VVI Class 12 Sociology Chapter 4 Notes In Hindi बाजार एक सामाजिक संस्था के रूप में

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Class 12 Sociology Chapter 4 Notes In Hindi बाजार एक सामाजिक संस्था के रूप में


Class12th 
Chapter Nameबाजार एक सामाजिक संस्था के रूप में
Chapter numberChapter 4
Book NCERT
SubjectSociology
Medium Hindi
Study MaterialsNotes & Questions answer
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बाजार एक सामाजिक संस्था के रूप में


सामान्य रूप से बाजार वस्तुओं और सेवाओं के खरीद-बिक्री के स्थान को कहा जाता है। इस दैनिक बोलचाल के प्रयोग में बाजार शब्द का अर्थ विशेष बाजार हो सकता है जिन्हें हम शायद जानते हैं, जैसे-रेलवे स्टेशन के पास का बाजार, फलों का बाजार या थोक बाजार । 

कभी-कभी हम स्थान की बात न कर लोगों, खरीददार और विक्रेता के जमा बेड़े की बात करते हैं जो मिलकर बाजार को बनाते हैं। अतः उदाहरण के तौर पर एक साप्ताहिक सब्जी बाजार नगरीय पड़ोस या पड़ोसी गाँव में हफ्ते के हर दिन विभिन्न स्थानों पर पाया जा सकता है। 

एक अन्य अर्थ में, बाजार एक क्षेत्र या व्यापार या कारोबार की श्रेणी के बारे में बात करता है, जैसे कारों का बाजार या फिर बने-बनाए कपड़ों का बाजार। इसी से जुड़ा हुआ एक अर्थ एक विशेष उत्पाद या सेवा की माँग का द्योतक है, जैसे-कम्प्यूटर विशेषज्ञों का बाजार । 

वृहत्त अर्थ में बाजार अर्थव्यवस्था के लगभग तुल्य है। हम बाजार को एक आर्थिक संस्था के रूप में देखने के आदी हैं।


VVI Class 12 Sociology Chapter 4 Notes In Hindi बाजार एक सामाजिक संस्था के रूप में

बाजार एक सामाजिक संस्था भी है। अपने स्वयं के तरीके में बाजार की तुलना जाति, जनजाति या परिवार जैसी स्पष्ट एवं प्रत्यक्ष सामाजिक संस्थाओं से की जा सकती है। 

समाजशास्त्री मानते हैं कि बाजार सामाजिक संस्थाएँ हैं जो विशेष सांस्कृतिक तरीकों द्वारा निर्मित हैं। उदाहरण के लिए, बाजारों का नियंत्रण या संगठन अक्सर विशेष सामाजिक समूह या वर्गों द्वारा होता है और इसकी अन्य संस्थाओं, सामाजिक प्रक्रियाओं और संरचनाओं से भी विशेष सम्बद्धता होती है।

आरंभिक दौर के राजनीतिक अर्थशास्त्रियों में एडम स्मिथ की सबसे चर्चित थे जिन्होंने अपनी किताब ‘दे वेल्थ ऑफ नेशन्स’ में बाजार अर्थव्यवस्था को समझाने का प्रयास किया जो उस वक्त अपने शुरुआती दौर में थी। 

स्मिथ का तर्क था कि बाजारी अर्थव्यवस्था व्यक्तियों में आदान-प्रदान या सौदों का एक लंबा क्रम है, जो अपनी क्रमबद्धता की वजह से खुद-ब-खुद कार्यशील और स्थिर व्यवस्था की स्थापना करती है। यह तब भी होता है जब करोड़ों के लेन-देन में शामिल व्यक्तियों में से कोई भी व्यक्ति इसकी स्थापना का इरादा नहीं रखता। प्रत्येक व्यक्ति अपने लाभ को बढ़ाने की सोचता है और ऐसा करते हुए वो जो भी करता है, वो स्वतः ही समाज के या सभी के हित में होता है। 

इस प्रकार, ऐसा प्रतीत होता है कि कोई एक अदृश्य वल यहाँ काम करता है जो इन व्यक्तियों के लाभ की प्रवृत्ति को समाज के लाभ में बदल देता है। इस बल को स्मिथ ने ‘अदृश्य हाथ’ का नाम दिया अतः उन्होंने तर्क दिया कि पूँजीवादी अर्थव्यवस्था स्वयं लाभ से स्वचालित है और यह तब सबसे अच्छी तरह कार्य करती है जब हर व्यक्ति खरीददार और विक्रेता तर्कसंगत निर्णय लेते हैं जो उनके हित में होते हैं। 

स्मिथ ने ‘अदृश्य हाथ’ के विचार को इस तर्क के रूप में प्रयोग किया कि जब बाजार में व्यक्ति स्वयं लाभ के अनुसार काम करता है तो समाज को हर तरह से फायदा होता है, क्योंकि यह अर्थव्यवस्था को बढ़ाता है और अधिक समृद्धि उत्पन्न करता है। 

यही कारण है कि स्मिथ ने ‘खुले व्यापार’ का समर्थन किया, एक ऐसा बाजार जो किसी भी प्रकार के राष्ट्रीय या अन्य रोकथाम से मुक्त हो। इस आर्थिक दार्शनिकता को फ्रांसीसी भाषा में ‘लेस-ए-फेयर’ भी कहा गया, जिसका अर्थ है- बाजार को ‘अकेला छोड़ दिया जाए’ या ‘हस्तक्षेप न किया जाए।

आधुनिक अर्थशास्त्र का विकास एडम स्मिथ जैसे प्रारंभिक विचारकों के विचारों से हुआ और यह इस विचार पर आधारित है कि अर्थव्यवस्था को समाज के एक पृथक् हिस्से के रूप में भी पढ़ा जा सकता है जो बड़े सामाजिक एवं राजनीतिक संदर्भ से अलग, जिसमें बाजार कार्य करते हैं, अपने स्वयं के नियमों के अनुसार कार्य करता है। 

इस उपागम के विपरीत, समाजशास्त्रियों ने बड़े सामाजिक ढाँचे के अंदर आर्थिक संस्थाओं और प्रक्रियाओं को समझने के लिए एक वैकल्पिक तरीके का विकास करने का प्रयास किया है।



समाजशास्त्री नानते हैं कि बाजार सामाजिक संस्थाएँ हैं जो विशेष सांस्कृतिक तरीकों द्वारा निर्मित हैं। उदाहरण के लिए, बाजारों का नियंत्रण या संगठन अक्सर विशेष सामाजिक समूहों या वर्गों द्वारा होता है और इसकी अन्य संस्थाओं, सामाजिक प्रक्रियाओं और संरचनाओं से भी विशेष संबद्धता होती है। 

समाजशास्त्री इस विचार को अक्सर यह कहकर प्रकट करते हैं कि है-एक पारंपरिक समुदाय’ अर्थव्यवस्थाएँ समाज में ‘रची-बसी हैं। इस मत को यहाँ दो उदाहरणों सहित प्रस्तुत किया गया है। एक उदाहरण है एक साप्ताहिक आदिवासी हाट का और दूसरा और औपनिवेशिक दौर में उसका लेन-देन का नेटवर्क या तंत्र।

भारतीय आर्थिक इतिहास के कुछ पारंपरिक विवरण भारतीय अर्थव्यवस्था और समाज को एक अपरिवर्तनशील रूप में देखते हैं। यह माना जाता रहा है कि आर्थिक रूपांतरण उपनिवेशवाद के साथ ही शुरू हुआ। 

ऐसा माना जाता था कि भारत प्राचीन ग्रामीण समुदायों का देश है जो अपेक्षाकृत स्व-निर्भर थे और उनकी अर्थव्यवस्थाएँ प्राथमिक तौर पर गैर- बाजारी विनिमय के आधार पर संगठित थीं। 

औपनिवेशिकता के दौरान और भारत की आजादी के प्रारंभिक दौर में ऐसा माना गया कि व्यावसायिक रुपये-पैसे की अर्थव्यवस्था के स्थानीय कृषक अर्थव्यवस्था में आने और विनिमय के वृहत् क्षेत्रों में उनके शामिल होने से ग्रामीण एवं नगरीय समाजों में जबरदस्त सामाजिक एवं आर्थिक परिवर्तन हुए। यहाँ यह कहना सही है कि औपनिवेशिकता ने बड़े आर्थिक रूपांतरण किए,

 जैसे-अंग्रेजी सरकार की ये मांग कि भू- लगान को नकद चुकाना है, वहीं हाल ही में हुए ऐतिहासिक शोध यह दिखाते हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था का मुद्रीकरण (व्यापार में रुपए-पैसे का प्रयोग होना) औपनिवेशिकता के ठीक पहले से ही विद्यमान था। 

जहाँ बहुत-से गाँवों और इलाकों में विभिन्न प्रकार की गैर-बाजारी विनिमय व्यवस्था (जैसे- ‘जजमानी व्यवस्था) तो मोजूद थी पर औपनिवेशिकता से पहले के दौर में भी गाँव विनिमय के बड़े तंत्र का हिस्सा थे जिससे कृषि उत्पाद और तरह-तरह की अन्य वस्तुओं का व्यापारिक प्रचलन होता था (बेयली 1983 स्टाइन एवं सुब्रमण्यन 1996)। 

अब ऐसा लगता है कि ‘पारंपरिक’ और ‘आधुनिक’ (या पूँजीवाद से पहले और पूँजीवाद का दौर) अर्थव्यवस्था के बीच में अक्सर जो बिभाजन किया जाता है वो सफाई से बेटा हुआ नहीं है।

भारतीय अर्थव्यवस्था के अनेक समाजशास्त्रीय अध्ययन पारंपरिक व्यापारिक समुदायों’ या जातियों जैसे नाकरद्वारों पर केंद्रित हैं। भूमि पर अधिक, व्यावसायिक भिन्नताएँ एवं अन्य विषयों के संदर्भ में जाति व्यवस्था और अर्थव्यवस्था में गहरा नाता है। 

यह बात बाजारों और व्यापार पर भी उतनी ही लागू होती है। वास्तव में, ‘वैश्य’ चार वर्णों में से एक हैं, यह तथ्य भारतीय समाज में प्राचीनकाल से व्यापार और व्यापारी के महत्त्व को दर्शाता है। हालांकि अन्य वर्णों की तरह ‘वैश्य’ प्रतिस्थिति अक्सर स्थिर पहचान या सामाजिक स्थिति की तुलना में अधिकार या आकांक्षी से प्राप्त की हुई होती है। 

हालांकि कुछ ऐसे ‘वैश्य समुदाय भी हैं (जैसे-उत्तरी भारत के बनिया) जिनका पारंपरिक व्यवसाय एक लंबे समय से व्यापार या वाणिज्य रहा है। कुछ जाति समूह भी है जो व्यापार में शामिल हो गए हैं। ऐसे समूह ऊपर बढ़ने की प्रक्रिया में ‘वैश्य’ की प्रतिस्थिति पाने की आकांक्षा रखते हैं या इस पर अधिकार जताते हैं। 

हर जाति समुदायों के इतिहास की तरह इस संदर्भ में भी जाति प्रस्थिति या पहचान और जाति व्यवहारों जिसमें व्यवसाय भी शामिल हैं, के नीच एक जटिल संबंध होता है। भारत में ‘पारंपरिक व्यापारिक समुदायों’ में सिर्फ ‘वैश्य’ ही नहीं बल्कि और समूह भी अपनी भिन्न धार्मिक या अन्य सामुदायिक पहचानों के साथ शामिल हैं, जैसे—पारसी, सिंधी, बोहरा या जैन। 

