VVI Class 12 Sociology Chapter 5 Notes In Hindi सामाजिक विषमता एवं बहिष्कार के स्वरूप

WhatsApp Group (Join Now) Join Now
Telegram Group (Join Now) Join Now

VVI Class 12 Sociology Chapter 5 Notes In Hindi सामाजिक विषमता एवं बहिष्कार के स्वरूप

Class12th 
Chapter Nameसामाजिक विषमता एवं बहिष्कार के स्वरूप
Chapter numberChapter 5
Book NCERT
SubjectSociology
Medium Hindi
Study MaterialsNotes & Questions answer
Download PDFSociology class 12 chapter 5 pdf

सामाजिक विषमता एवं बहिष्कार के स्वरूप


भारत में जन्में और यहीं पले-बढ़े लोग जानते हैं कि सामाजिक विषमता एवं बहिष्कार जीवन की एक वास्तविकता है। हम गलियों में और रेलवे प्लेटफॉर्म पर भिखारियों को देखते हैं। 

हम छोटे-छोटे बच्चों को घरेलू नौकर, भवन निर्माण में कार्य करते हुए, सड़क के किनारे बने ढाबों, चाय की दुकानों में सफाई करने वालों और काम करने वालों के रूप में देखते हैं। 

हम इन छोटे बच्चों को, जो कि नगरीय मध्य वर्ग के घरों में घरेलू नौकर के रूप में काम करते हैं, अपने से बड़े बच्चों का स्कूल वस्ता ढोते हुए देखकर आश्चर्यचकित नहीं होते हैं। 

यह हमें एक अन्याय के रूप में महसूस ही नहीं होता कि कुछ बच्चों को शिक्षा से वंचित किया जा रहा है। हममें से कुछ विद्यालयों में बच्चों के साथ जातिगत भेदभाव के बारे में पढ़ते हैं और कुछ इसका सामना करते हैं। इसी प्रकार महिलाओं के खिलाफ हिंसा एवं अल्पसंख्यक समूहों तथा अन्याय सक्षम लोगों के बारे में पूर्वाग्रह की खबरें भी हम रोजाना पढ़ते हैं।


VVI Class 12 Sociology Chapter 5 Notes In Hindi सामाजिक विषमता एवं बहिष्कार के स्वरूप

सामाजिक असमानता एवं बहिष्कार की घटना समाज में प्रतिदिन होती रहती है। इसीलिए ये घटनाएँ स्वाभाविकता का रूप ले लेती हैं। ऐसा माना जाता है कि यह एकदम सामान्य बात है, ये कुदरती चीजें हैं जिन्हें बदला नहीं जा सकता है। 

अगर हम असमानता एवं बहिष्कार को कभी-कभी अपरिहार्य नहीं भी मानते हैं तो अक्सर उन्हें उचित या न्यायसंगत भी मानते हैं। शायद लोग गरीब अथवा वंचित इसलिए होते हैं क्योंकि उनमें या तो योग्यता नहीं होती या वे अपनी स्थिति को सुधारने के लिए पर्याप्त परिश्रम नहीं करते। 

ऐसा मानकर हम उन्हें ही उनकी परिस्थितियों के लिए दोषी ठहराते हैं। यदि वे अधिक परिश्रम करते या बुद्धिमान होते तो वहाँ नहीं होते जहाँ वे आज हैं। वर्तमान समय में सामाजिक विषमता और बहिष्कार की समस्या का समाधान करने के लिए बहुत-से प्रयास समाज में किए गए हैं। 

इस समस्या का समुचित करने के लिए सरकारी पैमाने पर विभिन्न प्रयास किए गए हैं। सामाजिक असमानता और समाज में विषमता को रोकने के लिए सरकार की ओर से विभिन्न योजनाएँ चलाई जा रही हैं। सामाजिक मूल्यों को ऊँचा बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं। विषमता और असमानता समाज के लिए एक बुरी समस्या है। 

इसलिए इसपर समुचित नियंत्रण होना चाहिए। इस समस्या का स्थायी समाधान करने के लिए और भी ठोस कदम उठाना चाहिए, तभी समाज में असमानता एवं विषमता की समस्या को बहुत हद तक समाप्त किया जा सकता है।

ध्यान से देखने पर यह पाया जाता है कि जो लोग समाज के सबसे निम्न स्तर के हैं, वही सबसे ज्यादा परिश्रम करते हैं। एक दक्षिण अमेरिकी कहावत है- “यदि परिश्रम इतनी ही अच्छी घीज होती तो अमीर लोग हमेशा उसे अपने लिए बचाकर रखते।’ 

संपूर्ण विश्व में पत्थर तोड़ना, ख़ुदाई करना, भारी वजन उठाना, रिक्शा या ठेला खींचना जैसे कमरतोड़ काम गरीब लोग ही करते हैं। फिर भी वे अपना जीवन शायद ही सुधार पाते हैं। ऐसा कितनी बार होता है कि कोई गरीब मजदूर एक छोटा-मोटा ठेकेदार भी बन पाया हो ? ऐसा तो केवल फिल्मों में ही होता है कि सड़क पर पलनेवाला एक बच्चा उद्योगपति बन सकता है। परंतु फिल्मों में भी अधिकतर यहीं दिखाया जाता है कि ऐसे नाटकीय उधान के लिए गैर-कानूनी या अनैतिक तरीका जरूरी है।

हम अक्सर सामाजिक भेदभाव और बहिष्कार की केवल आर्थिक संसाधनों के विभेदीकरण के रूप में ही चर्चा करते हैं, जबकि यह आंशिक रूप से ही सत्य है। लोग ज्यादातर अपने लिंग धर्म, नृजातीय भाषा, जाति तथा विकलांगता की वजह से भेदभाव और बहिष्कार का सामना करते हैं। 

अतः एक अभिजात्य वर्ग को महिला भी सार्वजनिक स्थान पर यौन उत्पीड़न की शिकार हो सकती है। एक धार्मिक या नृजातीय अल्पसंख्यक समूह के मध्य वर्ग के पेशेवर व्यक्ति को भी महानगर की एक मध्य वर्ग कॉलोनी में रहने के लिए घर लेने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। 

लोग दूसरे सामाजिक समूहों के बारे में ज्यादातर पूर्वाग्रह से ग्रस्त होते हैं। हम सब एक समुदाय के सदस्य के रूप में बड़े होते हैं जिससे हम अपने ‘समुदाय’, ‘जाति’, ‘वर्ग’ या “लिंग’ के बारे में ही नहीं बल्कि इसके अलावा दूसरों के बारे में भी धारणाएँ बनाते हैं। यह धारणाएँ पूर्वाग्रहित होती है।

सामाजिक बहिष्कार वह तौर-तरीका है जिसके जरिए किसी व्यक्ति या समूह को समाज में पूरी तरह घुलने-मिलने से रोका जाता है व अलग या पृथक रखा जाता है। यह उन सभी कारकों पर ध्यान दिलाता है जो व्यक्ति या समूह को उन अवसरों से वंचित करते हैं जो अधिकांश जनसंख्या के लिए खुले होते हैं। 

भरपूर तथा क्रियाशील जीवन जीने के लिए, व्यक्ति को जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं (जैसे-रोटी, कपड़ा तथा मकान) के अलावा अन्य आवश्यक वस्तुओं और सेवाओं (जैसे- शिक्षा, स्वास्थ्य, यातायात के साधन, बीमा, सामाजिक सुरक्षा, बैंक तथा यहाँ तक कि पुलिस एवं न्यायपालिका) की भी जरूरत होती है। सामाजिक भेदभाव आकस्मिक या अनायास रूप से नहीं बल्कि व्यवस्थित तरीके से होता है। यह समाज की संरचनात्मक विशेषताओं का परिणाम है। 

भेदभाव अथवा अपमानजनक व्यवहार का लंबा अनुभव प्रायः इस तरह की प्रतिक्रिया के रूप में प्रकट होता है कि बहिष्कृत व्यक्ति मुख्यधारा में शामिल होने के प्रयास अक्सर बंद कर देते हैं। उदाहरण के लिए, उच्च जातीय हिंदु समुदायों ने अक्सर निम्न जातियों के (विशेष रूप ने से दलितों के) मंदिर में प्रवेश कर पाबंदी लगायी है। 

दशकों तक इस तरह के बर्ताव के पश्चात् दलितों ने अपने मंदिर बना लिए या बौद्ध, ईसाई या इस्लाम जैसे अन्य धर्म को अपना लिया।” ऐसा करने के बाद वे हिंदू-मन्दिर में प्रवेश करने या किसी भी धार्मिक उपलक्ष्य में सम्मिलित होने के इच्छुक नहीं होंगे। 

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि सामाजिक बहिष्कार नहीं किया जाता। ऐसी स्थिति बहिष्कार व अपमान के लंबे अनुभव से ही उपजती है। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि बहिष्कार बहिष्कृत व्यक्ति की इच्छा अनिच्छा की तरफ ध्यान ही नहीं देता।

अधिकांश समाजों की तरह भारत में भी सामाजिक भेदभाव तथा बहिष्कार चरम रूप में पाया जाता है। इतिहास की विभिन्न अवधियों में जाति, लिंग तथा धार्मिक भेदभाव के विरुद्ध आंदोलन हुए हैं, लेकिन इसके बावजूद पूर्वाग्रह बना रहता है तथा अक्सर नए पूर्वाग्रह उत्पन्न हो जाते हैं। 

अतः कानून अकेले अपने बूते पर समाज को रूपांतरित करने अथवा स्थायी सामाजिक परिवर्तन लाने में असमर्थ है। यह सब समाप्त करने के लिए परिवर्तन, एवं संवेदनशीलता के साथ एक सतत् सामाजिक अभियान की आवश्यकता है। 

जागरूकता ‘अस्पृश्यता’ जिसे आम बोलचाल में ‘छुआछूत’ कहा जाता है, जाति-व्यवस्था का एक अत्यंत घृणित एवं दूषित पहलू है, जो धार्मिक एवं कर्मकांडीय दृष्टि से शुद्धता एवं अशुद्धता के पैमाने पर सबसे नीची मानी जाने वाली जातियों के सदस्यों के विरुद्ध अत्यंत कठोर सामाजिक अनुशास्त्रियों (दंडों) का विधान करता है। 

सच पूछिए तो ‘अस्पृश्य’ यानी अछूत मानी जानेवाली जातियों का जाति सोपान या अधिक्रम में कोई स्थान ही नहीं है, वे तो इस व्यवस्था से बाहर है। 

उन्हें तो इतना अधिक ‘अशुद्ध’ एवं अपवित्र माना जाता है कि उनके जरा छू जाने भर से ही अन्य सभी जातियों के सदस्य अत्यंत अशुद्ध हो जाते हैं, जिसके कारण अछूत कहे जाने वाले व्यक्ति को तो अत्यधिक कठोर दंड भुगतना पड़ता ही है, साथ ही उच्च जाति का जो व्यक्ति छुआ गया है, उसे भी फिर से शुद्ध होने के लिए कई शुद्धीकरण क्रियाएँ करनी होती हैं। 

सच तो यह है कि भारत के कई क्षेत्रों (विशेष रूप से दक्षिण भारत) में ‘दूर से अशुद्धता’ की धारणा विद्यमान थी जिसके अनुसार ‘अछूत’ समझे जानेवाले व्यक्ति की उपस्थिति, अथवा छाया ही अशुद्ध समझी जाती थी। इस शब्द का आक्षरिक अर्थ सीमित होने के बावजूद, ‘अस्पृश्यता’ की संस्था शारीरिक संपर्क से बचने या अछूत से दूर रहने का आदेश देती है।

इन ‘अस्पृश्यों’ को पिछली अनेक शताब्दियों से सामूहिक रूप से भिन्न-भिन्न नामों से पुकारा जाता रहा है। इन नामों की अपनी व्युत्पत्ति कुछ भी हो, और इनका मूल अर्थ चाहे कुछ भी रहा हो, पर अब वे सब अत्यंत अपमानसूचक एवं निंदात्मक हैं। सच तो यह है कि उनमें से अनेक शब्द तो आज भी गाली के तौर पर इस्तेमाल किए जाते हैं। हालाँकि, आज उनका प्रयोग एक दंडनीय अपराध माना जाता है। 



महात्मा गाँधी ने इन जाति नामों के निंदात्मक आरोप को दूर करने के लिए 1930 के दशक में उन्हें ‘हरिजन’ (जिसका शाब्दिक अर्थ ‘परमात्मा के बच्चे’ हैं) कहकर पुकारना शुरू किया; यह काफी लोकप्रिय हुआ।

किंतु भूतपूर्व अस्पृश्य समुदायों और उनके नेताओं ने एक दूसरा शब्द ‘दलित’ गढ़ा, जो इन सभी समूहों का उल्लेख करने के लिए अब आमतौर पर स्वीकार कर लिया गया है। भारतीय भाषाओं में ‘दलित’ शब्द का आक्षरिक अर्थ है- ‘पैरों से कुचला हुआ’ और यह उत्पीड़ित लोगों के भाव का द्योतक है। 

यह शब्द न तो डॉक्टर अंबेडकर द्वारा गढ़ा गया था और न ही अक्सर उनके द्वारा इसका प्रयोग किया गया था, पर इनमें उसका चिंतन तथा दर्शन एवं उनके उस आंदोलन का मूल भाव निश्चित रूप से गुंजायमान है जो उनके नेतृत्व में दलितों को सशक्त बनाने कि लिए चलाया गया था। 1970 के दशक में मुंबई में हुए जातीय दंगों के दौरान इस शब्द का प्रयोग बहुत व्यापक रूप से किया गया। 

उस समय पश्चिमी भारत में ‘दलित पैंथर्स’ नाम का जो उग्र समूह उभरा, उसने अपने अधिकारों तथा मान-मर्यादा के लिए चलाए गए संघर्ष के अंतर्गत अपनी अलग पहचान बनाने के लिए इस शब्द का प्रयोग किया।

स्वतंत्रता प्राप्ति के पहले से ही भारतीय राज्य यानि भारत सरकार अनुसूचित जनजातियों और अनुसूचित जातियों के लिए अनेक विशेष कार्यक्रम चलाती रही है। ब्रिटिश भारत की सरकार 1935 में अनुसूचित जातियों और जनजतियों की ‘अनुसूचियाँ’ तैयार की थी जिनमें उन जातियों तथा जनजातियों के नाम दिए गए थे जिन्हें उनके विरुद्ध बड़े पैमाने पर बरते जा रहे मेदभाव के कारण विशेष का पात्र माना गया था। 

स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद उन नीतियों को तो जारी रखा ही गया, उनमें कई नई नीतियाँ भी जोड़ दी गई। इनमें सबसे उल्लेखनीय परिवर्तन यह किया गया कि 1990 के दशक के प्रारंभिक वर्षों से ‘अन्य पिछड़े वर्गों’ के लिए भी कुछ विशेष कार्यक्रम जोड़ दिए गए हैं।

पुराने और वर्तमान जातीय भेदभाव को दूर करने और उससे हुई क्षति की पूर्ति करने के लिए राज्य की ओर से जो सबसे महत्त्वपूर्ण कदम उठाया गया है, उसे आम लोगों में ‘आरक्षण’ के नाम से जाना जाता है। इसके अंतर्गत सार्वजनिक जीवन के विभिन्न पक्षों में अनुसूचित जातियों और जनजातियों के सदस्यों के लिए कुछ स्थान या सीटें अलग निर्धारित कर दी जाती हैं। 

इन आरक्षणों में अनेक किस्म के आरक्षण शामिल हैं, जैसे—राज्य और केंद्रीय विधानमंडल (यानि राज्य विधानसभाओं, लोकसभा और राज्यसभा) में सीटों का आरक्षण; सभी विभागों और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के अंतर्गत सरकारी सेवा में नौकरियों का आरक्षण; शैक्षिक संस्थाओं में सीटों का आरक्षण। 

आरक्षित सीटों का अनुपात समस्त जनसंख्या में अनुसूचित जातियों और जनजातियों के प्रतिशतांश के बराबर होता है। लेकिन अन्य पिछड़े वर्गों के लिए यह अनुपात अलग आधार पर निश्चित किया गया है। इसी सिद्धांत को सरकार के अन्य विकास कार्यक्रम पर भी लागू किया गया है; उनमें से कुछ तो विशेष रूप से अनूसूचित जातियों या जनजातियों के लिए है, जबकि कुछ अन्य कार्यक्रमों में उन्हें अधिमान्य या तरजीह दी जाती है।

आरक्षणों के अतिरिक्त और भी बहुत से कानून हैं जो जातीय भेदभाव विशेष रूप से। अस्पृश्यता को खत्म करने, रोकने अथवा उसके लिए देने के लिए बनाए गए हैं। ऐसे शुरुआती कानूनों में एक था 1850 का जातीय निर्योग्यता अधिनियम जिसमें यह व्यवस्था की गई थी कि केवल धर्म या जाति के परिवर्तन के कारण ही नागरिकों के अधिकारों को कम नहीं किया जाएगा। 

ऐसी ही सबसे हाल का कानून था – 2005 का संविधान संशोधन (तिरानदेवाँ संशोधन) अधिनियम, जो 23 जनवरी, 2006 को कानून बना। संयोगवश 1850 का कानून और 2006 का संशोधन दोनों ही शिक्षा से संबंधित थे। 

