया एक स्त्री या पुरुष हो सकते हैं। मूल परिवार में माता-पिता व उनके बच्चे ही शामिल होते हैं । 

इसके विपरीत विस्तृत परिवार में एक से अधिक दम्पत्ति और दो से अधिक पीढ़ियों के परिवार के लोग एक साथ रहते हैं । इसमें कई भाई अपने परिवारों को लेकर संयुक्त परिवार के सदस्य के रूप में रहते हैं या एक बुजुर्ग दम्पत्ति जो अपने बेटों, पोतों के साथ रहते हैं।

9. सामाजिक संरचना में होने वाले परिवर्तन पारिवारिक संरचना में किस प्रकार परिवर्तन ला सकते हैं ? 

Ans. सामाजिक संरचनाएँ पारिवारिक संरचनाओं में परिवर्तन ला सकती हैं। समाज की आर्थिक, राजनीतिक व सांस्कृतिक संरचनाएँ परिवार की आंतरिक संरचनाओं से जुड़ी होती हैं । 

हिमालयी क्षेत्रों में पुरुषों के गाँवों से प्रवसन से गाँव में ऐसे परिवारों का अनुपात बढ़ सकता है जिनमें स्त्रियाँ मुखिया होती हैं। इसके अतिरिक्त, किसी कम्पनी में कार्य करने वाले माता- -पिता को यदि अपने बच्चों की देखभाल का समय नहीं मिलता है तो उस घर में दादा-दादी, नाना-नानी की संख्या बढ़ जाएगी, क्योंकि वहाँ उन्हें ही आकर बच्चों की देखभाल करनी होगी। 

इस तरह परिवारों की संरचना व उसके गठन में परिवर्तन हो जाता है। कभी-कभी परिवारों में परिवर्तन आकस्मिक तौर पर होते हैं । यह परिवर्तन परिवारों में लड़ाई होने से या किसी परिवार के अन्यत्र चले जाने से हो सकते हैं। कभी-कभी यह परिवर्तन युवा लोगों द्वारा स्वयं ही अपना जीवन साथी चुनने के कारण भी हो सकते हैं।

इस तरह इन कारणों से पता चलता है कि परिवार की संरचनाओं में बदलाव आने की बजाय सांस्कृतिक विचार, मानकों तथा मूल्यों में परिवर्तन आते हैं।

10. मातृवंश (Matriliny) और मातृतंत्र (Matriarchy) में अंतर स्पष्ट कीजिए तथा व्याख्या कीजिए।

Ans. मातृवंश (Matriliny) 

1. इसके अनुसार जायदाद माँ से बेटी को मिलती है

2. मातृवंशीय समाज के मानवशास्त्रीय प्रमाण मिलते हैं। 

3. मातृवंशीय व्यवस्था में उत्पन्न भूमिका द्वंद से पुरुषों की बजाय स्त्रियाँ गहन रूप से प्रभावित होती हैं।

मातृतंत्र (Matriarchy)

1. इसके अनुसार परिवार संरचना में स्त्रियों प्रभुत्वकारी भूमिका निभाती हैं। 

2. मातृतंत्र के कोई ऐतिहासिक व मानवशास्त्रीय प्रमाण नहीं मिलते । 

3. मातृतंत्र में ऐसी कोई स्थिति नहीं आती ।

मातृवंशीय व्यवस्था में उत्पन्न भूमिका द्वंद्व से पुरुषों की बजाय स्त्रियों अधिक प्रभावित होती हैं, सिर्फ इसलिए नहीं कि पुरुष अधिकारों के स्वामी है स्त्रियों उनसे वंचित है, पर इसलिए क्योंकि समाज पुरुषों के नियम तोड़ने पर उन्हें कम सजा देता है। इस तरह मातृवंशीय समाज में गढ़ी माँ को जायदाद अपनी बेटी को देने का अधिकार होता है, वहीं मातृतंत्र में स्त्रियाँ ही चिकारी भूमिका निभाती हैं।


अति लघु उत्तरीय प्रश्न (VERY SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS)


1. ‘जाति’ शब्द का अर्थ समझाइए ।

Ans. ‘जाति’ एक व्यापक शब्द है जो किसी भी चीज के प्रकार या वंश श्रेणी को संबोधित करने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। इसमें अचेतन वस्तुओं से लेकर पेड़-पौधे, पशु-पक्षी भी हो सकते हैं। पशु पक्षियों और पेड़-पौधों में भी कई जातियाँ पाई जाती हैं । 

अतः इन्हें भी ‘जाति’ शब्द दिया जा सकता है। अर्थात् जिन वस्तुओं में विभिन्नताएँ पाई जाती हैं, उनमें ‘जाति’ शब्द का प्रयोग कर सकते हैं। भारतीय भाषाओं में ‘जाति’ शब्द का प्रयोग जाति संस्थान के संदर्भ में ही किया जाता है ।

2. ‘वर्ण’ व ‘जाति’ के आपसी संबंध की सटीक व्याख्या काजए। 

Ans. वर्ण को एक अखिल भारतीय सामूहिक वर्गीकरण के रूप में समझ सकते हैं । इसके विपरीत, जाति को क्षेत्रीय या स्थानीय उप-वर्गीकरण के रूप में समझ सकते हैं। इसमें सैकड़ों “या हजारों जातियों एवं उप जातियों से बनी अत्यधिक जटिल व्यवस्था शामिल होती है ।

3. किसी जाति के विवाह सम्बन्धी नियम बताइए। 

Ans. प्रत्येक जाति के अपने विवाह संबंधी कठोर नियम होते हैं । यदि कोई व्यक्ति ति की सदस्यता अपनाता है तो उसे इन नियमों का पालन करना पड़ता है। जाति समूह ‘सजातीय’ होते हैं । इसके अनुसार विवाह समूह के सदस्यों में ही हो सकते हैं ।

4. प्राचीन ग्रंथों व ऐतिहासिक सूत्रों से जाति की आनुभाविक वास्तविकता के बारे में क्या पता चलता है ?

Ans. प्राचीन ग्रंथों में जातियों के निर्धारित नियम हमेशा व्यवहार में नहीं थे। आधकाश निर्धारित नियमों में प्रतिबंध शामिल थे। ऐतिहासिक सूत्रों से यह पता चलता है कि जाति एक बहुत असमान संस्था थी। कुछ जातियों को इन व्यवस्थाओं से लाभ प्राप्त हुआ तो कुछ को इन व्यवस्थाओं की वजह से अधीनता व अत्यधिक श्रम का जीवन व्यतीत करना पड़ा । जाति जन्म द्वारा कठोरता से निर्धारित की गई थी ।

5. सैद्धांतिक तौर पर जाति व्यवस्था कितने समुच्चयों का मिश्रण है ? 

Ans. सैद्धांतिक तौर पर जाति व्यवस्था दो समुच्चयों का मिश्रण है- 

(1) भिन्नता और अलगाव पर आधारित समुच्चय

(2) संपूर्णता और अधिक्रम पर आधारित समुच्चय ।

6. जातियों के कठोर नियम बनाए जाने के क्या कारण हैं ?

Ans. जाति के अधिकांश धर्मग्रंथसम्मत नियमों की रूपरेखा जातियों को मिश्रित होने से बचाने के लिए बनाई गई है। प्रत्येक जाति का समाज में एक विशिष्ट स्थान के साथ-साथ एक. श्रेणी-क्रम भी होता है । शादी, खान-पान, व्यवसाय जातियों के नियमों में शामिल होते हैं ।

7. विभिन्न जातियों में शुद्ध व अशुद्ध का अर्थ समझाइए |

Ans. वह जातियाँ जिन्हें कर्मकांड की दृष्टि से शुद्ध माना जाता है, उनका स्थान उच्च होता है। इसके विपरीत अशुद्ध मानी जाने वाली जातियों को निम्न स्थान दिया जाता है। 

8. जाति व्यवस्था में किसी भी जाति के लिए निर्धारित स्थान क्या है ?

Ans. प्रत्येक जाति का व्यवस्था में अपना स्थान तय है अंत या स्थान किसी भी अन जाति को नहीं दिया जा सकता। अर्थात् उच्च स्थान वाली जातियों को उच्च स्थान व निम्न स्थान वाली जातिको निम्न स्थान की प्राप्त रहेगा। इसका स्थान कभी नहीं बदला जा सकता है।

9. औपनिवेशिक काल में जाति-व्यवस्था के लिए क्या प्रयत्न किए गए ? 

Ans. एक सामाजिक संस्था के रूप में जाति के वर्तमान स्वरूप को औपनिवेशिक काल और साथ ही स्वतंत्र भारत में तीव्र गति से हुए परिवर्तनों द्वारा मजबूती से आकार प्रदान किया गया । जातियों की व्यवस्था सुधारने के लिए कई प्रयत्न किए गए । इन प्रयत्नों में सबसे प्रमुख इन जातियों के बारे में आँकड़े इकट्ठे करना व इन जातियों में सम्मिलित समुदाय के लोगों की जनगणनाएँ करवाना इत्यादि प्रमुख चे

10. ब्रिटिश प्रशासकों द्वारा जाति व्यवस्थाओं के लिए क्या-क्या कदम उठाए गए ? 