व्यापारिक समुदायों की समाज में हमेशा उच्च प्रस्थिति नहीं रही है। मसलन, उपनिवेश काल के दौर में नमक का दूर-दराज तक व्यापार एक उपेक्षित जनजातीय समूह, बंजारा द्वारा होता था। हर स्थिति में सामुदायिक संस्थाओं का विशेष स्वरूप और उनका आचरण विभिन्न संस्थाओं और व्यापारिक प्रथाओं को जन्म देता है।

दुनिया के सभी कोनों में पूँजीवाद के विकास से जीवन के हर क्षेत्र और हिस्सों में बाजारों का विस्तार हो गया जो कि पहले इस व्यवस्था से अछूते थे। पण्यीकरण (Commoditisation) तंब होता है जब कोई वस्तु बाजार में बेची-खरीदी न जा सकती हो और अब वह बेची-खरीदी जा सकती है अर्थात् अब वह बाजार में बिकने वाली एक चीज बन गई है, जैसे-श्रम और कौशल अब ऐसी चीजें हैं जो खरीदी व बेची जा सकती है। 

मार्क्स और पूँजीवाद के अन्य आलोचकों के अनुसार, पण्यीकरण की प्रक्रिया के नकारात्मक सामाजिक प्रभाव हैं। श्रम का पण्यीकरण एक उदाहरण है, लेकिन समकालीन समाज में ऐसे और भी उदाहरण हैं। मसलन, आजकल एक विवादास्पद वाक्या है-गरीब लोगों द्वारा अपनी किडनी को अमीर लोगों को बेचना जिन्हें किडनी के प्रतिस्थापन की आवश्यकता है। 

बहुत-से लोगों का मानना है कि मानव अंगों का पण्यीकरण नहीं होना चाहिए। पहले के समय में इंसानों को गुलाम के तौर पर बेचा और खरीदा जाता था, पर आज के दौर में लोगों को वस्तुओं की तरह समझना अनैतिक माना जाता है, पर आधुनिक समाज में लगभग हर कोई मानता है कि इंसान का श्रम खरीदा जा सकता है या पैसों के बदले में अन्य सेवाओं या कौशल उपलब्ध कराया जा सकता है। मार्क्स के अनुसार, यह वह स्थिति है जो सिर्फ पूँजीवादी समाजों में ही पाई जाती है।

भारत में अतीत व समकालीन परिवेश में बाजारों के परिचालन को समझने के लिए हम इस बात की जाँच कर सकते हैं कि किस तरह व्यापार के कुछ विशेष क्षेत्र विशेष समुदायों द्वारा नियंत्रित होते हैं। 

इस जाति आधारित विशेषता का एक कारण यह भी हो सकता है कि व्यापार और खरीद-फरोख्त आम तौर पर जाति एवं नातेदारी तंत्रों में ही होता है जैसा कि हमने नाकरट्टारों के मामले में देखा। क्योंकि व्यापारी अपने स्वयं के समुदायों के लोगों पर विश्वास औरों की अपेक्षा ज्यादा करते हैं, इसलिए वे बाहर के लोगों की बजाय इन्हीं संपर्कों में व्यापार करते हैं और इससे व्यापार के कुछ क्षेत्रों पर एक जाति का एकाधिकार हो जाता है।

भारतीय अर्थव्यवस्था का भूमंडलीकरण खास तौर पर उदारीकरण की नीति की वजह से हुआ है जो कि 1980 के दशक में शुरू हुई। उदारवादिता में कई तरह की नीतियाँ शामिल हैं, जैसे- सरकारी विभागों का निजीकरण (सरकारी संस्थानों को प्राइवेट कंपनियों को बेच देना) पूँजी, श्रम और व्यापार में सरकारी दखल कम कर देना; 

विदेशी वस्तुओं के आसान आयात के लिए आयात शुल्क में कमी करना; और विदेशी कंपनियों को भारत में उद्योग स्थापित करने में सहूलियत देना। बाजारीकरण या इन परिवर्तनों को सामाजिक, राजनीतिक या आर्थिक समस्याओं के समाधान के लिए बाजार या बाजार आधारित प्रक्रियाओं (सरकारी नियमों और नीतियों के बजाय) के उपयोग से भी समझ सकते हैं। 


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Historyइतिहास
Geography भूगोल
Political science राजनीति विज्ञान
English SubjectResult
Hindi SubjectHistory answer keys

इसमें आर्थिक नियंत्रण को सरकार द्वारा कम या खत्म कर देना, उद्योग का निजीकरण और मजदूरी और मूल्यों पर से सरकारी नियंत्रण को खत्म कर देना शामिल है। जो लोग बाजारीकरण का समर्थन करते हैं, उनका मानना है कि इससे समाज में आर्थिक संवृद्धि आएगी, क्योंकि सरकारी संस्थाओं की अपेक्षा के निजी संस्थाएँ ज्यादा कुराल होती है।

उदाहरण के कार्यक्रमों के तहत जो परिवर्तन हुए, उन्होंने आर्थिक संवृद्धि को बढ़ाया और इसके साथ ही भारतीय बाजारों को विदेशी कंपनियों के लिए खोला। उदाहरण के लिए, अब बहुत सारी विदेशी वस्तुएँ यहाँ बिकती है, जो पहले यहाँ नहीं मिलती थीं। माना जाता है कि विदेशी पूंजी के निवेश से आर्थिक विकास होता है और रोजगार बढ़ते हैं। सरकारीयों के निजीकरण से कुशलता बढ़ती है और सरकार पर दबाव कम होता है। हालांकि, उदारीकरण का असर मिश्रित रहा है। 

कई लोगों का यह भी मत है कि उदारीकरण का भारतीय परिवेश पर प्रतिकूल असा ही हुआ है और आगे के दिनों में भी ऐसा ही होगा। हम अपनी ज्यादा चीजें खोकर कम चीजें को पाएँगे। भारतीय उद्योग के कुछ क्षेत्रों (जैसे-सॉफ्टवेयर या सूचना तकनीकी) या खेती (जैसे-मछली या फल उत्पादन) शायद वैश्विक बाजार से फायदा हो सकता है, पर अन्य क्षेत्र (जैसे—ऑटोमोबाइल्स, इलेक्ट्रॉनिक्स और तेलीय अनाजों के उद्योग) पर गहरा असर पड़ेगा क्योंकि यह उद्योग विदेशी उत्पादकों से प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाएँगे। फिर भी वैश्वीकरण के इस युग । में भारत को अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के बाजार में अपनी अमिट पहचान बनाना चाहिए।


sociology class 12 chapter 4 questions and answers in hindi


1. ‘अदृश्य हाथ’ का क्या तात्पर्य है ?

Ans. राजनीतिक अर्थशास्त्रियों में एडम रिमय सर्वाधिक प्रचलित थे। ‘अदृश्य हाथ’ का नाम उन्हीं के द्वारा दिया गया। स्मिथ का तर्क था कि बाजारी अर्थव्यवस्था व्यक्तियों में आदान-प्रदान या सीदों का एक सर्वाधिक लंबा क्रम है, जो अपनी क्रमबद्धता से स्वयं ही एक कार्यशील और स्थिर व्यवस्था की स्थापना करती है। 

ऐसा तब भी होता है जब कोई व्यक्ति करोड़ों के लेन-देन में इसकी स्थापना का इरादा रखता है। प्रत्येक व्यक्ति अपने लाभ को बढ़ाने की सोचता है और ऐसा करते हुए उसके सभी कार्य समाज के या सभी के हित में होते हैं। इस प्रकार ऐसा प्रतीत होता है कि कोई एक अदृश्य बल यहाँ काम करता है जो इन व्यक्तियों के लाभ की प्रवृत्ति को लाभ में परिवर्तित कर देता है।

 इस प्रकार के बल को स्मिथ द्वारा ‘अदृश्य दल’ का नाम दिय गया। ‘अदृश्य हाथ’ के विचार को स्मिथ ने इस तर्क के रूप में प्रयोग किया कि जब बाजार में व्यक्ति स्वयं लाभानुसार कार्य करता है तो समाज को हर तरह से लाभ होता है, क्योंकि या अर्थव्यवस्था को बढ़ाता है और अधिक समृद्धि उत्पन्न करता है।

2. बाजार पर समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण, आर्थिक दृष्टिकोण से किस तरह अलग हैं। 

Ans. आर्थिक दृष्टिकोण-इस दृष्टिकोण के अनुसार बाजार सुचारु रूप से तभी कार्य करते हैं जब खरीददार और विक्रेता तर्कसंगत निर्णय हैं और ये निर्णय विक्रेता व दुकानदार दोन के हितों में होते हैं। इसके अनुसार बाजार में हर व्यक्ति लाभानुसार निर्णय लेता है। 

इन्हीं निर्णयों के आधार पर ही समाज को फायदा होता है। इसके अनुसार खुला व्यापार हर प्रकार की राष्ट्रीय या अन्य रोकथाम से मुक्त होता है। आर्थिक दृष्टिकोण का अर्थ है कि बाजार के कार्यों में हस्तक्षेप न करके उसे अकेला छोड़ दिया जाए।

समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण- इस दृष्टिकोण से समाजशास्त्री मानते हैं कि बाजार विशेष सांस्कृतिक तरीकों द्वारा निर्मित हैं। ये विशेष प्रकार की सामाजिक संस्थाएँ हैं। बाजारों का नियंत्रण या संगठन विशेष सामाजिक समूहों या वर्गों द्वारा होता है। बाजार की अन्य संस्थाओं सामाजिक प्रक्रियाओं और संरचनाओं में भी विशेष संबद्धता होती है। 

समाजशास्त्रियों के अनुसार अर्थव्यवस्थाएँ समाज में बसी हुई हैं अर्थात् बाजारों का समाजों में एक स्थान निर्धारित है ब इनका समाज में आधिपत्य है।

3. किस तरह से एक बाजार जैसे कि, एक साप्ताहिक ग्रामीण बाजार, संस्था है ?

Ans. यह तर्क उचित है कि साप्ताहिक ग्रामीण बाजार एक सामाजिक संस्था है। यह समाज से पूर्ण रूप से जुड़े होते हैं। साप्ताहिक बाजार गाँवों के व्यक्तियों को सुविधाएँ व उचित सामान उपलब्ध करवाता है। 

गाँव के वे लोग जो अपनी उपज या अन्य किसी उत्पाद को बेचकर उन वस्तुओं को खरीदते हैं जो उन्हें गाँवों में नहीं मिलतीं, साप्ताहिक बाजारों द्वारा एकत्रित कर लिए जाते हैं। इन वस्तुओं में गाँवों से बाहर के विशेषज्ञ, जैसे- साहूकार, ज्योतिषी, मसखरें इत्यादि अपनी सेवाएँ एवं वस्तुओं के साथ आते हैं। 

ये बाजार गाँव के लोगों की उनकी जरूरतों के सामान उपलब्ध करवाते हैं। पहाड़ी इलाकों में जहाँ सड़कें और संचार शीर्ण होता है, अधिवास दूर-दूर तक होता है और अर्थव्यवस्था भी अपेक्षाकृत अल्पविकसित होते हैं। साप्ताहिक बाजार उत्पादों के आदान-प्रदान व व्यापार के साथ एक प्रमुख संस्था बन जाता है।

इन साप्ताहिक बाजारों के स्वरूप में भी काफी परिवर्तन हुआ है। इन बाजारों का विकास अब धीरे-धीरे क्षेत्रीय एवं राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाओं में भी किया जाने लगा है। साप्ताहिक बाजारों का उत्तम उदाहरण बस्तर जिले का है। इनके साप्ताहिक बाजारों में व्यापारी गैर जनजातीय, जनजातीय व बाहर से आए हुए हिंदू ही होते हैं। 

4. व्यापार की सफलता में जाति एवं नातेदारी संपर्क कैसे योगदान कर सकते हैं ? 