93वाँ संशोधन उच्चतर शिक्षा की संस्थाओं में अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण लागू करने के लिए था, जबकि 1850 का अधिनियम सरकारी स्कूलों में दलितों को भर्ती करने की इजाजत देने के लिए बनाया गया था। इन दोनों के बीच और अनेक कानून बनाए गए जिनमें वस्तुतः सबसे महत्त्वपूर्ण थे- ‘भारत का संविधान’ जो 1950 में पारित किया गया और 1989 का अनुसूचित जाति और जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम। 

संविधान ने अस्पृश्यता का उन्मूलन (अनुच्छेद 17) कर दिया और उपर्युक्त आरक्षण संबंधी उपबंध लागू हिंसा और अपमानजनक कार्यों के लिए दंड देने के लिए उपबंधों में संशोधन करके उन्हें और मजबूत बना दिया। 

इस प्रकार, इस विषय पर बार-बार अनेक कानून बनाए गए जो इस तथ्य के प्रमाण है कि अकेला कानून ही किसी सामाजिक कुप्रथा को नहीं मिटा सकता। वस्तुतः जैसा कि आपने समाचार पत्रों में पढ़ा होगा और टी.वी. रेडियो जैसे संचार माध्यमों में देखा-सुना होगा, दलितों तथा आदिवासियों के विरुद्ध अत्याचार सहित भेदभाव के मामले आज भी समस्त भारत में देखने को मिलते हैं।

अनुसूचित जातियों की तरह ही, अनुसूचित जनजातियों को भी भारतीय संविधान द्वारा विशेष रूप से निर्धनता, शक्तिहीनता तथा सामाजिक लांछन से पीड़ित सामाजिक समूह के रूप में पहचाना गया है। 

जन या जनजातियों को ऐसा ‘वनवासी’ समझा गया जिनके पहाड़ी या जंगली इलाकों के विशिष्ट परिस्थितियों में आवास ने उनकी आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक विशेषताओं को आकार दिया। लेकिन यह पारिस्थितिक पृथकता कहीं भी पूर्ण नहीं थी, अर्थात् वे एकदम अलग-अलग या संपर्कहीन नहीं थे। 

जनजातीय समूहों का हिंदू समाज और संस्कृति से लंबा निकट का नाता रहा है, जिससे ‘जनजाति’ और ‘जाति’ के बीच की परिसीमाएँ काफी जीर्ण-शीर्ण हो गई हैं। (अध्याय-3 में जनजाति की संकल्पना पर हुई चर्चा को याद करें।) आदिवासियों के मामले में, उनकी आबादी के एक इलाके से दूसरे इलाके में आने-जाने से हालात और भी उलझ गए हैं। 

आज पूर्वोत्तर राज्यों को छोड़कर देश में ऐसा कोई इलाका नहीं है जहाँ केवल जनजातीय लोग ही रहते हैं; सिर्फ ऐसे इलाके हैं जहाँ जनजातीय लोगों का जमावड़ा अधिक है यानि उनकी आबादी घनी है। उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य से अब तक बहुत से गैर-जनजातीय लोग मध्य भारत के जनजातिय जिलों में जा बसे हैं और उन्हीं जिलों के जनजातीय लोग भी रोजगार की तलाश में बागानों, खानों, कारखानों तथा रोजगार के अन्य स्थलों में चले गए हैं।

जिन इलाकों में जनजातीय लोगों की आबादी घनी है, वहाँ आमतौर पर उनकी आर्थिक और सामाजिक हालत गैर जनजातीय लोगों की अपेक्षा कहीं बदतर हैं। गरीबी और शोषण की जिन परिस्थितियों में आदिवासी अपना गुजर-बसर करने के लिए मजबूर हैं उसका ऐतिहासिक कारण यह रहा कि औपनिवेशिक ब्रिटिश सरकार ने तेजी से जंगलों के संसाधनों को निकालना शुरू कर दिया और यह सिलसिला आगे स्वतंत्र भारत में भी जारी रहा। 

उन्नीसवीं सदी के परवर्ती दशकों से लेकर आगे भी औपनिवेशिक सरकार ने अधिकांश वन-प्रदेश अपने उपयोग के लिए आरक्षित कर लिए और आदिवासियों को वहाँ की उपज इकट्ठी करने और झूम खेती के लिए उनका उपयोग करने के अधिकारों से वंचित कर दिया। 

फिर तो इमारती लकड़ी का अधिकाधिक उत्पादन करने के लिए ही वनों का संरक्षण किया जाने लगा। इस नीति के चलते, आदिवासियों से उनकी आजीविका के मुख्य आधार छीन लिए गए और इस प्रकार उनके जीवन को पहले की अपेक्षा अधिक अभावपूर्ण और असुरक्षित बना दिया गया। 

जब आदिवासियों से वनों की • उपज और खेती के लिए जमीन छिन गई तब वे या तो वनों को अवैध रूप से इस्तेमाल करने को मजबूर हो गए (जिसके लिए उन्हें ‘घुसपैठिए’ और ‘चोर-उचक्के’ कहकर तंग और दंडित किया जाने लगा या फिर दिहाड़ी मजदूरी की तलाश में वन छोड़कर अन्यत्र चले गए।

हिंदुओं की ऊँची जातियों में विधवाओं के साथ उस समय किया जा रहा निंदनीय एवं अन्यायपूर्ण व्यवहार एक प्रमुख मुद्दा था जिसे सामाजिक सुधारकों ने उठाया। रानाडे ने इस संबंध में विशप जोसेफ बटलर जैसे विद्वानों के लेखों का उपयोग किया, जिनकी कृति ‘ऐनेलॉजी ऑफ रिलीजन’ और ‘थ्री सर्मन्स ऑन ह्यूमन नेचर’ को 1860 के दशक में मुंबई विश्वविद्यालय के नैतिक दर्शन संबंधी पाठ्यक्रम में प्रमुख स्थान प्राप्त था। 

इसी समय, एम. जी. रानाडे द्वारा लिखित ग्रंथों ‘दि टेक्स्टस् ऑफ द हिंदू लॉ ऑन द लॉफुलनेश ऑफ द रीमैरिज ऑफ विडोज’ और ‘वैदिक आयॉरिटीज फॉर विडो मैरिज’ में विधवा विवाह के लिए शास्त्रीय स्वीकृति का विशद् विवेचन किया गया।

रानाडे और राममोहन तो उन्नीसवीं सदी के ऐसे समाज सुधारक थे जो तथाकथित ऊँची जातियों और मध्यवर्ग से थे; लेकिन सामाजिक दृष्टि से अपवर्जित जाति से भी एक समाज-सुधारक का आविर्भाव हुआ; उनका नाम था-ज्योतिबा फूले और उन्होंने जातीय और लैंगिक दोनों प्रकार के भेदभाव के विरुद्ध अपनी आवाज उठाई। 

उन्होंने ‘सत्यशोधक समाज’ नामक संस्था की स्थापना की और उसके माध्यम से सत्य की खोज पर बल दिया। व्यावहारिक सामाजिक सुधारों के लिए फूले ने सर्वप्रथम, पारंपरिक ब्राह्मण संस्कृति में सबसे नीचे समझे जाने वाले दो समूहों, स्त्रियों एवं अछूतों को सहायता देने के प्रयत्न किए।

1931 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कराची अधिवेशन में भारत के नागरिकों के मूल अधिकारों के बारे में एक घोषणा जारी की गई जिसके द्वारा कांग्रेस ने स्त्रियों को समानता का अधिकार देने के लिए स्वयं को प्रतिबद्ध किया। यह घोषणा इस प्रकार थी- 

(i) सभी नागरिक कानून (विधि) के समक्ष एक समान हैं, चाहे उनका धर्म, जाति, पंथ या लिंग कोई भी हो।

(ii) किसी भी नागरिक को उसके धर्म, जाति, पंथ, लिंग के कारण सार्वजनिक रोजगार, शक्ति या सम्मान का पद दिए जाने अथवा कोई भी व्यापार या धंधा किए जाने के संबंध में निर्योग्य नहीं ठहराया जाएगा।

(iii) मताधिकार का प्रयोग सर्वजनीन वयस्क मताधिकार के आधार पर होगा। 

(iv) स्त्रियों को मत डालने, प्रतिनिधित्व करने और सार्वजनिक पद धारण करने का अधिकार होगा। (‘योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था में नारी की भूमिका’ विषयक उपसमिति की रिपोर्ट 1947:37-38) 1 स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद दो दशक बीत जाने पर 1970 के दशक में स्त्रियों के मुद्दे फिर से उठ खड़े हुए। 19वीं सदी के सुधार आंदोलनों में सती, बाल-विवाह जैसी परंपरागत कुरीतियों अथवा विधवाओं के साथ बुरे बर्ताव को रोकने पर विशेष बल दिया गया था। 1970 के दशक

में आधुनिक मुद्दों, पुलिस अभिरक्षा में स्त्रियों के साथ बलात्कार, दहेज के लिए हत्या लोकप्रिय माध्यमों में स्त्रियों का प्रतिनिधित्व और असमान विकास के लैंगिक परिणाम आदि की ओर विशेष रूप से ध्यान आकर्षित किया गया। 

1980 के दशक में और उसके बाद कानून सुधार का विशेष मुद्दा बणा, घासतौर पर उस समय जब यह पाया गया कि स्त्रियों से सरोकार रखने वाले बहुत से कानूनों को 19वीं सदी से अब तक अपरिवर्तित रूप में ज्यों का त्यों रखा गया है। 

अब जबकि हम 21वीं सदी में प्रवेश गये रहे हैं, लैंगिक अन्याय के नए रूप उभरकर सामने आ रहे हैं। आप को याद होगा कि हमने अध्याय – 2 में गिरते हुए लैंगिक अनुपात यानी स्त्री-पुरुष अनुपात के बारे में चर्चा की थी। 

बाल लैंगिक अनुपात में जो तेजी से गिरावट आ रही है और बालिकाओं के विरुद्ध अव्यक्त रूप से जो सामाजिक पक्षपातपूर्ण रवैया उत्पन्न हो रहा है वह लैंगिक असमानता की नई चुनौतियों पेश करता है। 

स्त्रियों के अधिकारों अथवा अन्य किसी भी मुद्दे पर लाया गया सामाजिक परिवर्तन सदा-सर्वदा के लिए स्थायी नहीं होता; यह लड़ाई तो बार-बार लड़नी होगी और आगे भी जारी को बड़ी मुश्किल से प्राप्त किए गए अधिकारों की रक्षा के लिए लड़ना होगा और नए उभरते हुए मुद्दों को भी उठाना होगा। 

1947 में भारत स्वतंत्र हो जाने के बाद आदिवासियों की जिंदगी आसान हो जानी चाहिए थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसका एक कारण तो यह था कि वनों पर सरकार का एकाधिकार जारी रहा। यहाँ तक कि वनों के संदोहन (कटाई आदि) में और तेजी आ गई। 

दूसरे, भारत सरकार द्वारा अपनाई गई पूँजी प्रधान औद्योगीकरण की नीति को कार्यान्वित करने के लिए खनिज संतापनों और विद्युत उत्पादन की क्षमताओं की आवश्यकता थी और ये क्षमताएँ और संसाधन मुख्य रूप से आदिवासी क्षेत्रों में ही स्थित थे। 

नयी खनन और बाँध परियोजनाओं के लिए जल्दी से आदिवासी भूमियाँ अधिगृहीत कर ली गई। इस प्रक्रिया में, लाखों आदिवासियों को पर्याप्त मुआवजे और समुचित पुनर्वास की व्यवस्था किए बिना विस्थापित कर दिया गया। 

‘राष्ट्रीय विकास’ और ‘आर्थिक संवृद्धि’ के नाम पर इस कार्य को न्यायोचित ठहराया गया, इस प्रकार इन नीतियों का पालन वास्तव में एक तरह का आंतरिक उपनिवेशवाद ही था जिसके अंतर्गत आदिवासियों को अधीन करके संसाधनों को जिन पर वे निर्भर थे, छीन लिया गया। पश्चिमी भारत में नर्मदा नदी पर सरकार सरोवर बाँध और आंध्र प्रदेश में गोदावरी नदी पर पोलावरम् बाँध बनाने की परियोजनाओं से लाखों आदिवासी विस्थापित हो जायेंगे, 

तो उन्हें पहले से अधिक अभावग्रस्त बना देगा। प्रक्रियाएँ लंबे अरसे से चलती रही हैं और 1990 के दशक से तो और भी अधिक प्रबल हो गई हैं, जब से भारत सरकार द्वारा आर्थिक उदारीकरण की नीतियों आधिकारिक रूप से अपनाई गई हैं। अब निगमित फर्मों के लिए आदिवासियों को विस्थापित करके बड़े-बड़े इलाके अधिगृहीत करना अधिक आसान हो गया है।

रखनी होगी। अन्य सामाजिक मुद्दों की तरह यह संघर्ष लंबा चलेगा। भारत में नारी आंदोलन ‘दलित’ शब्द की तरह ‘आदिवासी’ शब्द भी राजनीतिक जागरूकता और अधिकारों की लड़ाई का सूचक बन गया है। 

इसका शाब्दिक अर्थ है- ‘मूल निवासी’ और इस शब्द को औपनिवेशिक सरकार और बाहरी बाशिंदों तथा ‘साहूकारों’ (ऋणदाताओं) द्वारा की जा रही घुसपैठ के विरुद्ध संघर्ष के अंतर्गत 1930 के दशक में गढ़ा गया था। 

आदिवासी होने का मतलब स्वतंत्रता प्राप्ति के समय से विकास परियोजनाओं के नाम पर आदिवासियों से वनों का छिन जाना, भूमि का अपहरण, बार-बार विस्थापन एवं अन्य कई और परेशानियों का सम्मिलित अनुभव है। आधुनिक भारत में स्त्रियों की स्थिति का प्रश्न उन्नीसवीं सदी के मध्यवर्गीय सामाजिक सुधार आंदोलनों के एक हिस्से के रूप में उदित हुआ। 

इन आंदोलनों का स्वरूप सभी क्षेत्रों में एक जैसा नहीं था। उन्हें अक्सर मध्यवर्गीय सुधार आंदोलनों की संज्ञा इसलिए दी जाती थी कि इन सुधारकों में से बहुत से लोग नए उभरते हुए पाश्चात्य शिक्षा प्राप्त भारतीय मध्य वर्ग से थे। वे अक्सर आधुनिक पश्चिम के लोकतांत्रिक आदर्शों द्वारा और अपने स्वयं के अतीत की सोकतांत्रिक परंपराओं पर गर्व एवं गौरव महसूस करते हुए इन सुधारों के लिए प्रेरित हुए थे। कई सुधारकों ने तो स्त्रियों के अधिकारों के लिए संघर्ष करने के प्रयोजन से इन दोनों संसाधनों का उपयोग किया था


CLASS 12 NCERT SOLUTION IN ENGLISHCLASS12 NCERT SOLUTION IN HINDI
Historyइतिहास
Geography भूगोल
Political science राजनीति विज्ञान
English SubjectResult
Hindi SubjectHistory answer keys

 हम इस संबंध में यहाँ कुछ उदाहरण दे सकते हैं, जैसे-बंगाल में राजा राममोहन राय ने सती-विरोधी अभियान का नेतृत्व किया, बॉम्बे प्रेसिडेंसी में वहाँ के अग्रणी सुधार रानाडे ने विधवाओं के पुनर्विवाह के लिए आंदोलन चलाया, ज्योतिबा फूले ने एक साथ जातीय और लैंगिक अत्याचारों के विरुद्ध आवाज उठाई और सर सैयद अहमद खान ने इस्लाम में सामाजिक सुधारों के आंदोलन का नेतृत्व किया।

“समाज, धर्म और स्त्रियों की परिस्थिति में सुधार करने के लिए राजा राममोहन राय द्वारा किए गए प्रयत्नों को बंगाल में उन्नीसवीं सदी के सामाजिक सुधारों का प्रारंभिक बिंदु कहा जा सकता है। 1828 में ब्रह्म समाज की स्थापना से एक दशक पहले राय ने सती-प्रथा के विरुद्ध अभियान चलाया, यह पहला स्त्री-संबंधी मुद्दा था जिस पर आम लोगों का ध्यान आकर्षित किया न गया था। राममोहन राय के विचारों में पाश्चात्य तर्कसंगति और भारतीय पारंपरिकता का सुंदर मिश्रण था। इन दोनों प्रवृत्तियों को उपनिवेशवाद की प्रतिक्रिया के व्यापक संदर्भ में रखकर देखा जा सकता है। राममोहन राय ने इस प्रकार, सती-प्रथा का विरोध मानवतावादी तथा नैसर्गिक अधिकारों के सिद्धांतों एवं हिन्दू शास्त्रों के आधार पर किया।

वास्तव में, सामाजिक असमानता एवं बहिष्कार समस्या का समाधान करने के लिए देश में सदा प्रयत्न किए गए हैं। लेकिन अभी भी बहुत हद तक समस्या समाज में कायम है। इसलिए इस समस्या का समाधान करने के लिए और कारगर उपाय करना चाहिए।


sociology class 12 chapter 5 questions and answers in hindi


1. सामाजिक विषमता व्यक्तियों की विषमताओं से कैसे भिन्न है ?