Ans. ब्रिटिश प्रशासकों ने भारत पर कुशलतापूर्वक शासन करना सीखने के उद्देश्य से जाति व्यवस्थाओं को समझने का प्रयत्न किया। देश के अन्तर्गत विभिन्न जातियों तथा जनजातियों की ‘प्रथाओं और तीर-तरीकों’ के बारे में सर्वेक्षण किया गया व उनकी रिपोर्ट तैयार

की गई। 

11. जाति के विषय में सूचना एकत्र करने का सरकारी प्रयत्न कब शुरू हुआ ? 

Ans. जाति की सूचना एकत्र करने का सरकारी प्रयत्न 1860 के दशक में प्रारंभ हुआ जब गनगणनाएँ शुरू की गई । सबसे महत्त्वपूर्ण जनगणना 1901 में हरबर्ट रिसले द्वारा जाति के सामाजिक अधिक्रम के लिए की गई ।। 

12. जनगणनाओं द्वारा जातियों के लिए किए गए किन्हीं दो प्रयासों के बारे में बताइए।

Ans. जनगणनाओं के समय जातियों के हितों के लिए काफी प्रयास किए गए जिनमें से दो इस प्रकार हैं- 

(I) विभिन्न जातियों के प्रतिनिधियों द्वारा जनगणना आयुक्त के पास सैकड़ों याचिकाएँ भेजी गई जिसमें सामाजिक क्रम में उनकी जाति को ऊँचा स्थान देने की माँग की गई ।

(2) श्रेणी क्रम में प्रत्येक जाति की स्थिति निर्धारित कर दी गई । उच्च जातियों को उच्च श्रेणी में व निम्न जातियों को निम्न श्रेणी में स्थान दिया गया।

13. 1935 का भारत सरकार अधिनियम पारित किए जाने का कारण बताइए । 

Ans. इस अधिनियम में राज्य द्वारा विशेष व्यवहार के लिए निर्धारित जातियों तथा जनजातियों की सूचियों या अनुसूचियों को वैध मान्यता प्रदान कर दी गई। इस अधिनियम द्वारा ही अनुसूचित जातियों व अनुसूचित जनजातियों को पहचाना जाने लगा ।

14. राज्यों व उद्योगों के विकास व संवृद्धि ने जाति संस्था को कैसे प्रभावित किया

Ans. राज्यों व उद्योगों की संवृद्धि में आर्थिक तीव्रता और गहनता आने से जाति संस्था अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हुई। आधुनिक उद्योगों में रोजगार के अवसरों में कोई जातीय नियम लागू नहीं किए गए । नगरीकरण और शहरीकरण के रहन-सहन के तरीकों ने जाति पृथक्कृत स्वरूपों का अधिक समय तक चलना मुश्किल कर दिया था। लोग जाति व्यवहारों को नहीं मानते थे । उनका स्तर इन विचारों से काफी ऊँचा हो गया था। 

15. ‘संस्कृतिकरण’ क्या है ? यह कब अपनाई गई थी ?

Ans. ‘संस्कृतिकरण’ एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा मध्य या निम्न जाति के सदस्य किसी उच्च जाति की धार्मिक क्रियाओं, घरेलू या सामाजिक परिपाटियों को अपनाकर अपनी सामाजिक प्रस्थिति को ऊँचा करने का प्रयत्न करते हैं। यह प्रक्रिया औपनिवेशिक काल से अपनाई जा रही है । परन्तु इन दिनों इसका काफी प्रचार हुआ है ।

16. ‘संस्कृतिकरण’ की प्रक्रिया क्यों अपनाई जाती है ? 

Ans. यह प्रक्रिया संबंधित जाति के आर्थिक स्तर में उन्नति होने के बाद या उसकी उन्नति के साथ अपनाई जाती है । इसके अन्तर्गत ब्राह्मण या दक्षिण जातियों के रीति रिवाजों को अपनाया जाता है, जैसे- शाकाहारी बनना, धार्मिक उत्सव मनाना इत्यादि ।

17. ‘प्रबल जाति’ शब्द का प्रयोग किन जातियों के लिए किया जाता है ? 

Ans. इस शब्द का प्रयोग अधिक जनसंख्या वाली बड़ी जातियों के लिए किया जाता है । ऐसी जातियाँ जिन्हें स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद किए गए आंकिक भूमि सुधारों द्वारा भूमि के अधिकार प्रदान किए गए थे।

18. मध्यवर्ती जातियों के देहाती इलाकों में प्रबल जातियाँ बनने के कारण स्पष्ट कीजिए।

Ans. मध्यवर्ती जातियों को भूमि के अधिकार प्राप्त होने के बाद ये जातियाँ स्वयं खेतों में परिश्रम न करके किसी निम्न जातियों के लोगों से मजदूरी करवाती थीं । इनकी बड़ी संख्या. के लोगों ने भी सार्वजनिक वयस्क मताधिकार पर आधारित चुनावी लोकतंत्र में उन्हें राजनीतिक शक्ति प्रदान की । ये जातियाँ फिर क्षेत्रीय राजनीति तथा कृषक अर्थव्यवस्था में निर्णायक भूमिका अदा करने लगीं ।

19. मध्यवर्ती जातियों के देहाती इलाकों की प्रबल जातियों के कुछ उदाहरण दीजिए।

Ans. बिहार व उत्तर प्रदेश के यादव, आंध्र प्रदेश के रेड्डी और सम्मा लोग, महाराष्ट्र के मराठे, पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के जाट और गुजरात के पाटीदार ।

20. जाति व्यवस्था में हुए विरोधाभासी परिवर्तनों का उल्लेख कीजिए । 

Ans. जाति व्यवस्था में परिवर्तन यह है कि उच्च जातियों, नगरीय, मध्यम और उच्च वर्गों 

के लिए जाति व्यवस्था लुप्त होती जा रही है। अपने कार्यों को भली-भाँति समझना, तीव्र विकान का पूरा-पूरा लाभ, स्थिति का और सुदृढ़ होना, इन सब कारणों से लोगों को विश्वास होने लगा कि प्रगति का जाति से कोई लेना-देना नहीं है। 

अतः जाति व्यवस्था का अर्थ अब लोगों के लिए समाप्त हो चुका है। सार्वजनिक जीवन में जाति की कोई भूमिका नहीं रही है, वह धार्मिक रीति-रिवाज, विवाह के क्षेत्र तक ही सीमित है।

21. ‘जनजातीय’ शब्द का अर्थ स्पष्ट कीजिए। प्राचीन समय में जनजाति समुदाय कौन थे ? 

Ans. ‘जनजातीय’ शब्द ऐसे समुदायों के लिए प्रयुक्त होता है जो बहुत पुराने हैं और उपहाद्वीप के सबसे पुराने अधिवासी हैं । जनजातियाँ ऐसे समुदाय थे जो किसी लिखित धर्मग्रंथ के अनुसार किसी धर्म का पालन नहीं करते थे। उनका कोई संगठन नहीं था, न ही समुदाय कठोर रूप में वर्गों में बँटे हुए थे। इनकी सबसे महत्त्वपूर्ण बात थी कि उनमें जाति जैसी कोई व्यवस्था नहीं थी न ही वे हिन्दू थे और न ही किसान ।

22. जनजाति और जाति के मध्य अंतर किस सांस्कृतिक अंतर पर आधारित था ?”

 Ans. जनजाति और जाति के बीच के अंतर को दर्शाने वाला तर्क शुद्धता या शुचिता तथा अशुद्धता या अशुचिता और अधिमिक एकीकरण में विश्वास रखने वाली हिन्दू जातियों और अपेक्षाकृत अधिक समतावादी और बंधुता आधारित सामाजिक संगठन की रीतियों वाली जीववादी जनजातियों के बीच माने गए सांस्कृतिक अंतर पर आधारित था । 

23. जाति और जनजाति के लिए किन-किन प्रक्रियाओं पर साहित्य तैयार किया गया ?

Ans. जाति और जनजाति के लिए उन प्रक्रियाओं पर साहित्य तैयार किया गया जिनके माध्यम से भिन्न-भिन्न युगों में जनजातियों को हिन्दू समाज में आत्मसात् किया गया । ये प्रक्रियाएँ थीं—

(1) संस्कृतिग्रहण, स्वर्ण हिन्दुओं द्वारा विजय के बाद विजितों को वर्णों के अन्तर्गत शामिल करना । 

(2) पर संस्कृतिग्रहण और अन्य प्रक्रियाओं द्वारा भी विजयी लोगों को शद वर्णों में शामिल जनजातीय इलाकों में विद्रोह । 

24, 18वीं व 19वीं शताब्दियों में उत्पन्न हुई ?