Ans. व्यापार की सफलता में जाति एवं नातेदारी संपर्क के लिए तमिलनाडु के नाकरद्वार एक जीवंत उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। इनकी व्यापारिक गतिविधियों समुदाय के सामाजिक संगठनों से जुड़ी हुई थीं। जाति, नातेदारी और परिवार की संरचना सब व्यापार के अनुकूल थी। नाकरट्टा के बैंक भी संयुक्त पारिवारिक संस्थान थे 

अर्थात् इनमें जाति एवं नातेदारी सभी का उचित सहयोग था। इसी प्रकार व्यापारिक और बैंकिंग गतिविधियाँ जाति और नातेदारी के माध्यम से संगठित थीं। अतः जाति एवं नातेदारी संपर्कों द्वारा व्यापारिक गतिविधियों बढ़ाई जा सकती हैं। अतः बाजार की सफलता में जाति एवं नातेदारी संपर्कों का योगदान होता है।

5. उपनिवेशवाद के आने के पश्चात् भारतीय अर्थव्यवस्था किन अर्थों में बदली ? 

Ans. उपनिवेशवाद के आते ही भारतीय अर्थव्यवस्था गहरे अर्थों में बदली। इस बदलाव से उत्पादन व्यापार और कृषि में काफी कमी हुई। उपनिवेशवाद के कारण हस्तकरघा उद्योगों की समाप्ति हो गई व इन कामों का खात्मा हो गया। इसका प्रमुख कारण यह था कि भारत में इंग्लैंड से सस्ते बने कपड़ों को बाजारों में बेचा गया जिससे हस्तकरघा उद्योग बंद ही हो गए। 

ज्यादातर इतिहासकार उपनिवेश काल को एक संधिकाल के रूप में देखते हैं। औपनिवेशिक काल के दौरान भारत विश्व की पूँजीवादी अर्थव्यवस्था से और अधिकता से जुड़ गया। जहाँ भारत पहले सिर्फ निर्मित वस्तुओं के निर्यात का प्रमुख केन्द्र था, वहीं उपनिवेशवाद के पश्चात् कच्चे माल और कृपक उत्पादों का स्रोत और उत्पादित सामानों का उपभोक्ता बन गया। नए-नए समूह व्यापार और व्यवसाय में आने लगे। 

इन समूहों ने पहले के व्यापारिक समुदायों से मिल-जुलकर अपना व्यापार शुरू किया या कभी इन समुदायों द्वारा उनका व्यापार छोड़ने पर इन कार्यों के द्वारा, नए व्यापारी समूहों ने अपनी सत्ता व प्रभुत्व भारत में स्थापित किया। 

परन्तु पहले से विद्यमान आर्थिक समुदायों को नए अवसर भी प्रदान किए गए जिससे इन समुदायों ने अपनी आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को पुनर्गठित किया व अपनी स्थिति को सुधार। 

6. उदाहरणों की सहायता से ‘पण्यीकरण’ के अर्थ की विवेचना कीजिए। 

Ans. पण्य- कोई वस्तु या सेवा जो बाजार में खरीदी या बेची जा सकती हो। पण्यीकरण-एक पण्येतर पानि गैर-पण्य वस्तु (यानी ऐसी वस्तु जिसे बाजार में खरीदा या बेचा नहीं जा सकता) का पण्य में रूपांतरण । यह तब होता है जब कोई वस्तु बाजार में बेची या खरीदी न जा सकती हो और अब वह बाजार में बिक सकती है। इसके उदाहरण है श्रम और कीशल । मे ऐसी चीजें हैं जो खरीदी या बेची जा सकती है। 

समकालीन समाज में पण्यीकरण के कई उदाहरण हैं, जैसे—गरीब लोगों द्वारा किडनी उन लोगों को बेचना जिन्हें किडनी की आवश्यकता है। पहले के समाज में भी इसके उदाहरण हैं कि इंसानों को गुलामों की तरह खरीदा और बेचा जाता था। कुछ लोगों के मतों में मानव व मानव अंगों का पण्यीकरण नहीं होना चाहिए। इंसान का श्रम ही खरीदा व बेचा जा सकता है।

आज समाज में शिक्षा का भी पप्पीकरण हो रहा है। सामाजिक कौशल और शिष्टाचार जैसे गुण परिवार में ही सिखाए जाते थे, परन्तु आज नए विद्यालय, महाविद्यालयों में शिक्षा के लिए होड़ लगी है। लोग बढ़िया से बढ़िया शिक्षा संस्थान में प्रवेश पाने का प्रयास कर रहे हैं। 

अनेक निजी संस्थान, जैसे- अंग्रेजी बोलना सीखना, कम्प्यूटर कोर्स विद्यार्थियों को समकालीन विश्व में सफल होने के लिए सांस्कृतिक एवं सामाजिक कौशल सिखाते हैं। जहाँ पहले शादियाँ माता-पिता द्वारा तय होती थी, वहीं अब शादियों मैरिज ब्यूरो या वेबसाइट पर ही हो जाती है। इससे अन्य व्यक्तियों को अच्छी आमदनी व रकम प्राप्त होती है।

इसी प्रकार जहाँ पहले शहर तथा कस्बों में वोतल का पानी उपलब्ध नहीं था, वहीं अब बोतल का पानी भी मिलने लगा है। अनेक कम्पनियाँ हैं और अनेक ब्रांड के नाम हैं जिनसे पानी की बोतलें पहचानी जाती हैं। इसी तरह ऐसी अनेक वस्तुएँ हैं जो पहले के समय में मुमकिन न थी परन्तु आज खुले स्तर पर उसका व्यापार होता है। 

7. ‘प्रतिष्ठा का प्रतीक’ क्या है ?

Ans. ‘प्रतिष्ठा का प्रतीक’ का नाम समाजशास्त्र के महान संस्थापक मैक्स वेबर के द्वारा दिया गया। उनके अनुसार जो लोग वस्तुएँ व अन्य सामान खरीदते हैं एवं उपयोग करते हैं, वह समाज में उनकी प्रस्थिति से गहनता से जुड़ा होता है। 

उदाहरणतया वे मध्य वर्गीय परिवार जिनके पास कोई कार का पुराना मॉडल है या कोई सेलफोन है तो इनके माध्यम से उनकी सामाजिक आर्थिक प्रस्थिति का अनुमान लगाया जा सकता है। वेबर का विचार था कि किस प्रकार लोगों की जीवन-शैली के आधार पर उनके वर्गों और प्रस्थिति समूहों में भिन्नता आ जाती है।

8. ‘भूमंडलीकरण’ के तहत् कौन-कौन सी प्रक्रियाएँ सम्मिलित हैं ? 

Ans. भूमंडलीकरण के तहत समाचार और लोगों का संचलन अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर वस्तुओं, पूँजी, अन्य आधारभूत सुविधाओं का विकास इत्यादि प्रक्रियाएँ सम्मिलित हैं। भूमंडलीकरण का उद्देश्य दुनिया के चारों कोनों में बाजारों का विस्तार और एकीकरण को बढ़ाना है। 

भूमण्डलीकरण के अन्तर्गत सांस्कृतिक उत्पादों और छवियों का भी दुनियाभर में परिचालन होता है। यह विनिमय के नए दायरों से प्रवेश करती है और नए बाजारों का निर्माण करती है। उत्पाद, सेवाएँ और सांस्कृतिक तत्व जो पहले बाज़ार व्यवस्था से बाहर थे, अब भूमण्डलीकरण के हिस्से हैं।

9. ‘उदारीकरण’ स क्या तात्पर्य है ?

Ans. उदारीकरण- यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा आर्थिक कार्यकलाप पर राज्य के नियंत्रण ढीले कर दिए जाते हैं और उन्हें बाजार की ताकतों के हवाले कर दिया जाता है। सामान्यतः एक ऐसी प्रक्रिया जिसके द्वारा कानूनों को अधिक उदार और सरल बना दिया जाता है।

10. आपकी राय में क्या उदारीकरण के दूरगामी लाभ उसकी लागत की तुलना से अधिक हो जाएँगे ? कारण सहित उत्तर दीजिए ।

Ans. उदारवाद के कार्यक्रमों के तहत जो परिवर्तन देखने को मिले हैं, उससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि उदारीकरण के दूरगामी लाभ उसकी लागत की तुलना से अधिक हो जाएँगे। इन परिवर्तनों के कारण ही आर्थिक संवृद्धि को बढ़ावा मिला है व भारतीय बाजारों को विदेशी कम्पनियों के लिए खोला गया है। 

अब भारत में ऐसी बहुत-सी विदेशी वस्तुएँ मिलती हैं, जो पहले नहीं मिलती थीं। परन्तु कुछ व्यक्तियों के मतानुसार उदारीकरण का भारतीय परिवेश पर प्रतिकूल असर ही हुआ है। इनके अनुसार हमने अधिक खोकर बहुत कम पाया है। सॉफ्टवेयर सूचना, मछली पालन इत्यादि को जहाँ उदारीकरण से लाभ प्राप्त होगा, वहीं ऑटोमोबाइल्स, इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे उद्योगों पर गहरा असर पड़ेगा। इनके विचार में यह उद्योग विदेशी उद्योगों में उत्पादकों से प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाएँगे। 


अति लघु उत्तरीय प्रश्न (VERY SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS)


1. ‘बाजार’ शब्द का अर्थ समझाइए ।

Ans. बाजार-बाजार एक क्षेत्र या व्यापार या कारोबार की श्रेणी से संबंध रखता है, जैसे- कारों या कपड़ों का बाजार। यह विभिन्न प्रकार की आर्थिक क्रियाओं और संस्थाओं को भी इंगित करता है। बाजार एक आर्थिक तथा सामाजिक संस्था भी है। 

2. एडम स्मिथ के बाजारी अर्थव्यवस्था के तर्क के बारे में बताइए ।

Ans. राजनीतिक अर्थशास्त्रियों में एडम स्मिथ सर्वाधिक प्रचलित थे जिन्होंने बाजारी अर्थव्यवस्था को अपनी किताब ‘द वेल्थ ऑफ नेशन्स’ में समझाया। उनका तर्क था कि बाजारी अर्थव्यवस्था व्यक्तियों में आदान-प्रदान या सीदों का एक लंबा क्रम है जो अपनी क्रमबद्धता की वजह से स्वयं एक कार्यशील और स्थिर व्यवस्था की स्थापना करती है।

3. साप्ताहिक बाजारों की पहाड़ी व जंगलीय इलाकों में क्या प्रासंगीकरण है ? 