Ans. सामाजिक विषमता सामाजिक संसाधनों तक पहुँच की पद्धति ही सामाजिक विषमता कहलाती है। सामाजिक विषमताएँ व्यक्तियों के बीच स्वाभाविक भिन्नता को प्रतिबिंबित करती हैं। उदाहरण के तौर पर, व्यक्तियों की योग्यता एवं प्रयास में भिन्नता । अर्थात कोई भी व्यक्ति असाधारण बुद्धिमान या प्रतिभावान हो सकता है या, 

यह भी हो सकता है कि उस व्यक्ति 5 ने समृद्धि और अच्छी स्थिति प्राप्त करने के लिए कठोर परिश्रम किया हो। सामाजिक विषम व्यक्ति के बीच उस समाज के माध्यम से उत्पन्न की जाती है जिस समाज में वे व्यक्ति रहते हैं। सामाजिक भिन्नता किसी सहज या प्राकृतिक भिन्नता की वजह से उत्पन्न नहीं होती।

2. सामाजिक स्तरीकरण की कुछ विशेषताएँ बताइए।

Ans. सामाजिक स्तरीकरण-समाज के भिन्न-भिन्न टुकड़ों के संस्तरों अथवा उपसमूहों में, अधिक्रमित व्यवस्था, जिनके सभी सदस्य अधिक्रम में एक सामान्य स्थिति रखते हो। स्तरीकरण का निहितार्थ है-असमानता, समतावादी समाजों में सिद्धांत रूप में अलग-अलग स्तर नहीं होते, हालाँकि उनमें अन्य रूप एवं प्रकार के उप-समूह हो सकते हैं जो अधिकतम में नहीं 

होते, यानी उनमें ऊँच-नीच का भाव नहीं होता। संक्षेप में, वह व्यवस्था जो एक समाज में लोगों का वर्गीकरण करते हुए एक अधिक्रमित संरचना में उन्हें श्रेणीबद्ध करती है, उसे समाजशास्त्रियों द्वारा सामाजिक स्तरीकरण कहा जाता है। इससे लोगों की पहचान, अनुभव, उनके दूसरों से संबंध तथा संसाधनों एवं अवसरों का ज्ञान होता है।

सामाजिक स्तरीकण की विशेषताएँ- 

1. सामाजिक स्तरीकरण समाज की एक विशिष्टता के रूप में सामाजिक स्तरीकरण समाज में व्यापक रूप से पाई जानेवाली वह व्यवस्था है जो सामाजिक संसाधनों को लोगों की विभिन्न श्रेणियों में असमान रूप से बाँटती है। तकनीकी रूप से अधिक उन्नत समाज में जह लोग अपनी मूलभूत जरूरतों से अधिक उत्पादन करते हैं, सामाजिक संसाधन विभिन्न सामाजि श्रेणियों में असमान रूप में बँटा होता है। इसका लोगों की व्यक्तिगत क्षमता से कोई सारोका नहीं होता है।

2. सामाजिक स्तरीकरण पीढ़ी-दर-पीढ़ी बने रहना-सामाजिक स्तरीकरण परिवार और सामाजिक संसाधनों के एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में उत्तराधिकार के रूप में मजबूती से जुड़ा रहता है। किसी भी व्यक्ति की प्रदत्त पहचान अर्थात वह पहचान जो उसे जन्म से प्राप्त होती है। निर्धारित होती है। बच्चे अपने माता-पिता की सामाजिक स्थिति को पाते हैं। 

3. सामाजिक स्तरीकरण को विश्वास या विचारधारा द्वारा समर्थन प्राप्त होना- सामाजिक स्तरीकण की प्रत्येक व्यवस्था न्यायसंगत या अपरिहार्य होने पर वह व्यवस्था पीढ़ी-दर-पीढ़ी चल सकती है। 

3. आप पूर्वाग्रह और अन्य किस्म की राय अथवा विश्वास के बीच कैसे भेद करेंगे ?

 Ans. पूर्वाग्रह किसी व्यक्ति या समूह के बारे में पूर्वनिर्धारित विचार रखने से संबंधित होते हैं। ऐसे विचार किसी नई जानकारी के प्राप्त होने पर भी बदलने को तैयार नहीं होते। पूर्वाग्रह सकारात्मसक अर्थात किसी जाति, समूह के बारे में अच्छे सोच या नकारात्मक अर्थात किसी जाति, समूह की उपेक्षा दोनों तरह के हो सकते हैं। 

परन्तु इसका सामान्य प्रयोग नकारात्मक या अनादरपूर्ण पूर्वधारणा के लिए ही होता है। संक्षेप में कहा जाए तो पूर्वाग्रह एक समूह के सदस्यों द्वारा दूसरे समूह के सदस्यों के बारे में पूर्वकल्पित विचार या व्यवहार होता है। इसमें व्यक्ति या समूह के बारे में बिना जाँचे-परखे एक नकारात्मक धारणा बना लेते हैं। पूर्वाग्रहित व्यक्ति के विचार सुनी-सुनाई बातों पर आधारित होते हैं। एक व्यक्ति अपनी जाति और समूह के सदस्यों के पक्ष में पूर्वाग्रहित हो सकता है अर्थात वह अपनी जाति को अन्य जातियों से श्रेष्ठ जान सकता है।

विश्वास एक ऐसी धारणा होती है जिसमें व्यक्ति सुनिश्चित है कि अन्य जाति के समूह या व्यक्ति किस प्रकार के हैं, अर्थात वह उन समूहों को जाने बिना ही पूर्वकल्पित विचार या धारणाएँ नहीं बनाता। इसके अतिरिक्त, अन्य किस्म की राय या विश्वास में व्यक्ति को नकारात्मक व सकारात्मक दोनों प्रकार की विचारधाराओं का सामना करना पड़ सकता है।

पूर्वाग्रह ज्यादा एक समूह के बारे में कठोर, अपरिवर्तनीय और रूढ़िबद्ध धारणाओं पर आधारित होते हैं। रूढ़िबद्ध धारणाएँ मुख्यतः नृजातीय और प्रजातीय समूहों और महिलाओं के बारे में होती हैं। कुछ रूढ़िबद्ध विचार औपनिवेशिक काल की देन है। जैसे कुछ समुदायों को ‘वीर प्रजाति’ की संज्ञा दी गई तो किसी समदाय को ‘आलसी’ या ‘चालाक’ की। रूढ़िवद्ध धारणा के अंतर्गत पूरे समुदाय को एक-सा ही माना जाता है, चाहे उस समुदाय के लोगों में अलग-अलग गुण हो।

4. सामाजिक अपवर्जन या बहिष्कार क्या है ? 

Ans. सामाजिक अपवर्जन-सामाजिक अपवर्जन संरचनात्मक, यानि व्यक्ति का कार्य होने की बजाय सामाजिक प्रक्रियाओं तथा संस्थाओं का परिणाम होता है। यह वचन और भेदभाव का मिला-जुला प्रतिफल है जो व्यक्तियों या समूहों को उनके अपने समाज के आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक जीवन में पूरी तरह शामिल होने से रोकता है। 

यह अनैच्छिक होता है। बहिष्कार बहिष्कृत लोगों की इच्छाओं के विरुद्ध कार्यान्वित होता है। यह उन कारकों का बखान करता है जो व्यक्ति के समूह को अन्य जनसंख्या को प्राप्त अवसरों से वंचित करते हैं। उदाहरण के लिए, शहरों तथा कस्बों में घनी व्यक्ति कभी भी पुल के नीचे सोते हुए नहीं दिखते हैं, परन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि धनी लोग फुटपाथ या पार्कों का प्रयोग करने से बहिष्कृत हैं। यदि वे चाहें तो इनका प्रयोग कर सकते हैं।

बहिष्कार से पीड़ित व्यक्ति समाज की मुख्य धारा में शामिल होना ही बंद कर देते हैं। जैसे- उच्च जाति के व्यक्ति निम्न जाति के व्यक्तियों के मन्दिरों में आने पर रोक लगा देते हैं जिससे निम्न जाति के व्यक्ति अपने मन्दिर व चर्च, मस्जिद इत्यादि बना लेते हैं या अन्य धर्म को अपना लेते हैं। ऐसी स्थिति बहिष्कार व अपमान के लंबे अनुभव से ही उपजती है। 

बहिष्कार बहिष्कृत व्यक्ति की इच्छा अनिच्छा की तरफ ध्यान नहीं देता। भारत में अन्य समाजों की अपेक्षा भेदभाव तथा बहिष्कार चरम रूप में पाया जाता है। इन सबकी समाप्ति केवल परिवर्तन, जागरूकता एवं संवेदनशीलता व एक सतत् सामाजिक अभियान के द्वारा ही हो सकती है। 

5. आज जाति और आर्थिक असमानता के बीच क्या संबंध है ?

Ans. जाति एक विशिष्ट भारतीय सामाजिक संस्था है जो विशेष जातियों में पैदा हुए व्यक्तियों के विरुद्ध भेदभावपूर्ण व्यवहार को लागू करती है एवं उसे न्यायसंगत ठहराती है। ऐतिहासिक व्यवहार में सामाजिक तथा आर्थिक प्रस्थिति एक-दूसरे के अनुरूप होती थी। सामाजिक तथा आर्थिक प्रस्थिति में घनिष्ठ संबंध था। 

उच्च जातियाँ निर्विवाद रूप से उच्च आर्थिक प्रस्थिति की थीं, जबकि निम्न जातियाँ निम्न आर्थिक स्थिति की होती थीं। 19वीं सदी से जाति तथा व्यवसाय के मध्य संबंध काफी हल्के हुए हैं। इसके अतिरिक्त, पहले की अपेक्षा जाति तथा आर्थिक स्थिति के सह-संबंध कमजोर हुए हैं। 

प्रत्येक जाति में अमीर व गरीब समान रूप से पाए जाते हैं। जाति वर्ग का परस्पर संबंध बृहत् स्तर पर पूरी तरह कायम है। व्यवस्था की कमी के कारण यह कम हुआ है, परन्तु विभिन्न सामाजिक-आर्थिक समूहों के बीच जातीय

अंतर अभी भी समान रूप से बना हुआ है। अतः आज जाति और आर्थिक असमानता के बीच जहाँ कई समूहों में संबंध कमजोर पड़े हैं वहीं कई समूहों में इनकी स्थिति पहले जैसी है। 

6. अस्पृश्यता क्या है ?

Ans. अस्पृश्यता-जाति व्यवस्था के भीतर एक सामाजिक प्रथा, जिसके द्वारा कथित निम्न जातियों के सदस्य कर्मकांडीय दृष्टि से इतने अपवित्र माने जाते हैं कि केवल छूने भर से कथित उच्च जाति लोगों को अपवित्र या प्रदूषित कर देते हैं। अछूत जातियाँ सामाजिक पैमाने पर सबसे नीचे की श्रेणी में आती हैं और इन्हें अधिकांश सामाजिक संस्थाओं से बाहर रखा जाता है। 

अस्पृश्यता को छुआछूत भी कहा जाता है। अस्पृश्य मानी जाने वाली जातियों का अधिक्रम जाति व्यवस्था में कोई स्थान ही नहीं है। उन्हें इस व्यवस्था से अलग ही रखा जाता है। उच्च जाति के किसी भी व्यक्ति द्वारा अस्पृश्य जाति के व्यक्ति को छूने से उसे भी अशुद्ध ही माना जाता है। इससे उसे फिर से शुद्ध होने के लिए कोई शुद्धीकरण क्रियाएँ करनी होती हैं।

अस्पृश्य जातियों के साथ काफी भेदभाव बरता जाता है, जैसे- उन्हें पेयजल के स्रोतों से पानी नहीं लेने दिया जाता। वे सामूहिक धार्मिक पूजा व उत्सवों में भाग नहीं ले सकते। उनसे अनेक छोटे-छोटे काम जबरदस्ती करवाना इत्यादि । अनादर और अधीनतासूचक अनेक कार्य सार्वजनिक रूप से कराना ही अस्पृश्यता का महत्त्वपूर्ण अंग है।

7. जातीय विषमता को दूर करने के लिए अपनाई गई कुछ नीतियों का वर्णन करें। 

Ans. जातीय विषमता को दूर करने के लिए पहले भी कई नीतियाँ बनाई गई थी, परन् 1990 के दशक के प्रारंभिक वर्षों से अन्य पिछड़े वर्गों के लिए अन्य अनेक कार्यक्रम भी ज दिए गए हैं जो इस प्रकार हैं- 

(1) पुराने एवं वर्तमान जातीय भेदभाव दूर करने के लिए ‘आरक्षण’ सुविधा प्रदान की गई है। इसके अंतर्गत सार्वजनिक जीवन के विभिन्न पक्षों में अनुसूचित जातियों और जनजातियों के सदस्यों के लिए कुछ स्थान या सीटें निर्धारित कर दी जाती हैं। इन आरक्षणों में के

अलग-अलग विभाग में अलग-अलग आरक्षण दिए जाते हैं, जैसे-

(क) राज्य और केन्द्रीय विधानमंडलों में सीटों का आरक्षण ।

(ख) शैक्षिक संस्थाओं में सीटों का आरक्षण। 

(ग) सभी विभागों और सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनियों के अंतर्गत सरकारी सेवा में नौकरियों का आरक्षण। 

(2) अन्य कानून जो जातीय भेदभाव, अस्पृश्यता को खत्म करने के लिए बनाए गए हैं। 1850 का जातीय निर्योग्यता निवारण अधिनियम, इसके अंतर्गत यह व्यवस्था थी कि केवल वर्म के आधार पर या जाति के आधार पर नागरिकों के अधिकारों को कम नहीं किया जायेगा।

(3) 93वाँ संशोधन उच्चतर शिक्षा की संस्थाओं में पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण लागू करने के लिए किया गया। 

(4) सरकारी स्कूलों में दलितों की भर्ती के लिए 1850 का अधिनियम बनाया गया। 

(5) 1989 का अनुसूचित जाति और जनजाति अधिनियम व 1950 में भारत का संविधान इन जनजातियों के हितों को ध्यान में रखकर बनाया गया था। 

(6) 1989 के अत्याचार निवारण अधिनियम ने दलितों और आदिवासियों के विरुद्ध हिंसा और अपमानजनक कार्यों के लिए दंड देने के उपबंधों में संशोधन करके उन्हें और मजबूत बना दिया। इस प्रकार जातीय विषमता को दूर करने के लिए नई नीतियाँ व कानून बनाए गए जिससे जनजातीय, जातीय समूहों को कुछ सुविधाएँ व प्रावधान देने का प्रयत्न किया गया। 

8. अन्य पिछड़े वर्ग, दलितों (या अनुसूचित जातियों) से भिन्न कैसे हैं ?

Ans. अन्य पिछड़े वर्ग वे हैं जिनके साथ काफी भेदभाव बरता जाता था, परन्तु उन्हें अटूत नहीं समझा जाता था। इन पिछड़े वर्गों को नीचा समझा जाता था। ये अनुसूचित जातियों व जनजातियों से अलग वे वर्ग हैं जिन्हें सामाजिक सुविधाएँ प्राप्त नहीं हैं। 

वे अपना निर्वाह गरीबी में व पिछड़े क्षेत्रों में रह कर ही करते हैं। अन्य पिछड़े वर्गों को नकारात्मक दृष्टि से ही देखा जाता है। इनकी तरफ कोई ध्यान नहीं दिया जाता। वे न तो जाति क्रम में ‘अगड़ी’ कही जानेवाली ऊँची जातियों के हिस्से हैं और न ही निम्नतम सोपान पर स्थित दलितों के अंतर्गत आते हैं। कहा जा सकता है कि समाज में सबसे निम्न स्तर पर पाई जाने वाली जातियों में पिछड़े वर्गों को रखा गया है।

पिछड़े वर्गों के समूह जाति पर आधारित नहीं होते, परन्तु इन्हें आमतौर पर जाति के नाम से ही पहचाना जाता है। इन्हें ‘सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों’ की संज्ञा दी गई है। इसके अतिरिक्त, अनुसूचित जातियों के साथ धर्म, जाति के आधार पर भेदभाव कम ही वरता जाता है। 

इन जातियों को सामाजिक सुविधाएँ भी प्राप्त हैं। जहाँ पिछड़े वर्गों के अधिकतर समूह गरीबी में ही रहते हैं या निर्वाह करते हैं, वहीं अनुसूचित जनजातियों या दलित में ऐसा नहीं है। इन जातियों में कुछ समूह ऐसे भी हैं जो गरीबी रेखा के ऊपर है व कुछ समूहों की आर्थिक स्थिति काफी अच्छी है।

“पिछड़ी जातियों के विभिन्न धर्मों में पाए जाने का कारण यह है कि अब इन जातियों के विभिन्न समूहों ने अपने अनुसार विभिन्न धर्मों को अपना लिया है।

अब इन जातियों की भी न परम्परागत व्यावसायिक पहचान होती है। परन्तु इनकी सामाजिक-आर्थिक उपस्थिति भी जैसी है और कुछ समूहों की प्रस्थिति पहले से भी ज्यादा बदत्तर है। इन्हीं कारणों से पिछड़े वर्ग, दलितों व अनुसूचित जातियों की अपेक्षा अधिक विविधतापूर्वक 5 है। 

9. आज आदिवासियों से संबंधित बड़े मुद्दे कौन से हैं?