Ans. 18वीं तथा 19वीं शताब्दियों में जनजातीय इलाको में विद्रोह के बाद औपनिवेशिक सरकार में ‘अपवर्जित’ और ‘आशिक रूप से अपवर्जित इलाके घोषित किए जिनमें गैर जनजातीय लोगों रूप प्रवेश पूरी तरह विनियमित था । इलाकों में ब्रिटिश सरकार स्थानीय राजाओं या मुखियों के माध्यम से अप्रत्यक्ष रूप से शासन चलाने के पक्ष में थी ।

25. 1940 के दशक में पृथकतावादी पक्ष का जनजातीय लोगों के पक्षों में क्या कहना था ? 

Ans. पृथकतावादी पक्ष के अनुसार जनजातियों लोगों को व्यापारियों, साहूकारों और हिन्दू तथा ईसाई धर्मों का प्रचार करने वालों से सुरक्षित करने की आवश्यकता है । पृथकतावादी पक्ष के अनुसार साहूकार व व्यापारी लोग इन जनजातीय लोगों का अस्तित्व मिटाकर उन्हें भूमिहीन श्रमिक बनाना चाहते हैं ।

26. एकीकरणवादी पक्ष का जनजातीय लोगों के बारे में क्या विचार था ? 

Ans. एकीकरणवादी पक्षानुसार जनजातीय लोग पिछड़े हिंदू ही हैं । इन लोगों की समस्या का समाधान पिछड़े वर्गों में निर्धारित की गई योजनाओं के दायरे में ही खोजा जाए। 

27. किन्हीं ऐसे दो कारणों का वर्णन करें जिसके कारण जनजातीय समुदाय के लोगों को संकट का सामना करना पड़ रहा है.

Ans. (i) में जनजातीय समुदाय जो वनों पर आश्रित हैं, वनों की कटाई व कमी से काफी यिन्ताग्रस्त हो गए हैं। इससे उन्हें अपनी जरूरत की वस्तुएँ नहीं मिल पातीं । (ii) जमीनों पर निजी मालिकाना हक लिए जाने से भी जनजातीय लोगों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। 


लघु उत्तरीय प्रश्न (SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS)


1. ‘जाति’ व ‘वर्ण’ शब्द की उत्पत्ति का स्रोत बताइए। जाति शब्द का अर्थ स्पष्ट कीजिए।

Ans. जाति एक प्राचीन सांस्कृतिक संस्थान है जो कि हजारों वर्षों से भारतीय इतिहास एवं संस्कृति का एक हिस्सा है। विश्व के अन्य भागों में भी समान प्रभाव उत्पन्न करने वाली सामाजिक व्यवस्थाएं पायी जाती हैं।

‘जाति’ शब्द का अंग्रेजी अर्थ ‘कास्ट’ बताया गया है। ‘कास्ट’ शब्द की उत्पत्ति पुर्तगाली मूल के शब्द ‘कास्टा’ से हुई है । कास्टा’ शब्द का अर्थ है- विशुद्ध नस्ल । कास्ट शब्द का अर्थ विस्तृत संस्थागत व्यवस्था से है जिसे भारतीय भाषाओं में वर्णों व जाति जैसे शब्दों में प्रयोग किया जाता है। 

‘वर्ण’ शब्द का तात्पर्य ‘रंग’ से है, जबकि ‘जाति’ शब्द किसी भी वस्तु के प्रकार या वंश श्रेणी को संबोधित करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। पेड़-पौधों एवं पशु-पक्षी इत्यादि सभी जाति के अन्तर्गत सम्मिलित किए जाते हैं। परन्तु भारतीय भाषाओं में जाति शब्द का प्रयोग जाति संस्थान के संदर्भ में ही किया जाता है ।

2. जाति की सबसे सामान्य निर्धारित विशेषताएं बताइए । Or, किसी जाति द्वारा निर्धारित किन्हीं चार नियमों का उल्लेख कीजिए ।

Ans. जाति द्वारा अनेक नियम निर्धारित किए जाते हैं जिनमें से कुछ प्रमुख हैं- 

(1) जाति में श्रेणी एवं प्रस्थिति में संयोजित अनेक जातियों की व्यवस्था शामिल होती है । प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी जाति से संबंध रखता है और उस जाति में उसका एक निर्धारित स्थान होता है। 

(2) जाति में अपनाई गई सदस्यता में खाने-पीने के नियम भी शामिल होते हैं। जाति के नियमों में किस प्रकार का भोजन बनाया व खाया जाए, शामिल होते हैं। इसके अतिरिक्त भोजन किस जाति के व्यक्ति के साथ बाँट कर खाया जाए आदि नियम जाति में प्रमुखता से पाए जाते हैं ।

(3) प्रत्येक व्यक्ति को अपने माता-पिता व पूर्वजों द्वारा अपनाई गई जाति को ही अपनाना होता है। वह कभी भी अपनी जाति को न त्याग सकता है न ही बदल सकता है। जाति चाहे तो उस व्यक्ति को जाति से निकाल भी सकती है।

(4) प्रत्येक जाति में विवाह संबंधी कठोर नियम भी शामिल होते हैं। विवाह जाति के सदस्यों में ही किया जा सकता है, किसी और जाति के व्यक्ति के साथ नहीं । 

3. विभिन्न जातियों के बारे में मिले प्रमाणों से जातियों की किस प्रकार की स्थिति का पता चलता है ?

Ans. प्रत्येक जाति में विशेष प्रकार के कठोर नियम बनाए गए थे। यह नियम उस समय के लोगों के लिए एक निश्चित अर्थ रखते थे। अधिकांशतः नियमों में प्रतिबंध शामिल थे। विभिन्न प्रकार के मिले ऐतिहासिक सूत्रों से ज्ञात होता है कि जाति एक असमान संस्था थी। किसी भी व्यक्ति के लिए जाति जन्म से ही कठोरता से निर्धारित हो गई थी व उस व्यक्ति की। उस स्थिति को बदलना असंभव था । 

कुछ जातियों को इन व्यवस्थाओं से लाभ प्राप्त हुआ। तो कुछ को हानि । कुछ जातियों को ऐशो-आराम तो कुछ को श्रम व अधीनता का जीवन भुगतना पड़ा । उच्च जाति के लोगों को पर्याप्त लाभ हुआ । उनका स्तर हमेशा ऊँचा ही समझा जाता रहा, जबकि निम्न जाति को हमेशा निम्न स्तर पर ही रखा गया । 

4. विभिन्न जातियों में पवित्र व अपवित्र का अर्थ समझाइए ।

Ans. विभिन्न जातियों को धार्मिक दृष्टि से शुद्धता व अशुद्धता के अन्तर पर रखा गया है । वे जातियाँ जिन्हें उच्च स्थान प्राप्त हैं, कर्मकांड व धार्मिक दृष्टि से पवित्र मानी जाती हैं। व इसके विपरीत वे जातियाँ जिन्हें निम्न स्तर पर समझा जाता है, अपवित्र मानी जाती है। 

शुद्ध जातियों को ही उच्च स्थान प्राप्त होता है। अशुद्ध जातियों को निम्न स्थान ही दिया जाता 중 वे जातियाँ जिनके पास शक्तियाँ अर्थात् आर्थिक या सैन्य बल होता है, उच्च मानी जाती है । जिन जातियों के पास शक्ति नहीं होती, उन्हें निम्न स्थिति प्राप्त होती है। 

5. औपनिवेशिक काल का जाति व्यवस्था से संबंध किस प्रकार है ?