Ans. पहाड़ी इलाकों में स्थानीय लोग इन साप्ताहिक बाजारों में अपनी खेती की उपज या जंगल से प्राप्त पदार्थों को बेचते हैं। इन बाजारों से प्राप्त पैसों से वे अपने लिए आवश्यक वस्तुएँ, जैसे नमक व खेती के औजार और अपने उपभोग की वस्तुएँ खरीदते हैं। 

4. जनजातीय अर्थव्यवस्था में बदलाव के कारण बताइए ।

Ans. जनजातीय अर्थव्यवस्था में बदलाव के अनेक कारण हैं जो इस प्रकार हैं- (i) जनजातीय क्षेत्रों में साप्ताहिक बाजारों के स्वरूप में काफी परिवर्तन हुआ है। (ii) दूरस्थ क्षेत्रों को धीरे-धीरे क्षेत्रीय एवं राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाओं से जोड़ दिया गया। (iii) जनजातीय क्षेत्रों को सड़कों के निर्माण द्वारा स्थानीय लोगों के लिए खोला गया जिससे इन इलाकों के समृद्ध जंगलों तक पहुँचा जा सके। 

5. एल्फ्रेड गेल के अनुसार बाजार का क्या महत्त्व है ?

Ans. एल्फ्रेड गेल जैसे मानवविज्ञानी के अनुसार बाजार का महत्त्व आर्थिक क्रियाओं तक सीमित न ठोकर सामाजिक संस्था के रूप में भी है। विभिन्न सामाजिक समूह, जाति एवं सामाजिक अधिक्रम में एवं बाजार व्यवस्था में अपनी स्थिति के अनुसार स्थापित होते हैं। बाजार की रूपरेखा उस क्षेत्र के अधिक्रमित अंतर-समूहों के सामाजिक संबंधों का प्रतीकात्मक चित्रण करती है।

6. औपनिवेशिक काल के समय भारत की व्यापार में क्या स्थिति थी ? 

Ans. भारत में आर्थिक रूपांतरण उपनिवेशवाद के साथ ही प्रारम्भ हुआ। औपनिवेशिकता के दौरान व्यावसायिक रुपये-पैसे की अर्थव्यवस्था के स्थानीय कृषि अर्थव्यवस्था में आने और विनिमय के वृहत् क्षेत्रों में उनके शामिल होने से ग्रामीण एवं नगरीय समाज में सामाजिक एवं आर्थिक परिवर्तन हुए। उपनिवेश के पहले से भारत में उन्नत अवस्था के उत्पादन केन्द्रों के साथ-साथ व्यापारियों का संगठित समाज, व्यापारिक तंत्र और बैंकिंग व्यवस्था भी शामिल थी जिससे भारत अन्य देशों से व्यापार करने में सक्षम था। 

7. उपनिवेश से प्रभावित तमिलनाडु के नादूकोटाई चेट्टीयारों समुदाय का उल्लेख कीजिए ।

Ans. उपनिवेश के दौरान इस समुदाय की परिवार संरचना, जाति, नातेदारी व्यापार के अनुकूल थी। व्यापार इन्हीं सामाजिक संरचनाओं के मध्य ही होता था। इन समुदायों के बैंक भी उनके संयुक्त पारिवारिक संस्थान थे ताकि व्यापारिक संस्थान की संरचना भी परिवार के समान रहे। इस प्रकार इनकी व्यापारिक और बैंकिंग गतिविधियाँ जाति और नातेदारी संबंधों के माध्यम से संगठित थीं। इस प्रकार उपनिवेश काल से इस समुदाय के व्यापारिक तरीकों में बदलाव आया। 

8. उपनिवेशवाद के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था में क्या बदलाव आए ?

Ans. उपनिवेशवाद के कारण भारतीय व्यापार में गहरे परिवर्तन आए। इसके कारण भारत विश्व की पूँजीवादी अर्थव्यवस्था से और अधिकता से जुड़ गया। उपनिवेशवाद के बाद भारत से कच्चे माल, कृषि उत्पाद व अन्य उत्पादित सामानों का निर्यात किया जाने लगा। 

भारत में बाजार अर्थव्यवस्था के विस्तार में कुछ व्यापारिक समुदायों को नए अवसर प्रदान किए गए। मारवाड़ी समुदाय इस उपनिवेशवाद द्वारा विकसित सबसे अधिक प्रचलित जाना माना व्यापारिक समुदाय है। 

9. मारवाड़ी समुदाय के बारे में बताइए ।

Ans. मारवाड़ियों का प्रतिनिधित्व बिड़ला परिवार जैसे नामी औद्योगिक घरानों से है। ये छोटे-छोटे दुकानदार और व्यापारी भी हैं। ये भारत में पाए जाने वाले सबसे अधिक प्रचलित व्यापारिक समुदाय हैं। औपनिवेशिक काल के दौरान ये एक सफल व्यापारिक समुदाय बने, जब उन्होंने कलकत्ता से मिले सुअवसरों का लाभ उठाया और देश के सभी भागों में अपनी साहूकारिता जारी रखने के लिए बस गए।

10. ‘पण्य’ को परिभाषित करें।

Ans. पण्य- कोई वस्तु या सेवा जो बाजार में खरीदी या बेची जा सकती हो।

11. पण्य रीति को परिभाषित करें। 

Ans. पण्यरीति- पूँजीवाद के अंतर्गत एक ऐसी स्थिति जिसमें सामाजिक संबंधों को भी वस्तुओं के बीच के संबंधों की तरह अभिव्यक्त किया जाता है। 

12. उपनिवेशवाद को परिभाषित करें।

Ans. उपनिवेशवाद – एक ऐसी विचारधारा, जिसके द्वारा एक देश दूसरे देश को जीतने और उसे अपना उपनिवेश बनाने का प्रयत्न करता है अर्थात् वहाँ जबरन बसने या शासन करने का प्रयत्न करता है।

13. कार्ल मार्क्स की पूँजीवाद के लिए विचारधारा का उल्लेख कीजिए । 

Ans. मार्क्स ने पूँजीवाद को पण्य उत्पादन या बाजार के लिए उत्पादन करने की व्यवस्था के रूप में समझा, जो कि श्रमिक की मजदूरी पर आधारित है। मार्क्स के अनुसार सभी आर्थिक व्यवस्थाएँ सामाजिक व्यवस्थाएँ भी हैं। हर उत्पादन विधि उत्पादन संबंधों से बनती है और एक विशिष्ट वर्ग संरचना से बनती है। 

14. पण्यीकरण की स्थिति कब होती है ? Or, पण्यीकरण से क्या तात्पर्य है ?

Ans. पण्यीकरण की स्थिति तब होती है जब बाजार में कोई वस्तु बेची या खरीदी न जा सकती हो, परन्तु अब वह बेची या खरीदी जा सकती हो। इसका अर्थ हुआ कि अब वह वस्तु बाजार में बिकने वाली एक चीज बन गई है, जैसे-श्रम और कौशल । 

15. समकालीन भारत की दो प्रक्रियाओं के बारे में बताइए । 

Ans. समकालीन भारत में कुछ चीजें या प्रक्रियाएँ ऐसी हैं जो पहले बाजार का हिस्सा नहीं थीं, परन्तु अब वह बाजार में मिलने वाली वस्तुएँ हो गई हैं । 

जैसे- (i) विवाह जो पहले परिवारों द्वारा तय किए जाते थे, अब मैरिज ब्यूरो के द्वारा या वेबसाइट के जरिए होते हैं।

(ii) अनेक निजी संस्थान विद्यार्थियों को समकालीन विश्व में सफल होने के लिए आवश्यक सांस्कृतिक और सामाजिक कौशल है। 

16. आधुनिक समाजों में उपभोग की क्या प्रासंगिकता है ?

Ans. आधुनिक समाज में उपभोग एक महत्त्वपूर्ण तरीका है जिसके द्वारा सामाजिक भिन्नता का निर्माण होता है। उपभोक्ता अपनी सामाजिक, आर्थिक स्थिति या सांस्कृतिक प्राथमिकताओं को कुछ विशेष वस्तुओं को खरीदकर या उनका प्रदर्शन कर प्रदर्शित करता है और कम्पनियाँ समान प्रस्थिति या संस्कृति के प्रतीकों के आधार पर बनाती व बेचती हैं।

17. मैक्स वेबर के विचार को स्पष्ट कीजिए ।

Ans. मैक्स वेबर के अनुसार लोग जो सामान खरीदते हैं एवं उनका उपयोग करते हैं वह समाज में उनकी प्रस्थिति से गहनता से जुड़ा होता है, उन्होंने इसे ‘प्रतिष्ठा का प्रतीक’ का नाम दिया।

18. भूमण्डलीकरण के विभिन्न पहलू कौन-कौन से हैं?. 

Ans. भूमण्डलीकरण के विभिन्न पहलू हैं, जैसे-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर वस्तुओं, पूँजी, समाचार और लोगों को संचलन एवं साथ ही प्रौद्योगिकी और अन्य आधारभूत सुविधाओं का विकास, जो इस संचालन को गति प्रदान करते हैं।

19. एकीकरण का अर्थ स्पष्ट कीजिए।

Ans. एकीकरण का अर्थ है कि दुनिया के किसी एक कोने में किसी बाजार में परिवर्तन होता है तो दूसरे कोने में उसका अनुकूल-प्रतिकूल असर हो सकता हो, जैसे—अमेरिकी बाजार में गिरावट आने से भारतीय सॉफ्टवेयर उद्योग में भी गिरावट आएगी।

20. भूमंडलीकरण के अन्तर्गत किन-किन का परिचालन होता है ? 

Ans. भूमण्डलीकरण के अन्तर्गत पूँजी एवं वस्तुओं का ही नहीं, सांस्कृतिक उत्पादों का भी विश्व भर में प्रचालन होता है। यह विनियम यानि आदान-प्रदान के नए दायरों से प्रवेश करती है और नए बाजारों का निर्माण करती है। उत्पाद, सेवाएँ और सांस्कृतिक तत्व भी इसके हिस्से हैं। 

21. नासाक क्या है व यह कहाँ स्थित है ?