Ans. आदिवासी से अनेक बड़े मुद्दे संबंधित हैं जो इस प्रकार हैं-

(i) आदिवासी इलाकों की जनजातीय आबादी काफी घनी है। इनकी आबादी या संख्या नी अधिक है कि इनकी आर्थिक और सामाजिक हालत, गैर जनजातीय लोगों की अपेक्षा की बदतर है। ये लोग बाहरी दुनिया व समाज से बिल्कुल ही कटे हुए हैं। इन लोगों को न कोई आरक्षण दिया गया है, न ही किसी क्षेत्र में नौकरी के अवसर प्रदान किए गए हैं। 

(ii) इन आदिवासी इलाकों का प्रमुख व्यवसाय इनके आस-पास के वनों में मिलने वाले योगी पदार्थों की बाजारी ही है। परन्तु औपनिवेशिक काल में इन आदिवासियों की भूमि पर विकार व वहाँ के आसपास के वनों की कटाई के कारण इनकी आजीविका के मुख्य आधार न्न लिए गए व इनके जीवन को पहले की अपेक्षा और अधिक अभावपूर्ण और असुरक्षित बना या गया।

(iii) गरीबी और शोषण की परिस्थितियों में इन आदिवासियों को गुजर-बसर करने के लिए जबूर किया गया है। इसके लिए इनकी भूमि व वनों को सरकार द्वारा आरक्षित कर वहाँ इमारतों भवनों, उद्योगों का निर्माण कार्य शुरू कर दिया गया है। 

(iv) अपनी आजीविका के स्रोतों के लिए इन आदिवासी लोगों ने वनों का अवैध रूप से स्तेमाल करना शुरू कर दिया है। सरकार द्वारा स्वतंत्रता लेने से वह स्थिति उत्पन्न हुई है जिससे न जातियों को अब चोर, घुसपैठिए कहकर दंडित किया जाने लगा है।

(v) सरकार द्वारा नयी खनन, बाँध परियोजनाओं इत्यादि को पूरा करने के लिए आदिवासी मियाँ अधिकृत कर ली गई। इसमें लाखों आदिवासियों को पर्याप्त मुआवजे और समुचित पुनर्वास की व्यवस्था के बिना ही विस्थापित कर दिया गया। 

10. नारी आंदोलन ने अपने इतिहास के दौरान कौन-कौन से मुद्दे उठाए हैं ? 

Ans. प्रारंभिक नारी-अधिकारवादी दृष्टिकोण के साथ-साथ भारत में अनेक नारी संगठन भी थे जो बीसवीं सदी के प्रारंभिक वर्षों में अखिल भारतीय एवं स्थानीय स्तरों पर उभर आए थे और फिर स्त्रियों का राष्ट्रीय आंदोलनों में भाग लेना शुरू हुआ। 1970 के दशक में स्त्रियों

के बिना बनाए गए मुद्दे फिर भी भड़क उठे जो इस प्रकार हैं- 

(i) 19वीं सदी के सुधार आंदोलनों में सती, बाल-विवाह जैसे परम्परागत कुरीतियों अथवा विधवाओं के साथ बुरे व्यवहार को रोकने का प्रयत्न किया गया।

(ii) आधुनिक मुद्दों, पुलिस अभिरक्षा में स्त्रियों के साथ बलात्कार, दहेज के लिए हत्या, असमान विकास के लैंगिक परिणाम, लोकप्रिय माध्यमों का प्रतिनिधित्व आदि की ओर विशेष ध्यान आकर्षित किया गया।

(iii) 1980 के दशक के बाद कानून सुधार करने पर विशेष बल दिया गया। इसका कारण था कि स्त्रियों के प्रावधान के लिए जो कानून बनाए गए थे, उन पर विशेष ध्यान नहीं दिया गया। उन प्रावधानों को अपरिवर्तित रूप में ज्यों का त्यों ही रखा गया है।

अतः नारी आंदोलन में ऐसे अनेक मुद्दे उठाए गए हैं जो स्त्रियों के पक्षों में थे और उन और कोई ध्यान नहीं दिया गया। इन आंदोलनों को उठाने का मुख्य कारण नारी जाति की स्ि में सुधार करना ही है। 

11. हम यह किस अर्थ में कह सकते हैं कि “असक्षमता जितनी शारीरिक है, ही सामाजिक थी? 

Ans असमझता—इसका अर्थ है-शरीर के अपंग होना अर्थात् किसी कार्य को करने के पूर्ण रूप से सक्षम न होना। एक शारीरिक रूप से अपंग व्यक्ति के लिए असक्षमता पूरे परिक्षा के लिए पृथक्करण और आर्थिक दबाव को बढ़ाते हुए गरीबी की स्थिति पैदा करके उसे 30 गंभीर बना देती है। यह तर्क उचित है कि एक अपंग व्यक्ति के लिए सामाजिक भेदभाव है। 

जिस प्रकार एक व्यक्ति शारीरिक रूप से कष्ट झेलता है, उसी प्रकार उसे समाज तरफ से भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। अक्षम व्यक्ति को हमेशा पीड़ित व्यक्ति द रूप में देखा जाता है। 

संस्कृति में जहाँ शारीरिक पूर्णता का आदर किया जाता है, वहीं पूर्ण शरीर न हो पर उसमें कोई असामान्य दोष या खराबी होने की बात सोची जाती है। पीड़ित व्यक्तियों के लिए “बेचारा’ शब्द इस्तेमाल करना उसकी परिस्थिति को और भी विकट बना देता है। समाज में धारणा रखी जाती है कि अपंग व्यक्ति की अपंगता उसके पुराने जन्मों या कर्म का फल है असमर्थ व अक्षम शरीर अर्थात् व्यक्ति को दुर्भाग्य का परिणाम माना जाता है।

अपंग व्यक्तियों के लिए मंदबुद्धि, अपंग सँगड़ा तूला आदि शब्दों का प्रयोग किया जात है। भारत में प्रचलित प्रमुख सांस्कृतिक विचारधारा एवं संरचना विकलांगता को आवश्यक रू से व्यक्ति की विशेष स्थिति मानती है जिसे अपंग व्यक्ति को झेलना पड़ता है, जैसे- अपंगद पुराने जन्मों का कर्म या किसी व्यक्ति पर अत्याचार करने से स्वयं के साथ घटित हुई घटन से अपंगता इत्यादि। विकलांग व्यक्ति अपनी जैविक अक्षमता के कारण विकलांग नहीं होते, बल्दि समाज की भावना व भेदभाव के कारण ही वे विकलांग बन जाते हैं।


अति लघु उत्तरीय प्रश्न (VERY SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS)


1. भारत में अन्य स्थानों व क्षेत्रों में गरीब लोगों के साथ हो रहे अन्याय के तीन उदाहरण दीजिए। 

Ans. (क) नगरीय मध्य वर्ग के घरों में घरेलू नौकर के रूप में गरीब बच्चों से ही कार्य करवाया जाता है। 

(ख) सड़क के किनारे बने ढाबे, चाय की दुकानों, भवन निर्माण में मजदूरी इत्यादि कार्य भी इन्हीं गरीब लोगों व बच्चों से करवाए जाते हैं। 

(ग) रेलवे पटरियों व प्लेटफार्म पर व गलियों में मिखारी।

2. आपके विचार में निम्न स्तर के लोग या गरीब व्यक्ति अपनी स्थिति सुधारने के लिए परिश्रम करते हैं। उचित तर्क दें।

Ans. यह तर्क उचित है कि निम्न स्तर व गरीब व्यक्ति परिश्रम करते हैं और यदि का जाए तो यही लोग अत्यधिक परिश्रम करते हैं। परन्तु कई व्यक्तियों की यह धारणा होती है कि गरीब लोग अपनी स्थिति को सुधारने के लिए पर्याप्त परिश्रम नहीं करते। परन्तु अमीर व्यक्तिय के लिए इमारतें, भवनों के निर्माण में पत्थर तोड़ना, खुदाई करना, भारी वजन उठाना जैसे कमरतोड़ काम इन्हीं निम्न स्तर या गरीब व्यक्तियों के द्वारा ही किए जाते हैं।

3. सामाजिक संसाधन क्या होते हैं ? इनके रूपों का उल्लेख कीजिए। 

Ans. प्रत्येक समाज में कुछ लोगों के पास धन, सम्पदा, शिक्षा, स्वास्थ्य एवं शक्ति जैसे मूल्यवान संसाधन होते हैं जिन्हें सामाजिक संसाधन कहा जाता है। यह सामाजिक संसाधन पूँजी तीन रूपों में विभाजित किए जा सकते हैं- 

(1) भौतिक संपत्ति एवं आय के रूप में आर्थिक पूँजी,

(ii) प्रतिष्ठा और शैक्षणिक योग्यताओं के रूप में सांस्कृतिक पूंजी, 

(iii) सामाजिक संगतियों और संपर्कों के जाल के रूप में सामाजिक पूंजी। 

4. सामाजिक विषमता’ को परिभाषित कीजिए व सामाजिक स्तरीकरण का अर्थ सम्झाइए । 

Ans. सामाजिक विषमता सामाजिक संसाधनों तक असमान पहुँच की पद्धति ही साधारणतया सामाजिक विषमता कहलाती है। इन सामाजिक संसाधनों में धन सम्पदा, शिक्षा, शक्ति एवं रोजगार इत्यादि शामिल होते हैं।

सामाजिक स्तरीकरण- एक समाज में रह रहे लोगों का वर्गीकरण करके उन्हें एक अधिक्रमित संरचना में बाँटना सामाजिक स्तरीकरण कहलाता है। यह अधिक्रम लोगों की पहचान, अनुभव, एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति से संबंध तथा साथ ही संसाधनों एवं अवसरों तक उनकी पहुँच को साकार देता है।

15. “सामाजिक स्तरीकरण पीढ़ी-दर-पीढ़ी बना रहता है।” इस तर्क को स्पष्ट कीजिए। 

Ans. स्तरीकरण परिवार और सामाजिक संसाधनों से घनिष्ठता से जुड़ा है। अर्थात् सामाजिक संसाधनों का पीढ़ी-दर-पीढ़ी कोई न कोई उत्तराधिकार बनता रहता है। प्रत्येक व्यक्ति की सामाजिक स्थिति या प्रदत्त अर्थात् वे पहचान जो जन्म से ही निर्धारित होती है, अपने परिवार से ही प्राप्त होती है। 

जन्म ही व्यावसायिक अवसरों को निर्धारित करते हैं, जैसे- दलितों में सफाई, चमड़े का कार्य, मजदूर इत्यादि का कार्य। अतः यह तर्क उचित है कि स्तरीकरण पीढ़ी-दर-पीढ़ी बना रहता है। अर्थात् हमारी पहचान, व्यवसाय, गुण इत्यादि हमारी ही अगली पीढ़ी को अपनाने पड़ते हैं।

6. पूर्वाग्रह को परिभाषित कीजिए। 

Ans. पूर्वाग्रह — इस शब्द का उचित अर्थ है- ‘पूर्वनिर्णय’ अर्थात् ‘पहले ही निर्णय लेना’ ।

एक समूह के सदस्यों द्वारा दूसरे समूहों के सदस्यों के बारे में पूर्वनिर्णय लेना या व्यवहार इत्यादि ‘पूर्वाग्रह’ कहलाता है। इसमें किसी व्यक्ति या समूह को जाने या पहचाने बिना ही नकारात्मक सोच या व्यवहार बना लिया जाता है। यह मनोवृत्ति और विचारों को दर्शाता है। 

7. रुढ़िबद्ध धारणाओं से आप क्या समझते हैं ?

Ans. रुढ़िबद्ध धारणाएँ- रूढ़िबद्ध धारणाएँ लोगों के एक समूह का निश्चित और अपरिवर्तनीय स्वरूप रुढ़िबद्ध वारणाएँ ज्यादातर नृजातीय और प्रजातीय समूहों और महिलाओं के संबंध में प्रयोग की जाती है। रुढ़िबद्ध धारणा पूरे समूह को एक समान रूप से स्थापित कर देती है। इस रुढ़िबद्ध धारणा के अंतर्गत व्यक्तिगत समयानुसार या परिस्थिति अनुरूप भिन्नता को भी नकार दिया जाता है।

8. ‘भेदभाव’ शब्द का अर्थ स्पष्ट कीजिए।

Ans. भेदभाव — भेदभाव एक समूह या व्यक्ति के प्रति किया गया व्यवहार कहलाता है। यह व्यवहार सकारात्मक व नकारात्मक दोनों प्रकार के हो सकते हैं। भेदभाव के तहत एक समूह को उन सुविधाओं, नौकरियों से वंचित किया जा सकता है जो दूसरे समुदाय या जाति के लोगों के लिए खुले होते हैं। उदाहरण के लिए, किसी क्षेत्र में एक समूह के व्यक्ति को नौकरी देना व दूसरे समूह के व्यक्ति को मना कर देना।

9.सामाजिक बहिष्कार क्या है? 

Ans. सामाजिक बहिष्कार—वे तौर-तरीके जिनके जरिए किसी व्यक्ति या समूह में पूरी तरह पुलने-मिलने से रोका जाता है। इन तरीकों के कारण किसी समूह का अन्य समू से पृथक् या अलग रखा जाता है। यह किसी व्यक्ति या समूह को उन अवसरों या सुविधाओ से वंचित करते हैं जो अधिकांश जनसंख्या के लिए खुले होते हैं या अधिकांश जनसंख्या को प्राप्त होते हैं। सामाजिक बहिष्कार लोगों की इच्छाओं के विरुद्ध होता है। 

10. दलितों या निम्न जातियों के साथ धर्म से संबंधित कोई एक अपमानजनक व्यवहार

Ans. दलितों व निम्न जातियों के लिए उच्च जाति के हिन्दू समुदायों ने मन्दिरों में प्रवेश पर पाबन्दी लगा दी है। विशेष रूप से दलित समुदायों के लिए यह पाबन्दी लगाई गई है। इससे प्रभावित होकर दलित समुदायों ने अन्य धर्म अपना लिए हैं। 

11. ‘जाति’ शब्द का अर्थ स्पष्ट कीजिए ।

Ans. जाति–जाति व्यवस्था एक प्रकार की भारतीय सामाजिक संस्था है। यह विशेष जातियों में पैदा हुए व्यक्तियों के विरुद्ध भेदभावपूर्ण व्यवहार को अपनाती है। भेदभाव में कर प्रकार, जैसे—अपमानजनक, गठिधकारी शोषणकारी इत्यादि, शामिल हैं । समय के साथ-साथ जाति व्यवस्था में भी परिवर्तन आए हैं। 

12. ‘जनजाति’ को परिभाषित कीजिए। 

Ans. जनजाति–एक सामाजिक समूह जिसमें कई परिवार, कुल (वंशज) शामिल हों और नातेदारी, सजातीयता, सामान्य इतिहास अथवा प्रादेशिक-राजनीतिक संगठन के साझे संबंधों पर आचारित हो । जाति परस्पर अलग-अलग जातियों की अधिक्रमिक व्यवस्था है, जबकि जनजाति एक समावेशात्मक समूह होती है। 

13. किसी जाति का उस जाति के व्यवसाय से क्या सम्बन्ध था ? 

Ans. जाति व्यवस्था किसी भी जाति के व्यक्तियों का उनके व्यवसाय तथा प्रस्थिति के आधार पर वर्गीकरण करती थी। प्रत्येक जाति एक व्यवस्था से जुड़ी थी। इसका तात्पर्य है कि एक विशेष जाति में जन्मा व्यक्ति उस व्यवसाय में भी जन्म लेता था जो उस जाति से जुड़ा था। अर्थात् उसे अपनी जाति के व्यवसाय को ही अपनाना होता था, परन्तु आज आधुनिक काल में जति तथा व्यवसाय के बीच सम्बन्ध काफी ढीले हुए हैं। 

14. आज जाति व्यवस्था में कौन-कौन से परिवर्तन हुए हैं ? उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए। 

Ans. आधुनिक काल के साथ-साथ जाति व्यवस्था में काफी परिवर्तन हुए हैं जो इस प्रकार है- 

(i) जाति तथा व्यवसाय के बीच की कड़ी काफी कमजोर हुई है। इसके सम्बन्ध व्यवसाय से अधिक मजबूत नहीं हैं। 

(ii) जाति तथा आर्थिक स्थिति के सह-संबंध काफी कमजोर हुए हैं अर्थात् आज गरीब व अमीर लोग हर जाति में पाए जाते हैं। 

(iii) पहले की अपेक्षा अब जाति में व्यवसाय परिवर्तन आसान हो गया है, अर्थात् अब एक जाति के व्यक्ति दूसरे व्यवसाय को भी अपना सकते हैं।

15. क्या आपके विचार में सामाज में व्यापक रूप से परिवर्तन हुआ है ? अपने तर्क के पक्ष में उत्तर दीजिए ।

Ans. यह सही है कि समाज निश्चित रूप से बदला है, परन्तु व्यापक स्तर पर बदलाव बहुत ही निम्न है। जैसे—आज भी ऊँची व नीची जातियों के गरीब और अमीर व्यक्तियों के बीच के अनुपात में जमीन-आसमान का फर्क है। समाज के सम्पन्न व ऊँचे पदों वाले वर्ग में उच्च जाति के लोग व वंचित तथा निम्न आर्थिक स्थिति वाले वर्गों में निम्न जातियों की अधिकता है।

16. राजनीतिक नियंत्रण को सुनिश्चित करने के लिए अल्पसंख्यक श्वेतों ने किस नीति को अपनाया व कब इसे मान्यता दी गई ?