Ans. औपनिवेशिक काल के द्वारा जाति व्यवस्था के स्वरूप को एक सुदृढ़ आकार प्रदान किया गया व औपनिवेशिक काल में ही सभी प्रमुख सामाजिक संस्थानों में व जाति व्यवस्था में प्रमुख परिवर्तन आए ।

जातिव्यवस्था का स्वरूप उपनिवेशवाद की ही देन है। ब्रिटिश शासकों ने जातियों के व्यवस्थाओं को समझने में रुचि ली व इन शासकों व प्रशासकों ने विभिन्न जातियों व जनजाति की प्रथाओं एवं तौर-तरीकों का गहन सर्वेक्षण किया व इनके विषय में रिपोर्ट तैयार की औपनिवेशिक काल में जाति व्यवस्था को सुधारने के अनेक प्रयास किए गए। जनगणनाएं प्रारंभ करवाई गई व 1860 के दशक में इसका कार्य शुरू किया गया ।

1901 की जनगणना में सामाजिक अधिक्रम की सूचनाओं को इकट्ठा किया गया जिस किस क्षेत्र में किस जाति को अन्य जातियों की तुलना में सामाजिक दृष्टि से कितना ऊंचा प नीचा स्थान प्राप्त है आदि की सूचनाएँ थीं । इसके पश्चात् श्रेणी क्रम में प्रत्येक जाति की एवं स्थिति निर्धारित कर दी गई । 

औपनिवेशिक शासन द्वारा भू-राजस्व व्यवस्थाओं तथा कानूनों है जाति आधारित अधिकारों को वैध मान्यता प्रदान की गई । अब ये जातियों किसी की गुलाम न रहकर स्वयं ही भूमि की मालिक बन गई थी।

इस काल में दलित वर्ग कही जाने वाली जातियों के कल्याण के भी प्रयत्न किए गए। इसके लिए 1935 का भारत सरकार अधिनियम पारित किया गया जिसमें सभी जातियों के मान्यता प्रदान की गई। 

6. भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् जाति व्यवस्था के सुधार के लिए क्या-क्या प्रयत्न किए गए ? ऐसे महापुरुषों के नाम बताइए जिन्होंने इस दिशा में सुधार किए। 

Ans. राष्ट्रपादी आंदोलनों के लिए व्यापक पैमाने पर जनमत जुटाने में जातीय भावनाओं च आधारों की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी । राष्ट्रवादी आंदोलनों का प्रारम्भ 19वीं शताब्दी के बाद ही हुआ, जबकि ‘दलित वर्गों और अछूत जातियों को संगठित करने के प्रयत्न 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में ही प्रारम्भ हो चुके थे। 

इन जातियों व वर्गों को संगठित करने का प्रयत्न राष्ट्रवादी आंदोलनों से पहले से शुरू हो चुका था । उच्च समझी जाने वाली जातियों के विभिन्न सुधारकों वनीची समझी जाने वाली जातियों में महात्मा ज्योतिबा फूले, बाबा साहेब अम्बेडकर और दक्षिणी भारत में अध्यनकालि, श्री नारायण गुरे, इमोतीदास और पेरियार ने इस दिशा में पहल की इसके अतिरिक्त महात्मा गाँधी और बाबा साहब अंबेडकर ने भी 1920 के दशक से अस्पृश्यता के विरुद्ध अपने विरोधी आंदोलन चलाए । 

इन महापुरुषों ने अछूत जातियों द छुआछूत इत्यादि के विरुद्ध अनेक आन्दोलन चलाए व इस दिशा में काफी प्रयत्न किए। अस्पृश्यता विरोधी कार्यक्रमों को कॉंग्रेस सरकार की कार्यसूची में उचित स्थान दिया गया राष्ट्रवादी नेतागण जिनमें महात्मा गाँधी प्रमुख थे, ने अस्पृश्यता तथा अन्य जातीय प्रतिबंधों के उन्मूलन के पक्ष में समर्थन जुटाने में सफल रहे व उच्च जातियों के हितों की सुरक्षा का भी आश्वासन दिया गया ।

7. राज्य के विकास व उद्योगों में हुई उन्नति ने जाति संस्था को कैसे प्रभावित किया ? 

Ans. राज्य के विकास व उद्योगों की वृद्धि ने आर्थिक परिवर्तन में तीव्रता व गहनता लाकर जाति संस्था को काफी प्रभावित किया। पहले उद्योगों में रोजगार के लिए विभिन्न जातीय नियम होते थे । उद्योगों में रोजगार जाति के आधार पर ही दिया जाता था, परन्तु आधुनिक उद्योग ने सभी प्रकार के नए-नए रोजगार के अवसर प्रदान किए। इन रोजगारों के लिए कोई जातीय नियम नहीं थे । 

इन उद्योगों में लोगों को रोजगार उनकी काबिलियत व तजुर्वे के आधार पर मिलते थे । नगरीकरण तथा शहरीकरण में सामूहिक रहन-सहन की परिस्थितियों ने सामाजिक अंतःक्रिया के जाति-पृथक्कृत स्वरूपों का अधिक समय तक चलना मुश्किल कर दिया । आधुनिक शिक्षा प्राप्त भारतीय व्यक्तिवाद और योग्यता को महत्त्व देने वाले विचारों से प्रभावित हुए। इन विचारों के प्रभाव के कारण भारतीय लोगों ने जातीय व्यवहारों को छोड़ना प्रारम्भ कर दियो।

परन्तु कहीं-कहीं जाति व्यवस्था में बहुत कम सुधार देखने को मिले। मुंबई या कोलकाता की कपड़ा मिलों में भर्ती जाति के आधार पर या रिश्तेदारी के आधार पर होती थी। कारखानों में मजदूरों को भर्ती करने वाले लोग अपने ही जाति के लोगों का चयन करते थे । उनके प्रति काफी भेदभाव करता जाता था। अछूत व्यक्तियों को कहीं भी स्थान प्राप्त न था । कई मिलों में खास जाति या एक ही जाति के मजदूरों की अधिकता रहती थी ।

8. आपके विचार में क्या आज जाति के विभिन्न कठोर नियमों में कोई बदलाव आया है ? अपने तर्क के पक्ष में उत्तर दीजिए। 

Ans. विभिन्न जातियों ने अपनी जाति के सदस्यों के लिए कठोर नियम निर्धारित किए थे। जाति सांस्कृतिक और घरेलू क्षेत्रों में भी सुदृढ़ हुई। जाति के कई नियम कई प्रकार के परिवर्तनों से प्रभावित हुए, जिनमें से कुछ बदल गए व कुछ समाप्त ही हो गए। 

परन्तु जाति के भीतर विवाह करने का नियम, आधुनिकीकरण व विभिन्न प्रकार के परिवर्तनों से अप्रभावित रहा। आज भी अधिकांश विवाह जाति की परिसीमाओं के भीतर ही होते हैं, बल्कि अंतर्जातीय यह विवाह अब पहले की तुलना में अधिक हो रहे हैं। इसके विपरीत, कुछ नियमों में दरारें पड़ गई हैं अर्थात् जाति के सदस्य इनका पालन कम ही करते हैं।

उच्च जातियों, जैसे- ब्राह्मण, राजपूत, बनिया के जाति में अंतर्जातीय विवाह पहले से अधिक हो रहे हैं। इसके विपरीत, पिछड़ी जाति और अनुसूचित जाति के व्यक्तियों के बीच विवाह सम्भवतः न के बराबर ही है। भोजन को मिल-बॉटकर खाने के नियम भी इसी प्रकार ही है। कुछ जाति के व्यक्ति इसका पालन करते हैं तो कुछ नहीं । 

9. जाति व्यवस्था में परिवर्तन की प्रक्रियाओं को समझने के लिए प्रचलित संकल्पनाओं का उल्लेख कीजिए। इन संकल्पनाओं के रचयिता कौन थे ? 

Ans. समाजशास्त्रियों एवं सामाजिक मानव विज्ञानियों ने परिवर्तन की प्रक्रियाओं को समझने के लिए नई-नई संकल्पनाएँ गढ़ीं। परन्तु एम. एन. श्रीनिवास द्वारा प्रदत्त संकल्पनाएँ अत्यधिक प्रचलित हुई। इनमें दो संकल्पनाएँ प्रमुख थीं-

(i) संस्कृतिकरण, (ii) प्रबल जाति ।

‘संस्कृतिकरण’ एक ऐसी प्रक्रिया का नाम है जिसके द्वारा जाति के सदस्य किसी उच्च जाति की धार्मिक क्रियाओं, घरेलू या सामाजिक क्रियाओं को अपनाकर अपनी सामाजिक प्रस्थिति को ऊँचा करने का प्रयत्न करते हैं। अर्थात् उच्च जाति के विचारों, धार्मिक क्रियाओं से प्रेरित होकर यदि किसी दूसरी जाति के लोग अपना स्तर ऊँचा करने या अपनी स्थिति को सुधारने के प्रयत्न करते हैं तो उसे संस्कृतिकरण कहते हैं ।

 इस समय इस संकल्पना का सबसे अधिक प्रचार हुआ है। इस प्रक्रिया के अन्तर्गत कुछ मुख्य जातियों के रीति-रिवाजों को अपनाया जाता था। ये रीति-रिवाज अधिकतर ब्राह्मण या क्षत्रिय जाति से संबंध रखते थे, जैसे- शाकाहारी बनना, प्रार्थनाएँ करना, धार्मिक उत्सव मनाना आदि ।

‘प्रबल जाति’ शब्द का प्रयोग अधिक जनसंख्या वाली जाति के लिए किया जाता है। इसके अतिरिक्त वे जातियाँ जिन्हें स्वतंत्रता प्राप्ति होने पर इनकी आर्थिक शक्ति में वृद्धि हो गई। इन जातियों की बड़ी जनसंख्या ने भी उन्हें राजनीतिक शक्ति प्रदान की। इस प्रकार यह मध्यवर्ती जातियाँ देहाती इलाकों में प्रबल जातियाँ बन गई जिनमें से बिहार व उत्तर प्रदेश के यादव, महाराष्ट्र के मराठे, पंजाब, हरियाणा व उत्तर प्रदेश के जाट प्रमुख हैं