Ans. नासडाक एक प्रमुख इलेक्ट्रानिक विनिमय केन्द्र का नाम है जो न्यूयार्क में स्थित है। इसका संचालन कम्प्यूटर पर आधारित इलेक्ट्रॉनिक संचार के माध्यमों से होता है।

22. पुष्कर मेले के बारे में बताइए । 

Ans. पुष्कर एक वार्षिक मेला है जो राजस्थान में लगता है। इस मेले में स्थानीय लोग अथवा दूर-दराज के लोग पशुओं, जैसे-ऊँटों व अन्य पशुओं को बेचने और खरीदने आते हैं। यह मेला पर्यटकों के लिए काफी आकर्षण का कारण है, क्योंकि यह कार्तिक पूर्णिमा के ठीक पहले आता है जब हिन्दू तीर्थयात्री पवित्र पुष्कर तालाब में नहाते हैं। 

23. उदारवादिता की विभिन्न नीतियों के नाम बताइए।

Ans. उदारवादिता में कई तरह की नीतियाँ शामिल हैं, जैसे- 

(i) सरकारी विभागों का निजीकरण,

(ii) पूँजी,

(iii) श्रम और व्यापार में सरकारी दखल कम देना,

(iv) विदेशी वस्तुओं के आघात के लिए आयात शुल्क में कमी करना, 

(v) विदेशी कम्पनियों को भारत में उद्योग स्थापित करने में सहूलियत देना ।


लघु उत्तरीय प्रश्न (SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS)


1. ‘बाजार’ शब्द से आप क्या समझते हैं ? एडम स्मिथ के बाजारी अर्थव्यवस्था के तर्क के बारे में बताइए । 

Ans. बाजार इसका संबंध क्षेत्र, व्यापार या कारोबार की श्रेणी से होता है। जैसे कारों का बाजार या फिर बने बनाए कपड़ों का बाजार, कम्प्यूटर विशेषज्ञों का बाजार बाजार शब्द का अर्थ विशेष बाजार से भी हो सकता है जिन्हें हम जानते हो। 

यह विभिन्न प्रकार की आर्थिक क्रियाओं व संस्थाओं को भी इंगित करता है। बाजार को एक आर्थिक संस्था के रूप में ही देखा जाता है, परन्तु सही शब्दों में बाजार एक सामाजिक संस्था भी है। बाजार की तुलना जाति, जनजाति या परिवार जैसे स्पष्ट एवं प्रत्यक्ष सामाजिक संस्थाओं से की जा सकती है।

एडम स्मिथ प्रारंभिक दौर के राजनीतिक अर्थशास्त्रियों में सबसे चर्चित थे जिन्होंने अपनी किताब ‘द वेल्थ ऑफ नेशन्स’ में बाजार अर्थव्यवस्था को समझाने का प्रयास किया। मिचका तर्क था कि बाजारी अर्थव्यवस्था व्यक्तियों में आदान-प्रदान या सौदों का एक लंबा क्रम है, जो अपनी क्रमबद्धता की वजह से स्वयं एक कार्यशील और स्थिर व्यवस्था की स्थापना करती है। यह तब भी होता है जब करोड़ों के लेन-देन में शामिल व्यक्तियों में से कोई भी व्यक्ति इसकी स्थापना का इरादा नहीं रखता। 

जब प्रत्येक व्यक्ति अपने ही लाभ की वृद्धि के बारे में सोचता है और इसके लिए वह जो भी प्रयास करता है, वह समाज के या सभी के हितों में होता है। उन्होंने तर्क दिया कि पूँजीवादी अर्थव्यवस्था स्वयं लाभ से स्वचालित है और जब विक्रेता व खरीददार तर्कसंगत निर्णय लेते हैं तब यह सुचारु रूप से कार्य करती है जो इसके हित में होता है। 

आधुनिक अर्थशास्त्र का विकास एडम लिए जैसे प्रारम्भिक विचारकों के विचारों से हुआ और यह इस विचार पर आधारित है कि अर्थव्यवस्था को समाज के एक पृथक हिस्से के रूप में समझा जा सकता है।

 2. बाजार सामाजिक संस्थाएँ क्या हैं ?

Ans. समाजशास्त्रियों ने बड़े सामाजिक ढाँचे के अन्दर आर्थिक संस्थाओं और प्रक्रियाओं को समझने के लिए एक वैकल्पिक तरीकों का विकास करने का प्रयास किया है। समाजशास्त्री मानते हैं कि बाजार सामाजिक संस्थाएँ है जो किसी विशेष प्रकार के तरीकों द्वारा निर्मित होती है। 

उदाहरणतया, बाजारों का नियन्त्रण व संगठन अक्सर विशेष सामाजिक समूहों या वर्गों के द्वारा होता है। बाजारों के निर्माण व देख-रेख में विशेष सामाजिक समूह वह वर्ग दखल अंदाजी करते हैं और इसे सुचारु रूप से चलाते हैं। बाजारों की अन्य संस्थाओं, सामाजिक प्रतिमाओं और संरचनाओं से भी विशेष संबद्धता होती है। 

समाजशास्त्री अक्सर इसी विचार को प्रकट करते हैं कि अर्थव्यवस्थाएँ समाज में रची-बसी हैं। उदाहरणतया, ‘साप्ताहिक आदिवासी हाट’ और “पारंपरिक व्यापारिक समुदाय और भारत के औपनिवेशिक दौर में उसका लेन-देन का नेटवर्क या तंत्र। कृषक या खेतिहर समाजों में आवधिक बाजार या हाट, सामाजिक और आर्थिक संगठन व्यवस्था की एक केंद्रीय विशेषता होती है।

3. छत्तीसगढ़ के जिला बस्तर में धोराई गाँव के साप्ताहिक आदिवासी बाजार का उल्लेख कीजिए ।

Ans साप्ताहिक बाजार- साप्ताहिक बाजार गाँवों के लोगों को इकट्ठा करता है जहाँ लोग अपनी खेती की उपज या किसी और उत्पाद को बेचने आते हैं और अपनी जरूरत की वस्तुएँ, जैसे-बनी-बनाई वस्तुएँ एवं अन्य सामान खरीदने आते हैं जो उनके गाँवों में नहीं मिलती। 

दुनियाभर के अधिकांश कृषक या खेतिहर समाज में आवधिक बाजार या हाट, सामाजिक और आर्थिक संगठन व्यवस्था की एक केंद्रीय विशेषता होते हैं। इन साप्ताहिक बाजारों में स्थानीय क्षेत्र से बाहर के लोगों के साथ-साथ साहूकार ज्योतिषी एवं विशेषज्ञ अपनी सेवाएँ एवं वस्तुओं के साथ आते हैं।

बस्तर जिले में बसा बाजार एक चतुर्भुजीय जमीनी हिस्सा है जो लगभग 100 एकड़ के क्षेत्र में बसा हुआ है। इसके बीचोबीच एक भव्य बरगद का पेड़ है। 

बाजार की छोटी-छोटी दुकानें पास-पास बनी हुई हैं, जिनकी छते छप्पर की बनी हुई हैं। आदिवासी लोग इन बाजारों में जंगल के सामान, अपनी खेती की उपज या फिर हाथ का बना हुआ सामान लेकर आते हैं। 

इनमें तरकारी बेचने वाले हिंदू एवं शिल्पकार, कुम्हार, जुलाने एवं लोहार सम्मिलित होते हैं। वन व्यापारी भी इन आदिवासियों के साथ व्यापार करने आते हैं जो अपने उत्पाद और सेवाएँ बेचने आते हैं। 

गहने पायल बर्तन, हाथ बर्तन, हाथ की बनी हुई वस्तुएँ, जैसे—-टोकरियाँ, नमक, हल्दी, इमली एवं तिलहन इत्यादि वस्तुओं का इन बाजारों में आदान-प्रदान होता है। जंगल के उत्पाद को व्यापारी आदिवासियों से लेकर शहरों में ले जाते हैं। इन बाजारों के खरीददार मुख्यतः यही आदिवासी ही होते हैं और विक्रेता हिन्दू प्रधान आदिवासी अपनी वस्तुओं को बेचकर जो धन कमाते हैं, उसे गहनों, बने बनाए कपड़ों की खरीददारी के लिए प्रयोग में लाते हैं। 

4. जनजातीय अर्थव्यवस्था के स्वरूप में क्या-क्या परिवर्तन आए ?

Ans. जनजातीय अर्थव्यवस्था के स्वरूप में अनेक परिवर्तन आए हैं जो इस प्रकार हैं-

(i) दूरस्थ क्षेत्रों को धीरे-धीरे क्षेत्रीय एवं राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था से जोड़ दिया गया। यह सब कार्य औपनिवेशिक राज्यों के नियंत्रण में आने के बाद हुआ । 

(ii) जनजातीय क्षेत्रों को सड़कों के निर्माण द्वारा स्थानीय लोगों के लिए खोला गया। 

(iii) सड़कों के माध्यम से इन इलाकों के समृद्ध जंगलों और खनिजों तक पहुँचा गया। इससे इन क्षेत्रों में व्यापारी, साहूकार और आस-पास के गैर जनजातीय लोगों की भी भीड़ उमड़ आई। 

(iv) जंगल के उत्पादों को बाहरी लोगों को बेचा गया जिससे नई तरह की वस्तुएँ व्यवस्था में शामिल हो गई।

(v) आदिवासियों को खादानों और बागानों में मजदूर के तौर पर रखा जाने लगा जो अंग्रेजी सरकार के दौर में स्थापित हुए।

इस प्रकार इन बदलावों से त्थानीय जनजातीय अर्थव्यवस्थाएँ बड़े बाजारों से जुड़ गई। इस प्रकार जनजातीय अर्थव्यवस्था में बदलाव आया। 

5. एलफ्रेड गेल के तर्क को समझाइए ।

Ans. एलफेड गेल के अनुसार बाजार का महत्त्व सिर्फ इसकी आर्थिक क्रियाओं तक सीमित न होकर सामाजिक संस्था के रूप में भी है। बाजार की रूपरेखा उस क्षेत्र के अधिक्रमित अंतर-समूहों के सामाजिक संबंधों का प्रतीकात्मक चित्रण करती है। विभिन्न सामाजिक समूह, जाति एवं सामाजिक अधिक्रम में एवं साथ ही बाजार व्यवस्था में अपनी स्थिति के अनुसार स्थापित होते हैं। 

उच्च श्रेणी वाले राजपूत आभूषण निर्माता और मध्य श्रेणी के स्थानीय हिन्दू व्यापारी बाजार के बीच वाले क्षेत्रों में बैठते हैं और वे आदिवासी जो तरकारी एवं स्थानीय सामान बेचते हैं, बाजार के बाहरी हिस्सों में बैठते हैं। सामाजिक संबंधों का पता खरीदी एवं बेची जा सकने वाली वस्तुओं व उनके मोल-भाव से चलता है। उदाहरण के लिए, जनजातीय और गैर जनजातीय लोगों के बीच की अंतःक्रिया, एक समुदाय के हिन्दुओं के बीच की अंतःक्रिया से भिन्न होती है। यह अंतःक्रिया अधिक्रम और सामाजिक दुराव को दर्शाती है न कि सामाजिक भिन्नता को । 

6. उपनिवेशवाद से आपका क्या तात्पर्य है ? उपनिवेशवाद से पहले भारत की आर्थिक व्यवस्था को समझाइए ।

Ans. उपनिवेशवाद-एक ऐसी विचारधारा जिसके द्वारा एक देश दूसरे देश को जीतने और अपना उपनिवेश बनाने का प्रयत्न करता है। ऐसा उपनिवेश, उपनिवेशकर्ता देश का एक अधीनस्थ हिस्सा बन जाता है और फिर उपनिवेशकर्ता देश के लाभ के लिए उस उपनिवेश का तरह-तरह से शोषण करता है। 

उपनिवेशवाद साम्राज्यवाद से संबंधित है, परन्तु उपनिवेशवाद के अन्तर्गत उपनिवेशकर्ता देश उपनिवेश में बसने और उस पर अपना शासन बनाए रखने में अधिक रुचि लेता है, जबकि साम्राज्यवादी देश उपनिवेश को लूटकर उसे छोड़ देता है। यह दूर से ही उस पर शासन करता रहता है।

भारत प्राचीन ग्रामीण समुदायों का देश है जो अपेक्षाकृत स्वयं पर ही निर्भर थे। भारत की आर्थिक व्यवस्थाएँ प्राथमिक तौर पर गैर-बाजारी विनिमय के आधार पर संगठित थी। 