Ans. राजनीतिक नियंत्रण को सुनिश्चित करने के लिए अल्पसंख्यक श्वेतों ने रंगभेद अथवा प्रजाति के पृथक्करण की नीति को विकसित किया। यह नीति कई वर्षो तक अनौपचारिक व्यवहार ये रही। 

1948 में इस नीति को कानूनी मान्यता दी गई। प्रत्येक व्यक्ति का प्रजाति के आधार पर वर्गीकरण किया गया तथा मिश्रित विवाह पर पाबंदी लगा दी गई।

17. अस्पृश्य व्यक्तियों के प्रति अपनाए जाने वाले अपमानजनक व्यवहारों के बारे में बताइए ।

Ans. अस्पृश्य यानि अछूत व्यक्तियों का जाति सोपान या अधिक्रम में कोई स्थान नहीं है। उन्हें इस व्यवस्था से बाहर रखा जाता है। 

इनके अन्य उच्च जातियों को छू जाने से ही अन्य जातियों के सभी सदस्य अशुद्ध हो जाते हैं। जो व्यक्ति हुआ गया है उसे फिर से शुद्ध होने के लिए कई शुद्धीकरण क्रियाएँ करनी होती हैं। इसके अतिरिक्त अछूत कहे जाने वाले व्यक्ति को कठोर दंड भुगताना पड़ता है।

18. अस्पृश्यता के तीन मुख्य आयाम बताइए 

Ans. अस्पृश्यता के तीन मुख्य आयाम इस प्रकार हैं-

(i) अपवर्जन या बहिष्कार, 

(ii) अनादर,

(iii) अधीनता और शोषण ।

19. दलित वर्गों के साथ क्या-क्या शोषण या अपमानजनक व्यवहार किए जाते हैं ? 

Ans. (i) उन्हें पेयजल के स्रोतों से जल नहीं लेने दिया जाता व न ही पीने दिया जाता । उनके कुएँ, नल इत्यादि अलग बने होते हैं।

(i) उन्हें धार्मिक उत्सवों, पूजा-आराधना, सामाजिक समारोहों में भाग नहीं लेने दिया जाता। (iii) उनसे किसी विवाह शादी में नगाड़े बजवाना, धार्मिक उत्सवों में छोटे काम इत्यादि करवाए जाते हैं।

(iv) इसके अतिरिक्त उन्हें बड़े व्यक्तियों के सामने पगड़ी उतारकर, पहने हुए जूतों को हाथ में पकड़कर, सिर झुकाकर खड़े रहने व साफ कपड़े च पहन के जाना, इत्यादि कार्यों को करने के लिए जबरदस्ती की जाती है। 

20. अस्पृश्य जातियों के लिए विभिन्न महापुरुषों द्वारा कौन-कौन से शब्द प्रयोग में लाए गए ?

Ans. अस्पृश्य जातियों को काफी समय से भिन्न-भिन्न नामों से पुकारा जाता रहा है, परन्तु 1930 के दशक में, महात्मा गाँधी ने इन निंदात्मक आरोपों को दूर करने के लिए इन्हें ‘हरिजन’ नाम दिया, जिसका अर्थ है ‘परमात्मा के बच्चे’। इसके अतिरिक्त भूतपूर्व अस्पृश्य समुदायों के नेताओं ने इन जातियों को ‘दलित’ शब्द का स्वरूप दिया जिसे आमतौर पर स्वीकार कर लिया गया। 

1970 के दशक में मुंबई में हुए जातीय दंगों के दौरान ‘दलित’ शब्द का प्रयोग व्यापक रूप से किया गया था। यह शब्द उत्पीड़न के भाव को दर्शाता है जिसका अर्थ है ‘पैरों से कुचला हुआ

21. अनुसूचित जातियों व पिछड़े वर्गों के लिए स्वतन्त्रता प्राप्ति से पूर्व व पश्चात् कौन से प्रावधान किए गए ? 

Ans. स्वतन्त्रता प्राप्ति से पूर्व 1935 में अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए ‘अनुसूचियाँ’ तैयार की गई जिनमें जनजातियों व जातियों के विरुद्ध बड़े पैमाने पर बरते जा रहे भेदभाव के कारण को दूर करने के लिए विशेष प्रावधान किए गए थे।

22. जनजातियों के लिए आरक्षण का अर्थ समझाइए ।

Ans. राज्य की ओर से जनजातियों के लिए कई क्षेत्रों में आरक्षण का प्रावधान है, जिनके अनुसार अनुसूचित जातियों व जनजातियों के लिए सार्वजनिक जीवन के विभिन्न पक्षों में स्थान व सीटें निर्धारित कर दी जाती हैं। 

इन स्थानों पर केवल अनुसूचित जातियों व जनजातियों का ही अधिकार होता है। इन स्थानों से सरकारी नौकरियाँ, शैक्षिक स्थानों में सीटें, विधानसभा, कुछ लोकसभा में सीटें इत्यादि सम्मिलित होती हैं।

23. अस्पृश्यता या जातीय भेदभाव को कम करने के लिए बनाए गए कानूनों के बारे में बताइए ।

Ans. 1850 ‘जातीय योग्यता निवारण अधिनियम’ अर्थात् जाति या धर्म के आधार पर नागरिकों के अधिकार को कम न करना।

(ii) 1950 ‘भारत का संविधान’। (iii) 1989

‘अनुसूचित जाति और जनजाति अधिनियम’। इसके अन्तर्गत अनुसूचित जातियों व जनजातियों के प्रति अत्याचार के निवारण के प्रावधान दिए गए।

24. उन दलित नेताओं व समिति के नाम बताइए जिन्होंने दलितों के लिए विभिन्न आंदोलन चलाए।

Ans. दलित लोग स्वयं भी राजनीतिक, आंदोलन और सांस्कृतिक मोर्चों पर सक्रिय हुए हैं। इनमें ज्योतिबा फूले, इयोतीदास, पेरियार, अंबेडकर जैसे दलित नेता शामिल हैं। स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् भी उत्तर प्रदेश की बहुजन समाज पार्टी और कर्नाटक की दलित संघर्ष समिति जैसे समकालीन राजनीतिक संगठनों द्वारा चलाए जाते रहे हैं। 

25. अन्य पिछड़े वर्गों के कल्याण के लिए क्या-क्या उपाय किए गए थे ?

Ans. जवाहर लाल नेहरू के प्रधानमंत्री बने रहने के काल के दौरान स्वतंत्र भारत की पहली सरकार ने अन्य पिछड़े वर्गों के कल्याण के उपाय सुझाने के लिए एक आयोग स्थापित किया था। 1970 के दशक के आखिरी वर्षों में आपात्काल के बाद जनता पार्टी ने शासन की बागडोर सँभाली। 

बी. पी. मंडल की अध्यक्षता में पिछड़े वर्ग आयोग नियुक्त किया गया। 1990 में केन्द्रीय सरकार ने मंडल आयोग की रिपोर्ट को कार्यान्वित किया व उसके पश्चात् पिछड़े वर्ग का मुद्दा राष्ट्रीय राजनीति में एक प्रमुख विषय बन गया। 

26. आदिवासियों को किन पहचानों के आधार पर जाना जाता है ?

Ans. आदिवासी जातियों को अनुसूचित जनजातियों की श्रेणी में रखा गया है। अनुसूचित जातियों की भाँति इन्हें भी भारतीय संविधान द्वारा विशेष रूप से निर्धनता, शक्तिहीन तथा पीड़ित समूहों के रूप में पहचाना जाता है। इन आदिवासियों को ऐसा ‘वनवासी’ समझा गया जिनके पहाड़ी या जंगली इलाकों के विशिष्ट परिस्थितियों में आवास ने उनकी आर्थिक, सामाजिक व राजनीतिक विशेषताओं को आकार दिया।

27. आदिवासियों के साथ सरकार या अन्य उच्च वर्गों की तरफ से कौन-कौन अपमानजनक बर्ताव किए गए ?

Ans. उच्च वर्गों व सरकार की ओर से इन आदिवासियों से विकास परियोजनाओं का हवाला देते हुए बनों को छीन लेना, भूमि का अपहरण, निर्वाह क्षेत्रों पर अधिकार इत्यादि सुविधाएँ छीन ली गई हैं। यही कारण है कि अनेक जनजातीय समूह सरकार के विरुद्ध संघर्ष करते हैं। आदिवासियों को अधीन करके उनके संसाधनों को छीन लिया गया। स्वतन्त्रता प्राप्ति से पूर्व व पश्वात् इनकी स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं आया है बल्कि स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् इनकी स्थिति और अधिक बदतर हो गई है। 

28. आदिवासियों के द्वारा चलाए गए आंदोलनों की किसी एक उपलब्धि का वर्णन कीजिए ।

Ans. आदिवासियों ने अपने साथ हुए अन्याय के विरुद्ध कई आंदोलन चलाए जिनमें से एक आंदोलन में उन्हें सर्वाधिक बड़ी उपलब्धि प्राप्त हुई। यह उपलब्धि थी- झारखंड और छत्तीसगढ़ के लिए अलग राज्य का दर्जा प्राप्त करना। 

इससे पहले यह दोनों राज्य क्रमशः बिहार और मध्य प्रदेश राज्यों के हिस्से थे। 

29. आदिवासी समुदाय के साथ घटी किसी एक दर्दनाक घटना का उल्लेख कीजिए ।

Ans. 2 जनवरी, 2006 को जब उड़ीसा राज्य के आदिवासी स्टील कंपनी द्वारा उनकी कृषि भूमि लिए जाने का विरोध कर रहे थे तो पुलिस ने आदिवासियों पर गोलियाँ चलाई जिसमें बारह आदिवासियों को मौत के घाट उतार दिया गया। 

इसका कारण था कि आदिवासियों ने  दिनों से कलिंगनगर राजमार्ग को रोके रखा था और उद्योगपति अपना निर्माण कार्य शीघ्र ही शुरू करवाना चाहते थे। मारे गए आदिवासियों के शवों के हाथ व अन्य गुप्तांग काट दिए गए थे जिससे पुलिस या सरकार यह दिखाना चाहती थी कि वह कुछ भी कर सकती है।

30. स्त्रियों के अधिकारों के लिए समाज सुधारकों द्वारा क्या-क्या प्रयत्न किए गए ? 

Ans. अनेक समाज सुधारकों के कानूनों, आंदोलनों इत्यादि का सहारा लेकर स्त्रियों के अधिकारों को समाज के प्रत्यक्ष रखने का प्रयत्न किया जिनमें से कुछ इस प्रकार हैं-

समाज-सुधारक

(i) राजा राममोहन राय

(ii) बॉम्बे प्रेसिडेंसी के सुधारक ‘रानाडे’ 

(iii) ज्योतिबा फूले

(iv) सर सैयद अहमद


लघु उत्तरीय प्रश्न (SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS)


1. सामाजिक विषमता को परिभाषित कीजिए। सामाजिक संसाधन पूँजी के रूपों का उल्लेख कीजिए ।

Ans. सामाजिक विषमता सामाजिक संसाधनों तक असमान पहुँच की पद्धति ठी सामाजिक विषमता कहलाती है। सामाजिक विषमताएँ व्यक्तियों के मध्य स्वाभाविक भिन्नता को प्रतिबिंबित करती हैं। उदाहरणतया, व्यक्तियों की योग्यता एवं प्रयास में भिन्नता। 

अर्थात् कोई व्यक्ति असाधारण बुद्धिमान या प्रतिभावान हो सकता है या यह भी हो सकता है कि उस व्यक्ति ने समृद्धि और अच्छी स्थिति प्राप्त करने के लिए कठोर परिश्रम किया हो। अर्थात् योग्यता जहाँ बुद्धि से सम्बन्ध रखती है, वहीं प्रयास कठोर परिश्रम से सामाजिक विषमता व्यक्तियों के बीच उस समाज द्वारा उत्पन्न की जाती है जिसमें वे रहते हैं न कि ‘प्राकृतिक भिन्नता’ की वजह से। 

अर्थात् सामाजिक विषमता व्यक्तियों की दशा, स्थिति, रंग, शक्ल इत्यादि के आधार पर उपलब्ध नहीं की जाती। एक सामाजिक संसाधन पूँजी को तीन रूपों में विभाजित किया जा सकता है जो इस प्रकार हैं-

(1) आर्थिक पूँजी 

(2) सांस्कृतिक पूँजी। 

(3) सामाजिक पूँजी। 

(1) आर्थिक पूँजी-भीतिक सम्पत्ति व आय के रूप में।

(2) सांस्कृतिक पूंजी-प्रतिष्ठा और शैक्षणिक योग्यताओं के रूप में।

(3) सामाजिक पूँजी सामाजिक संगतियों एवं सम्पर्कों के जाल के रूप में।

पूँजी के ये तीनों रूप आपस में मिले-जुले होते हैं इसका अर्थ है, इनको एक-दूसरे में परिवर्तित किया जा सकता है। उदाहरणतया, एक व्यक्ति अपनी आर्थिक पूँजी के जरिए उच्च शिक्षा प्राप्त कर सकता है। इस प्रकार वह आर्थिक पूँजी को सांस्कृतिक रूप में बदल सकता है। इसी प्रकार कोई व्यक्ति उचित राय या निर्देशन से अच्छी नौकरी पा सकता है या धन कमाने के साधन ढूँढ सकता है जिसका अर्थ है-सामाजिक पूँजी में बदलाव । 

2. पूर्वाग्रह का अर्थ स्पष्ट कीजिए। किन-किन जातियों, समूहों को इसका शिकार होना पड़ता है ? औपनिवेशिक काल का इसमें क्या हाथ है ? 

Ans. पूर्वाग्रह- इसका अर्थ है किसी व्यक्ति या समूह के बारे में पूर्वनिर्धारित विचार रखना। ऐसे विचार जिसे कि लोग नई जानकारी प्राप्त होने पर भी बदलने को तैयार न हो अर्थात् यदि उस समूह के बारे में कोई सकारात्मक विचार सामने भी आए तो भी यह विचारधारा न बदले। पूर्वाग्रह सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह का हो सकता है, परन्तु इसका प्रयोग नकारात्मक या अनादरपूर्ण पूर्वधारणा के लिए ही होता है। यह स्वीकारात्मक पूर्वनिर्णयों पर भी लागू होता है। 

उदाहरण के तौर पर, एक व्यक्ति अपनी जाति या समूह के सदस्यों के पक्ष में पूर्वाग्रहित हो। सकता है। इसमें व्यक्ति अपनी जाति या समूह को अन्य जातियों की तुलना में श्रेष्ठ मानता है। पूर्वाग्रह के शिकार संभवतः सभी समूह व जातियाँ ही हैं। लोगों से ज्यादातर लिंग, धर्म, भाषा, जाति तथा विकलांगता के आधार पर भेदभाव व पूर्वाग्रह किया जाता है। 

एक अभिजात्य वर्ग की महिला भी सार्वजनिक स्थान पर यौन उत्पीड़न का शिकार हो सकती है। एक धार्मिक या नृजातीय अल्पसंख्यक समूह के मध्य वर्ग के पेशेवर व्यक्ति को भी महानगर की एक मध्य वर्ग कॉलोनी में रहने के लिए कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।

भारत जैसे देश में जिसमें उपनिवेश काल काफी समय तक रहा है, कई रूढ़िबद्ध विचार औपनिवेशिक काल की ही देन हैं। सढ़िबद्ध धारणाएँ ज्यादातर नृजातीय और प्रजातीय समूहों और महिलाओं के बारे में प्रयोग की जाती हैं।

 इन औपनिवेशिक काल द्वारा प्रदान सढ़िबद्ध विचारधाराओं में कुछ समुदायों को ‘वीर प्रजाति’ तो कुछ को ‘कायर’, ‘पौरुषहीन’ या ‘दगाबाज’ की संज्ञा दी गई। अंग्रेजों द्वारा किसी समुदाय को आलसी या ‘चालाक’ की संज्ञा दी जाती थी। रूढ़िबद्ध धारणाएँ किसी समूह को एक समान श्रेणी में स्थापित कर देती है। इसके अनुसार पूरे समुदाय को एकल व्यक्ति अर्थात् एक जैसा ही समझा जाता है। 

3. सामाजिक अपवर्जन या बहिष्कार को परिभाषित कीजिए। बहिष्कार से समाज में क्या-क्या असमान परिवर्तन हुए हैं ? 