10. उच्च जातियों के लिए जातीयता अदृश्य हो चुकी है, परन्तु अनुसूचित जातियों व जनजातियों के लिए जातीयता और सुदृश्य हो गई है। इसका कारण स्पष्ट कीजिए। 

Ans. निम्न जातियों, अनुसूचित जातियों और जनजातियों तथा पिछड़े वर्गों के लिए जातीयता का महत्त्व अधिक हो गया है। इन जातियों को आर्थिक तथा शैक्षिक संसाधनों कीकभी प इनमें विकास की धीमी गति के करण जातीयता इनके लिए महत्त्वपूर्ण हो गई है । इसके अन्य कारण निम्नलिखित हैं- 

(1) इन जातियों के व्यक्तियों की पहचान इनकी जाति ही है । इनकी जाति के आधार पर ही इनका महत्व है। अत: इनके लिए यह जरूरी हो जाता है कि ये जाति के साथ ही जुड़े रहे ।

(2) इन जातियों को शैक्षिक तथा सामाजिक संसाधन भी उपलब्ध नहीं है व इन्हें उच्च जाति के समूह के साथ प्रतिस्पर्धा में उतरना पड़ रहा है।

(3) इनकी जातीय पहचान ही इनकी सामूहिक परिसंपत्तियों में से एक है। 

(4) सरकार द्वारा आरक्षण नीतियाँ केवल इन्हीं जाति के वर्गों को प्राप्त है । अतः हाँ यह जातीयता इनके लिए महत्त्वपूर्ण हो जाती है । यह जीवन रक्षक साधन ही उनकी जाति को सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण बना देते हैं और अक्सर यही उनकी पहचान का पक्ष होता है। इसी के द्वारा ही इन्हें दुनिया में मान्यता दी जाती है ।

11. भारत में विभिन्न राज्यों में पाई जाने वाली जातियों द्वारा अपनाए गए पेशों के बारे में बताइए । 

Ans. भारत में प्रत्येक राज्य में विभिन्न जातियाँ पाई जाती हैं। इनमें संथाल, गोंड और भील जैसी जातियाँ प्रमुख हैं । ये जातियाँ काफी बड़ी हैं और काफी विस्तृत क्षेत्र में फैली हुई हैं। इन जातियों में व्यक्तियों की संख्या काफी अधिक है । 

इन जातियों ने अपने-अपने विशेष प्रकार के पेशे अपना लिए हैं। मुंडा जैसी जातियाँ काफी समय से एक स्थान पर बसी हैं व इन जातियों ने वहीं बसकर खेती करना शुरू कर दिया है। बिहार की बिरहोर जैसी शिकारी-संग्राहक जनजातियों ने भी विशेष प्रकार के घर बसा लिए हैं जहाँ रहकर वे टोकरियाँ चुनती है और तेल निकालने जैसे अन्य कार्य करती हैं। 

कुछ जातियों ने विकल्पों के अभाव में अर्थात् काम न मिलने की कमी से शिकार और संग्रहण का पेशा अपना लिया है ।.

12. औपनिवेशिक काल में जनजातियों की स्थिति में आए विपरीत परिवर्तनों का उल्लेख कीजिए ।

Ans. उपनिवेशवाद जनजातीय समुदायों के जीवन में कई अटल परिवर्तन ला चुका था इनके द्वारा जनजातीय समुदायों के जीवन में कई विपरीत परिवर्तन आए जो निम्नलिखित हैं- 

(1) जनजातीय समुदायों को साहूकारों की घुसपैठ का सामना करना पड़ा । 

(2) वे लोग जो एक ही स्थान पर बस जाते थे, गैर जनजातीय अप्रवासी उनकी जमीन छीनते जा रहे थे जिससे जनजातियों के पास जमीन की कमी हो गई थी।

(3) वनों के आरक्षण की सरकारी नीति और खनन कार्यों के प्रारम्भ होने से भी वनों तक उनकी पहुँच कम हो रही थी। वे अपने उपयोग के लिए उचित सामान उपलब्ध नहीं कर सकते थे।

(4) पहाड़ी और जंगली इलाकों में जहाँ ये जातियाँ बसती थीं, वनों तथा खनिजों जैसे प्राकृतिक संसाधनों की अधिकता व उपभोग ही औपनिवेशिक सरकार के लिए आय का साधन था।

(5) 18वीं तथा 19वीं शताब्दियों में जनजातियों में विद्रोह के पश्चात् औपनिवेशिक सरकार द्वारा अपवर्जित इलाके घोषित किए गए जहाँ गैर-जनजातीय लोगों का प्रवेश वर्जित था । 

(6) ब्रिटिश सरकार राजाओं या मुखियों के माध्यम से अप्रत्यक्ष रूप से शासन चलाती थी । ब्रिटिश सरकार द्वारा ही मुखियों को किसी निश्चित कार्य के लिए संदेश दिए जाते थे। मुखिया अपनी तरफ से कोई निर्णय नहीं ले सकता था । 

13. विकास के कारण जनजातीय लोगों की हानि पर मुख्य धारा के लोग लाभान्वित हुए। अपने तर्क के पक्ष में उत्तर दीजिए।

Ans., ‘राष्ट्रीय विकास’ के कारण बड़े-बड़े बाँध बनाए गए, कारखाने स्थापित किए गए विकास के कारण बहुत से इलाकों व वनों की खुदाई हुई है। इसमें वे जन तीय इलाके जो देश के ऐसे क्षेत्रों में रहते थे जहाँ खनिज व वन अधिकता में थे, को काफी मुसीबतों का सामना करना पड़ा । 

वनों की कटाई व खुदाई से इन जनजातीय लोगों को शेष भारतीय समाज के विकास के कारण बहुत अधिक कीमत चुकानी पड़ी । खनिजों के दोहन और जल विद्युत, संयंत्रों की स्थापना जनजातीय इलाकों में अधिकतम मात्रा में की गई, जिससे जनजातीय लोगों की जमीने छिननी शुरू हो गई।

दनों की कटाई से भी इन्हें भारी धक्का लगा। जमीनों पर मालिकाना हकों के कारण इन जनजातीय लोगों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। नयी-नयी व्यवस्थाओं के लागू होने से भी इन लोगों को काफी हानि उठानी पड़ी । 

उदाहरणतया नर्मदा नदी पर बनाए जा रहे बाँधों की अधिकांश कीमत विभिन्न समुदायों व क्षेत्रों को ही मिल रही है। इन जनजातीय लोगों को इससे सबसे अधिक हानि हुई है। जनजातीय लोगों को घनी आबादी वाले अनेक क्षेत्रों और राज्यों के विकास के कारण अल्पसंख्यता का सामाना करना पड़ रहा है। 

उदाहरणतया झारखंड व पूर्वोत्तर क्षेत्र में त्रिपुरा जैसे राज्यों में जनजातीय लोगों का अनुपात एक ही दशक में घटकर आधा रह गया है। अरुणाचल प्रदेश जैसे राज्यों में भी यही स्थिति बनी हुई है। 

14. जनजातीय लोगों को किन-किन समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है ? 

Ans. जनजातीय इलाकों व लोगों की स्थिति स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् कुछ सम्मानजनक नहीं थी। इन लोगों पर काफी दबाव था। इन इलाकों में वनों की कटाई व कारखानों की स्थापना इत्यादि के कारण यहाँ के व्यक्तियों को आश्रय स्थल छोड़ना पड़ा । परन्तु लंबे संघर्ष के बाद इन जातियों के हितों के बारे में सोचा गया है। 

झारखंड और छत्तीसगढ़ को अलग-अलग राज्यों का दर्जा मिल गया है। परन्तु पहले मिली असफलताओं के कारण इन सफलताओं का कोई ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ा है। पूर्वोत्तर क्षेत्र के अनेक राज्य कई दशकों से ऐसे विशेष कानूनों के अंतर्गत जीवन-यापन कर रहे हैं जिससे वहाँ के निवासियों की नागरिक स्वतंत्रताएँ सीमित हो गई हैं।

 झारखंड और छत्तीसगढ़ को अपने नवार्जित राज्यत्व का अभी पूरा-पूरा उपयोग करना है। इन राज्यों की राजनीतिक व्यवस्था बड़ी संरचनाओं के शिकंजे से निकलकर स्वायत्त नहीं हुई है।

इसके अतिरिक्त मणिपुर या नागालैंड जैसे राज्यों को ‘उपद्रवग्रस्त क्षेत्र’ घोषित किया गया है। इन राज्यों के नागरिकों को भारत के अन्य नागरिकों की तरह अधिकार प्राप्त नहीं है। सशस्त्र विद्रोह, सरकार द्वारा इन जातियों के व्यक्तियों के दमन के लिए उठाए गए कठोर कदम और फिर भड़के विद्रोहों के दुश्चक्र में पूर्वोत्तर राज्यों की अर्थव्यवस्था, संस्कृति को भारी हानि पाई है।