औपनिवेशिकता ने भारत की अर्थव्यवस्था में बड़े आर्थिक रूपांतरण किए, परन्तु ऐतिहासिक शोष के अनुसार भारतीय अर्थव्यवस्था का मुद्रीकरण औपनिवेशिकता से पहले ही विद्यमान था। बहुत से गाँवों और इलाकों में विभिन्न प्रकार की गैर-बाजारी विनिमय व्यवस्था थी। 

गाँव विनिमय के बड़े तंत्र का हिस्सा थे जिससे कृषि उत्पाद और अन्य वस्तुओं का व्यापारिक प्रचलन होता था। उपनिवेश के पहले भारत में विस्तृत और परिष्कृत व्यापारिक तंत्र विद्यमान थे। भारत हस्तकरथा के कपड़ों का मुख्य निर्माता वस्तुओं जिनकी वैश्विक बाजार में माँग थी, का स्रोत था। 

भारत सूती कपड़े और महँगे रेशम का निर्यातक भी था। उपनिवेश के पहले के दिनों में भारत में उन्नत अवस्था के उत्पादन केन्द्रों के साथ-साथ देशज व्यापारियों का संगठित समाज, व्यापारिक तंत्र और बैकिंग व्यवस्था भी शामिल थी। पारंपरिक समुदाय या जातियों की अपनी कर्ज और बैंक की व्यवस्थाएँ थीं।

इस प्रकार उपनिवेशवाद के बाद भारत के कुछ क्षेत्रों में परिवर्तन तो आए, परन्तु उपनिवेश काल से पहले भी भारत एक समृद्ध राज्य था। भारतीय अर्थव्यवस्था का मुद्रीकरण औपनिवेशिकता के ठीक पहले से विद्यमान था ।

7. भारत में वैश्य के अर्थ को समझाइए । 

Ans. वैश्य चार वर्गों में से एक है। यह तथ्य भारतीय समाज में प्राचीनकाल से व्यापार और व्यापार करने वाले व्यापारी के महत्त्व को दर्शाता है। ‘वैश्य’ स्थिति अक्सर स्थिर पहचान या सामाजिक स्थिति की तुलना में अधिकार या आकांक्षा से प्राप्त की हुई होती है। 

कुछ ऐसे वैश्य समुदाय भी है जिनका पारंपरिक व्यवसाय एक लंबे समय से व्यापार रहा है। कुछ अन्य जाति समूह भी हैं जो व्यापार में शामिल हो गए हैं। ऐसे समूह व्यापार के क्षेत्र में ऊपर उठने के लिए ‘वैश्य’ की प्रतिस्थिति की आकांक्षा रखते हैं या इस पर अधिकार जताते हैं। 

भारत में पारंपरिक व्यापारिक समुदायों में सिर्फ ‘वैश्य’ ही नहीं बल्कि और भी समूह अपनी भिन्न धार्मिक या अन्य सामुदायिक पहचानों के साथ शामिल हैं। इन समूहों व समुदायों में जैन, पारसी, सिंधी इत्यादि शामिल हैं। 

8. भारतीय अर्थव्यवस्था पर उपनिवेशवाद के प्रभाव बताइए। तमिलनाडु के नाटकोटाई चेट्टीयारों के समुदाय जो उपनिवेशवाद से प्रभावित हैं, का उल्लेख कीजिए। 

Ans. उपनिवेशवाद से भारत के व्यापार, उत्पादन और कृषि में गहरे विघटन हुए उपनिवेशवाद द्वारा प्रदान किए गए आर्थिक सुअवसरों का लाभ उठाने के लिए समुदायों का जन्म हुआ जिन्होंने स्वतन्त्रता के बाद भी अपनी आर्थिक शक्ति को निरंतरता से बनाए रखा। 

इतिहासकार उपनिवेश काल को एक संधिकाल के रूप में देखते हैं। इस काल के दौरान भारत विश्व की पूँजीवादी अर्थव्यवस्था से और अधिकता से जुड़ गया। अंग्रेजी राज से पूर्व भारत से केवल निर्मित वस्तुओं का ही व्यापार होता था। परन्तु उपनिवेशवाद के बाद भारत कच्चे माल और कृषक उत्पादों का स्रोत बन गया। 

भारत से अब निर्मित सामान के अलावा कृषि उत्पाद व उद्योग के लिए कच्चा माल भी निर्यात किये जाने लगे। नए-नए व्यापारों और व्यवसायों को विभिन्न समूहों ने अपनाया। भारत में बाजार अर्थव्यवस्था के विस्तार ने कुछ व्यापारिक समुदाय को नए अवसर प्रदान किए, जिन्होंने बदलती हुई आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को

पुनर्गठित किया। तमिलनाडु के मोटाई पेड़ीयारों के समुदाय देशज व्यापारिक तंत्र से संगठित थे। उपनिवेशवाद के दौरान इस समुदाय पर किया गया अध्ययन दर्शाता है कि किस प्रकार से इन समुदायों की बैंकिंग और व्यापारिक गतिविधियाँ समुदाय के सामाजिक संगठनों से जुड़ी हुई थीं।

जाति नातेदारी व परिवार की संरचना के अनुकूल थी और व्यापार भी इन्हीं सामाजिक संरचनाओं के भीतर होता था। इनके बैंक भी उनके संयुक्त पारिवारिक संस्थान थे ताकि व्यापारिक संस्थान की संरचना परिवार के समान रहे। 

व्यापारिक और बैंकिंग गतिविधियों भी जाति और नातेदारी संबंधों के माध्यम से संगठित थीं। एक दृष्टिकोण से नाकरद्वारों की देशज आर्थिक गतिविधियों को एक प्रकार का पूँजीवाद कह सकते हैं।

9. पूँजीवाद को एक सामाजिक व्यवस्था के रूप में समझाइए । 

Ans. पूँजीवाद को मायर्स के आधार पर समझा जा सकता है। कार्ल मार्क्स ने पण्य को उत्पादन या बाजार के लिए उत्पादन करने की व्यवस्था के रूप में समझा जो कि श्रमिक की जबूरी पर आधारित है। मार्क्स ने लिखा है कि सभी आर्थिक व्यवस्थाएँ सामाजिक व्यवस्थाएँ भी है। हर उत्पादन विधि विशेष उत्पादन संबंधों से बनती है और वह एक विशिष्ट वर्ग-संरचना का निर्माण करती है। 

मार्क्स ने इस बात पर जोर दिया कि अर्थव्यवस्था लोगों के रिश्तों से बनती है न कि चीजों से। ये रिश्ते उत्पादन की प्रक्रिया द्वारा एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं। पूँजीवादी उत्पादन विधि के अन्तर्गत, मजदूरी व श्रम भी एक बिकाऊ वस्तु बन जाती है। इसका कारण है कि मजदूरों को अपनी श्रम शक्ति बेचकर ही अपनी मजदूरी अर्थात् धन कमाना होता है। इस प्रकार दो आधारभूत वर्गों का गठन होता है-

(i) पूँजीपति वर्ग जो उत्पादन के साधनों के मालिक होते हैं, 

(ii) श्रमिक वर्ग जो अपना श्रम पूँजीपतियों को बेचते हैं।

11. संस्कृति बाजार का हिस्सा कैसे बन जाती है ? उदाहरण सहित बताइए ।

Ans. अन्तर्राष्ट्रीय पर्यटन के बढ़ते बाजार से, संस्कृति बाजार का एक हिस्सा बन जाती । इसका उदाहरण है राजस्थान में लगने वाला प्रसिद्ध वार्षिक मेला, जिसे ‘पुष्कर’ के नाम से जाना जाता है। 

इस मेले में दूर-दराज से व्यापारी और पशुचारी ऊँटों व अन्य पशुओं को बेचने एवं खरीदने आते हैं। यह मेला अब अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भी एक बड़े पर्यटन स्थल के नाम से जाना जाता है। यह स्थानीय लोगों के लिए एक भव्य सामाजिक और आर्थिक उपलक्ष्य है। 

यह कार्तिक पूर्णिमा के ठीक पहले आता है जिससे यह मेला पर्यटकों के लिए और भी अधिक आकर्षण का कारण बन जाता है। कार्तिक पूर्णिमा वाले दिन हिंदू लोग व तीर्थयात्री पवित्र पुष्कर तालाब में स्नान करते हैं। इस तरह हिंदू तीर्थ यात्रियों, ऊँटों, व्यापारियों और विदेशी पर्यटकों का सम्मेलन बन जाता है जिसमें सिर्फ पशुओं का विनिमय ही नहीं बल्कि धार्मिक पुण्यों और सांस्कृतिक प्रतीकों की भी अदला-बदली होती है।

12. उदारवादिता की विभिन्न नीतियों के बारे में बताइए व इसका उल्लेख कीजिए । 

Ans. उदारवादिता की कई नीतियाँ हैं, जैसे-श्रम और व्यापार में सरकारी दखल कम देना, सरकारी विभागों का निजीकरण, पूँजी, विदेशी वस्तुओं के आसान आयात के लिए आयात शुल्क में कमी करना और विदेशी कंपनियों को भारत में उद्योग स्थापित करने में सहायता देना।

उदारवाद के कार्यक्रमों के तहत जो परिवर्तन हुए, उन्होंने आर्थिक संवृद्धि को बढ़ाया। इन कार्यक्रमों के तहत भारतीय बाजार विदेशी कम्पनियों के लिए भी खुला। अब भारत में ऐसी बहुत-सी वस्तुएँ मिलती हैं। जो पहले यहाँ नहीं थीं। 

उदारीकरण का असर मिश्रित रहा है। कई लोगों के अनुसार उदारीकरण का कुछ क्षेत्रों पर प्रतिकूल ही प्रभाव रहा है और भविष्य में भी। ऐसा ही रहेगा। लोगों के अनुसार हम अपनी ज्यादा वस्तुएँ खोकर कम वस्तुएँ पाएँगे । सॉफ्टवेयर या सूचना तकनीकी, मछली पालन, फल उत्पादन जैसे कुछ उद्योग को उदारीकरण से फायदा हो सकता है, 

परन्तु ऑटोमोबाइल्स, इलेक्ट्रॉनिक्स और तेलीय अनाजों के उद्योग पर गहरा असर पड़ेगा, क्योंकि ये उद्योग विदेशी उत्पादकों से प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाएँगे। उदाहरणतया, भारतीय किसान भारत की कृषि के उत्पादों का आयात करने के लिए व अन्य देशों के किसानों के उत्पादों से प्रतिस्पर्धा करने के लिए उत्पादन कर रहे हैं। 


दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (LONG ANSWER TYPE QUESTIONS)


1. ‘बाजार’ शब्द को परिभाषित कीजिए व बाजार की सामाजिक संस्थाओं का उल्लेख कीजिए । एडम स्मिथ के बाजारी अर्थव्यवस्था में योगदान के बारे में बताइए

Ans. ‘बाजार’ का संबंध व्यापार, कारोबार क्षेत्रों की श्रेणी से होता है। इस शब्द का अर्थ विशेष बाजार से भी हो सकता है। उदाहरण के लिए, कारों का बाजार, नए कपड़ों का बाजार और कम्प्यूटर विशेषज्ञों का बाजार। 

बाजार को वैसे तो एक आर्थिक संस्था के रूप में देखा जाता है, परन्तु बाजार एक सामाजिक संस्था भी है। यह विभिन्न प्रकार की आर्थिक क्रियाओं व संस्थाओं भी इंगित करता है। 