Ans. बहिष्कार- ऐसे अनैच्छिक तरीके जिनके जरिए किसी व्यक्ति या समूह को अन्य समूहों या समाज से पूरी तरह घुलने-मिलने से रोका जाता है अर्थात् उन्हें अलग रखा जाता है। बहिष्कार उन कारकों को दर्शाता है जो अक्सर अधिकांश जनसंख्या के लिए तो होते हैं, परन्तु व्यक्ति या समूह को उन अवसरों से परे या वंचित रखा जाता है। 

प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में रोटी, कपड़ा इत्यादि के अलावा अन्य आवश्यक वस्तुओं और सेवाओं की आवश्यकता पड़ती है। इन सेवाओं में शिक्षा, स्वास्थ्य, यातायात के साधन, बीमा, सामाजिक सुरक्षा, बैंक इत्यादि शामिल होते हैं। 

इसके अतिरिक्त पुलिस एवं न्यायपालिका भी आवश्यक होते हैं। परन्तु इन सुविधाओं को कुछ ही समूहों के अन्तर्गत बाँटा जाता है, बाकी समूहों को इनसे अलग ही रखा जाता है या उन्हें ये सुविधाएँ मुहैया ही नहीं कराई जाता। सामाजिक भेदभाव आकस्मिक या.

अनायास रूप से नहीं बल्कि व्यवस्थित तरीके से होता है। बहिष्कार बहिष्कृत लोगों के साथ किया जाता है, वह उनकी इच्छा के विरुद्ध होता है। अर्थात् जिन अपमानजनक व्यवहारों को बहिष्कृत लोगों के साथ किया जाता है, वह उनकी इच्छा के विरुद्ध होता है। 

वे नहीं चाहते कि उनके साथ इस प्रकार का व्यवहार किया जाए। भेदभाव अथवा अपमानजनक व्यवहार का लंबा अनुभव इस तरह की प्रतिक्रिया के रूप में प्रकट होता है कि बहिष्कृत लोग व्यक्तिगत मुख्यधारा में शामिल होने के प्रयास बंद ही कर देते हैं। 

वे समाज से अलग हो जाते हैं ताकि इस प्रकार की अपमानजनक स्थिति से बचा जा सके। उदाहरण के लिए, जब ‘उच्च’ वर्गों ने भिन्न वर्गों के मन्दिरों में प्रवेश पर पाबन्दी लगा दी तो इन ‘निम्न’ वर्गों ने अन्य धर्मों को अपना लिया। कुछ दलितों ने अपने मन्दिर अलग बना लिए। अर्थात् बहिष्कार बहिष्कृत व्यक्ति की इच्छा या अनिच्छा की तरफ कोई ध्यान नहीं देता। भारतीय समाज भी बहिष्कार की बेड़ियों से पूर्ण रूप से बँधा हुआ है। यहाँ भेदभाव चरम

रूप में पाया जाता है। 

4. जाति व जनजाति को सही अर्थों में परिभाषित कीजिए। जाति व्यवस्था व्यवसाय से कैसे जुड़ी हुई थी ? इनके मध्य क्या परिवर्तन हुए हैं ?

Ans. जनजाति–एक सामाजिक समूह जिसमें कई परिवार, वंशज शामिल हों और जो नातेदारी, सजातीयता, सामान्य इतिहास अथवा प्रादेशिक राजनीतिक संगठन के साझे संबंधों पर आधारित हो। 

जाति से जनजाति इस तरह अलग है कि जाति परस्पर अलग-अलग जातियों की अधिक्रमिक व्यवस्था है, जबकि जनजाति एक समावेशात्मक समूह होती है, चाहे इसमें कुल या वंशों पर आधारित विभाजन हो सकते हैं।

जाति-जाति एक विशिष्ट भारतीय सामाजिक संस्था है जो विशेष जातियों में पैदा हुए क्तियों के विरुद्ध भेदभावपूर्ण व्यवहार को लागू करती है एवं न्यायसंगत ठहराती है। भेदभावपूर्ण से अभिप्राय अपमानजनक व्यवहार, बहिष्कारिता तथा शोषणकारिता से है। 

प्रत्येक जाति ऐतिहासिक रूप से एक व्यवसाय से जुड़ी थी। अर्थात् प्रत्येक जाति में एक व्यवसाय निर्धारित था व उस जाति के लोगों को उसी व्यवसाय को ही अपनाना पड़ता था। एक विशेष जाति में जन्मा व्यक्ति उस व्यवसाय में भी जन्म लेता था जो उसकी जाति से जुड़ा था। प्रत्येक जाति का सामाजिक प्रस्थिति में विशेष स्थान था।

आधुनिक काल में विशेष रूप से 19वीं सदी से, जाति तथा व्यवसाय के बीच की कड़ी कमजोर हुई है। आज विभिन्न जातियों में धार्मिक व व्यावसायिक प्रतिबंध लागू नहीं किए जा सकते। अब पहले की अपेक्षा व्यवसाय परिवर्तन आसान हो गया है। 

आज किसी एक विशेष जाति के व्यक्ति अपनी जाति के व्यवसाय को न अपनाकर दूसरे व्यवसायों को भी अपना सकते हैं। इसके अतिरिक्त जाति तथा आर्थिक स्थिति के सहसंबंध कमजोर हुए हैं। जहाँ पहले किसी विशेष जाति में ही अमीरों व गरीबों की संख्या पाई जाती थी वहीं अब प्रत्येक जाति में अमीर व गरीब दोनों की संख्या समान रूप से पाई जाती है। 

जाति व्यवस्था के कम सख्त होने पर सामाजिक तथा आर्थिक स्थितियों वाली जातियों के बीच फासला कम हुआ। है। 

5. दक्षिण अफ्रीका में समाज को श्रेणीबद्ध किस आधार पर किया गया है ? वहाँ बहुसंख्यक अश्वेतों के साथ किए गए अनौपचारिक व्यवहार के बारे में बताइए । Or, 1948 ई. में दक्षिण अफ्रीका में बहुसंख्यक अश्वेतों के साथ प्रजाति के आधार पर क्या-क्या अनुचित बदलाव किए गए ?

Ans. दक्षिण अफ्रीका में प्रजाति के आधार पर समाज को श्रेणीबद्ध किया गया है। दक्षिण अफ्रीका में पाई जाने वाली प्रजाति अल्पसंख्यक श्वेतों की है। अल्पसंख्यक श्वेतों का वहाँ की शक्ति एवं संपदा पर प्रबल अधिकार है। 

इन लोगों को पूर्ण अधिकार है। ये दक्षिण अफ्रीका के वनों, सुविधाओं तथा अन्य सुविधाओं का पूर्ण लाभ उठा सके। 20वीं सदी की शुरुआत में ब्रिटिश लोगों ने पहले संघ तथा बाद में दक्षिण अफ्रीकी गणराज्य पर नियन्त्रण कर लिया, परन्तु अल्पसंख्यक श्वेतों ने अपने राजनीतिक नियंत्रण को सुनिश्चित करने के लिए रंगभेद तथा प्रजाति का पृथक्करण की नीति का विकास किया। 

यह कई वर्षों तक तो अनौपचारिक व्यवहार में रहा। परन्तु बाद में 1948 में इस नीति को कानूनी मान्यता दी गई तथा बहुसंख्यक दक्षिण अफ्रीकी अश्वेतों को वहाँ की नागरिकता, जमीन के स्वामित्व तथा सरकार में शामिल होने के औपचारिक अधिकार से वंचित कर दिया गया। प्रत्येक व्यक्ति का प्रजाति के आधार पर वर्गीकरण किया गया तथा विभिन्न जातियों में होने वाले मिश्रित विवाह पर पाबन्दी लगा दी गई। श्वेतों द्वारा प्राप्त आय की तुलना में अश्वेतों अर्थात् बहुसंख्यकों की आयु एक चीचाई थी। प्रजातीय जाति के

रूप में अश्वेतों के पास कम आय वाली नौकरी थी। 20वीं सदी के उत्तरार्ध में लाखों अश्वेतों को ‘बांदुस्तान’ या ‘गृहक्षेत्रों’ में बलपूर्वक स्थापित किया गया जो गंदगी से भरा हुआ क्षेत्र था व काफी गरीब भी, जहाँ उद्योग, नौकरी व अन्य आधारभूत संरचनाएँ बिल्कुल नहीं थीं। समृद्ध अल्पसंख्यक श्वेतों ने अपने विशेषाधिकार का बचाव अश्वेतों को सामाजिक रूप

से निम्न घोषित करते हुए किया। अश्वेत विद्रोहियों को प्रतिदिन जेल में डाला जाता था और प्रताड़ित किया जाता था तथा उनकी हत्या कर दी जाती थी।

6. अस्पृश्यता का अर्थ समझाइए । अछूतों के प्रति किए जाने वाले अपमानजनक व्यवहारों के बारे में बताइए । 

Ans. अस्पृश्यता जाति-व्यवस्था का एक अत्यन्त घृणित एवं दूषित पहलू जो धार्मिक एवं कर्मकांडीय दृष्टि से शुद्धता एवं अशुद्धता के पैमाने पर सबसे नीची मानी जानी वाली जातियों के सदस्यों के विरुद्ध अत्यन्त कठोर सामाजिक दंडों का विधान करता है। 

‘अस्पृश्यता’ को ‘छुआछूत’ शब्द से भी जाना जाता है व अधिकतर नीची जातियों के लिए अछूत शब्द का प्रयोग किया जाता है। अस्पृश्य या अछूत जातियों को जाति अधिक्रम व व्यवस्था में कोई स्थान नहीं दिया गया है व इन्हें इस व्यवस्था से बाहर रखा गया है। इसके अतिरिक्त इन अछूत जातियों के साथ अनेक अपमानजनक व्यवहार किए जाते हैं। 

जैसे—केवल इनके मात्र छू लेने से ही हुआ गया व्यक्ति अछूत बन जाता है। यह धारणाएँ अनेक समाज में बनी हुई है। इसके लिए हुए गए व्यक्ति को पुनः शुद्ध होने के लिए अन्य प्रकार की शुद्धीकरण क्रियाएँ करनी होती हैं।

इसके अतिरिक्त जो व्यक्ति हुआ गया है उसके कारण पूरी जाति को अछूत मान लिया है। इसके लिए अछूत व्यक्ति को भी कई बार कठोर दंड दिया जाता है। इसके अतिरिक्त भारत के कई क्षेत्रों में विशेष रूप से दक्षिण भारत में ‘दूर से अशुद्धता’ की धारणा प्रचलित है जिसके अन्तर्गत अछूत व्यक्तियों की परछाई से भी दूर रहा जाता है। 

अछूत व्यक्तियों की किसी स्थान पर उपस्थिति से भी उस स्थान को गंदा स्थान या ‘मनहूस’ की संज्ञा दे दी जाती है। इसके अतिरिक्त ऐसे कई अपमानजनक व्यवहार हैं जो उच्च जाति के व्यक्तियों द्वारा निम्न या दलित वर्गों के साथ किए जाते हैं।

7. अस्पृश्यता के मुख्य आयामों का वर्णन कीजिए । 

Ans. अस्पृश्यता के तीन मुख्य आयाम हैं-

(i) अपवर्जन या बहिष्कार, 

(ii) अनादर एवं अधीनता, 

(iii) शोषण।

इन तीन आयामों में नीची जातियों को कुछ हद तक अधीनता और शोषण का सामना करना पड़ता है, परन्तु बहिष्कार का सामना ‘अछूत’ जातियों को ही करना पड़ता है। इन दलित जातियों को बहिष्कार के इतने भयंकर रूप भुगतने पड़ते हैं जो अन्य जातियों व समुदायों को नहीं सहने पड़ते। इन जातियों के साथ बहिष्कार के तौर पर बहुत ही अपमानजनक व्यवहार किए जाते हैं। 

8. दलित वर्गों के लिए प्रयुक्त होने वाले नामों के बारे में बताइए। वे कब व किसके द्वारा प्रयुक्त किए गए थे ? 

Ans. अस्पृश्यों को पिछले काफी समय से विभिन्न नामों से पुकारा जा रहा है। इन नामों का मूल अर्थ चाहे कुछ भी रहा हो, परन्तु अब वे अत्यन्त अपमानसूचक एवं निंदात्मक रूप ले चुके हैं। 

इन प्रचलित नामों में से अनेक शब्द गाली के तौर पर इस्तेमाल किए जाते हैं। चाहे ने उन नामों के प्रयोग पर प्रतिबंध लगा दिया है व इन नामों का प्रयोग करना एक वांछनीय अपराध है। इसके लिए महात्मा गाँधी ने इन जाति नामों के निंदात्मक प्रयोग को दूर सरकार करने के लिए 1930 के दशक में ‘हरिजन’ शब्द दिया।

 बाद में इन अस्पृश्य जातियों को ‘हरिजन’ अर्थात् (परमात्मा के बच्चे) के नाम से पुकारा जाने लगा व यह नाम काफी लोकप्रिय हुआ। इन जातियों के समुदायों और नेताओं ने भी अस्पृश्य जातियों के लिए ‘दलित’ शब्द दिया। यह नाम इन समूहों का उल्लेख करने के लिए आमतौर पर स्वीकार कर लिया गया है।

 ‘दलित’ शब्द का भारतीय भाषा में अर्थ है- पैरों से कुचला हुआ। यह शब्द उत्पीड़न के भाव का द्योतक है। अर्थात् दलित शब्द यह दर्शाता है कि इन जातियों के लोगों को काफी समय से पीड़ित किया जा रहा है।

“दलित’ शब्द का प्रयोग न तो डॉ. अम्बेडकर द्वारा गढ़ा गया न ही उनके द्वारा इसका प्रयोग किया गया। वे भी एक अनुसूचित जाति से सम्बन्ध रखते थे। परन्तु उनके चिंतन, दर्शन एवं उनके आंदोलनों का मूल भाव निश्चित रूप से इस शब्द में शामिल है। 

9. जातियों और जनजातियों के प्रति भेदभाव को मिटाने के लिए राज्य और अन्य संगठनों द्वारा उठाए गए कुछ महत्त्वपूर्ण कदमों के बारे में बताइए ।

Ans. भारत में जातियों और जनजातियों के प्रति स्वतन्त्रता प्राप्ति से पूर्व ही भेदभाव किया जा रहा है। स्वतन्त्रता प्राप्ति से पूर्व ही भारत सरकार अनुसूचित जनजातियों व जातियों के लिए अनेक कार्यक्रम चलाती रही है। भारत में ब्रिटिश सरकार ने 1935 में अनुसूचित जातियों और जनजातियों की ‘अनुसूचियाँ’ तैयार की थीं जिनमें उन जातियों तथा जनजातियों के नाम दिए गए थे जिनके विरुद्ध काफी भेदभाव बरता जाता था। इसके अतिरिक्त स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद भी कुछ अन्य नीतियों को शुरू किया गया। 

इसका अर्थ यह नहीं कि स्वतन्त्रता प्राप्ति से पूर्व की नीतियों को बन्द कर दिया बल्कि उन नीतियों को भी सुचारु रूप से चलाया गया। इसके अतिरिक्त 1990 के दशक के प्रारंभिक वर्षों से ‘अन्य पिछड़े वर्गों’ के लिए भी कुछ विशेष कार्यक्रम जोड़ दिए गए हैं। राज्य की ओर से भी पुराने व वर्तमान जातीय भेदभाव को दूर करने के लिए कई महत्त्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं जिनमें सर्वाधिक लोकप्रिय ‘आरक्षण’ है। 

चाहे कुछ वर्गों के समूहों को इनसे परेशानी हुई है परन्तु निम्न जाति व अनुसूचित जनजाति के समूहों को इससे काफी लाभ हुआ है। आरक्षण के अन्तर्गत सार्वजनिक जीवन के विभिन्न पदों में अनुसूचित जातियों और जनजातियों के सदस्यों के लिए कुछ स्थान या सीटें निर्धारित कर दी जाती हैं। इन सीटों पर केवल इन्हीं जातियों के लोगों का अधिकार होता है। 

किसी भी शर्त या कीमत पर ये सीटें किसी और वर्ग या जाति समूह को नहीं दी जातीं। इन आरक्षणों में अनेक किस्म के आरक्षण, जैसे-राज्य और केन्द्रीय विधान मंडलों में सीटों का आरक्षण, सभी विभागों और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के अन्तर्गत सरकारी सेवा में नौकरियों का आरक्षण, शैक्षिक संस्थाओं में सीटों का आरक्षण।

10. ऐसे अनेक कानूनों का उल्लेख कीजिए जो जातियों और जनजातियों के प्रति भेदभाव को दूर करने के लिए बनाए गए। 

Ans. भारत सरकार द्वारा इन जातियों व जनजातियों के प्रति भेदभाव को दूर करने के लिए अनेक कार्यक्रम चलाए गए जिनमें से सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण ‘आरक्षण’ प्रदान करना था, जो इन जातियों के लिए काफी सहयोगी साबित हो रहा है। 

इसके अतिरिक्त सरकार ने इन जातियों व जनजातियों के लिए कानून भी बनाए हैं, जो जातीय भेदभाव विशेष रूप से अस्पृश्यता को खत्म करने व रोकने व इसका दुरुपयोग करने वालों के लिए दण्ड देने के लिए बनाए गए हैं। इन कानूनों का प्रमुख उद्देश्य इन जातियों व जनजातियों को सामाजिक भेदभाव से दूर रखना व उन्हें उनके अधिकार दिलाना है । विभिन्न कानूनों का उल्लेख इस प्रकार है-

(i) 1850 का ‘जातीय निर्योग्यता निवारण अधिनियम कानून’- इस कानून के अन्तर्गत यह व्यवस्था थी कि धर्म या जाति के परिवर्तन के कारण नागरिकों के अधिकारों को कम नहीं किया जाएगा। अर्थात् यदि कोई व्यक्ति जाति परिवर्तन या धर्म-परिवर्तन करता है तो उसके अधिकारों को कम नहीं किया जाएगा।