परन्तु इन इलाकों में सरकार द्वारा धीरे-धीरे शिक्षा का प्रचार किए जाने से इन वर्गों के लोगों व जातियों का विकास हो रहा है ।


दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (LONG ANSWER TYPE QUESTIONS)


1. “ जनजातीय लोगों को शेष समाज की तुलना में अत्यधिक कीमत चुकानी पड़ी।” क्या आप इस बात से सहमत हैं ? अपने तर्क के पक्ष में उत्तर दीजिए ।

Ans. यह तर्क उचित है कि जनजातीय लोगों को अत्यधिक मुश्किलों का सामना करना पड़ा। देश के विकास में आए परिवर्तनों के कारण जनजातीय लोगों को काफी वही कीमत चुकानी पड़ी। बड़े बाँध बनाए जाने से व कारखाने स्थापित किए जाने से जनजातीय लोगों को अपने निर्वाह स्थानों को छोड़ना पड़ा । 

कारखाने व बाँध इन स्थानों पर बनाने का कारण यह वा कि इन जनजातीय लोगों के इलाके देश के खनिज सम्पन्न इलाकों में स्थित थे। यही कारण था कि इन जनजातीय लोगों को शेष भारतीय समाज की तुलना में अत्यधिक कीमत चुकानी पड़ी ।

जनजातीय लोगों से उनकी जमीनें छिनमी शुरू हो गई थी। निजों के दोहन और जल विद्युत संयंत्रों की स्थापना के लिए उपयुक्त स्थल, इन जनजातीय लोगों के इलाके ही थे । इन इलाकों की जमीनों को खरीदकर या यहाँ कब्जा करके विभिन्न प्रकार के कारखानों, उद्योगो, जल विद्युत संयंत्रों की स्थापना की गई । 

जहाँ कुछ समय जनजातियों का समूह निर्वाह करता था, यहाँ अब उद्योग की प्रगति हो रही थी। इस प्रकार के विकास से जनजातियों को हानि की कीमत पर मुख्यधारा के लोग लाभान्वित हुए ।

वनों की कटाई का कार्य ब्रिटिश काल में ही प्रारम्भ हो चुका था । बहुत-सी जनजातियाँ अपने निर्वाह के लिए इन वनों की भूमि य इन वनों के वृक्षों पर ही आधारित थीं । वह पूरी दुनिया से अलग इन यनों से ही अपने निर्वाह की वस्तुएँ प्राप्त कर लेती थी।

 परन्तु इन वनों छिन जाने व वहाँ कटाई होने से इन्हें गहरा धक्का लगा । जमीनों पर निजी मालिकाना हक लिए जाने से जनजातीय लोगों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा । जनजातीय लोगों के भारी संख्या में अप्रवास की समस्या का भी सामना करना पड़ रहा है। झारखंड के कुछ औद्योगिक इलाकों में जनजातीय अनुपात कम हो रहा है। त्रिपुरा जैसे राज्यों में तो जनजातीय अनुपात घटकर आपा रह गया है जिसके परिणामस्वरूप वे अल्पसंख्यक हो गए हैं। 

इस प्रकार जहाँ स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व जनजातीय लोगों को उच्च स्थान नहीं दिया गया, यहाँ स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् भी इनकी स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं है। समाज के कुछ क्षेत्र प्रगति कर रहे हैं तो इन जनजातीय लोगों के इलाके पिछड़ते जा रहे हैं। अतः हम यह स्पष्ट रूप से कह सकते हैं कि जनजातीय लोगों को शेष समाज की तुलना में अत्यधिक कीमत चुकानी पड़ी ।

2. औपनिवेशिक युग की प्रारंभिक मानव वैज्ञानिक कृतियों में जनजातियों की पृथक संस्कृत समुदायों के रूप में वर्णित किया गया था। क्या आप इस बात से सहमत हैं ? 

Ans. औपनिवेशिक युग की प्रारंभिक मानव वैज्ञानिक कृतियों में जनजातियों को पृथक् समुदायों के रूप में वर्णित किया गया था। परन्तु इन सबसे पूर्व उपनिवेशवाद जनजातियों की स्थिति काफी दयनीय थी । इन समाज को विभिन्न साहूकारों की घुसपैठ का सामना करना पड़ रहा था। इस काल में हुए विभिन्न कार्यों, जैसे आरक्षण की सरकारी नीति और खनन कार्यों के द्वारा आय का साधन इन्हीं लोगों से था। इस सरकार को विभिन्न स्रोतों से आय प्राप्त होती थी जो इस प्रकार है–

(1) इन जनजातीय समाजों से अत्यधिक मात्रा में भूमि का लगान लिया जाता था जिससे औपनिवेशिक सरकार को आय व पन की प्राप्ति होती थी । 

(2) बनों व खनिजों जैसे प्राकृतिक संसाधनों का विनियोजन आदि कार्यों द्वारा भी औपनिवेशिक सरकार को आय प्राप्त होती थी ।

3. ‘जनजाति एक संकल्पना की जीवनी’ पर अपने विचार प्रकट कीजिए।

Ans. 1960 के दशक में जो विद्वान जनजातियों के विस्तार के पक्ष में थे, उनका मानना था कि जनजातियाँ जाति आधारित कृषक समाज से भिन्न नहीं हैं, परन्तु उनमें संस्तरीकरण बहुत कम हुआ है । 

परन्तु इसके विपरीत, विरोधी पक्ष का मत था कि जनजातियाँ जातियों से पूर्ण रूप से भिन्न होती हैं, क्योंकि उनमें धार्मिक या कर्मकांडीय दृष्टि से शुद्धता और अशुद्धता का भाव नहीं होता जो कि जाति व्यवस्था का केन्द्रबिन्दु है। 

1970 के दशक तक आते-आते जनजाति और कृषक समुदाय के बीच किया गया अंतर सामान्य रूप से अपनाई गई कसीटियों, जैसे—आकार, धर्म के साधनों में से किसी भी निर्वाह स्थान स्थापित कर लिए हैं। मुंडा जैसी जनजातियाँ एक ही स्थान पर खेती करने लगी हैं व गोंडा, संथाल जैसी जनजातियाँ काफी विस्तृत

क्षेत्र में फैली हुई हैं। बिहार की बिरहोर जातियों ने अपने व्यवसाय के लिए टोकरियाँ बुनना व तेल निकालने जैसे कार्य शुरू कर दिए हैं। जाति व जनजाति की प्रक्रियाओं तथा उपायों के विषय में तैयार साहित्यों के माध्यम से इन जातियों को हिंदू समाज में आत्मसात किया गया। ये प्रक्रियाएँ थीं- 

(1) संस्कृतिकरण (2) पारसंस्कृतिग्रहण |

विभिन्न जनजातीय समूहों को हिंदू समाज के जातीय अधिक्रम में विभिन्न स्तरों पर आत्मसात् कर लिया गया। इसका कारण था कि जमीनों पर बस्तियाँ बसा दी गई थीं, व जंगलों और वनों का सफाया कर दिया गया था। कुछ विद्वानों के अनुसार जनजातियों को अछूत मानने का कोई आधार नहीं था। 

उनके अनुसार जनजातियों को ऐसी ‘द्वितीयक’ प्रघटना माना जाए जो पहले से विद्यमान राज्यों और जनजातियों जैसे राज्येत्तर समूहों के बीच शोषणात्मक और उपनिवेशवादी संपर्क के परिणामस्वरूप अस्तित्व में आया। इसके अतिरिक्त, आदिवासियों की स्थिति भी काफी बिगड़ी है ।

4. ऐतिहासिक सूत्रों के अनुसार जातियों की स्थिति का वर्णन कीजिए। जाति व्यवस्था के सिद्धांतों के बारे में बताइए ।

Ans. ऐतिहासिक सूत्रों व प्रमाणों से हमें जातियों की विभिन्न स्थिति का पता चलता है । इनके अनुसार प्रत्येक जाति के अपने नियम थे। यह नियम जाति के सदस्यों के लिए निर्धारित थे व उनके लिए एक निश्चित अर्थ रखते थे। अधिकांशतः सूत्रों से पता चलता है कि जाति एक असमान संस्था के रूप में मानी जाती थी। 

जाति किसी भी व्यक्ति के लिए जन्म से ही निर्धारित हो जाती थी व जाति के सदस्यों के लिए निर्धारित जाति को त्यागना आसान न था इन जातियों के अधिकांश नियमों में प्रतिबंध शामिल थे। जातियों को अधीनता व कभी न समाप्त होने वाले श्रम का जीवन जीने का दण्ड भुगतना पड़ा । 