बाजार की तुलना जाति, जनजाति या परिवार जैसी सामाजिक संस्थाओं से भी की जा सकती है। समाजशास्त्रियों के अनुसार बाजार सामाजिक संस्थाएँ हैं जो किसी विशेष प्रकार के तरीकों द्वारा निर्मित होती है। 

समाजशास्त्रियों ने बड़े सामाजिक ढाँचे के अन्तर्गत आर्थिक संस्थाओं और प्रक्रियाओं को समझाने के लिए वैकल्पिक तरीकों का विकास करने का प्रयास किया है। उदाहरणतया, बाजारों का नियन्त्रण व संगठन व रख-रखाव सामाजिक समूहों या वर्गों के द्वारा होता है। बाजारों के निर्माण व देखरेख में विशेष सामाजिक समूह व वर्ग दखलअंदाजी करते हैं और बाजारों को सुधारु रूप से चलाते हैं। 

बाजारों की अन्य संस्थाओं, सामाजिक प्रक्रियाओं व संरचनाओं से भी संबद्धता होती है। समाजशास्त्रियों के मतानुसार अर्थव्यवस्थाएँ समाज में रची-बसी हैं। उदाहरण के तौर पर, ‘साप्ताहिक आदिवासी हाट और पारम्परिक व्यापारिक समुदाय और भारत के औपनिवेशिक दौर में उसका लेन-देन का नेटवर्क या तंत्र।

एडम स्मिथ आरंभिक दौर के राजनीतिक अर्थशास्त्रियों में सर्वाधिक चर्चित थे। उन्होंने अपनी किताब ‘द वेल्थ ऑफ नेशन्स’ में बाजार अर्थव्यवस्था को समझाने का प्रयास किया। स्मिथ का तर्क था कि बाजारी अर्थव्यवस्था व्यक्तियों के मध्य आदान-प्रदान का एक लंबा क्रम है, जो अपनी क्रमबद्धता के कारण स्वयं ही एक कार्यशील और स्थिर व्यवस्था की स्थापना करती है। यह तब भी होता है जब करोड़ों के लेन-देन में शामिल व्यक्तियों से कोई भी व्यक्ति इसकी स्थापना का इरादा नहीं रखता। 

प्रत्येक व्यक्ति अपने लाभ के बारे में सोचता है और प्रक्रिया के साथ वह जो भी कार्य करता है, वह स्वतः ही समाज के या समाज के समुदायों के हितों में होता है । इस प्रकार कोई एक अदृश्य बल यहाँ कार्य करता है जो इस व्यक्तियों के लाभ की प्रवृत्ति को समाज के लाभ में बदल देता है। इस बल को स्मिच द्वारा अदृश्य बल का नाम दिया गया। 

अतः इससे उन्होंने यह तर्क दिया कि पूँजीवादी अर्थव्यवस्था स्वयं लाभ से स्वचालित है। यह तब सबसे अच्छे से कार्य है जब हर व्यक्ति यानी विक्रेता व खरीददार तर्कसंगत निर्णय लेते हैं और निर्णय उनके हित में होते हैं। 

स्मिथ ने ‘अदृश्य हाथ’ को इस तर्क के रूप में प्रयोग किया कि जब बाजार में व्यक्ति स्वयं ही अपने लाभानुसार कार्य करता है तो समाज को हर प्रकार से लाभ प्राप्त होता है। स्मिथ ने खुले व्यापार का समर्थन किया, अर्थात् एक ऐसा बाजार जो किसी भी प्रकार की राष्ट्रीय या अन्य रोकथाम से मुक्त हो।

अतः आधुनिक अर्थशास्त्र का विकास एडम जैसे विचारकों के कारण ही हुआ है। जिनका विचार इस तथ्य पर आधारित है कि अर्थव्यवस्था को समाज के पृथक हिस्से के रूप में भी पढ़ा जा सकता है जिसमें बजार कार्य करते हैं और अपने स्वयं के नियमों के अनुसार कार्य करते हैं। 

2. साप्ताहिक बाजार को वर्णित कीजिए। साप्ताहिक बाजारों का विकास मुख्यतः कहाँ होता है व इन क्षेत्रों में उदारवाद से क्या-क्या परिवर्तन आए ?

Ans. साप्ताहिक बाजार गाँवों से मुख्यतः सम्बन्ध रखते हैं। इन बाजारों के लोग गाँवों के लोगों को इकट्ठा करते हैं। ये लोग मुख्यतः अपनी खेती की उपज व किसी अन्य उत्पाद को बेचने आते हैं और बनी-बनाई वस्तुएं व अपनी जरूरत के सामान खरीदते हैं जो उन्हें गाँवों में नहीं मिलते। 

इन साप्ताहिक बाजारों में बाहर के लोग व साहूकार, ज्योतिथी व अन्य व्यक्ति जैसे विशेषज्ञ अपनी सेवाओं व वस्तुओं के साथ आते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में भी साप्ताहिक या वार्षिक अर्थात् कम अन्तराल पर भी बाजार लगते हैं। इन क्षीण अन्तरालों के बाजारों का स्वतः उदाहरण ‘पशु बाजार’ है। 

ये आवधिक बाजार या हाट कहलाते हैं जो अधिकांश कृषक या खेतिहर समाजों में सामाजिक और आर्थिक संगठन की एक केंद्रीय विशेषता होते हैं। साप्ताहिक बाजार उन क्षेत्रों में प्रमुख संस्थाएँ होते हैं जहाँ सड़कों व संचार क्षीण होता है एवं अर्थव्यवस्था भी अविकसित होती है। 

पहाड़ी और जंगली इलाकों में जहाँ आदिवासी दूर-दराज तक फैले होते हैं, वहाँ साप्ताहिक बाजार पाए जाते हैं। यहाँ साप्ताहिक बाजार आदान-प्रदान के साथ-साथ मेल-मिलाप की एक प्रमुख संस्था बन जाते हैं। 

स्थानीय लोग अपनी खेती की उपज को इन

बाजारों में बेचते हैं। जहाँ से व्यापारी इन वस्तुओं को शहरों व कस्बों में जाकर बेच देते हैं जो अपनी जरूरत की वस्तुएँ खरीद लेते हैं। जनजातीय क्षेत्रों में उदारवाद से परिवर्तन-जनजातीय क्षेत्रों के औपनिवेशिक राज्यों के नियन्त्रण में आने के बाद काफी परिवर्तन आए हैं जो इस प्रकार हैं-

(i) जंगल में निर्मित किसानों द्वारा उत्पादों को शहरों या कस्बों में ले जाकर बेचा जाने लगा जिससे किसानों को अपनी आवश्यकता की वस्तुएँ खरीदने में धन की कमी नहीं खली व व्यवस्था में भी नई-नई वस्तुएँ शामिल हो गई।

(ii) दूरस्थ जनजातीय व पिछड़े समुदायों को क्षेत्रीय व राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था से जोड़ दिया गया इससे जनजातीय इलाके शहरों व कस्बों के सम्पर्क में आए और उन्होंने इनसे एक व्यापारिक क्षेत्र कायम कर लिया।

(iii) जनजातीय क्षेत्रों को सड़कों के निर्माण स्थानीय लोगों के लिए खोल दिया गया जिससे। स्थानीय लोगों की अर्थव्यवस्था का असर जनजातीय क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ा। 

(iv) सड़कों के माध्यम से ही इन इलाकों के समृद्ध जंगलों और खनिजों तक पहुँचा गया। इससे इन क्षेत्रों में व्यापारी, साहूकार और आस-पास के गैर-जनजातीय लोग अधिकता में आने

लगे। 

(v) आदिवासियों को खादानों और बागानों में मजदूर के तीर पर रखा जाने लगा जिससे इनकी आय में इजाफा हुआ। अतः औपनिवेशिक दौर के दौरान जनजातीय श्रम के एक बाजार का विकास हुआ। इनसे स्थानीय जनजातीय अर्थव्यवस्थाएँ बड़े बाजारों से जुड़ गई। 

3. एल्फ्रेड गेल के अनुसार बाजार का महत्त्व किस-किससे संबंधित है ? वर्णन करें। बस्तर जिले के आदिवासी गाँव के बाजार के बारे में बताइए ।

Ans. एल्फ्रेड गेल के अनुसार बाजार का महत्त्व केवल क्रियाओं तक ही सीमित नहीं है। विभिन्न सामाजिक समूह, जाति एवं सामाजिक अधिक्रम में एवं साथ ही बाजार व्यवस्था में अपनी स्थिति के अनुसार स्थापित होते हैं। बाजार की रूपरेखा उस क्षेत्र के अधिक्रमित अंतर-समूहों के सामाजिक संबंधों को प्रतीकात्मक चित्रण करती है। 

अमीर और उच्च श्रेणी के राजपूत आभूषण निर्माता श्रेणी के सामान्य हिंदू व्यापारी बाजार के बीच के क्षेत्रों में बैठते हैं और आदिवासी जो तरकारी और स्थानीय सामान बेचते हैं, बाजार के बाहरी हिस्सों में ही रहते हैं। खरीदी व बेची जा सकने वाली वस्तुओं के प्रकार से एवं मोल-भाव के तरीके से सामाजिक संबंधों का पता चलता है। 

गैर जनजातीय और जनजातीय के मध्य अंतःक्रिया एक समुदाय के हिंदुओं के बीच की अंतः क्रिया से बिल्कुल भिन्न होती है।

छत्तीसगढ़ के उत्तर बस्तर जिले के भीतरी इलाकों में बसा धोराई एक आदिवासी बाजार का नाम है। धोराई का जीवन यहाँ की दो प्राचीन चाय की दुकानों तक ही सीमित है। बाजार लगने के समय आदिवासी लोग जंगल का सामान हस्तकरघा सामान या फिर अपनी खेती की उपज लेकर आते हैं। 

इनमें तरकारी बेचने वाले हिंदू एवं विशेषज्ञ शिल्पकार, कुम्हार, जुलाहे सम्मिलित होते हैं। यहाँ का बाजार एक चतुर्भुजीय हिस्से के आकार का है जो लगभग 100 एकड़ के क्षेत्र में फैला हुआ है, जिसके बीचों-बीच एक भव्य बरगद का पेड़ भी है। बाजार की छोटी-छोटी दुकानों की छत छप्पर की बनी हुई है और यह दुकानें काफी पास-पास भी हैं। 

इन साप्ताहिक बाजारों में मुख्यतः जनजातीय लोग, स्थानीय लोग, गैर जनजातियों के साथ-साथ बाहरी लोग जिनमें हिंदू व्यापारी होते हैं, शामिल होते हैं। वन अधिकारी भी बाजार में आदिवासियों के साथ व्यापार करने आते हैं जो वन-विभाग के लिए कार्य करते हैं। मुख्य चीजें जिनका विनिमय होता है, वे हैं। 

गहने, पायलें, बर्तन, चाकू, नमक, हल्दी आदि। इसके अतिरिक्त, स्थानीय खाद्य सामग्री, बनी बनाई वस्तुएँ जैसे बाँस की टोकरी, इमली, तिलहन तथा जंगल के उत्पादन भी शामिल होते हैं। इन बाजारों में खरीददार मुख्यतः आदिवासी ही होते हैं और व्यापारी जाति प्रधान

हिंदू । आदिवासियों के उत्पादों गरे से जाकर व्यापारी कस्बों में बेच देते हैं। 

आदिवासियों को इससे धन मिलता है जिसका प्रयोग ये सस्ती पायलों एवं गहने बने-बनाए कपड़े खरीदने में करते है। 