(ii) 1950 का ‘भारत का संविधान’ इस संविधान के अन्तर्गत भी जातियों व जनजातियों के लिए कई प्रावधान किए गए। इसके अन्तर्गत अस्पृश्यता का उन्मूलन किया गया व उपयुक्त आरक्षण संबंधित उपबंध लागू किए गए।

(iii) 1989 का ‘अनुसूचित जाति और जनजाति अधिनियम’- यह अधिनियम जातियों व जनजातियों के प्रति हिंसात्मक व अपमानजनक कार्यों को रोकने के लिए किया गया था। इस अधिनियिम ने दलितों और आदिवासियों के विरुद्ध हिंसा और अपमानजनक कार्यों के लिए दंड देने के उपबंधों में संशोधित करके उन्हें और मजबूत बना दिया। यदि कोई व्यक्ति या समूह आदिवासियों के प्रति हिंसा करता है तो उसे इस अधिनियम के अन्तर्गत कठोर कानूनन दंड दिया जाएगा।

(iv) 2005 का ‘संविधान संशोधन अधिनियम’- यह अविनियम 23 जनवरी, 2006 को कानून बना। यह कानून मुख्यतः शिक्षा से संबंधित था। यह अधिनियम 93वाँ संशोधन था जिसके अन्तर्गत उच्चतर शिक्षा की संस्थाओं में अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण अर्थात् सीटों को- सुरक्षित रखा गया। 

11. विभिन्न नेताओं द्वारा जातियों व जनजातियों के लिए किए गए प्रयत्नों का उल्लेख कीजिए।

Ans. विभिन्न व्यक्तियों, समुदाय द्वारा जातियों व जनजातियों के लिए विभिन्न प्रकार के प्रयास किए गए जिनमें से कुछ सफल रहे तो कुछ विफल। इसके अतिरिक्त दलित लोगों व समुदायों ने भी अपने अधिकारों को प्राप्त करने के लिए अनेक राजनीतिक आंदोलनात्मक और सांस्कृतिको पर अनेक सक्रिय कार्य किए है। इसके अतिरिक्त विभिन्न नेताओं जैसे-ज्योतिबा फुले, इयोतीदास, पेरियार, अम्बेडकर जैसे अनेक दलित नेताओं स्वतन्त्रता ने प्राप्ति से पूर्व आंदोलन व संघर्ष किए। इसके अतिरिक्त स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् भी उत्तर प्रदेश की समाज पार्टी व कर्नाटक की दलित संघर्ष समिति ने भी अनेक आंदोलन चलाए। 

बहुजन इसी प्रकार समय-समय पर इन आंदोलनों को उजागर किया जाता है ताकि दलितों को उनके अधिकार प्राप्त हो सके। 

12. अन्य पिछड़े वर्गों को परिभाषित कीजिए व उल्लेख कीजिए ।

Ans. अन्य पिछड़े वर्ग-अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों के अलावा ऐसे अनेक समूह हैं जिन्हें अछूत तो नहीं माना जाता था, परन्तु नीचा समझा जाता था। ये समूह सामाजिक  असुविधाओं से पीड़ित हैं। इन समूहों को ‘सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़ा वर्ग’ कहा जाता है।

ये समूह शिल्पी (कारीगर) जातियों के लोग थे जिन्हें जाति-सोपान में नीया स्थान दिया गया था। ऐसे समूह जातियों पर आधारित नहीं होते, लेकिन फिर भी इन समूहों को जाति के आधार पर ही पहचाना जाता है। 

जनजाति की श्रेणी की तरह अन्य पिछड़े वर्गों को भी नकारात्मक रूप से जाना जाता है। उन्हें न तो ‘अगड़ी’ कही जाने वाली जाति में स्थान प्राप्त है, न ही निम्न जातियों में। परन्तु आज इन जातियों द्वारा विभिन्न धर्मों को अपना लेने से ये जातियाँ विभिन्न धर्मो में पाई जाती हैं।

उच्च स्तर के अन्य पिछड़े वर्गों और निम्न स्तर के अन्य पिछड़े वर्गों के लोग जो बहुत गरीब तथा सुविधाओं से वंचित हैं, के बीच पाई जाने वाली घोर विषमताओं ने कई समस्याओं से निपटने के कार्य को बहुत कठिन बना दिया है। 

भूधारण और राजनीतिक प्रतिनिधित्व जहाँ उनके विधायकों तथा सांसदों की संख्या काफी है अन्य सभी कार्यक्षेत्रों में पिछड़े वर्गों का प्रतिनिधित्व काफी कम है। यद्यपि पिछड़े वर्ग ग्रामीण क्षेत्रों में अपना प्रभुत्व बनाए हुए हैं। 


दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (LONG ANSWER TYPE QUESTIONS)


1. ‘सामाजिक विषमता’ व ‘सामाजिक स्तरीकरण’ को परिभाषित कीजिए। सामाजिक स्तरीकरण के मुख्य सिद्धांतों की व्याख्या कीजिए ।

Ans. सामाजिक विषमता सामाजिक संसाधनों तक असमान पहुँच की पद्धति, सामाजिक विषमता कहलाती है। यह व्यक्तियों के मध्य स्वाभाविक भिन्नता को प्रतिबिंबित करती है। उदाहरण के तौर पर, व्यक्तियों की योग्यता व प्रयास में भिन्नता होना। 

इसका अर्थ यह है कि कोई भी व्यक्ति बुद्धिमान या प्रतिभावान हो सकता है। इसके विपरीत यह भी कहा जा सकता है कि उस व्यक्ति ने कठोर परिश्रम द्वारा ही समृद्धि प्राप्त की है। इसका अर्थ है- योग्यता जहाँ बुद्धिमत्ता से सम्बन्धित है, वहीं प्रयास कठोर परिश्रम से। सामाजिक विषमता व्यक्तियों के बीच उस समाज द्वारा उत्पन्न की जाती है जिसमें वे रहते हैं। 

सामाजिक विषमता व्यक्तियों के बीच दशा, स्थिति, रंग इत्यादि के आधार पर उपलब्ध नहीं की जा सकती।

सामाजिक संसाधन पूँजी अर्थात् गुण, धन इत्यादि को तीन रूपों में विभाजित किया जा सकता है जो इस प्रकार है-

(i) आर्थिक पूँजी 

(ii) सांस्कृतिक पूँजी 

(iii) सामाजिक पूँजी

(i) आर्थिक पूँजी – इसका अर्थ उस पूँजी से है जो हमारे पास किसी आय या पूर्वजों की सम्पत्ति से प्राप्त होती है।

(ii) सांस्कृतिक पूँजी यह पूँजी हमारी प्रतिष्ठा और वैक्षणिक योग्यताओं के रूप में परिभाषित की जा सकती है।

(iii) सामाजिक पूँजी- यह वह पूँजी है जो हमें हमारे समाज की सामाजिक संगतियों एवं वहाँ के लोगों से मिलने-जुलने के संपर्क जाल से प्राप्त होती है। आपसी संबंध यह तीनों रूप आपस में एक-दूसरे से संबंधित हैं अर्थात् एक पूँजी के द्वारा दूसरे स्तर की पूँजी को प्राप्त किया जा सकता है।

(i) आर्थिक पूँजी अर्थात् अपने कमाए धन से कोई भी व्यक्ति उच्च शिक्षा प्राप्त कर सकता है। इसका अर्थ है कि आर्थिक पूँजी को सांस्कृतिक पूँजी में बदला जा सकता है। 

(ii) कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति की राय या निर्देशन से अच्छी नौकरी प्राप्त कर सकता है या धन कमाने के साधन ढूँढ सकता है। इसका अर्थ है कि सामाजिक पूँजी को आर्थिक पूँजी में बदला जा सकता है।

सामाजिक स्तरीकरण-वह व्यवस्था जो समाज में लोगों का वर्गीकरण करते हुए एक अधिक्रमिक संरचना में उन लोगों को श्रेणीबद्ध करती है, उसे सामाजिक स्तरीकरण कहा जाता है। सामाजिक स्तरीकरण के तीन मुख्य सिद्धान्त हैं जो इस प्रकार हैं-

(i) सामाजिक स्तरीकरण व्यक्तियों के बीच की विभिन्नता का प्रकार्य ही नहीं, बल्कि समाज की एक विशिष्टता है-सामाजिक स्तरीकरण समाज में व्यापक रूप से पाई जाने वाली व्यवस्था है जो सामाजिक संसाधनों को, लोगों की विभिन्न श्रेणियों में, असमान रूप से बाँटती है। 

(ii) सामाजिक स्तरीकरण पीढ़ी-दर-पीढ़ी बना रहता है-यह परिवार और सामाजिक संसाधनों के एक पीढ़ी से अगली पीढ़ी में उत्तराधिकार के रूप में घनिष्ठता से जुड़ा है। एक व्यक्ति की सामाजिक स्थिति प्रदत्त अर्थात् अपने आप मिली हुई होती है। अर्थात् बच्चे अपने माता-पिता की सामाजिक स्थिति को पाते हैं। जाति व्यवस्था के अंदर, जन्म ही व्यावसायिक अवसरों को निर्धारित करता है। 

(ii) सामाजिक स्तरीकरण को विश्वास या विचारधारा द्वारा समर्थन मिलता है-सामाजिक स्तरीकरण की कोई भी व्यवस्था पीढ़ी-दर-पीढ़ी नहीं चल सकती जब तक कि व्यापक तौर पर यह माना न जाता हो कि वह या तो न्यायसंगत या अपरिहार्य है। उदाहरण के लिए, जाति व्यवस्था को धार्मिक या कर्मकांडीय दृष्टिकोण से शुद्धता एवं अशुद्धता के आधार पर न्यायोचित ठहराया जाता है जिसमें जन्म और व्यवसाय की बदौलत ब्राह्मणों को सबसे उच्च स्थिति और दलितों को सबसे निम्न स्थिति दी गई है। 

2. पूर्वाग्रह का अर्थ समझाइए व यह किन-किन धारणाओं पर आधारित होते हैं वर्णन कीजिए। भेदभाव का अर्थ स्पष्ट कीजिए ।

Ans. पूर्वाग्रह- इसका स्पष्ट शब्दों में अर्थ है कि किसी व्यक्ति या समूह के बारे में पूर्वनिर्धारित विचार रखना। ऐसे विचार जिसे लोग नई जानकारी प्राप्त होने पर भी बदलने को तैयार न हों। पूर्वाग्रह अधिकतर किसी दूसरे व्यक्ति या समुदाय के बारे में नकारात्मक सोच पर आधारित होता है। 

अर्थात् यदि किसी समूह के बारे में कोई सकारात्मक विचार भी प्राप्त हो तो दूसरा समूह उस समूह के बारे में अपनी विचारधारा न बदलें। लोग दूसरे सामाजिक समूहों के बारे में ज्यादातर पूर्वाग्रह से ग्रस्त होते हैं। 

प्रत्येक व्यक्ति एक समुदाय के सदस्य के रूप में बड़ा होता है जिससे वह हर अपने समुदाय, जाति, वर्ग या लिंग के बारे में ही जानकारी प्राप्त नहीं करता बल्कि दूसरे समुदायों के बारे में भी धारणाएँ बनाता है। ये धारणाएँ पूर्वाग्रहित होती हैं जो सकारात्मक भी हो सकती हैं व नकारात्मक भी पूर्वाग्रह ज्यादातर एक समूह के बारे में तीन धारणाओं पर आधारित होते हैं-

(i) अपरिवर्तनीय (ii) कठोर (a) पारणाएँ

रूढ़िबद्ध धारणाएँ-रूढ़िबद्ध धारणाएँ औपनिवेशिक काल की ही देन है। यह उपनिवेश भारत में बहुत लंबे समय तक पैर जमाए रहे। इसके द्वारा ही कुछ समुदायों को जहाँ वीर जाति की संज्ञा दी गई तो कुछ को कायर, पौरुषहीन या दगाबाज कहा गया। 

रूढ़िबद्ध धारणाएँ नृजातीय और प्रजातीय समूहों और महिलाओं के बारे में ही अधिकतर प्रयोग की जाती हैं। कुछ व्यक्तियों या समूहों को जहाँ कायर, पौरुषहीन इत्यादि कहा गया तो यह तर्क उचित माना गया कि किसी समूह या समाज में कुछ लोग कायर हो सकते हैं, परन्तु पूरा समूह या समाज नहीं। 

रूढ़िबद्ध धारणाएँ पूरे समूह को एक समान श्रेणी में स्थापित कर देती है व इस धारणा के अन्तर्गत व्यक्तिगत, परिस्थिति अनुरूप भिन्नता को भी नकार दिया जाता है। इसके अनुसार पूरे समुदास को एकल व्यक्ति के रूप में देखा जाता है। अर्थात् यदि उसमें कोई एक व्यक्ति गुणरहित हो या कायर हो तो पूरे समुदाय को ही कायर मान लिया जाता है।

भेदभाव-भेदभाव को इस अर्थ में समझा जा सकता है कि यह किसी समूह या विशेष व्यक्ति के प्रति किया गया व्यवहार है। अर्थात् जहाँ यदि किसी एक विशेष समुदाय या व्यक्ति के प्रति सकारात्मक सोच रखी जाती है तो अन्य व्यक्ति या समुदाय के प्रति अवश्य ही नकारात्मक सोच रखी जाएगी। भेदभाव को इस प्रकार भी देखा जा सकता है जिसके तहत एक समूह के सदस्य उन अवसरों के लिए अयोग्य करार दिए जाते हैं जो दूसरों के लिए खुले होते हैं। 

जैसे—जब किसी व्यक्ति को उसके लिंग, जाति या धर्म के आधार पर नौकरी देने से मना कर दिया जाता है। भेदभाव को इस तरह भी प्रदर्शित किया जा सकता है जैसे वह किसी दूसरे कारणों द्वारा प्रेरित हो, जो भेदभाव को न दर्शाकर किसी अन्य कारण को दर्शाता है, जैसे किसी व्यक्ति को भेदभाव के आधार पर नौकरी न देना व बाद में यह तर्क देना की उसकी योग्यता दूसरों से कम है। 

3. सामाजिक अपवर्जन या बहिष्कार का वर्णन कीजिए।

Ans. सामाजिक अपवर्जन- ऐसे तौर-तरीके या अनैच्छिक तरीके जिनके द्वारा किसी व्यक्ति या समूह पर यह प्रतिबंध लगाया जाता है कि वह किसी अन्य समूह या समाज से घुल-मिल या बातचीत नहीं कर सकते, उन्हें पूर्ण रूप से बाहरी समाज से अलग रखा जाता है। 

बहिष्कार बहिष्कृत लोगों के साथ किया जाता है, वह उनकी इच्छा के विरुद्ध होता है। वे नहीं चाहते कि उनके साथ इस तरह का व्यवहार किया जाए। भेदभाव अथवा अपमानजनक व्यवहार का अनुभव इस तरह की प्रक्रिया के रूप में प्रकट होता है कि बहिष्कृत लोग समाज से पूर्ण रूप से अलग हो जाते हैं। 

बहिष्कार उन कारकों को दर्शाता है जो अवसर अधिकांश जनसंख्या के लिए तो खुले होते हैं, परन्तु किसी विशेष व्यक्ति या समूह के लिए उन अवसरों को प्राप्त करने की मनाही होती है। प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन काल में रोटी, कपड़ा व मकान इत्यादि के अलावा अन्य सामाजिक उपभोगों, जैसे- स्वास्थ्य सुविधाएँ, यातायात के साधन, बीमा, पुलिस, बैंक, सामाजिक सुरक्षा आदि की आवश्यकताएँ भी होती हैं। इसके अतिरिक्त पुलिस सुरक्षा व न्यायपालिका भी एक आवश्यक जरूरत है। 

परन्तु इन सुविधाओं को कुछ ही समूहों व समुदायों के अन्तर्गत ही बाँटा जाता है। बाकी अन्य समूहों को इन सुविधाओं से अलग ही रखा जाता है। सामाजिक भेदभाव सभी समुदाय के साथ समान रूप से न करके किसी एक विशेष समुदाय या समूह के प्रति किया जाता है।

किसी समुदाय, समूह या व्यक्ति के साथ बहिष्कार या सामाजिक अपवर्जन इस हद तक किया जाता है कि बहिष्कृत लोग व्यक्तिगत मुख्य धारा में शामिल होना ही बंद कर देते हैं। 

उच्च जाति के समुदायों द्वारा निम्न जाति के लोगों का मंदिरों में प्रवेश पर पाबन्दी लगाने से यह परिणाम हुआ कि निम्न जाति के लोगों ने अपने मंदिर बना लिए हैं या कुछ ने तो बौद्ध, जैन, ईसाई इत्यादि धर्मों को ही अपना लिया है। ऐसा करने के पश्चात् वे हिंदू मंदिर में प्रवेश करने या किसी भी धार्मिक उत्सव में सम्मिलित होने के इच्छुक नहीं होंगे। 

अधिकांश समाजों की तरह भारत में भी सामाजिक भेदभाव तथा बहिष्कार चरम रूप में पाया जाता है। चाहे पुराने समय में इसके विरुद्ध कई आंदोलन किए गए, परन्तु पूर्वाग्रह ने अपनी जड़ें गड़ाए रखी हैं। इसके अतिरिक्त