उच्च जाति के लोग उच्च स्तर के हो या न हो उनका स्तर ऊँचा ही समझा जाता था, जबकि निम्न जाति के लोगों का स्तर हमेशा ही नीचा रहा । जाति व्यवस्था को भिन्नता और अलगाव व सम्पूर्णता और अधिक्रम के मिश्रण के रूप में समझा जा सकता है।

जाति के अधिकांश नियम जातियों को मिश्रित होने से बचाने के लिए बनाए गए हैं। दूसरी ओर इन विभिन्न प्रकार की व पृथक् जातियों का कोई व्यक्तिगत अस्तित्व नहीं है । प्रत्येक जाति का समाज में एक निर्धारित स्थान होता है। इसके अतिरिक्त इन जातियों का एक श्रेणीक्रम भी होता है-जाति एक संपूर्णता से संबंधित होकर ही अपना अस्तित्व बनाए रख सकती है । इसके अतिरिक्त, धार्मिक कर्मकांड की दृष्टि से जाति शुद्धता और अशुद्धता के अन्तर

पर आधारित होती है । जातियाँ जिन्हें धर्म के अनुसार शुद्ध माना जाता है, उनका स्थान उच्च होता है जिन्हें अशुद्ध माना जाता है, उनका स्थान या स्तर निम्न होता है। 

यदि किसी जाति समूह की स्थिति उच्च होती है तो उसके पास शक्तियाँ अर्थात् सैनिक बल इत्यादि होता है जिनके पास शक्ति नहीं होतीं, उनकी स्थिति निम्न होती है। इस प्रकार प्रत्येक जाति का अपना स्थान तय है जो किसी भी अन्य जाति को नहीं दिया जा सकता । जातियाँ केवल कर्मकांड की दृष्टि से असमान नहीं हैं बल्कि वे एक-दूसरे की सहयोगी भी है।

5. “एक सामाजिक संस्था के रूप में जाति के वर्तमान स्वरूप को औपनिवेशिक काल द्वारा मजबूती से आकार प्रदान किया गया।” इस कथन के बारे में अपने विचार प्रकट कीजिए। 

Or, उपनिवेशवाद और जाति के बीच संबंध का वर्णन कीजिए।

 Or, स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व व पश्चात् जाति व्यवस्था के स्वरूप में आए परिवर्तनों का उल्लेख कीजिए।

Ans. एक सामाजिक संस्था के रूप में जाति के वर्तमान स्वरूप को औपनिवेशिक काल और साथ ही स्वतंत्र भारत के तीव्र गति से हुए परिवर्तनों द्वारा मजबूती से आकार प्रदान किया गया । 

औपनिवेशिक काल के दौरान जाति व्यवस्था में मुख्य परिवर्तन आए। इसके अतिरिक्त इस काल में प्रमुख सामाजिक संस्थाओं में भी काफी बदलाव हुए। ब्रिटिश प्रशासकों ने देश पर कुशलतापूर्वक शासन करना सीखने के उद्देश्य से जाति व्यवस्थाओं की जटिलताओं को समझने का प्रयत्न किया। इसके लिए उन्होंने विभिन्न जातियों और जनजातियों की प्रथाओं और तौर-तरीकों का गहन सर्वेक्षण किया । 

अनेक प्रशासनिक अधिकारियों ने इनके सर्वेक्षण तथा अध्ययन कार्यों में अत्यन्त रुचि ली। स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व ही इन जनजातियों की स्थिति में सुधार लाने के काफी प्रयत्न किए गए। आज जाति को जिस रूप में जाना जाता है, वह औपनिवेशिक काल की ही देन है। 

जाति के विषय में सूचनाएँ जनगणना के माध्यम से एकत्रित की गई, जिसे सर्वप्रथम 1860 के दशक में प्रारम्भ किया गया। इसके पश्चात् 1881 से जनगणनाएँ प्रत्येक दस वर्ष पश्चात् की जाने लगीं । 1901 में हुई जनगणना में जाति के सामाजिक अधिक्रम के बारे में जानकारियां एकत्रित की गई।

इन जनगणनाओं के चलते विभिन्न जातियों के प्रतिनिधियों द्वारा जनगणना आयुक्तों के पास अपनी जातियों को उच्च स्थान देने के लिए याचिकाएं भेजी गई। इन जनगणनाओं में किस क्षेत्र में किस जाति को अन्य जातियों की तुलना में उच्च स्थान प्राप्त है वह श्रेणी क्रम में उस जाति की स्थिति निर्धारित करना इत्यादि कार्य किए गए। 

इस प्रकार के विभिन्न जाति व्यवस्था के सुधारों में रुचि लेने से जाति व्यवस्था में काफी बदलाव देखा गया। विद्वानों के अनुसार उपनिवेशवाद में हुए हस्तक्षेपों से पूर्व जाति व्यवस्था व जातियों की पहचान बहुत अधिक अस्थिर व कमजोर थी।

भू-राजस्व व्यवस्थाओं और तत्संबंधी प्रबंधों तथा कानूनों ने उच्च जातियों के रूढ़िगत अधिकारों को वैध मान्यता देने का कार्य किया । इन व्यवस्थाओं तथा प्रबंधों द्वारा ही जातियों के अधिकारों को उभारा गया । 

इससे पूर्व इन जनजातियों से सिर्फ श्रमिक व मजदूरों का ही कार्य लिया जाता था, परन्तु इन प्रबंधों द्वारा ये जातियाँ भूमियों की स्वामी बन गई थी व उनका जमीन की उपज अथवा राजस्व जैसे नजरानों पर दावा स्थापित हो गया था। 

औपनिवेशिक काल के अंतिम दौर में प्रशासन ने ‘दलित वर्ग’ कही जाने वाली जातियों के कल्याण के लिए भी महत्त्वपूर्ण कदम उठाए । इन ‘दलित वर्गों’ को समाज में कोई भी स्थान प्राप्त न था व न ही इन्हें कोई अधिकार प्राप्त था।

 इन दलित वर्गों के सुधारों के प्रयत्नों के अन्तर्गत ही 1935 का भारत सरकार अधिनियम पारित किया गया। इन अधिनियम द्वारा निर्धारित जातियों तथा जनजातियों की सूचियों तथा अनुसूचियों को वैध मान्यता दी गई । 

अस्पृश्य यानि अछूत समझी जाने वाली जातियों को अनुसूचित जातियों की श्रेणी में शामिल किया गया। पंजाब जैसे राज्यों में बड़े पैमाने पर सिंचाई योजनाएँ प्ररम्भ की गई। इसके अतिरिक्त अन्य राज्यों में भी सिंचाई योजनाएँ प्रारम्भ की गई। इन राज्यों में रहने वाली विभिन्न जनजातियों व जातियों को ये सुविधाएँ निःशुल्क उपलब्ध करवाई गई।

इस प्रकार उपनिवेशवाद ने जाति संस्था में अनेक प्रमुख परिवर्तन किए। उपनिवेशवाद ने के कारण ही अनुसूचित जनजातियाँ और अनुसूचित जातियाँ जैसे शब्द अस्तित्व में आए । उस काल में पूँजीवाद और आधुनिकता के प्रसार के कारण पूरे विश्व में बदलाव महसूस किए गए । 

6. जाति के समकालीन रूप को स्पष्ट कीजिए। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् विभिन्न उद्योगों की उन्नति ने जाति व्यवस्था को कैसे प्रभावित किया ? 

Or, आप क्या सोचते हैं कि स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् भी जनजातियों की स्थिति उच्च बनी रही ? अपने उत्तर तर्क के पक्ष में दीजिए। 

Or, भारत में स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् जाति व्यवस्था में कौन-कौन से प्रयत्न किए गए ? उद्योगों में हुई प्रगति से जाति व्यवस्था में क्या बदलाव आए ?