4. उपनिवेशवाद को परिभाषित कीजिए। क्या आप इस बात से सहमत है कि उपनिवेशवाद से पहले भी भारत क पारिक क्षेत्र में अग्रणी था ? अपने तर्क के पक्ष में उत्तर दीजिए। ऐसे समुदाय का वर्णन कीजिए जिस पर उपनिवेशवाद के दौरान अनुकूल प्रभाव पड़ा। 

Ans. उपनिवेशवाद यह एक ऐसी विचारधारा है जिसके द्वारा एक देश दूसरे देश को जीतने और अपना उपनिवेश बनाने का प्रयत्न करता है। ऐसा उपनिवेश, उपनिवेशकर्ता देश का एक हिस्सा बन जाता है और फिर उपनिवेशकर्ता देश के लाभ के लिए उस उपनिवेश का तरह-तरह से शोषण किया जाता है। 

उपनिवेशवाद साम्राज्यवाद से सम्बन्धित है, परन्तु उपनिवेशवाद के अन्तर्गत उपनिवेशकर्ता देश उपनिवेश में बसने और उस पर अपना शासन बनाएँ रखने में अधिक रुचि लेता है, जबकि साम्राज्यवादी देश उपनिवेश को लूटकर उसे छोड़ देता है। यह दूर से ही उस पर शासन करता रहता है।

भारत प्राचीन ग्रामीण समुदायों का देश है और ये समुदाय स्वयं पर ही निर्भर थे। भारत में आर्थिक रूपांतरण उपनिवेशवाद के साथ ही प्रारम्भ हुआ। भारतीय समुदायों की अर्थव्यवस्थाएँ प्राथमिक तौर पर गैर-बाजारी विनिमय के आधार पर संगठित थीं। 

औपनिवेशिकता के दौरान व्यावसायिक रुपये-पैसे की अर्थव्यवस्था के स्थानीय कृषक अर्थव्यवस्था में आने और विनिमय के वृहत् क्षेत्रों में उनके शामिल होने से ग्रामीण समाजों में जबरदस्त आर्थिक एवं सामाजिक परिवर्तन हुए। परन्तु ऐतिहासिक शोष के अनुसार भारतीय अर्थव्यवस्था का मुद्रीकरण औपनिवेशिकता के ठीक पहले से ही विद्यमान था। 

बहुत से गाँवों और इलाकों में विभिन्न प्रकार की गैर-बाजारी विनिमय व्यवस्था मौजूद थी, पर औपनिवेशिकता के पहले दौर में भी गाँव विनिमय के बड़े तंत्र का हिस्सा थे जिससे कृषि उत्पाद और तरह-तरह की अन्य वस्तुओं का व्यापारिक प्रचलन होता था। उपनिवेश के पहले भी भारत में विस्तृत और परिष्कृत व्यापारिक तंत्र विद्यमान थे। 

भारत हस्तकरपा के कपड़ों का मुख्य निर्माता और निर्यातक होने के साथ-साथ अनेक अन्य वस्तुओं जिनकी वैश्विक बाजार में माँग थी, का स्रोत था। 

उपनिवेश के पहले दिनों में भारत में उन्नत अवस्था के उत्पादन केन्द्रों के साथ-साथ देशज व्यापारियों का संगठित समाज, व्यापारिक तंत्र और बैंकिंग व्यवस्था भी शामिल थी, जिससे भारत दुनिया से व्यापार करने में सक्षम था।

तमिलनाडु के नाट्कोटाई चेट्टीयारों के समुदाय पर किया गया अध्ययन दर्शाता है कि किस तरह से उपनिवेशवाद के दौरान इनकी बैंकिंग और व्यापारिक गतिविधियाँ समाज के सामाजिक संगठनों से जुड़ी हुई थीं। जाति, नातेदारी और परिवार की संरचना व्यापार के अनुकूल थी व व्यापार इन्हीं सामाजिक संरचनाओं के भीतर होता था। नाकरद्वारों के बैंक भी उनके संयुक्त पारिवारिक संस्थान थे। 

इसका कारण था कि व्यापारिक संस्थान की संरचना परिवार के समान रहे। इसी प्रकार व्यापारिक और बैंकिंग गतिविधियों जाति और नातेदारी सम्बन्धों के माध्यम से संगठित थीं। इस तरह उपनिवेशवाद ने चेट्टियार व्यापारियों के जाति आधारित सामाजिक तंत्र या संपर्कों को दक्षिण पूर्व एशिया और सिलोन में अपनी गतिविधियाँ बढ़ाने में सहायता दी। 

नाकरद्वारों को बैंकिंग व्यवस्था एक जाति आधारित बैंकिंग व्यवस्था थी। इनमें एक-दूसरे से कर्ज लेना या पैसा जमा करना जाति आधारित सामाजिक संबंधों से जुड़ा होता था जो कि व्यापार के भूभाग, विवाह और संप्रदाय की सदस्यता पर आधारित था।

5. उपनिवेशवाद के भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले अनुकूल व प्रतिकूल प्रभावों का वर्णन कीजिए। 

Ans. उपनिवेशवाद से भारतीय अर्थव्यवस्था में गहरे बदलाव आए जिससे उत्पादन, कृषि व्यापार में एक अभूतपूर्व विघटन हुआ। इससे हस्तकरघा के काम की बिल्कुल ही समाप्ति हो गई। 

इसका कारण था कि उस वक्त के बाजारों में इंगलैंड से सस्ते बने कपड़ों की भरमार लग गई थी। हालाँकि भारत में उपनिवेश के दौर से पहले ही एक जटिल मुद्रीकृत अर्थव्यवस्था थी। ज्यादातर इतिहासकार उपनिवेश काल को एक संधिकाल के रूप में देखते हैं। 

उपनिवेश काल के दौरान, भारत विश्व की पूँजीवादी अर्थव्यवस्था से जुड़ गया। अंग्रेजी राज से पहले भारत से सिर्फ बने बनाए सामानों का निर्यात होता था, परन्तु उपनिवेशवाद के बाद भारत कच्चे माल और कृषक उत्पादों का स्रोत और उत्पादित सामानों का उपभोक्ता बन गया। ये दोनों कार्य इंग्लैंड के उद्योगों को लाभ पहुँचाने के लिए किए गए। उसी समय नए समूहों का व्यापार और व्यवसाय में आना हुआ । 

ये समूह पहले से जमे हुए व्यापारिक समुदायों से मेल-जोल कर अपना व्यापार शुरू करते थे या कभी उन समुदायों को उनका व्यापार छोड़ने को मजबूर करते थे। भारत में अर्थव्यवस्था के विस्तार द्वारा कुछ व्यापारिक समुदायों को नए अवसर प्रदान किए गए। 

उपनिवेशवाद द्वारा किए गए आर्थिक सुअवसरों का लाभ उठाने के लिए नए समुदायों का जन्म हुआ जिन्होंने स्वतन्त्रता के बाद भी आर्थिक शक्ति को बनाए रखा। इसका सफल उदाहरण हे – मारवाड़ी।

6. मार्क्स के पूँजीवादी अर्थव्यवस्था के सिद्धान्त का वर्णन कीजिए। पण्यीकरण को उदाहरण सहित समझाइए ।

Ans. मार्क्स के पूँजीवादी अर्थव्यवस्था और समाज के सिद्धान्त ने 19वीं और 20वीं शताब्दियों में पूँजीवाद के स्वरूप के बारे में अनेक सिद्धान्तों को प्रेरित किया। मार्क्स ने पूँजीवाद को पण्य उत्पादन या बाजार के लिए उत्पादन करने की व्यवस्था के रूप में समझा जो कि श्रमिक की मजदूरी पर आधारित है। 

मार्क्स ने लिखा कि सभी आर्थिक व्यवस्थाएँ सामाजिक व्यवस्थाएँ भी हैं। हर उत्पादन विधि विशेष उत्पादन संबंधों से बनती है और विशिष्ट वर्ग संरचना का निर्माण करती है। मार्क्स ने इस बात पर जोर दिया कि अर्थव्यवस्था चीजों से नहीं बल्कि लोगों के बीच रिश्तों से बनती है जो उत्पादन की प्रक्रिया के द्वारा एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। 

पूँजीवादी उत्पादन विधि के अन्तर्गत मजदूरी या श्रम भी एक बिकाऊ सामान बन जाता है, क्योंकि मजदूरों को अपनी श्रम शक्ति को बाजार में बेचकर ही अपनी मजदूरी कमानी है। इस तरह दो आधारभूत वर्गों का गठन होता है-

(i) पूँजीपति जो उद्योगों के मालिक होते हैं। (ii) श्रमिक, जो उद्योगों में कार्य करते हैं।

पूँजीपति श्रमिकों को उनके काम के बराबर पैसा नहीं देते जिससे उन्हें इस व्यवस्था से मुनाफा होता है और वे श्रम के अतिरिक्त मूल्य निकाल लेते हैं।


FAQs


Q. भूमंडलीकरण की व्याख्या करें।

Ans. आर्थिक सामाजिक, प्रौद्योगिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक परिवर्तनों की एक जटिल श्रृंखला जिसमें विविध प्रकार के स्थानों के लोगों और आर्थिक कार्यकर्ताओं में पारस्परिक निर्भरता, एकीकरण और अंतःक्रिया को बढ़ावा दिया गया है। 

Q. बाजारीकरण के बारे में लोगों के क्या विचार हैं ?

Ans. बाजारीकरण का समर्थन करने वाले लोगों का मानना है कि इससे समाज में आर्थिक समृद्धि व संवृद्धि को बढ़ावा मिलेगा, क्योंकि ये निजी संस्थाएँ सरकारी संस्थाओं की अपेक्षा ज्यादा कुशल होती हैं। 

Q. उदारीकरण से किन-किन क्षेत्रों को फायदा होगा व किन-किन पर गहरा प्रभाव पड़ेगा ?

Ans. उदारीकरण से सॉफ्टवेयर तकनीकी, सूचना तकनीकी, मछली या फल उत्पादन को शायद फायदा हो, परन्तु ऑटोमोबाइल्स, इलेक्ट्रॉनिक्स और तेलीय अनाजों के उद्योगों को हानि उठानी पड़ सकती है।

NOTES & QUESTIONS ANSWER


  1. Introducing Indian Society
  2. The Demographic Structure of the Indian Society
  3. Social Institutions: Continuity and Change
  4. The Market as a Social Institution
  5. Patterns of Social Inequality and Exclusion
  6. The Challenges of Cultural Diversity
  7. suggestions for projects work
  1. Structural Change
  2. Cultural Change
  3. The Story of Indian Democracy
  4. Change and Development in Rural Society
  5. Change and Development in Industrial Society
  6. Globalisation and Social Change
  7. Mass Media and Communications
  8. Social Movements

MCQS IN ENGLISH


  1. Introducing Indian Society
  2. The Demographic Structure of the Indian Society
  3. Social Institutions: Continuity and Change
  4. The Market as a Social Institution
  5. Patterns of Social Inequality and Exclusion
  6. The Challenges of Cultural Diversity
  1. Structural Change
  2. Cultural Change
  3. The Story of Indian Democracy
  4. Change and Development in Rural Society
  5. Change and Development in Industrial Society
  6. Globalisation and Social Change
  7. Mass Media and Communications
  8. Social Movements

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