और अधिक पूर्वाग्रहों की स्थिति उत्पन्न हो गई है। इसलिए यह आवश्यक है कि इसे रोकने या समाप्त करने के लिए परिवर्तन, जागरूकता एवं संवेदनशीलता के साथ एक सतत् सामाजिक अभियान चलाया जाए।

4. ‘जाति’ शब्द को परिभाषित कीजिए व वर्णन कीजिए कि जाति एक भेदभावपूर्ण व्यवस्था का हिस्सा बन गई है।

Ans. जाति-यह एक विशिष्ट भारतीय सामाजिक संस्था है जो विशेष जातियों में पैदा व्यक्तियों के प्रति भेदभावपूर्ण व्यवहोर को उजागर करती है व उसे न्यायसंगत ठहराती भेदभावपूर्ण व्यवहार का अर्थ अपमानजनक व्यवहार, बहिष्कारिता तथा शोषणकारिता से है। प्रत्येक जाति एक व्यवसाय से संबंधित होती है व ऐतिहासिक काल में भी इसके परिणाम मिले हैं। 

प्रत्येक जाति का अपना एक व्यवसाय निर्धारित था। एक विशेष जाति में जन्मा व्यक्ति उस व्यवसाय में भी जन्म लेता था जो उस जाति से जुड़ा हुआ था। उस व्यक्ति को उसी व्यवसाय को ही अपनाना पड़ता था। प्रत्येक जाति का सामाजिक प्रस्थिति या हैसियत में एक विशेष स्थान होता था। सिर्फ सामाजिक प्रस्थिति के अनुसार ही व्यावसायिक श्रेणियाँ श्रेणीबद्ध नहीं थी, बल्कि प्रत्येक वृहत् व्यावसायिक श्रेणी के अन्दर पुनः श्रेणीक्रम था। 

हालांकि वास्तविक ऐतिहासिक व्यवहार में सामाजिक तथा आर्थिक प्रस्थिति एक-दूसरे से सम्बन्धित होती हैं। अतः स्पष्टतया सामाजिक तथा आर्थिक हैसियत में घनिष्ठ संबंध था- ‘उच्च जातियाँ प्रायः उच्च आर्थिक प्रस्थिति की थीं, जबकि ‘निम्न’ जातियाँ प्रायः निम्न आर्थिक स्थिति की होती थीं। 

19वीं सदी से जाति तथा व्यवसाय के बीच की कड़ी कुछ कमजोर हुई है। व्यावसायिक परिवर्तन संबंधित आनुष्ठानिक-धार्मिक प्रतिबंध आज के समय में उतनी सरलता से लागू नहीं किए जा सकते, तथा पहले की अपेक्षा अब व्यवसाय परिवर्तन आसान हो गया है। 

जहाँ पहले एक विशेष जाति के व्यक्ति को अपनी जाति के ही व्यवसाय को अपनाना पड़ता था, वहीं आज कोई भी जाति अपने सदस्यों पर यह प्रतिबंध नहीं लगा सकती कि उस जाति के सदस्य अन्य जातियों द्वारा अपनाए गए व्यवसाय को नहीं अपना सकते हैं। आज पहले की अपेक्षा जाति तथा आर्थिक स्थिति के सह-संबंध भी कमजोर हुए हैं। 

जहाँ पहले अमीर लोग व गरीब व्यक्ति किसी एक विशेष जाति में ही पाए जाते थे, वहीं आज अमीर व गरीब व्यक्ति प्रत्येक जाति में देखने को मिल जाते हैं। परन्तु मुख्य बात यह है कि जाति-वर्ग का परस्पर संबंध बृहत् स्तर पर अभी भी पूरी तरह कायम है। परन्तु आज भी विभिन्न सामाजिक आर्थिक समूहों के बीच जातीय अन्तर बना हुआ है।

तरह इन सबके आधार पर यह कहा जा सकता है कि समाज में व्यापक स्तर पर अधिक परिवर्तन नहीं हुआ है, चाहे इसमें कुछ बदलाव जरूर आए हैं। आज भी उच्च जाति के लोग। सम्पन्न ऊँचे ओहदे वाले वर्ग में अधिक हैं व निम्न जाति के लोग वंचित वर्ग में। जनजाति – एक सामाजिक समूह जिसमें कई परिवार, वंशज इत्यादि सम्मिलित हों और जो

नातेदारी, सजातीयता, सामान्य इतिहास अथवा प्रादेशिक राजनीतिक संगठन के साँझे संबंधों पर आधारित हो। जाति व जनजाति में यह अन्तर है कि जाति परस्पर अलग-अलग जातियों की अधिक्रमिक व्यवस्था है, जबकि जनजाति एक समावेशात्मक समूह होती है। चाहे इसमें कुलों या वंशों पर आधारित विभाजन हो सकते हैं।

5. दक्षिण अफ्रीका में अल्पसंख्यक श्वेतों द्वारा अपने विशेषाधिकार को सुरक्षित रखने का प्रयास में बहुसंख्यक अश्वेतों को क्या हानि उठानी पड़ी ? Or, 1948 के पश्चात् दक्षिण अफ्रीका के बहुसंख्यकों को किन-किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ा ?

Ans. भारत की जाति प्रथा की तरह दक्षिण अफ्रीका में प्रजाति के आधार पर समाज को श्रेणीबद्ध किया गया है। लगभग हर सात दक्षिण अफ्रीकी व्यक्ति में से एक यूरोपीय वंश का है, फिर भी दक्षिण अफ्रीका के अल्पसंख्यक श्वेतों का वहाँ की शक्ति एवं संपदा पर प्रबल अधिकार है। डच व्यापारी 17वीं शताब्दी के मध्य में दक्षिण अफ्रीका में बस गए। 19वीं शताब्दी के शुरू में उनके वंशजों को ब्रिटिश औपनिवेशकों द्वारा भीतरी प्रदेशों में खदेड़ दिया गया था।

बीसवीं सदी की शुरुआत में अंग्रेजों ने पहले संघ का तथा बाद में दक्षिण अफ्रीकी गणराज्य पर नियंत्रण कर लिया।

6. ‘अस्पृश्यता’ को परिभाषित कीजिए। “विभिन्न समुदाय व जातियों के लिए

अस्पश्यता एक श्राप की भाँति है।” इस कथन की पुष्टि कीजिए। Or, ‘अस्पृश्यता’ आज भारत के कुछ पिछड़े वर्गों में एक अपमानजनक व्यवहार समझा जाता है। अपने तर्क के पक्ष में उत्तर दीजिए।

Ans. अस्पृश्यता -जाति-व्यवस्था का एक अत्यन्त घृणित एवं दूषित पहलू जो धार्मिक एवं कर्मकांडीय दृष्टि से शुद्धता एवं अशुद्धता के पैमाने पर सबसे नीची मानी जानी वाली जातियों के सदस्यों के विरुद्ध अत्यन्त कठोर सामाजिक दंडों का विधान करता है। ‘अस्पृश्यता’ को ‘छुआछूत’ शब्द से भी जाना जाता है व अधिकतर नीची जातियों के लिए अछूत शब्द का प्रयोग किया जाता है। 

अस्पृश्य या अछूत जातियों को जाति-अधिक्रम व व्यवस्था में कोई स्थान नहीं दिया गया है व इन्हें इस व्यवस्था से बाहर रखा गया है। इसके अतिरिक्त इन अछूत जातियों के साथ अनेक अपमानजनक व्यवहार किए जाते हैं। 

जैसे केवल इनके मात्र छू लेने से ही हुआ गया व्यक्ति अछूत बन जाता है। यह धारणा अनेक समाजों में बनी हुई है। इसके लिए हुए गए व्यक्ति को पुनः शुद्ध होने के लिए अन्य प्रकार की शुद्धीकरण क्रियाएँ करनी पड़ती हैं।

इसके अतिरिक्त जो व्यक्ति हुआ गया है उसके कारण पूरी जाति को अछूत मान लिया है। इसके लिए अछूत व्यक्ति को भी कई बार कठोर दंड दिया जाता है। इसके अतिरिक्त भारत के कई क्षेत्रों में विशेष रूप से दक्षिण भारत में ‘दूर से अशुद्धता’ की धारणा प्रचलित है जिसके अन्तर्गत अछूत व्यक्तियों की परछाई से भी दूर रहा जाता है। 

अछूत व्यक्तियों की किसी स्थान पर उपस्थिति से भी उस स्थान को गंदा स्थान या ‘मनहूस’ की संज्ञा दे दी जाती है। इसके अतिरिक्त ऐसे कई अपमानजनक व्यवहार है जो उच्च जाति के व्यक्तियों द्वारा निम्न या इति वर्गों के साथ किए जात हैं। 

अस्पृश्यता के तीन मुख्य आयाम हैं- 

(i) अपवर्जन या बहिष्कार, 

(ii) अनादर एवं अधीनता 

(iii) शोषण इन तीन आयामों में नीची जातियों को कुछ हद तक अधीनता और शोषण का सामना करना पड़ता है, परन्तु बहिष्कार का सामान ‘अछूत’ जातियों को करना पड़ता है। इन दलित जातियों को बतिष्कार के इतने भयंकर रूप भुगतने पड़ते हैं जो अन्य जातियों व समुदायों को नहीं सहने पड़ते । 

इन जातियों के साथ बहिष्कार के तीर पर बहुत ही अपमानजनक व्यवहार किए जाते हैं। उदाहरणतया, इन अछूत जातियों के लोगों को पेयजल के समान स्रोतों से पानी नहीं लेने दिया जाता। उनके हैंडपम्प, घाट व कुएँ अलग ही होते हैं। उन्हें सामूहिक पूजा व आराधना, सामाजिक समारोहों और त्योहारों-उत्सवों में भाग नहीं लिया जाता। इसके अतिरिक्त उनसे अनेक छोटे दर्जे के काम करवाए जाते हैं और यह काम उनसे जबरदस्ती करवाए जाते हैं। इन छोटे कार्यों में किसी धार्मिक उत्सव या विवाह इत्यादि में ढोल-नगाड़े बजवाना इत्यादि शामिल हैं।

7. भारत में जातियों एवं जनजातियों को स्वतन्त्रता के बाद भारत सरकार से प्राप्त कुछ सुविधाओं के बारे में बताइए उन कानूनों का वर्णन कीजिए जो भारत सरकार ने जातियों एवं जनजातियों के लिए बनाया है। 

Ans. भारत में जातियों और जनजातियों के प्रति स्वतन्त्रता प्राप्ति से पूर्व ही भेदभाव किया जा रहा है। स्वतन्त्रता प्राप्ति से पूर्व ही भारत सरकार अनुसूचित जन‌जातियों व जातियों के लिए अनेक कार्यक्रम चलाती रही है। 

भारत में ब्रिटिश सरकार ने 1935 में अनुसूचित जातियों और जनजातियों की ‘अनुसूधियों’ तैयार की थीं जिनमें उन जातियों तथा जनजातियों के नाम दिए गए थे जिनके विरुद्ध काफी भेदभाव बरता जाता था। इसके अतिरिक्त स्वतन्त्रता प्राप्ति से पूर्व की नीतियों को बन्द कर दिया बल्कि उन नीतियों को भी सुधारा रूप से चलाया गया। इसके अतिरिक्त 1990 के दशक के प्रारंभिक वर्षों में अन्य पिछड़े वर्गों के लिए भी कुछ विशेष कार्यक्रम जोड़ दिए गए हैं। 

राज्य की ओर से भी पुराने व वर्तमान जातीय भेदभाव को दूर करने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं जिनमें सर्वाधिक लोकप्रिय ‘आरक्षण’ है। चाहे कुछ उपत के समूहों को इनसे परेशानी हुई है, परन्तु निम्न जाति व अनुसूचित जनजाति के समूहों को इससे काफी लाभ हुआ है। आरक्षण के अन्तर्गत सार्वजनिक जीवन के विभिन्न पक्षों में अनुसूचित जातियों और जनजातियों के सदस्यों के लिए कुछ स्थान या सीटे निर्धारित कर दी जाती है। 

इन सीटों पर केवल इन्ही जातियों के लोगों का अधिकार होता है। किसी भी शर्त या कीमत पर पह सीटें किसी और वर्ग या जाति समूह को नहीं दी जाती। इन आरक्षणों में अनेक किस्म के आरक्षण, जैसे-राज्य और केन्द्रीय विधान मंडलों में सीटों का आरक्षण, सभी विभागों और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के अन्तर्गत सरकारी सेवा में नौकरियों का आरक्षण, शैक्षिक संस्थाओं में सीटों का आरक्षण।

आरक्षित सीटों का अनुपात समस्त जनसंख्या में अनुसूचित जातियों और जनजातियों के प्रतिशतांश के बराबर होता है। लेकिन अन्य पिछड़े वर्गों के लिए यह अनुपात अलग आधार पर निश्चित किया गया है। कई सिद्धांत जो सरकार के विकास कार्यक्रमों पर लागू किया गया है, उनमें से कुछ विशेष रूप से अनुसूचित जातियों या जनजातियों के लिए हैं, जबकि कुछ को अन्य कार्यक्रमों में अधिमान्यता दी जाती है।

भारत सरकार द्वारा इन जातियों व जनजातियों के प्रति भेदभाव को दूर करने के लिए अनेक कार्यक्रम चलाए गए जिनमें से सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण ‘आरक्षण’ प्रदान करना था, जो इन जातियों के लिए काफी सहयोगी साबित हो रहा है। इसके अतिरिक्त सरकार ने इन जातियों व जनजातियों के लिए कानून भी बनाए हैं जो जातीय भेदभाव, विशेष रूप से अस्पृश्यता को खत्म करने व रोकने व इसका दुरुपयोग करने वालों के लिए दण्ड देने के लिए बनाए गए हैं।


FAQs


1. राजा राममोहन राय द्वारा स्वियों के अधिकारों व उनकी परिस्थिति सुधारने के लिए किए गए प्रयत्नों का उल्लेख कीजिए ।

Ans. 19वीं शताब्दी के सामाजिक सुधारों में राजा राममोहन राय के प्रयत्न उल्लेखनीय हैं। उन्होंने 1828 में ब्रह्म समाज की स्थापना से पूर्व ‘सती’ प्रथा के विरुद्ध अभियान चलाया। उन्होंने सती प्रथा का विरोध मानवतावादी तथा नैसर्गिक अधिकारों के सिद्धांतों एवं हिन्दू शास्त्र के आधार पर किया। यह पहला स्त्री संबंधी मुद्दा था जिसने आम जनता को स्त्रियों की परिस्थिति व अधिकारों की ओर ध्यान आकर्षित किया।

2. बॉम्बे प्रेसिडेंसी के सुधारक कौन थे ? उनके द्वारा स्त्रियों के अधिकारी के लिए क्या-क्या प्रयत्न किए गए ?

Ans. बॉम्बे प्रेसिडेंसी के सुधारकों में ‘रानाडे’ का नाम अग्रणीय है। उन्होंने विधवाओं पुनर्विवाह के लिए कई अभियान चलाए। इसके लिए उन्होंने दो ग्रंथों ‘दि टेक्स्टस् ऑफ द हिं लॉ आन द लॉफुलनेश ऑफ द रीमैरिज ऑफ विडोज’ और ‘वेदिक अथॉरिटीज फॉर विडो मैरिज में विधवा विवाह के लिए शास्त्रीय स्वीकृति का विवेचन किया।

3. ‘ज्योतिबा फूले’ द्वारा स्त्रियों के लिए किए गए प्रयासों का विवरण दीजिए। 

Ans. सामाजिक दृष्टि से अपवर्जित जाति से भी एक समाज सुधारक का जन्म हुआ ज था, ‘ज्योतिबा फूले’। उन्होंने जातीय और लैंगिक दोनों प्रकार के भेदभाव के विरुद्ध आवाज उठाई। उन्होंने सत्य की खोज पर बल देने के लिए ‘सत्यशोधक समाज’ नामक संस्था की स्थापना की। उन्होंने ब्राह्मण संस्कृति में नीच समझे जाने वाले दो समूहों-स्त्रियों एवं अछूतों को सहायता देने के प्रयत्न किए।

NOTES & QUESTIONS ANSWER


  1. Introducing Indian Society
  2. The Demographic Structure of the Indian Society
  3. Social Institutions: Continuity and Change
  4. The Market as a Social Institution
  5. Patterns of Social Inequality and Exclusion
  6. The Challenges of Cultural Diversity
  7. suggestions for projects work
  1. Structural Change
  2. Cultural Change
  3. The Story of Indian Democracy
  4. Change and Development in Rural Society
  5. Change and Development in Industrial Society
  6. Globalisation and Social Change
  7. Mass Media and Communications
  8. Social Movements

MCQS IN ENGLISH


  1. Introducing Indian Society
  2. The Demographic Structure of the Indian Society
  3. Social Institutions: Continuity and Change
  4. The Market as a Social Institution
  5. Patterns of Social Inequality and Exclusion
  6. The Challenges of Cultural Diversity
  1. Structural Change
  2. Cultural Change
  3. The Story of Indian Democracy
  4. Change and Development in Rural Society
  5. Change and Development in Industrial Society
  6. Globalisation and Social Change
  7. Mass Media and Communications
  8. Social Movements

class12.in

Leave a Comment