Ans. स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् भी भारत को औपनिवेशिक अतीत से छुटकारा नहीं मिला । ‘दलित वर्गों’ व ‘अछूत जातियों’ को संगठित करने के प्रयत्न राष्ट्रवादी आंदोलनों के प्रारम्भ होने से पहले ही 19वीं शताब्दी में प्रारम्भ हो चुके थे। 

इन जनजातियों व अस्पृश्य जातियों के सुधारों के लिए काफी प्रयत्न किए गए। उच्च कही जाने वाली जातियों तथा नीच समझी जाने वाली जातियों के सदस्यों, जैसे—दक्षिण भारत में अय्यनकालि पश्चिमी भारत में महात्मा ज्योतिबा फूले और बाबा साहब अम्बेडकर, श्री नारायण गुरु, ई.वी. रामास्वामी नायकर ने इन जातियों के विकास के लिए काफी प्रयत्न किए। 

इसके अतिरिक्त, छुआछूत के विरुद्ध 1920 के दशक में महात्मा गाँधी और बाबा साहब अंबेडकर द्वारा अनेक विरोध- आंदोलन चलाए गए । इन महापुरुषों ने जातीयता में फैली असमान स्थिति व असमान विचारों को दूर करने के भरसक प्रयत्न किए। 

अस्पृश्यता विरोधी कार्यक्रमों को कॉंग्रेस की कार्यसूचियों में भी महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया। यह कार्य इसलिए लिए किया गया ताकि इन विरोधी कार्यक्रमों का प्रभाव कम न हो। 

इन सब प्रयत्नों द्वारा राष्ट्रवादी नेतागण, जिनमें महात्मा गाँधी प्रमुख थे, नीच समझी जाने वाली जातियों के उत्थान के लिए अस्पृश्यता तथा अन्य जातीय प्रतिबंधों के पक्ष में समर्थन जुटाने में सफल रहे। इसके साथ-साथ उच्च जातियों के अधिकारों की सुरक्षा की ओर भी ध्यान दिया गया। परन्तु इन सब प्रयत्नों के बाद भी जातीय अधिकारों को बल नहीं मिला । सरकारी पदों पर नियुक्ति के मामले में जाति को ‘समान’ आधार पर प्रतियोगिता करनी पड़ती थी । 

इसका कारण यह था कि अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के लिए कुछ पद आरक्षित थे परन्तु स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् इन तथ्यों पर राज्य सरकार ने कोई कारवाई नहीं की । इन जातियों के लिए किए गए प्रयासों व इन्हें दिलाए आश्वासनों को सुरक्षित रखने का कोई प्रयत्न नहीं किया गया ।

इसके अतिरिक्त उद्योगों की उन्नति ने भी आर्थिक परिवर्तन में तीव्रता और गहनता लाकर अप्रत्यक्ष रूप से जाति संस्था को प्रभावित किया । इन उद्योगों के विकास का भी जातीय व्यवस्था पर गहरा प्रभाव पड़ा । इन उद्योगों में उपलब्ध रोजगारों में कोई जातीय नियम नहीं बनाए गए । 

नगरीकरण और शहरों के रहन-सहन व विचारों ने जाति-पृथक्कृत स्वरूपों का अधिक समय तक चलना मुश्किल कर दिया। उद्योगों में नौकरियों की भर्ती जाति और नातेदारी के आधार पर होती थी। कारखानों व मिलों में भर्ती करने वाले व्यक्ति केवल अपनी ही जाति के लोगों की भर्ती किया करते थे । 

7. ‘संस्कृतिकरण’ तथा ‘प्रबल जाति’ का अर्थ स्पष्ट करें। निम्न जातियों के लिए उनको जाति उन पर बोझ बन गई है। इसका अर्थ स्पष्ट करें। 

Ans. ‘संस्कृतिकरण’ तथा ‘प्रबल जाति’ सबसे अधिक प्रचलित संकल्पनाएँ हैं जो एम.

एन. श्रीनिवास की देन है संस्कृतिकरण—यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा जाति के सदस्य किसी उच्च जाति की धार्मिक क्रियाओं, परेलू या सामाजिक परिपाटियों को अपनाकर अपनी सामाजिक परिपाटियों को ऊँथा करने का प्रयत्न करते हैं। इस प्रक्रिया का प्रचार हाल के समय में सर्वाधिक हुआ है। इस प्रक्रिया के अन्तर्गत समानुकरण के लिए अक्सर ब्राह्मण या क्षत्रिय जातियों के रीति-रिवाजों को अपनाया जाता था । 

इस ब्राह्मणी व क्षत्रिय रीति-रिवाजों में शाकाहारी बनना, प्रार्थनाएँ करना व धार्मिक उत्सव मनाना, व यज्ञ इत्यादि करना आदि कार्य व नियम सम्मिलित थे । संस्कृतिकरण की प्रक्रिया संबंधी जाति के आर्थिक स्तर में उन्नति के बाद या उन्नति के साथ-साथ अपनाई जाती है । अर्थात् निम्न जाति के सदस्य दूसरी जाति को तब अपनाते थे जब वह जाति प्रगति के पथ पर अग्रसर हो रही हो ।

प्रबल जाति- इस शब्द का प्रयोग ऐसी जातियों के उल्लेख के लिए किया जाता है जिनकी जनसंख्या अधिक होती थी और जिन्हें स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद किए गए आंशिक भूमि सुधारों द्वारा भूमि के अधिकार प्रदान किए गए थे। 

इन भूमि सुधारों में दावेदारों द्वारा भूमि छीनकर जाति के समुदायों में बाँट दी गई थी। ये दावेदार उच्च जाति के सदस्य होते थे जो शहरों में रहते थे व अपना लगान वसूल करने के अलावा कृषक अर्थव्यवस्था में कोई भूमिका अदा नहीं करते थे । परन्तु अब ये अधिकार उन दावेदारों के हाथ में है जो कृषि प्रबन्ध में तो शामिल थे, परन्तु स्वयं भूमि नहीं जीतते थे । 

इन भूमियों की जुताई के लिए निम्न जातियों के मजदूर व अछूत जातियों के मजदूर शामिल थे। इस प्रकार मध्यवर्ती जातियाँ देहाती इलाकों में प्रबल जातियाँ बन गई, क्योंकि इनकी सर्वाधिक संख्या ने ही लोकतंत्र के इस युग में इन्हें राजनीतिक शक्ति प्रदान की। ये जातियाँ क्षेत्रीय राजनीति तथा कृषि अर्थव्यवस्था में निर्णायक भूमिका अदा करने लगी । इन प्रयत्त जातियों में कुछ इस प्रकार है— 

(i) बिहार व उत्तर प्रदेश के यादव, 

(ii) कर्नाटक के योककलिंग, 

(iii) महाराष्ट्र के मराठे व पंजाब, हरियाणा और उत्तर

प्रदेश के जाट, 

(iv) गुजरात के पाटीदार इत्यादि । इन विभिन्न राज्यों की मध्य तथा निम्न जातियों ने आर्थिक व राजनीतिक क्षेत्र में काफी उन्नति की है।


FAQs


Q. भारत में उन राज्यों के नाम बताइए जहाँ जनजातीय लोगों की दशा बिगड़ती जा रही है।

Ans. भारत में सबसे अधिक प्रभाव पूर्वोत्तर क्षेत्र में पड़ा है। त्रिपुरा में जनजातीय लोगों की संख्या में भारी कमी आई है। यहाँ जनजातीय लोगों की संख्या घटकर आधी रह गई है। अरुणाचल प्रदेश में भी यही स्थिति है। वहीं झारखंड के औद्योगिक इलाकों में वहाँ की जनसंख्या में भी जनजातीय अनुपात कम हो गया है ।

Q. जनजातीय आंदोलनों को बढ़ावा देने में किन्हीं दो मुद्दों के बारे में बताएँ । Or, ऐसे दो मुद्दे बताएँ जिनके कारण जनजातीय आंदोलनों को तूल मिला है। 

Ans. एक प्रकार के मुद्दे वे हैं जो भूमि तथा विशेष रूप से वनों जैसे अत्यन्त महत्त्वपूर्ण आर्थिक संसाधनों पर नियंत्रण से संबंधित हैं। इस प्रकार के मुद्दों का संबंध नृजातीय सांस्कृतिक पहचान के मामलों से है

Q. मातृवंशीय समाज और पितृवंशीय समाज में अंतर स्पष्ट करें। 

Ans. पितृवंशीय समाज में जायदाद पिता से पुत्र को मिलती है, जबकि मातृवंशीय समाज में माँ से बेटी को । पितृतंत्रात्मक परिवार संरचना में पुरुषों की सत्ता का प्रभुत्व होता है । इसके विपरीत, मातृतंत्रात्मक परिवार में स्त्रियों समान प्रभुत्वकारी भूमिका निभाती हैं।

NOTES & QUESTIONS ANSWER


  1. Introducing Indian Society
  2. The Demographic Structure of the Indian Society
  3. Social Institutions: Continuity and Change
  4. The Market as a Social Institution
  5. Patterns of Social Inequality and Exclusion
  6. The Challenges of Cultural Diversity
  7. suggestions for projects work
  1. Structural Change
  2. Cultural Change
  3. The Story of Indian Democracy
  4. Change and Development in Rural Society
  5. Change and Development in Industrial Society
  6. Globalisation and Social Change
  7. Mass Media and Communications
  8. Social Movements

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  1. Introducing Indian Society
  2. The Demographic Structure of the Indian Society
  3. Social Institutions: Continuity and Change
  4. The Market as a Social Institution
  5. Patterns of Social Inequality and Exclusion
  6. The Challenges of Cultural Diversity
  1. Structural Change
  2. Cultural Change
  3. The Story of Indian Democracy
  4. Change and Development in Rural Society
  5. Change and Development in Industrial Society
  6. Globalisation and Social Change
  7. Mass Media and Communications
  8. Social Movements

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1 thought on “VVI Class 12 Sociology Chapter 3 Notes In Hindi सामाजिक संस्थाएँ : निरंतरता एवं परिवर्तन”

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